शनिवार, 9 जून 2012

प्रशासन की मजबूरियां और विकास की बढती दूरियां !


नमस्कार मित्रो ,
अक्सर हम नौकरशाहों को दोष देते है , कि वे अपने सी कमरों में आराम से बैठे रहते रहते और आम जनता परेशान होती है . कल मुझे इसका अलग नजारा देखने मिला . मैं अपने मित्र डॉ. चन्द्र प्रकाश पटेल को डिप्टी कलेक्टर के रूप में जोइनिंग करने दमोह (मध्य प्रदेश ) कलेक्ट्रेट  पंहुचा . वहां  के कलेक्टर श्री स्वतन्त्र कुमार सिंह का व्यवहार काफी अच्छा लगा . स्टाफ का व्यव्हार भी सहयोगी  रहा (हालाँकि ये नए डिप्टी कलेक्टर के साथ जाने के कारण भी हो सकता है ). लेकिन उसके बाद मुझे एक आश्चर्य जनक बात पता चली , कि नए डिप्टी कलेक्टर साहब को बिना गाड़ी के काम चलाना होगा  .और तो और कुछ दिन पहले अपर कलेक्टर साहब तो अपने बंगले से गाड़ी के आभाव में पैदल ही कार्यालय आते थे . पिछले १० सालो से दमोह जिले में अधिकारियो के लिए कोई नया वाहन नही ख़रीदा गये  है . जो दस साल पहले ख़रीदे गये थे , वो भी अब खटारा हो गये है
                                              मेरे मित्र डॉ. पटेल , डिप्टी कलेक्टर  जो कि मकान आवंटित होने तक सागर से ट्रेन से आयेंगे जायेंगे . अब सोचिये एक डिप्टी कलेक्टर रेलवे स्टेशन से ऑटो  में बैठ कर कलेक्ट्रेट  जायेगा ! हम मित्रो ने मजाक में ही पटेल साब को सलाह दी , कि वो अपने साथ अपनी डिप्टी कलेक्टर की नेम प्लेट और एक पीली बत्ती (डिप्टी कलेक्टर को मिलने वाली ) हमेशा रखे . जब ऑटो -रिक्शा में बैठे तो आगे डिप्टी कलेक्टर की  नेम प्लेट और ऊपर पीली बत्ती लगाले.
मित्रो यह इस पोस्ट को लिखने का उद्देश्य अधिकारियो को अधिक सुविधाए देने का नही है , बल्कि हमारी व्यवस्था की कमियों पर चर्चा  करना हैएक ओर जहाँ हमारे जन प्रतिनिधियों को तुरंत सारी सुविधाए मिल जाती है , वही प्रशासन  की रीढ़ अधिकारी-कर्मचारियों को आधारभूत सुविधाए भी नही मिल पाती है .ऐसी ही कई विडंबनाओ के साथ अधिकारी -कर्मचारियों को अच्छे कार्य करने की नसीहत दी जाती है . ऊपर से रोज राजनीतिज्ञों हा रोज हर काम में हस्तक्षेप होता है ( जो कि हमेशा मौखिक होता है ,ताकि काम बिगड़ने पर अधिकारी-कर्मचारी ही फंसे ). कुछ समय पहले मैं जब बिहार लोक सेवा आयोग की मुख्य परीक्षा की तैयारी पटना में रहकर कर रहा था , तो आये दिन अंचल विकास पदाधिकारी (बी डी ) के पीटने की खबर अखबारों में छपती थी . मेरी समझ में नही आता था , कि कारन क्या है ? क्या बिहार के सभी अधिकारी बेकार है( ये सभी बहुत कठिन प्रतियोगी परीक्षा को पास करके आते है ) , या यहाँ कि जनता ज्यादा उग्र है !( चूँकि मैं भी मूलतः बिहार से हूँ , और पता है बिहारी बड़े विनम्र  होते है , जब तक छेड़ा जाये .आम आदमी के पास रोजी रोटी की चिंता रहती  है . वह उग्र अति होने पर या किसी के भड़काने पर ही होता है ) फिर  पता चला कि बिहार में बहुत समय (लालू के राज में )से लोक सेवा आयोग की भर्ती ही नही हुई , जिससे अधिकारियो की बहुत ही ज्यादा कमी  है , और एक-एक  अधिकारी  से क्षमता  अधिक कार्य लिया  जा रहा है ,संसाधनों की भी कमी है . जिसका परिणाम आम लोगो के जरुरी कार्यो में भी देरी हो रही है . और बी डी साहब लोग पिट रहे है. कहने का मतलब ये है , कि आज भी पुरे देश में हर विभाग में अधिकारी - कर्मचारियों (पुलिस और न्याय विभाग सहित ) कि बहुत अधिक कमी है . और यही कारण है कि देश में भ्रष्टाचार धड़ल्ले से बढ़ रहा है, क्योंकि सक्षम लोग अपना काम जल्दी से करवाने के लिए पैसे लिए खड़े रहते है . और आम आदमी मज़बूरी में आपनी बाँट जोहता है .
    अगर केंद्र और राज्य सरकारे आवश्यकता  अनुसार समय- समय पर खली पदों को भरती  रहे तो  अधिकारियो पर से काम का बोझ हटेगा , कार्यो में गति आएगी साथ ही भ्रष्टाचार भी कम होगा (क्योंकि पूरी तरह से समाप्त तो कभी नही हो सकता है ). ईश्वर करे हमारी विधायिका में बैठे  लोगो को सद्बुद्धि आये ताकि कार्यपालिका  की क्षमता बढे और देश आगे तरक्की करे और हम आप चैन की साँस ले .
इसी आशा के साथ  .............राम राम
 

1 टिप्पणी:

  1. सारा तंत्र सरकार अपनी मर्जी से चलाती है न की देश समाज की जरूरत से ... उन्हें कोई क्या कह सकता है ...

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ab apki baari hai, kuchh kahne ki ...

orchha gatha

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