रविवार, 12 जुलाई 2009

गरीब की बेटी

न तन पर है पूरे कपड़े, न खाने को है रोटी
क्योंकि मैं हूँ एक गरीब की बेटी
सारी इच्छाए मेरी अधूरी रह गयी
गरीबी, मेरे सपनो की दूरी बन गयी
मेरे पास भी है, इच्छायों अ अनंत आकाश
मेरे भी है कुस्छ सपने, है कुछ करने की आस
काश, मैं भी किसी बड़े घर में पैदा होती
न तन पर है पूरे कपड़े , न खाने को है रोटी
हर जगह निगाहें, तन को है तरेरती
पर मदद के वक्त, आंखे है फेरती
न जाने क्यों किया, ये अन्याय उसने मेरे साथ
दे दिया जीवन , पर कुछ भी नही है मेंरे हाथ
दुनिया बड़ी जालिम है, न जीने न मरने देती
क्योंकि मैं हूँ एक गरीब की बेटी
आपका ही मुकेश पाण्डेय "चंदन"

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खुब लिखा है, आपने मुद्दा एक ज्वंलन्त है,, आपने इक जिवित मुद्दे को उकेरा है। इस मुद्दे से जुङा मेरा लेक "प्लेटफार्म पर भटकता बचपन": ''जरुर पढे व अपनी राय दे। आभार

    उत्तर देंहटाएं
  2. एक अच्छी कविता ! मेरी रचनायें पढ्ने के लिए लाग आन करें :

    www.khuranarkk.jagranjunction.com

    www.google.com/profiles/khuranapvp

    राम कृष्ण खुराना

    उत्तर देंहटाएं

ab apki baari hai, kuchh kahne ki ...

orchha gatha

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