रविवार, 20 दिसंबर 2009

कोपेनहेगन ; बड़े-बड़ो के चोंचालें....

नमस्कार, दोस्तों
आजकल डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन पर १९२ देशो का विचार मंथन चल रहा है । हमारे प्रधानमंत्री महोदय भी वहां तशरीफ़ ले गये है । जहाँ अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के कारन उन्हें ट्राफिक जाम में फसना पड़ा । जैसा की हम सभी जानते है की , दुनिया में अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश कार्बन डाय ओक्साईड गैस का सबसे ज्यादा उत्सर्जन करते है, जिसके कारन जलवायु परिवर्तन जैसी समस्या सामने आ रही है । मगर ये देश सोचते है की इस समस्या से निपटने का सारा जिम्मा विकासशील देश ही उठाये जो की गलत ही नही बल्कि उनका गैरजिम्मेदारना रवैया दिखलाता है । खैर जैसा की पहले से ही तय लग रहा था की इस सम्मलेन से कोई हल नही निकलने वाला है । वही हो भी रहा है ।
खैर हम सरे देश वासी भी कोई बहुत जागरूक नही है। आज भी हमारे देश में पर्यावरण को लेकर कोई खास जागरूकता नही है। इसकी आगे बहुत ज्यादा जरुरत है। अगर हम जल्द ही चेते नही तो हो सकता है की हमारे देश के नक़्शे से लक्ष्यदीप और अंडमान के कई द्वीप गायब हो जाये ! हमारी जल की बर्बादी का ही नमूना ले लीजिये ॥ बिहार में हर साल बाढ़ आती है तो देश के कई हिस्से पानी को तरसते है। आज ही गाँव में खाना पकाने के कल लिए लकड़ी को जलाया जा रहा है, जबकि देश में जंगल तेजी से ख़त्म हो रहे है । सडको के प्रदुषण का तो हाल आप जानते ही है । खैर खतरे की घंटी बज रही है हम नही जागे तो फिर हो सकता है ,की हमें फिर जागने की नौबत ही न आये (तब तक बहुत देर हो चुकी होगी )
अब बरी है पुछल्ले की ......
अपने जवाहर सिंह झल्लू जो की बहुत प्रतिभाशाली है , उनसे पत्रकारों ने दुनिया में तेजी से बढ़ रही कार्बन डाय ओक्साइड की मात्र कम करने का सुझाव पूछा तो झल्लू जी ने कहा -" सरे पेड़ो को कटवा दो साले सभी पूरी रात कार्बन डे ओक्साइड का उत्सर्जन करते है ।
न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी

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