शनिवार, 4 अप्रैल 2020

एक अनजान हसीना के साथ यादगार सफर


नमस्कार मित्रों, वैसे तो पूरी जिंदगी ही एक सफर है , और हम सब यात्री होने के साथ साथ किसी न किसी के हमसफ़र है । खैर मेरी हर यात्रा में कोई न कोई हमसफ़र अवश्य ही रहा है, क्योंकि मुझे अकेले घूमने में मजा नही आता । तो बड़ा मुश्किल होता है , किसी एक यात्रा को चुनकर उसमें एक हम सफर चुनने का ।  चलिए आज एक ऐसे हमसफ़र के बारे में बताते है , जो मेरे लिए आज भी गुमनाम है । बात आज से लगभग 13 साल पहले यानी 2006 के बरस की है । मैं इलाहाबाद में सिविल सेवा की तैयारी कर रहा था । कुछ दिन की दीपावली की छुट्टियां हुई थी, तो बक्सर (बिहार) गया था । फिर वहां से सागर (म0प्र0) अपने नाना जी के पास आना था, क्योंकि माताजी वही थी । बक्सर से हम लोग (मैं और मेरा मंझला भाई निकेश)  श्रमजीवी एक्सप्रेस से वाराणसी आये और वाराणसी से सागर के लिए कामायनी एक्सप्रेस पकड़ी । सामान्यतः कामायनी एक्सप्रेस पूर्वांचल से मुंबई जाने वाले मजदूरों और नौकरीपेशा लोगों से भरी रहती है, लेकिन दीपावली के कारण लोग अपने घरों को लौट रहे थे । इसलिए लोकमान्य तिलक टर्मिनस जाने वाली ट्रेन में लोक कम ही मान्य हो रहा था । दीपावली नजदीक होने के बावजूद उस साल सर्दी अभी ढंग से आई नही थी, लिहाजा हम दोनों भाई एक पतली सी टी शर्ट ही पहने थे । खैर तयशुदा कार्यक्रम अनुसार हम दोनों शयनयान श्रेणी डिब्बे की अपनी सीट पर बैठ गए । हमारी सीट के सामने वाली सीट पर मेहंदी किये लाल बाल और दाढ़ी वाले एक बुजुर्ग मुस्लिम तशरीफ़ रखे थे । बाकी का डिब्बा खाली ही था । हम दोनों भाई आपस में ही बतिया रहे थे । ट्रेन ने सीटी बजाई जो इस बात का इशारा था, कि  छुकछुक गाड़ी यहां से रुखसत होने वाली है । मैं वाराणसी जंक्शन को विदा देने डिब्बे के दरवाजे पर आ खड़ा हुआ । ट्रेन झटके के साथ आगे बढ़ने लगी अभी रफ्तार धीमी ही थी, स्टेशन अपनी भीड़ के साथ पीछे सरकने लगा । तभी एक नवयौवना कंधे पर बैग टांगे मेरी तरफ हाथ बढ़ाये दौड़ी चली आ रही थी । ट्रेन की रफ्तार के साथ मेरे दिल की धड़कन भी तेज होने लगी , तभी मोहतरमा चिल्लाई...मेरा हाथ पकड़ो ! मैंने भी फिल्मी स्टाइल में हाथ बढ़ा दिया और उन्हें अपनी तरफ खींच लिया । अब वो ट्रेन के अंदर आ चुकी थी । ट्रेन और हृदय की रफ्तार तेज हो चुकी थी । हम मानो जागी आंखों से ख्वाब देख रहे थे । साइड हटिये...प्लीज ! की आवाज़ से मेरी तन्द्रा टूटी ।
पूरा डिब्बा खाली था, तो वो नवयुवती हमारी सीट की साइड लोवर बर्थ पर बैठ गयी । मैं भी अपनी सीट पर आया तो देखा निकेश बाबू ऊपर की बर्थ पर चादर तान चुके है । सामने बैठे मौलवी जी अपनी दाढ़ी खुजाते हुए कुछ फ़ारसी में पढ़ रहे है ।  हमने भी अपनी सीट पर आसन जमाया । नवयुवती अपना बैग सीट के किनारे पर लगाकर  उसे तकिया बनाकर उस पर टिककर पैर फैलाकर बैठ गयी थी ।
पूरे डिब्बे में हम चार लोग ही थे । ट्रेन अपनी पूरी रफ्तार में आ गयी थी । खिड़की के बाहर पेड़, खेत , मकान तेजी से पीछे भागने लगे थे । कुछ देर ट्रेन की खटर-पटर सुनने के बाद मैंने अपनी खटर-पटर चालू करने का फैसला किया ।
नमस्कार अंकल  !
जवाब में मौलवी जी  अपनी किताब में से बिना सर उठाये सिर्फ सिर हिला दिया ।
आप कहाँ तक जाएंगे ?
जौनपुर
मतलब आपने बनारस से जौनपुर जाने के लिए रिजर्वेशन करवाया है ?
नही , हम डेली पैसेंजर है । एमएसटी
ओह, मतलब आप बनारस में काम करते है और जौनपुर के रहने वाले है ?
हाँ ,
तभी मैंने कनखियों से देखा तो नवयुवती मेरी तरफ ही देख रही थी । तो मैंने देखकर मुस्कुरा दिया ।
प्रत्युत्तर में भी हल्की सी मुस्कान मिली । तो मैंने मौलवी साहब को किताब में गड़ा देखकर अपना मुंह साइड बर्थ की ओर घुमा लिया ।
मेरे सिर घुमाते ही नजरे दो-चार हुई , उधर मुस्कान थोड़ी लम्बी हुआ और इधर बांछे (शरीर मे जहां कही होती हो ) खिल गयी ।
आप कहाँ तक जाएंगी ?
जी, इलाहाबाद !
अरे, वाह ! इलाहाबाद में ही तो मैं भी सिविल सर्विस की तैयारी कर रहा हूँ । (मैंने रोब जमाने के हिसाब से कहा )
इलाहाबाद में लोग सिविल सर्विस की तैयारी करने आते है, और कुछ साल बाद मास्टर बन जाते है ।  उसकी मुस्कान अब हंसी में बदल गयी ।
नही, उनमे कुछ सफल भी होते है ।
सिर्फ कुछ ही
जी, जो दृढ़निश्चय के साथ मेहनत करते है , वो सफल ही होते है ।
कोई उत्तर नही मिलने पर मैं भी कुछ देर चुप बैठा रहा ।
माहौल की खामोशी को रेल की खटर पटर और मौलवी साहब की बुदबुदाहट तोड़ रही थी ।  अब नवयुवती खिड़की से नजारे देखने लगी । तो हम भी अपनी तरफ वाली खिड़की की तरफ खिसक आये ।  ट्रेन कुछ धीमी सी होने लगी शायद कोई स्टेशन आने वाला था , लेकिन खिड़की से देखने पर ऐसी कोई संभावना नजर नही आ रही थी ।  तभी ट्रेन धीमी होती हुई खड़ी हो गयी , सामने खेतों में जुताई चल रही थी, ट्रैक्टर के पीछे पीछे बगुले झुंड के झुंड में कीड़े खाने के लिए मंडरा रहा और इधर मेरे मन में कई विचार मंडरा रहे थे । तभी एक जोरदार सीटी के साथ बगल की पटरी से एक ट्रेन धड़धड़ाती गुजर गई ।  इसी ट्रेन को गुजारने के लिए हमारी ट्रेन रोक दी गयी थी । अब हमारी ट्रेन भी रेंगने लगी थी , खिड़की में से खेत , ट्रेक्टर और बगुले पीछे छूटने लगे थे ।  मौलवी जी की बुदबुदाहट के साथ मेरे भाई के खर्राटे ताल मिलाने लगे ।  ट्रेन की रफ्तार के साथ खड़खड़ाहट भी तेज होने लगी ।  दूर क्षितिज में सूरज लाल चुनरियाँ फैलाये डूबने की तैयारी में था । ट्रेन की तेजी बढ़ गयी, मगर सूरज अपनी रफ्तार से था । पंछियों के झुंड अपने घोंसलों में लौटने लगे थे ,  जैसे इस ट्रेन में भी लोग त्यौहार के समय अपने अपने घर लौट रहे थे । ट्रेन अपनी रफ्तार में थी ।  नवयुवती खिड़की से बाहर देख रही थी, मौलवी जी अभी भी किताब में गड़े हुए थे, हम भी बोर होने लगे तो बैग से 'प्रतियोगिता दर्पण' निकाल कर पलटने लगे ।  देश-दुनिया की जानकारी में हम उलझने वाले थे, कि नवयुवती की आवाज आई ।
क्या आप मेरी खिड़की का कांच बन्द कर देंगे , मुझसे हो नही रहा ।
मैं अनमने भाव से उठा , खिड़की  का कांच बंद कर अपनी सीट पर लौट आया ।
दो बार मदद करने का कोई अहसान नही । खैर हमे क्या ? हम फिर देश-दुनिया की जानकारी में घुसने वाले थे , कि उधर से एक मधुर आवाज आई । थैंक यू ! 
मैंने  देश-दुनिया की जानकारी में से निकलकर देखा कि नवयुवती के अधरों पर मुस्कुराहट तैर रही है । मैंने भी औपचारिकता वश यॉर वेलकम कह दिया ।
मगर इस बार नवयुवती की आंखों में मुझे नमी सी दिखी, जिसने मुझे पुनः देश-दुनिया की जानकारी में उलझने नही दिया ।  खैर हिम्मत कर मैंने उससे पूछा - इलाहाबाद में आपका घर है ?
नही, इलाहाबाद में मेरी एक सहेली रहती है , उसी के पास जा रही हूँ ।
लेकिन लोग त्यौहार पर अपने घर जाते है, और आप सहेली के पास जा रही है !
मैं अपने घर से भाग रही हूं !
क्या ?
मेरे जोर से क्या बोलने पर मौलवी जी ने गर्दन ऊपर उठाई और मेरी तरफ देखा , फिर किताब में ही गड़ गए ।  मैं खिसक कर साइड बर्थ की तरफ आया ।
आप अपने घर से क्यों भाग रही हो ?
मैं आगे पढ़ना चाहती हूं, और मेरे घरवाले मेरी शादी करना चाहते है ।
तो आप अपने घरवालों को समझा सकती है , भागना कोई सही विकल्प नही है ।
मैं उन्हें समझा समझा कर हार गई हूं, इसलिए मैंने ये फैसला लिया ।
खिड़की के बाहर आसमान अंधेरे के गिरफ्त में आ चुका था ।
आपने ये फैसला बिल्कुल भी गलत लिया । आखिर  आपके घरवाले  भी तो सोच समझकर ये फैसला ले रहे होंगे।
मेरे पिता जी एक छोटी सी नौकरी करते है, और उन पर 4 बेटियों का बोझ है । मैं सबसे बड़ी बेटी हूँ । बेटे की चाह  में चार बेटियां हो गयी , अब किसी तरह से सबकी शादी करनी है ।  कहते है , रिटायरमेंट के पहले चारों की शादी निपटानी है ।
एक तरह से आपके पिता की सोच सही है , लेकिन आप इस तरह से घर से भागकर  अपने पिता की समस्या बढ़ा ही रही है । और लड़कियों को बोझ मानने की सोच को विस्तार दे रही है ।
तो मैं क्या करूँ ? मुझे अभी शादी नही करनी  , मुझे आगे  पढ़ना है ।
आप अपने पिता से एक बार फिर से बात कीजिये और उनसे अपने लिए 2 साल मांगिये , साथ ही हो सके तो  आप पढ़ाई के साथ कोई पार्ट टाइम जॉब भी कर लीजिए , जिससे उनकी आर्थिक मदद भी हो सके । आप अपने पिता का गर्व बनिये न कि शर्म
!  सोचिए गांधी जी के चार बेटे थे, उन्हें आज कोई भी नही जानता है , जबकि नेहरू जी की सिर्फ एक ही बेटी थी, जिसकी वजह आज भी लोग नेहरू जी को याद करते है ।
खिड़की के बाहर उजाला बढ़ने लगा था  । शायद कोई स्टेशन आने वाला है ।
मेरी बातों से वो युवती सहमत नजर आई । और जौनपुर स्टेशन पर गाड़ी रुकते ही , उसने अपना बैग उठाया । आप सही कह रहे । मेरे पापा मेरे लिए परेशान हो रहे होंगे । मैं वापस बनारस जा रही हूं । आपने मेरी आँखें खोल दी । धन्यवाद ....और वो जौनपुर स्टेशन पर उतर गई ।
मौलवी साहब भी अपनी बुदबुदाहट खत्म कर किताब में से उखड़े और स्टेशन की ओर रुखसत हुए । अब शोरगुल बढ़ने लगा , लोग डिब्बे में चढ़ने लगे । और मैं देश-दुनिया की जानकारी में उलझने की कोशिश करने लगा ।

बुधवार, 25 मार्च 2020

मध्य प्रदेश की एक खूबसूरत अनछुई जगह पन्ना

 आपको पन्ना जिले के मेरे अनुभव से यात्रा करवाते है ।

मेरा स्थानांतरण जब मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में हुआ , तो अधिकांश व्यक्तियों ने नकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त की । क्योंकि पन्ना मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र का सबसे पिछड़ा जिला है । खैर काम कही करना है, तो हम 2 सितंबर को पन्ना जिले में जॉइन करने निकल पड़े ।  अपनी कार से जब छतरपुर से सतना मार्ग पर  बमीठा (यहाँ से 9 किमी दूरी पर खजुराहो है ।)  से आगे निकला तो सड़क के दोनों किनारे सागौन का जंगल शुरू हो गया । जगह जगह पन्ना टाइगर रिजर्व के साइन बोर्ड जिन पर बाघ के होने की चित्रमय सूचना दी थी , मिलने शुरू हो गए । मेरे ड्राइवर ने मुझसे पूछा - सर यहां से सचमुच शेर गुजरते है या वन विभाग ने डराने के लिए ये बोर्ड लगाए है ।  मैंने अपना ज्ञान बघारते हुए कहा -  नही, यहां 50 से ऊपर बाघ है । एक समय यहां बाघ समाप्त हो गए थे, फिर 2009 में बाघ पुनर्स्थापना की शुरुआत हुई और तत्कालीन फील्ड डायरेक्टर मूर्ति जी और स्टॉफ की कड़ी मेहनत ने पन्ना टाइगर रिजर्व को फिर से बाघों से आबाद किया । और आज दूसरी जगहों पर पन्ना से बाघ भेजे गए । पन्ना टाइगर रिजर्व दुनिया पहला और इकलौता टाइगर रिजर्व है , जहाँ बाघों की संख्या शून्य होने के बाद उनका पुनर्वास सफलता पूर्वक किया गया है , बल्कि अब दुनिया भर के टाइगर रिजर्व यहाँ इस बात का प्रशिक्षण लेने आते है । पन्ना टाइगर रिजर्व में बाघों के अलावा तेंदुआ, रीछ, लकड़बग्घा, जंगली सुअर, सांभर , चीतल, नीलगाय जैसे जानवर बहुतायत में है । यहां के सांभर अनुकूल परिस्थितियों के कारण आकार में बड़े और हष्ट पुष्ट होते है । सांभर बाघों का प्रिय भोजन है । हालांकि हमे भी सांभर बड़ा पसंद है, लेकिन डोसा और इडली के साथ । 
                                              
                         अब हम पांडव गुफा और जलप्रपात के पास से गुजर रहे थे । मैंने 2013 में यह स्थान देखा था । यहाँ खूबसूरत झरने के पास कुछ गुफाएं भी बनाई गई है । जिनके बारे में कहा जाता था, कि इन्हें पांडवों ने अपने अज्ञातवास में बनाया था । खैर पांडव प्रपात से थोड़े आगे घाटी चढ़े ही थे, कि सड़क किनारे एक गाड़ी खड़ी लेकिन उसमें से कोई व्यक्ति बाहर नही निकला । सब खिड़की से जंगल की तरफ झांक रहे थे । तभी एक वन विभाग की बोलेरो आई और वो भी जंगल की तरफ देखने लगे । हम भी उत्सुकता वश रुक गए  और पूछा क्या हुआ ? तो गाड़ी वाले एक व्यक्ति ने जंगल की तरफ इशारा करके कहा - वहाँ टाइगर है ! फिर क्या था , हमारी बांछे (शरीर मे जहाँ भी होती हो ) खिल उठी । और हमने न केवल जी भर टाइगर देखा बल्कि उसका भरी दोपहरी में मोबाइल से वीडियो बनाया । बाद में मुझे पता चला कि हमने जो बाघ देखा था, उसका नाम कन्हैया है । इसके नामकरण की भी रोचक दास्तान है । किसी अन्य बाघ के साथ इलाके की लड़ाई में इसकी एक आंख नही रही । इसलिये इसे काणा (एक आंख वाला) नाम दिया , कुछ लोगों ने काणा को कान्हा समझा । फिर कान्हा को सुधार कर कन्हैया कर दिया गया । यह एक आंख होने के कारण अंदर घने जंगल में न रहकर सड़क किनारे के क्षेत्र में रहने लगा है, क्योंकि यहाँ कम मेहनत में आसपास के गांवों के पालतू पशु आसानी से मिल जाते है । और दूसरे किसी बाघ का इलाका न होने के कारण सुरक्षित भी है ।  कन्हैया बाघ के जाने के बाद हम भी चल पड़े , अपना दिन बन चुका था । जहाँ लोगो को हजारों खर्च करने के बाद बाघ नही दिखता हम मुफ्त में ही सड़क किनारे बाघ देख लिए वो भी तब जब टाइगर रिजर्व बन्द रहता है । (जुलाई से सितम्बर तक)
                                  अब हम पन्ना शहर में प्रवेश किये और पन्ना के सबसे ज्यादा प्रसिद्ध और पूज्यनीय मन्दिर जुगलकिशोर मन्दिर पहुँचे । मध्यकालीन बुंदेला शैली में बना भव्य मंदिर के अंदर गर्भगृह में कृष्ण और राधा की प्रतिमा है । कहते है कि कृष्ण जी की प्रतिमा की मुरली और मुकुट में हीरे जड़े है । बात सही भी है, क्योंकि पूरे भारत में सिर्फ पन्ना जिले में ही हीरे की खदानें है । यहाँ की एशिया की सबसे बड़ी हीरे खुली खदान यही पर मझगंवा में है , जिसका संचालन राष्ट्रीय खनन विकास कॉर्पोरेशन (एन एम डी सी) द्वारा किया जाता है । दर्शन पश्चात हमने अपनी नौकरी जॉइन की ।
                                 अगले दिन हम पन्ना के दूसरे प्रसिद्ध मंदिर बलदेव जी के मन्दिर गए । इस मंदिर की बड़ी तारीफ सुनी थी, और यह उससे भी ज्यादा खूबसूरत निकला । यह दुनिया का इकलौता मन्दिर है, जो चर्च की स्थापत्य शैली में बना है । इसके वास्तुकार इटली के मेल्स है, जिन्होंने 1921 में राजा रुद्रदेव के आदेश पर यह बेहद खूबसूरत मन्दिर बनाया । 16 कलाओं के स्वामी बलराम को समर्पित इस मंदिर में 16 गुम्बद, 16 दरवाजे, 16 खिड़कियां, 16 स्तंभ, 16 सीढ़ियां है । अंदर चमकदार काले ग्रेनाईट से बलराम जी की सुंदर मूर्ति है, पीछे शेषनाग बने हुए है । इस मंदिर का स्थापत्य हर किसी को मोहित कर सकता है । इसके पास में ही दो भव्य मंदिर है । जिनमे से एक जगन्नाथ स्वामी मंदिर है , जो बना तो बुंदेला स्थापत्य शैली में है , मगर अंदर प्रतिमा पुरी के जगन्नाथ मंदिर की प्रतिकृति ही है । यहां पुरी की तरह ही भव्य रथयात्रा निकाली जाती है । बलदेव जी मन्दिर के दूसरी तरह गोविंद जी का मन्दिर है । जहाँ भगवान कृष्ण की सुंदर प्रतिमा स्थापित है ।
                              तीसरे दिन आफिस के बाद हम फिर शहर घूमने निकल पड़े । इस बार पड़ाव था , प्राणनाथ मन्दिर । दुनिया का मकबरा शैली में संगमरमर से बना यह शानदार मन्दिर प्रणामी सम्प्रदाय के संत प्राणनाथ जी को समर्पित है । प्राणनाथ जी बुंदेला वीर शासक महाराज छत्रसाल के आध्यात्मिक गुरु थे । प्रतिवर्ष शरद पूर्णिमा पर बहुत बड़ा मेला लगता है , जिसमें प्रणामी सम्प्रदाय के लाखों अनुयायी देश-विदेश से आते है । इसके बाद गली से निकलते ही पुराना कलेक्ट्रेट भवन मिला । महेंद्र भवन के नाम से विख्यात यह इमारत एक समय पन्ना राजघराने का महल था, जिसे प्रशासनिक भवन बना दिया गया । यह मध्य प्रदेश का सबसे खूबसूरत कलेक्ट्रेट भवन था । अब नई इमारत बनने से इसे खाली कर दिया गया है , भविष्य में इसमे  हेरिटेज होटल बनना प्रस्तावित है । इससे थोड़े आगे चलने पर रामजानकी मन्दिर है । इस मंदिर में अंदर दीवारों पर तुलसीकृत रामचरित मानस की सभी चौपाइयां, दोहे आदि लिखे हुए है । गर्भगृह में राम जानकी की मनमोहक प्रतिमा है ।
अब अगले दिन रविवार पड़ गया । छुट्टी के दिन क्या करें ? तो गूगल महाराज का सहारा लिया तो पता चला नए कलेक्ट्रेट के पास ही किलकिला नदी पर कलकल जलप्रपात है । शहर के इतने पास जलप्रपात देख बड़ी खुशी हुई । बायपास रोड पर जब कलकल जलप्रपात पहुँचे तो मजा आ गया । जलप्रपात के पास ही चट्टानें इस तरह है, मानो कोई महापाषाणीय समाधि हो । पास में शिवमंदिर भी है । वही एक व्यक्ति से जलप्रपात के बारे में पूछताछ करने पर पता चला कि इसी नदी पर आगे 2 किमी जंगल में  कौआसेहा जलप्रपात इससे भी बड़ा और खूबसूरत है । अंधा क्या चाहे दो आंखे और हम अकेले ही गड्डी लेकर निकल पड़े जंगल की ओर । तब किलकिला नदी ने ही हमारा रास्ता रोका । पास से गुजर रहे लकड़हारे लड़के से मैंने कौआसेहा जलप्रपात जाने के अन्य विकल्प का पूछा तो उसने बताया रास्ता तो यही है , वैसे नदी में पानी ज्यादा नही है, गाड़ी आसानी से पार हो जाएगी । लेकिन मेरी हिम्मत नही हुई, तो उसे पहले नदी पार करने को कहा जब वो नदी पार हो गया तब हमने अपनी गाड़ी पार की । कुछ देर बाद जब हम जलप्रपात के नजदीक पहुँचे तो नजारा अविस्मरणीय था । स्थानीय भाषा में सेहा का अर्थ कुंड या प्रपात होता है । कौआसेहा जलप्रपात देखने ने छत्तीसगढ़ के तीरथगढ़ जलप्रपात जैसा लगता है । शहर के इतने नजदीक जंगल मे इतना शानदार जलप्रपात होने के बाद भी भीड़ न होना आश्चर्यजनक है । बाद में इसका कारण पता चला कि मॉनसून में पन्ना और आसपास ढेर सारे झरने जाग्रत हो जाते है ।
                             अब अगले दिन जब मैंने अपने कार्यालय के सहयोगियों को दोनो झरनों की फ़ोटो दिखाई तो उन्होंने कहा - अभी आपने बृहस्पति कुण्ड का झरना तो देखा ही नही । उसके आगे पन्ना के सारे झरने बच्चे है । अब बृहस्पति कुण्ड देखने की इच्छा जोर मारने लगी । इंटरनेट पर मैंने बृहस्पति कुण्ड खोज कर देखा वास्तव में बड़ा खूबसूरत झरना है । अगले दिन सुबह सुबह अपने उन्ही सहयोगियों के साथ पन्ना से 35 किमी दूर बृहस्पति कुण्ड पहुँचे । वहाँ का दृश्य देखकर दिल गार्डन गार्डन सॉरी झरना झरना हो गया । बाघिन नदी पर बना यह एक ज्वालामुखी कृत जलप्रपात है । घोड़े के नाल की आकृति में बाघिन नदी जब नीचे घाटी में गिरती है, तो गिरने से पहले दिल लूट लेती है । बृहस्पति कुंड जलप्रपात का क्षेत्र प्राकृतिक रूप से तो मनभावन है ही , साथ ही धार्मिक-पौराणिक, ऐतिहासिक,आर्थिक रूप से भी महत्वपूर्ण है  । एक कथा अनुसार देवगुरु बृहस्पति ने यहां पर यज्ञ किया था । ऋषि मुनियों के अनेक आश्रम भी यहाँ रहे है । त्रेता युग में भगवान राम अपने चित्रकूट वनवास काल में सीता और लक्ष्मण के साथ यहाँ ऋषि-मुनियों के दर्शन करने आये । ( चित्रकूट यहां से जंगल के रास्ते से लगभग 50 किमी होगा।) यहाँ की गुफाओं और चट्टानों पर आदिमानवों द्वारा हजारों साल पहले बनाये शैलचित्र है । एक शैलचित्र में तो जिराफ जैसे जानवर को देखकर आश्चर्यचकित रह गया । चूंकि भारत का प्रायद्वीपीय भाग पहले अफ्रीका से जुड़ा था, तो हो सकता है यहां जिराफ रहे हो । अधिकांश शैलचित्रों में शिकार , आदिमानवों की तत्कालीन गतिविधियाँ और वन्य जीवों के चित्र है । आर्थिक महत्व के रूप में इस जलप्रपात के आसपास हीरे की खदानें भी है । खदान का नाम सुनते ही हमारे जेहन में बड़ा सा गड्ढा सामने आता है । जबकि पन्ना में हीरे ही 3-4 फुट की उथली खदानें है । पन्ना के आसपास किम्बरलाइट चट्टाने बहुतायत में पाई जाती है । जिनमें हीरे पाए जाते है । जमीन में जिन जगहों पर किम्बर लाइट के पत्थर ज्यादा होते है , वहाँ लोग जमीन के हिस्से का हीरे उत्खनन का लाइसेंस ले लेते है, फिर वहाँ की मात्र 3-4 फुट की खुदाई कराई जाती है , पत्थरों के बीच हीरा खोजा जाता है । यहाँ उत्कृष्ट किस्म का हीरा मिलता है । सबसे अच्छी बात भारत का कोई भी नागरिक हीरा खोदने का लाइसेंस ले सकता है, वो भी कुछ हजार रुपयों में ।
                                  पन्ना जिले में राम वनगमन पथ के स्थानों में वृहस्पति कुंड के अलावा सुतीक्ष्ण मुनि आश्रम सारंगधर, अगस्त्य मुनि आश्रम सलेहा, अग्निजिह्वा आश्रम आदि स्थल है । ऐसी मान्यता है, कि भगवान राम अपने वनवास काल में इन स्थानों पर ऋषि मुनियों के दर्शन करने आये थे । रामायण काल के अलावा पन्ना जिले में महाभारत कालीन स्थलों में पाण्डव गुफा और जलप्रपात , अमानगंज के पास पन्डवन है, जहाँ केन नदी पाँच चट्टानों में से गुजरती है । यही से लगभग 30 किमी दूरी पर भीमकुण्ड है, जिसका पानी बिल्कुल नीला है । दुनिया में कही भी भूकम्प या सुनामी आती है, तो भीमकुण्ड के जल में अपने आप ऊंची लहरें उठने लगती है ।
पन्ना जिला अभी भी अपनी ठेठ बुंदेली संस्कृति को बचाकर रखे है । खानपान पर अभी भी शहरी मुलम्मा नही चढ़ा है ।  पन्ना में खान पान और संस्कृति पूरी तरह बुंदेली है । यहां भोजन में दाल-बाटी के साथ भटा का भर्ता, चीला, बरा, मंगोड़ा, बिजौरा, बरी, खोवा की जलेबी, रायता, बिर्रा की रोटी आदि स्वादिष्ट व्यंजन लोकप्रिय है । यह तो पन्ना  संक्षिप्त परिचय था , जल्द ही अगले पोस्ट में विस्तार से लिखने का प्रयास करूँगा।  20 फ़रवरी को दैनिक जागरण  राष्ट्र्रीय संस्करण में सप्तरंग परिशिष्ट में पन्ना पर मेरा आलेख प्रकाशित चुका है।  जिसे आप दैनिक जागरण की वेबसाइट पर पढ़ सकते है।  
अब आप चित्रों का आनंद लीजिये 
पन्ना राष्ट्रीय उद्यान में सांभर 

जुगल किशोर जी मंदिर 

चर्च जैसा बलदेव जी मंदिर 

पन्ना टाइगर रिज़र्व में चीतल 

बृहस्पति कुण्ड जलप्रपात 

जलप्रपात का एक और खूबसूरत नजारा 

बृहस्पति कुण्ड के पास प्राचीन शैलचित्र जिसमे जिराफ भी दिख रहा है।  

मस्जिद जैसा प्राणनाथ मंदिर 

कउआसेहा जलप्रपात 

कलकल जलप्रपात 
अजयगढ़ घाटी 

बक्चुर जलप्रपात 

नवीन कलेक्ट्रेट भवन 

पुराना कलेक्ट्रेट महेंद्र भवन 
गुप्तकालीन नचने कुठार का मंदिर 

अजयगढ़ किले से सूर्यास्त 
20 फ़रवरी 2020 को दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित मेरा आलेख 

मंगलवार, 7 जनवरी 2020

वृहस्पति कुंड में आदि मानव के बनाये शैल चित्र

हजारों साल पुराने शैल चित्र ! 
बी एस सी की पढ़ाई के दौरान मानव विज्ञान (Anthropology)  विषय रहा । तब से आदि मानव से आधुनिक मानव का विकास क्रम सिलेबस का हिस्सा रहा । मगर मुझे शैल चित्रों ने सदैव आकर्षित किया । मध्य प्रदेश में यूनेस्को की विश्व धरोहर भीमबेटका शैल चित्रों के लिए विश्वविख्यात है, मगर दुर्भाग्य से वहां तक जा न पाया । खैर पन्ना जिले में पदस्थापना के दौरान कई जगहों पर शैल चित्रों के होने की जानकारी मिली तो दिल खुशी से नाच उठा । उसी यात्रा का पहला पड़ाव प्रस्तुत है । 
मनुष्य प्रारम्भ से अन्य जीवों से अधिक मस्तिष्क वाला रहा है । प्रारम्भ में जब मानव बानरो की भांति पेड़ पर रहता था, तब उसे कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता था , क्योंकि प्रकृति ने उसे अन्य जीवों की तरह कोई विशेष अंग नही दिए जिससे वह अपनी रक्षा या बचाव हेतु अनुकूलन कर सके । न तो मांसाहारी जीवों की तरह नुकीले नाखून, लंबे दांत दिए और न ही शाकाहारी जीवों की तरह सींग या खुर दिए । पेड़ों पर रहने के लिए पूंछ का भी सहारा न रहा । बेचारा मजबूरी में पेड़ से नीचे उतरा । अब समस्या ये कि चार पैर (तब हाथ का प्रयोग पैर के रूप में ही था ) पर चलने पर लम्बी घास के कारण ज्यादा दूर तक नही दिख पाता था । अब खूंखार जंगली जानवरों के बीच निरीह मानव अपने अगले पैरों को हवा में रख पिछले पैरों पर खड़ा हुआ । यह क्रांतिकारी घटना थी । क्योंकि यही से मानव अन्य जीवों से अलग विशिष्ट श्रेणी की ओर उन्मुख हुआ । अगले पैर अब हाथ के रूप में विकसित हुए , हाथ का अंगूठा अंगुलियों के समकोण पर आया, जिससे चीजों को पकड़ना आसान हुआ । सिर सीधा होने से मष्तिष्क के लिए ज्यादा जगह बनी । बड़ा मस्तिष्क मतलब बड़ी सोच  और बड़ी सोच मतलब बड़ा बदलाव । इतनी कहानी सुनाने का मतलब ये है कि इसी बड़े मस्तिष्क ने कल्पनाओं और विचारों को जन्म दिया । अब पेड़ से उतर आये थे, और हाथ में पत्थर के औजार आ गए थे । तो शिकार भी करने लगे । हालांकि शिकार सामूहिक रूप से हो पाता था । कई बार गलती से बड़ा शिकार हाथ लग जाता तो बचे माँस को सुरक्षित और संग्रहित करने की जरूरत पड़ी । तो बड़े जानवरों की प्राकृतिक गुफाओं पर कब्जा किया गया । संग्रहित शिकार की सुरक्षा के लिए पहरेदार भी बिठाए गए । अब पहरेदार दिनभर बैठे बैठे क्या करे ?  तो गुफाओं की दीवारों पर पत्थरों से आड़ी तिरछी रेखाएं खींची । जब साथ वालों ने तारीफ की तो उन रेखाओं के विकास कर आसपास की गतिविधियों को उकेरा । फिर वनस्पतियों के रस से रंग बनाया । अब तो गुफ़ाओं की दीवारों पर रंगीन चित्रकारी होने लगी । यही से आदि मानव द्वारा बनाये गए शैल चित्रों की शुरुआत हुई । जो आज हजारों साल बाद भी गुफाओं में मिलते है । 
मध्य प्रदेश में भीमबेटका के शैलचित्र को यूनेस्को की विश्व धरोहर में शामिल हो गए । मगर आज भी मध्य प्रदेश में बहुत सी जगहों पर ये उपेक्षित पड़े है , और समय की मार से बचकर आज के मानव की मार से खराब हो रहे है । इसी तरह के शैलचित्र मध्य प्रदेश के पन्ना जिले के पहाड़ीखेड़ा गांव के पास बृहस्पति कुंड जलप्रपात के आसपास बहुतायत में है । मगर सरंक्षण के अभाव में नष्ट होने की कगार पर है । बहुत से शैल चित्र धुंधले पड़ गए है । इन शैल चित्रों में आदि मानव ने तत्कालीन परिस्थितियों और जीवों की चित्रित किया है । इन चित्रों में वन्य जीव, आखेट, नृत्य आदि का चित्रण लाल रंगों से किया गया है । आगे भी शैल चित्रों की खोज जारी रहेगी ....
- मुकेश पाण्डेय 




शनिवार, 14 सितंबर 2019

भेड़ाघाट का प्राचीन चौसठ योगिनी मंदिर !

नमस्कार मित्रों,
इस 17 जुलाई को जबलपुर उच्च न्यायालय एक केस के सिलसिले में जाना हुआ , उच्च न्यायालय से जल्दी फुरसत होने पर भेड़ाघाट की ओर रुख किया । हालाँकि पहले भी कई बार भेड़ाघाट स्थित धुंआधार जलप्रपात की खूबसूरती देखी है, लेकिन इस बार चौसठ योगिनी मंदिर जाना मुख्य उद्देश्य था ।
                                                                                     जबलपुर के पास स्थित भेड़ाघाट नर्मदा नदी के विहंगम जलप्रपात धुंआधार और संगमरमर की खूबसूरत चट्टानों के बीच बहती नर्मदा के खूबसूरत दृश्यों के लिए प्रसिद्द है । लेकिन भेड़ाघाट में एक प्राचीन चौसठ योगिनी मंदिर भी महत्वपूर्ण स्थल है । जिसकी जानकारी बहुत कम लोगो को होती है । पूरे भारत में कुछ ही प्राचीन चौसठ योगिनी मंदिर है, जिनमे से तीन मध्य प्रदेश में ही है । एक चौसठ योगिनी मंदिर मुरैना जिले के मितावली गांव में स्थित है । गोलाकार आकृति में बने इस मंदिर को भारतीय संसद के स्थापत्य की प्रेरणा कहा जाता है । मितावली स्थित चौसठ योगिनी मंदिर 9 वीं सदी में गुर्जर प्रतिहार शासक देवपाल गुर्जर में बनवाया था। इसके अलावा चौसठ योगिनी मंदिर, छतरपुर जिले में विश्व विरासत स्थल खजुराहो में भी चौसठ योगिनी का एक ध्वस्त मंदिर है। यह खजुराहो का सबसे प्राचीन मंदिर है, जो अब भी विद्यमान है। किन्तु यह अकेला ऐसा मन्दिर है जिसका आकार गोल न होकर आयताकार है। यह 9 वीं सदी में चंदेल शासकों द्वारा बनवाया गया था । ये तो हुए मध्य प्रदेश के चौसठ योगिनी मन्दिरो की बात अब मध्य प्रदेश के बाहर स्थित मंदिरों की बात करें तो उड़ीसा में भुवनेश्वर के निकट हीरापुर तथा बोलनगीर के निकट रानीपुर में हैं। इस तरह से देखा जाये तो पूरे भारत में कुल 5 प्राचीन चौसठ योगिनी मंदिर है । जिनमे 4 गोलाकार और 1 आयताकार आकृति में बने है । इन पांचों का निर्माण काल 9-10  सदी है । लेकिन सभी अलग अलग शासकों द्वारा बनवाये गये है । 
                                              आमतौर पर हिन्दू मंदिर वर्गाकार होते हैं और इनका विन्यास रेखीय होता है। अधिकतर मंदिरों में ईश्वर का मुख पूर्व दिशा की ओर होता है। दूसरी ओर गोलाकार योगिनी मंदिरों में ईश्वर का मुंह हर दिशा की ओर होता है। हालांकि, कुएं जैसी इन संरचनाओं का प्रवेश द्वार पूर्व की ओर ही है। मंदिरों की आम पहचान गुम्बद, शिखर या विमान इन मंदिरों में नहीं हैं। वास्तव में इन मंदिरों की तो छत ही नहीं है। उड़ीसा के हीरापुर तथा रानीपुर के योगिनी मंदिरों की अंदरूनी दीवारों पर योगिनियों की प्रतिमाएं हैं, सभी का मुंह केंद्र में बने मंदिर की ओर है। मध्यप्रदेश के भेड़ाघाट और मितावली मंदिरों में सभी योगिनियों के अलग-अलग मंदिर हैं जिनकी छतें तो हैं परंतु वे सभी गोलाकार प्रांगण की ओर खुलते हैं। योगिनियों की प्रतिमाएं हीरापुर, रानीपुर तथा भेड़ाघाट के मंदिरों में अच्छी हालत में हैं। खजुराहो के मंदिर में केवल तीन प्रतिमाएं बची हैं, जबकि मुरेना के मितावली मंदिर में कोई प्रतिमा नहीं है। 
                                                                            ये तो हुआ भारत में बने चौसठ योगिनी मन्दिरों के बारे में परिचय । अब हम बात करते है , अपनी चौसठ योगिनी मन्दिर की यात्रा की । उच्च न्यायालय के कार्य से मुक्त होते ही हम चल पड़े अपनी कार से भेड़ाघाट की ओर । मौसम भी सुहावना होकर हमारा साथ दे रहा था । बादल छाए हुए थे, और हवा चल रही थी । हम गूगल मैप की सहायता से मुख्य सड़क से न होकर गलियों से होकर भेड़ाघाट पहुँचे । कई बार गूगल महाराज पर गुस्सा भी आया कि कहां गलियों में भटका रहा है , लेकिन अंत भला तो सब भला । अभी मानसून आने में देरी थी , गर्मी अपने चरम पर थी , इसलिए भेड़ाघाट के धुआंधार जलप्रपात में पानी कम ही था । यहां एक बात बताना चाहूंगा कि भेड़ाघाट जगह का नाम है, जबकि नर्मदा नदी के जलप्रपात का नाम धुंआधार है । इस बार हमने रोप वे का प्रयोग करके नर्मदा के शानदार नजारे देखे । हालांकि जलप्रपात के भ्रमण के बारे में अगली पोस्ट में विस्तार से लिखूंगा । फिलहाल चौसठ योगिनी मन्दिर की यात्रा पर ही वापिस आते है । जलप्रपात देखने के बाद हम भेड़ाघाट शहर (कस्बा नुमा) की ओर आगे बढ़े । और एक पहाड़ी पर पत्थर की सीढ़ियां चढ़ कर हम चौसठ योगिनी मन्दिर पहुंचे । पसीने से लथपथ जब ऊपर पहुंचे तो वहां से नर्मदा नदी का दृश्य अद्भुत था । किसी ने बताया कि जल्दी दर्शन कर ले , अन्यथा मन्दिर बंद होने वाला है । उनकी बात मानते हुए हम मन्दिर के अंदर प्रवेश किये । गोलाकार आकृति में बने मन्दिर की बाहरी दीवालों पर चौसठ योगिनियों की अद्भुत प्रतिमाएँ बनी हुई है । यह देखकर दुख हुआ, कि सभी प्रतिमाएँ खण्डित है । कहानी वही मुस्लिम आक्रमण कारियों द्वारा इन प्रतिमाओं को खंडित किये जाने की । खैर योगिनियों की फ़ोटो लेने के बाद मन्दिर के बीचोबीच बने गर्भ गृह की ओर बढे । गर्भगृह के ऊपर लगा ध्वज बता रहा था, कि ये जाग्रत मन्दिर है, अर्थात यहां नियमित पूजा होती है । मतलब गर्भ गृह की मूल प्रतिमा खण्डित नही है । अंदर पहुँचे तो देखा गर्भ गृह में भगवान शिव और उनकी अर्धांगिनी पार्वती जी नंदी बैल पर सवार है । मन्दिर के पुजारी के अनुसार यह विश्व में इस तरह की एकमात्र ऐसी प्रतिमा है । मैंने भी कभी इस तरह नन्दी आरूढ़ उमा-महेश्वर की प्रतिमा देखी या सुनी नही है । सामान्यतः शिव मंदिर में शिवलिंग ही प्रतिष्ठित होते है । प्रतिमा भी बड़ी आकर्षक थी । शिव-पार्वती  के बगल में में ही कार्तिकेय और गणेश की प्रतिमाएं विराजमान थी, मतलब पूरा शिव परिवार ही विराजमान था।  
                                                                                   मन्दिर के अंदर सीसीटीवी कैमरे लगे थे, और मन्दिर के अंदर की फ़ोटो न खींचने की मनाही वाली चेतावनी लिखी थी । चेतावनी पढ़कर मन मायूस हुआ , मगर एक कोशिश करने में क्या हर्ज है ?  यही सोचकर मैंने पुजारी जी से फ़ोटो खीचने के बारे में पूछा तो उन्होंने सीसीटीवी की पहुँच से बाहर होकर फ़ोटो खींचने की अनुमति दे दी । अंधा क्या चाहे दो आंखे ! हमने भी मोबाइल से ही जल्दी जल्दी कुछ फोटो ली । फिर भगवान को प्रणाम कर बाहर निकल आये । आज बड़ी पुरानी इच्छा पूर्ण हुई । अभी तक दो चौसठ योगिनी मन्दिर देख लिए एक खजुराहो वाला और दूसरा ये भेड़ाघाट का । अब मुरैना और ओडिसा के मंदिर बाकी है । 

चौसठ योगिनी मंदिर की बाहरी बनावट 
मंदिर के भीतरी प्रांगण में स्थित शिव मंदिर 
मंदिर के गर्भगृह में नंदी पर आरूढ़ शिव-पार्वती और बगल में उनका परिवार



योगिनी की खंडित खंडित प्रतिमा 
























मंदिर में स्थित शिवलिंग 














मंदिर के बाहर  मैं 
इस पोस्ट में इतना ही अगली पोस्ट में धुआंधार जलप्रपात के खूबसूरत नजारें देखेंगे।

रविवार, 2 जून 2019

ब्राह्मणों के गोत्रों की जानकारी




ब्राह्मणों की कहानी  अपनी एक पुरानी पोस्ट में ब्राह्मणों के बारे जानकारी दी थी, जिसे पाठकों द्वारा जबरदस्त प्रतिसाद मिला । मित्रों, आइये आज हम ब्राह्मणों के सभी गोत्रों के विषय में जानने का प्रयास करें ।।

गोत्र ज्ञान -  गोत्र सामान्यतः एक प्रतीक होता है, कि किसी व्यक्ति या वंश की उत्पत्ति कहाँ से हुई । ब्राह्मणों के अधिकांश वंश ऋषियों से ही उत्पन्न हुए है । इसलिये अधिकांश गोत्रों के नाम ऋषियों के नाम पर ही है ।

मित्रों, उन ११५ ऋषियों के नाम, जो कि ब्राह्मणों के गोत्र भी है.......

१.अत्रि गोत्र,
२.भृगुगोत्र,
३.आंगिरस गोत्र,
४.मुद्गल गोत्र,
५.पातंजलि गोत्र,
६.कौशिक गोत्र,
७.मरीच गोत्र,
८.च्यवन गोत्र,
९.पुलह गोत्र,
१०.आष्टिषेण गोत्र,
११.उत्पत्ति शाखा,
१२.गौतम गोत्र,
१३.वशिष्ठ और संतान (क) पर वशिष्ठ गोत्र, (ख)अपर वशिष्ठ गोत्र, (ग) उत्तर वशिष्ठ गोत्र, (घ)
पूर्व वशिष्ठ गोत्र, (ड) दिवा वशिष्ठ गोत्र !!!
१४.वात्स्यायन गोत्र,
१५.बुधायन गोत्र,
१६.माध्यन्दिनी गोत्र,
१७.अज गोत्र,
१८.वामदेव गोत्र,
१९.शांकृत्य गोत्र,
२०.आप्लवान गोत्र,
२१.सौकालीन गोत्र,
२२.सोपायन गोत्र,
२३.गर्ग गोत्र,
२४.सोपर्णि गोत्र,
२५.शाखा,
२६.मैत्रेय गोत्र,
२७.पराशर गोत्र,
२८.अंगिरा गोत्र,
२९.क्रतु गोत्र,
३०.अधमर्षण गोत्र,
३१.बुधायन गोत्र,
३२.आष्टायन कौशिक गोत्र,
३३.अग्निवेष भारद्वाज गोत्र, ३४.कौण्डिन्य गोत्र,
३५.मित्रवरुण गोत्र,
३६.कपिल गोत्र,
३७.शक्ति गोत्र,
३८.पौलस्त्य गोत्र,
३९.दक्ष गोत्र,
४०.सांख्यायन कौशिक गोत्र, ४१.जमदग्नि गोत्र,
४२.कृष्णात्रेय गोत्र,
४३.भार्गव गोत्र,
४४.हारीत गोत्र,
४५.धनञ्जय गोत्र,
४६.पाराशर गोत्र,
४७.आत्रेय गोत्र,
४८.पुलस्त्य गोत्र,
४९.भारद्वाज गोत्र,
५०.कुत्स गोत्र,
५१.शांडिल्य गोत्र,
५२.भरद्वाज गोत्र,
५३.कौत्स गोत्र,
५४.कर्दम गोत्र,
५५.पाणिनि गोत्र,
५६.वत्स गोत्र,
५७.विश्वामित्र गोत्र,
५८.अगस्त्य गोत्र,
५९.कुश गोत्र,
६०.जमदग्नि कौशिक गोत्र, ६१.कुशिक गोत्र,
६२. देवराज गोत्र,
६३.धृत कौशिक गोत्र,
६४.किंडव गोत्र,
६५.कर्ण गोत्र,
६६.जातुकर्ण गोत्र,
६७.काश्यप गोत्र,
६८.गोभिल गोत्र,
६९.कश्यप गोत्र,
७०.सुनक गोत्र,
७१.शाखाएं गोत्र,
७२.कल्पिष गोत्र,
७३.मनु गोत्र,
७४.माण्डब्य गोत्र,
७५.अम्बरीष गोत्र,
७६.उपलभ्य गोत्र,
७७.व्याघ्रपाद गोत्र,
७८.जावाल गोत्र,
७९.धौम्य गोत्र,
८०.यागवल्क्य गोत्र,
८१.और्व गोत्र,
८२.दृढ़ गोत्र,
८३.उद्वाह गोत्र,
८४.रोहित गोत्र,
८५.सुपर्ण गोत्र,
८६.गालिब गोत्र,
८७.वशिष्ठ गोत्र,
८८.मार्कण्डेय गोत्र,
८९.अनावृक गोत्र,
९०.आपस्तम्ब गोत्र,
९१.उत्पत्ति शाखा गोत्र,
९२.यास्क गोत्र,
९३.वीतहब्य गोत्र,
९४.वासुकि गोत्र,
९५.दालभ्य गोत्र,
९६.आयास्य गोत्र,
९७.लौंगाक्षि गोत्र,
९८.चित्र गोत्र,
९९.विष्णु गोत्र,
१००.शौनक गोत्र,
१०१.पंचशाखा गोत्र,
१०२.सावर्णि गोत्र,
१०३.कात्यायन गोत्र,
१०४.कंचन गोत्र,
१०५.अलम्पायन गोत्र,
१०६.अव्यय गोत्र,
१०७.विल्च गोत्र,
१०८.शांकल्य गोत्र,
१०९.उद्दालक गोत्र,
११०.जैमिनी गोत्र,
१११.उपमन्यु गोत्र,
११२.उतथ्य गोत्र,
११३.आसुरि गोत्र,
११४.अनूप गोत्र,
११५.आश्वलायन गोत्र !!!!!

कुल संख्या १०८. ही है, लेकिन इनकी छोटी-छोटी ७ शाखा और हुई है ! इस प्रकार कुल मिलाकर इनकी पुरी संख्या ११५ है ! मैं स्वयं वशिष्ठ गोत्र से हूँ ।
आज की पोस्ट में इतना ही ।

गुरुवार, 9 मई 2019

गंगा जी कहिन : अहिल्या का उद्धार (बक्सर गाथा -2)



अहिरौली गंगा घाट (बक्सर , बिहार ) चित्र प्रतीकात्मक है।  
इस श्रृंखला की पहली पोस्ट में आपने पढ़ा, कैसे मेरे और मां गंगा के बीच संवाद शुरु हुआ और मैंने उनसे कैसे बक्सर का प्रारंभिक इतिहास जाना । परंतु मेरा प्रश्न अनुत्तरित रह गया था , कि भगवान राम ने कैसे अहिल्या का उद्धार किया ?  
चूँकि मैं जीवन यापन के लिए मां गंगा से सैकड़ों किलोमीटर दूर बेतवा किनारे ओरछा में रहता हूं और साल में एक या दो बार ही आना हो पाता है, इसलिए मां गंगा से  मुलाकात अधूरी रही और महीनों तक यह प्रश्न मेरे मन में भ्रमण करता रहा, कि आखिर भगवान श्री राम अपने गुरु विश्वामित्र के साथ जब गौतम ऋषि के आश्रम पहुंचे होंगे तो वह दृश्य कैसा होगा और उस स्त्री को जिसको उसके स्वयं तपस्वी पति ने छोड़ दिया हो ,आखिर भगवान ने कैसे उस पर अपनी करुणा दिखाई होगी ?
 मां गंगा की कृपा बहुत जल्दी मुझ पर हुई और उन्होंने अपने तट पर मुझे जल्दी ही बुला लिया और इस बार मैं फिर हाजिर था।  अपने उन्हीं प्रश्नों या जिज्ञासाओं के उत्तर को पाने के लिए और मां गंगा के बक्सर स्थित उसी रामरेखा घाट पर मैं पहुंचा जहां कभी भगवान श्री राम अपने अनुज लक्ष्मण और गुरु विश्वामित्र के साथ स्नान करते थे। मैं मां गंगा के आंचल के  एक छोर पर प्रतीक्षारत बैठा था , कि कब मां गंगा अपनी कृपा मुझ पर बरसा दे  ! और महीनों से अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर मुझे मिले।  मां गंगा की कृपा मुझ पर हुई और गंगा की अविरल धारा से आवाज आई-  हे पुत्र ! आखिर तुम्हें आना ही पड़ा !  मैं हाथ जोड़कर नतमस्तक खड़ा था और मैंने कहा कि क्या ऐसा हो सकता है कि आप बुलाएं और आपका यह अनुग्रहित पुत्र आए ना ।
इसके पश्चात मैंने मां गंगा से अपना वही पुराना प्रश्न दोहराया कि आज मां बताइए पाषाण बनी अहिल्या से कैसे मिले प्रभु राम ? 
कुछ देर की शांति  के पश्चात गंगा की लहरें  शांत हुई और कुछ देर के बाद मां गंगा  बोली - मैं  त्रेता युग में पहुंच गई थी  और मुझसे बोली - पुत्र मुझे अच्छे से याद है, वह दिन जब ऋषि गौतम और उनकी पत्नी की  कथा महर्षि विश्वामित्र ने राम को सुनाई और राम ने अहिल्या के लांछन और अपमान की कथा सुनकर अपने गुरुदेव से कहा - कि मैं उस देवी के दर्शन करना चाहूंगा गुरुदेव !  गुरुदेव ने कुछ कहा नहीं केवल गर्व से देखा था राम की ओर और राम के निकट पहुंच कर उनके कंधे पर हाथ रख कर दूर आकाश की ओर निहारा और अपने शिष्य के मुख से उस तिरस्कृत और लोक निर्वासित महिला के लिए देवी का संबोधन सुन बोले कि आज तुम में मैं अपना आप में मेरा विस्तार देख रहा हूं।   कुछ क्षण  तक महर्षि विश्वामित्र आत्म मुग्ध से खड़े रहे और राम की ओर देखते हुए बोले उसे भी तुम्हारी ही प्रतीक्षा है।  राम ! अपमान और उपेक्षा ने उसकी चेतना को लगभग नष्ट कर दिया है, मनुष्यों की छाया से भी वह डरती है , किसी को दूर से ही देख कर छिपने या भागने का प्रयत्न करती है ,डरती है,  न जाने क्या अपशब्द सुनने पड़े ! चेतना का केवल यही प्रमाण शेष रह गया है।  समाज  उसे दूषित करने वालों की लोग पूजा करता है।   ! पुरुष जो ठहरे शक्तिशाली जो ठहरे वे छल कर सकते हैं ! लूट सकते हैं !दूसरों को अपमानित कर सकते हैं ! और जिन्हें चलते लूटते और अपमानित करते हैं, उन्हीं को इन सब के लिए दोषी भी सिद्ध कर सकते हैं।  आश्चर्य है !  जो सिरजता है, गढ़़ता है लोक  को जीवन और अवलंबन देता है, वही सबसे अधिक अपमानित भी होता है वह धरती हो,स्त्री हो या नदी  हो सबकी एक नियति है । महर्षि विश्वामित्र और उनके दोनों होनहार शिष्य धीरे धीरे मेरे किनारे ही उस स्थान पर पहुंचे जहां पर अहिल्या जीवित होते हुए भी पाषाण की तरह शापित थी।  राम ने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए थे और दूर किसी स्त्री की छाया दिख रही थी, वह हाथ जोड़े उसी दिशा में चलते रहे लक्ष्मण भी उनका अनुगमन करके उनके साथ उसी तरह चल रहे थे, संभवत उन्हें भी लगा था कि वह व्यक्ति अन्य लोगों से भिन्न है ,  वह ना तो अपने स्थान से हिली थी और ना भागी थी।  संभव है उसे आंखों से कुछ दिख ही  ना रहा हो या संभव है कि उसमें हिलने की शक्ति ही ना रह गई हो ! नहीं ! वह शायद इधर देख ही नहीं पा रही थी,  मौन बैठी थी।  किसी सोच में डूबी थी। उसके निकट पहुंचकर राम उसके चरणों में लेट गए थे और बोली आपने बहुत दुख झेला है मां ! मैं समस्त पुरुष जाति की ओर से आपसे क्षमा मांगने आया हूं ! हे देवी मैं आपको अपमानित करने वाली उस दम्भी पुरुष जाति का प्रतिनिधि आपसे दंड मांगने आया हूं ।
उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था।   यदि राम के शब्द उसके कानों में पड़ भी रहे थे, तो उनका अर्थ शायद उसकी समझ में नहीं आ रहा था ! वह जड़ सी एकटक राम को देखी जा रही थी ! नहीं,  उसके कानों में कोई ध्वनि आवश्यक टकराई थी उसने बोलने का प्रयत्न किया था,  होठ हिले थे, पर शब्द बाहर नहीं आ पा रहे थे।   कोई मरणासन्न व्यक्ति जैसे कुछ कहने का प्रयत्न करें और उसकी आवाज एक अस्पष्ट फुसफूसाहट बनकर रह जाए और बहुत ध्यान देने पर कुछ समझ में आए वैसे ही उसने कहा था - मैं लंछिता हूँ !  पतिता हूं !  उसने राम के सिर को अपनी दुर्बल अंगुलियों से कुछ इस तरह छुआ था, जैसे उठाने का प्रयत्न कर रही हो !
                                               और फिर वही शब्द 'पतिता  ' .. आप पतित नहीं हो सकती मां , जो पतित होते हैं,  वह अपने जघन्य कृत्य पर भी अपने को पतित नहीं कहते।  वह अपने पापों  को लेकर गर्व करते हैं , उनकी चेतना अहंकार से इतनी मलिन हो चुकी होती है , कि वे अपने पातकों को समझ ही नहीं पाते।  जिनमें पतित होने का बोध है,  जो उन अहंकारियों द्वारा पातिकी कहीं जाते हैं।  वे या तो अज्ञान अपज्ञान या व्यवस्था के कारण उनके ही पापों और पातकों का बोझ धोने को बाध्य कर दिए जाते हैं । राम ने प्रतिवाद करते हुए कहा था ।
                                             अहिल्या की समझ में कुछ नहीं आ रहा था।   वह केवल आश्चर्य से राम को निहार रही थी राम ने कुछ स्पष्ट स्वर में एक एक शब्द पर रुकते हुए और एक एक शब्द का स्पष्ट उच्चारण करते हुए फिर कहा  " तुम पतित नहीं हो मां तुमने दूसरों के पातक का प्रक्षालन अपनी पीड़ा और यात्रा से किया है । जैसे मां अपनी गोद के बच्चों की मल का प्रक्षालन करती है । हाँ मां, अपने समस्त अहंकार के बावजूद पुरुष जाति स्त्री के सम्मुख एक शिशु ही बना रह जाता है अपनी धात्री और पोषिका को ही दूषित और मलिन करके किलकारियां भरने वाले शिशु से अधिक क्या है वह "
तुम्हारी बातें मेरी समझ में नहीं आती अहिल्या ने दुर्बल और कांपते हुए स्वर में कहा था।  उसकी समझ में कुछ तो आ ही रहा था,  अन्यथा वाणी में यह परिवर्तन कहां से आता । उसके नकार में भी आत्मविश्वास कहां से लौटता ।  ' कुछ समझ में नहीं आता बेटा" बेटा शब्द का उच्चारण उसने इतने विलगित होकर किया था ,कि अपना संयम ना खोने वाले राम की भी आंखें भर आई थी ।
आततायी  होते हैं मां ,जो दूसरों को कुचलकर अकेले ऊपर उठना चाहते हैं ,सिर तान कर शिखर बनना चाहते हैं।  मैंने शिखरों को भूचाल तो दूर मात्र मेह से खिसकते और लुढकते देखा है । पर्वतों को अपने अहंकार के दरबार से बिना किसी बाहरी ठोकर या आघात के चूर चूर होते देखा है । लेकिन मैंने धरती को द्रवित होकर बहते तो देखा है, पर पतित होते नहीं देखा । स्त्री तो जननी होती है ! वह तो धरती होती है !  मां वह पतित नहीं हो सकती !  पतितो को भी वही संभालती है और वहीं संभाल सकती है । यदि वह पतित होगी तो उसे कौन संभालेगा । राम ने अपने संयत पर कोमल स्वर में कहा था । उस समय वृद्धा के मुख पर हो रहे भाव परिवर्तन को देखकर आश्चर्य हो रहा था उसमें एक ऐसी प्राणशक्ति आ गई थी मानो कोई सूखी लता वर्षा की झड़ी से एक ही क्षण में हरी हो गई हो ।

तुम कौन हो ? कौन हो तुम ? उसने अपने आंतरिक आह्लाद को दबाते हुए भर आई सी आवाज में कहा था । " तुम मनुष्य नहीं हो सकते " नहीं तुम मनुष्य नहीं हो सकते , तुम भगवान हो । तुम पतित पावन भगवान हो , पतितों को भी पवित्र मानने वाले, उपेक्षित और वंचितों को उनका लूटा हुआ सौभाग्य और गौरव दिलाने वाले अवतार हो तुम " वह बढ़कर राम के चरणों में लिपट गई और फूट-फूट कर रोने लगी थी राम बार-बार उठो मां ! उठो देवी !  कहकर बुला रहे थे ! 

मां गंगा की लहरें शांत हो चली थी , इधर मेरा मन अशांत हो चला था , आँखों से अविरल धारा बह रही थी  ......
( क्रमशः अगले भाग में जारी )
चित्रकला - अलका दास 


शुक्रवार, 29 जून 2018

ताजमहल की छत पर आइंस्टीन !!

ताजमहल की छत पर आइंस्टीन 
भारत में लगभग हर घुमक्कड़ या पर्यटक का सपना होता है , कि वह अपनी जिंदगी में एक बार ताजमहल जरूर देखे।  यहां तक विदेशी पर्यटक भी भारत घूमते वक़्त ताजमहल घूमना चाहते है।  विदेशी राजप्रमुख भी अपने व्यस्त दौरे में ताजमहल के लिए समय निकल ही लेते है।  तो इसी तरह से हमारी भी बचपन से इच्छा थी, कि हम भी ताजमहल के दीदार करे।  जब 2007 में दुनिया के नए अजूबों के लिए प्रतियोगिता चल रही थी , तो हमने भी ताजमहल के समर्थन के लिए ताबड़तोड़ सात कवितायेँ लिख डाली और दैनिक भास्कर में भेज भी दी , अब सात कवितायेँ तो नहीं छपी , हाँ एक कविता की चार लाइन जरूर छाप गयी थी।  वही दूसरी तरह टुच्चे से लोग अपनी ताजमहल के साथ फोटो भेज दें तो तुरंत छप रही थी। खैर " वक़्त के गाल पर ठहरे हुए आंसू  " (गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने ताजमहल के लिए कहा था  ) के लिखी कविताओं के लिए हमने भी गाल पर आंसू बहा लिए।  ये तो हुई पुरानी बातें अब आते है , ताजमहल की वर्तमान यात्रा के सन्दर्भ के बारे में ...  तो मेरे बेटे अनिमेष के दूसरे जन्मदिन (25 अप्रैल ) पर मेरे साढ़ू और बड़ी साली आने वाले थे, और उन्हें ताजमहल देखने जाना था। हालाँकि मेरा मन नहीं था ,क्यूंकि गर्मी अपने चरम पर थी, और आगरा में गर्मी भी भीषणतम रूप में पड़ रही है।  लेकिन जब ससुराल पक्ष से प्रस्ताव आया तो मन मारकर भी जाना ही पड़ेगा।  खैर जन्मदिन के बाद आनन -फानन में कार्यक्रम बनाया।  आगरा में गॉइड मित्र आशीष कुमार के माध्यम से होटल में रूम बुक कराया।  उस दिन विवाह के लग्न अधिक होने से बड़ी मुश्किल से कमरे मिले , और इधर ओरछा में बड़ी मुश्किल से इनोवा।  अब 28 अप्रैल को हम चल पड़े 6 व्यस्क और 3 बच्चे आगरा की ओर......  झाँसी , दतिया , ग्वालियर , मुरैना , धौलपुर होकर आखिरकार 6  घंटे में आगरा पहुँच ही गए।   
आगरा पहुंचकर होटल सीरीस 18 में चेक इन किया , होटल बढ़िया था।  हमारे होटल पहुँचने के कुछ देर बाद ही हमारे मित्र आशीष भाई भी सपरिवार आ गये, साथ आगरा का मशहूर पंछी पेठा लेकर आये  थे ।  आशीष भाई का अधिकार पूर्वक आग्रह था , कि आज का रात्रिभोज उनकी तरफ से होगा।  हम न भी नहीं कर सकते थे , आखिर इलाहबाद में हमारे संघर्ष के साथी का जो आग्रह था।  हम लोग फ्रेश होने के बाद फतेहाबाद में ही केसर रेस्टोरेंट आशीष भाई के साथ पहुँचे।  आशीष भाई की पत्नी यानि हमारी भाभी जी और उनके बच्चो से हम पहली बार मिल रहे थे , मगर लगा ही नहीं कि पहली मुलाकात है।  उसी दौरान आगरा में रहने वाले एक और मित्र रितेश गुप्ता जी को भी कॉल किया , तो वे भी अपनी बाइक से केसर रेस्टोरेंट आ गए और रितेश जी भी हमारे लिए पेठा लेकर आये ।  रितेश जी सोशल मीडिया का एक जाना-माना नाम है।  रितेश जी सफर है सुहाना  नाम से एक यात्रा ब्लॉग भी लिखते है। घुमक्कड़ी दिल से फेसबुक ग्रुप के एडमिन भी है।  इस ग्रुप में देश-विदेश के लगभग 14 हजार से भी ज्यादा सदस्य है।  खैर आज का दिन का सफर हमरे लिए दिल से सुहाना हो गया था।  भोजन पश्चात् हम होटल वापिस हुए।  आशीष भाई से सुबह 6 बजे तैयार मिलने का कहकर विदा लिया। 
                                                      29 अप्रैल की सुबह हम दुनिया के सात आश्चयों  में से एक आश्चर्य को देखने 6 बजे तैयार हो गए।  आशीष भाई के आते ही हम निकल पड़े।  आशीष भाई ने कल ही बता दिया था , कि ताजमहल में कोई भी खाने-पीने की सामग्री अन्य अतिरिक्त सामान न रखे , क्यूंकि शुरुआत में ही सिक्योरिटी चेक में सब बाहर ही रखवा दिया जायेगा।  तब भी हमारी श्रीमती जी पेठा अपने बैग में डालकर आ गयी।  सिक्योरिटी चेक में ही पेठा बाहर निकलवा दिया गया , उसे फेंकने से अच्छा हम लोगों ने उसे खा लिया।  एक चीज और बताना चाहूंगा , जितने भी लोग ताजमहल देखने जा रहे हो , टिकट लेते समय सबका परिचय पत्र अवश्य साथ रखे।  हमारे साथ तो आशीष भाई थे, तो कोई दिक्कत नहीं हुई।  वरना  कई बार बिना परिचय पत्र के टिकट ही नहीं देते।  आतंकवादियों की हिटलिस्ट में होने के कारण ताजमहल में सिक्योरिटी के इतने चोचले है।  खैर सुरक्षा भी जरुरी है। ताजमहल के बाहर ही जुते-चप्पलो का कवर मिलता है , क्यूंकि आप सीधे जुते चप्पल पहने ताजमहल के अंदर नहीं जा सकते।  हमने भी बाहर ही शू कवर खरीद लिए , क्यूंकि अंदर महंगे भी मिलते है।  अब हम चल पड़े दीदारे ताज के लिए  ------सबसे पहले शाही दरवाजे से ताज का हल्का -हल्का दीदार होने लगा।  दरवाजे के पास हमने एक ग्रुप फोटो खिंचवाई फिर दरवाजे में से प्रवेश किया। अंदर घुसते ही लोगों का सैलाब दिखा , हर तरह लोग मोबाइल और कैमरा लेकर ताज के साथ खुद को कैद करने में लगे थे।  जिन जगहों से ताजमहल की अच्छी फोटो आ सकती है, वहां कतारबद्ध होकर इंतजार करना पड़ता था।  कई बार तो जबरन भीड़ में घुस कर जगह बनानी पड़ती थी।  हमने भी घुसते ही भीड़ में घुसकर जगह बनाई और फोटो खिंचवाई।  ग्रुप फोटो आशीष भाई खींच रहे थे। 
शाही दरवाजे से अंदर आने के बाद हम चारबाग में आ चुके थे।  ये बाग मुख्य मकबरे और मुख्य द्वार के मध्य बनाया गया है।  इसके बीचोबीच एक नहर बनी है , जिसमे फब्बारे लगे है।  नहर के पानी में ताजमहल का सुन्दर प्रतिबिम्ब दिखता है।  नहर के किनारे कतारबद्ध पेड़ लगे हुए है।  ये बाग फ़ारसी बाग की तर्ज पर बने है , जिसका भारत में पहली बार प्रयोग बाबर ने किया था। सामन्यतः मुग़ल बागों के मध्य में मंडप या मकबरा बाग के बीचोबीच बने है , जबकि इसके उलट ताजमहल में मकबरा बाग के आखिर में बना है।  हालाँकि यमुना के दूसरी तरफ मेहताब बाग होने से वास्तुकार यमुना और मेहताब बाग को शामिल कर ताजमहल को बीच में ही मानते है।  वर्तमान में जो बाग में पेड़-पौधे लगे है , मुगल शैली के नहीं बल्कि ब्रिटिश शैली के है।  जी हाँ , अंग्रेजो ने अपने शासन के दौरान जीर्ण - शीर्ण हो चुके बाग़ की जगह ब्रिटिश शैली का बाग लगवाया।  अंग्रेजो से एक इतिहास में पढ़ा किस्सा याद आया।  अंग्रेज खुद को दुनिया में सर्वश्रेष्ठ मानते थे , तो वे ये कैसे स्वीकार कर सकते थे , कि दुनिया की सबसे सुन्दर ईमारत अंग्रेजो ने नहीं मुगलो ने बनाई।  तो उन्होंने ताजमहल को नीलाम करने का ठान लिया।  सौभाग्य से ताजमहल को खरीदने वाला कोई खरीददार नहीं मिला।  और ताजमहल बिकने से बच गया।  खैर अंग्रेजों  ने ताजमहल से भी खूबसूरत इमारत भारत की तात्कालिक राजधानी कोलकाता में बनवाना शुरू की , संगमरमर से बनी ये ईमारत खूबसूरत तो बनी , लेकिन ताजमहल से खूबसूरत न बन सकी।  अंग्रेजों ने अपनी इस खूबसूरत ईमारत का नाम अपनी महारानी विक्टोरिया के नाम पर विक्टोरिया मेमरियल नाम रखा।  आज ये कोलकाता में है।    
अब ताजमहल  के बारे में कुछ परिचयात्मक जानकारी दे दूँ , हालाँकि ताजमहल किसी परिचय का मोहताज  नहीं है।  फिर भी एक सैलानी या घुमक्कड़ को एक जिज्ञासा तो रहती ही है।  वर्तमान में ताजमहल को हिन्दू या मुस्लिम ईमारत होने पर चर्चा गरम है।  लेकिन इस चर्चा को इतिहासकारों और वास्तुकारों के लिए छोड़ उन जानकारियों की चर्चा करेंगे जो अभी तक सर्वमान्य है।  अभी तक इसलिए क्यूंकि इतिहास भी नई नई खोजों के हिसाब से बदलता रहता है।  जैसे 1921 के पहले भारत का इतिहास सिर्फ ऋग्वैदिक काल (1500 ईसापूर्व ) तक ही सिमटा था , लेकिन रायबहादुर दयाराम साहनी की सिंधु घाटी सभ्यता की खोज ने भारतीय इतिहास को 5000 वर्ष पीछे ही नहीं धकेला बल्कि दुनिया को ये बताया कि जब दुनिया में लोग अभी जंगली अवस्था में थे , तब हम भारतीय नगरीय सभ्यता का निर्माण कर चुके थे।  अब आप सोच रहे कि मैं ताजमहल से कहाँ सिंधु घाटी पहुँच गया ! तो आपको बता दूँ, कि ताजमहल भी उसी तरह नदी के किनारे बना है , जिस तरह से सिंधु घाटी के लोग अपनी इमारतें बनाते थे।  वैसे इतिहास की किताबों में मैंने लाजबर्द मणि के बारे में सिंधु घाटी और ताजमहल में प्रयोग होते पढ़ा है।  खैर अब सीधी बात नो बकवास ! 
जैसा कि सभी जानते है , कि ताजमहल का निर्माण मुग़ल बादशाह शाहजहां ने अपनी प्रिय बेगम मुमताज महल के मरने के बाद उसकी याद में किया था।  हालाँकि मुमताज महल  की मौत प्रसव पीड़ा के दौरान वर्तमान मध्य प्रदेश के बुरहानपुर नामक जगह पर हुई थी।  उपेक्षा के कारण बुरहानपुर  ताजमहल खंडहर सा पड़ा है। अब वापिस आगरा लौटते है, शाहजहां को जहाँ इमारतों को बनवाने का शौक था , वही उसे संगमरमर बहुत प्यारा लगता था , उसने संगमरमर की इमारतों का निर्माण तो करवाया ही था , साथ ही पहले से बनी इमारतों पर संगमरमर की परतें भी चढ़वाई थी।  जैसे अपने पिता जहांगीर द्वारा बनवाई मोती मस्जिद पर संगमरमर चढ़वाया था।  तो ताजमहल बनवाने के वक़्त भी उसने संगमरमर को चुना।  मुमताज ने अपने पिता एतमाद-उल्ला के मकबरे में पिट्रा ड्यूरे शैली 
Jump to navigationJump to searchपोप क्लेमेण्ट अष्टम, पीट्रा ड्यूरे में
(पीट्रा ड्यूरे या पर्चिनकारी, दक्षिण एशिया में, या पच्चीकारी हिन्दी में), एक ऐतिहासिक कला है। इसमें उत्कृष्ट पद्धति से कटे, व जड़े हुए, तराशे हुए एवं चमकाए हुए रंगीन पत्थरों के टुकड़ो से पत्थर में चित्रकारी की जाती है। यह सजावटी कला है। इस कार्य को, बनने के बाद, एकत्र किया जाता है, एवं अधः स्तर पर चिपकाया जाता है। यह सब इतनी बारीकी से किया जाता है, कि पत्थरों के बीच का महीनतम खाली स्थान भी अदृश्य हो जाता है। इस पत्थरों के समूह में स्थिरता लाने हेतु इसे जिग सॉ पहेली जैसा बानाया जाता है, जिससे कि प्रत्येक टुकडा़ अपने स्थान पर मजबूती से ठहरा रहे। कई भिन्न रंगीन पत्थर, खासकर संगमरमर एवं बहुमूल्य पत्थरों का प्रयोग किया जाता है। यह प्रथम रोम (इटली) में प्रयोग की दिखाई देती है 1500 के आसपास। ) का सुन्दर प्रयोग किया था। भारत में सबसे पहले इस शैली का प्रयोग मुमताज बेगम के अब्बाजान के मकबरे में ही हुआ। उसी शैली का प्रयोग ताजमहल में भी किया गया। ताजमहल की बाहरी दीवारों में इस्लाम में वर्जित मानवाकृति के अंकन का प्रयोग न करके सिर्फ विभिन्न ज्यामितीय आकारों को उकेरा गया है।  ऊपरी हिस्से में कुरान की आयतों को लिखा गया है।  ये आयतें फ़ारसी लिपि में अमानत खां द्वारा संगमरमर पर जैस्पर से लिखा गया है।  जैसे ही हम ताजमहल के अंदर करते है , तो प्रवेश द्वार पर जो आयात लिखी है , उसका अर्थ है -

 हे आत्मा ! तू ईश्वर के पास विश्राम कर। ईश्वर के पास शांति के साथ रहे तथा उसकी परम शांति तुझ पर बरसे।   
जाहिर है , ये आयत मुमताज बीबी के लिए लिखवाई गयी होंगी।  खैर हम जब अंदर प्रवेश करते है , तो शांति तो नहीं , बल्कि उमस भरी गर्मी जरूर हम पर बरसी।  कारण अंदर कम जगह में अधिक भीड़ होना था।  लेकिन  शाहजहां और मुमताज की नकली कब्रों की पच्चीकारी देखकर मुंह खुला का खुला रह गया।  अंदर एक अटेंडेंट एक पत्थर पर टॉर्च से रौशनी डाल रहा था , और वह पत्थर चमक उठा। शाहजहां और मुमताज की असली कब्रे नीचे के तल में है , जो साधारण ही है , क्यूंकि इस्लाम में कब्रों पर ज्यादा नक्काशी की मनाही है।  मतलब हमने जो कब्रें देखी वो नकली थी , और सिर्फ दिखाने के लिए बनवाई गयी थी।  खैर भीड़ और गर्मी से हलाकान होकर हम पीछे की तरफ से बाहर आये। बाहर आते ही आशीष भाई ने गुम्बद की डायमंड कटिंग के साथ ही गुम्बद पर कुछ अलग ही दिखाया।  जी हाँ गुम्बद पर एक आकृति 20 सदी के महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन के चेहरे जैसी लग रही थी।  (क्रमशः अगले भाग में जारी )
तब तक आप चित्रों का आनंद लीजिये 




ताजमहल का प्रवेश द्वार 

ताजमहल का पहला दीदार 

ताजमहल का पूरा दीदार 
प्रवेश द्वार का प्रतिबिम्ब 
ताज की एक मीनार सूरज के सामने 
ताज का एक अलग एंगल 
ताज की छत पर हमे आइंस्टीन का चेहरा भी नजर आया 
ताज अलग नजर से 
ताज की मुंडेर पर हमें बाल जटायू (इजिप्शियन वल्चर ) भी दिख गए 
हमारा घुमक्कड़ी दल 
हमारे मित्र और हम 
ताजमहल का प्रतिबिम्ब 

orchha gatha

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