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गुरुवार, 9 मई 2019

गंगा जी कहिन : अहिल्या का उद्धार (बक्सर गाथा -2)



अहिरौली गंगा घाट (बक्सर , बिहार ) चित्र प्रतीकात्मक है।  
इस श्रृंखला की पहली पोस्ट में आपने पढ़ा, कैसे मेरे और मां गंगा के बीच संवाद शुरु हुआ और मैंने उनसे कैसे बक्सर का प्रारंभिक इतिहास जाना । परंतु मेरा प्रश्न अनुत्तरित रह गया था , कि भगवान राम ने कैसे अहिल्या का उद्धार किया ?  
चूँकि मैं जीवन यापन के लिए मां गंगा से सैकड़ों किलोमीटर दूर बेतवा किनारे ओरछा में रहता हूं और साल में एक या दो बार ही आना हो पाता है, इसलिए मां गंगा से  मुलाकात अधूरी रही और महीनों तक यह प्रश्न मेरे मन में भ्रमण करता रहा, कि आखिर भगवान श्री राम अपने गुरु विश्वामित्र के साथ जब गौतम ऋषि के आश्रम पहुंचे होंगे तो वह दृश्य कैसा होगा और उस स्त्री को जिसको उसके स्वयं तपस्वी पति ने छोड़ दिया हो ,आखिर भगवान ने कैसे उस पर अपनी करुणा दिखाई होगी ?
 मां गंगा की कृपा बहुत जल्दी मुझ पर हुई और उन्होंने अपने तट पर मुझे जल्दी ही बुला लिया और इस बार मैं फिर हाजिर था।  अपने उन्हीं प्रश्नों या जिज्ञासाओं के उत्तर को पाने के लिए और मां गंगा के बक्सर स्थित उसी रामरेखा घाट पर मैं पहुंचा जहां कभी भगवान श्री राम अपने अनुज लक्ष्मण और गुरु विश्वामित्र के साथ स्नान करते थे। मैं मां गंगा के आंचल के  एक छोर पर प्रतीक्षारत बैठा था , कि कब मां गंगा अपनी कृपा मुझ पर बरसा दे  ! और महीनों से अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर मुझे मिले।  मां गंगा की कृपा मुझ पर हुई और गंगा की अविरल धारा से आवाज आई-  हे पुत्र ! आखिर तुम्हें आना ही पड़ा !  मैं हाथ जोड़कर नतमस्तक खड़ा था और मैंने कहा कि क्या ऐसा हो सकता है कि आप बुलाएं और आपका यह अनुग्रहित पुत्र आए ना ।
इसके पश्चात मैंने मां गंगा से अपना वही पुराना प्रश्न दोहराया कि आज मां बताइए पाषाण बनी अहिल्या से कैसे मिले प्रभु राम ? 
कुछ देर की शांति  के पश्चात गंगा की लहरें  शांत हुई और कुछ देर के बाद मां गंगा  बोली - मैं  त्रेता युग में पहुंच गई थी  और मुझसे बोली - पुत्र मुझे अच्छे से याद है, वह दिन जब ऋषि गौतम और उनकी पत्नी की  कथा महर्षि विश्वामित्र ने राम को सुनाई और राम ने अहिल्या के लांछन और अपमान की कथा सुनकर अपने गुरुदेव से कहा - कि मैं उस देवी के दर्शन करना चाहूंगा गुरुदेव !  गुरुदेव ने कुछ कहा नहीं केवल गर्व से देखा था राम की ओर और राम के निकट पहुंच कर उनके कंधे पर हाथ रख कर दूर आकाश की ओर निहारा और अपने शिष्य के मुख से उस तिरस्कृत और लोक निर्वासित महिला के लिए देवी का संबोधन सुन बोले कि आज तुम में मैं अपना आप में मेरा विस्तार देख रहा हूं।   कुछ क्षण  तक महर्षि विश्वामित्र आत्म मुग्ध से खड़े रहे और राम की ओर देखते हुए बोले उसे भी तुम्हारी ही प्रतीक्षा है।  राम ! अपमान और उपेक्षा ने उसकी चेतना को लगभग नष्ट कर दिया है, मनुष्यों की छाया से भी वह डरती है , किसी को दूर से ही देख कर छिपने या भागने का प्रयत्न करती है ,डरती है,  न जाने क्या अपशब्द सुनने पड़े ! चेतना का केवल यही प्रमाण शेष रह गया है।  समाज  उसे दूषित करने वालों की लोग पूजा करता है।   ! पुरुष जो ठहरे शक्तिशाली जो ठहरे वे छल कर सकते हैं ! लूट सकते हैं !दूसरों को अपमानित कर सकते हैं ! और जिन्हें चलते लूटते और अपमानित करते हैं, उन्हीं को इन सब के लिए दोषी भी सिद्ध कर सकते हैं।  आश्चर्य है !  जो सिरजता है, गढ़़ता है लोक  को जीवन और अवलंबन देता है, वही सबसे अधिक अपमानित भी होता है वह धरती हो,स्त्री हो या नदी  हो सबकी एक नियति है । महर्षि विश्वामित्र और उनके दोनों होनहार शिष्य धीरे धीरे मेरे किनारे ही उस स्थान पर पहुंचे जहां पर अहिल्या जीवित होते हुए भी पाषाण की तरह शापित थी।  राम ने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए थे और दूर किसी स्त्री की छाया दिख रही थी, वह हाथ जोड़े उसी दिशा में चलते रहे लक्ष्मण भी उनका अनुगमन करके उनके साथ उसी तरह चल रहे थे, संभवत उन्हें भी लगा था कि वह व्यक्ति अन्य लोगों से भिन्न है ,  वह ना तो अपने स्थान से हिली थी और ना भागी थी।  संभव है उसे आंखों से कुछ दिख ही  ना रहा हो या संभव है कि उसमें हिलने की शक्ति ही ना रह गई हो ! नहीं ! वह शायद इधर देख ही नहीं पा रही थी,  मौन बैठी थी।  किसी सोच में डूबी थी। उसके निकट पहुंचकर राम उसके चरणों में लेट गए थे और बोली आपने बहुत दुख झेला है मां ! मैं समस्त पुरुष जाति की ओर से आपसे क्षमा मांगने आया हूं ! हे देवी मैं आपको अपमानित करने वाली उस दम्भी पुरुष जाति का प्रतिनिधि आपसे दंड मांगने आया हूं ।
उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था।   यदि राम के शब्द उसके कानों में पड़ भी रहे थे, तो उनका अर्थ शायद उसकी समझ में नहीं आ रहा था ! वह जड़ सी एकटक राम को देखी जा रही थी ! नहीं,  उसके कानों में कोई ध्वनि आवश्यक टकराई थी उसने बोलने का प्रयत्न किया था,  होठ हिले थे, पर शब्द बाहर नहीं आ पा रहे थे।   कोई मरणासन्न व्यक्ति जैसे कुछ कहने का प्रयत्न करें और उसकी आवाज एक अस्पष्ट फुसफूसाहट बनकर रह जाए और बहुत ध्यान देने पर कुछ समझ में आए वैसे ही उसने कहा था - मैं लंछिता हूँ !  पतिता हूं !  उसने राम के सिर को अपनी दुर्बल अंगुलियों से कुछ इस तरह छुआ था, जैसे उठाने का प्रयत्न कर रही हो !
                                               और फिर वही शब्द 'पतिता  ' .. आप पतित नहीं हो सकती मां , जो पतित होते हैं,  वह अपने जघन्य कृत्य पर भी अपने को पतित नहीं कहते।  वह अपने पापों  को लेकर गर्व करते हैं , उनकी चेतना अहंकार से इतनी मलिन हो चुकी होती है , कि वे अपने पातकों को समझ ही नहीं पाते।  जिनमें पतित होने का बोध है,  जो उन अहंकारियों द्वारा पातिकी कहीं जाते हैं।  वे या तो अज्ञान अपज्ञान या व्यवस्था के कारण उनके ही पापों और पातकों का बोझ धोने को बाध्य कर दिए जाते हैं । राम ने प्रतिवाद करते हुए कहा था ।
                                             अहिल्या की समझ में कुछ नहीं आ रहा था।   वह केवल आश्चर्य से राम को निहार रही थी राम ने कुछ स्पष्ट स्वर में एक एक शब्द पर रुकते हुए और एक एक शब्द का स्पष्ट उच्चारण करते हुए फिर कहा  " तुम पतित नहीं हो मां तुमने दूसरों के पातक का प्रक्षालन अपनी पीड़ा और यात्रा से किया है । जैसे मां अपनी गोद के बच्चों की मल का प्रक्षालन करती है । हाँ मां, अपने समस्त अहंकार के बावजूद पुरुष जाति स्त्री के सम्मुख एक शिशु ही बना रह जाता है अपनी धात्री और पोषिका को ही दूषित और मलिन करके किलकारियां भरने वाले शिशु से अधिक क्या है वह "
तुम्हारी बातें मेरी समझ में नहीं आती अहिल्या ने दुर्बल और कांपते हुए स्वर में कहा था।  उसकी समझ में कुछ तो आ ही रहा था,  अन्यथा वाणी में यह परिवर्तन कहां से आता । उसके नकार में भी आत्मविश्वास कहां से लौटता ।  ' कुछ समझ में नहीं आता बेटा" बेटा शब्द का उच्चारण उसने इतने विलगित होकर किया था ,कि अपना संयम ना खोने वाले राम की भी आंखें भर आई थी ।
आततायी  होते हैं मां ,जो दूसरों को कुचलकर अकेले ऊपर उठना चाहते हैं ,सिर तान कर शिखर बनना चाहते हैं।  मैंने शिखरों को भूचाल तो दूर मात्र मेह से खिसकते और लुढकते देखा है । पर्वतों को अपने अहंकार के दरबार से बिना किसी बाहरी ठोकर या आघात के चूर चूर होते देखा है । लेकिन मैंने धरती को द्रवित होकर बहते तो देखा है, पर पतित होते नहीं देखा । स्त्री तो जननी होती है ! वह तो धरती होती है !  मां वह पतित नहीं हो सकती !  पतितो को भी वही संभालती है और वहीं संभाल सकती है । यदि वह पतित होगी तो उसे कौन संभालेगा । राम ने अपने संयत पर कोमल स्वर में कहा था । उस समय वृद्धा के मुख पर हो रहे भाव परिवर्तन को देखकर आश्चर्य हो रहा था उसमें एक ऐसी प्राणशक्ति आ गई थी मानो कोई सूखी लता वर्षा की झड़ी से एक ही क्षण में हरी हो गई हो ।

तुम कौन हो ? कौन हो तुम ? उसने अपने आंतरिक आह्लाद को दबाते हुए भर आई सी आवाज में कहा था । " तुम मनुष्य नहीं हो सकते " नहीं तुम मनुष्य नहीं हो सकते , तुम भगवान हो । तुम पतित पावन भगवान हो , पतितों को भी पवित्र मानने वाले, उपेक्षित और वंचितों को उनका लूटा हुआ सौभाग्य और गौरव दिलाने वाले अवतार हो तुम " वह बढ़कर राम के चरणों में लिपट गई और फूट-फूट कर रोने लगी थी राम बार-बार उठो मां ! उठो देवी !  कहकर बुला रहे थे ! 

मां गंगा की लहरें शांत हो चली थी , इधर मेरा मन अशांत हो चला था , आँखों से अविरल धारा बह रही थी  ......
( क्रमशः अगले भाग में जारी )
चित्रकला - अलका दास 


बुधवार, 7 मार्च 2018

सांची : पत्थरों पर लिखा अध्यात्म

मेरी पिछली पोस्ट में आप बोधगया ,राजगीर और नालंदा जैसे बौद्ध स्थलों की मेरी यात्रा को पढ़ चुके हैं और जो इन पोस्टों को पढ़ने से चूक गए हैं वह दी गई लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं । बौद्ध स्थानों की श्रंखला को आगे बढ़ाते हुए आज हम सांची के बौद्ध स्तूपों की यात्रा पर चलेंगे ।

                                                              मध्य प्रदेश माध्यमिक शिक्षा मंडल से शिक्षा प्राप्त मैंने बचपन से किताबों में सांची के बारे में खूब पढ़ा और उसके चित्र बचपन से ही आकर्षित करते आ रहे हैं। परंतु कई बार भोपाल जाने के बावजूद भी सांची के संयोग नहीं बन पा रहे थे । 20 सितंबर 2017 को पासपोर्ट बनवाने के लिए भोपाल जाना था तो इस बार ठान लिया था कि भोपाल से लौटते हुए सांची जरूर जाऊंगा । मैं ओरछा से अपनी कार से सड़क मार्ग से भोपाल के लिए निकला । भोपाल पहुंच कर पासपोर्ट ऑफिस में पासपोर्ट संबंधी औपचारिकताएं निभाने के पश्चात वापस लौटा । और बहुप्रतीक्षित मेरी सांची यात्रा शुरू हुई । साँची वैसे तो रायसेन जिले में आता है परंतु विदिशा जिले के मुख्यालय से इसकी दूरी मात्र 10 किलोमीटर है जबकि भोपाल से 40 किलोमीटर पूर्वोत्तर दिशा में स्थित है । दिल्ली से भोपाल रेल मार्ग के मध्य यह विदिशा के बाद एक रेलवे स्टेशन साँची भी है । और सड़क मार्ग से भी अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है । अब हम दिन ढलने के कुछ देर पहले ही सांची पहुंचे । सड़क से ही पहाड़ियों के ऊपर स्तूप नजर आ रहे थे । और हमने अपनी कार पहाड़ी के ऊपर बनी स्तूपों वाली मार्ग पर मोड़ दी, परंतु कुछ दूर चलने चलने के बाद पता चला कि टिकट घर तो नीचे ही है ।  वापस लौटे और टिकट लिया ।  पुनः पहाड़ी के शीर्ष की ओर चल दिए । 
            सांची के स्तूपों को देखने से पूर्व मैं सांची के इतिहास के बारे में थोड़ा सा चर्चा करना चाहूंगा । सांची के स्तूप एक बौद्ध स्मारक हैं, जिनका निर्माण काल तीसरी शताब्दी ईसापूर्व से बारहवीं शताब्दी के बीच माना जाता है । सबसे पहले महान सम्राट अशोक ने सांची स्तूपों का निर्माण तीसरी शताब्दी ईसापूर्व में कराया । और सांची स्तूप मौर्यकालीन कला के सबसे सुंदर उदाहरणों में से एक है । सांची स्तूप को सम्राट अशोक ने गौतम बुद्ध और बौद्ध धर्म के संदेशों को पूरे विश्व में प्रसारित करने कि एक सुनियोजित योजना के तहत स्थापित किया । सम्राट अशोक ने पुराने  स्तूपों को खुदवाकर उनसे मिले गौतम बुद्ध और उनके प्रिय शिष्य के अवशेषों को 84000 भागों में बांट कर अपने साम्राज्य साहित्य निकटवर्ती देशों में भेजकर बड़ी संख्या में स्तूपों का निर्माण करवाया । इसके अलावा मिट्टी और ईटों से बने स्तूपों को स्थाई रूप देने के लिए उन्हें पत्थरों से निर्मित कराया और मौर्यकालीन सुंदर शिल्प कला से सुसज्जित किया । सांची को प्राचीन काल में कांकेन्वा, ककन्या और ककनादबोट आदि नामों से जाना जाता रहा है । सम्राट अशोक की एक पत्नी श्रीदेवी विदिशा की ही रहने वाली थी और हो सकता है कभी वह अपनी ससुराल विदिशा आए हो और सांची कि यह पहाड़ियां उन्हें आकर्षित की होंगी इसलिए उन्होंने इस क्रम में स्थान को स्तूप बनाने के लिए चुना होगा ।
                                                   सांची का स्तूप बौद्ध शिक्षा के प्रमुख केंद्रों के रूप में विकसित हो चुका था चीनी यात्री व्हेनसॉन्ग के यात्रा वृतांतों में भी सांची का उल्लेख मिलता है । दूसरे चीनी यात्री फाहियान ने तो साँची  और उसके आसपास के क्षेत्र जिसे मालवा के नाम से जाना जाता है यहां की जलवायु को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ जलवायु कहा । गुप्त काल में विदिशा या भेलसा नगरी का महत्व अत्यधिक बढ़ गया था तो जाहिर सी बात है साँची इससे अछूता कैसे रह पाता। गुप्त काल में गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम के शासनकाल का एक शिलालेख सांची से भी मिला है । जिसके अनुसार बौद्ध उपासक संसद की पत्नी उपासिका हरी स्वामिनी द्वारा काकना दबोट यानी वर्तमान सांची में स्थित आर्य संघ के नाम कुछ मात्रा में धन दान में दिए जाने का उल्लेख है । सांची का महत्व राजपूत काल तक बना रहा परंतु मुस्लिम आक्रमण के पश्चात सांची की प्रतिष्ठा धूमिल हो गई और वह पहाड़ियों के बीच घनी झाड़ियों और पेड़ों में छुप गया । पूरे मध्य काल तक सांची गुमनामी में गुम हो चुका था ।    फिर 19वीं सदी में एक अंग्रेज अधिकारी कर्नल टेलर जब इस तरफ से गुजरे तो उन्हें सांची के स्तूप जर्जर अवस्था में मिले । कर्नल टेबल द्वारा स्तूपों का उत्खनन करवाया गया और इन्हें व्यवस्थित कर कर इनका जीर्णोद्धार किया । स्थानीय लोग बताते हैं कि कर्नल टेलर ने इसके अंदर धन संपदा होने की आशा में इसकी खुदाई करवाई जिससे इस संरचना को काफी नुकसान हुआ बाद में पुरातत्वविद् मार्शल ने इसका जीर्णोद्धार कराया ।
                                  अब इतिहास से वर्तमान की ओर आते हैं हम जब सांची के स्तूपों को देखने पहाड़ियों के ऊपर पहुंचे तो यह स्तूप देर देखने में भले ही मामूली अर्ध गोलाकार संरचनाएं प्रतीत होते हैं लेकिन निकट जाने पर इनकी भव्यता विशिष्टता और बारीकियों को देखकर लोग आश्चर्यचकित हो जाते हैं । सांची के स्तूप के पत्थरों पर की गई विशिष्ट कारीगरी न केवल देसी बल्कि विदेशी पर्यटकों को भी आकर्षित करती है ।  स्तूपों के चारों और सुंदर परिक्रमा पथ बने हुए हैं और सेंड स्टोन के बने चार तोरण द्वार चारों दिशाओं में निर्मित है जिन पर भगवान बुद्ध के जीवन से संबंधित विशेषकर जातक कथाओं में वर्णित कथाओं का अद्भुत शिल्प अंकन किया गया है । मानव जीवन के विभिन्न रूपों के अलावा पशु पक्षी और पेड़-पौधों का जीवंत चित्रण अद्भुत है । सांची के स्तूप में कहीं भी भगवान बुद्ध का अंकन नहीं है । इसका कारण यह है कि जब यह स्तूप बनाया गया उस समय तक भगवान बुद्ध की मूर्तियां बनाकर उन्हें पूजा नहीं जाता था। भगवान बुद्ध की मूर्तियों का बनना कनिष्क के काल में पहली सदी ईस्वी में प्रारंभ हुआ जबकि यह स्तूप तीसरी सदी ईसा पूर्व का है । हालांकि भगवान बुद्ध के जीवन से संबंधित प्रतीक चिन्हों का शिल्प अंकन हुआ है । जैसे भगवान बुद्ध के ग्रह त्यागने का चित्रण अश्वारोही के रूप में हुआ है या दौड़ते हुए घोड़े के द्वारा जिस पर एकछत्र स्थापित है उस के माध्यम से दर्शाया गया है । इसी तरह भगवान बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति को बोधि वृक्ष के माध्यम से दिखाया गया है । साक्षी के इन रूपों में भगवान बुद्ध के प्रिय शिष्य सारिपुत्र और मोग्गलायन के अस्थि अवशेष को स्थानीय संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया ।  सम्राट के अशोक के काल का एक दूसरा छोटा स्तूप भी यहां स्थापित है जिसमें तोरणद्वार नहीं बने हैं  । इसके अलावा एक प्रस्तर स्तंभ जिस पर सम्राट अशोक का शिलालेख उत्कीर्ण है वह स्तंभ अवस्था में यहां है । सम्राट अशोक द्वारा जिन पत्थरों का प्रयोग किया गया वह स्थानीय पत्थर ना होकर यहां से सैकड़ों किलोमीटर दूर मिर्जापुर जिले में स्थित चुनार से यहां लाए गए । स्तूप के आस-पास ही गुप्तकालीन मंदिर के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं । इसके अलावा यहां पर बौद्ध मठों के भी अवशेष प्राप्त हुए हैं जहां पर बौद्ध भिक्षु और बौद्ध गुरु रहते होंगे और शिक्षा दीक्षा का कार्य करते रहे होंगे । 1989 में यूनेस्को द्वारा सांची को विश्व विरासत स्थलों की सूची में शामिल किया गया ।
घर सांची के स्तूपों को देखते-देखते शाम ढलने लगी थी और एक व्यक्ति द्वारा बताए जाने पर हम पास ही स्थित कैंटीन पहुंचे जहां एक बाड़े के भीतर सुंदर सफेद रंग के खरगोश कबूतर और बत्तखें के पाली गई थी । स्वल्पाहार लेकर हम नीचे उतरो और चल पड़े अपने घर की ओर सांची को अपनी यादों में बसा कर..
साँची के आसपास दर्शनीय स्थलों में भोपाल , विदिशा , कर्क रेखा , उदयगिरि गुफा , नीलकंठेश्वर मंदिर , रायसेन , रातापानी टाइगर रिज़र्व , भीमबैठका , भोजपुर आदि प्रमुख है  

अब चित्रों का आनंद लीजिये और हाँ नीचे टिपण्णी में हमें अपनी प्रतिक्रियाओं से अवश्य अवगत कराइये।  धन्यवाद। 
साँची स्तूप का एक दृश्य 

प्रवेश शुल्क की जानकारी 

यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर में शामिल साँची 

स्तूप के द्वार के स्थापत्य की जानकारी 
स्तूप का मुख्य द्वार 
द्वार के शीर्ष पर चार हाथी और आम्रपालिका 

द्वार की अद्भुत शिल्प कला 


द्वार शीर्ष पर बने पंखो वाले सिंह 

बोधि वृक्ष की पूजा करते अनुयायी 

कमल और पक्षी ा सुन्दर अंकन 

अश्व : बौद्ध प्रतीकों में महत्वपूर्ण 

गज : बौद्ध धर्म में महत्वपूर्ण प्रतीक 

हमारा राष्ट्रिय चिन्ह - चार सिंह 
अश्वारोही 

मुख्य स्तूप का मुख्य द्वार 

नाग मर्दन और नाग आसन 

धम्म चक्र 

राजा और सेवक 
कैप्शन जोड़ें

एक कक्ष के अवशेष 

अन्य कक्ष 

एक स्तम्भ 

खरगोश 
शांति का प्रतीक : कपोत 

रविवार, 25 फ़रवरी 2018

नालंदा :प्राचीन भारतीय ज्ञान के खण्डहरों का अद्भुत अनुभव



जैसा कि आप सभी ने पिछली पोस्ट में पढ़ा कि कैसे मैं और मेरे बड़े साले ध्रुव राजगीर घूम चुके थे और अपनी बाइक से अब नालंदा की ओर चल पड़े थे । नालंदा अपने आप में एक बहुत बड़ा नाम है जो भारत ही नहीं बल्कि पूरे एशिया में एक समय अपने उच्चकोटि ज्ञान की वजह से विख्यात था । हमारी बाइक के पहियों के साथ कालचक्र भी घूम रहा था और मैं अलग ही कल्पना लोक में विचरण करने लगा ।
                                       दिल्ली में अलाउद्दीन खिलजी अपने चाचा और ससुर जलालुद्दीन की हत्या कर सल्तनत की गद्दी पर बैठ चुका था, और उसके कारिंदे पूरे भारत को रौंदने के लिए अलग-अलग दिशा में निकल चुके थे । उन्हीं में से एक कारिंदा दोआब के क्षेत्र से होते हुए गंगा पार करके नालंदा की ओर बढ़ रहा था । बख्तियार खिलजी ! जी हां उस दरिंदे का यही नाम था, जो बंगाल की ओर बढ़ते हुए रास्ते में पड़ने वाले तमाम गांव-शहरों और मंदिरों को न केवल लूटते हुए आ रहा था ,बल्कि लूटने के बाद उन्हें तहस-नहस कर के उनमें आग भी लगा रहा था । बख्तियार खिलजी कि इस लूटपाट की खबर जब नालंदा बौद्ध बिहार के प्रमुख आचार्य के पास पहुंची तो उनके मन में किसी भी प्रकार की घबराहट या बेचैनी नहीं थी, वह निर्विकार रूप से शांत भाव में थे । तभी आचार्य को प्रणाम कर द्वारपाल ने अपनी शंका व्यक्त की। कि आचार्य ! लोग बता रहे हैं बख्तियार बहुत ही नृशंस और अमानवीय तरीके से गांव और नगरों को नष्ट करता आ रहा है । तभी एक अन्य आचार्य  ने कहा- लेकिन उससे हमें भयभीत होने की क्या आवश्यकता ?  हमारे पास तो स्वर्ण भंडार नहीं है, बस ज्ञान भंडार ही है ! हमारे महाविहार को लूटने से उसे कुछ नहीं मिलेगा ।
                                   अब प्रमुख आचार्य मैं अपना मौन तोड़ा और बोले- आचार्य श्री, इन मुस्लिम आक्रांताओं को सैन्य बल से उतना भय नहीं लगता, जितना कि ज्ञान बल से लगता है । यह सैन्य बलों से तो किसी भी तरीके से निपट सकते हैं, परंतु ज्ञान से लड़ने की क्षमता इनमे नहीं है । यह शस्त्र से तो युद्ध कर सकते हैं परंतु शास्त्र से भयभीत रहते हैं । इन का उद्देश्य सिर्फ लूटपाट करना ही नहीं बल्कि अपने धर्म का प्रसार करना भी है । और इनके धर्म के प्रसार में कहीं भी शस्त्र बाधा नहीं बनी जहां भी इन्हें रुकावटें मिली वहां शास्त्र ने ही उन्हें रोका । इसलिए हमारा नालंदा बौद्ध विहार इनके लिए एक महाकाय शत्रु के समान है । तभी इन्हें गांव से दूर की तरफ धूल भरी आंधी नजर आई, जो इस बात का संकेत थी कि बख्तियार खिलजी की सेनाएं नालंदा की सीमा पर पहुंच चुकी है । और पहुंचते ही उन्होंने मारकाट लूटपाट  करना शुरू किया । अहिंसा के उपदेशक और बुद्ध के अनुयाई अपनी कलम से तलवारों से मुकाबला ना कर सके और ज्ञान का यह विश्वविद्यालय धूल धूसरित हो गया । महाविहार के पुस्तकालय में आग लगा दी गई और हजारों बहुमूल्य ग्रंथ धू-धूकर कर जल उठे । चारों तरफ करुण क्रंदन होने लगा नर-नारी ही नहीं अब इतिहास भी रो रहा था ।
                                           ध्रुव के ब्रेक लगाते ही मैं कल्पना लोक से बाहर आया तो देखा सामने ही उस महान नालंदा विश्वविद्यालय की खंडहर खड़े थे ।नालंदा को यूनेस्को ने वर्ष 2016  में विश्व धरोहरों की सूची में शामिल किया । इस तरह से बिहार में महाबोधि मंदिर बोधगया के पश्चात नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहर यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल होने वाले स्थानों में दूसरा है । सड़क के दोनों तरफ दो बड़े गेट लगे हुए हैं एक तरफ का गेट नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहरों की ओर ले जाता है तो दूसरी तरफ का गेट टिकट काउंटर और नालंदा संग्रहालय की ओर ले जाता है । गर्मी अपने चरम पर थी चटक धूप निकली हुई थी और हमारा शरीर पसीने से तरबतर था । टिकट काउंटर से टिकट लेकर हम नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहरों की तरफ बढ़ चले । सामने एक सूचना शिलालेख ने हमारा स्वागत किया । इस शिलालेख के अनुसार छठी शताब्दी ईसापूर्व में भगवान महावीर एवं बुद्ध के काल से ही नालंदा की ऐतिहासिकता के प्रमाण प्राप्त होते हैं बुद्ध के परम प्रिय शिष्यों में से एक सारी पुत्र के जन्म एवं निर्माण के रूप में भी इसे जाना जाता है । प्राच्य कला एवं संस्कृति के विख्यात शिक्षा संस्थान व महाविहार के रूप में इसकी पहचान पांचवी सदी में स्थापित हुई जब चीन सहित अनेक सुदूरवर्ती देशों से बौद्ध भिक्षु ज्ञानार्जन हेतु यहां आते थे । इस संस्थान से जुड़े विद्वानों में नागार्जुन, आर्य देव ,वसुबंधु ,धर्मपाल ,सुविष्णु , असंग ,शीलभद्र ,धर्मकीर्ति ,शांति रक्षित इत्यादि प्रमुख है। इसके अतिरिक्त प्रसिद्ध चीनी यात्रियों में ह्वेनसांग एवं इत्सिंग के नाम उल्लेखनीय है । जिन्होंने अपने यात्रा वृतांतो  में नालंदा के महाविहारों , मंदिरों तथा भिक्षुओं की जीवनचर्या आदि का विशेष वर्णन किया है । धर्मशास्त्र ,व्याकरण ,तर्कशास्त्र ,खगोलिकी ,तत्वज्ञान ,चिकित्सा एवं दर्शनशास्त्र आदि इस शिक्षा केंद्र में अध्ययन के प्रमुख विषय थे । अभिलेखीय प्रमाणों के अनुसार समकालीन शासकों द्वारा दान किए गए अनेक ग्रामों के राजस्व से इन महाविहारों का व्यय  वहन किया जाता था ।
                                                              प्राचीन युग के एक महानतम विश्वविद्यालय के रूप में प्रतिष्ठित नालंदा महाविहार की स्थापना गुप्त सम्राट कुमारगुप्त प्रथम (413-455 ई0) के शासनकाल में की गई थी । कन्नौज नरेश हर्षवर्धन(606-647 ई0)  व पूर्वी भारत के पाल शासकों ( 8 वी -12 वी सदी) के समय में भी महाविहारों को राज्य पर से अनवरत प्राप्त होता रहा । भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा कराए गए उत्खनन (1915-37 तथा 1974-82) से यहां ईट निर्मित 6 मंदिरों एवं 11 विहारों की सुनियोजित श्रंखला अनावृत हुई जिसका विस्तार लगभग 1 वर्ग किलोमीटर से भी अधिक है । लगभग 30 मीटर चौड़े उत्तर दक्षिण पथ के पश्चिम में मंदिरों की एवं पूर्व में विहारों की श्रंखला है । आकार एवं विन्यास में सभी विहार लगभग एक जैसे हैं । सर्वाधिक महत्वपूर्ण संरचना दक्षिणी छोर पर स्थित मंदिर संख्या 3 है ,जिसमें निर्माण के सात चरण है । इस के निकट छोटे छोटे आकार के मनौती स्तूपों का एक विशाल समूह है । महा विहारों एवं मंदिरों के भग्नावशेषों के साथ-साथ प्रस्तर (पत्थर), कांस्य (कांसा) स्टको मैं निर्मित अनेक मूर्तियां तथा कलाकृतियों उत्खनन से प्राप्त हुई हैं । इनमें विभिन्न मुद्राओं में बुद्ध ,अवलोकितेश्वर ,मंजूश्री ,तारा ,प्रज्ञापारमिता ,मारीचि ,जंभल आदि बौद्ध प्रतिमा है तथा विष्णु ,शिव-पार्वती ,महिषासुर-मर्दिनी, गणेश ,सूर्य इत्यादि हिंदू देव प्रतिमाएं प्रमुख हैं । इसके अतिरिक्त भित्तिचित्र ,ताम्र-पत्र, प्रस्तर और ईटों पर उत्कीर्ण अभिलेख मुद्राएं ,फलक ,सिक्के ,टेराकोटा ,मृदभांड आदि की प्राप्ति हुई है । इन सभी कलाकृतियों एवं पूरा वस्तुओं को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संचालित स्थानीय संग्रहालय में दर्शकों के लिए प्रदर्शित किया गया है ।
                                                     इस सूचना शिलालेख से जानकारी पढ़ने के पश्चात हम दोनों खंडहरों की ओर चल दिए । जहां हमारे टिकट चेक किए गए उसके बाद हमें प्रवेश दिया गया । गर्मी धीरे-धीरे बहुत तेज हो रही थी इसलिए हमने खंडहरों में प्रवेश करने के साथ ही एक पेड़ की छाया के नीचे कुछ देर सुस्ताने का निर्णय लिया । ऊपर नीले आसमान में छोटे-छोटे सफेद बादल बहुत ही मनोहारी दृश्य उत्पन्न कर रहे थे, परंतु नीचे आग बरस रही थी । कभी हमारे पास यहां माली का काम करने वाले एक सज्जन आए और बोले गाइड की जरूरत है । अब शक्ल और सूरत से लग तो नहीं रहा था कि वह हमें गाइड कर पाएंगे । परंतु हमने उनका पारिश्रमिक पूछा तो बोले वैसे तो ₹300 गाइड लेते हैं पर आप लोग ₹100 ही दे देना । मैंने सोचा यूं ही खाली भटकने से इन खंडहरों में कुछ समझ में तो आएगा नहीं, इससे अच्छा इन्हें ही साथ रख लिया जाए । तो उन सज्जन के सामने एक शर्त रखी कि अगर हमें वाकई उन्होंने ढंग से गाइड किया तभी पैसे देंगे ।
                                                                                                            अब हम चल पड़े उनके साथ विहार संख्या-1 की ओर । भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा नालंदा में उत्खनन कार्य का प्रारंभ इसी विहार से किया गया था और यह यहां स्थित सभी विभागों में सबसे महत्वपूर्ण विहार भी है । यहां से मुद्राएं ,पाषाण अभिलेख ,ताम्र पत्र इत्यादि अनेक पुरा वस्तुओं के साथ-साथ 9 चरणों में निर्मित एक विशाल विहार भी उत्खनित हुआ जो दो काल खंडों का प्रतिनिधित्व करता है । मूलतः इस विहार का निर्माण छठवीं सातवीं सदी में हुआ है तथा इसका पुनर्निर्माण नालंदा के पतन के दिनों तक अनवरत चलता रहा । इस के प्रांगण में एक छोटा सा मंदिर है जो गुप्त कालीन है ,जबकि उसके निकट ही दूसरा चौकोर मंदिर और उसकी दीवार से सटा गजपृष्टकार (हाथी की पीठ के आकार का) छत एवं डॉट द्वार से युक्त दो कोठियों को जोड़ा गया है ।  यहां से प्राप्त एक ताम्रपत्र के अनुसार नीचे वाला विहार तृतीय पाल वंश के शासक देवपाल के शासनकाल (810-850 ) में सुमात्रा के एक नरेश ने बनवाया था । विहार में अवस्थित सीढ़ी से यह प्रतीत होता है कि यह विहार कम से कम 2 मंजिला अवश्य रहा होगा । विहार में ऊपरी स्तर पर 34 कक्ष बने थे जिनमें कुछ में भिक्षुओं के विश्राम हेतु शैया एवं पुस्तक और सामग्री रखने के लिए कोनो में अलमारी का भी प्रावधान था । विहार की दीवारों से अग्नि द्वारा नालंदा महाविहार के विध्वंस के प्रमाण भी प्राप्त होते हैं जहां आज भी जली हुई दिखाई देती हैं ।
                                                                                                          हमारे गाइड महोदय हमें विद्यार्थियों के कक्ष की ओर ले गए जिनके दरवाजे के सामने नालियां बनी हुई थी । मैं खंडहरों की फोटो लेने में मशगूल था और गाइड महोदय नालियों की तरफ इशारा करके हमारे साले साहब को बता रहे थे कि यहां डाइनिंग सिस्टम था । डाइनिंग सिस्टम सुन कर मेरे कान खड़े हुए और जब मैंने देखा तो गाइड साहब नालियों की तरफ इशारा कर रहे थे । यह देख कर मुझे उनके आंग्लभाषा ज्ञान पर हंसी आई । और मैंने उनकी गलती को सुधारा और बताया कि यह डाइनिंग सिस्टम नहीं ड्रेनेज सिस्टम कहलाता है । हमारे गाइड महोदय हमें अन्य विहारों स्तूपों ,पूजा ग्रहों, छात्रावासों को दिखाते हुए उनकी व्याख्या कर रहे थे । क्योंकि हम भी इतिहास के अध्ययेता रहे हैं ,इसलिए बीच-बीच में उनकी कमियों को सुधार कर उन्हें बता रहे थे । एक तरफ छोटे बड़े कई स्तूप बने हुए थे । स्तूप बौद्ध धर्म में किसी भी व्यक्ति के मृत्यु पश्चात स्मारक स्वरूप बनाए जाते हैं । कई स्तूपों में संबंधित व्यक्ति के अस्थि अवशेष भी रखे होते हैं । यहां बने स्तूपों में बड़े स्तूप विश्वविद्यालय के आचार्यों के और छोटे स्तूप विद्यार्थियों के स्मारक थे । उस समय महामारियां भी फैलती थी जिसके कारण कई बार विद्यार्थी कम उम्र में ही काल कवलित हो जाते थे । और उनके अंतिम संस्कार के लिए उनके घर वालों को सूचना बहुत देर से मिलती थी । इसलिए उन्हें यहीं पर अंतिम विदाई दी जाती थी । चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी आत्मकथा सी-यू-की में नालंदा विश्वविद्यालय के बारे में विस्तार से वर्णन किया है । नालंदा विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए भी प्रवेश परीक्षा ली  जाती थी । विश्वविद्यालय के द्वारपाल  भी इतने विद्वान होते थे, कि सबसे पहले विद्यार्थियों का परीक्षण उन्हीं द्वारपालों के माध्यम से किया जाता था । जब विद्यार्थी उन द्वारपालों के प्रश्नों के उत्तर सही दे पाते तभी उन्हें अगले स्तर के परीक्षण से गुजरना पड़ता । इस तरह नालंदा विश्वविद्यालय में दूर-दूर देशों से भी विद्यार्थी आते और ज्ञान प्राप्त करते । हमारे गाइड महोदय ने छात्रावास के एक कक्ष को ह्वेनसांग का कक्ष बताया । जब हमने कहा कि हम क्यों माने कि यह ह्वेनसांग का ही कक्ष है । तो उनका जवाब था कि अधिकांश चीनी पर्यटक इस कक्ष में अवश्य आते हैं और पूजा पाठ करते हैं । शायद ह्वेनसांग ने अपनी आत्मकथा में अपने कक्ष की स्थिति का वर्णन किया होगा,  जिससे वर्तमान में पर्यटकों को अंदाजा होगा कि उनका कक्ष किस तरफ था । हमारे पास इसे ना मानने का कोई कारण नहीं था तो हम उसे ह्वेनसांग का कक्ष मानकर आगे बढ़ चले । 
                                                                                     विश्वविद्यालय में बहुत बड़े-बड़े भांडागार भी थे जहां पर विश्वविद्यालय के शिक्षकों और छात्रों के लिए अनाज सुरक्षित रखा जाता था । हमारे गाइड महोदय ने हमें उस समय के चूल्हे भी दिखाएं, जो आज की तरह नहीं लेकिन बनावट में विशेष आकार के थे । विश्वविद्यालय परिसर में ही अष्टकोणीय कुए का भी दर्शन हमने किया जिसे आज लोहे की जाली से ढक दिया गया है । अब दिन ढलने लगा था और हमने भी फोटोग्राफी करने के पश्चात वापस लौटने का निर्णय लिया क्योंकि इसके पश्चात हमें संग्रहालय भी देखना था और बाइक से गया भी लौटना था । हमारे गाइड साहब की जिन गलतियों का हमने सुधार किया उन्हें उन्होंने दोबारा पूछ कर अपनी पॉकेट डायरी में नोट किया । जब हम उन्हें उनका पारिश्रमिक देने लगे तो उन्होंने विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़ लिए अब बोलें आप से मुझे भी बहुत कुछ सीखने मिला हम आपसे पैसे नहीं ले सकते । काफी मान-मनौव्वल करने के पश्चात भी जब उन्होंने हम से पैसे नहीं लिए तो हम भी उन से हाथ मिला कर निकल पड़े संग्रहालय की ओर । सड़क पर आकर हमने अनानास का जूस पिया उसके पश्चात संग्रहालय गए । संग्रहालय में नालंदा विश्वविद्यालय और आसपास के क्षेत्रों से उत्खनित वस्तुएं प्रदर्शन के लिए रखी थी । यहां पर फोटोग्राफी प्रतिबंधित थी इसलिए हमने संग्रहालय के भीतर कोई भी फोटो नहीं खींची । मुझे यह बात समझ में नहीं आती कि संग्रहालयों में फोटोग्राफी प्रतिबंधित तो नहीं करनी चाहिए । फोटोग्राफी से उस काल की संस्कृति और सभ्यता का ज्ञान का प्रसार ही होगा । खैर अब हम वापस बाइक से गया की ओर निकल पड़े नालंदा को अपनी यादों में संजोकर । दिन ढलने के कारण पावापुरी नहीं जा सके जो भगवान महावीर से ना केवल जुड़ी है बल्कि जैन धर्म का एक बहुत ही महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है । 
- मुकेश पांडेय 'चँदन '
प्रवेश करते ही ASI का स्वागत 
नालंदा की जानकारी देता शिलापट्ट 
प्रवेश करते ही प्रथम दर्शन 
चटख धूप में नील आसमान में सुन्दर बादल 
हमारे गाइड महोदय हमें जानकारी देते हुए 
छात्रावास के कमरे 
छात्रावास के सामने डाइनिंग सिस्टम नहीं ड्रेनेज सिस्टम बना था।  
दूसरी मंजिल तक जाने के लिए सीढियाँ 
सभागृह का मंच 
यहाँ भगवान बुद्ध की मूर्ति स्थापित रही होगी 
एक कुंआ 
गज पृष्ठाकार छत 
पिरामिड के आकार की छत 
मनौती स्तूप 
एक विशेष प्रकार का चूल्हा 
मैं और ध्रुव स्तूप के अवशेषों के सामने 
यूनेस्को द्वारा घोषित विश्व विरासत स्थल का पटल 
संग्रहालय का प्रवेश द्वार 
इसी तरह का घंटा हमे राजगीर में भी मिला था।  
अप्प दीपो भव  (बुद्ध का अंतिम सन्देश ) के शुभ विदा 

शनिवार, 25 नवंबर 2017

देवगढ़ का अनमोल, अनछुआ प्राकृतिक खजाना !

 अद्भुत शिल्प और दशावतार मंदिर देवगढ़                                        

           पिछली पोस्ट में आपने पढ़ा कि  दशावतार मंदिर के अद्भुत शिल्प अंकन में हम इतना खो गए थे कि हमें न खुद की सुध बुध थी और ना ही अपनी भूख की । ऐसा लग रहा था कि मानो इन मंदिरों के शिल्प के साथ हम भी उस काल में पहुंच गए हो और मंदिर की भित्ति पर उत्कीर्ण प्रतिमाएं हम से साक्षात्कार कर रही हो और वह दृश्य हमारे सामने जीवित हो उठे हो । परंतु समय कब किसके लिए रुका है और यहां भी सूर्यदेव आकाश मार्ग में धीरे-धीरे अस्ताचल की ओर गमन करने लगे और हमें वर्तमान में ले आए । मैं और नयन सिंह जी भूख से बेहाल हो चुके थे, हालांकि साथ में ले आए सेव फलों (सेव फलों ने ही तो दुनिया में कई परिवर्तन ला दिए, न एडम वह स्वर्ग में सेव खाता और ना ही इस धरती पर हम इंसानों की दुनिया बसती । फिर न्यूटन महोदय के सर पर न पेड़ से सेव गिरता और ना वो गुरुत्वाकर्षण का नियम खोजते और ना ही आज विज्ञान इतनी तरक्की  कर पाता ।) हमारी भूख को कुछ तो राहत दी । अब हमारे खाए हुए सेवफल ने भी कम गुल नहीं खिलाए । 
दशावतार मंदिर को देखने के बाद हमने वहां के चौकीदार सीताराम तिवारी जी से यहां आस-पास और दर्शनीय स्थलों के बारे में जानकारी ली तो उन्होंने बताया यहां पर भगवान महावीर वन्य जीव अभ्यारण के अंदर एक जैन मंदिर, वराह मंदिर, सिद्ध की गुफा, नाहर घाटी, राज घाटी और बेतवा नदी का मनोरम दृश्य है । यह सभी सदियों पुराने हैं । इसके साथ ही बेतवा के किनारे पर प्राकृतिक चट्टानों से बने घाट पर चट्टानों की दीवारों पर कई प्रतिमाएं उकेरी गई हैं । ब्राह्मी लिपि में एक अभिलेख भी लिखा हुआ है । यह सुनकर हम अपनी पेट की भूख भूल गए और घुमक्कड़ी की भूख जाग उठी । सेव फल  अपना चमत्कार  दिखाने लगे और  देवगढ़  जहां हमें सिर्फ दशावतार मंदिर ही  खींच लाया  अब एक  नई दुनिया  से रूबरू होने वाले थे । अब हमारे पैरों में सनीचर हमें खुद ही उस जंगल की ओर बुलाने लगा । क्योंकि यह हमारे लिए अनजान जगह थी , इसलिए हमने सीताराम तिवारी जी से निवेदन करके उनके लड़के को अपने साथ एक मार्गदर्शक के रुप में ले लिया और हम चल पड़े जंगल की ओर । सबसे पहले हमने सबसे दूर वाली जगह जाने का निश्चय किया क्योंकि पहले वाली जगह देखने के चक्कर में अंधेरा हो सकता था और हम बाकी जगहों से मिलने से मरहूम हो सकते थे । पहाड़ी जंगलों के बीच पगडंडी नुमा सड़क पर हमारी Scorpio आराम-आराम से चली जा रही थी बीच-बीच में पेड़ पौधे झाड़ियां हमारा रास्ता रोकने की कोशिश भी कर रही थी, मगर हम उन्हें हटाते हुए अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहे थे । कुछ दिन पहले हुई बरसात के कारण रास्ते में कीचड़ और गड्ढे भी थे । पर इन सब से बेपरवाह हम बढ़ते चले जा रहे थे , क्योंकि अगर हम रुकते तो सूर्य अस्त हो जाता और इस खजाने से वंचित हो जाते ।
                                          सबसे पहले हम नाहर घाटी पहुंचे और यहां बेतवा नदी का विहंगम दृश्य देखकर मन मयूर सा नाचने लगा । बेतवा नदी और मेरा रिश्ता तो आप मेरी  ओरछा गाथा सीरीज में  पढ़ ही चुके हैं । मुझे यहां आने के पहले यह नहीं पता था कि देवगढ़ भी बेतवा नदी के किनारे  बसा हुआ है । बेतवा का अपार चल देख कर  मन प्रसन्न हो गया । यहां पर  राजघाट बांध  के कारण  यह क्षेत्र डूब क्षेत्र  में आता है  इसलिए  यहां पर  बेतवा  अपनी अथाह जलराशि से  सागर जैसा  एहसास दिला रही थी । बीच में  टापू जैसी जगह पर  कुछ मकान दिख रहे थे  जो  मध्य प्रदेश  का एक गांव था । अर्थात बेतवा की तरफ  उत्तर प्रदेश और दूसरी तरफ मध्य प्रदेश  है । बेतवा  मध्य प्रदेश की  उत्तरी सीमा  बनाने में  सहायक है  विशेषकर  ललितपुर और झांसी जिलों में । नाहर घाटी के नाम में नाहर का अर्थ सिंह होता है, अतः नाम से लगता है कि कभी इन जंगलों में सिंह भी निवास करते रहे होंगे और हो सकता है इस घाट पर वह पानी पीने आते होंगे इसलिए इसका नाम नाहर घाटी पड़ा । यहां प्राकृतिक चट्टानों को काटकर सीढ़ियां बनाई गई थी और खड़ी चट्टानों की दीवारों पर छेनी और  हथोंडो से खोदकर शिवलिंग और अन्य प्रतिमाएं बनाई गई थी । जिन जगहों पर यह प्रतिमाएं बनाई गई थी वहां पहुंच पाना ही बहुत कठिन था न जाने कैसे शिल्पकारों ने यह अद्भुत कारीगरी की होगी । एक तरफ चट्टानों पर मनुष्य कलाकृतियां देख कर मन विस्मित था तो दूसरी तरफ बेतवा नदी के सुंदर रूप को देखकर प्रकृति की कलाकारी पर हमने दांतों तले उंगलियां दबा ली थी । इन नजारों को देख कर मन नहीं भर रहा था ऐसा लग रहा था कि घंटों इस जगह पर बैठकर प्रकृति और मनुष्य की कलाकारी को निहारते रहे । पर हमारे पास समय कम था अंधेरा होने को आ रहा था और हमें और भी स्थान देखने थे इसलिए हम वापस हुए । राज घाटी में भी शिवलिंग, सूर्य की प्रतिमा और अन्य कुछ प्रतिमाएं खड़ी चट्टानों पर उत्कीर्ण की गई थी यह भी बेतवा के तट पर बनी घाटी थी । 
                                              राज घाटी के बाद हम सिद्ध की गुफा पहुंचे। इस जगह खड़ी चट्टान को काटकर एक गुफा बनाई गई थी, जिसके आसपास महिषासुर मर्दिनी, शिव और अन्य देवी देवताओं की प्रतिमाएं उत्कीर्ण की गई थी । पास में ही ब्राह्मी लिपि में एक लेख लिखा हुआ था जो हमारी समझ से बाहर था। इसी के पास देवनागरी में भी एक लेख खुदा हुआ था जिसकी भाषा इसे बुंदेली शासकों की समय का बता रही थी । सिद्ध की गुफा देखने के पश्चात हम लोग वराह मंदिर की तरफ आए वराह मंदिर भी गुप्तकाल का एक मंदिर था जिसमें भगवान विष्णु के वराह अवतार की प्रतिमा विराजित थी । लेकिन चोरों द्वारा उस प्रतिमा को चुरा लिया गया परंतु उसे खंडित अवस्था में बरामद कर लिया गया और वह वर्तमान में भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के स्टोर रूम में धूल खा रही है । वराह मंदिर में वर्तमान में भग्नावशेष इसकी भव्यता का यशोगान गा रहे हैं। वराह मंदिर के पश्चात हमारी गाड़ी जैन मंदिर की ओर मुड़ चली । जैन मंदिर का वास्तुशिल्प और बनावट आठवीं नवी सदी के चंदेल कालीन मंदिरों का है । जैन समाज द्वारा इन मंदिरों की देखरेख की जाने के कारण इनकी स्थिति बहुत अच्छी है यहां पर जंगल में यत्र-तत्र बिखरी पड़ी जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाओं को एकत्र करके एक ही परिसर में स्थापित किया गया है । मुख्य मंदिर के गर्भ गृह में जैन तीर्थंकर शांतिनाथ की प्रतिमा है । मंदिर परिसर में ही एक संग्रहालय बना हुआ है ,जहां पर सुरक्षा व्यवस्था के लिए पुलिस चौकी भी है, परंतु सूर्य अस्त हो जाने के पश्चात यह संग्रहालय बंद हो गया था, इस कारण हम इसके दर्शन नहीं कर पाए । सीताराम तिवारी जी के सुपुत्र ने हमें एक नई जानकारी दी, कि देवगढ़ के इन जंगलों में हाल में ही भगवान बुद्ध से संबंधित बहुत सारी प्रतिमाएं और अवशेष खोजे गए हैं, जिन पर अभी शोध चल रहे हैं. हालांकि घने जंगल में होने के कारण हम उनका फिलहाल मोह त्याग कर वापस लौटने का विचार बनाएं । वैसे भी अब वापसी की बेला हो चली थी और जठराग्नि भी प्रज्वलित हो रही थी । लौटते में देवगढ़ कस्बे में स्थित जैन धर्मशाला की स्थिति देखने हम लोग पहुंचे जहां पर 300 रुपये और 500 रुपये के दो प्रकार के कमरे बने हुए थे और व्यवस्था बहुत अच्छी थी । साथ ही शाकाहारी भोजन की भी सुलभता थी । अर्थात यहां आराम से रात गुजारी जा सकती है और हमने निश्चय किया कि कभी परिवार सहित यहां अवश्य आएंगे और एक रात्रि विश्राम करके आराम से और विस्तार से देवगढ़ का भ्रमण किया जाएगा । देवगढ़ के पास ही रणछोड़ धाम भी एक दर्शनीय स्थल है जहां भगवान श्री कृष्ण ने कालिया यवन का वध किया था और यहीं पर वह रणभूमि छोड़कर भागे थे जिस कारण उनका नाम रणछोड़ पड़ा। चूंकि रात्रि हो चुकी थी।  अतः हमने वापसी में ही भलाई समझी और रणछोड़ धाम को दोबारा आने का एक निमित्त बनाकर अपने धाम को लौटने का विचार किया । देवगढ़ जाने के लिए नजदीकी रेलवे स्टेशन ललितपुर है और ललितपुर सड़क मार्ग द्वारा भी देश के बाकी हिस्सों से जुड़ा हुआ है ।
हम चल पड़े प्रकृति की ओर 

नयन सिंह जी और उनकी स्कार्पियो 
बेतवा की पहली झलक (मेरे और माँ बेतवा के सम्बन्ध तो आप जानते ही है )
इस नजारे ने तो दिल चुरा लिया 
खड़ी चट्टानों को काटकर बनाई गयी सीढिया 
नदी किनारे खड़ी चट्टानों को काटकर कैसे मूर्ति बनायीं गयी होगी ?
सप्तमातृकाएं और गणेश का  साहसिक शिल्पांकन 
शिवलिंग 
भगवान भास्कर 
कुदरत की कलाकारी 
ये अभिलेख भी हमें प्राप्त हुआ।  हालाँकि पल्ले कुछ भी नहीं पड़ा 
सिद्ध गुफा 
महिषासुर मर्दिनी का सुन्दर शिल्पांकन 
इन किंगफिशर जनाब के काम में हमने शायद खलल डाल दिया 
प्रकृति की इस अद्भुत चित्रकारी को हमने अपने कैमरे में कैद किया 
वराह मंदिर के भग्नावशेष 
जैन तीर्थंकर शांतिनाथ मंदिर 
प्राचीन जैन मंदिर (नागर शैली )
मंदिर परिसर में स्थापित की गयी अन्य तीर्थंकरों की प्रतिमाएं 
अच्छा तो अब चलते है 

orchha gatha

बेतवा की जुबानी : ओरछा की कहानी (भाग-1)

एक रात को मैं मध्य प्रदेश की गंगा कही जाने वाली पावन नदी बेतवा के तट पर ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा हुआ. बेतवा की लहरों के एक तरफ महान ब...