संदेश

October, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

दिवाली : एक पर्व और उद्देश्य

चित्र
दिवाली पर्व के बारे में अनेक कथाएँ और किंवदंतियाँ प्रचलित है। वैसे तो यह त्यौहार धन और प्रकश से जुदा है । मगर इस त्यौहार पर साफ़-सफाई और स्वच्छता की परंपरा भी जुडी है । हमारे ग्रंथो में कहा गया है - तमसो माँ ज्योतिरगमय अर्थात हे माँ ! मुझे अन्धकार से प्रकाश की और ले चलो । इसी उद्देश्य की सार्थकता को प्रतिबिंबित करता है ये त्यौहार । मगर आज हम बाजारवाद और आधुनिकता के अन्धानुकरण के कारन इस त्यौहार के मूल उद्देश्यों को भूल कर केवल आडम्बरो और कर्मकांडो के पीछे भाग रहे है ।


हम बाहरी चमक दमक को बढ़ने में तो खूब लगे है , मगर कभी खुद के भीतर झांक कर देखा है कि कितनी गंदगी है ?


हमने घरो के बाहर रोशनियों से जगमग कर दिया है , मगर कभी अपने भीतर के अँधेरे को दूर कर पाए है ?


हम धन कि आस में लक्ष्मी को पूजते है , मगर कभी धन का सही अर्थ समझ पाए है ?


दुसरो को मिठाईयां तो खूब बांटते है , मगर उनसे कितनी बार मीठे बोल बोले है ?





दीपावली को भगवन राम से भी जोड़ कर देखा जाता है । कहते है कि, भगवान राम रावन को मार कर इसी दिन अयोध्या वापिस लौटे और इस ख़ुशी में अयोध्या वासियों ने दीप मालाये सजाकर उनका आमवस्या कीअँधेरी…

दिल्ली : नाम बड़े और दर्शन छोटे ...!!

चित्र
ये है दिल्ली नगरिया ...










आभाव का प्रभाव !!









मज़बूरी लेकिन जरुरी ...









स्वागतम दिल्ली !!!

नमस्कार मित्रो ,
पिछले ५-६ दिनों से दिल्ली प्रवास पर हूँ । इसके पहले सिर्फ एक बार ही कुछ घंटो के लिए ही दिल्ली आया था । इसलिए दिल्ली की वही तस्वीर मन में बसी थी , जो टी ० वी ० और फिल्मो में ही देखी थी । जब पहली बार आया था , तो निजामुद्दीन स्टेशन से मुखर्जी नगर तक ही गया था । रस्ते में राजघाट आदि होते हुए ही सुन्दर दिल्ली ही दिखी थी । मगर इन ५-६ दिनों में दिल्ल्ली की दूसरी ही तस्वीर दिखी है .....
चमचमाती इमारतों के पीछे बिलबिलाते झुग्गियो के लोग ............... सड़ांध मारते अतिक्रमित नाले -नालियां ......... दिन भर की भाग दौड़ के बाद रात भर पानी आने का इंतजार करते लोग ............. दिल्ली जल बोर्ड के टेंकरों के सामने पानी के लिए लड़ते झगड़ते लोग .................मेट्रो का सुख तो है , मगर रिक्शोवालो के सूखते कंठ भी है..........
वाह री ....... दिल्ल्ली

खींचो अब प्रत्यंचा .....

चित्र
जब-जब घायल हुआ, धर्म का सांचा
तब-तब थामी किसी ने प्रत्यंचा
जब रावण का बढ़ रहा था अत्याचार
तब धर्म होने लगा बेबस और लाचार
ज्यो ही सीता का हुआ अपहरण, कराही प्रकृति
तब हुंकार भरी राम ने , झूम उठी धरती
धूमिल हुआ दशानन, कोई अधर्मी न बचा
अधर्म के विरुद्ध, जब राम ने खींची प्रत्यंचा
द्वापर में कौरवों ने पांडवों पर कहर ढहाया
सत्य- धर्म पांडवों का , दुर्योधन को न भाया
यूं ही बढती गयी, नित अधर्म की पराकाष्ठा
पर डिग न पाई , पांडवो की धर्म में आस्था
कुरुक्षेत्र के रण में , कृष्ण ने महाभारत रचा
सुन गीता का उपदेश, अर्जुन ने खींची प्रत्यंचा
आज भी अधर्ममय हो गया है सकल राष्ट्र
हर ओर रावण, कंस , दुर्योधन और ध्रतराष्ट्र
नित बढ़ता जा रहा है, अधर्म का अत्याचार
क्यों चुप हैं हम, आओ मिलकर करें विचार
कब तक करेंगे राम-कृष्ण, अर्जुन की प्रतीक्षा
जागो,उठो और खींचो अब ........प्रत्यंचा

मैं और जिन्दगी ........!!!!!!!

चित्र
जिन्दगी ने मुझसे कहा- तू चाहता क्या है ?




मैंने कहा- तू ही मेरी चाहत , तुझसे दिल लगाना चाहता हूँ




तू औरो को आजमाती है, मैं तुझे आज़माना चाहता हूँ




जिन्दगी- इतनी आसान नही मैं, जितना तुम समझ बैठे




मेरी चाहत में न जाने कितने , मौत को गले लगा बैठे




मैं- गर तू आसन होती , तो मेरी चाहत न होती




मौत तो मिलेगी ही, उससे कहाँ राहत होती ?




मौत तो मंजिल है , मगर सफ़र तो तू है




दिल्लगी न समझना , ये इश्क की खुशबू है




जिन्दगी- मेरे सफ़र में, सब इश्क जाओगे भूल




कोई खुशबु नही यहाँ , न ही कोई है फूल




मैं- होगा ये तुम्हारा नजरिया ,पर तुम बहुत खूबसूरत हो




लाख समझाओ मुझे, पर तुम मेरी जरुरत हो




जिन्दगी- मैं असीम हूँ, जैसे कोई सागर




मिल भी गयी , तो करोगे क्या मुझे पाकर




मैं-तुम्हारे सहारे, बहुत से नज़रिए बदलने है




बहुतो की जिन्दगी में , "चन्दन " के फूल खिलने है !

चिर ऋणी रहूँगा गुरुवर का ....

चित्र
परम पूज्य स्वामी श्री सुकान्तानंद जी के श्री चरणों में सादर समर्पित !

जब चारो तरफ था अँधेरा, माँ थी मुझसे दूर
जिन्दगी उलझनों से घिरी, मैं था मजबूर
राह कोई सूझी नही, प्यास मेरी बुझी नही
जीवन में थी एक कमी, और आँखों में थी नमी
किस डगर पर चालू , कैसे जीवन में संभालू
मन में थे कई विचार , पर मैं न था तैयार
तब किसी ने हाथ थमा , जिन्दगी को दिया अमलीजामा
अब तक था मैं गुमराह , फिर मिली मुझे सही राह
दूर हटी परेशानियों की छाया , जीवन में उजाला आया
भटकते- भटकते पहुंचा जहाँ , अहसान है उस दर का
आगे अब शब्द नही, चिर ऋणी रहूँगा गुरुवर का

आपका चरण सेवक
मुकेश पाण्डेय "चन्दन "

बूँद

चित्र
कौन कहता है ,कि बूँद छोटी होती है
वो अपने अन्दर सागर समेटे होती है


जीवन की शुरुआत बूँद से ही होती है


बूँद के बिना कहाँ आँख रोती है ?


बूँद से बादल, बादल से वर्षा होती है


वर्षा की बूँद, बीजों में जीवन बोती है


करते श्रम तो पसीने की बून्द निकलती है


बूँद जीवन का सत्य लेकर मचलती है


छोटी होकर बड़ा होना , बूँद सिखलाती है



संगठन ही जीवन है, ये बूँद दिखलाती है





- मुकेश पाण्डेय 'चन्दन'