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शुक्रवार, 8 सितंबर 2023

मोबाइल और आजकल का बचपन



मोबाइल अंग्रेजी भाषा का शब्द है, जिसका हिंदी अर्थ 'गतिशील' होता है। मगर आज मोबाइल फोन के लिए रूढ़ हो चुके शब्द 'मोबाइल' ने आजकल के बच्चों को गतिहीन कर दिया है । अब बच्चों में बचपना बचा ही नही । पैदा होते ही उन्हें खेलने के लिए मोबाइल सौंप दिया जाता है, जो उनके बचपन को ही लील जाता है । 

आज लगभग हर भारतीय परिवार जिनमें छोटे बच्चे है, उनमें बच्चों को मोबाइल की लत आम है । इसका सबसे बड़ा कारण स्वयं अभिभावक ही है । माताएं अपने घरेलू कार्यों के बीच बच्चों का मन बहलाने के लिए मोबाइल पकड़ा देती है, शुरू-शुरू में तो उन्हें यह आदत बड़ी राहत देती है । मगर अब बच्चों को हर समय मोबाइल चाहिए । उनकी दिन भर की सारी गतिविधियों में मोबाइल अनिवार्य हो जाता है, और समस्या यही से शुरू होती है । खाते समय मोबाइल, पढ़ते समय मोबाइल, खेलते समय भी मोबाइल । खेल भी मोबाइल गेम वाले खेल हो गए है । अब यूपीआई और पेमेंट एप्प के कारण इन गेम से खेलते समय कई बार बच्चे हजारों रुपये इन गेम भी खर्च कर देते है, अभिभावकों को जब पता चलता है, तब तक एक बड़ी रकम खर्च हो चुकी है । पबजी गेम के कारण बच्चे आक्रामक और चिड़चिड़े होने लगे थे, तो एक कदम आगे बढ़ते हुए ब्लू व्हेल गेम के कारण तो बच्चे आत्महत्या तक करने लगे थे । मजबूरन कई देशों को इन मोबाइल गेम पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाना पड़ा । 

मोबाइल फोन से हानिकारक रेडिएशन किरणें निकलती है, जो न केवल शरीर को हानि पहुँचाती है, बल्कि मस्तिष्क पर भी बुरा असर डालती है । बच्चों के मानसिक स्तर को प्रभावित करती है । शुरू शुरू में बच्चा चिड़चिड़ा और जिद्दी होता है, बाद में वो पागलों जैसी हरकतें करने लगता है । मोबाइल न मिल पाने पर वो घर के सामान की तोड़-फोड़ भी करने लगता है । 

अब अभिभावक इस समस्या से निजात कैसे पाये ? क्योंकि आज हमारे दैनिक जीवन में मोबाइल जरूरत नही मजबूरी बन गया है । इसके बिना आज के जीवन की कल्पना नही की जा सकती है । नौकरी और व्यवसाय भी मोबाइल के माध्यम से चल रहे है।  पैसे का लेन-देन भी मोबाइल के माध्यम से हो रहे है । यहाँ तक बच्चों के होमवर्क भी स्कूल वाले मोबाइल पर ही भेजते है । तो आज मोबाइल से बच्चों को दूर करना तो असंभव है, लेकिन हम अपनी निगरानी में बच्चों के मोबाइल उपयोग को सीमित कर सकते है । बच्चों के मोबाइल प्रयोग का समय निश्चित कर दें । उन्हें इकट्ठा लंबे समय के लिए मोबाइल न देकर थोड़े-थोड़े समय के लिए मोबाइल दे सकते है । उनके मोबाइल इस्तेमाल के समय अभिभावकों की निगरानी जरूरी है, ताकि हमें पता रहे कि बच्चे मोबाइल पर क्या कर रहे है । बच्चों को मोबाइल देते समय उसे चाइल्ड मोड (आजकल लगभग सभी स्मार्ट फोन में यह फीचर आता है ।) में करके दें । इसके अलावा पेमेंट वाले एप ऐसे पासवर्ड से लॉक कर दें, जिसके पासवर्ड बच्चे उपयोग नही कर पाये । जैसे फिंगर प्रिंट या फेस लॉक कर सकते है । सोशल मीडिया वाले एप पर उनका अकाउंट कम से कम 15 वर्ष के होने के बाद ही बनाये । अपने सोशल मीडिया के अकाउंट वाले एप लॉक रखे । पासवर्ड में पैटर्न या पिन की जगह फिंगरप्रिंट या फेस लॉक रखे ताकि आपकी जानकारी के बगैर किसी एप का इस्तेमाल न हो । बच्चों को आउटडोर गेम खेलने तो प्रेरित करें, हो सके तो उनके साथ भी खेले । समय-समय पर उनके साथ घर से बाहर घूमने जाए । घर पर भी उन्हें पर्याप्त समय दें, उन्हें कहानियां और किस्से सुनाए । उनकी बातें सुने, उनकी स्कूल की गतिविधियों को सुने, अपने स्कूल के अनुभव भी उन्हें सुनाये । जब आप घर पर हो तो खुद भी मोबाइल का कम से कम इस्तेमाल करें । रात को खाने के समय से लेकर सुबह तक यदि बहुत जरूरी न हो तो मोबाइल का प्रयोग न करें । मोबाइल में सीमित और उपयोगी एप रखे । गेम और टिकटोक सरीखे एप न रखे । बच्चों के लिए कामिक्स और किताबें पढ़ने की आदत डालें । रचनात्मक गतिविधियों को बढ़ावा देने, जैसे चित्रकला, क्राफ्ट बनाना, गायन-वादन आदि कलाओं से जोड़े ताकि उनका फुरसत का समय उसमें व्यतीत हो । बच्चे जितना अधिक अन्य गतिविधियों में व्यस्त रहेंगे वो उतना ही मोबाइल से दूर रहेंगे ।

उन्हें ये आदत डालें कि मोबाइल का उतना ही इस्तेमाल करें, जितनी जरूरत हो ताकि मोबाइल लत न बन पाये । हालांकि इसके लिए अभिभावकों को भी अपनी मोबाइल से जुड़ी आदतें कम करनी होगी । 


गुरुवार, 14 नवंबर 2013

बाल दिवस के कुछ सवाल ..हम सब से ?????

                                  मित्रो आप सभी को भारतीय बाल दिवस कि हार्दिक शुभकामनायें. 
मेरे ख्याल से आज आपने अपने फेसबुक , ट्विटर  और शोशल मीडिया के मित्रो को शुभकामनयें भेज कर बाल दिवस मना लिया होगा . है न ?
 पर कभी -कभी मन में कई सवाल आते है , सोचा क्यों न आप से ही साझा कर लिया जाये  ? 
शायद कुछ के जवाब ही मिल जायेंगे  ? 
हम बाल दिवस को बच्चो के दिन के रूप में मानते है , तो क्या आज हमने बच्चों को बच्चा रहने दिया है ?
दिन भर स्कूली बस्ते का बोझ लादने के बाद कोचिंग , ट्यूशन , म्यूजिक क्लास , स्पोर्ट क्लास , कंप्यूटर , विडिओ गेम्स , मोबाइल के बीच क्या उनका बचपना बचा है ?
और स्कूलों में भी कौन सी शिक्षा ....सिर्फ नौकरी या व्यवसाय के लिए ?
हम उन्हें नैतिक शिक्षा , संस्कार दे पा रहे है  ?
क्या इस गलाकाट प्रतियोगी दौर में उन्हें किसी असहाय , बेसहारा या जरूरतमंद की मदद करना सिखा पा रहे है ?  
टेलीविज़न और इंटरनेट के बीच माँ की लोरी और थपकियाँ कहाँ  है ?
बड़ो का सम्मान , पड़ौसी धर्म, परोपकार , विनम्रता , सहनशीलता , आदर्श इस पीढ़ी के पास पहुचें है ?
तकनीक के तनाव में प्यार की छाँव उन्हें नसीब है ?
ग्लोबल वर्ल्ड में माँ-बाप की गलबहियां मिल पा रही है ?
  जिंदगी की जद्दोजहद में जिंदादिली उन्हें मिल पायी है ?
वर्चुयल रिलेशन और सोशल नेटवर्किंग के जाल में रिश्ते-नाते , दादा-दादी , नाना -नानी , मामा-मामी, चाचा-चाची का दुलार मिला है ?
ये तो हुए हमारे अपने बच्चों के लिए अब कुछ बच्चे ऐसे भी है , जिनका जन्म लेना ही उनके लिए अभिशाप से कम नही है . ऐसे बच्चों के लिए तो जिंदगी ही सबसे बड़ा सवाल है . उनकी दुनिया में सबसे बड़ा उद्देश्श्य ही रोटी है . ऐसे ही  बच्चो की कुछ तसवीरें आपके लिए लाया हूँ ....


हमारी ये जंजीरें कब टूटेंगी ...???

क्या आपका ये कचरा ही हमारा भविष्य होगा ?

क्या सारा बोझ हम ही उठाएंगे ?


मुझे कब भरपेट रोटी नसीब होगी ?

कब हम अपने आंसू पोंछ पाएंगे ?

हम कब आपकी दुनिया में शामिल होंगे ....?

हमें भिक्षा नही शिक्षा कब मिलेगी ?

कब हमारे उज्जवल भविष्य के नींव की ईंट रखी जायेगी ?
इसलिए नही कि आप बस उन्हें देखे ...बल्कि उनके लिए सोचे ...कुछ करे ...मैं ये नही कहूंगा कि आप ऐसे बच्चों को गोद  ले या उनका खर्च उठाएं ....या उनकी पढाई का खर्च उठाएं ...बल्कि जब कभी ऐसे बच्चे आपको नज़र आयें तो उनकी तरफ हिकारत कि नज़र से न देखे ..बल्कि प्यार से देखे ...वो भी हमारी तरह इंसान है . उनके साथ इंसानों के जैसा ही बर्ताव करे ...और हो सके तो उनकी मदद करे (पैसे की नही ) ...ऐसी मदद जो उनके जीवन में खुशियां ला सकें ...उनको अपने पैरो पर खड़ा कर सके ...उन्हें गलत राहों पर जेन को मजबूर न करें .....वो भी एक इंसानी जिंदगी फक्र से  जी सके  .....और इस दुनिया में पैदा होने के लिए ऊपर वाले का शुक्रिया अदा कर सकें
हमें भी हक़ है जीने का .....है न !

शनिवार, 17 अगस्त 2013

अब पहले जैसा सावन नही आता ...!

भारतीय साहित्य में बसंत के बाद जिस मौसम की चर्चा की गयी है ....वो है श्रावण या सावन मास ! 
हो भी क्यों न , आखिर प्रकृति भी इस महीने पर बहुत मेहरबान जो होती है . सावन के वर्णन में कवियों ने कोई कसर नही छोड़ी है .
याद करे मुकेश का गाया हुआ वो मधुर गीत -  
सावन का महीना, पवन करे सोर
 पवन करे शोर पवन करे सोर 
पवन करे शोर अरे बाबा शोर नहीं सोर, सोर, सोर 
पवन करे सोर.
 हाँ, जियरा रे झूमे ऐसे, जैसे बनमा नाचे मोर हो 
सावन का महीना … मौजवा करे क्या जाने, हमको इशारा जाना कहाँ है पूछे,
 नदिया की धारा मरज़ी है ...
या फिर ..
लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है....
या फिर 
सावन बरसे...धड़के दिल...क्यों ना घर से निकले दिल...

 सावन का महिना प्यार का महिना कहलाता था .....पर प्यार तो अब बारहमासी हो गया है . 
भगवान् शिव का प्रिय महिना भी सावन ही है ....इसी महीने में लोग सावन सोमवार का व्रत रखते है ...इसी महीने में कांवरिये कांवर में जल भर कर भगवन शिव का जलाभिषेक करने मीलो पैदल चल कर जाते है . 
सावन के महीने में ही पपीहा स्वाति नक्षत्र का जल पीने पिहू-पिहू  गाता फिरता है ...
सावन के महीने में ही किशोरियां कजरी तीज का व्रत रखती है ..
 लेकिन मैं आज सावन की कसक की बात करना चाहूँगा .......
अब सावन पहले जैसा नही रहा ...
न ही सावन का इंतजार होता है . ...
न बागों में झूलें पड़ते है ...
न परदेस से पिया के आने का इन्तजार होता है ...
न कई दिनों की झड़ी लगती है ....
न सावन के मेले भरते है , जिसमे बच्चे साल भर के लिए खिलोने लेते थे ...
न सावन में  गाँव  में लोग विदेशिया या आल्हा गाते है ..... 
न बहनों के राखी बांधने जाने के लिए मायके जाने की वो बेकरारी रहती है ....
न नागपंचमी पर अखाड़ो में कुश्तियां होती है ....
न सावन में बेटी-बहनें अपने हाथों में पहले की तरह मेहंदी रचाती है ...
न सावन में बारिश के पानी में कागज की कश्तियाँ छोड़ी जाती है ..
न सावन की लड़ी में भीगने का मन होता है ....
आखिर बाजारवाद की अंधी दौड़ ...आधुनिकता के नाम पर ....पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से हम क्यों अपनी संस्कृति ....अपनी प्रकृति ....से दूर होते जा रहे है ....
अब क्यों नही पहले जैसा सावन आता है ???



मंगलवार, 18 जून 2013

हर कसौटी पर कम निकले ....

हार गये सारी बाजी, हर कसौटी पर कम निकले 
अब आरज़ू है , कि किसी तरह बस दम निकले 
हर तरह की आजमाईश , हमने की हर तरकीब 
क्या पता था ? हमरी कोशिशें उन पर सितम निकलें 
जीने की आरज़ू नही अब , ख़त्म हो गया जहाँ 
खुश रहे वो , जब कभी हमारा कफ़न निकलें 
हो गये तबाह , पर अब गम क्या करें ,
 मिले खुशियाँ  उन्हें , जब-जब हमारा सनम निकलें
महक बाकि रहेगी ताउम्र, मेरी मोहब्बत की 
चिता की राख को संभल के रखना , क्या पता वो 'चन्दन 'निकले

सोमवार, 10 दिसंबर 2012

हाईटेक नही होना चाहता , मेरा गाँव !!

हाईटेक नही होना चाहता , मेरा गाँव 
न धन-दौलत , न  सोना चाहता है मेरा गाँव 
 भरी बरसात में  , जब खेत होते लबालब
किसी घर में प्रसव पीड़ा, सुन कांपते सब 
चारपाई पे रख के दौड़ते ,जब  चार कंधे 
कीचड़ -पानी सब भूल , भागे जाते बनके अंधे 
किस्मत हुई तो , सही वक़्त पे मदद देगा दूजा गाँव 
वरना उन्ही चार कंधो पर , लौटेगा बिलखता बहाव 
सुनसान रातों में , किसी बुजुर्ग को चलती खांसी 
धड़कने तेज , बच पायेगा  या लग जाएगी फांसी 
आज़ादी के इतने साल बाद , हो गया इंडिया शाईन 
पर मेरे गाँव में आज भी बसते, ओझा और डाईन
बिन सड़क, बिन अस्पताल, कैसे चले विकास की नाव    

मित्रो , मेरा गाँव बिहार के बक्सर जिले के सिमरी प्रखंड (ब्लाक ) के अंतर्गत 'गोप भरवली'  है . कहने को तो मेरा गाँव ब्लाक से १ कि०मि० की दुरी पर है , मगर लगभग १००० की आबादी आजादी के ६५ सालों बाद भी विकास की सारी सुविधाओ से दूर है . आज भी सड़क ( कच्ची या पक्की ) न होने के कारण मेरा गाँव बाकि देश - दुनिया से कटा  है  . सड़क बनवाने के लिए ग्रामवासियों ने बी०डी 0 ओ० से लेकर माननीय मुख्यमंत्री ' सुशासन बाबु ' तक अर्जी लगाई, मगर नतीजा वही ढाक के तीन पात. आज भले ही प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना जैसी योजना पुरे देश में चल  रही है , मगर मेरे गाँव से वो दूर ही है . अगर विकास को ढूँढा जाये तो मेरे गाँव में दो प्राथमिक  विद्यालय , कुछ टूटी- फूटी  सिन्धु घाटी  सभ्यता के अवशेषों की तरह  पक्की नालियों  
मेरे गाँव के जांबाज़ युवा जो मिटटी में आनंद ढूंढ रहे !
के अवशेषों के अलावा कुछ नही मिलता . हाँ बिजली आ गयी  है , जिसकी सूचना देता राजीव गाँधी की फोटो व राजीव गाँधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना का बोर्ड गाँव की शुरुआत में ही लगा है . इसके अलावा मनरेगा के कार्य तो बस खानापूर्ति की तरह होते है . हा आधुनिकता की चाह ने लोगो को मोबाइल फोन्स से जरुर जोड़ दिया है , जिसमे प्रोढ़ भोजपुरी गाने देखते-सुनते रहते है , तो युवा पीढ़ी आधुनिक नौकरियों से बेपरवाह फेसबुक और इंटरनेट की रंगीनियों के जाल में फंसा है .गाँव के  कुछ जागरूक लोगो ने गाँव की प्रगति और विकास के लिए अपनी क्षमता अनुसार प्रयास किये ...यहाँ तक कि माननीय मुख्यमंत्री जी को ज्ञापन भी दिया ....आधिकारियो , जनप्रतिनिधियों के आगे गुहार लगाई ...मगर मिला तो बस आश्वासन ...गाँव की समस्याओं का निराकरण न हो पाने का मूल कारण स्वयं की ग्राम पंचायत न हो पाना है , क्योंकि अभी हमारा गाँव 'आशा पड़री ' ग्राम पंचायत में आता है , जहाँ हमारे गाँव की साडी आशाएं पड़ी रहती है ...क्योंकि पंचायत में हमारे गाँव से केवल एक मात्र वार्ड मेंबर है , जिसकी आवाज़ नक्कारखाने में तूती बनके रह जाती है . अब तो गाँव के लोग अपनी  इस आदिम जिन्दगी के आदि हो गये है , और इसी में खुश है.  

बुधवार, 19 सितंबर 2012

कांटा लगा !!!!!

 बहुत पहले गणेश चतुर्थी के समय ये कविता लिखी थी , आज आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ .

गणेश चतुर्थी के पहले लोग पंडाल सजा रहे थे
लेकिन धार्मिक की जगह , फ़िल्मी गीत बजा रहे थे
बंगले के पीछे कांटा लगा, बुद्धि विनायक  सुन रहे थे
मानो काँटों से बचने के लिए , जाल कोई बुन रहे थे
बेरी के नीचे लगा हुआ था, काँटों का अम्बार
लहूलुहान से गजानन , होके बेबस और लाचार
सोच रहे थे कब अनंत चतुर्दशी आएगी
जाने कब इन  बेरी के काँटों से मुक्ति मिल पायेगी
मुश्किल हो गया , इस लोक में शांति का ठिकाना
नाक में दम कर दिया ,और कहते अगले बरस जल्दी आना
मैं इसी बरस जल्दी जाने की सोच रहा हूँ
अपने फ़िल्मी भक्तों के लिए , अपने आंसू पोछ रहा हूँ
मुझसे भी बढ़कर है , इनके लिए फिल्मे और फ़िल्मी संसार
फिर गणेशोत्सव क्यों मानते , करते क्यों मुझ पर उपकार ?
- मुकेश पाण्डेय 'चन्दन '
गणेश चतुर्थी और पर्युषण पर्व की शुभकामनाएं

बुधवार, 22 अगस्त 2012

राग दरवारी :हिंदी साहित्य का व्यंग्य का सर्वश्रेष्ठ और कालजयी उपन्यास

नमस्कार मित्रो ,

बहुत दिनों बाद मैं आज ब्लॉग लिखने बैठा हूँ . कुछ दिन सोचा इन्टरनेट की दुनिया से दूर होकर साहित्य की दुनिया की सैर की जाये . इस लिए मैं पिछले हफ्ते हिंदी  साहित्य का व्यंग्य का सर्वश्रेष्ठ और कालजयी उपन्यास " राग दरवारी " पढने में व्यस्त था . सच पूछो तो श्रीलाल शुक्ल जी का लिखित उपन्यास हर भारतीय को पढना चाहिए . इस उपन्यास में शुक्ल जी ने एक कसबे 'शिवपालगंज ' और उसके निवासियों ( जिन्हें उपन्यास में गंजहा कहा गया है ) के बहाने भारतीय संस्कृति और मानसिकता पर करारा व्यंग्य किया है . जैसे :- " वर्तमान शिक्षा पद्धति रास्ते में पड़ी हुई कुतिया है , जिसे कोई भी लात मार सकता है . "
स्व० श्रीलाल शुक्ल जी
शुक्ल जी ने शिवपालगंज कसबे के बहाने देश  की लगभग हर समस्या को जोरदार तरीके से उठाते है . यही कारण है, कि 1960 के दशक में लिखा  गया ये उपन्यास आज भी प्रासंगिक  है. शुक्ल जी जिस सरल भाषा शैली में अपनी बात रखते  है ,वह लाजवाब है ! उदहारण के लिए  "  इस देश के निवासी परंपरा से कवि है , चीज  को समझने से पहले वे उस पर मुग्ध होकर कविता कहते है . भाखड़ा नांगल बांध को देखकर वे कह सकते है 'अहा ! अपना चमत्कार दिखाने  के लिए , देखो प्रभु ने फिर से भारतभूमि को चुना . '
मेरे अभी तक पढ़े गए साहित्य में निश्चय ही 'राग दरवारी ' सर्वश्रेष्ट है . राग दरवारी के पात्र वैद्य जी , रंगनाथ , रुप्पन बाबु , बद्री पहलवान , प्रिंसपल साहब , खन्ना मास्टर , सनीचर , लंग्गड़  और अन्य पात्र हमारे आस-पास के ही लगते है . और उपन्यास को पढ़ते समय हम भी उन्ही में शामिल हो जाते है . लगता है शुक्ल जी हमारी ही कहानी कह रहे है . आज भी ग्रामीण भारत 'राग दरवारी ' के शिवपाल गंज कि तरह है . आज देश के लोग वैद्य जी तरह देश को अच्छाई का मुखौटा पहन कर लूट रहे है , आज भी प्रिंसिपल साहब जैसे चापलूस देश की व्यवस्था को चूस रहे है . आज भी सत्ता का विरोध करने वालों  को खन्ना मास्टर की तरह परेशान किया जा रहा है . आज भी लंग्गड़ जैसे कई ईमानदार लोग अपनी जमीन  की नक़ल लेने  के लिए तहसीली  का चक्कर काट रहे है. आज भी बद्री पहलवान जैसे गुंडे सत्ता के उत्तराधिकारी बन रहे है . आज भी गयादीन जैसे सीधे-सादे  लोग  अपनी बेटी की इज्जत बचाने के लिए पलायन कर रहे है . आज भी सनीचर जैसे लोग सत्ता की कठपुतली बन कर दुसरो की उंगलियों पर नाच रहे है . आज भी देश के लोग भंग और गांजे के नशे में धूत्त होकर मतदान कर रहे है , आज भी रुप्पन बाबु और रंगनाथ  जैसे पढ़े लिखे हम जैसे लोग शुरूआती विरोध का भ्रम रच कर बाद में उसी सड़ी हुई व्यवस्था का अंग बनने को  बेबस है !!!
स्वर्गीय श्रीलाल शुक्ल जी को नमन !
इन्टरनेट प्रेमियों के लिए खुशखबरी ' राग दरबारी ' जो कि राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है , अब ऑनलाइन भी उपलब्ध है .

मंगलवार, 7 अगस्त 2012

बूंदों में जाने क्या ......नया है ?

अले याल फिल पानी गिलने लगा ,...तू भी तो अपने पापा से छतरी मँगा !

छई छप्पा छई ...चलो उठो ...फिर से खेलते है छई छप्पा छई !
अक्सर बच्चे ही बारिश की बूंदों का मजा ले पाते ....हमारे भीतर तो बचपना बचा ही नही है . अब देखो न कितने मजे से खेल रहे बच्चो के झुण्ड में जब एक बच्चा गिर जाता है , तो बाकि उसे उठाने को दौड़ पड़े है . और हम इसे देख कर बस इतना कह पाते है ........काश !
बरसे चाहे कितना भी  पानी , पर माँ कहती पढने से न करना आना-कानी
बारिश में सबसे बुरा लगता है , स्कूल जाना ! लेकिन मन मार कर जाना पड़ता है . और जब मम्मी मेरे लिए इतनी परेशान हो सकती है , तो मैं तो उनका लाडला राजकुमार स्कूल क्यों  नही जाऊंगा ? एएँ !
गिरा अबकी खूब पानी ...सड़क पे आ गयी जल की रानी लाओ बंसी पकडे मछली खूब सारी, माँ भी होगी खुश बनेगी इसी की तरकारी
अरे यार छोडो स्कूल ...वहां भी तो पानी टपक रहा है , चलो  मछली पकड़ते है .........देखो कौन सबसे ज्यादा मछली पकड़ता है ? अरे ...वो  देखो मछ्....छ्ली !!!!!!!!!!!
हम तो है बाल मजदूर , हर हाल में काम करने को मजबूर
माँ बीमार है , घर में पानी भरा है , बापू का पता नही , माँ की दवा लेने  के लिए पैसे की व्यवस्था भी तो करनी है . अब काम तो करना ही होगा ........घर पर माँ इन्तजार कर रही होगी ......मुझे नही खेलना .......लाया साब ....गर्म ही ला रहा हूँ !
बारिश चाहे करें कितनी भी खटपट , पर अपना धंधा न होने दूंगा  चौपट 
अरे साब , बारिश आप बड़े लोगो को ख़ुशी देती होगी , अपने लिए तो मुसीबत ही होती है ....अब देखो न , कल रात हुई तूफानी बारिश में दुकान बह गयी .किसी तरह  काम तो करना होगा , वरना पेट कैसे भरेगा ?
जब बारिश हो जोरदार , तब ऐसी करें आड़ , जय भारत और जय जुगाड़



सीप न सही मकड़ी होके भी है स्वाति की चाह , बोलो वाह वाह

बूंदों में जाने क्या ......नया है ?

एक बूंद में समायी सारी कायनात .......

मगर आजकल शहरी आपा-धापी में ऐसे नज़ारे देखने वाले लोग बारिश की खुबसूरत कहानियो को कहाँ पढ़ पाते है ?
आपको इन चित्रों के माध्यम से सुनाई गयी कहानियों में से कौन सी कहानी अच्छी लगी ? जरुर बताना

गुरुवार, 2 अगस्त 2012

तुम्हारे जाने से .........

सभी ब्लोगेर्स साथियों को पावन रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाये . रक्षाबंधन भारतीय संस्कृति का एक अनूठा त्यौहार है . इस दिन का सभी बहनों को बड़ी बेसब्री से इन्तजार होता है . लेकिन इस बार रक्षाबंधन के दिन मैं अपनी बहन को राखी बंधवाने के बाद  उसे जब स्टेशन छोड़ने जा रहा था , तो मन बड़ा व्यथित था .अभी तक तो सभी रक्ष्बंधन साथ मनाये थे , लेकिन उसकी शादी के बाद ये विछोह ...पुरानी यादों को फिल्म की रील की तरह फ्लेश बैक में ले जा रहा था . बचपन की बातों से लेकर अब तक की सारी बातें एक एक करके याद आ रही थी . वो बात -बात में लड़ना -झगड़ना , रूठना-मनाना और न जाने कितनी बातें ............
तुम्हारे जाने से, जीवन में एक कमी सी तो है 
आँखे कुछ ढूंढे  , इनमे भी नमी सी तो है 
दुनिया की रीत है, एक दिन था तुम्हे जाना 
आखिर क्यों कोई अपना , हो जाता बेगाना 
वो बचपन की बातें , वो होती तकरार 
बस तेरी याद बची , कहाँ  तेरा प्यार ?
मेरे लिए सब कुछ थी तुम , अब जाने कहाँ गुम
वो तुम्हारी बकबक , अब तुम्हारी तस्वीर गुमसुम 
हर पल हर लम्हा तुम्हारी याद दिलाता 
अब जाना, कि ये रिश्ता क्या कहलाता 
मुझे पता है , वहां तुम्हारी आँखों में भी होगा पानी 
 पर शायद , मिलना-बिछड़ना ही है जिंदगानी 
कैसे भूलूं , कैसे याद करूँ , प्यारी बहना 
जब बोलते आंसू , तो जुबाँ से कहना 
सोच के तुम्हारी मुस्कराहट , आंसू निकल आते 
काश ! फिर कहीं से वो बीते पल मिल जाते

बुधवार, 20 जून 2012

अपने को बौना पाता हूँ


इन लम्बे -लम्बे दरख्तों के बीच अपने को  बौना पाता हूँ 
इन जिंदगियों  की खरीद-फरोख्त के बीच , अपने को खिलौना पाता हूँ
कुछ हसीं चेहरों में न जाने क्यों खौफ  नज़र आता  है 
फैशन के नाम पर बदन  पर बस चिथड़ा नज़र आता है 
दर्दनाक चीखो में अपनी मुस्कान भी छीन गयी 
मौत के सौदागरों के बीच जिन्दगी  कहाँ गुम गयी 
पत्थर की इन दीवारों में, अपने लिए छोटा कोना पाता हूँ  
इन जिंदगियों  की खरीद-फरोख्त के बीच , अपने को खिलौना पाता हूँ  
हर तरफ छाई भीड़ पर तन्हाई ही दिखती  है 
पैसे हो गर जेब में , तो यहाँ हर चीज बिकती   है 
खो गये है हर रिश्ते-नाते , खो गया है अपनापन 
बस गयी है मतलब की दुनिया , मतलबी है हर मन 
यहीं रईसों के ठहाके , तो यहीं गरीबो की आँखों में रोना पाता हूँ 
इन जिंदगियों  की खरीद-फरोख्त के बीच , अपने को खिलौना पाता हूँ 
 

बुधवार, 13 जून 2012

एक अकेला पेड़ !

सोया  पेड़ के नीचे एक थका राही
तभी कहीं से एक दर्द भरी आवाज़ कराही
नींद खुली राही की , देखा चारो तरफ सुनसान 
एक अकेला पेड़ था, बाकि इलाका था वीरान 
क्या देख रहे हो तुम , अचरज होके आसपास 
मैं अकेला पेड़ बचा, बाकी का इंसानों ने किया नाश 
थी यहाँ भी हरियाली  , थे अनेक पशु और पक्षी 
सबका नाश किया मानव ने, बनके पर्यावरण भक्षी 
असहाय बनके खड़ा रहा , देखता रहा सहोदरों का नाश
मेरी बांहों को भी काट दिया, है अंतिम क्षण की आस 
क्या शत्रुता थी इन मनवो से, सदा  ही उनका कल्याण किया 
मीठे-मीठे फल  दिए उनको, और ऑक्सीजन  सा प्राण दिया   
पर वो हमारा मोल समझ न सका अब तक 
यूँ ही अपने पैरो पर कुल्हाड़ी मारेगा  कब तक
        

मंगलवार, 5 जून 2012

आज पर्यावरण दिवस पे फिर से कुछ ढोंग किया जाये !

आज पर्यावरण  दिवस पे फिर से कुछ ढोंग किया जाये
ताकि अपनी भी तस्वीर कल अखबारों में आ जाये
प्लास्टिक के फ्लेक्स पर छपवायें , सुन्दर पोस्टर
 पौधे लगाये उन्ही गमलो में , जिन्हें भूले थे पिछली बार रोपकर
इतनी गर्मी हो रही है , जल्दी से चलाओ  ए सी
भले ही कितना बढ़ जाये , दुनिया में सी ऍफ़ सी
काटने दो सारे जंगल, नए शहर बसायेंगे
जानवरों का क्या है , शहर में रहने आ जायेंगे
वैसे भी अब क्या फर्क जानवर  और इंसान में
वो रहते हा चिड़ियाघर में और हम रहते मकान में 
चलो बहुत हुआ , कुछ तो फोटो खिच जाये
आज पर्यावरण  दिवस पे फिर से कुछ ढोंग किया जाये
- मुकेश पाण्डेय "चन्दन "

गुरुवार, 31 मई 2012

भारत बंद !

आज भाजपा ने रखा भारत बंद
जो संसद में खाते  रहे कलाकंद
इतने घोटाले, इतनी महंगाई
फिर इनके मुह में लगी थी जंग
आपस में लड़ने से फुर्सत नही
और सड़क पर झंडा बुलंद
इतनी नाकारा  है सरकार
फिर भी न लगा सके  पेबंद
बस आम    आदमी हो परेशान
इसी शान में करते रहो भारत बंद
टू जी, आदर्श, कॉमन  वेल्थ
महंगाई , भ्रष्टाचार ,के कितने रंग
बस तुम करते रहना , भारत बंद
बंद की जगह , खोलो दिमाग  के ताले
तब देश का सुधरेगा रंग ढंग
फिर भी कुछ न कर सके
तो कार्लो अपनी दुकान बंद
-मुकेश पाण्डेय "चन्दन"  

रविवार, 27 मई 2012

अब मर रहे रहे है, ताल-तलैया

अब मर रहे रहे है, ताल-तलैया 
कहाँ गए  ?  उनमे थे जो नाव खिवैया
 नदियों के भी आंसू सूख गये 
अब कठौती में होती, जय गंगा मैया 
माँ थी कभी सारी नदिया 
आज मात् हंता बने हम सब भैया 
धरती का सीना, चीर के चूसा 
अब पानी को करते ता-ता थैया 
मार के कुल्हाड़ी अपने पैरो पर 
 समझदार बने है, आज सैंया
सारे जंगल काट दिए है हमने 
 और ढूंढ  रहे , क्रांकीट में छैंया
अब तो जागो , कुम्भकरणो
डूब रही है , चन्दन की नैया
-mukesh pandey "chandan"

सोमवार, 7 मई 2012

अजन्मी की पुकार

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अजन्मी की पुकार

सुना है माँ तुम मुझे , जीने के पहले ही मार रही हो
कसूर क्या मेरा लड़की होना , इसलिए नकार रही हो
सच कहती हूँ माँ , आने दो मुझे जीवन में एक बार
न मांगूंगी खेल-खिलौने , न मांगूंगी तुमसे प्यार
रुखी सूखी खाकर पड़ी रहूंगी, मैं एक कोने में
हर बात तुम्हारी मानूंगी , न रखूंगी अधिकार रोने में
न करुँगी जिद तुमसे , जिद से पहले ही क्यों फटकार रही हो
कसू क्या मेरा लड़की होना , इसीलिए नकार रही हो
माँ तुम भी तो लड़की थी, तो समझो मेरा दुःख
न करना मुझे दुलार, फ़िर भी तुम्हे दूंगी सुख
भइया से न लडूंगी , न छिनुंगी उसके खेल खिलौने
मेहनत मैं खूब करुँगी , पुरे करुँगी सपने सलौने
आख़िर क्या मजबूरी है , जो जीने के पहले मार रही हो
कसूर की मेरा लड़की होना , इसीलिए नकार रही हो
कहते है दुनिया वाले , लड़का-लड़की होते है सामान
तो फ़िर क्यों नही देखने देते , मुझे ये प्यारा जहाँ
आने दो एक बार मुझे माँ , फ़िर न तुम पछताओगी
है मुझे विश्वाश माँ, तुम मुझे जरूर बुलाउगी
क्या देख लू मैं सपने , जिसमे तुम मुझे दुलार रही हो
देकर मुझको जनम माँ, तुम मेरा जीवन सवांर रही हो


मेरे प्यारे दोस्तों मेरी ये कविता अब तक की श्रेष्ठतम एवं सर्वाधिक सराही गयी कविताओ में से एक है। इस कविता को लिखते समय मेरे मन में  देश में हो रहे भ्रूण हत्याओं से लगातार  कम हो रही लड़कियों की मार्मिक दशा थी ।इसे मैं पूर्व में भी अपने ब्लॉग पर पोस्ट कर चूका हूँ .  सचमुच जिस देश में कन्या को देवी माना जाता हो वहां कन्या भ्रूण हत्या वाकई शर्म की बात है । मेरी कविता का उद्देश्य केवल सराहना पाना नही है , बल्कि मैं चाहता हूँ की कोई बदलाव की बयार बहे .................
इस बदलाव में आपका साथ अपेक्षित  है , अपना सहयोग अवश्य दे क्योंकि हम कल भी देख सके
इसी आशा के साथ आपका अपना ही अनुज
- मुकेश पाण्डेय "चन्दन "

मंगलवार, 1 मई 2012

सत्यमेव जयते !

जब भी तनहा रहता हूँ , तो जीवन के बारे में सोचता हूँ . थोडा सा अध्यात्मिक सा होने लगता हूँ . सोच जन्म-मरण से भी आगे जाने लगती है . कभी भाग्य पर चिंतन होता है , तो कभी कर्म पर , कभी जीवन के औचित्य पर ही मन खुद से  सवाल करने लगता है . कभी जवाब  मिलते है तो कभी नही भी .....इसी उधेड़ बुन में लगा था, कि ये कुछ पंक्तियाँ उत्पन्न हुई .....

सत्यमेव जयते  !
हम हरदम ये कहते
पर आखिर क्या है सत्य ?
रहता जो शाश्वत
ये जीवन, ये धरा
ये ब्रम्हांड, ये परा
सब तो है नश्वर
बस सत्य है ईश्वर
लौकिक सत्य के पीछे क्यों भागें
 जब सब मिथ्या है , उसके आगे
बस सत्य सनातन !!
क्या प्राचीन, क्या अधुनातन ?
जन्म-मृत्यु आनी जानी है 
हम तुम बस झूठी कहानी है
 जीवन का क्या औचित्य है
राम नाम ही सत्य है !

सोमवार, 9 अप्रैल 2012

कैसे बनेगा देश महाशक्ति !

भारत में दुनिया के सबसे ज्यादा युवा है । इनकी आबादी लगभग ५५ करोड़ है , मगर इनमे से अधिकांश बेरोजगार है ! जहाँ विकसित देशो में जनसँख्या को संसाधन माना जाता है, वहीँ भारत में इसे बोझ माना जाता है। आज हम भारत को भविष्य की महाशक्ति कहते है , मगर किस हिसाब से यह महाशक्ति हो पायेगा ? आज सामरिक शक्ति के आधार पर किसी भी देश को महाशक्ति नही माना जाता है ( पाकिस्तान और उत्तर कोरिया जैसे देशो के पास भी नाभिकीय हथियार है ) आज बौद्धिक संसाधन ही महा शक्ति बनने का मुख्य आधार है , कहने को हम भारतीय प्रतिभा का लोहा मानते नही थकते है ! मगर ये भारतीय मेधा शक्ति कितनी कारगर है ? आज़ादी के बाद हमने कितने अविष्कार किये ? कितने विश्वस्तरीय खोजे हुई ? हम अपने विज्ञान और कला के बलबूते दुनिया को तो ठीक अपने ही देश को क्या दे पाए है ? हमारे यह नोबल पुरस्कार पाने वालो की संख्या अँगुलियों पर ही गिनने लायक है , उनमे से भी अधिकतर भारतीय मूल के है , अगर भारत में रहते तो शायद ही कुछ कर पाते !
आखिर हम इस युवा शक्ति के आधार पर विश्व की महाशक्ति बनेंगे , जिसके बारे में कहा जाता है , कि भारत में हर वर्ष ३३ लाख लोग स्नातक होते है , मगर उनमे से १० % को ही मनचाहा रोजगार मिल पाता है । भारत में हजारो इंजीनियरिंग कोलेज है , जिनमे से निकलने वाले १५ % ही उस डिग्री के योग्य होते है। आज भारत में मेनेजमेंट और सॉफ्टवेर कंप्यूटर सॉफ्टवेर जैसे प्रोफेशनल डिग्री बांटने वाले लाखो संसथान है , मगर ये संसथान बाजार में उपलब्ध नौकरियों के योग्य युवा नही दे प् रहे है । मतलब नौकरियों की कमी नही है , मगर उन नौकरियों के योग्य युवा नही है । हमारे यहाँ के शिक्षा संस्थान सिर्फ नाम की डिग्रियां बाँट रहे है । आज हमारे यहाँ के उच्च शिक्षित युवाओ में बहुत ही कम युवाओ को उस स्तर का ज्ञान है ।
अगर हम इसके कारण को देखे तो कई कारण मिलेंगे । जैसे - सबसे पहले तो हमारी शिक्षा प्रणाली ही गलत है । यह डेढ़ सौ साल पुराणी अंग्रेजो की क्लर्क पद्धति पर आधारित है । इसमें सिर्फ रटंत विद्या पर ही जोर दिया जाता है , न की विषय को समझने पर । हमारी शिक्षा प्रणाली की एक कमी यह है, कि हमारे यहाँ प्रथ्मिल शिक्षा को कभी महत्त्व नही दिया गया है । जबकि प्राथमिक शिक्षा ही देश के विकास का आधार है । इसी के फलस्वरूप हमारे देश के भविष्य का आधार ही कमजोर होता है ,तो आगे कि इमारत का गिरना तय ही है । प्राथमिक शिक्षा पर सरकार का कितना ध्यान है , ये इससे ही पता चलता है , कि देश में इतने शिक्षा आयोग और समितियां बनाई गयी , मगर उनमे एक भी प्राथमिक शिक्षा के लिए नही थी । हमारे देश में प्राथमिक शिक्षक को इतना कम वेतन दिया जाता है , कि योग्य शिक्षक इस ओर आते ही नही , नतीजतन कमजोर या मजबूर शिक्षक देश का आधार तैयार करते है , रटंत प्रणाली के माध्यम से !
खैर हम अगर इन बातों को नजरंदाज़ कर भी दे तो , माध्यमिक शिक्षा के बाद कुछ और मुसीबतें छात्रो के सर पर आन पड़ती है । मतलब कभी भी छात्रो को अपने मन का विषय लेने की छूट नही होती है , या तो अभिवाभाक अपने अधूरे सपने अपने बच्चो के माध्यम से पूरा करना चाहते है । या फिर दुसरो की देखा सीखी विषय चयन किया जाता है । ये भी नही देखा जाता कि बच्चा उस विषय में कमजोर है या उसकी रूचि है । फिर उच्च शिक्षा में तो पूरी तरह व्यवसायीकरण हो गया है । अब संस्थानों को शिक्षा कि गुणवत्ता से तो कोई मतलब सा नही रह गया है । खैर जैसे तेसे डिग्री मिलने के बाद बेरोजगार बन भटकने का दौर शुरू होता है । फिर मजबूरन छोटी मोटी जो भी नौकरी हाथ लगी कर लेते है । सबसे बुरी स्थिति तो हमारे देश में शोध कि है । हमारे विश्व विद्यालय तो सही शोध कि परिभाषा ही भूल गये है ।
एक बार उच्चतम न्यायलय के तत्कालीन मुख्य न्यायधीश न्यायमूर्ति श्री के० जी० बालकृष्णन ने कहा था - " इस देश को तो भगवान् ही चला रहा है "

गुरुवार, 15 मार्च 2012

रेल का मजेदार सफ़र



आजकल रेल की बड़ी चर्चा है । लेकिन मैं यहाँ उस कारन से चर्चा नही करना चाहूँगा । मैं आम आदमी की उस रेल की चर्चा करना चाहूँगा , जिससे हमरा वास्ता पड़ता है। भारतीय रेल दुनिया में सबसे अधिक यात्री ढोती है । हर दिन इतने यात्री धोती है , जितने कि दुनिया के कई देशो कि आबादी भी नही है । भारत में लगभग सभी का वास्ता जीवन में कभी न कभी रेलयात्रा से जरुर पड़ा है । रेल यात्रा ........ये शब्द वैसे तो आम आदमी को थोडा सा डरावना लगता है (अगर रिजर्वेशन नही मिला है )। मगर बहुत सी रेलयात्राएँ बड़ी यादगार बन जाती है । कई बार रेल में मिले लोगो से बड़े आत्मीय सम्बन्ध बन जाते है ।
अगर मैं अपना और रेल का सम्बन्ध जोडू तो बहुत पुराना नाता है। मेरे पिताजी श्री सुरेश पाण्डेय जी इसी रेल महकमे में मुलाजिम (सिग्नल विभाग, सोनपुर, बिहार ) है । मेरे नाना जी मध्य प्रदेश में पुलिस विभाग में थे । इस कारन बहुत छुटपन से ही रेलयात्रा का सुख (सुख इसलिए क्योंकि पिताजी जो रेलवे में है )मिला । अक्सर रेलवे पास पर मुफ्त की रेलयात्रा की । बहुत बार कई यादगार वाकये हुए जो आज भी यदा कदा याद आ जाते है ।
रेलवे से जुडी मेरी एक मजेदार कविता प्रस्तुत है

रात का समय था, और रेल का सफ़र
कुछ बेटिकटों ने मेरी सीट पर कब्ज़ा, लगवाया नीचे बिस्तर
जैसे तैसे रात गुजरने के पहले आया वो अनजाना शहर
सुबह होने तक सोचा, कुछ नींद लेलू प्लेटफार्म पर
नींद खुलने पर शर्त सहित सामान गायब, था मैं बनियान पर
सर चकरा रहा था , जैसे हो क्लोरोफार्म का असर
जूते भी नदारद, शुक्र है पैंट पर न गयी उनकी नज़र
बेहाल हो मैं ढूंढ रहा था, रेलवे पुलिस को इधर-उधर
थाने पंहुचा तो देखा सो रहे थे, कुछ बनियानधारी मेरे जैसे नर
जगाया उन्हें तो चिल्लाये, नींद ख़राब करता है, कर दूं अन्दर
मैं लुटा-पिटा हूँ, कुछ चोरो की मुझ पर हुई टेढ़ी हुई नज़र
सोचा मदद करेंगे आप, रिपोर्ट लिखाने आया हूँ इधर

खुद सामान का ध्यान रखते नही, और आ जाते है , यहाँ करने खबर
क्या तुम वी0आई०पी० हो या रिश्तेदार, जो तुम्हारी स्थिति न हो बदतर
मैंने भी दिमाग लड़ाया , रेलमंत्री का हूँ रिश्तेदार, और भाई है इसी विभाग में अफसर
ये सुनते ही सैल्यूट मरी उनने। हुए पसीने से तर-ब -तर
एक चाय लेने दौड़ा , दूसरा बोला - माफ़ कर दो सर
आप जो वी०आइ०पी० है, इसलिए आपका सामान है सिक्युर्ती पर
इतना कहते ही उसने फोन लगाया, कुछ बुदबुदाया फोन पर
अभी तक जो गरजे थे, नरम पड़ गयी उनकी नज़र
दो आदमी आये लेकर मेरा सामान , कहिये तो पंहुचा दूं आपके घर
इसे कहते है भैया, हिन्दुस्थान में रिश्तेदारी का असर

orchha gatha

बेतवा की जुबानी : ओरछा की कहानी (भाग-1)

एक रात को मैं मध्य प्रदेश की गंगा कही जाने वाली पावन नदी बेतवा के तट पर ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा हुआ. बेतवा की लहरों के एक तरफ महान ब...