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शनिवार, 8 जुलाई 2017

तिरंगे के तले , घुमक्कड़ यार मिले

अभी एक मेरी दिल्ली यात्रा में दो भाग पढ़ चुके है।  (जिन्होंने नहीं पढ़ा वो दी गयी लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते है -  लाल किले की ओर 
छतरपुर में बहन जी के घर जाकर दिल्ली की दिवाली का लुत्फ़ उठाया  मैंने पहली बार किसी पर्व को दिल्ली जैसे महानगर में मनाया ।  रात में चारो तरफ आतिशबाजी हो रही थी , पटाखों का शोर था।   अमावस्या की घनघोर अँधेरी रात्रि में तारों की जगह धुंए का गुबार दिख रहा था।  खैर खुली हवा में साँस लेने आदी  हम जल्द ही इस दमघोंटू माहौल से आज़ादी पाने के लिए सो गए।  दिल्ली आगमन से ही आ रहे बुखार ने  फिर आगोश में ले लिया। अमित तिवारी जी तो अपने बच्चों को लेकर राजस्थान भ्रमण पर निकल गए ताकि दिल्ली के इस प्रदुषण से बचा जा सके।  

अगली सुबह यानि 31  अक्टूबर 2016 को नींद सोनीपत निवासी घुमक्कड़ मित्र  संजय कौशिक जी के कॉल ने अलार्म का काम किया और हम सोकर उठे।  अपने दिल्ली और आसपास  के घुमक्कड़  दोस्तों से मिलने की प्लानिंग शुरू।  अब मिलने के लिए किस जगह इकठ्ठा हुआ जाये , इस को लेकर चर्चा चल रही थी।  क्यूंकि कुछ लोग सोनीपत , गुरुग्राम से आने वाले थे , कुछ नॉएडा , ग़ज़ियाबाद से तो कुछ दिल्ली से ही आ रहे थे।  दिवाली के कारण ऑटो, कैब कम ही उपलब्ध थी , अतः मेट्रो ही एक सहारा थी।  इसलिए ऐसी जगह चुननी  थी  जो सबको पास पड़े।  खैर जगह फाइनल की गयी , कनॉट प्लेस का सेंट्रल पार्क।  खैर मैं पहुँच गया , छतरपुर मेट्रो स्टेशन , जहाँ सोनीपत से संजय कौशिक जी , गुरुग्राम से महेश सेमवाल जी तो करावल नगर से अनिल दीक्षित जी अपनी इनोवा से आने वाले थे।  मिलने की उत्सुकता इतनी ज्यादा थी, कि समय से पहले ही पहुंच गया था।  अब इंतजार की घड़ियां काटे न कटे।  अंततः प्रतीक्षा समाप्त हुई , और वो आये  .... इन सभी से पहली बार मिल रहा था  . देखते ही गले लग गए .. जैसे कबके बिछड़े .. यहाँ  आके मिले ।  फिर सेमवाल जी के सुझाव पर सरोजनी नगर की ओर इनोवा से निकल पड़े , वहां के प्रसिद्द पकोड़े खाने के लिए। पकोड़े वाकई स्वादिष्ट थे।  यहां लहसुन, प्याज ,अदरक के अलावा भी कई तरह के पकोड़े मिल रहे थे।   पकोड़ो की दुकान पर जब चर्चा हुई , कि लग ही नहीं रहा , हम पहली बार मिल रहे।  ये सुनकर कौशिक को पहली बार मिलने का आभास हुआ , तो फिर से गले मिले।  खैर कई तरह की बातें हुई।  कौशिक जी और अनिल भाई को अपनी ड्यूटी पर जाना था।  इसलिए सेमवाल जी और मैं वही रुक गया और अनिल भाई अपनी इनोवा में कौशिक जी को लेकर ड्यूटी पर निकल लिए।  मैं और सेमवाल जी मेट्रो  से राजीव चौक स्टेशन उतरे , फिर सेंट्रल पार्क पहुंचे .. लेकिन मायूसी हाथ लगी।  आज बुधवार के दिन पार्क मेंटेनस के लिए  रहता है।  तभी बीनू कुकरेती उर्फ़ विजय कुकरेती उर्फ़ रमता जोगी जी का कॉल आया कि वो भी कुछ देर में सेंट्रल पार्क पहुँच रहे है।  तो थोड़ा इंतजार किया , कि छरहरे शरीर वाले गढ़वाली पंडित रमता जोगी जी आ ही गए।  अब भरत-मिलाप के बाद निर्णय लिया गया , कि पालिका बाजार के पार्क पर डेरा जमाया जाये।
अब हम पास ही बने पालिका बाजार के ऊपर बने पार्क में पहुँच गए।  पालिका बाजार भारत का पहला भूमिगत बाजार है।  फ़िलहाल ये बाजार अपने सस्ते सामानों के लिए विख्यात है।  इसका एक कारण  चोरी का माल यहां बिकना भी है।  खैर मेरे लिए अभी अपने घुमक्कड़ मित्रो से मिलना जरुरी था , इसलिए पालिका बाजार से नजरे दो-चार न हो सकी।  पालिका बाजार में डेरा ज़माने के बाद एक -एक करके कमल कुमार सिंह , रुपेश शर्मा जी  (ग्रेटर नॉएडा से ) , सचिन त्यागी जी ( गाजियाबाद से ) आ गए।  सेमवाल जी  ने पालिका बाजार से ही एक गोल टावर नुमा ईमारत को बताते हुए बताया , कि ये भारत का पहला घूमता हुआ रेस्टोरेंट है , फ़िलहाल इसमें कम ही रौनक है।  अब जब सब लोग इकट्ठे हो ही गए तो चर्चाएं घुमक्कड़ी की चलने लगी। मन बड़ा ही प्रसन्न था , आखिर एक दूसरे से अनजान लोग जब किसी आभासी माध्यम (सोशल मीडिया ) से परिचित हो तो ख़ुशी कुछ और ही होती है। रुपेश जी अपने इलाके की प्रसिद्द बालूशाही लेकर आये थे, सचिन की अलग मिठाई लेकर आये थे।  बीनू भाई अपने सोनी के कैमरे से इस यादगार पल को कैद कर रहे थे।  हमारी पृष्ठभूमि में सेंट्रल पार्क का विशालकाय राष्ट्रिय ध्वज तिरंगा माहौल को एक अलग ही रंग भर रहा था।  सबसे मिलने पर किसी को भी नहीं लग रहा था , कि हम पहली बार मिल रहे है।  मेरे मन में तो अलग ही ख़ुशी थी, कि पहले भी दिल्ली आया तो रिश्तेदारों से मिला।  अबकी बार नए रिश्ते बने।  मिलने के बाद बिछड़ना भी तो पड़ता , आखिरकार फिर से जो मिलना है।    खैर चर्चाओं के बाद सब अपने अपने धाम के लिए निकल पड़े .... 
अब हम तीन लोग बचे मैं  मेरी इस दिल्ली यात्रा में छाये रहे कमल कुमार जी और बीनू भाई।  तो कमल भाई अपनी आदतानुसार एक बार में हमे ले गए जो उनके एक पहाड़ी मित्र का था।  फिर कमल भाई  जो खमीर उठे जौ के रस में सराबोर हुए तो महफ़िल उठने का नाम ही ले।  जैसे तैसे बीनू भाई और मैंने उन्हें वहां से बाहर  लेकर आये तो ऑटो से रात में मुझे इंडिया गेट और सचिवालय की सैर कराने ले आये  . रस्ते भर उनकी गजल गायकी सुनते आये  . बड़ी मुश्किल से मुझे छतरपुर छोड़ा , फिर बहन के यहाँ खाना खाया , और शादीपुर के लिए निकला , क्यूंकि सुबह साढ़े छह बजे नई  दिल्ली स्टेशन से  झाँसी के लिए शताब्दी एक्सप्रेस पकड़नी थी।  सुबह ध्रुव के साथ जब शादीपुर मेट्रो स्टेशन पहुंचा तो इतनी सुबह कोई मेट्रो नहीं थी।  मजबूरन एक ऑटो किया और स्टेशन पहुंचकर शताब्दी एक्सप्रेस में सवार  हो गया  अपने साथ कई अनूठी यादें लेकर ....... 
हाँ , इस यात्रा ने एक नई यात्रा का बीज बो दिया था , जहाँ एक जगह पर इससे भी ज्यादा घुमक्कड़ मित्रों को मिलना था  जानने के लिए आगे दी गयी लिंक पर क्लिक कीजिये। ........  महामिलन की पूर्वकथा ; असंभव से संभव तक
पकोड़ों का आनंद लेते हुए हम लोग 


सेंट्रल पार्क में लहराता हमारा तिरंगा 
लो पहुँच गए पालिका बाजार 

बांये से सचिन त्यागी, कमल सिंह, रुपेश शर्मा , महेश सेमवाल और मैं 



अब चलने की तैयारी 

फिर मिलेंगे चलते-चलते 

शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

जिन्द्गी न जाने , क्यूँ खफा हो गयी है ...

 जिन्द्गी  न जाने , क्यूँ खफा हो गयी है

हैतन्हाई के आलम में , ख़ुशी बेवफा हो गयी है 

जो लिखे मोहब्बत के तराने , आज हुए बेगाने
दिल में बसी तेरी खुशबु , जाने कहाँ दफा हो गयी है


सोचा था , एक दिन पूरी होगी मोहब्बत की किताब
अफ़सोस , बचे कुछ पन्ने, कुछ फलसफा हो गयी 

जेहन में बची यादें, दिल भी वीरान हुआ 
दफन हो सब बातें , जिंदगी भी सफा हो गयी 

महक न रह गयी बाकि, चली ऐसी आंधियां 
वीरान 'चन्दन' के दरख्त , अब ऐसी फ़िज़ा हो गयी है . 
- मुकेश पाण्डेय 'चन्दन'

गुरुवार, 14 नवंबर 2013

बाल दिवस के कुछ सवाल ..हम सब से ?????

                                  मित्रो आप सभी को भारतीय बाल दिवस कि हार्दिक शुभकामनायें. 
मेरे ख्याल से आज आपने अपने फेसबुक , ट्विटर  और शोशल मीडिया के मित्रो को शुभकामनयें भेज कर बाल दिवस मना लिया होगा . है न ?
 पर कभी -कभी मन में कई सवाल आते है , सोचा क्यों न आप से ही साझा कर लिया जाये  ? 
शायद कुछ के जवाब ही मिल जायेंगे  ? 
हम बाल दिवस को बच्चो के दिन के रूप में मानते है , तो क्या आज हमने बच्चों को बच्चा रहने दिया है ?
दिन भर स्कूली बस्ते का बोझ लादने के बाद कोचिंग , ट्यूशन , म्यूजिक क्लास , स्पोर्ट क्लास , कंप्यूटर , विडिओ गेम्स , मोबाइल के बीच क्या उनका बचपना बचा है ?
और स्कूलों में भी कौन सी शिक्षा ....सिर्फ नौकरी या व्यवसाय के लिए ?
हम उन्हें नैतिक शिक्षा , संस्कार दे पा रहे है  ?
क्या इस गलाकाट प्रतियोगी दौर में उन्हें किसी असहाय , बेसहारा या जरूरतमंद की मदद करना सिखा पा रहे है ?  
टेलीविज़न और इंटरनेट के बीच माँ की लोरी और थपकियाँ कहाँ  है ?
बड़ो का सम्मान , पड़ौसी धर्म, परोपकार , विनम्रता , सहनशीलता , आदर्श इस पीढ़ी के पास पहुचें है ?
तकनीक के तनाव में प्यार की छाँव उन्हें नसीब है ?
ग्लोबल वर्ल्ड में माँ-बाप की गलबहियां मिल पा रही है ?
  जिंदगी की जद्दोजहद में जिंदादिली उन्हें मिल पायी है ?
वर्चुयल रिलेशन और सोशल नेटवर्किंग के जाल में रिश्ते-नाते , दादा-दादी , नाना -नानी , मामा-मामी, चाचा-चाची का दुलार मिला है ?
ये तो हुए हमारे अपने बच्चों के लिए अब कुछ बच्चे ऐसे भी है , जिनका जन्म लेना ही उनके लिए अभिशाप से कम नही है . ऐसे बच्चों के लिए तो जिंदगी ही सबसे बड़ा सवाल है . उनकी दुनिया में सबसे बड़ा उद्देश्श्य ही रोटी है . ऐसे ही  बच्चो की कुछ तसवीरें आपके लिए लाया हूँ ....


हमारी ये जंजीरें कब टूटेंगी ...???

क्या आपका ये कचरा ही हमारा भविष्य होगा ?

क्या सारा बोझ हम ही उठाएंगे ?


मुझे कब भरपेट रोटी नसीब होगी ?

कब हम अपने आंसू पोंछ पाएंगे ?

हम कब आपकी दुनिया में शामिल होंगे ....?

हमें भिक्षा नही शिक्षा कब मिलेगी ?

कब हमारे उज्जवल भविष्य के नींव की ईंट रखी जायेगी ?
इसलिए नही कि आप बस उन्हें देखे ...बल्कि उनके लिए सोचे ...कुछ करे ...मैं ये नही कहूंगा कि आप ऐसे बच्चों को गोद  ले या उनका खर्च उठाएं ....या उनकी पढाई का खर्च उठाएं ...बल्कि जब कभी ऐसे बच्चे आपको नज़र आयें तो उनकी तरफ हिकारत कि नज़र से न देखे ..बल्कि प्यार से देखे ...वो भी हमारी तरह इंसान है . उनके साथ इंसानों के जैसा ही बर्ताव करे ...और हो सके तो उनकी मदद करे (पैसे की नही ) ...ऐसी मदद जो उनके जीवन में खुशियां ला सकें ...उनको अपने पैरो पर खड़ा कर सके ...उन्हें गलत राहों पर जेन को मजबूर न करें .....वो भी एक इंसानी जिंदगी फक्र से  जी सके  .....और इस दुनिया में पैदा होने के लिए ऊपर वाले का शुक्रिया अदा कर सकें
हमें भी हक़ है जीने का .....है न !

मंगलवार, 3 सितंबर 2013

मेरी सफलता ....फिर से


नमस्कार मित्रो ,
आपको यह बताते हुए अत्यंत हर्ष हो रहा है , कि मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित राज्य सेवा परीक्षा 2010  के अंतिम परीक्षा परिणाम घोषित हुए जिसमे आपका यह मित्र " बाल विकास परियोजना  अधिकारी " के पद पर चयनित हुआ है . साथ ही " खंड विकास अधिकारी " की प्रतीक्षा सूची में प्रथम स्थान है . मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा  यह मेरा लगातार दूसरा चयन है . इससे पूर्व मैं आबकारी उपनिरीक्षक के पद पर चयनित हुआ था , और तब नायब तहसीलदार  की प्रतिक्षा सूची में भी स्थान था .इन चयनों में मेरी कड़ी मेहनत के साथ आप सभी का आशीर्वाद और शुभकामनाएं रही है . अभी भी लगातार प्रयास जारी है ....
दैनिक भास्कर के मुख्य पृष्ट पर फोटो के साथ खबर भी ....

शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

पुलिस प्रशिक्षण की प्यारी प्यारी यादें ...

प्रणाम मित्रो .
सर्वप्रथम आप सभी को स्वतंत्रता  दिवस की पश्चातवर्ती हार्दिक शुभकामनाएं !
पूरे दो महीने आप से दूर रहने के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ, दरअसल मैं २ माह के पुलिस प्रशिक्षण के लिए जवाहर लाल पुलिस अकादमी , सागर  ( म० प्र० ) गया था . दो महीने प्रशिक्षण में बड़ा मजा आया ! पूरे मध्य प्रदेश से आये अपने बैच के लोगो के साथ विभाग के  अनुभवी ( पदोन्नत/प्रमोटी ) लोगो का साथ खूब भाया. इन दो महीनो में बहुत कुछ सीखा. और सबसे ख़ुशी की बात तो ये थी , कि प्रशिक्षण मेरे अपने शहर सागर में ही था .
अब आप सभी से भी इसके अनुभव बाँटना जरुरी है न !
तो प्रशिक्षण कि शुरुआत हुई कटोरा कट हेयर कटिंग के साथ .....

प्रशिक्षण के दौरान मौज मस्ती में भी कोई कमी नही रही ...

ये है सागर की प्रसिद्द लाखा बंजारा झील जिसके किनारे जवाहर लाल पुलिस अकादमी बनी हुई है ...इस तरह के ज्ञान देने की मेरी आदत यह भी बनी रही ..साथ में है मनोज प्रजापति ( ज्ञानार्जन करते हुए ..)

ये है हमारे पूरे बैच की चांडाल चौकड़ी ! इसमें बांयें से मनोज प्रजापति ( सीधी में पदस्थ मगर सीधे नही है ), फिर नीलिमा ( देखने में सबसे छोटी मगर मस्ती में सबकी माँ है ), इसके बाद हमारे बैच के सबसे कमउम्र विक्रम (बेताल ) और सबसे बांये संजीव जैन ( जिन्हें अपने मक्कार होने का गर्व था )



परेड ( सलामी शास्त्र )  करते हुए हम लोग ....और सबसे आगे हमारे कमांडर मनोज प्रजापति

ये है जलवा ...रिवाल्वर और पिस्टल दोनों एक साथ ....हैंड्स अप
और कंप्यूटर भी सीखा हमने ....

  
जब ज्यादा पी० टी० और परेड हो जाती तो थ्योरी की क्लास में थोड़ी झपकी भी लेने में नही चुकते थे . 




ये है हमारा बैच और हमारे प्रशिक्षक

पीछे दिख रही बिल्डिंग -हमारा होस्टल है .

इन महीनो में हमने शारीरिक प्रशिक्षण में पी० टी०  परेड तो थ्योरी में भारतीय दंड संहिता , दंड प्रक्रिया संहिता , आबकारी अधिनियम , एन डी पी एस एक्ट ,  आचरण नियम , विभागीय नियम  इत्यादि सीखा .
और आखिर में दीक्षांत समारोह के बाद विदाई .....






गुरुवार, 27 सितंबर 2012

हो रहा भारत निर्माण ( व्यंग्य कविता )

 १२ सितम्बर को साहित्य अकादमी , मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद्  भोपाल तथा  हिंदी विभाग , डॉ हरी सिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय , सागर द्वारा आयोजित ' पद्माकर समारोह ' काव्यपाठ हुआ . जिसमे कई बड़े कवि-कवियत्रियो के साथ मैंने भी अपनी कवितायेँ पढ़ी . उनमे से एक कविता आप सभी के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ .
हो रहा भारत निर्माण  !

ऐ जी , ओ जी , लो जी  , सुनो जी 
हम करते रहे जी -जी , वो कर गए 2  जी 
महंगाई का चढ़ा पारा , बिगड़ी वतन की हेल्थ 
सब मिल के खा गए , खेला ऐसा कामनवेल्थ 
दुनिया करे छि-छि , हो कितना भी अपमान 
अबे चुप रहो ! हो रहा भारत निर्माण ..... 
पेट्रोल इतना महंगा , पकड़ो अब टमटम
खी-खी करके , कर गए वे स्पेक्ट्रम 
हम मरें भूख , महंगाई, गरीबी , बदहाली से 
और वो ख़ामोशी ओढ़े  ,कोयले की दलाली से 
दाग अच्छे है ! कोयले से भी न टूटा ईमान
अबे चुप रहो ! हो रहा भारत निर्माण .....  
कार्टून बनाने पर , मचा दिया कार्टूनों ने बवाल 
फिर कैसी ख़ामोशी , कौआ चले हंस की चाल 
होते रहे आतंकी हमले , जीते रहे नक्सलवादी 
खामोश रहना ही भला , ऐसी मिली आज़ादी 
आये चाहे बाढ़ या सूखा , मरते रहे चाहे किसान 
अबे चुप रहो ! हो रहा भारत निर्माण ..... 


बुधवार, 22 अगस्त 2012

राग दरवारी :हिंदी साहित्य का व्यंग्य का सर्वश्रेष्ठ और कालजयी उपन्यास

नमस्कार मित्रो ,

बहुत दिनों बाद मैं आज ब्लॉग लिखने बैठा हूँ . कुछ दिन सोचा इन्टरनेट की दुनिया से दूर होकर साहित्य की दुनिया की सैर की जाये . इस लिए मैं पिछले हफ्ते हिंदी  साहित्य का व्यंग्य का सर्वश्रेष्ठ और कालजयी उपन्यास " राग दरवारी " पढने में व्यस्त था . सच पूछो तो श्रीलाल शुक्ल जी का लिखित उपन्यास हर भारतीय को पढना चाहिए . इस उपन्यास में शुक्ल जी ने एक कसबे 'शिवपालगंज ' और उसके निवासियों ( जिन्हें उपन्यास में गंजहा कहा गया है ) के बहाने भारतीय संस्कृति और मानसिकता पर करारा व्यंग्य किया है . जैसे :- " वर्तमान शिक्षा पद्धति रास्ते में पड़ी हुई कुतिया है , जिसे कोई भी लात मार सकता है . "
स्व० श्रीलाल शुक्ल जी
शुक्ल जी ने शिवपालगंज कसबे के बहाने देश  की लगभग हर समस्या को जोरदार तरीके से उठाते है . यही कारण है, कि 1960 के दशक में लिखा  गया ये उपन्यास आज भी प्रासंगिक  है. शुक्ल जी जिस सरल भाषा शैली में अपनी बात रखते  है ,वह लाजवाब है ! उदहारण के लिए  "  इस देश के निवासी परंपरा से कवि है , चीज  को समझने से पहले वे उस पर मुग्ध होकर कविता कहते है . भाखड़ा नांगल बांध को देखकर वे कह सकते है 'अहा ! अपना चमत्कार दिखाने  के लिए , देखो प्रभु ने फिर से भारतभूमि को चुना . '
मेरे अभी तक पढ़े गए साहित्य में निश्चय ही 'राग दरवारी ' सर्वश्रेष्ट है . राग दरवारी के पात्र वैद्य जी , रंगनाथ , रुप्पन बाबु , बद्री पहलवान , प्रिंसपल साहब , खन्ना मास्टर , सनीचर , लंग्गड़  और अन्य पात्र हमारे आस-पास के ही लगते है . और उपन्यास को पढ़ते समय हम भी उन्ही में शामिल हो जाते है . लगता है शुक्ल जी हमारी ही कहानी कह रहे है . आज भी ग्रामीण भारत 'राग दरवारी ' के शिवपाल गंज कि तरह है . आज देश के लोग वैद्य जी तरह देश को अच्छाई का मुखौटा पहन कर लूट रहे है , आज भी प्रिंसिपल साहब जैसे चापलूस देश की व्यवस्था को चूस रहे है . आज भी सत्ता का विरोध करने वालों  को खन्ना मास्टर की तरह परेशान किया जा रहा है . आज भी लंग्गड़ जैसे कई ईमानदार लोग अपनी जमीन  की नक़ल लेने  के लिए तहसीली  का चक्कर काट रहे है. आज भी बद्री पहलवान जैसे गुंडे सत्ता के उत्तराधिकारी बन रहे है . आज भी गयादीन जैसे सीधे-सादे  लोग  अपनी बेटी की इज्जत बचाने के लिए पलायन कर रहे है . आज भी सनीचर जैसे लोग सत्ता की कठपुतली बन कर दुसरो की उंगलियों पर नाच रहे है . आज भी देश के लोग भंग और गांजे के नशे में धूत्त होकर मतदान कर रहे है , आज भी रुप्पन बाबु और रंगनाथ  जैसे पढ़े लिखे हम जैसे लोग शुरूआती विरोध का भ्रम रच कर बाद में उसी सड़ी हुई व्यवस्था का अंग बनने को  बेबस है !!!
स्वर्गीय श्रीलाल शुक्ल जी को नमन !
इन्टरनेट प्रेमियों के लिए खुशखबरी ' राग दरबारी ' जो कि राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है , अब ऑनलाइन भी उपलब्ध है .

रविवार, 12 अगस्त 2012

यही तो देश का कष्ट है


यही तो देश का कष्ट है
कि सारे नेता भ्रष्ट है
राजनीती तो अब नष्ट है
तब भी नेता स्वस्थ्य है
वे घोटालो के अभ्यस्त है
और आम जनता त्रस्त है
सारे मौका परस्त है
सब अपने में मस्त है
वतन कि हालत पस्त है
खुशहाली अस्त-व्यस्त है
यही तो देश का कष्ट है
कि अब सब ध्रतराष्ट्र  है
- मुकेश पाण्डेय 'चन्दन'

शुक्रवार, 29 जून 2012

गंगा भले ही श्रेष्ठ हो मगर ज्येष्ठ है मैकलसुता !


अमरकंटक में नर्मदा  कुंड


नमस्कार मित्रो ,
 आज हम चर्चा करेंगे मध्य प्रदेश की जीवनरेखा कही जाने वाली एक अति महत्पूर्ण नदी "नर्मदा " की , जिसे पुराणों में रेवा के नाम से जाना गया है . भारत में बहने वाली लगभग सभी नदिया विवाहित मानी जाती है , जबकि सौमोदेवी - नर्मदा ही एक मात्र नदी है , जो अविवाहित है !   गंगा की उत्पत्ति की कथा तो आप सभी जानते होंगे , कि विष्णुपदी गंगा स्वर्ग से भागीरथ के प्रयास से पृथ्वी पर अवतरित  हुई . जबकि नर्मदा इसके पूर्व से ही भूलोक में विराजमान थी . अगर हम धार्मिक-पौराणिक संदर्भो से भी हटकर भूगर्भिक/ भौगोलिक प्रमाणों का सहारा ले तो हिमालय से निकलने वाली गंगा से नर्मदा प्राचीन प्रमाणित होती है
नर्मदा कुंड से नर्मदा का उद्गम
. जैसा  कि हमने भूगोल की किताबो में पढ़ा है , कि हिमालय एक नवीन वलित पर्वत है, जो प्लेट- विवर्तनिक प्रक्रिया के फलस्वरूप उत्पन्न हुआ है . अर्थात इसकी उत्पत्ति बहुत बाद में हुई है . इसके पूर्व यहाँ पर टेथिस सागर था , तो जाहिर है कि उससे निकलने वाली गंगा भी हिमालय के बाद ही उत्पन्न हुई होगी . जबकि भूगर्भिक साक्ष्य बताते है , कि अरावली , विंध्यांचल , सतपुड़ा और मैकल जैसी श्रेणिया अवशिष्ट पर्वतो का उदहारण है , जो कि हिमालय से बहुत पहले से मौजूद है .तो मैकल पर्वत की अमरकंटक चोटी (जिला  - अनुपपुर, मध्य प्रदेश) से निकलने वाली नर्मदा भी गंगा से बहुत प्राचीन है.
भेड़ाघाट (जबलपुर ) में संगमरमरी घाटी में नर्मदा   
नर्मदा के विवाह के सम्बन्ध में एक पौराणिक कथा मिलती  है - नर्मदा का विवाह सोनभद्र नाम के युवक से होने जा रहा था , तभी नर्मदा को पता चला कि सोनभद्र एक आदिवासी कन्या जोहिला से प्रेम करता है . तब नर्मदा क्रोधावेश में अमरकंटक से दक्षिण - पश्चिम दिशा की ओर नदी रूप में आगे बढ़ने लगी , नर्मदा को रोकने के लिए पंडित- नाई आदि पहाड़ो के रूप में खड़े हुए  , मगर नर्मदा सारी बाधाओ  को चीरकर आगे बढती  रही. इधर अमरकंटक में ही सोनभद्र नद का रूप लेकर उत्तर- पूर्व दिशा में आगे बढ़ा , जहाँ उसका मिलन जोहिला से हुआ . इस तरह भारत की सारी नदियों में नर्मदा ही अविवाहित है . और इसी कारण से नर्मदा का महत्त्व अन्य नदियों से ज्यादा है . नर्मदा ही भारत की एकमात्र नदी है , जिसकी परिक्रमा की जाती है . हर साल हजारो लोग नर्मदा  की पैदल परिक्रमा पूरी करते है .   
पूरी दुनिया में अमरकंटक ही ऐसा स्थल है , जहा से तीन नदियों (नर्मदा, सोन और जोहिला) का उद्गम हुआ है , और तीन विपरीत दिशाओ में बहती है .  
नर्मदा घाटी परियोजना के अंतर्गत नर्मदा  और उसकी सहायक नदियों पर 29 बड़े , १३५ मध्यम और 3000 छोटे बांध बनाये  जा रहे  है, जिसका विरोध नर्मदा बचाओ आन्दोलन (मेधा पाटकर ) जैसे संगठन कर रहे है.    
नर्मदा अपने उद्गम से 8 - 10 किमी ० बाद कपिलधारा एवं दुग्धधारा जलप्रपात बनाती  है, जबलपुर के पास भेड़ाघाट में नर्मदा मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा जलप्रपात धूंआधार बनाती है . बडवाह के पास मान्धाता और दरदी नाम के दो जलप्रपात का निर्माण होता है . महेश्वर के निकट नर्मदा सहस्त्रधारा   जलप्रपात का निर्माण करती है .
ओम्कारेश्वर  में ॐ के आकार में नर्मदा का विहंगम दृश्य
नर्मदा मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले के अमरकंटक से निकल कर गुजरात में खम्भात की खाड़ी में मिलने तक 1312  किमी ० का सफ़र तय करती है , जिसमे सबसे ज्यादा मध्य प्रदेश में 1077  किमी ० प्रवाहित होती है . नर्मदा मध्य प्रदेश , महाराष्ट्र और गुजरात तीन राज्यों से बहती है . नर्मदा के बेसिन  का क्षेत्रफल 86,000  वर्ग किमी ० है . नर्मदा अनुपपुर , मंडला, डिंडोरी ,जबलपुर, नरसिंहपुर, होशंगाबाद , रायसेन , हरदा, खंडवा , खरगौन . धार, सीहोर  , देवास, बडवानी और अलीराजपुर जिलो से बहती है . 

गुजरात में सरदार सरोवर  बांध का सुन्दर दृश्य
 नर्मदा की सहायक नदियों के नाम भी बड़े दिलचस्प है . नर्मदा के दांये तट से मिलने वाली नदिया है - हिरन , तेंदोनी, बारना  , चन्द्र केशर , मान , हथिनी  आदि तो बांये तट से बंजर, दूधी  , शक्कर, तवा , गंजाल , छोटी तवा , कुण्डी देव, गोई आदि  


नमामि देवी नर्मदे


नर्मदा मैकल श्रेणी से निकल कर सतपुड़ा और विंध्यांचल पर्वत को विभाजित करती है . नर्मदा मध्य प्रदेश को भी दो भागो में बाँटती है नर्मदा के किनारे  बारह ज्योतिर्लिंगों  में से एक ओम्कारेश्वर स्थित है , जहाँ नर्मदा ॐ के आकार में बहती है  .नर्मदा के किनारे मांडू या मांडव नामक बहुत ही खूबसूरत पर्यटन स्थल है .गंगा जहाँ मनुष्यों के पापो को धोती है , तो नर्मदा जड़ वस्तुओ को भी देवत्व प्रदान करती है . तभी तो कवि शिव मंगल सिंह "सुमन " को लिखना पड़ा-
नर्मदा में   गिरा  जो कंकर 
 
                                                              हर- हर करता बना वो शंकर   !
तो कैसी लगी आप को नर्मदा की ये यात्रा .....जरुर बताना 
आपका अपना ही मुकेश पाण्डेय " चन्दन " 

























बुधवार, 20 जून 2012

अपने को बौना पाता हूँ


इन लम्बे -लम्बे दरख्तों के बीच अपने को  बौना पाता हूँ 
इन जिंदगियों  की खरीद-फरोख्त के बीच , अपने को खिलौना पाता हूँ
कुछ हसीं चेहरों में न जाने क्यों खौफ  नज़र आता  है 
फैशन के नाम पर बदन  पर बस चिथड़ा नज़र आता है 
दर्दनाक चीखो में अपनी मुस्कान भी छीन गयी 
मौत के सौदागरों के बीच जिन्दगी  कहाँ गुम गयी 
पत्थर की इन दीवारों में, अपने लिए छोटा कोना पाता हूँ  
इन जिंदगियों  की खरीद-फरोख्त के बीच , अपने को खिलौना पाता हूँ  
हर तरफ छाई भीड़ पर तन्हाई ही दिखती  है 
पैसे हो गर जेब में , तो यहाँ हर चीज बिकती   है 
खो गये है हर रिश्ते-नाते , खो गया है अपनापन 
बस गयी है मतलब की दुनिया , मतलबी है हर मन 
यहीं रईसों के ठहाके , तो यहीं गरीबो की आँखों में रोना पाता हूँ 
इन जिंदगियों  की खरीद-फरोख्त के बीच , अपने को खिलौना पाता हूँ 
 

बुधवार, 13 जून 2012

एक अकेला पेड़ !

सोया  पेड़ के नीचे एक थका राही
तभी कहीं से एक दर्द भरी आवाज़ कराही
नींद खुली राही की , देखा चारो तरफ सुनसान 
एक अकेला पेड़ था, बाकि इलाका था वीरान 
क्या देख रहे हो तुम , अचरज होके आसपास 
मैं अकेला पेड़ बचा, बाकी का इंसानों ने किया नाश 
थी यहाँ भी हरियाली  , थे अनेक पशु और पक्षी 
सबका नाश किया मानव ने, बनके पर्यावरण भक्षी 
असहाय बनके खड़ा रहा , देखता रहा सहोदरों का नाश
मेरी बांहों को भी काट दिया, है अंतिम क्षण की आस 
क्या शत्रुता थी इन मनवो से, सदा  ही उनका कल्याण किया 
मीठे-मीठे फल  दिए उनको, और ऑक्सीजन  सा प्राण दिया   
पर वो हमारा मोल समझ न सका अब तक 
यूँ ही अपने पैरो पर कुल्हाड़ी मारेगा  कब तक
        

मंगलवार, 5 जून 2012

आज पर्यावरण दिवस पे फिर से कुछ ढोंग किया जाये !

आज पर्यावरण  दिवस पे फिर से कुछ ढोंग किया जाये
ताकि अपनी भी तस्वीर कल अखबारों में आ जाये
प्लास्टिक के फ्लेक्स पर छपवायें , सुन्दर पोस्टर
 पौधे लगाये उन्ही गमलो में , जिन्हें भूले थे पिछली बार रोपकर
इतनी गर्मी हो रही है , जल्दी से चलाओ  ए सी
भले ही कितना बढ़ जाये , दुनिया में सी ऍफ़ सी
काटने दो सारे जंगल, नए शहर बसायेंगे
जानवरों का क्या है , शहर में रहने आ जायेंगे
वैसे भी अब क्या फर्क जानवर  और इंसान में
वो रहते हा चिड़ियाघर में और हम रहते मकान में 
चलो बहुत हुआ , कुछ तो फोटो खिच जाये
आज पर्यावरण  दिवस पे फिर से कुछ ढोंग किया जाये
- मुकेश पाण्डेय "चन्दन "

रविवार, 27 मई 2012

अब मर रहे रहे है, ताल-तलैया

अब मर रहे रहे है, ताल-तलैया 
कहाँ गए  ?  उनमे थे जो नाव खिवैया
 नदियों के भी आंसू सूख गये 
अब कठौती में होती, जय गंगा मैया 
माँ थी कभी सारी नदिया 
आज मात् हंता बने हम सब भैया 
धरती का सीना, चीर के चूसा 
अब पानी को करते ता-ता थैया 
मार के कुल्हाड़ी अपने पैरो पर 
 समझदार बने है, आज सैंया
सारे जंगल काट दिए है हमने 
 और ढूंढ  रहे , क्रांकीट में छैंया
अब तो जागो , कुम्भकरणो
डूब रही है , चन्दन की नैया
-mukesh pandey "chandan"

शुक्रवार, 25 मई 2012

मैं एक आम इन्सान हूँ

मैं एक आम इन्सान हूँ 
हर कदम जिन्दगी से परेशान हूँ
मैं जन्म लेता हूँ , गंदे सरकारी अस्पतालों में 
या फिर अँधेरे कमरों, सूखे खेतो या नालो में 
पलता-बढ़ता  हूँ, संकरी-छोटी गलियों में 
खेलता फिरता हूँ, मिटटी-कीचड़ और नालियों में 
ऊँची इमारतों को देखकर , मैं हैरान हूँ 
मैं एक आम इन्सान हूँ 
खंडहर  से सरकारी स्कूलों से की पढाई 
 क्लास बनी मैदान ,साथियों  से होती लडाई   
होश सँभालते ही, शुरू होती काम की तलाश 
आँखों में सपने , होती कर गुजरने की आस 
पर लगता मैं बेरोजगारी की शान हूँ 
मैं एक आम इन्सान हूँ 
जैसे-तैसे मिलती रोजी-रोटी, चलती जीवन की गाड़ी 
हर राह  पर पिसता , इस देश का ये खिलाडी 
 हर विपदा हमारे लिए होती, देखो जिंदगी का खेल 
हर बार हम  होते बर्बाद, करती मौत हमसे मेल 
बाढ़, सुखा, भूकंप, अकाल का मैं बर्बाद हुआ सामान हूँ 
मैं एक आम इन्सान हूँ  
- मुकेश पाण्डेय "चन्दन" 

 

गुरुवार, 24 मई 2012

आई जेठ की दुपहरी

झुलसते से पेड़ खड़े हो जाते   , आई जेठ की दुपहरी 
 पंछी भी निश्वास  हो जाते , आई जेठ की दुपहरी 
आसमान से मनो बरस रहे हो, आग के गोले 
ताप इतना है, कि लगे सूर्य अनलकोष होले 
नंदिनी गाय पेड़ टेल बैठी, पर वहां भी आराम  कहाँ 
भूरी कुतिया जीभ निकाले ,ढूँढती मानो शाम कहाँ
ताल-नदी सब सूखे, कालू कुआ ढूंढ रहा है पानी 
सांवली भैंस कीचड़ से लथपथ. सबसे ज्यादा उसे परेशानी 
हवा भी बहती नही , मिले कैसे गर्मी से छुटकारा 
अब जाये कहाँ सब, जल रहा है जग सारा 
पुसी बिल्ली आराम फरमाती , छोड़ चूहों कि चिंता 
सब चुपचाप दुबके , पंख न फैलाये कोई परिंदा 
सारा तन पसीना से नहाये,आई जेठ की दुपहरी 
सब जन है अलसाये , आई जेठ की दुपहरी      
 - मुकेश पाण्डेय "चन्दन"

गुरुवार, 17 मई 2012

दार्जलिंग की यात्रा

नमस्कार , 

मित्रो आज मैं अपनी दार्जलिंग यात्रा से आप सभी लोगो को रु-ब -रु  करना चाहता हूँ . हालाँकि मेरी ये यात्रा पिछले साल अप्रेल में हुई थी , लेकिन याद अभी भी ताजा ताजा है .मुझे बिहार लोक सेवा आयोग की प्रारंभिक परीक्षा का केंद्र बिहार-बंगाल की सीमा पर  किशनगंज मिला था . मैंने  चलो इसी बहाने यहाँ  से नज़दीक विश्व प्रसिद्द पर्यटन स्थल दार्जलिंग की सैर कर ली जाये . तो 17 अप्रैल को मैं , मेरा  भाई और उसका एक  दोस्त किशनगंज से बस से सिलीगुड़ी  लिए रवाना हुए .(सिलीगुड़ी के पास राजगंज में हमारे रिश्तेदार रहते है ) अगर ट्रेन से जाना हो तो नजदीकी स्टेशन न्यू जलपाईगुडी  है .  दुसरे दिन 18 अप्रेल को बंगाल में विधानसभा चुनाव थे , इसलिए वाहन  कम ही मिल रहे थे . बस के ऊपर बैठकर हम लोग गये .सिलीगुड़ी के नजदीक पहुचते ही आसपास चाय के बागान दिख रहे थे .
बस से ..... चाय के बागान 

सिलीगुड़ी से दार्जलिंग जाते हुए रस्ते का  मनोरम नजारा ! ऊँचे  पहाडो की गहरी घाटियों में से झांकते हुए लम्बे- लम्बे चीड और देवदार के पेड़ इन खूबसूरत वादियों में हमारा स्वागत कर रहे थे .  रास्ता बहुत ही घुमावदार है , पलक झपकते ही गाड़ी दूसरी दिशा में घूम जाती है .
यूनेस्को की विश्व विरासत सूचि में शामिल  दार्जलिंग हिमालयन रेलवे का बाष्प चालित इंजन , जो आज भी नैरो गेज की पटरियों पर पर्यटकों को इस फिजा के दर्शन करता है . 
                      ये है विश्व धरोहर  रेलवे की खूबसूरत बोगी , बैठने का लोभ कौन छोड़ पायेगा !
और ये है , दार्जलिंग का छोटा सा  खूबसूरत स्टेशन , जो मेरे ख्याल से भारत का एकलौता स्टेशन होगा , जहाँ अन्दर तक चार पहिये वाहन आ जाते है . चित्र में आप देख सकते है .
  पहले दिन हम लोग पद्मजा नायडू हिमालयन जूलोजिकल पार्क एवं हिमालयन  माउंटेरिंग इन्स्टीटयुट को देखने पहुचे . चलिए आप को भी इसकी सैर करते है !
तो ये देखिये तंदुआ जो जाली  के  पास आकर हमसे दोस्ती करना चाह रहा है . ...दोस्ती करेंगे ?
अरे ध्यान से देखो ! वो दूर... जंगल का राजा शेर खड़ा है , दिखाई दिया ? राजा की शान में कौन  गुस्ताखी करें ! हम आगे बढे .......
ये जो पेड़ो  की डाल  पर  घूम रहा है , ये है दुर्लभ हिमालयन  लाल पांडा जो  बांस की पत्तियों को  मजे  से खाता है . और भी बहुत  से वन्यजीव  थे , मगर सबके चित्र लेना  संभव नही था .
अब आते है , पार्क में ही बने हिमालयन  माउंटेरिंग इन्स्टीटयुट को देखने के लिए ..इसे देखने के लिए पार्क के लिए टिकट लेते समय  से टिकट अलग से टिकट लेना पड़ता है . इस  संस्थान  में पर्वतारोहन की ट्रेनिंग दी जाती है . यही पर एक म्यूजियम भी है , जहाँ पर्वतारोहण से  सम्बंधित चित्र और सामग्रियां संग्रह  की गयी है . 
बहुत ही  सुन्दर  है न . ये  पहाड़ी फूल ?
लीजिये हम पहुच गए चाय के बागानों में ,जिसके  लिए दार्जलिंग मशहूर  है ! वाह !
ये लो जब हम चाय के बागानों को निहार रहे थे , तो  जाने कहाँ  से ये आवारा बादल आ गये ! और हमें  गीला    करके  चलते बने ! दार्जलिंग में ये आम  है !
चाय के  के पास ही लोग किराये से पहाड़ी पहनावा  के फोटो खिचवा रहे थे . इनमे महिलाये चाय बागान की  महिला  मजदूरो की ड्रेस में फोटो  खीचा रही थी . 
ये है सेंट जोसेफ स्कूल जहाँ पर "मेरा नाम जोकर " फिल्म के पहले भाग की शूटिंग हुई थी . दार्जलिंग में " मैं हूँ न " जैसी कई फिल्मो की शूटिंग हुई है . 
दुसरे दिन हम सुबह सुबह मुह अँधेरे निकले टाईगर  हिल के लिए ...दार्जलिंग से पास ही   स्थित टाईगर हिल से सूर्योदय देखने का मजा ही कुछ और  है! हालाँकि इसके लिए होटल से सुबह तीन-साढ़े तीन बजे अँधेरे में ही निकलना पड़ता है . हमारा  दुर्भाग्य ही , था, कि  उस दिन सूर्य देव बादलो की ओट  में छुपे रहे . मगर दूसरी और हमने टाईगर हिल से दूर कोहरे  और बादलों के  बीच कंचनजंघा का स्वर्गीय नजारा देखा तो ख़ुशी के मारे पैर जमीन पर नही थे .     
ये है टाईगर हिल के दुसरे छोर का  नजारा ....पहाड़ ....बादल....फिर पहाड़ ...और फिर बादल ! टाईगर हिल से  भारत की दूसरी सबसे ऊँची छोटी कंचनजंघा के दर्शन होते है . सुबह बादलो के कारन हमें नही हो पाए .. 
                                               लौटते  में   " घूम " में बौद्ध मठ  पहुचे
बौद्ध मठ  के अन्दर का दृश्य .....बहुत ही शांतिमय वातावरण ! मैं पहली  किसी बुद्ध  मठ में गया था . बुद्धं शरणम गच्छामि !
तिब्बतियों का पूजा के समय घुमाया जाने वाला यन्त्र 
अब तैयार हो  एक स्वर्गीय अनुभूति के लिए ,
जी  हाँ! जब हमने बतासिया लूप से ये नजारा देखा तो देखते ही रह गए . सामने हिम की चादर ओढ़े कंचनजंघा !  अद्भुत !
बतासिया लूप पर ही दार्जलिंग वार मेमोरियल  बना  हुआ है, और इस  मूर्ति  को देख  कर  है, मन में विचार आता है , कि  देश इन्ही के कारन सुरक्षित है ...........  
सीढ़ीदार जंगल ......
और आखिर में फिर से कंचनजंघा के दर्शन ........हमने तो सैकड़ो फोटो खीची फिर भी मन नही भरा ! सचमुच अनुपम !
   
 तो कैसी लगी ये दार्जलिंग की यात्रा .......जरुर  बताये .

orchha gatha

बेतवा की जुबानी : ओरछा की कहानी (भाग-1)

एक रात को मैं मध्य प्रदेश की गंगा कही जाने वाली पावन नदी बेतवा के तट पर ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा हुआ. बेतवा की लहरों के एक तरफ महान ब...