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रविवार, 16 जुलाई 2017

पवित्र गुफा में बाबा गुप्तेश्वर नाथ के दर्शन के साथ एक अद्भुत रोमांचक यात्रा (अंतिम भाग )

इस श्रृंखला की पिछली तीन पोस्ट से इतना तो आप जान ही गए होंगे , कि  बाबा गुप्तेश्वर के धाम तक पहुंचना इतना आसान नहीं है।  अगर आपने पिछली पोस्ट नहीं पढ़ी तो नीचे  लिंक दे रहा हूँ , क्लिक करके पढ़ लीजिये तभी असली आनंद आएगा।

 अगर पढ़ चुके है , तो बहुत अच्छी बात है , बम भोले करते हुए आगे बढ़ते है।
                                            तो अँधेरी रात में जंगल के बीच  से कठिनतम चढ़ाई करके हम लोग बोल बम का नारा  लगते हुए आएगी बढे।  कई बाधा  आई पर जब बाबा का सहारा हो तो फिर मुश्किल कैसी  ! अब सुबह हो चुकी थी , बिना पेट खाली  किये हम लोग आगे बढ़ रहे थे , सुबह की ठंडी और सुहावनी बयार की मस्ती में बड़े आराम से चल रहे थे।  पर ये आराम ज्यादा देर नहीं टिका।  अब सूरज नारायण धीरे धीरे उग्र होने लगे थे , और शरीर पसीना छोड़ने लगा था।  रस्ते में कई बरसाती झरने मिले तो ऐसे ही एक झरने पर कुछ लोगो ने नहाया।  अब लगातार चलना मुश्किल हो रहा था , तो सुस्ता -सुस्ता के आगे बढ़ रहे थे।  सुबह से नींबू  वाली चाय के अलावा कुछ नहीं लिया था।  अब सुबह होने से हमें लौटने  वाले बम  भी मिलने लगे , जिन्हे देख कर लगने लगा कि  हम करीब आ गए।  अब हम पहाड़ की कठिन उतराई  उतर चुके थे।  उतरते ही कुछ दुकाने मिली  जहाँ हमने हम लोग नींबू  वाली चाय पीने  रुके या इसी बहाने सुस्ताने लगे।  सबसे बुरी हालत मेरी और संजय सिंह जी की हो चली थी।  हमारी शारीरिक मेहनत की आदत लगभग ख़त्म सी हो गयी है  इसलिए यहां इतना चलना अखर रहा था।  जबकि बाकि लोग मजे से चल रहे थे।  खैर चाय पीकर सब चलने तैयार हो गए , हम दोनों भी मजबूरन चल पड़े।  मन तो बहुत चलने को कर रहा था , मगर तन तो साथ दे। 
                                                           आगे दुर्गावती नदी मिली , ये नदी ऊपर से बहुत खूबसूरत चमकती हुई चाँदी  की लकीर सी दिख रही थी, लेकिन आस आने पर तेज प्रवाहनी थी , इसका कारन एक दिन पहले हुई बारिश थी।  स्थानीय लोगों ने या कहे नक्सलियों ने  सीमेंट के पिलर बनाकर लकड़ियों के द्वारा एक अस्थायी पुल  का निर्माण किया था , जो तेज बारिश में नदी का पानी बढ़ने पर बह जाता है।   अभी तक पुरे रस्ते में हमें दर्शनार्थी ो खूब मिले मगर उनके लिए प्रशासन की तरफ से सुविधा के नाम पर हाथ सलाई शून्य ही मिला।  लेकिन इतनी कठिनाई के बाद भी लोग श्रद्धा और भक्ति के बल पर बाबा के दर्शन करने आते है।  हैरानी की बात इतनी कठिनाई में महिलाएं , बच्चे और बुजुर्ग भी आते है।  खैर अपने जीवन में पहली बार लकड़ी के इस तरह के पुल को देखा था।  इस सेतु के निर्माणकर्ताओं ने बाकायदा टोल बसूलने का इंतजाम कर रखा था।  प्रति व्यक्ति मात्र  दस रुपये।  कुछ लोगों ने बिना पैसे दिए ही नदी की  धार में से नदी पार करने की कोशिश की , मगर धार तेज होने से अंततोगत्वा दस रूपया खर्च कर नदी आर करने में ही भलाई समझी।  हम भी इस रोमांचक जुगाड़ू पुल  से नदी पार की।
                                                        अब चढ़ाई- उतराई की जगह समतल जमीन ने ले ली थी।  पर जंगल साथ ही था।  कुछ किलोमीटर चलने पर पगडण्डी से कुछ चौड़ा रास्ता मिला , जिसमे ट्रेक्टर के चक्के  के निशान भी मिले।  राहगीरों से पूछने पर पता चला कि  ये चेनारी वाला रास्ता है।  बरसात होने के पहले स्थानीय लोग ट्रेक्टर से अपनी दुकानों के सामान और रसद सामग्री ले आते है।  और बरसात होते ही दुर्गावती नदी चेनारी वाला रास्ता बंद कर देती है।  हालाँकि महाशिवरात्रि के समय दोनों रास्ते  खुले होते है।  सावन और फागुन के अलावा बाबा के दर्शन बंद रहते है।  फागुन में आसान रास्ते  से तो आया जा सकता है, मगर प्रकृति की इतनी सुंदरता छूट जाती है। आप कुछ देर के लिए अपनी आंखे बंद कर कल्पना कीजिये, कि आप हरे भरे पहाड़ से गुजर रहे है , आसपास के पेड़-पौधे बारिश से नहाकर आपका स्वागत कर रहे।  चलते-चलते पहाड़ो की चोटियों से झरने फूट  पड़े , उनका झर-झर  का कोलाहल शोर नहीं पैदा कर रहा बल्कि संगीत की मधुर तान लग रहा है , इस संगीत में साथ देने पक्षियों की चहचहाट भी  है।  ऊपर नीले  आसमान में रुई केफाहे से सफ़ेद बादल माहौल को चार चाँद लगा रहे है।  सोचिये जब ये सब कल्पना में ही इतना प्यारा लग रहा है , तो वास्तविकता में कितना अच्छा लगेगा।  तो इन नजारो का लुत्फ़ उठाये हुए हमारा कारवां आगे बढ़ रहा था।  लौट रहे लोगो की एक बात बड़ी अच्छी लगी , कि  जिससे भी पूछो - कितनी दूर और चलना है ?  तो पिछले चार-पांच किलोमीटर से हमें एक ही जवाब मिल रहा था।  बस ज्यादा नहीं एक-दो किलोमीटर ! तो वापिसी कर रहे श्रद्धालु जाने वालों का मनोबल नहीं तोडना चाहते।  हम भी एक-दो किलोमीटर की आस में जब एक-दो किलोमीटर आगे बढ़ते और पूछते तो वही ढाक के तीन पात ! 
                        खैर अब सचमुच बाबा के नजदीक पहुँच गए , क्योंकि अब  दुकानें  ज्यादा मात्रा में दिखने लगी थी।  लोग भी भीड़ के रूप में दिखने लगे थे।  बोल बम का नारा गूंज रहा था।  लेकिन दुकानों तक पहुंचने  दुर्गावती नदी फिर रास्ता रोके बह रही थी , ये नदी तीन चार बार रास्ते  में मिली।  हालाँकि यहां ज्यादा गहरी नहीं थी , तो हमने भी दूसरो  की देखादेखी में पैदल ही नदी पार  की।  नदी के ठन्डे पानी से थकान  भरे पैरों  को बड़ा आराम मिला।  कई लोग यही स्नान कर रहे थे , और यही से जल भर रहे थे।  तो कुछ लोग जंगल के दूसरी तरफ प्लास्टिक के लौटे लेकर जा रहे थे।  एक दुकान पर पूछने पर पता चला।  कि  लोग शीतल कुंड से जल भरकर ला रहे है, और वही स्नान भी कर रहे है।  शीतलकुण्ड की दुरी 100 मीटर जंगल के अंदर बताई।  पर  हम  हिम्मत हार चुके थे।  फिर सोचा जब यहां तक  चुके है, तो 100 मीटर और चल लेते है।  
                                                                               एक दुकान से प्लास्टिक के छोटे छोटे लोटे ख़रीदे ताकि जल भरकर बाबा को चढ़ाया जा सके।  अब मन से चल पड़े क्यूंकि तन तो थक चुका था।  शीतलकुण्ड के नाम से ऐसा लग रहा था , कि  कोई कुंड या पोखर होगा , जिसे शीतलकुण्ड कहा जाता है।  लेकिन वहां पहुंचकर नए नज़ारे देखने मिले।  सामने ऊँचे पहाड़ से दो झरने से पानी रहा था।  नजारा देखकर सारी थकान उड़न छू हो गयी।  पैरों में पंख लग गए।   पहले जहाँ 100 मीटर लम्बी दूरी लग रही अब  दूरी ख़त्म हो गयी।  वास्तव में इस नज़ारे की हमें उम्मीद  ही नहीं थी  ये  हमारे लिए बोनस पॉइंट था  संजय जी  हमे शीतलकुण्ड का जिक्र कर रहे , पर हमारे दिमाग में कुंड ही था , झरना नहीं।  अब हम सब तैयार हो गए जल प्रपात स्नान के लिए।  हमने दो बार में तीन-तीन लोग करके स्नान किया।  तीन लोग स्नान करते बाकी तीन लोग सामान की रखवाली करते हुए फोटो खींच रहे थे।  ऐसी जगहों पर सामान का सुरक्षा करना जरुरी होती , वरना सावधानी हटी और दुर्घटना घटी।  अब जहाँ भारी मन से आये थे , वहां से मन भर ही नहीं रहा था।  हम लोग लगभग डेढ़ घंटे नहाये।  फिर जल लेकर चल पड़े बाबा की गुफा ऒर...  अब थकान गायब हो चुकी थी।
                                                अस्थायी दुकानों से होते हुए हम बाबा गुप्तेश्वरनाथ की रहस्यमयी  गुफा की बढ़ चले।  बाबा गुप्तेश्वर नाथ की गुफा के पहले बाहर एक चबूतरा बनाकर मंदिर जैसा नया  निर्माण किया गया है।  उसके बाद अंदर पूरी गुफा प्राकृतिक है।  गुफा के अंदर जनरेटर के माध्यम से बल्ब जलाकर रौशनी की व्यवस्था की जाती है।  अंदर जाने पर ऑक्सीजन की कमी होने लगती है , इसलिए आपातकालीन व्यवस्था के लिए ऑक्सीजन सिलिंडर की भी व्यवस्था भी की गयी है।  हम लोग भी गुफा के अंदर बाबा का जयकारा लगाकर प्रवेश कर गए।  अंदर  जगह की कमी थी , और बल्ब जलने के कारण  गर्मी भी लग रही थी।  जैसे जैसे गुफा के अंदर जा रहे थे , वैसे ही दम घूंट सा रहा था।  इससे पता चलता है, ऑक्सीजन वाकई में कम हो रही थी।  सबकी साँस अपने आप ही तेज चलने लगी थी।  खैर हम अंदर बाबा गुप्तेश्वरनाथ के समीप पहुँच ही गए।  वहां बाबा का प्राकृतिक शिवलिंग था।  इसका आकार सामान्य शिवलिंग जैसे नहीं था।  शिवलिंग के पास एक दाढ़ी वाले साधु बाबा भी बैठे थे।  आश्चर्य इस बात का कि  सामान्य व्यक्तियों का जहाँ थोड़ी देर में ही दम घुंटने लगा , वहां ये साधु बाबा इतनी देर से कैसे बैठे होंगे ? खैर लोग दम घुटने के कारन जल्दी ही प्लास्टिक वाले लौटे सहित जल चढाकर वापिस लौट रहे थे  शिवलिंग के आसपास बहुत से प्लास्टिक के लौटे पड़े हुए थे।  ये देखकर मुझे बड़ा बुरा लगा।  एक तरफ हम ईश्वर के दर्शन के लिए इतने कष्ट सहनकर यहां तक आये और दूसरी तरफ ईश्वर  के पास उन गन्दगी कर रहे है।  कितनी ओछी मानसिकता है ? हम भी बाबा को जल चढ़ाकर लौटे और साथ अपने प्लास्टिक के लौटे भी वापिस लाये। बाहर वो लौटे दुकानदार को वापिस कर दिए। 
                                                                                 अब दर्शन करने के बाद भोजन की इच्छा जोर मार रही थी।  तो एक अच्छी सी दुकान देखकर डेरा जमाया।  यहां पूड़ी तौलकर मिल रही थी।  अतः हम लोगों ने डेढ़ किलोग्राम पूड़ी और सब्जी के साथ जलेबी का भी आर्डर दिया।  भरपेट भोजन के बाद कुछ देर आराम किया और निकल पड़े वापिसी के लिए।  लौटना भी उसी रस्ते से था, जिससे गए थे।  हाँ ईश्वर ने इतना साथ दिया कि  बारिश होती रही तो ठन्डे ठन्डे मौसम में भीगते हुए वापिस लौटे।  बीच बीच में जब धुप निकल आती थी , तो पसीने में भीग जाते थे।  आखिरी उतराई उतरते समय पैर  कांपने लगे थे , लगा कि कहीं लड़खड़ाकर गिर न जाऊ , मगर बाबा की कृपा से सभी लोग सुरक्षित पनारी पहुँच गए।  इस तरह अपने ही गृह राज्य में इतनी शानदार घुमक्क्ड़ी कभी नहीं की थी।  इसके लिए विशेष धन्यवाद के पात्र संजय कुमार सिंह जी है।  हम लोगो को दोनों ओर (पनारी-गुप्तेश्वर धाम-पनारी ) से आने-जाने में कुल समय 12 घंटे लगे।  हालाँकि संजय जी हमेशा इससे दोगुने समय में गए , मगर इस बार तेज चलने वालों के साथ फंस गए थे।  इस यात्रा में सबसे ज्यादा हालत हम दोनों की ही ख़राब थी , क्योंकि चलने की आदत ख़त्म जो  हो  गयी है ।  
गुप्तेश्वर धाम कब जाया जा सकता है -  सिर्फ साल में दो बार महाशिवरात्रि (फ़रवरी में ) के समय और सावन                                      (जुलाई-अगस्त )के पूरे  महीने में ही जाया जा सकता है।  बाकि समय यात्रा बंद रहती है।  
कैसे जाये -  
                 वायु मार्ग - नजदीकी हवाई अड्डे पटना और वाराणसी है।  
               रेल मार्ग -सासाराम मुगलसराय -गया रेल लाइन में एक जंक्शन है।  जहाँ से दिल्ली - हावड़ा रूट की                  गाड़िया गुजरती है।  
             सड़क मार्ग - सासाराम राष्ट्रिय राजमार्ग क्रमांक 2 ( जीटी रोड ) पर स्थित है।  सासाराम से आप टेम्पो ,                   शेयरिंग टैक्सी करके 40 किमी  दूर पनारी तक जा सकते है।  वहां से पैदल ट्रैक करके जान पड़ेगा।  
क्यों जाये ? -  यदि  आपको धार्मिक, प्राकृतिक , साहसिक यात्राओं में थोड़ी भी रूचि है , तो आपको गुप्तेश्वर                          धाम अवश्य जाना चाहिए।  
शीतलकुण्ड जल प्रपात का आनंद 

गुफा का प्रवेश द्वार 

जलप्रपात का एक मनमोहक नजारा 
दूर से दीखता जल प्रपात 

बाबा के भक्त बोल बम के नारे के साथ 
गुफा के अंदर का दृश्य 

गुफा के अंदर 

बाबा गुप्तेश्वर नाथ का प्राकृतिक शिवलिंग 




पार्किंग का एक दृश्य
आपातकालीन व्यवस्था के तहत ऑक्सीजन सिलिंडर भी रखे थे।  

गुफा में प्रवेश करने के पहले 
वापिसी भी आसान न थी 

बाबा का आशीर्वाद और ऐसे दृश्यों के लिए जो कष्ट सही वो कम थे। 
 कुछ फोटोग्राफ हमारे मित्र अभ्यानंद सिन्हा जी ने अपने मित्र वीरेंद्र कुमार जी से लेकर इस पोस्ट के लिए दिए ,  उनका हार्दिक धन्यवाद।  बाबा गुप्तेश्वर नाथ सब कृपा करे।

रविवार, 11 सितंबर 2016

जब नक्सली क्षेत्र में बम बने हम (गुप्तेश्वर नाथ धाम यात्रा भाग -1)

व्हाट्स एप ग्रुप " घुमक्कड़ी दिल से "  में पटियाला वासी श्री सुशिल कुमार जी ने एक नई श्रृंखला प्रारम्भ की " छुपा हीरा ( Hidden places)" इसी श्रृंखला में बिहार के आरा (भोजपुर जिला ) के रहने वाले श्री संजय कुमार सिंह जी ने सासाराम के पास गुप्तेश्वर नाथ धाम जिसे स्थानीय लोग "गुप्ता बाबा " के नाम से जानते है , का परिचय ग्रुप में कराया । अब चूँकि मैं भी बिहार के बक्सर जिले का मूल निवासी हूँ, और आरा और सासाराम हमारे पडोसी जिले है , तो मैंने संजय जी से गुप्ता धाम चलने की चरचा की , तो उन्होंने बताया कि वहां यात्रा सिर्फ सावन और फागुन के महीनों में ही होती है । मेरी तो बांछे खिल गयी (शरीर में जहाँ भी होती हो ) , क्योंकि 16 जुलाई 2016 को मेरे पुत्र की मूल पूजा (सताईसा) करने मुझे घर आना ही था । खैर 20 जुलाई से सावन का महीना शुरू हो रहा था । व्हाट्स एप्प पर ही संजय जी से चर्चा हुई और 22 जुलाई को सासाराम में मिलने का तय हुआ । 11 जुलाई को मैं सपरिवार ओरछा से अपनी कार से  बक्सर अपने घर आया । 16 जुलाई को बारिश के बीच सताईसा का कार्यक्रम संपन्न हुआ । अभी तक घर में मैंने गुप्ता धाम जाने की चर्चा नही की थी । गांव के कुछ घुमक्कडों से जरूर गुप्ता धाम के बारे पूछा । जब  घर पर चर्चा की तो कोहराम मच गया । गुप्ता धाम ही नही सासाराम जिला नक्सली क्षेत्र के रूप में बदनाम है । और गुप्ता धाम में तो प्रशासन है ही नही । सारी व्यवस्थाएं नक्सली ही सँभालते है । पूरा क्षेत्र घने जंगलों वाला पहाड़ी इलाका है । बरसात में तो और रास्ते बंद हो जाते है , जगह-जगह बरसाती नदियां और झरने बहते है । घर की इंवेस्टिगेशन में जब पूछा गया कि वहां के बारे में किसने बताया । तो संजय जी के बारे में बताया गया , अब और आफत कि एक अनजान आदमी जिससे कभी मिले नही , उसके कहने पर नक्सली क्षेत्र में जाने तैयार हो गए ! अब मैं किंकर्तव्यविमूढ़ कि जाना तो है, लेकिन कैसे ?
इसी बीच संजय जी से मोबाइल पर चर्चा हुई , तो उन्होंने बताया कि वो 22 जुलाई की रात सासाराम मिलेंगे , पहले बाइक से चलने का कार्यक्रम था , मगर हो रही बारिश के कारण मैंने अपनी कार से जाने का फैसला किया । घरवालों को बताया कि बस सासाराम घूम के लौट आऊंगा । जब कार से चलने का फैसला हो गया तो साथ चलने के लिए मेरा सबसे छोटा भाई अभिषेक (मोनू), मेरा ड्राइवर टिंकू भी तैयार हो गए ।  22 जुलाई को अंत में मेरे चाचा जी जो स्वास्थ्य कारणों से इस बार देवघर कांवर यात्रा में नही जा पाए , वो भी तैयार हो गए । खैर घर से कार में मैं, ड्राइवर टिंकू और चाचा जी निकल पड़े । सोनपुर में पदस्थ मोनू ट्रैन से आ रहे था, जिसे हमने डुमरांव रेलवे स्टेशन से साथ लिया । अब कार में चार लोग हो गए , सासाराम में संजय जी के मिलने पर कार फुल हो जानी थी । डुमरांव से हम लोग विक्रमगंज के रास्ते सासाराम की ओर बढ़ रहे थे । बक्सर जिले की सीमा पार करते ही जब हम रोहतास (सासाराम) जिले की सीमा में प्रवेश किये , तो सड़क के दोनों तरफ सिर्फ पानी ही पानी नज़र आ रहा था । खेत, घर सब पानी -पानी हुए जा रहे थे । कुछ खेतों में महिलाएं  धान रोप रही थी । रोहतास जिले को बिहार का धान का कटोरा कहते है । इस क्षेत्र में चावल बहुतायत में होता है , रास्ते में हर थोड़ी दूरी पर मिलती राइस मिलों ने पुख्ता किया । सासाराम मेरी घुमक्कड़ यात्रा में बहुत पहले से था , क्योंकि एक तो यह मेरे घर से नजदीक था , दूसरा इतिहास का विद्यार्थी होने के कारण मध्य कालीन इतिहास के सर्वश्रेष्ठ व्यक्तित्व शेरशाह सूरी की कर्मस्थली का अलग ही आकर्षण था ।  मेरी इच्छा आज पूरी होने वाली थी । अब चूँकि संजय जी अपना ऑफिस का कार्य पूरा करने के बाद रात्रि 9-10 बजे आने वाले थे, तो हम लोगो के पास सासाराम और आसपास घूमने के लिए पूरा दिन था । सबसे पहले हमने सासाराम की शान शेरशाह सूरी के मकबरे की ओर रुख किया । मोबाइल पर गूगल मैप की सहायता से हम शेरशाह के भव्य मकबरे पर पहुँचे ।

मेरे गांव में हर साल देवघर जाने वाले कांवरियां 
सड़क के किनारे धान के खेत में रोपणी करती हुई महिलायें

शेरशाह सूरी इतिहास में मेरे प्रिय पात्रों में से एक रहा है । उसका जीवन प्रेरणादायी रहा है । अपनी तलवार के एक वार से शेर के दो टुकड़े करने वाला बाबर की सेना का एक अदना सा सैनिक बहुत जल्दी ही हुमांयू को बुरी तरह हराकर हिंदुस्तान का शहंशाह बन जाता है । लेकिन मुझे शेरशाह इस वजह से पसंद नही है । बल्कि उसके अपने पांच वर्ष (1540-1545 ई0) के छोटे से कार्यकाल में जो कार्य किये वो अतुलनीय है ।उस ज़माने में कोलकाता से उत्तर भारत के सभी महत्वपूर्ण शहरों जैसे धनबाद, गया, सासाराम, ग़ाज़ीपुर, वाराणसी, इलाहबाद, कानपूर, आगरा, मथुरा, दिल्ली, अमृतसर, लाहौर से होकर पेशावर तक पक्की सड़क बनवाई । आज हम जिसे ग्रैंड ट्रंक रोड या जीटी रोड (NH No. 2) के नाम से जानते है । इस सड़क के दोनों तरफ छायादार और फलदार वृक्ष लगवाये , यात्रियों के रुकने के लिए सराय, कुंऐं आदि की व्यवस्था की । हमारी भारतीय करेंसी रुपया भी शेरशाह की देन है । भूमि की पैमाइश भी शेरशाह ने टोडरमल (जो बाद में अकबर के नवरत्नों में शामिल हुए ) से करवाई । इतिहासकार तो यहाँ तक लिखते है, कि अगर शेरशाह न होता तो अकबर भी महान न होता । क्योंकि अकबर शेरशाह की अधिकांश योजनाओं को आगे बढाकर प्रसिद्धि हासिल की । तो ऐसे महान शासक का मकबरा जो न केवल अपने गृहराज्य में बल्कि गृह जिले के पास हो देखना बनता है । अब इतिहास से वापिस वर्तमान में लौटते है । गूगल मैप के भरोसे हम मकबरे के चक्कर लगाते रहे , अंततः एक स्थानीय व्यक्ति से पूछकर प्रवेश द्वार पर पहुंचे ।टिकट काउंटर लिखी जगह पर पहुँचे तो वहां ताला लगा हुआ था । फिर पार्किंग वाले ने बताया कि गेट के पास बने काउंटर से टिकट मिलेगा । टिकट लेकर स्मारक के अंदर दाखिल हुए । शेरशाह का मकबरा भारत के सुन्दर मकबरों में से एक है । मकबरे के चारो तरफ एक बड़ा तालाब बना है , जिसके किनारों पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI)  ने सुन्दर बगीचा विकसित किया है ।
शेरशाह ने अपने मकबरे का निर्माण कार्य स्वयं ही शुरू किया था, लेकिन 1545 में कालिंजर के किले को जीतने के प्रयास में बारुदखाने में आग लग जाने के कारण असमय ही मृत्यु हो जाने के कारण शेरशाह के पुत्र सलीम सूरी ने इसे पूरा करवाया था ।ये मकबरा भारत में अफगानी स्थापत्य का सर्वश्रेष्ठ नमूना है । एक तरफ ये भव्य है, तो दूसरी तरफ ये सादगी से भी परिपूर्ण है । तालाब के बीचो बीच बना इस  मकबरे में मध्य में एक बड़ा गुम्बद है, जिसके कोनों पर अष्टकोणीय शैली में अन्य छोटे गुम्बद बने है । पूरा मकबरा मूलतः ईटों से निर्मित है, जिस पर बाद में लाल पत्थरों को लगाया गया है । मुख्य गुम्बद के नीचे भीतर शेरशाह सूरी और उनके खास दरबारियो की कब्रें है । अंदर जूते-चप्पल पहनकर जाना मना है । जब अंदर घुसे तो बाहर की जालियों से रौशनी छनकर कब्रों के ऊपर आ रही थी । मानों  सूरज भी हिंदुस्तान की तारीख में दफन हो चुके अजीम सुल्तान का इस्तकबाल कर रहा हो । मैं भी कुछ देर तक उन कब्रों के बीच खड़ा फक्र महसूस कर रहा था । अंदर फ़ोटो खींचना मना था । फिर आँख बचाकर एक दो फ़ोटो खींच ही ली । मकबरे की दीवारों पर फ़ारसी या अरबी में कुरान की आयते लिखी थी । बाहर कुछ नवयुगल इतिहास से अनजान अपने वर्तमान में मगन थे । धूप बहुत ही तेज थी । लेकिन मकबरे से तालाब के दूसरी तरफ की हरियाली आँखों को सुकून दे रही थी । खैर कुछ देर और घूमने के बाद फ़ोटो खींच कर हम मकबरे की सीमा से बाहर निकल पड़े । अब हमारा अगला लक्ष्य सासाराम में ही स्थित ताराचण्डी देवी मंदिर था । अपनी कार हमने मकबरे के पीछे वाले रस्ते पर मोड़ ली ...क्रमशः जारी


टिकट कॉउंटर जहाँ टिकट नही मिलता 

प्रवेश द्वार 

प्रवेश करते ही दिखाई देता भव्य मकबरा 

हमारी घुमक्कड़ फैमिली 


orchha gatha

बेतवा की जुबानी : ओरछा की कहानी (भाग-1)

एक रात को मैं मध्य प्रदेश की गंगा कही जाने वाली पावन नदी बेतवा के तट पर ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा हुआ. बेतवा की लहरों के एक तरफ महान ब...