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न जाने क्यूँ वो मुझसे रूठ गये !

न जाने क्यूँ वो मुझसे रूठ गये
एक पल में ही सरे रिश्ते नाते टूट गये
क्या खता की थी हमने, जो हमको ये सिला मिला
क्या ज़रा सी आह भरने पर, हमको ये जलजला मिला
उनको हमारी छोटी सी गलती पर, जरा भी रहम न आया
बड़े जालिम निकले वो, जो हमपे इतना सितम ढाया
उनके साथ ही , उनकी यादें , बातें , सारे कारवां पीछे छूट गये
न जाने क्यूँ वो मुझसे रूठ गये
निगाहें जब हम उनसे मिलते है वो अपना चेहरा मोड़ लेते है अब
हमने भी देखना बंद कर दिया , हम भी दूर से हाथ जोड़ लेते है अब
हमसे रुखसत जो वो होंगे, तभी नज़रे मिलायेंगे हम
गर जालिम है वो , तो हम भी कर सकते है जुलम
सपने निकले कच्ची मिटटी के , जो झट से टूट गये
न जाने क्यूँ वो मुझसे रूठ गये



उपहार :कविता

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एकदिनजरुरीकामसे , मैंगयाएककार्यालय
वहांसबमस्तीमेंथे, सबकीथीअपनीलय
कामकरवानेकीनीयतसेमैं, पहुंचाअधिकारीकक्षकीओर
चपरासीनेरोका, साहबबिजीहै! आनाकिसीदिनऔर
बहुतजरुरीकामहै , नहीहैमेरेपासफिरआनेकावक़्त
लौटजाओ , बिनाउपहारवालोकेलिएकानूनहैसख्त
"उपहार " आपकेकहनेकाक्याप्रयासहै ?क्यासाहबकाजन्मदिनआसपासहै ?
जन्मदिनवालाउपहारसाहबस्वीकारनहीकरतेबिनाउपहारवालोकेलिएअपनासमयबेकारनहीकरते
अरेभाई , ऑफिसमेंक्याहैउपहारकाकाम ?उपहारतोहैसमारोहोंकातामझाम
ऑफिस में बिन उपहार के नही बनता है कोई काम
क्योंकि भैया उपहार है, "रिश्वत" का नया नाम

नव वर्ष आया .................पत्रिका :जबलपुर में १ जनवरी को प्रकाशित

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आप सभी को देर से ही सही नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाये , दर असल मैं जबलपुर में मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग -२०१० की मुख्य परीक्षा में व्यस्त था । अभी फुर्सत मिली है , तो आपके सामने पत्रिका (अखबार) के १ जनवरी के नैनो अंक के मुखप्रष्ठ पर पहली कविता मेरी प्रकाशित हुई , हालाँकि अन्दर के पृष्ठों में २०-२५ कवितायेँ थी । उसी को ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर रहा हूँ .......
नव, नूतन , नवल नया वर्ष आया है
नई उमंग, नई आशा संग लाया है
कुछ ऐसी खुशियाँ मिले नए साल में
स्वाभिमान जगे, यूं तिलक लगे भाल में

अश्रु बहे तो खुशियों से होके सराबोर
दमके जीवन, मुस्कान हो हर और
चाँद सितारे झोली में, ऐसा हो दामन
सब कुछ शाश्वत , मन हो पावन
रात भी आये , पर भटके न सवेरा
तपती धुप में हो, चैन का बसेरा
नव, नूतन , नवल हो अभिनन्दन
हर ओर खुशबू हो , जैसे महके 'चन्दन'