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शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2020

बृहस्पति कुण्ड का रहस्य (भाग 1)



 बृहस्पति कुण्ड का रहस्य (भाग 1) 

                           एक दिन मन बड़ा ही उदास था, अपनी चार पहिया गाड़ी से ऐसे ही पन्ना से पहाड़ीखेड़ा मार्ग पर अनायास ही चल पड़ा । शाम का समय हो रहा, आकाश में बादल घुमड़ रहे है, बादलों की रंगत श्यामल हो चली है । मौसम ठंडा हो चला यानी आसपास कही बारिश हो चुकी है, हवा में भी ठंडक घुलने लगी थी । गाड़ी के शीशे उतार कर हम भी आराम से चले जा रहे थे । अभी तक खाली चल रहे मन में प्रकृति धीरे धीरे प्रवेश करने लगी । आसपास के खेत, पहाड़ियाँ और उनके ऊपर घुमड़ते आवारा बादल मन को प्रसन्न कर रहे थे । प्रकृति में इतना खोया रहा कि पता ही नही चला कि कब बृजपुर आ गया । बृजपुर आने पर मन बृहस्पति कुण्ड जाने का बनने लगा । गाड़ी अपने पथ पर चली जा रही थी । मैंने गाड़ी बृहस्पति कुण्ड की तरफ मोड़ दी । रास्ते में बाघिन नदी का पुल पड़ा । बाघिन नदी जो बृहस्पति कुण्ड जलप्रपात बनाती है, आज अलग ही अंदाज में बह रही थी । मैंने पुल के थोड़े पहले ही गाड़ी रोकी । पता नही क्यों एक अलग ही सम्मोहन मुझे नदी की ओर खींच रहा था । इससे पहले मैं कई बार बृहस्पति कुण्ड जाते समय यहाँ से गुजरा हूँ, मगर कभी रुका नही । आज एक अलग ही अहसास हो रहा था । लग रहा था, कि जैसे कोई मुझे बुला रहा हो ! यह अनुभव लौकिक तो बिल्कुल भी नही लग रहा था । मैं धीरे धीरे नदी की तरफ बढ़ने लगा ।      

                                     आसमान बादल काले हो रहे थे, हवा भी अपनी रफ्तार बढ़ा रही थी । अचानक बहुत तेज बिजली चमकती है ! मेघ गर्जना की बहुत तेज आवाज से हाथ अपने आप कानो को ढक लेते है । मुझसे कुछ दूर ही नदी में बज्रपात होता है , नदी का पानी बहुत ऊपर तक उछलता है ! यह दृश्य देख कर भय मिश्रित आश्चर्य होने लगता है, ऐसा दृश्य मैंने अपने जीवन में पहली बार देखा था । मस्तिष्क विचार शून्य हो गया । पैर अपनी जगह पर जम से गये, मैं चाहकर भी न आगे बढ़ पा रहा था, न पीछे हट पा रहा था । हृदय की गति भी इतनी तेज हो गयी कि स्पंदन स्पष्ट सुनाई दे रहा था । मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे । 

                                                                 खैर झंझावात  हुआ, नदी की लहरें सामान्य हुई , ये सामान्य भी मेरे लिए असामान्य सा था । लगा जैसे को स्वप्न देख रहा हूँ, और अचानक नींद टूट गयी हो । तभी पृष्ठभूमि से एक गुर्राहट मिश्रित आवाज आई - कैसे हो पुत्र ! स्वर मधुर था, मगर गुर्राहट मिश्रण से भय लगा । आसपास देखा तो कोई दिखा नही !

फिर से आवाज़ आई, 

भयभीत क्यों हो पुत्र ?

 तुम तो नदियों से पहले भी वार्तालाप कर चुके हो न ! यह सुन हृदय स्पंदन कम हुआ , आवाज नदी से ही आ रही थी । लगता है, आज फिर से मुझे नदी-संवाद का सौभाग्य मिलेगा ! 

पुत्र ! मैं बाघिन हूँ ! 

मैंने दोनो हाथ जोड़ प्रणाम किया । माते मुझ अकिंचन पर कृपा करें । 

तथास्तु ! आखिरकार विधाता ने तुम्हे मेरी कथा सुनने भेज ही दिया । युगों युगों से प्रवाहित मैं हर युग में किसी न किसी को अपनी कहानी सुनाती आई हूँ । सतयुग में देवगुरु बृहस्पति, त्रेता युग स्वयं नारायण अवतार श्रीराम , जगत जगनी सीता और शेषावतार सौमित्र के अलावा अगस्त्य मुनि, द्वापर में अज्ञातवास बिता रहे पाण्डव और कृष्णा (द्रोपदी) के बाद कलिकाल में आज तुम मिले हो ! 

अभी तक हाथ जोड़े खड़ा मैं अब नतमस्तक हो गया । आज मुझे बेतवा, गंगा और नर्मदा के बाद अरण्यानी बाघिन से भी संवाद का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है । 

आपके इस अनुग्रह से यह पातकी पावन हुआ ! 

आकाश में घुमड़ते मेघों के बीच भगवान भास्कर अस्तांचल गामी होने लगे । गोधूलि बेला में गौ-महिषी वन से गांवों की ओर वापिस लौटने लगे । उनके बछड़े रंभा रहे थे । पक्षी भी कलरव करते हुए नीड़ की ओर उड़ चले थे । बगुले त्रिभुजाकार अनुशासन में उड़ रहे थे । मैं भी नदी किनारे एक चट्टान पर हाथ जोड़े बैठ गया । पृष्ठभूमि में झींगुर अपना राग अलाप रहे थे, और तबले पर उनकी संगत मेंढ़क बखूबी दे रहे थे । 

सुनो पुत्र ! मैं अपनी कथा आरंभ से सुनाती हूँ । 

माते, एक निवेदन स्वीकार करें, यदि कथा के मध्य में कोई जिज्ञासा या प्रश्न हो तो उसका भी निवारण अवश्य करती चलें ।

ठीक है !  महाप्रलय के पश्चात सृष्टि का पुनः निर्माण हो रहा था । श्रीहरि मत्स्य अवतार ले चुके थे । वर्तमान स्थल जहाँ तुम अभी बैठे हो यह आधुनिक अफ्रीका महाद्वीप का भाग था । यहाँ बड़े बड़े घास के मैदान थे , जिसमें सिंह, बाघ, चीता, तेंदुआ, भालू, जिराफ और हाथी जैसे बड़े जीव विचरण करते थे । 

लेकिन माते ! जिराफ तो भारत में पाए नही जाते । 

पुत्र मैं आज से करोड़ो वर्ष पूर्व की बात कर रही हूँ, तब तो यहाँ भीमकाय सरीसृप जिसे पाश्चात्य जगत डायनासुर कहता है, वो भी विचरते थे । फिर श्रीहरि का कच्छप अवतार हुआ, कच्छप की पीठ पर ही मंदरांचल पर्वत रख कर समुद्र मंथन हुआ । चौदह रत्नों की प्राप्ति हुई । समुद्र मंथन से वसुंधरा के गर्भ में हलचल हुई । महाद्वीप टूटने लगे । अफ्रीका का एक भाग टूटकर उत्तर भारत के नीचे आ लगा । इस भौगोलिक प्रक्रिया से भूगर्भीय हलचल होने लगी , संयोजक स्थल पर ज्वालामुखी सक्रिय होने लगे । विंध्याचल पर्वत धीरे धीरे उच्च होने लगा । ज्वालामुखी का लावा प्रवाहित होने लगा । उत्तर भारतीय जन को नवीन भूमि और वहाँ के लोगों के जानने की उत्सुकता बढ़ रही थी । परंतु विंध्याचल और जवालामुखी बाधा बन रहे थे । लेकिन परिवर्तन संसार का नियम है । अफ्रीका से टूटकर अलग हुआ भाग वर्तमान भारत से जुड़ा और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में ज्वालामुखी धधक रहे थे । ज्वालामुखी के लावे से नए नए पहाड़ो का निर्माण हो रहा था, जिनमे सबसे प्रमुख विंध्याचल पर्वत श्रेणी थी । धरती के अंदर चल रही भूगर्भीय हलचलों के कारण विंध्याचल ऊपर उठता जा रहा था । 

माते ! क्या पर्वत अपने निर्माण के बाद भी ऊपर उठते है ? 

एक मधुर मुस्कान के साथ बाघिन माता आगे बोली -

पुत्र , बिल्कुल पर्वत भी निरंतर परिवर्तन शील होते है । जैसे आज हिमालय में परिवर्तन हो रहे है । चूंकि ये परिवर्तन इतनी धीमी गति से होते है, कि मानवों को दिखाई नही देते है । इन परिवर्तनों में हजारों साल लग जाते है, तब तक मनुष्य की आयु ही समाप्त हो जाती है । 

हाथ जोड़े मैंने निवेदन किया - माते आपका नाम बाघिन क्यों पड़ा ? 

माता बाघिन कुछ देर तक मंद मंद मुस्कुराती रही है । मैं हाथ जोड़े खड़ा रहा । तभी उत्तर देने की जगह बोली - ईश्वर भी कैसे संयोग बनाता है ! पुत्र तुम्हारा गोत्र क्या है ? 

मैं - माते, मैं वशिष्ठ गोत्र का कान्यकुब्ज ब्राह्मण हूँ । 

तुम्हारा जन्म कहाँ हुआ ? 

बक्सर, बिहार में 

बक्सर का भगवान राम से क्या सम्बन्ध है ? 

माते, भगवान राम बक्सर में महर्षि विश्वामित्र के आश्रम में शिक्षा पाए, ताड़का और सुबाहु का वध किये । और वर्तमान अहिरौली गांव में अहिल्या का उद्धार किये । बक्सर से भगवान मिथिला की ओर प्रस्थान किये । 

तब बाघिन माता बोली - आज इसीलिए तुम मेरी गाथा सुनने चयनित हुए हो ! मेरी कथा भी भगवान राम से जुड़ी है ! तुम्हारा गोत्र बशिष्ठ है, अर्थात तुम महर्षि बशिष्ठ के वंशज हुए न ! 

जी , 

तुम्हारा जन्म राशि का नाम क्या है ?

 अवध बिहारी !

अभी तक जिन जगहों पर रहे हो, उनके पते क्या रहे ? 

सागर में राम मंदिर के पास, पुलिस लाइन सागर , हनुमान मंदिर के पीछे, सिविल लाइन सागर । फिर टीकमगढ़ में रामजानकी मन्दिर के पास, पपौरा चौराहा, उसके बाद रामराजा की नगरी ओरछा में पदस्थ रहा । 

इसका संकेत समझे ? 

तुम्हारे जीवन में हर जगह राम किसी न किसी रूप में जुड़े है । 

पता है, महर्षि बशिष्ठ के भाई कौन थे ? 

नही माते,

महान वैज्ञानिक, अविष्कारक महर्षि अगस्त्य ! जिनकी कृपा से मैं कृतार्थ हुई । महर्षि का जन्म भगवान विश्वनाथ की नगरी काशी में एक घड़े से हुआ था । वे बचपन से ही प्रखर बुद्धि और तपोबल वाले थे ।  उन्होंने सूर्यवंशी राजाओं के कुलगुरु का पद स्वयं न लेकर अपने भाई  बशिष्ठ को दिया । वे राजकाज के बंधन में नही बंधना चाहते थे । वे एक महान वैज्ञानिक थे । मुझे वो दिन अच्छे से याद जब महर्षि अगस्त्य ने अपने भाई को रघुवंश का कुलगुरु बनने की कथा सुनाई थी । 

बाघिन नदी की धारा शांत हो गयी, सूर्यास्त पश्चात अंधकार बढ़ने लगा था । झींगुरों की आवाज तेज हो गयी थी । इधर मेरी जिज्ञासा भी बढ़ने लगी थी । धीरे धीरे जल में हलचल हुई । माते बाघिन ने जैसे यादों में गोता लगाया हो । अगस्त ऋषि को सूर्यवंश का राजपुरोहित या राजगुरु बनने का निमंत्रण प्राप्त हुआ । परंतु अगस्त्य मुनि अपने अविष्कारों को अधबीच में छोड़कर पुरोहताई नही करना चाहते थे । लेकिन तत्कालीन विश्व के सर्वश्रेष्ठ कुल से सम्बन्ध विच्छेद भी नही करना चाहते थे । वो अपने भाई महर्षि बशिष्ठ के पास गए और उन्हें रघुकुल का राजपुरोहित बनने को कहा । बशिष्ठ भी अपने गुरुकुल के माध्यम से न केवल वैदिक शिक्षा को समाज में प्रसारित कर रहे थे, बल्कि कुछ वैज्ञानिक शोधों पर भी लगे हुए थे । 

अगस्त्य मुनि - प्रिय भ्राता बशिष्ठ, तुम्हे अयोध्या का राजपुरोहित बन जाना चाहिए ! 

बशिष्ठ - आदरणीय आप स्वयं जानते है, राजपुरोहित बनना एक बन्धन है । मुझे राज्य की नियमों से चलना होगा, मेरा गुरुकुल भी प्रभावित होगा ।

अगस्त्य - भ्राता, किसी महान उद्देश्य के लिए लघु वस्तुओं का त्याग करना होता है । 

बशिष्ठ - महान उद्देश्य ! राजपुरोहित बनना कौन सा महान उद्देश्य है ? 

अगस्त्य - बशिष्ठ, राजपुरोहित बनना तो एक माध्यम है । तुम्हे राक्षस राज दशानन के अत्याचार से पूरी पृथ्वी को मुक्ति दिलानी है ! 

बशिष्ठ - आदरणीय आप पहेली न बुझाये ! स्पष्ट बताये, कि मेरे राजपुरोहित बनने से लंकाधीश से मुक्ति कैसे होगी ? 

अगस्त्य - स्नेहिल बशिष्ठ, रघुकुल में भगवान श्री हरि अवतार के रूप में जन्म लेंगे और वही दसकन्धर का उद्धार भी करेंगे । 

बशिष्ठ - श्री नारायण रघुकुल में जन्म लेंगे ! कब , जल्दी बताइये कब  आदरणीय ? 

अगस्त्य -धैर्य धारण करो, श्री नारायण त्रेता युग में सूर्यकुल के सूर्य के रूप जन्म लेंगे । 

बशिष्ठ - धन्य है, आदरणीय ! अभी सतयुग चल रहा है, फिर द्वापर आएगा उसके पश्चात कही त्रेता युग में नारायण का अवतार होगा । तब तक मुझे प्रतीक्षा करते हुए पुरोहताई करनी होगी । मैं पूरे एक युग तक पुरोहताई नही करना चाहता । आप अयोध्या नरेश को संदेश भिजवा दीजिये वो किसी और को अपना राजपुरोहित बना ले । चाहे तो आप ही बन जाये । मुझसे इतनी प्रतीक्षा न हो पाएगी । 

अगस्त्य - सोचो , तुम्हे भगवान को शिक्षा देने का सौभाग्य मिल रहा है ! वो तुम्हारे गुरुकुल में पढ़ेंगे । तुम्हारे आदेशों का पालन करेंगे । तुम प्रतीक्षा के कारण इस परम सौभाग्य को त्यागना चाहते हो । 

बशिष्ठ - आप ही क्यों नही बन जाते ।

अगस्त्य - मुझे प्रभु के अवतार हेतु और भी कार्य करने है ।

बशिष्ठ - ऐसा कौन सा कार्य करना है ? 

अगस्त्य - प्रभु का अवतार रावण के उद्धार हेतु होने वाला है , रावण बहुत ही शक्तिशाली है, उसे महादेव और परमपिता ब्रह्मा का आशीर्वाद भी प्राप्त है । उससे युद्ध के लिये प्रभु को बड़े शक्तिशाली आयुधों की आवश्यकता होगी । उनका निर्माण हमे करना है । 

बशिष्ठ - जब वो स्वयं नारायण के अवतार है, तो उन्हें आपके आयुधों की आवश्यकता होगी ? 

अगस्त्य -  भ्राता, उनका ये अवतार मर्यादा पुरुषोत्तम का होगा । वो मानव की मर्यादा को पार नही करेंगे । वो ईश्वर की तरह नही बल्कि एक सामान्य मनुष्य की तरह युद्ध करेंगे ।

बशिष्ठ - बाकी सब उचित है, परंतु एक युग तक प्रतीक्षा करने का धैर्य मुझमें नही है । 

अगस्त्य - बालहठ न करो बशिष्ठ, विधि के विधान में सब निश्चित है । प्रभु का जन्म त्रेता युग में नियत है । और त्रेता प्रत्येक सृष्टि में द्वापर के पश्चात ही आता है । 

बशिष्ठ - यदि त्रेता द्वापर से पूर्व आ जाये तो ?

अगस्त्य - यह तो असंभव है ! 

बशिष्ठ - मैं परम् पिता ब्रम्हा की आराधना कर उन्हें प्रसन्न करूंगा । और इस असंभव को संभव बनाने का प्रयास करूंगा ।

अगस्त्य - अर्थात तुम राजपुरोहित बनने तैयार हो ? 

बशिष्ठ - आप ही बताइये जब श्री हरि विष्णु के अवतार का सानिध्य मिल रहा हो, तो कोई मूढ़ ही होगा जो तैयार न हो । 

इसके बाद महर्षि बशिष्ठ ने ब्रह्मा जी की उपासना कर प्रसन्न किया तो विधि के विधान को परिवर्तित करते हुए सतयुग के बाद द्वापर के स्थान पर त्रेता का आविर्भाव हुआ । इतना कह बाघिन माता ने विराम लिया । लेकिन मेरे मन में प्रश्न घुमड़ने लगे । 

सूर्य नारायण अस्तांचल से धरा के दूसरे भाग को प्रकाशित करने चले गए । इधर सूर्यवंश की राजपुरोहित बनने की कथा ने मेरे मस्तिष्क में हलचल मचा दी । मां बाघिन मंद मंद मुस्कान के साथ चुप हो गयी । लहरें भी मंद मंद गति से प्रवाहित हो रही थी, मगर मेरे हृदय में जिज्ञासा के ज्वार उठ रहे थे । अंधकार बढ़ने के साथ ही अज्ञानता के तिमिर में मैं स्वयं को असहाय पा रहा था । विवश होकर मैंने पुनः बाघिन नदी की ओर करबद्ध होकर विनती की । 

हे माते ! मेरे मन में उमड़ रहे प्रश्नों का निवारण कीजिये ? 

लहरों की गति में कुछ तीव्रता आई । ऊपर आकाश में हंसिये के आकार के चन्द्र देव निकल आये थे । अंधकार कुछ कम हुआ । चंद्र देव की परछाई नीचे नदी के जल में बन रही थी, लेकिन लहरों की गति के कारण ऐसा प्रतीत हो रहा था , कि जैसे स्वर्ण मयी कोई हंसिया जल में तैर रहा हो ! 

पृष्ठभूमि से आवाज़ आई - पुत्र, पूछो अपने प्रश्न ! 

माते, वशिष्ठ जी इतनी लंबी आयु के थे, कि सतयुग से त्रेता तक उपस्थित रहे ? 

बिल्कुल पुत्र, ऋषि-मुनि अपने तप के बल पर लम्बी आयु प्राप्त कर लेते है । आज भी बहुत से ऋषि मुनि हिमालय की कंदराओं में सैकड़ो वर्षों से तपस्यारत है । वैसे एक रोचक तथ्य बताऊँ , इंद्र की तरह वशिष्ठ भी एक पद है, जो समय समय पर अनेक ऋषि-मुनियों ने अपने तप के बल पर प्राप्त किया है । 

माते, थोड़ा समझाकर बताइये ।

जैसे आज के जमाने में प्रधानमंत्री एक व्यक्ति न होकर पद है, जो समय समय पर अलग अलग व्यक्तियों द्वारा धारण किया गया है । उसी प्रकार इंद्र, वशिष्ठ और व्यास भी एक पद है, जो समय समय पर अलग अलग ऋषि रहे है । इनमें से कुछ प्रमुख वशिष्ठ के बारे में संक्षेप में बताती हूँ । पहले वशिष्ठ ब्रह्मा जी के मानस पुत्र हुए ।

माते ! ये मानस पुत्र क्या होते है ? 

पु

त्र, जब महाप्रलय के पश्चात फिर से सृष्टि की रचना करनी थी, तो ब्रह्माजी ने अपनी योगमाया से 14 मानसपुत्र उत्‍पन्‍न किए:- मन से मारिचि, नेत्र से अत्रि,  मुख से अंगिरस, कान से पुलस्त्य, नाभि से पुलह, हाथ से कृतु, त्वचा से भृगु, प्राण से वशिष्ठ, अंगुष्ठ से दक्ष, छाया से कंदर्भ, गोद से नारद, इच्छा से सनक, सनन्दन, सनातन और सनतकुमार, शरीर से स्वायंभुव मनु और शतरुपा व ध्यान से चित्रगुप्त। 

ब्रह्माजी के उक्‍त मानस पुत्रों में से प्रथम सात मानस पुत्र तो वैराग्‍य योग में लग गए तथा शेष सात मानस पुत्रों ने गृहस्‍थ जीवन अंगीकार किया। गृहस्‍थ जीवन के साथ-साथ वे योग, यज्ञ, तपस्‍या तथा अध्‍ययन एवं शास्‍त्रास्‍त्र प्रशिक्षण का कार्य भी करने लगे। अपने सात मानस पुत्रों को, जिन्‍होंने गृहस्‍थ जीवन अंगीकार किया था ब्रह्माजी ने उन्‍हें विभिन्‍न क्षेत्र देकर उस क्षेत्र का विशेषज्ञ बनाया था ।


'सप्‍त ब्रह्मर्षि देवर्षि महर्षि परमर्षय:। 

कण्‍डर्षिश्‍च श्रुतर्षिश्‍च राजर्षिश्‍च क्रमावश:।।


1. ब्रह्मर्षि   2. देवर्षि   3. महर्षि   4. परमर्षि   5. काण्‍डर्षि   6. श्रुतर्षि    7. राजर्षि


उक्‍त ऋषियों का कार्य अपने क्षेत्र में खोज करना तथा प्राप्‍त परिणामों से दूसरों को अवगत कराना व शिक्षा देना था। मन्‍वन्‍तर में वशिष्‍ठ ऋषि हुए हैं, उस मन्वन्‍तर में उन्‍हें ब्रह्मर्षि की उपाधि मिली है। वशिष्‍ठ जी ने गृहस्‍थाश्रम की पालना करते हुए सृष्टि वर्धन, रक्षा, यज्ञ आदि से संसार को दिशा बोध दिया।

 

वशिष्ठ नाम से कालांतर में कई ऋषि हो गए हैं। एक वशिष्ठ ब्रह्मा के पुत्र हैं, दूसरे इक्क्षवाकु के काल में हुए, तीसरे राजा हरिशचंद्र के काल में हुए और चौथे राजा दिलीप के काल में, पांचवें राजा दशरथ के काल में हुए और छठवें महाभारत काल में हुए। पहले ब्रह्मा के मानस पुत्र, दूसरे मित्रावरुण के पुत्र, तीसरे अग्नि के पुत्र कहे जाते हैं। पुराणों में कुल बारह वशिष्ठों का जिक्र है।


 आगे बाघिन माते बताती है,

एक वशिष्ठ ब्रह्मा के पुत्र हैं, दूसरे इक्क्षवाकुवंशी त्रिशुंकी के काल में हुए जिन्हें वशिष्ठ देवराज कहते थे। तीसरे कार्तवीर्य सहस्रबाहु के समय में हुए जिन्हें वशिष्ठ अपव कहते थे। चौथे अयोध्या के राजा बाहु के समय में हुए जिन्हें वशिष्ठ अथर्वनिधि (प्रथम) कहा जाता था। पांचवें राजा सौदास के समय में हुए थे जिनका नाम वशिष्ठ श्रेष्ठभाज था। कहते हैं कि सौदास ही सौदास ही आगे जाकर राजा कल्माषपाद कहलाए। छठे वशिष्ठ राजा दिलीप के समय हुए जिन्हें वशिष्ठ अथर्वनिधि (द्वितीय) कहा जाता था। इसके बाद सातवें भगवान राम के समय में हुए जिन्हें महर्षि वशिष्ठ कहते थे और आठवें महाभारत के काल में हुए जिनके पुत्र का नाम पराशर था। इनके अलावा वशिष्ठ मैत्रावरुण, वशिष्ठ शक्ति, वशिष्ठ सुवर्चस जैसे दूसरे वशिष्ठों का भी जिक्र आता है। 

मैं अवाक सा सुन रहा था, कि मेरे गोत्र ऋषि वशिष्ठ के बारे में इतनी विस्तृत जानकारी के बारे में अब तक अनजान ही रहा है । मध्य रात्रि हो चुकी थी । लेकिन मन प्रसन्न था, भूख और नींद गायब थी । चन्द्र देव बिल्कुल सिर के ऊपर आ गए थे । पृष्ठभूमि तो जान गया, परंतु अभी तक बृहस्पति कुण्ड का रहस्य तो बाकी ही था । 

मां बाघिन मेरे मन की बात जानती हुई बोली,

पुत्र अभी पृष्ठभूमि पूर्ण नही हुई है, जब तक पृष्ठभूमि पूर्ण नही होगी, आगे बृहस्पति कुण्ड के रहस्यों को नही जान पाओगे । रहस्य इतने आसान होते तो रहस्य ही क्यों होते है । पृष्ठभूमि की एक एक बात आगे चलकर किसी न किसी रहस्य की परत खोलेगी ! अभी इन रहस्यों में बहुत से पात्रों का प्रवेश होगा, कुछ जाने होंगे कुछ अनजाने होंगे । लेकिन कोई भी पात्र कही से कमजोर नही बल्कि इन रहस्यों को समझने के लिए महत्वपूर्ण होगा । अब बहुत देर हो गयी पुत्र आज के लिये इतना बहुत है । फिर आना तो अगले किसी पात्र से परिचित कराउंगी ।
नदी के जल में अचानक हलचल हुई, जैसे ज्वार उठ रहा हो, एक लहर तेजी से उछल कर मेरे सिर का स्पर्श करती हुई, पुलिया के दूसरी ओर चली गयी । उस अलौकिक स्पर्श से ऐसा लगा जैसे बाघिन माता मुझे आशीर्वाद दे रही हो । मैं प्रणाम करते हुए अपनी गाड़ी में बैठ गया । मोड़दार रास्तों में स्टेरिंग की तरह मेरे मन में बहुत सारे प्रश्न घूम रहे थे । वशिष्ठ जी राजपुरोहित कैसे और क्यों बने ? भगवान राम के जीवन में अगस्त्य ऋषि की क्या भूमिका थी ?  अगस्त्य मुनि ने बृहस्पति कुण्ड को ही क्यों चुना ? 

( क्रमशः )




रविवार, 12 जुलाई 2020

खूबसूरत पाण्डव जलप्रपात और गुफाएं

पन्ना झरनों का एक अलग ही संसार
 नमस्कार मित्रों मानसून का प्रवेश देश में हो चूका है , लेकिन कोरोना के संक्रमण  कारण घुमक्कड़ी लगभग बंद सी है। लेकिन मानसून में देश में झरनो की एक अलग ही खूबसूरत दुनिया शुरू हो जाती है।  देश में बारहमासी झरने  कम ही है।  चलिए हम आपको मॉनसूनी झरनो की खूबसूरत दुनिया से रू ब रू कराते है।  देश के दिल यानि मध्य प्रदेश में उत्तर प्रदेश के बाँदा जनपद से लगा एक पिछड़ा सा जिला है।  जिसका नाम है , पन्ना।  हो सकता है,आपने नाम ही न सुना हो।  वैसे पन्ना सामान्य ज्ञान की किताबों में देश के एकमात्र हीरा उत्पादक जिले के रूप में जाना जाता है।  इसके अलावा यहाँ का पन्ना टाइगर रिजर्व भी थोड़ा-बहुत प्रसिद्द है। लेकिन आज हम पन्ना जिले के छुपे हुए खजाने की चर्चा करेंगे वो भी बिना खर्चा (कोरोना काल में यही कर सकते है ) पन्ना को प्रकृति ने दिल खोल कर अपनी सुंदरता प्रदान की है। मानसून आते ही यहाँ के पहाड़ अनगिनत झरनो को अपनी गोद से उतार देते है।  छोटे-बड़े झरने बड़े ही मनमोहक दृश्यावली उत्पन्न करते है।  मैदानी इलाकों में शायद ही कोई एक जिला होगा जिसमे इतने सारे जलप्रपात होंगे।  खैर हम एक एक कर के पन्ना जिले के खूबसूरत झरनो से आपको मिलवाते है।  इस श्रृंखला  का श्रीगणेश हम पन्ना जिले के सबसे प्रसिद्द जलप्रपात पांडव फॉल एवं गुफा से करते है।
  
स्थिति - छतरपुर -पन्ना मार्ग पर पन्ना टाइगर रिजर्व के मड़ला गेट से लगभग 5 किमी पन्ना की ओर मुख्य सड़क से 600 मीटर अंदर जंगल की ओर 
प्रवेश शुल्क -50 रूपये प्रति व्यक्ति ( पन्ना टाइगर रिजर्व  की तरफ से )
                   चार पहिया वाहन के 300 रूपये 
कब तक खुला रहता है - पूरे साल सूर्योदय से सूर्यास्त तक ( जबकि पन्ना टाइगर रिजर्व अक्टूबर से जून तक खुला रहता है।  )
                          अब नाम से इतना तो पता चल ही गया होगा कि इस जलप्रपात का नाम महाभारत कालीन पांच पांडवों से जुड़ा है।  अब पांडव हस्तिनापुर से यहाँ आये या नहीं इसका कोई प्रमाण है नहीं मुझे नहीं पता।  लेकिन पन्ना जिले में ही केन नदी पर  पण्डवन नाम से एक शानदार जगह है।  जिसका सम्बन्ध पांडवों से जोड़ते है।  इसके अलावा छतरपुर के बिजावर के पास भीमकुण्ड नाम से भी रहस्यमयी कुंड है।  पन्ना से 90 किमी की दूरी पर प्रसिद्द शक्तिपीठ शारदा देवी मंदिर मैहर है , जिसका सम्बन्ध पांडवों से जोड़ा जाता है। किंवदंती है, पांडव यहाँ  स्थित प्राकृतिक गुफा में अपने अज्ञातवास के दौरान रहे है।  अब अज्ञात वास है , तो उसे ज्ञात करना मुश्किल है।  इसके अलावा स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद भी काकोरी कांड के बाद यहाँ 4  सितम्बर 1929 को क्रांतिकारियों की एक गुप्त बैठक आयोजित की थी।  
दिल के आकार में बहने वाले इस खूबसूरत झरने को देखते ही बनती है।  टाइगर रिजर्व में पड़ने वाले इस जलप्रपात के आसपास प्राकृतिक खूबसूरती भी बहुत है।  कुछ वन्य जीव देखने मिल जाते है।  लंगूर, लाल मुँह वाले बन्दर, सियार , चीतल , सांभर , नीलगाय आदि गाहे-बगाहे दिख जाते है।  

  
पांडव जलप्रपात का पेनोरमा दृश्य 

                                       






चंद्रशेखर आजाद  

  • पांडव गुफाएं 














शनिवार, 14 सितंबर 2019

भेड़ाघाट का प्राचीन चौसठ योगिनी मंदिर !

नमस्कार मित्रों,
इस 17 जुलाई को जबलपुर उच्च न्यायालय एक केस के सिलसिले में जाना हुआ , उच्च न्यायालय से जल्दी फुरसत होने पर भेड़ाघाट की ओर रुख किया । हालाँकि पहले भी कई बार भेड़ाघाट स्थित धुंआधार जलप्रपात की खूबसूरती देखी है, लेकिन इस बार चौसठ योगिनी मंदिर जाना मुख्य उद्देश्य था ।
                                                                                     जबलपुर के पास स्थित भेड़ाघाट नर्मदा नदी के विहंगम जलप्रपात धुंआधार और संगमरमर की खूबसूरत चट्टानों के बीच बहती नर्मदा के खूबसूरत दृश्यों के लिए प्रसिद्द है । लेकिन भेड़ाघाट में एक प्राचीन चौसठ योगिनी मंदिर भी महत्वपूर्ण स्थल है । जिसकी जानकारी बहुत कम लोगो को होती है । पूरे भारत में कुछ ही प्राचीन चौसठ योगिनी मंदिर है, जिनमे से तीन मध्य प्रदेश में ही है । एक चौसठ योगिनी मंदिर मुरैना जिले के मितावली गांव में स्थित है । गोलाकार आकृति में बने इस मंदिर को भारतीय संसद के स्थापत्य की प्रेरणा कहा जाता है । मितावली स्थित चौसठ योगिनी मंदिर 9 वीं सदी में गुर्जर प्रतिहार शासक देवपाल गुर्जर में बनवाया था। इसके अलावा चौसठ योगिनी मंदिर, छतरपुर जिले में विश्व विरासत स्थल खजुराहो में भी चौसठ योगिनी का एक ध्वस्त मंदिर है। यह खजुराहो का सबसे प्राचीन मंदिर है, जो अब भी विद्यमान है। किन्तु यह अकेला ऐसा मन्दिर है जिसका आकार गोल न होकर आयताकार है। यह 9 वीं सदी में चंदेल शासकों द्वारा बनवाया गया था । ये तो हुए मध्य प्रदेश के चौसठ योगिनी मन्दिरो की बात अब मध्य प्रदेश के बाहर स्थित मंदिरों की बात करें तो उड़ीसा में भुवनेश्वर के निकट हीरापुर तथा बोलनगीर के निकट रानीपुर में हैं। इस तरह से देखा जाये तो पूरे भारत में कुल 5 प्राचीन चौसठ योगिनी मंदिर है । जिनमे 4 गोलाकार और 1 आयताकार आकृति में बने है । इन पांचों का निर्माण काल 9-10  सदी है । लेकिन सभी अलग अलग शासकों द्वारा बनवाये गये है । 
                                              आमतौर पर हिन्दू मंदिर वर्गाकार होते हैं और इनका विन्यास रेखीय होता है। अधिकतर मंदिरों में ईश्वर का मुख पूर्व दिशा की ओर होता है। दूसरी ओर गोलाकार योगिनी मंदिरों में ईश्वर का मुंह हर दिशा की ओर होता है। हालांकि, कुएं जैसी इन संरचनाओं का प्रवेश द्वार पूर्व की ओर ही है। मंदिरों की आम पहचान गुम्बद, शिखर या विमान इन मंदिरों में नहीं हैं। वास्तव में इन मंदिरों की तो छत ही नहीं है। उड़ीसा के हीरापुर तथा रानीपुर के योगिनी मंदिरों की अंदरूनी दीवारों पर योगिनियों की प्रतिमाएं हैं, सभी का मुंह केंद्र में बने मंदिर की ओर है। मध्यप्रदेश के भेड़ाघाट और मितावली मंदिरों में सभी योगिनियों के अलग-अलग मंदिर हैं जिनकी छतें तो हैं परंतु वे सभी गोलाकार प्रांगण की ओर खुलते हैं। योगिनियों की प्रतिमाएं हीरापुर, रानीपुर तथा भेड़ाघाट के मंदिरों में अच्छी हालत में हैं। खजुराहो के मंदिर में केवल तीन प्रतिमाएं बची हैं, जबकि मुरेना के मितावली मंदिर में कोई प्रतिमा नहीं है। 
                                                                            ये तो हुआ भारत में बने चौसठ योगिनी मन्दिरों के बारे में परिचय । अब हम बात करते है , अपनी चौसठ योगिनी मन्दिर की यात्रा की । उच्च न्यायालय के कार्य से मुक्त होते ही हम चल पड़े अपनी कार से भेड़ाघाट की ओर । मौसम भी सुहावना होकर हमारा साथ दे रहा था । बादल छाए हुए थे, और हवा चल रही थी । हम गूगल मैप की सहायता से मुख्य सड़क से न होकर गलियों से होकर भेड़ाघाट पहुँचे । कई बार गूगल महाराज पर गुस्सा भी आया कि कहां गलियों में भटका रहा है , लेकिन अंत भला तो सब भला । अभी मानसून आने में देरी थी , गर्मी अपने चरम पर थी , इसलिए भेड़ाघाट के धुआंधार जलप्रपात में पानी कम ही था । यहां एक बात बताना चाहूंगा कि भेड़ाघाट जगह का नाम है, जबकि नर्मदा नदी के जलप्रपात का नाम धुंआधार है । इस बार हमने रोप वे का प्रयोग करके नर्मदा के शानदार नजारे देखे । हालांकि जलप्रपात के भ्रमण के बारे में अगली पोस्ट में विस्तार से लिखूंगा । फिलहाल चौसठ योगिनी मन्दिर की यात्रा पर ही वापिस आते है । जलप्रपात देखने के बाद हम भेड़ाघाट शहर (कस्बा नुमा) की ओर आगे बढ़े । और एक पहाड़ी पर पत्थर की सीढ़ियां चढ़ कर हम चौसठ योगिनी मन्दिर पहुंचे । पसीने से लथपथ जब ऊपर पहुंचे तो वहां से नर्मदा नदी का दृश्य अद्भुत था । किसी ने बताया कि जल्दी दर्शन कर ले , अन्यथा मन्दिर बंद होने वाला है । उनकी बात मानते हुए हम मन्दिर के अंदर प्रवेश किये । गोलाकार आकृति में बने मन्दिर की बाहरी दीवालों पर चौसठ योगिनियों की अद्भुत प्रतिमाएँ बनी हुई है । यह देखकर दुख हुआ, कि सभी प्रतिमाएँ खण्डित है । कहानी वही मुस्लिम आक्रमण कारियों द्वारा इन प्रतिमाओं को खंडित किये जाने की । खैर योगिनियों की फ़ोटो लेने के बाद मन्दिर के बीचोबीच बने गर्भ गृह की ओर बढे । गर्भगृह के ऊपर लगा ध्वज बता रहा था, कि ये जाग्रत मन्दिर है, अर्थात यहां नियमित पूजा होती है । मतलब गर्भ गृह की मूल प्रतिमा खण्डित नही है । अंदर पहुँचे तो देखा गर्भ गृह में भगवान शिव और उनकी अर्धांगिनी पार्वती जी नंदी बैल पर सवार है । मन्दिर के पुजारी के अनुसार यह विश्व में इस तरह की एकमात्र ऐसी प्रतिमा है । मैंने भी कभी इस तरह नन्दी आरूढ़ उमा-महेश्वर की प्रतिमा देखी या सुनी नही है । सामान्यतः शिव मंदिर में शिवलिंग ही प्रतिष्ठित होते है । प्रतिमा भी बड़ी आकर्षक थी । शिव-पार्वती  के बगल में में ही कार्तिकेय और गणेश की प्रतिमाएं विराजमान थी, मतलब पूरा शिव परिवार ही विराजमान था।  
                                                                                   मन्दिर के अंदर सीसीटीवी कैमरे लगे थे, और मन्दिर के अंदर की फ़ोटो न खींचने की मनाही वाली चेतावनी लिखी थी । चेतावनी पढ़कर मन मायूस हुआ , मगर एक कोशिश करने में क्या हर्ज है ?  यही सोचकर मैंने पुजारी जी से फ़ोटो खीचने के बारे में पूछा तो उन्होंने सीसीटीवी की पहुँच से बाहर होकर फ़ोटो खींचने की अनुमति दे दी । अंधा क्या चाहे दो आंखे ! हमने भी मोबाइल से ही जल्दी जल्दी कुछ फोटो ली । फिर भगवान को प्रणाम कर बाहर निकल आये । आज बड़ी पुरानी इच्छा पूर्ण हुई । अभी तक दो चौसठ योगिनी मन्दिर देख लिए एक खजुराहो वाला और दूसरा ये भेड़ाघाट का । अब मुरैना और ओडिसा के मंदिर बाकी है । 

चौसठ योगिनी मंदिर की बाहरी बनावट 
मंदिर के भीतरी प्रांगण में स्थित शिव मंदिर 
मंदिर के गर्भगृह में नंदी पर आरूढ़ शिव-पार्वती और बगल में उनका परिवार



योगिनी की खंडित खंडित प्रतिमा 
























मंदिर में स्थित शिवलिंग 














मंदिर के बाहर  मैं 
इस पोस्ट में इतना ही अगली पोस्ट में धुआंधार जलप्रपात के खूबसूरत नजारें देखेंगे।

गुरुवार, 9 मई 2019

गंगा जी कहिन : अहिल्या का उद्धार (बक्सर गाथा -2)



अहिरौली गंगा घाट (बक्सर , बिहार ) चित्र प्रतीकात्मक है।  
इस श्रृंखला की पहली पोस्ट में आपने पढ़ा, कैसे मेरे और मां गंगा के बीच संवाद शुरु हुआ और मैंने उनसे कैसे बक्सर का प्रारंभिक इतिहास जाना । परंतु मेरा प्रश्न अनुत्तरित रह गया था , कि भगवान राम ने कैसे अहिल्या का उद्धार किया ?  
चूँकि मैं जीवन यापन के लिए मां गंगा से सैकड़ों किलोमीटर दूर बेतवा किनारे ओरछा में रहता हूं और साल में एक या दो बार ही आना हो पाता है, इसलिए मां गंगा से  मुलाकात अधूरी रही और महीनों तक यह प्रश्न मेरे मन में भ्रमण करता रहा, कि आखिर भगवान श्री राम अपने गुरु विश्वामित्र के साथ जब गौतम ऋषि के आश्रम पहुंचे होंगे तो वह दृश्य कैसा होगा और उस स्त्री को जिसको उसके स्वयं तपस्वी पति ने छोड़ दिया हो ,आखिर भगवान ने कैसे उस पर अपनी करुणा दिखाई होगी ?
 मां गंगा की कृपा बहुत जल्दी मुझ पर हुई और उन्होंने अपने तट पर मुझे जल्दी ही बुला लिया और इस बार मैं फिर हाजिर था।  अपने उन्हीं प्रश्नों या जिज्ञासाओं के उत्तर को पाने के लिए और मां गंगा के बक्सर स्थित उसी रामरेखा घाट पर मैं पहुंचा जहां कभी भगवान श्री राम अपने अनुज लक्ष्मण और गुरु विश्वामित्र के साथ स्नान करते थे। मैं मां गंगा के आंचल के  एक छोर पर प्रतीक्षारत बैठा था , कि कब मां गंगा अपनी कृपा मुझ पर बरसा दे  ! और महीनों से अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर मुझे मिले।  मां गंगा की कृपा मुझ पर हुई और गंगा की अविरल धारा से आवाज आई-  हे पुत्र ! आखिर तुम्हें आना ही पड़ा !  मैं हाथ जोड़कर नतमस्तक खड़ा था और मैंने कहा कि क्या ऐसा हो सकता है कि आप बुलाएं और आपका यह अनुग्रहित पुत्र आए ना ।
इसके पश्चात मैंने मां गंगा से अपना वही पुराना प्रश्न दोहराया कि आज मां बताइए पाषाण बनी अहिल्या से कैसे मिले प्रभु राम ? 
कुछ देर की शांति  के पश्चात गंगा की लहरें  शांत हुई और कुछ देर के बाद मां गंगा  बोली - मैं  त्रेता युग में पहुंच गई थी  और मुझसे बोली - पुत्र मुझे अच्छे से याद है, वह दिन जब ऋषि गौतम और उनकी पत्नी की  कथा महर्षि विश्वामित्र ने राम को सुनाई और राम ने अहिल्या के लांछन और अपमान की कथा सुनकर अपने गुरुदेव से कहा - कि मैं उस देवी के दर्शन करना चाहूंगा गुरुदेव !  गुरुदेव ने कुछ कहा नहीं केवल गर्व से देखा था राम की ओर और राम के निकट पहुंच कर उनके कंधे पर हाथ रख कर दूर आकाश की ओर निहारा और अपने शिष्य के मुख से उस तिरस्कृत और लोक निर्वासित महिला के लिए देवी का संबोधन सुन बोले कि आज तुम में मैं अपना आप में मेरा विस्तार देख रहा हूं।   कुछ क्षण  तक महर्षि विश्वामित्र आत्म मुग्ध से खड़े रहे और राम की ओर देखते हुए बोले उसे भी तुम्हारी ही प्रतीक्षा है।  राम ! अपमान और उपेक्षा ने उसकी चेतना को लगभग नष्ट कर दिया है, मनुष्यों की छाया से भी वह डरती है , किसी को दूर से ही देख कर छिपने या भागने का प्रयत्न करती है ,डरती है,  न जाने क्या अपशब्द सुनने पड़े ! चेतना का केवल यही प्रमाण शेष रह गया है।  समाज  उसे दूषित करने वालों की लोग पूजा करता है।   ! पुरुष जो ठहरे शक्तिशाली जो ठहरे वे छल कर सकते हैं ! लूट सकते हैं !दूसरों को अपमानित कर सकते हैं ! और जिन्हें चलते लूटते और अपमानित करते हैं, उन्हीं को इन सब के लिए दोषी भी सिद्ध कर सकते हैं।  आश्चर्य है !  जो सिरजता है, गढ़़ता है लोक  को जीवन और अवलंबन देता है, वही सबसे अधिक अपमानित भी होता है वह धरती हो,स्त्री हो या नदी  हो सबकी एक नियति है । महर्षि विश्वामित्र और उनके दोनों होनहार शिष्य धीरे धीरे मेरे किनारे ही उस स्थान पर पहुंचे जहां पर अहिल्या जीवित होते हुए भी पाषाण की तरह शापित थी।  राम ने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए थे और दूर किसी स्त्री की छाया दिख रही थी, वह हाथ जोड़े उसी दिशा में चलते रहे लक्ष्मण भी उनका अनुगमन करके उनके साथ उसी तरह चल रहे थे, संभवत उन्हें भी लगा था कि वह व्यक्ति अन्य लोगों से भिन्न है ,  वह ना तो अपने स्थान से हिली थी और ना भागी थी।  संभव है उसे आंखों से कुछ दिख ही  ना रहा हो या संभव है कि उसमें हिलने की शक्ति ही ना रह गई हो ! नहीं ! वह शायद इधर देख ही नहीं पा रही थी,  मौन बैठी थी।  किसी सोच में डूबी थी। उसके निकट पहुंचकर राम उसके चरणों में लेट गए थे और बोली आपने बहुत दुख झेला है मां ! मैं समस्त पुरुष जाति की ओर से आपसे क्षमा मांगने आया हूं ! हे देवी मैं आपको अपमानित करने वाली उस दम्भी पुरुष जाति का प्रतिनिधि आपसे दंड मांगने आया हूं ।
उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था।   यदि राम के शब्द उसके कानों में पड़ भी रहे थे, तो उनका अर्थ शायद उसकी समझ में नहीं आ रहा था ! वह जड़ सी एकटक राम को देखी जा रही थी ! नहीं,  उसके कानों में कोई ध्वनि आवश्यक टकराई थी उसने बोलने का प्रयत्न किया था,  होठ हिले थे, पर शब्द बाहर नहीं आ पा रहे थे।   कोई मरणासन्न व्यक्ति जैसे कुछ कहने का प्रयत्न करें और उसकी आवाज एक अस्पष्ट फुसफूसाहट बनकर रह जाए और बहुत ध्यान देने पर कुछ समझ में आए वैसे ही उसने कहा था - मैं लंछिता हूँ !  पतिता हूं !  उसने राम के सिर को अपनी दुर्बल अंगुलियों से कुछ इस तरह छुआ था, जैसे उठाने का प्रयत्न कर रही हो !
                                               और फिर वही शब्द 'पतिता  ' .. आप पतित नहीं हो सकती मां , जो पतित होते हैं,  वह अपने जघन्य कृत्य पर भी अपने को पतित नहीं कहते।  वह अपने पापों  को लेकर गर्व करते हैं , उनकी चेतना अहंकार से इतनी मलिन हो चुकी होती है , कि वे अपने पातकों को समझ ही नहीं पाते।  जिनमें पतित होने का बोध है,  जो उन अहंकारियों द्वारा पातिकी कहीं जाते हैं।  वे या तो अज्ञान अपज्ञान या व्यवस्था के कारण उनके ही पापों और पातकों का बोझ धोने को बाध्य कर दिए जाते हैं । राम ने प्रतिवाद करते हुए कहा था ।
                                             अहिल्या की समझ में कुछ नहीं आ रहा था।   वह केवल आश्चर्य से राम को निहार रही थी राम ने कुछ स्पष्ट स्वर में एक एक शब्द पर रुकते हुए और एक एक शब्द का स्पष्ट उच्चारण करते हुए फिर कहा  " तुम पतित नहीं हो मां तुमने दूसरों के पातक का प्रक्षालन अपनी पीड़ा और यात्रा से किया है । जैसे मां अपनी गोद के बच्चों की मल का प्रक्षालन करती है । हाँ मां, अपने समस्त अहंकार के बावजूद पुरुष जाति स्त्री के सम्मुख एक शिशु ही बना रह जाता है अपनी धात्री और पोषिका को ही दूषित और मलिन करके किलकारियां भरने वाले शिशु से अधिक क्या है वह "
तुम्हारी बातें मेरी समझ में नहीं आती अहिल्या ने दुर्बल और कांपते हुए स्वर में कहा था।  उसकी समझ में कुछ तो आ ही रहा था,  अन्यथा वाणी में यह परिवर्तन कहां से आता । उसके नकार में भी आत्मविश्वास कहां से लौटता ।  ' कुछ समझ में नहीं आता बेटा" बेटा शब्द का उच्चारण उसने इतने विलगित होकर किया था ,कि अपना संयम ना खोने वाले राम की भी आंखें भर आई थी ।
आततायी  होते हैं मां ,जो दूसरों को कुचलकर अकेले ऊपर उठना चाहते हैं ,सिर तान कर शिखर बनना चाहते हैं।  मैंने शिखरों को भूचाल तो दूर मात्र मेह से खिसकते और लुढकते देखा है । पर्वतों को अपने अहंकार के दरबार से बिना किसी बाहरी ठोकर या आघात के चूर चूर होते देखा है । लेकिन मैंने धरती को द्रवित होकर बहते तो देखा है, पर पतित होते नहीं देखा । स्त्री तो जननी होती है ! वह तो धरती होती है !  मां वह पतित नहीं हो सकती !  पतितो को भी वही संभालती है और वहीं संभाल सकती है । यदि वह पतित होगी तो उसे कौन संभालेगा । राम ने अपने संयत पर कोमल स्वर में कहा था । उस समय वृद्धा के मुख पर हो रहे भाव परिवर्तन को देखकर आश्चर्य हो रहा था उसमें एक ऐसी प्राणशक्ति आ गई थी मानो कोई सूखी लता वर्षा की झड़ी से एक ही क्षण में हरी हो गई हो ।

तुम कौन हो ? कौन हो तुम ? उसने अपने आंतरिक आह्लाद को दबाते हुए भर आई सी आवाज में कहा था । " तुम मनुष्य नहीं हो सकते " नहीं तुम मनुष्य नहीं हो सकते , तुम भगवान हो । तुम पतित पावन भगवान हो , पतितों को भी पवित्र मानने वाले, उपेक्षित और वंचितों को उनका लूटा हुआ सौभाग्य और गौरव दिलाने वाले अवतार हो तुम " वह बढ़कर राम के चरणों में लिपट गई और फूट-फूट कर रोने लगी थी राम बार-बार उठो मां ! उठो देवी !  कहकर बुला रहे थे ! 

मां गंगा की लहरें शांत हो चली थी , इधर मेरा मन अशांत हो चला था , आँखों से अविरल धारा बह रही थी  ......
( क्रमशः अगले भाग में जारी )
चित्रकला - अलका दास 


शनिवार, 25 नवंबर 2017

देवगढ़ का अनमोल, अनछुआ प्राकृतिक खजाना !

 अद्भुत शिल्प और दशावतार मंदिर देवगढ़                                        

           पिछली पोस्ट में आपने पढ़ा कि  दशावतार मंदिर के अद्भुत शिल्प अंकन में हम इतना खो गए थे कि हमें न खुद की सुध बुध थी और ना ही अपनी भूख की । ऐसा लग रहा था कि मानो इन मंदिरों के शिल्प के साथ हम भी उस काल में पहुंच गए हो और मंदिर की भित्ति पर उत्कीर्ण प्रतिमाएं हम से साक्षात्कार कर रही हो और वह दृश्य हमारे सामने जीवित हो उठे हो । परंतु समय कब किसके लिए रुका है और यहां भी सूर्यदेव आकाश मार्ग में धीरे-धीरे अस्ताचल की ओर गमन करने लगे और हमें वर्तमान में ले आए । मैं और नयन सिंह जी भूख से बेहाल हो चुके थे, हालांकि साथ में ले आए सेव फलों (सेव फलों ने ही तो दुनिया में कई परिवर्तन ला दिए, न एडम वह स्वर्ग में सेव खाता और ना ही इस धरती पर हम इंसानों की दुनिया बसती । फिर न्यूटन महोदय के सर पर न पेड़ से सेव गिरता और ना वो गुरुत्वाकर्षण का नियम खोजते और ना ही आज विज्ञान इतनी तरक्की  कर पाता ।) हमारी भूख को कुछ तो राहत दी । अब हमारे खाए हुए सेवफल ने भी कम गुल नहीं खिलाए । 
दशावतार मंदिर को देखने के बाद हमने वहां के चौकीदार सीताराम तिवारी जी से यहां आस-पास और दर्शनीय स्थलों के बारे में जानकारी ली तो उन्होंने बताया यहां पर भगवान महावीर वन्य जीव अभ्यारण के अंदर एक जैन मंदिर, वराह मंदिर, सिद्ध की गुफा, नाहर घाटी, राज घाटी और बेतवा नदी का मनोरम दृश्य है । यह सभी सदियों पुराने हैं । इसके साथ ही बेतवा के किनारे पर प्राकृतिक चट्टानों से बने घाट पर चट्टानों की दीवारों पर कई प्रतिमाएं उकेरी गई हैं । ब्राह्मी लिपि में एक अभिलेख भी लिखा हुआ है । यह सुनकर हम अपनी पेट की भूख भूल गए और घुमक्कड़ी की भूख जाग उठी । सेव फल  अपना चमत्कार  दिखाने लगे और  देवगढ़  जहां हमें सिर्फ दशावतार मंदिर ही  खींच लाया  अब एक  नई दुनिया  से रूबरू होने वाले थे । अब हमारे पैरों में सनीचर हमें खुद ही उस जंगल की ओर बुलाने लगा । क्योंकि यह हमारे लिए अनजान जगह थी , इसलिए हमने सीताराम तिवारी जी से निवेदन करके उनके लड़के को अपने साथ एक मार्गदर्शक के रुप में ले लिया और हम चल पड़े जंगल की ओर । सबसे पहले हमने सबसे दूर वाली जगह जाने का निश्चय किया क्योंकि पहले वाली जगह देखने के चक्कर में अंधेरा हो सकता था और हम बाकी जगहों से मिलने से मरहूम हो सकते थे । पहाड़ी जंगलों के बीच पगडंडी नुमा सड़क पर हमारी Scorpio आराम-आराम से चली जा रही थी बीच-बीच में पेड़ पौधे झाड़ियां हमारा रास्ता रोकने की कोशिश भी कर रही थी, मगर हम उन्हें हटाते हुए अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहे थे । कुछ दिन पहले हुई बरसात के कारण रास्ते में कीचड़ और गड्ढे भी थे । पर इन सब से बेपरवाह हम बढ़ते चले जा रहे थे , क्योंकि अगर हम रुकते तो सूर्य अस्त हो जाता और इस खजाने से वंचित हो जाते ।
                                          सबसे पहले हम नाहर घाटी पहुंचे और यहां बेतवा नदी का विहंगम दृश्य देखकर मन मयूर सा नाचने लगा । बेतवा नदी और मेरा रिश्ता तो आप मेरी  ओरछा गाथा सीरीज में  पढ़ ही चुके हैं । मुझे यहां आने के पहले यह नहीं पता था कि देवगढ़ भी बेतवा नदी के किनारे  बसा हुआ है । बेतवा का अपार चल देख कर  मन प्रसन्न हो गया । यहां पर  राजघाट बांध  के कारण  यह क्षेत्र डूब क्षेत्र  में आता है  इसलिए  यहां पर  बेतवा  अपनी अथाह जलराशि से  सागर जैसा  एहसास दिला रही थी । बीच में  टापू जैसी जगह पर  कुछ मकान दिख रहे थे  जो  मध्य प्रदेश  का एक गांव था । अर्थात बेतवा की तरफ  उत्तर प्रदेश और दूसरी तरफ मध्य प्रदेश  है । बेतवा  मध्य प्रदेश की  उत्तरी सीमा  बनाने में  सहायक है  विशेषकर  ललितपुर और झांसी जिलों में । नाहर घाटी के नाम में नाहर का अर्थ सिंह होता है, अतः नाम से लगता है कि कभी इन जंगलों में सिंह भी निवास करते रहे होंगे और हो सकता है इस घाट पर वह पानी पीने आते होंगे इसलिए इसका नाम नाहर घाटी पड़ा । यहां प्राकृतिक चट्टानों को काटकर सीढ़ियां बनाई गई थी और खड़ी चट्टानों की दीवारों पर छेनी और  हथोंडो से खोदकर शिवलिंग और अन्य प्रतिमाएं बनाई गई थी । जिन जगहों पर यह प्रतिमाएं बनाई गई थी वहां पहुंच पाना ही बहुत कठिन था न जाने कैसे शिल्पकारों ने यह अद्भुत कारीगरी की होगी । एक तरफ चट्टानों पर मनुष्य कलाकृतियां देख कर मन विस्मित था तो दूसरी तरफ बेतवा नदी के सुंदर रूप को देखकर प्रकृति की कलाकारी पर हमने दांतों तले उंगलियां दबा ली थी । इन नजारों को देख कर मन नहीं भर रहा था ऐसा लग रहा था कि घंटों इस जगह पर बैठकर प्रकृति और मनुष्य की कलाकारी को निहारते रहे । पर हमारे पास समय कम था अंधेरा होने को आ रहा था और हमें और भी स्थान देखने थे इसलिए हम वापस हुए । राज घाटी में भी शिवलिंग, सूर्य की प्रतिमा और अन्य कुछ प्रतिमाएं खड़ी चट्टानों पर उत्कीर्ण की गई थी यह भी बेतवा के तट पर बनी घाटी थी । 
                                              राज घाटी के बाद हम सिद्ध की गुफा पहुंचे। इस जगह खड़ी चट्टान को काटकर एक गुफा बनाई गई थी, जिसके आसपास महिषासुर मर्दिनी, शिव और अन्य देवी देवताओं की प्रतिमाएं उत्कीर्ण की गई थी । पास में ही ब्राह्मी लिपि में एक लेख लिखा हुआ था जो हमारी समझ से बाहर था। इसी के पास देवनागरी में भी एक लेख खुदा हुआ था जिसकी भाषा इसे बुंदेली शासकों की समय का बता रही थी । सिद्ध की गुफा देखने के पश्चात हम लोग वराह मंदिर की तरफ आए वराह मंदिर भी गुप्तकाल का एक मंदिर था जिसमें भगवान विष्णु के वराह अवतार की प्रतिमा विराजित थी । लेकिन चोरों द्वारा उस प्रतिमा को चुरा लिया गया परंतु उसे खंडित अवस्था में बरामद कर लिया गया और वह वर्तमान में भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के स्टोर रूम में धूल खा रही है । वराह मंदिर में वर्तमान में भग्नावशेष इसकी भव्यता का यशोगान गा रहे हैं। वराह मंदिर के पश्चात हमारी गाड़ी जैन मंदिर की ओर मुड़ चली । जैन मंदिर का वास्तुशिल्प और बनावट आठवीं नवी सदी के चंदेल कालीन मंदिरों का है । जैन समाज द्वारा इन मंदिरों की देखरेख की जाने के कारण इनकी स्थिति बहुत अच्छी है यहां पर जंगल में यत्र-तत्र बिखरी पड़ी जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाओं को एकत्र करके एक ही परिसर में स्थापित किया गया है । मुख्य मंदिर के गर्भ गृह में जैन तीर्थंकर शांतिनाथ की प्रतिमा है । मंदिर परिसर में ही एक संग्रहालय बना हुआ है ,जहां पर सुरक्षा व्यवस्था के लिए पुलिस चौकी भी है, परंतु सूर्य अस्त हो जाने के पश्चात यह संग्रहालय बंद हो गया था, इस कारण हम इसके दर्शन नहीं कर पाए । सीताराम तिवारी जी के सुपुत्र ने हमें एक नई जानकारी दी, कि देवगढ़ के इन जंगलों में हाल में ही भगवान बुद्ध से संबंधित बहुत सारी प्रतिमाएं और अवशेष खोजे गए हैं, जिन पर अभी शोध चल रहे हैं. हालांकि घने जंगल में होने के कारण हम उनका फिलहाल मोह त्याग कर वापस लौटने का विचार बनाएं । वैसे भी अब वापसी की बेला हो चली थी और जठराग्नि भी प्रज्वलित हो रही थी । लौटते में देवगढ़ कस्बे में स्थित जैन धर्मशाला की स्थिति देखने हम लोग पहुंचे जहां पर 300 रुपये और 500 रुपये के दो प्रकार के कमरे बने हुए थे और व्यवस्था बहुत अच्छी थी । साथ ही शाकाहारी भोजन की भी सुलभता थी । अर्थात यहां आराम से रात गुजारी जा सकती है और हमने निश्चय किया कि कभी परिवार सहित यहां अवश्य आएंगे और एक रात्रि विश्राम करके आराम से और विस्तार से देवगढ़ का भ्रमण किया जाएगा । देवगढ़ के पास ही रणछोड़ धाम भी एक दर्शनीय स्थल है जहां भगवान श्री कृष्ण ने कालिया यवन का वध किया था और यहीं पर वह रणभूमि छोड़कर भागे थे जिस कारण उनका नाम रणछोड़ पड़ा। चूंकि रात्रि हो चुकी थी।  अतः हमने वापसी में ही भलाई समझी और रणछोड़ धाम को दोबारा आने का एक निमित्त बनाकर अपने धाम को लौटने का विचार किया । देवगढ़ जाने के लिए नजदीकी रेलवे स्टेशन ललितपुर है और ललितपुर सड़क मार्ग द्वारा भी देश के बाकी हिस्सों से जुड़ा हुआ है ।
हम चल पड़े प्रकृति की ओर 

नयन सिंह जी और उनकी स्कार्पियो 
बेतवा की पहली झलक (मेरे और माँ बेतवा के सम्बन्ध तो आप जानते ही है )
इस नजारे ने तो दिल चुरा लिया 
खड़ी चट्टानों को काटकर बनाई गयी सीढिया 
नदी किनारे खड़ी चट्टानों को काटकर कैसे मूर्ति बनायीं गयी होगी ?
सप्तमातृकाएं और गणेश का  साहसिक शिल्पांकन 
शिवलिंग 
भगवान भास्कर 
कुदरत की कलाकारी 
ये अभिलेख भी हमें प्राप्त हुआ।  हालाँकि पल्ले कुछ भी नहीं पड़ा 
सिद्ध गुफा 
महिषासुर मर्दिनी का सुन्दर शिल्पांकन 
इन किंगफिशर जनाब के काम में हमने शायद खलल डाल दिया 
प्रकृति की इस अद्भुत चित्रकारी को हमने अपने कैमरे में कैद किया 
वराह मंदिर के भग्नावशेष 
जैन तीर्थंकर शांतिनाथ मंदिर 
प्राचीन जैन मंदिर (नागर शैली )
मंदिर परिसर में स्थापित की गयी अन्य तीर्थंकरों की प्रतिमाएं 
अच्छा तो अब चलते है 

orchha gatha

बेतवा की जुबानी : ओरछा की कहानी (भाग-1)

एक रात को मैं मध्य प्रदेश की गंगा कही जाने वाली पावन नदी बेतवा के तट पर ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा हुआ. बेतवा की लहरों के एक तरफ महान ब...