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April, 2012 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

बांस के पत्ते का मृत्यु गीत !

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शीर्षक देख चौंके नही ..........कभी आपने बांस  के सूखे  हुए पत्ते को बांस पर से गिरते हुए देखा है ? अगर नही तो अब कभी मौका मिले तो देखना ! अभी कुछ दिनों पहले मैं अपने गाँव ( गाँव- भरौली, पोस्ट - सिमरी, जिला बक्सर , बिहार ) गया हुआ था . मेरे घर के पीछे बांसों का एक छोटा सा जंगल जिसे भोजपुरी में कोठी कहते है . इस बार गरम दोपहरी में जब मैं दुवार (घर के बाहर बिहार में पुरुषो के बैठक खाने को कहते  है ) में लेटा रहता था ( मजबूरन बिजली न होने के कारण ) , तो मैंने बांस के पत्तो को बांस से गिरते हुए देखा , देखा तो पहले भी था, मगर कभी इस तरह से नही देखा था . बांस के पत्ते आम पेड़-पौधो की तरह नही सीधे जमीन पर गिरते है . बल्कि बांस के पत्ते जब सूख कर बांस से नीचे गिरते है , तो हवा में कलाबाजियां खाते हुए ऐसे गिरते है , जैसे अपनी  मृत्यु पर नृत्य कर रहे हो .............इस संसार सागर से छूटने का उत्सव मना रहे हो . ..बांस के पत्ते जब बांस से नीचे गिरते है , तो कभी सीधे नही गिरते, वे हवा को काटते हुए..........नाचते से धीरे-धीरे जमीन को ओर बढ़ते है . 
अब इस पर कुछ वैज्ञानिक सोच के लोग कहेंगे कि.....बां…

कैसे बनेगा देश महाशक्ति !

भारत में दुनिया के सबसे ज्यादा युवा है । इनकी आबादी लगभग ५५ करोड़ है , मगर इनमे से अधिकांश बेरोजगार है ! जहाँ विकसित देशो में जनसँख्या को संसाधन माना जाता है, वहीँ भारत में इसे बोझ माना जाता है। आज हम भारत को भविष्य की महाशक्ति कहते है , मगर किस हिसाब से यह महाशक्ति हो पायेगा ? आज सामरिक शक्ति के आधार पर किसी भी देश को महाशक्ति नही माना जाता है ( पाकिस्तान और उत्तर कोरिया जैसे देशो के पास भी नाभिकीय हथियार है ) आज बौद्धिक संसाधन ही महा शक्ति बनने का मुख्य आधार है , कहने को हम भारतीय प्रतिभा का लोहा मानते नही थकते है ! मगर ये भारतीय मेधा शक्ति कितनी कारगर है ? आज़ादी के बाद हमने कितने अविष्कार किये ? कितने विश्वस्तरीय खोजे हुई ? हम अपने विज्ञान और कला के बलबूते दुनिया को तो ठीक अपने ही देश को क्या दे पाए है ? हमारे यह नोबल पुरस्कार पाने वालो की संख्या अँगुलियों पर ही गिनने लायक है , उनमे से भी अधिकतर भारतीय मूल के है , अगर भारत में रहते तो शायद ही कुछ कर पाते !
आखिर हम इस युवा शक्ति के आधार पर विश्व की महाशक्ति बनेंगे , जिसके बारे में कहा जात…

जब से आये तुम सजन

हर दिन सुहाना लगने लगा, जब से आये तुम सजन
अबसबमनकोभानेलगा, जबसेआयेतुमसजन
दरवाजेपेदिन-रातआंखेताकती
हरआहातपेखिड़कीसेझांकती
हरपलरहताबसध्यानतुम्हारा
तुमबिनलगेनकुछभीप्यारा
अबदिलभीगुनगुनानेलगाहै, जबसेआयेतुमसजन
हरदिनसुहानालगनेलगा, जबसेआयेतुमसजन
चाँदभीविरहकीआगबरसता
दीपकभीमानोदिलकोजलाता
कोकिलकीकूकभीकर्कशलगती
तुम्हारेस्वप्नबसा, आंखेदिन-रातजगती
अबदीपकभीजगमगानेलगा, जबसेआयेतुमसजन
चाँदभीसुधाबरसानेलगा, जबसेआयेतुमसजन
फूलभी

जिंदगी और मौत

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हर किसी की जिन्दगी में एक बार आती है मौत
हर कदम पर कड़वा सच, जिंदगी का दिखाती है मौत
जिंदगी तो करती वेबफाई, पर अपने संग ले जाती है मौत
जिंदगी के कई रंग है, पर एक ही रंग दे जाती है मौत
जिंदगी करती भेदभाव, पर सब के साथ इन्साफ करती है मौत
जिंदगी लगाती दामन में दाग, उस दाग को साफ़ करती है मौत
जिंदगी देती हरदम भागदौड, पर उससे आराम देती है मौत
काम ही काम होते है जिंदगी में, पर उन्हें अंजाम देती है मौत
नींद छीन लेती है जिंदगी, पर हर किसी को सुलाती है मौत
पास होते हुए भी है, जो जिन्दगी से दूर, उन्हें पास बुलाती है मौत
हकीकत है ये जिंदगी की, ये बात सबको डराती है मौत
हर किसी को अपनी सच्चाई का अहसास कराती है मौत
जिन्दगी सूखे पालने में, तो 'चन्दन' की चिता के साथ आती है मौत

बाकी रह गये कुछ निशां

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जिन्दगीमेंकुछछूटजाताहै , जानेकहाँ
होताहैसबकुछसाथ, परहैदिलतनहा
अतीतकीहोतीहै, कुछरंगीलीयादें
कुछखालीपन्ने , होतेहैकुछअधूरेफलसफा
मनकरताहै, किफिरलौटचलेपीछे
परबाकीहै, अभीदेखनाआगेकाजहाँ
हमतनहाहीचलेथे, इससफ़रमें
आजफिरतनहा, छूतेजानेकितनेकारवां
ख़ुशीसीहोतीनही, परगमभीनही
निकलेथेकितनेअश्क, लगेकितनेकहकहा
लहरेंयूँहीआतीरही , साहिलपेखड़ेहम
आखिरसमंदरमेंडूबहीगयायेआसमां
टूटगयेवो

क्रांकीट के जंगल

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इनक्रांकीटोकेजंगलोमेंजिंदगी, नजानेकहाँगमहोगयी
हंसती- गातीजिन्दगीसीमेंट केदरख्तोंमेंगुमसुमहोगयी
भागमभागकीलहरोंकेसाथबहतादरियाकोलतारका
भोरहोतेशुरूहोताकलरव, ट्रकों , बसों , गाडियोंऔरकारका
चलतीजबबयारतोझूमउठतेतरुइस्पातके
टिमटिमाउठतीसितारोंसीबत्तियांहोतेहीरातके
मुसकानलापताहै, चीखोकेसाथयेजिंदगीबदनामहोगयी
इनक्रांकीटोकेजंगलोमेंजिंदगी , नजानेकहाँगमहोगयी
कीड़ोसीजिंदगीजीतेलोग, जिनकानकोईहिसाबहै
मुखोटोपेमुखोटे

मील का पत्थर

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काफिले गुजरते रहे , मैं खड़ा रहा बनके मील का पत्थर
मंजिल कितनी दूर है, बताता रह उन्हें, जो थे राही-ऐ -सफ़र
आते थे मुसाफिर, जाते थे मुसाफिर, हर किसी पे थी मेरी नजर
गर्मी, बरसात और ठण्ड आये-गये , पर मैं था बेअसर
हर भूले-भटके को मैंने बताया, कहाँ है तेरी डगर
थके थे जो, कहा मैंने - मंजिल बाकी है , थामो जिगर
चलते रहो हरदम तुम, गुजर गये न जाने कितने लश्कर
मुशाफिर हो तुम जिन्दगी में, न सोचना यहाँ बनाने की घर
एक दिन गुजरना है सबको यहाँ, नही है कोई अमर
गर रुक गये तो रुक जाएगी जिन्दगी, चलते रहो ढूंढ के हमसफ़र
एक ही मंजिल पर राह ख़त्म न होगी, ढूंढो मंजिले इधर-उधर
राह काँटों की भी मिलेगी तुम्हे, आते रहेंगे तुम पर कहर
मुश्किलों से न डरना, क्योंकि मिलेगा अमृत के पहले जहर
काफिले गुजरते रहे , मैं खड़ा रहा बनके मील का पत्थर

अथ श्री गर्दभ कथा ........

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कल मुर्ख दिवस पर कई ब्लोगों की सैर की . कुछ दुसरो को मुर्ख घोषित करने में लगे , तो कुछ खुद को ही महामूर्ख घोषित करवाना चाह रहे थे। मुर्ख शब्द सुनने के बाद इंसानों (अगर कुछ लोग नाराज न हो तो ) के बाद जिस जीव का नाम आता है , वो है बैशाखनंदन गर्दभराज जिसे हम आप बोलचाल की भाषा में गधा (कुछ मनुष्य भी इसी श्रेणी में आते है )कहते है। खैर यह जीव बहुत ही मेहनती होता है (बुरा न माने तो कुछ ब्लोगर भी मेहनती होते है ।) बिना सोचे विचारे अथक परिश्रम करता रहता है । इसके गधे होने के कई किस्से प्रसिद्ध है (लेकिन इसमें मेरा कोई योगदान नही है ), जैसे- धोबी (कृपया इसे जाति सूचक शब्द न समझे ) अपने गधे को रस्सी से नही बंधता बल्कि , उसे झूठ-मूठ बांधने का उपक्रम करता है , और यह जीव निर्विकार भाव से 'जैसे थे " की भावना से अपनी जगह पर बिना हिले डुले खड़ा रहता है । इसलिए इसे गधा कहा जाता है ।
इसके गधा कहे जाने का एक किस्सा ये है, कि यह जीव ग्रीष्मकाल में जब बाकी जीव घास कि कमी के कारन दुबले होते है , वही ये गधा यह सोचकर मोटा होता है , कि मैंने सारी धरती की घास खाली , और अब कहीं भी घास ही नही बची ! इसी…

कलयुग में मुर्ख दिवस के दिन पैदा हुए भगवान राम !! (व्यंग्य)

मित्रो सर्वप्रथम आप सभी को राम नवमी की हार्दिक शुभकामनाये
इसके बाद मैं आपको मुर्ख दिवस की शुभकामनाएं नही दूंगा , क्योंकि आप सभी मुर्ख तो है नही !(जरुरी नही कि मेरी सोच सही ही हो )
तो आज सुबह से राम नवमी से ज्यादा अप्रेल फूल की शुभकामनाएं मेरे मोबाइल के इन्बोक्स में आ रही है । अब मैं ये सोच नही पा रहा हूँ , कि कौन मुर्ख है , मैं (जिसे ऐसे सन्देश आ रहे है ) या वो लोग जो ऐसे सन्देश भेज या फॉरवर्ड कर रहे है । खैर ये सब छोडो कुछ काम की बात की जाये ....अरे यार हंसाने की बात नही है , क्या अफ्रेल फूल के दिन काम नही होता । अगर ऐसा होता तो सरकार अपना वित्तीय वार्षिक वर्ष १ अप्रेल से शुरू नही करती ।( वो अलग बात है ,कि वो हमेशा लोगो को किसी भी दिन मुर्ख बनाने के लिए स्वतंत्र है ) बैंको का वर्ष १ अपेल से शुरू नही होता । आप फिर हंसाने लगे , गलत बात है , मैं कोई लताफा(लतीफे का बड़ा भाई ) थोड़े सुना रहा हूँ ॥
हाँ ,तो मैं अपनी बात शुरू कर रहा हूँ , तो सुबह सुबह मेरे पडोसी गौतम जी फनफनाये से मेरे पास आये , और दांत पीसते हुए आँखे निकलते हुए मुझ को घूरने के अंदाज़ में बोले - हद हो गय…