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शनिवार, 14 सितंबर 2019

भेड़ाघाट का प्राचीन चौसठ योगिनी मंदिर !

नमस्कार मित्रों,
इस 17 जुलाई को जबलपुर उच्च न्यायालय एक केस के सिलसिले में जाना हुआ , उच्च न्यायालय से जल्दी फुरसत होने पर भेड़ाघाट की ओर रुख किया । हालाँकि पहले भी कई बार भेड़ाघाट स्थित धुंआधार जलप्रपात की खूबसूरती देखी है, लेकिन इस बार चौसठ योगिनी मंदिर जाना मुख्य उद्देश्य था ।
                                                                                     जबलपुर के पास स्थित भेड़ाघाट नर्मदा नदी के विहंगम जलप्रपात धुंआधार और संगमरमर की खूबसूरत चट्टानों के बीच बहती नर्मदा के खूबसूरत दृश्यों के लिए प्रसिद्द है । लेकिन भेड़ाघाट में एक प्राचीन चौसठ योगिनी मंदिर भी महत्वपूर्ण स्थल है । जिसकी जानकारी बहुत कम लोगो को होती है । पूरे भारत में कुछ ही प्राचीन चौसठ योगिनी मंदिर है, जिनमे से तीन मध्य प्रदेश में ही है । एक चौसठ योगिनी मंदिर मुरैना जिले के मितावली गांव में स्थित है । गोलाकार आकृति में बने इस मंदिर को भारतीय संसद के स्थापत्य की प्रेरणा कहा जाता है । मितावली स्थित चौसठ योगिनी मंदिर 9 वीं सदी में गुर्जर प्रतिहार शासक देवपाल गुर्जर में बनवाया था। इसके अलावा चौसठ योगिनी मंदिर, छतरपुर जिले में विश्व विरासत स्थल खजुराहो में भी चौसठ योगिनी का एक ध्वस्त मंदिर है। यह खजुराहो का सबसे प्राचीन मंदिर है, जो अब भी विद्यमान है। किन्तु यह अकेला ऐसा मन्दिर है जिसका आकार गोल न होकर आयताकार है। यह 9 वीं सदी में चंदेल शासकों द्वारा बनवाया गया था । ये तो हुए मध्य प्रदेश के चौसठ योगिनी मन्दिरो की बात अब मध्य प्रदेश के बाहर स्थित मंदिरों की बात करें तो उड़ीसा में भुवनेश्वर के निकट हीरापुर तथा बोलनगीर के निकट रानीपुर में हैं। इस तरह से देखा जाये तो पूरे भारत में कुल 5 प्राचीन चौसठ योगिनी मंदिर है । जिनमे 4 गोलाकार और 1 आयताकार आकृति में बने है । इन पांचों का निर्माण काल 9-10  सदी है । लेकिन सभी अलग अलग शासकों द्वारा बनवाये गये है । 
                                              आमतौर पर हिन्दू मंदिर वर्गाकार होते हैं और इनका विन्यास रेखीय होता है। अधिकतर मंदिरों में ईश्वर का मुख पूर्व दिशा की ओर होता है। दूसरी ओर गोलाकार योगिनी मंदिरों में ईश्वर का मुंह हर दिशा की ओर होता है। हालांकि, कुएं जैसी इन संरचनाओं का प्रवेश द्वार पूर्व की ओर ही है। मंदिरों की आम पहचान गुम्बद, शिखर या विमान इन मंदिरों में नहीं हैं। वास्तव में इन मंदिरों की तो छत ही नहीं है। उड़ीसा के हीरापुर तथा रानीपुर के योगिनी मंदिरों की अंदरूनी दीवारों पर योगिनियों की प्रतिमाएं हैं, सभी का मुंह केंद्र में बने मंदिर की ओर है। मध्यप्रदेश के भेड़ाघाट और मितावली मंदिरों में सभी योगिनियों के अलग-अलग मंदिर हैं जिनकी छतें तो हैं परंतु वे सभी गोलाकार प्रांगण की ओर खुलते हैं। योगिनियों की प्रतिमाएं हीरापुर, रानीपुर तथा भेड़ाघाट के मंदिरों में अच्छी हालत में हैं। खजुराहो के मंदिर में केवल तीन प्रतिमाएं बची हैं, जबकि मुरेना के मितावली मंदिर में कोई प्रतिमा नहीं है। 
                                                                            ये तो हुआ भारत में बने चौसठ योगिनी मन्दिरों के बारे में परिचय । अब हम बात करते है , अपनी चौसठ योगिनी मन्दिर की यात्रा की । उच्च न्यायालय के कार्य से मुक्त होते ही हम चल पड़े अपनी कार से भेड़ाघाट की ओर । मौसम भी सुहावना होकर हमारा साथ दे रहा था । बादल छाए हुए थे, और हवा चल रही थी । हम गूगल मैप की सहायता से मुख्य सड़क से न होकर गलियों से होकर भेड़ाघाट पहुँचे । कई बार गूगल महाराज पर गुस्सा भी आया कि कहां गलियों में भटका रहा है , लेकिन अंत भला तो सब भला । अभी मानसून आने में देरी थी , गर्मी अपने चरम पर थी , इसलिए भेड़ाघाट के धुआंधार जलप्रपात में पानी कम ही था । यहां एक बात बताना चाहूंगा कि भेड़ाघाट जगह का नाम है, जबकि नर्मदा नदी के जलप्रपात का नाम धुंआधार है । इस बार हमने रोप वे का प्रयोग करके नर्मदा के शानदार नजारे देखे । हालांकि जलप्रपात के भ्रमण के बारे में अगली पोस्ट में विस्तार से लिखूंगा । फिलहाल चौसठ योगिनी मन्दिर की यात्रा पर ही वापिस आते है । जलप्रपात देखने के बाद हम भेड़ाघाट शहर (कस्बा नुमा) की ओर आगे बढ़े । और एक पहाड़ी पर पत्थर की सीढ़ियां चढ़ कर हम चौसठ योगिनी मन्दिर पहुंचे । पसीने से लथपथ जब ऊपर पहुंचे तो वहां से नर्मदा नदी का दृश्य अद्भुत था । किसी ने बताया कि जल्दी दर्शन कर ले , अन्यथा मन्दिर बंद होने वाला है । उनकी बात मानते हुए हम मन्दिर के अंदर प्रवेश किये । गोलाकार आकृति में बने मन्दिर की बाहरी दीवालों पर चौसठ योगिनियों की अद्भुत प्रतिमाएँ बनी हुई है । यह देखकर दुख हुआ, कि सभी प्रतिमाएँ खण्डित है । कहानी वही मुस्लिम आक्रमण कारियों द्वारा इन प्रतिमाओं को खंडित किये जाने की । खैर योगिनियों की फ़ोटो लेने के बाद मन्दिर के बीचोबीच बने गर्भ गृह की ओर बढे । गर्भगृह के ऊपर लगा ध्वज बता रहा था, कि ये जाग्रत मन्दिर है, अर्थात यहां नियमित पूजा होती है । मतलब गर्भ गृह की मूल प्रतिमा खण्डित नही है । अंदर पहुँचे तो देखा गर्भ गृह में भगवान शिव और उनकी अर्धांगिनी पार्वती जी नंदी बैल पर सवार है । मन्दिर के पुजारी के अनुसार यह विश्व में इस तरह की एकमात्र ऐसी प्रतिमा है । मैंने भी कभी इस तरह नन्दी आरूढ़ उमा-महेश्वर की प्रतिमा देखी या सुनी नही है । सामान्यतः शिव मंदिर में शिवलिंग ही प्रतिष्ठित होते है । प्रतिमा भी बड़ी आकर्षक थी । शिव-पार्वती  के बगल में में ही कार्तिकेय और गणेश की प्रतिमाएं विराजमान थी, मतलब पूरा शिव परिवार ही विराजमान था।  
                                                                                   मन्दिर के अंदर सीसीटीवी कैमरे लगे थे, और मन्दिर के अंदर की फ़ोटो न खींचने की मनाही वाली चेतावनी लिखी थी । चेतावनी पढ़कर मन मायूस हुआ , मगर एक कोशिश करने में क्या हर्ज है ?  यही सोचकर मैंने पुजारी जी से फ़ोटो खीचने के बारे में पूछा तो उन्होंने सीसीटीवी की पहुँच से बाहर होकर फ़ोटो खींचने की अनुमति दे दी । अंधा क्या चाहे दो आंखे ! हमने भी मोबाइल से ही जल्दी जल्दी कुछ फोटो ली । फिर भगवान को प्रणाम कर बाहर निकल आये । आज बड़ी पुरानी इच्छा पूर्ण हुई । अभी तक दो चौसठ योगिनी मन्दिर देख लिए एक खजुराहो वाला और दूसरा ये भेड़ाघाट का । अब मुरैना और ओडिसा के मंदिर बाकी है । 

चौसठ योगिनी मंदिर की बाहरी बनावट 
मंदिर के भीतरी प्रांगण में स्थित शिव मंदिर 
मंदिर के गर्भगृह में नंदी पर आरूढ़ शिव-पार्वती और बगल में उनका परिवार



योगिनी की खंडित खंडित प्रतिमा 
























मंदिर में स्थित शिवलिंग 














मंदिर के बाहर  मैं 
इस पोस्ट में इतना ही अगली पोस्ट में धुआंधार जलप्रपात के खूबसूरत नजारें देखेंगे।

शुक्रवार, 29 जून 2018

ताजमहल की छत पर आइंस्टीन !!

ताजमहल की छत पर आइंस्टीन 
भारत में लगभग हर घुमक्कड़ या पर्यटक का सपना होता है , कि वह अपनी जिंदगी में एक बार ताजमहल जरूर देखे।  यहां तक विदेशी पर्यटक भी भारत घूमते वक़्त ताजमहल घूमना चाहते है।  विदेशी राजप्रमुख भी अपने व्यस्त दौरे में ताजमहल के लिए समय निकल ही लेते है।  तो इसी तरह से हमारी भी बचपन से इच्छा थी, कि हम भी ताजमहल के दीदार करे।  जब 2007 में दुनिया के नए अजूबों के लिए प्रतियोगिता चल रही थी , तो हमने भी ताजमहल के समर्थन के लिए ताबड़तोड़ सात कवितायेँ लिख डाली और दैनिक भास्कर में भेज भी दी , अब सात कवितायेँ तो नहीं छपी , हाँ एक कविता की चार लाइन जरूर छाप गयी थी।  वही दूसरी तरह टुच्चे से लोग अपनी ताजमहल के साथ फोटो भेज दें तो तुरंत छप रही थी। खैर " वक़्त के गाल पर ठहरे हुए आंसू  " (गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने ताजमहल के लिए कहा था  ) के लिखी कविताओं के लिए हमने भी गाल पर आंसू बहा लिए।  ये तो हुई पुरानी बातें अब आते है , ताजमहल की वर्तमान यात्रा के सन्दर्भ के बारे में ...  तो मेरे बेटे अनिमेष के दूसरे जन्मदिन (25 अप्रैल ) पर मेरे साढ़ू और बड़ी साली आने वाले थे, और उन्हें ताजमहल देखने जाना था। हालाँकि मेरा मन नहीं था ,क्यूंकि गर्मी अपने चरम पर थी, और आगरा में गर्मी भी भीषणतम रूप में पड़ रही है।  लेकिन जब ससुराल पक्ष से प्रस्ताव आया तो मन मारकर भी जाना ही पड़ेगा।  खैर जन्मदिन के बाद आनन -फानन में कार्यक्रम बनाया।  आगरा में गॉइड मित्र आशीष कुमार के माध्यम से होटल में रूम बुक कराया।  उस दिन विवाह के लग्न अधिक होने से बड़ी मुश्किल से कमरे मिले , और इधर ओरछा में बड़ी मुश्किल से इनोवा।  अब 28 अप्रैल को हम चल पड़े 6 व्यस्क और 3 बच्चे आगरा की ओर......  झाँसी , दतिया , ग्वालियर , मुरैना , धौलपुर होकर आखिरकार 6  घंटे में आगरा पहुँच ही गए।   
आगरा पहुंचकर होटल सीरीस 18 में चेक इन किया , होटल बढ़िया था।  हमारे होटल पहुँचने के कुछ देर बाद ही हमारे मित्र आशीष भाई भी सपरिवार आ गये, साथ आगरा का मशहूर पंछी पेठा लेकर आये  थे ।  आशीष भाई का अधिकार पूर्वक आग्रह था , कि आज का रात्रिभोज उनकी तरफ से होगा।  हम न भी नहीं कर सकते थे , आखिर इलाहबाद में हमारे संघर्ष के साथी का जो आग्रह था।  हम लोग फ्रेश होने के बाद फतेहाबाद में ही केसर रेस्टोरेंट आशीष भाई के साथ पहुँचे।  आशीष भाई की पत्नी यानि हमारी भाभी जी और उनके बच्चो से हम पहली बार मिल रहे थे , मगर लगा ही नहीं कि पहली मुलाकात है।  उसी दौरान आगरा में रहने वाले एक और मित्र रितेश गुप्ता जी को भी कॉल किया , तो वे भी अपनी बाइक से केसर रेस्टोरेंट आ गए और रितेश जी भी हमारे लिए पेठा लेकर आये ।  रितेश जी सोशल मीडिया का एक जाना-माना नाम है।  रितेश जी सफर है सुहाना  नाम से एक यात्रा ब्लॉग भी लिखते है। घुमक्कड़ी दिल से फेसबुक ग्रुप के एडमिन भी है।  इस ग्रुप में देश-विदेश के लगभग 14 हजार से भी ज्यादा सदस्य है।  खैर आज का दिन का सफर हमरे लिए दिल से सुहाना हो गया था।  भोजन पश्चात् हम होटल वापिस हुए।  आशीष भाई से सुबह 6 बजे तैयार मिलने का कहकर विदा लिया। 
                                                      29 अप्रैल की सुबह हम दुनिया के सात आश्चयों  में से एक आश्चर्य को देखने 6 बजे तैयार हो गए।  आशीष भाई के आते ही हम निकल पड़े।  आशीष भाई ने कल ही बता दिया था , कि ताजमहल में कोई भी खाने-पीने की सामग्री अन्य अतिरिक्त सामान न रखे , क्यूंकि शुरुआत में ही सिक्योरिटी चेक में सब बाहर ही रखवा दिया जायेगा।  तब भी हमारी श्रीमती जी पेठा अपने बैग में डालकर आ गयी।  सिक्योरिटी चेक में ही पेठा बाहर निकलवा दिया गया , उसे फेंकने से अच्छा हम लोगों ने उसे खा लिया।  एक चीज और बताना चाहूंगा , जितने भी लोग ताजमहल देखने जा रहे हो , टिकट लेते समय सबका परिचय पत्र अवश्य साथ रखे।  हमारे साथ तो आशीष भाई थे, तो कोई दिक्कत नहीं हुई।  वरना  कई बार बिना परिचय पत्र के टिकट ही नहीं देते।  आतंकवादियों की हिटलिस्ट में होने के कारण ताजमहल में सिक्योरिटी के इतने चोचले है।  खैर सुरक्षा भी जरुरी है। ताजमहल के बाहर ही जुते-चप्पलो का कवर मिलता है , क्यूंकि आप सीधे जुते चप्पल पहने ताजमहल के अंदर नहीं जा सकते।  हमने भी बाहर ही शू कवर खरीद लिए , क्यूंकि अंदर महंगे भी मिलते है।  अब हम चल पड़े दीदारे ताज के लिए  ------सबसे पहले शाही दरवाजे से ताज का हल्का -हल्का दीदार होने लगा।  दरवाजे के पास हमने एक ग्रुप फोटो खिंचवाई फिर दरवाजे में से प्रवेश किया। अंदर घुसते ही लोगों का सैलाब दिखा , हर तरह लोग मोबाइल और कैमरा लेकर ताज के साथ खुद को कैद करने में लगे थे।  जिन जगहों से ताजमहल की अच्छी फोटो आ सकती है, वहां कतारबद्ध होकर इंतजार करना पड़ता था।  कई बार तो जबरन भीड़ में घुस कर जगह बनानी पड़ती थी।  हमने भी घुसते ही भीड़ में घुसकर जगह बनाई और फोटो खिंचवाई।  ग्रुप फोटो आशीष भाई खींच रहे थे। 
शाही दरवाजे से अंदर आने के बाद हम चारबाग में आ चुके थे।  ये बाग मुख्य मकबरे और मुख्य द्वार के मध्य बनाया गया है।  इसके बीचोबीच एक नहर बनी है , जिसमे फब्बारे लगे है।  नहर के पानी में ताजमहल का सुन्दर प्रतिबिम्ब दिखता है।  नहर के किनारे कतारबद्ध पेड़ लगे हुए है।  ये बाग फ़ारसी बाग की तर्ज पर बने है , जिसका भारत में पहली बार प्रयोग बाबर ने किया था। सामन्यतः मुग़ल बागों के मध्य में मंडप या मकबरा बाग के बीचोबीच बने है , जबकि इसके उलट ताजमहल में मकबरा बाग के आखिर में बना है।  हालाँकि यमुना के दूसरी तरफ मेहताब बाग होने से वास्तुकार यमुना और मेहताब बाग को शामिल कर ताजमहल को बीच में ही मानते है।  वर्तमान में जो बाग में पेड़-पौधे लगे है , मुगल शैली के नहीं बल्कि ब्रिटिश शैली के है।  जी हाँ , अंग्रेजो ने अपने शासन के दौरान जीर्ण - शीर्ण हो चुके बाग़ की जगह ब्रिटिश शैली का बाग लगवाया।  अंग्रेजो से एक इतिहास में पढ़ा किस्सा याद आया।  अंग्रेज खुद को दुनिया में सर्वश्रेष्ठ मानते थे , तो वे ये कैसे स्वीकार कर सकते थे , कि दुनिया की सबसे सुन्दर ईमारत अंग्रेजो ने नहीं मुगलो ने बनाई।  तो उन्होंने ताजमहल को नीलाम करने का ठान लिया।  सौभाग्य से ताजमहल को खरीदने वाला कोई खरीददार नहीं मिला।  और ताजमहल बिकने से बच गया।  खैर अंग्रेजों  ने ताजमहल से भी खूबसूरत इमारत भारत की तात्कालिक राजधानी कोलकाता में बनवाना शुरू की , संगमरमर से बनी ये ईमारत खूबसूरत तो बनी , लेकिन ताजमहल से खूबसूरत न बन सकी।  अंग्रेजों ने अपनी इस खूबसूरत ईमारत का नाम अपनी महारानी विक्टोरिया के नाम पर विक्टोरिया मेमरियल नाम रखा।  आज ये कोलकाता में है।    
अब ताजमहल  के बारे में कुछ परिचयात्मक जानकारी दे दूँ , हालाँकि ताजमहल किसी परिचय का मोहताज  नहीं है।  फिर भी एक सैलानी या घुमक्कड़ को एक जिज्ञासा तो रहती ही है।  वर्तमान में ताजमहल को हिन्दू या मुस्लिम ईमारत होने पर चर्चा गरम है।  लेकिन इस चर्चा को इतिहासकारों और वास्तुकारों के लिए छोड़ उन जानकारियों की चर्चा करेंगे जो अभी तक सर्वमान्य है।  अभी तक इसलिए क्यूंकि इतिहास भी नई नई खोजों के हिसाब से बदलता रहता है।  जैसे 1921 के पहले भारत का इतिहास सिर्फ ऋग्वैदिक काल (1500 ईसापूर्व ) तक ही सिमटा था , लेकिन रायबहादुर दयाराम साहनी की सिंधु घाटी सभ्यता की खोज ने भारतीय इतिहास को 5000 वर्ष पीछे ही नहीं धकेला बल्कि दुनिया को ये बताया कि जब दुनिया में लोग अभी जंगली अवस्था में थे , तब हम भारतीय नगरीय सभ्यता का निर्माण कर चुके थे।  अब आप सोच रहे कि मैं ताजमहल से कहाँ सिंधु घाटी पहुँच गया ! तो आपको बता दूँ, कि ताजमहल भी उसी तरह नदी के किनारे बना है , जिस तरह से सिंधु घाटी के लोग अपनी इमारतें बनाते थे।  वैसे इतिहास की किताबों में मैंने लाजबर्द मणि के बारे में सिंधु घाटी और ताजमहल में प्रयोग होते पढ़ा है।  खैर अब सीधी बात नो बकवास ! 
जैसा कि सभी जानते है , कि ताजमहल का निर्माण मुग़ल बादशाह शाहजहां ने अपनी प्रिय बेगम मुमताज महल के मरने के बाद उसकी याद में किया था।  हालाँकि मुमताज महल  की मौत प्रसव पीड़ा के दौरान वर्तमान मध्य प्रदेश के बुरहानपुर नामक जगह पर हुई थी।  उपेक्षा के कारण बुरहानपुर  ताजमहल खंडहर सा पड़ा है। अब वापिस आगरा लौटते है, शाहजहां को जहाँ इमारतों को बनवाने का शौक था , वही उसे संगमरमर बहुत प्यारा लगता था , उसने संगमरमर की इमारतों का निर्माण तो करवाया ही था , साथ ही पहले से बनी इमारतों पर संगमरमर की परतें भी चढ़वाई थी।  जैसे अपने पिता जहांगीर द्वारा बनवाई मोती मस्जिद पर संगमरमर चढ़वाया था।  तो ताजमहल बनवाने के वक़्त भी उसने संगमरमर को चुना।  मुमताज ने अपने पिता एतमाद-उल्ला के मकबरे में पिट्रा ड्यूरे शैली 
Jump to navigationJump to searchपोप क्लेमेण्ट अष्टम, पीट्रा ड्यूरे में
(पीट्रा ड्यूरे या पर्चिनकारी, दक्षिण एशिया में, या पच्चीकारी हिन्दी में), एक ऐतिहासिक कला है। इसमें उत्कृष्ट पद्धति से कटे, व जड़े हुए, तराशे हुए एवं चमकाए हुए रंगीन पत्थरों के टुकड़ो से पत्थर में चित्रकारी की जाती है। यह सजावटी कला है। इस कार्य को, बनने के बाद, एकत्र किया जाता है, एवं अधः स्तर पर चिपकाया जाता है। यह सब इतनी बारीकी से किया जाता है, कि पत्थरों के बीच का महीनतम खाली स्थान भी अदृश्य हो जाता है। इस पत्थरों के समूह में स्थिरता लाने हेतु इसे जिग सॉ पहेली जैसा बानाया जाता है, जिससे कि प्रत्येक टुकडा़ अपने स्थान पर मजबूती से ठहरा रहे। कई भिन्न रंगीन पत्थर, खासकर संगमरमर एवं बहुमूल्य पत्थरों का प्रयोग किया जाता है। यह प्रथम रोम (इटली) में प्रयोग की दिखाई देती है 1500 के आसपास। ) का सुन्दर प्रयोग किया था। भारत में सबसे पहले इस शैली का प्रयोग मुमताज बेगम के अब्बाजान के मकबरे में ही हुआ। उसी शैली का प्रयोग ताजमहल में भी किया गया। ताजमहल की बाहरी दीवारों में इस्लाम में वर्जित मानवाकृति के अंकन का प्रयोग न करके सिर्फ विभिन्न ज्यामितीय आकारों को उकेरा गया है।  ऊपरी हिस्से में कुरान की आयतों को लिखा गया है।  ये आयतें फ़ारसी लिपि में अमानत खां द्वारा संगमरमर पर जैस्पर से लिखा गया है।  जैसे ही हम ताजमहल के अंदर करते है , तो प्रवेश द्वार पर जो आयात लिखी है , उसका अर्थ है -

 हे आत्मा ! तू ईश्वर के पास विश्राम कर। ईश्वर के पास शांति के साथ रहे तथा उसकी परम शांति तुझ पर बरसे।   
जाहिर है , ये आयत मुमताज बीबी के लिए लिखवाई गयी होंगी।  खैर हम जब अंदर प्रवेश करते है , तो शांति तो नहीं , बल्कि उमस भरी गर्मी जरूर हम पर बरसी।  कारण अंदर कम जगह में अधिक भीड़ होना था।  लेकिन  शाहजहां और मुमताज की नकली कब्रों की पच्चीकारी देखकर मुंह खुला का खुला रह गया।  अंदर एक अटेंडेंट एक पत्थर पर टॉर्च से रौशनी डाल रहा था , और वह पत्थर चमक उठा। शाहजहां और मुमताज की असली कब्रे नीचे के तल में है , जो साधारण ही है , क्यूंकि इस्लाम में कब्रों पर ज्यादा नक्काशी की मनाही है।  मतलब हमने जो कब्रें देखी वो नकली थी , और सिर्फ दिखाने के लिए बनवाई गयी थी।  खैर भीड़ और गर्मी से हलाकान होकर हम पीछे की तरफ से बाहर आये। बाहर आते ही आशीष भाई ने गुम्बद की डायमंड कटिंग के साथ ही गुम्बद पर कुछ अलग ही दिखाया।  जी हाँ गुम्बद पर एक आकृति 20 सदी के महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन के चेहरे जैसी लग रही थी।  (क्रमशः अगले भाग में जारी )
तब तक आप चित्रों का आनंद लीजिये 




ताजमहल का प्रवेश द्वार 

ताजमहल का पहला दीदार 

ताजमहल का पूरा दीदार 
प्रवेश द्वार का प्रतिबिम्ब 
ताज की एक मीनार सूरज के सामने 
ताज का एक अलग एंगल 
ताज की छत पर हमे आइंस्टीन का चेहरा भी नजर आया 
ताज अलग नजर से 
ताज की मुंडेर पर हमें बाल जटायू (इजिप्शियन वल्चर ) भी दिख गए 
हमारा घुमक्कड़ी दल 
हमारे मित्र और हम 
ताजमहल का प्रतिबिम्ब 

रविवार, 10 जून 2018

एक किला जहाँ पूरी बारात ही गायब हो गयी


बुंदेलखंड भारत के इतिहास में एक उपेक्षित क्षेत्र रहा है, जब हम भारतीय इतिहास को पढ़ते हैं ,तो हमें बुंदेलखंड के बारे में बहुत कम या कहें की नाम मात्र की ही जानकारी मिलती है । जबकि बुंदेलखंड की धरती वीरभूमि रही है यहां पर समय समय पर वीर पैदा हुए । बुंदेलखंड की बात चले और हम बुंदेला शासको के  दिनों को याद ना करें यह तो संभव ही नहीं क्योंकि बुंदेले ने  ही तो बुंदेलखंड की स्थापना की ।

                                                      मैंने अपनी ओरछा गाथा सीरीज  में बुंदेलखंड की स्थापना का जिक्र किया है, और बुंदेलखंड की पहली राजधानी बनने का गौरव टीकमगढ़ जिले में स्थित गढ़कुंडार नामक स्थान को प्राप्त हुआ है । बुंदेलों की राजधानी बनने के पूर्व गढ़ कुंडार खंगार वंश की राजधानी रहा और खंगार वंश के प्रतापी राजा खेत सिंह (10 वी सदी )  ने स्थान का पल्लवन पुष्पन किया । राजा खेतसिंह खंगार पृथ्वीराज चौहान के सेनापति रहे थे , उन्होंने पृथ्वीराज की तरफ से कई युद्धों में वीरता का परिचय दिया था , इसी से खुश  होके  पृथ्वीराज ने उन्हें गढ़कुंडार की रियासत प्रदान की।  मुहम्मद गोरी से पृथ्वीराज की हार  बाद  खेतसिंह ने स्वयं को स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया था। 14 वी सदी में  खंगारों से छीनकर बुंदेला शासकों ने गढ़कुंडार को अपनी राजधानी बनाया ।
                                    वर्तमान में गढ़ कुंडार मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले में निवाड़ी तहसील के अंतर्गत आता है । यह झांसी छतरपुर सड़क मार्ग पर निवाड़ी से 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है जबकि झांसी से इसकी दूरी लगभग 58 किलोमीटर है । यहां का नजदीकी रेलवे स्टेशन निवाड़ी है । जो झांसी मानिकपुर रेलवे लाइन पर स्थित है । वर्तमान में गढ़ कुंडार एक छोटा सा कस्बा है और यहां पर दर्शनीय स्थलों में गढ़कुंडार का प्रसिद्ध किला गीद्द वाहिनी का मंदिर तालाब आदि देखने योग्य स्थल हैं । शासन की उपेक्षा के कारण यहां पर बहुत कम लोग ही आते हैं । हां प्रतिवर्ष दिसंबर माह में 27 से 29 दिसंबर तक मध्य प्रदेश शासन द्वारा तीन दिवसीय गढ़ कुंडार महोत्सव का आयोजन किया जाता है । यह महोत्सव भी खंगार जाति का महोत्सव बनकर रह गया है , जबकि से पर्यटन गतिविधियों के साथ जोड़कर और अधिक सफल बनाया जा सकता था ।
अब किले  के कुछ इतिहास पर नजर डाली जाए ।

किले का इतिहास

-यह किला चंदेल काल में चंदेलों का सूबाई मुख्यालय और सैनिक अड्डा था।
- यशोवर्मा चंदेल (925-40 ई.) ने दक्षिणी-पश्चिमी बुंदेलखंड को अपने अधिकार में कर लिया था।
- इसकी सुरक्षा के लिए गढ़कुंडार किले में कुछ निर्माण कराया गया था।
- इसमें किलेदार भी रखा गया। 1182 में चंदेलों-चौहानों का युद्ध हुआ, जिसमें चंदेल हार गए।
- इसमें गढ़कुंडार के किलेदार शियाजू पवार की जान चली गई।
- इसके बाद यहां नायब किलेदार खेत सिंह खंगार ने खंगार राज्य स्थापित कर दिया।
- 1182 से 1257 तक यहां खंगार राज रहा। इसके बाद बुंदेला राजा सोहन पाल ने यहां खुद को स्थापित कर लिया।
- 1257 से 1539 ई. तक यानी 283 साल तक किले पर बुंदेलों का शासन रहा।
- इसके बाद यह किला वीरान होता चला गया। 1605 के बाद ओरछा के राजा वीर सिंह देव ने गढ़कुंडार की सुध ली।
- वीर सिंह ने प्राचीन चंदेला युग, कुठारी, भूतल घर जैसे विचित्र तिलिस्मी गढ़ का जीर्णोधार कराकर गढ़कुंडार को किलों की पहली पंक्ति में स्थापित कर दिया।
- 13वीं से 16 वीं शताब्दी तक यह बुंदेला शासकों की राजधानी रही।
- 1531 में राजा रूद्र प्रताप देव ने गढ़ कुंडार से अपनी राजधानी ओरछा बना ली।

घूमने आई पूरी बारात में हो गई थी गायब..
- बताया जाता है कि काफी समय पहले यहां पास के गांव में एक बारात आई थी। बारात में शामिल 50 से 60 लोग किला घूमन आए। यहां वे किले के अंडरग्राउंड वाले हिस्‍से में चले गए। नीचे गए सभी लोग आज तक वापस नहीं लौटे। इसके बाद भी कुछ इस तरह की घटनाएं हुईं। इन घटनाओं के बाद किले के नीचे जाने वाले सभी दरवाजों को बंद कर दिया गया। किला बिल्‍कुल भूल-भुलैया की तरह है। अगर जानकारी न हो तो ज्‍यादा अंदर जाने पर कोई भी खो सकता है। भूलभुलैया और अंधेरा रहने के कारण दिन में भी यह किला डरावना लगता है।
- गढ़कुंडार को लेकर वृन्दावनलाल वर्मा ने उपन्यास भी लिखा  है। इस उपन्यास  में गढ़कुंडार के कई रहस्य दर्ज किए गए हैं।

                                    गढ़ कुंडार इतिहास प्रेमियों के लिए आज भी आकर्षित करता है और इसी आकर्षण में बंद कर मैं अभी तक 5-6   बार इस जगह जा चुका हूं । यह किला अपनी खूबसूरती के साथ-साथ महत्वपूर्ण सुरक्षा व्यवस्था के लिए जाना जाता है । ऊंचाई पर बने इस किले से आसपास का बहुत ही सुंदर नजारा दिखाई देता है । किले का निर्माण सामने एक पहाड़ी के सापेक्ष इस तरह किया गया है , कि जब हम सड़क मार्ग से किले की ओर आते हैं , तो दूरी पर किला नजर आता है । जैसे जैसे ही हम उसके नजदीक पहुंचते हैं यह दिखाई देना बंद हो जाता है । ऐसा कहा जाता है, कि यह किला सात मंजिला है , जिसमे जमीन  ऊपर तीन मंजिल है, और चार मंजिल जमीन के नीचे बने है।  हालाँकि   दरवाजे सुरक्षा की दृष्टि से बंद कर दिए गए है।  गढ़कुंडार का किला बौना चोर के लिए भी प्रसिद्ध रहा है । कहते है कि उसकी लंबाई 52 अंगुल (साढ़े तीन फुट ) थी, इसलिए उसे बौना चोर कहते थे । कुछ लोग उसका नामकरण 52 चोरियों की वजह से कहते हैं । कहा जाता है कि बोना चोर एक ऐसा चोर था जिससे तत्कालीन समय का बुंदेलखंडी रॉबिनहुड कहा जा सकता है । यह धनाढ्य व्यक्तियों को पहले से चेतावनी देता था , कि वह उसके यहां चोरी करेगा और उनकी तमाम सुरक्षा व्यवस्थाओं को चकमा देकर वह चोरी करने में सफल हो जाता था । धनाढ्यों से लूटे गए धन से वह गरीबों और जरूरतमंदों की मदद भी करता था  । इसलिए वह क्षेत्र में लोकप्रिय था।  बौना चोर धन के  लिए धन लोलुप लोगों किले में बहुत खुदाई भी की है।  फ़िलहाल किले की सुरक्षा के लिए मध्य प्रदेश पुरातत्व विभाग ने प्राइवेट सुरक्षा एजेंसी के कुछ गार्ड नियुक्त किये है , जो दिन में आने वाले लोगो के लिए गाइड का भी काम करते है।   
                            गढ़कुंडार में ही गिद्धवाहनी देवी का मंदिर है।  गिद्ध वाहिनी मंदिर मूलतः विंध्यवासिनी देवी का मंदिर है । उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के विंध्याचल में स्थित विंध्यवासिनी देवी बुंदेलों की कुलदेवी हैं । ऐसी मान्यता है , कि  विंध्यवासिनी ही  बुंदेलों की सहायता करने के लिए विंध्याचल से गिद्ध पर बैठकर गढ़कुंडार आई इसलिए उन्हें यहां पर गिद्ध वाहिनी कहा गया । गिद्धवाहिनी मंदिर के बाहर एक बहुत ही खूबसूरत गिद्ध की प्रतिमा की बनी हुई है । साथ ही मंदिर से लगा हुआ एक बड़ा तालाब है जो इस जगह की खूबसूरती में चार चांद लगा देता है । इस तालाब में सर्दियों में कई प्रकार के प्रवासी पक्षी भी आते है।  हालाँकि पिछले कई सालों  के सूखे के कारण हाल -बेहाल है।
बुंदेलखंड के अन्य दर्शनीय स्थल -
ओरछा
देवगढ़
टीकमगढ़
दतिया
झाँसी
खजुराहो
पन्ना
कालिंजर


गढ़कुंडार किले का प्रवेश द्वार ( हालाँकि दरवाजा नया लगा है ) 
प्रवेश द्वार  से दिखता किला 
किले का एक बुर्ज 
किले में प्रवेश करते ही बनी भूलभुलैया 

किले की भूलभुलैया में में रोशनी के लिए छत में रोशनदान बने है।  (अभी सुरक्षा की दृष्टि से जाली लगाई गयी है।  ) 
किले की दीवार पर शुकदेव जी 
किले का जर्जर हिस्सा 

किले के अंदर का विहंगम दृश्य 
किले की सबसे ऊपरी मंजिल 
किले से शाही प्रवेश द्वार का रास्ता 
किले के पास बनी प्राचीन बाबड़ी  जो कभी किले वासियों की प्यास बुझती होगी।  
छत पर बनी डिजायन  
किले से दिखता गिद्धवाहिनी मंदिर और सूखा पड़ा तालाब 
गढ़कुण्डार के तालाब में प्रवासी पक्षी 
सुधा घर्षण यन्त्र (जिसका आज भी पुनर्निर्माण में प्रयोग होता है।  )

orchha gatha

बेतवा की जुबानी : ओरछा की कहानी (भाग-1)

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