संदेश

February, 2012 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ये कैसा बसंत आया ?

चित्र
ये कैसा बसंत आया ?
हर दिन एक यौवना पे किसी ने सितम ढाया
प्रेम , उल्लास के मौसम में कैसी रुत आई
जाने क्यों हवस हर तरफ छाई
गर ऐसा हो बसंत तो मत आना अबकी बार
पतझर ही अच्छा , ऐसा बसंत बेकार
हे ऋतुराज ! क्यों आये ऐसे इस बार
क्या यही है ? ऋतुराज का ऐसा दरबार
धरती को आज भी है तुम्हारा इन्तजार
पर अब न आना ऐसे , जैसे आये इस बार
- मुकेश पाण्डेय 'चन्दन'

आहिस्ता आहिस्ता.....(ग़ज़ल)

चित्र
यूँहीजिंदगीगुजरतीजारहीहै, आहिस्ता -आहिस्ता
जैसेसुबहकीधुपपसरतीजारहीहैआहिस्ता-आहिस्ता
रातगुजरगयीपरख्वाबतकनआये
जिन्दगीमेंमशरूफियतठहरतीजारहीहैआहिस्ता-आहिस्ता

जुबानतोनजानेकबसेखामोशहै
परदिलकीधड़कनेबढतीजारहीहैआहिस्ता-आहिस्ता
जेहनमेंखयालोकासमंदरसाहोगयाहै
परयेआँखेबरसतीजारहीआहिस्ता-आहिस्ता
थमगयेहै,

उसका सपना ..

चित्र
खेलरहेथे, हिलमिलकरतीनबच्चे
पूंछरहेथे , किसनेदेखेसपनेअच्छे
मैंनेदेखासपनासलोना, लालाकाबेटाबोला
सारीदुनियामैंगुम, बिनाबस्ताबिनाझोला
येभीकोईसपनाहोताहै , मेरासपनाहैसबसेसुन्दर
मास्टरकाहूँबेटा, परचलारहाथामैंमोटर
तुम्हारेसपनेतोहै , पुरेबकवास
सुनोतोमेरासपनाहै, कितनाख़ास
भलेगरीबकाहूँबेटा, परसपनेमेंबदलीरंगत
खूबपुआ-पूरीखाई, थीपकवानोंकीसांगत
इतनाअच्छासपनाभीमेरेआंसूरोकनपाए
थायेझूठ, क्योंकिभूखेपेटनींदनआये

जिंदगी और मेरा संवाद !

चित्र
जिन्दगीनेमुझसेपूछा- तूचाहताक्याहै ?
मैंनेकहा- तूहीमेरीचाहत, तुझसेदिललगानाचाहताहूँतूऔरोकोआजमातीहोगी, मैंतुझेआजमानाचाहताहूँ
जिंदगी - इतनीआसननहीमैं, जितनातुमसमझबैठेमेरीचाहतमेंनजानेकितनेमौतकोगलेलगाबैठे
मैं- गरतूआसानहोती, तोमेरीचाहतनहोती
मौततोमिलेगीही ,उससेकहाँराहतहोती
मौततोमंजिलहै, परसफ़रतोतूहै
दिल्लगीनसमझना , येइश्ककीखुशबुहै
जिन्दगी - मेरेसफ़रमें , सबइश्कजाओगेभूल
कोईखुशबुनहीयहाँ, नहीकोईफूल
मैं-

हो खुशियों की बारिश , उस नए आँगन में

चित्र
होखुशियोंकीबारिश, उसनएआँगनमें
मनचाहाप्यारमिले, प्रियतममनभावनमें
हरख्वाहिशपूरीहो, ससुरालमेंहोइतनासुख
राजकरोऐसे, किबाबुलकोनहोदुःख
योगेशसेऐसाहोयोगहो , होवर्षाकाअभिनन्दन
परिणितजीवनऐसेमहके, जैसेहोकोईचन्दन
लाड-प्यारसेपलीगुडिया, वहांभीमिलेप्यार
मायकेकाचिराग , रोशनकरेंवहांकाघरसंसार
हरपल, हरक्षणखुशियाँहो, नहोदुखोकासामना

उज्जवलहोपरिणितजीवन , हैयहीशुभकामना
मेरीप्यारीमुहबोलीबहनवर्षाशर्माकोवैवाहिकजीवनकिहार्दिकशुभकामनाएं

ख्वाबो में तुम आते हो .....

चित्र
हर गुजरती रात में ख्वाबो में तुम आते हो
औरहरख्वाबमेंदिलमेंआग तुमलगातेहो
आखिरक्याखताकीहमनेजोहमेंयेसिलामिला
दिन-ब-दिनक्योंमुझपरइतनेसितमढातेहो
पलदोपलकेलिएमिलतीहैकुछखुशियाँ
क्योंदोपलकाएकअहसासतुमजागतेहो
येमुस्कुराहतेकभीहोपायेगीहकीकत
यासिर्फख्वाबोमेंहीतुममुस्कुरातेहो
वोख्वाबोकीतुम्हारीहसींअदाएं
आखिर

अनादि काल से पूजते आ रहे है शिव !

चित्र
सर्वप्रथम आप सभी को महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभ कामनाएं !
"शिव " का शाब्दिक अर्थ होता है , कल्याण । अर्थात शिव कल्याण के देवता है । (शिव का संहारक रूप भी पुनः नव सृष्टि के लिए होता है ) शिव को महादेव कहा जाता है , क्योंकि सभी देवो में महँ शिव ही है । बाकि देवताओ और शिव में सबसे बड़ा अंतर ये है , कि शिव सभी (देव , दानव , मानव, किन्नर , नाग , भूत-पिशाच आदि ) में सामान रूप से लोकप्रिय और पूज्य है । शिव की पूजा के साक्ष्य इतिहास में सिन्धु घाटी सभ्यता (२३५०-१७५० ई० पू० ) से ही मिलना प्रारंभ हो जाते है । सिन्धु घाटी में लोग शिव की पूजा लिंग रूप में तो करते ही थे , साथ ही यहाँ से शिव के पशुपति रूप की मुद्राएं भी मिली है है । सिन्धु घाटी में लिंग-योनी के मृदा स्वरुप बहुतायत से प्राप्त हुए है ।
सिन्धु घाटी सभ्यता के बाद आर्य (वैदिक ) सभ्यता में भी शिव की पूजा का वर्णन मिलता है । चूँकि वैदिक सभ्यता पशुपालन पर आधारित थी , और शिव का सम्पूर्ण परिवार ही इसका समर्थन करता है ( शिव का वाहन -बैल, पारवती का सिंह , गणेश का मूषक , कार्तिकेय का मयूर ) ।
हर काल में शिव का पूजन अन्य देवताओ से अधिक…

करवटें बदलते रहे .........

चित्र
आँखों में आंसू , दिल में कासक लिए करवटें बदलते रहे
पर वो न आये जिनके लिए , हम कबसे मचलते रहे

यूँ ही इन्तजार में कट गयी , न जाने कितनी रातें
और बस तन्हाईयों से होती रही हमारी मुलाकातें

इन्तहा हो रही है, हर घडी हमारे इन्तजार की
आखिर कब पूरी होगी , चाहत उनके दीदार की

जगी आँखों से ही हम कितने ख्वाब बुनते रहे
पर वो न आये , जिनके लिए हम कबसे मचलते रहे

अब सूख चूका है , इन आँखों का भी पानी
सोचा था हसीं होगी दास्तान , पर बनी दुःख भरी कहानी

हर पल आँखे ताकती है , उस डगर को
आखिर कब तरस आएगा , मेरे हमसफ़र को

हर शाम कितने चिराग जलते और बुझते रहे
पर वो न आये जिनके लिए , हम कबसे मचलते रहे

मुकेश पाण्डेय "चन्दन"

ऐसी निभाना तुम प्रीत .........

चित्र
सब भूल जाना चाहता हूँ , तुम्हारी बांहों में
रच-बस जाना चाहता हूँ, तुम्हारी निगाहों में
स्वर भी तुम हो , ह्रदय का स्पंदन भी तुम हो
तीर्थ सा पावन सरस, चन्दन भी हो तुम
तुम से शुरू होकर , तुम पर ही ख़त्म हो जीवन
मन में बसी एक सुन्दर सी मूरत हो प्रियतम
मेरा  सर्वस्य तुम, और मैं हूँ पर्याय तुम्हारा
रीत भले ही कुछ हो , पर तुम पर ही सब कुछ हारा
जिन्दगी भी तुम्हारे बिना, ख़त्म हो जाएगी
दम निकलने के बाद, मिलने की आरज़ू रह जाएगी
गीत अब तुम्हारे लिए होंगे. तुम जीवन का संगीत 
हो अमर अपना बंधन . ऐसी निभाना  तुम प्रीत 
मुकेश पाण्डेय " चन्दन "


आज एक प्रण ठाना है......

चित्र
आज एक प्रण ठाना है
कुछबनकेसबकोदिखानाहै
चाहेआयेआंधी , याआजायेतूफ़ान
सबसेटकराजाऊँगा, बनकेमैंचट्टान
लक्ष्यनबिसरितहोगामनसे
चाहेसंघर्षकितनाभीहोजीवनसे
सच्चीलगनऔरहोगाअटलइरादा
तिनकेसी उड़जाएगी, राहकीहरबाधा
मिलेंगेराहमेंजानेकितनेकंटक-शूल
परसिवायलक्ष्यकेजाऊँगासबभूल
चाँदसेभीउसपरजानाहै
कुछबनकेसबकोदिखानाहै
मित्रो मैंने अपनी ये कविता ८ अगस्त २००५ को उस समय लिखी थी, जब मैं इलाहबाद में सिविल सर्विस की तैयारी करने पंहुचा ही था । तब से आज सफलता मिलने तक लगभग साढ़े ६ वर्ष का समय लग गया , मगर कभी भी हार नही मानी , बस लगा रहा अपनी मंजिल की और पहुचने में ............आज भले ही मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग के माध्यम से आबकारीउपनिरीक्षकपद जरुर मिला गया है , मगर अभी तो सफ़र में एक मील का पत्थर मिला है , मंजिल तो बाकि है ...............

अब दिल में एक आरजू है

चित्र
अब दिल में एक आरजू है
कुछ करने की जुस्तजू है
लगा के पंख उड़ना है आसमान में
करके कुछ दिखाना है इस जहाँ में
सबसे अलग मंजिल पानी है
बस कुछ जुदा करने की ठानी है
कदमो के के नीचे करना है आफताब
क़ल होगी ये हकीकत ,न होगा ये ख्वाब
दरिया के साथ , हम नही बहने वाले
हम तो है, दरिया का रुख मोड़ने वाले
दुनिया देखेगी हमारी परवाज
सबसे अलग होगा "चन्दन" का अंदाज
मुकेश पाण्डेय "चन्दन"

तन्हाईयाँ ..........

चित्र
बहुत कुछ आदमी को सिखा जाती है तन्हाईयाँ
जिन्दगी के सफ़र की मंजिल दिखा जाती है तन्हाईयाँ
जिन्दगी के कई राज़ अपने में छुपा लेती है तन्हाईयाँ
ऊंचों-ऊंचों को भी झुका देती है तन्हाईयाँ
किसी की हमदम बन जाती है तन्हाईयाँ
तो किसी को हर कदम याद आती है तन्हाईयाँ
कभी लाख जिल्लतो से बचाती है तन्हाईयाँ
तो कभी मन में उथल पुथल मचाती है तन्हाईयाँ
कभी किसी की याद दिला जाती है तन्हाईयाँ
कभी किसी की फ़रियाद सुना जाती है तन्हाईयाँ
तनहा करके भी भीड़ में गम कर जाती है तन्हाईयाँ
हँसते हुए भी आँखे नाम कर जाती है तन्हाईयाँ