मंगलवार, 10 मई 2016

बेतवा की जुबानी : ओरछा की कहानी (भाग-1)

एक रात को मैं मध्य प्रदेश की गंगा कही जाने वाली पावन नदी बेतवा के तट पर ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा हुआ. बेतवा की लहरों के एक तरफ महान बुंदेला शासको की छतरियां बनी हुई है, तो दूसरी तरफ ओरछा अभयारण्य जो कभी तुंगा मुनि की तपोभूमि रहा है. धवल चांदनी में बेतवा की लहरें हिलोर मार रही है .. तभी कलकल के कलरव के बीच कहीं से एक मधुर आवाज आती है...
हे पथिक...
क्या तुम मेरी आवाज सुन रहे हो ?
 हैरान होकर अपने आस पास देखा तो वहां मेरे अलावा कोई भी नही था. मैं आश्चर्य मिश्रित भय के साथ आने वाली आवाज के स्रोत को खोज रहा था. कभी फिर से आवाज ने मेरा ध्यान खींचा...
हे पथिक....
तुम्हे डरने की आवश्यकता नही है..
मैं हूँ....बेत्रवती !
जिसे तुम लोग अब बेतवा कहते हो .
मैंने ध्यान दिया तो आवाज बेतवा की लहरों से ही आ रही थी .....
मैने श्रद्धा वश हाथ जोड़ लिये
बेतवा की आवाज !
सुनकर तो मेरे रोंगटे ही खड़े हो गये . विश्वास ही नही हो रहा है, कि मैं जाग रहा हूँ , या सपना देख रहा हूँ. मुँह से आवाज ही नही निकल पा रही...तभी बेतवा की एक लहर तेजी से ग्रेनाइट की चट्टान से टकराई. पानी के छींटे मेरे ऊपर आये...मेरी तंद्रा टूटी ! हां मैं यथार्थ में ही बेतवा की आवाज सुन रहा हूँ , कोई स्वप्न नही देख रहा हूँ . मैने हाथ जोड़े ही माँ बेतवा से कहा - माता आपने मुझे ही वार्तालाप के लिए क्यों चुना ?
बेतवा- पुत्र मैं तो सदियों से अपनी आवाज सुनाने के लिए बसुधा पर प्रवाहित हो रही है, मगर मानव अपनी कथित प्रगति के शोरगुल में कहां प्रकृति या हम जैसी नदियों की आवाज सुन रहा है. आज तुम्हे अपने आंचल में बैठा देखा तो सोचा शायद तुम सुन पाओ .
मैं - माते मैं स्वयं को सौभाग्यशाली समझता हूँ , कि म० प्र० की गंगा स्वयं संवाद कर रही है.
बेतवा - पुत्र मैं बहन गंगा से बहुत ज्येष्ठ हूँ...वो तो धरा पर लाई गयी..जबकि मैं तो सदा से हूँ.
मैं - माँ जब आप सनातन काल से प्रवाहित हो तो क्या इस शहर की गाथा सुनाओगी ? तुमने तो इस नगर का जन्म, उत्थान, पतन सब देखा होगा.
धीरे-धीरे जैसे अंधेरा बढ़ रहा है, आकाश में चंद्रमा का तेज चरम की ओर जा रहा है, धवल चांदनी में बेतवा के जल में चंद्रमा का प्रतिबिंब भी हिलोरे ले रहा था. मानो बेतवा उसे अपने आंचल में बिठाकर झूला झुला रही हो ! कुछ देर की खामोशी के बाद ..बेतवा की सुमधुर आवाज फिर शुरू हुई ...
तुम इस नगर की कहानी पूछ रहे हो , मैने तो इस सृष्टि का भी उत्थान देखा है.मेरे उद्गम कुमरागांव (रायसेन जिला, म०प्र०) से प्रवाहित होकर यमुना से मिलने तक(हमीरपुर, उ०प्र०) सांची, विदिशा, ओरछा आदि का भूत, वर्तंमान देखा है.
बेतवा की लहरें कुछ शांत हुई , मानो ध्यान मग्न होकर अपने अतीत को याद कर रही हो . चंद्रमा भी आंचल के झूले से उतरकर एक तरफ चुपचाप सा बैठा गया. जैसे कोई शिशु माँ के स्तनपान के बाद सीने से लगकर ही सो गया हो. मैं भी आगे की गाथा सुनने को उत्सुक ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा चारो तरफ आंखे फाड़कर देख रहा हूँ, न जाने कब मां बेत्रवती अपने अतीत के समुद्र में गोता लगाकर वापिस आ जाये. तभी लहरों में हलचल प्रारंभ हुई ...मेरी आंखे खुशी से चमक उठी ...
मैने पूछा- मां क्यों चुप हो गयी थी ?
बेतवा- पुत्र तुम्हारे प्रश्न ने मुझे अतीत की यादों में लौटने को विवश कर दिया. अशोक और कारूवाकी का मेरे तट पर प्रेम पनपने से लेकर पुष्यमित्र शुंग की विजय गाथा, हेलियोडोरस का भागवत धर्म अपनाना, गुप्त शासकों का स्वर्ण काल, ओरछा में बुंदेलाओं का उत्थान-पतन, रामराजा का आगमन, केशव का काव्य, रायप्रवीण की प्रेमगाथा, लक्ष्मीबाई की वीरता , चंद्रशेखर आजाद का अज्ञातवास तक सब स्मरण है. सृष्टिकर्ता ने मुझे कितने गौरव के क्षण प्रदान किये ...आभार परमपिता !
ये बोल कर परम पावन बेत्रवती फिर अपनी यादों में खो गई !
मैने हाथ जोड़कर बेतवा की तंद्रा तोड़ते हुये निवेदन किया . माते ! इस अबोध बालक की धृष्टता को क्षमा करते हुये मुझे ओरछा की गाथा सुनाइये ना .
बेतवा की हिलोरें तेज होने लगी ....लगा चक्रवात बनने लगे .....मुझे लगा मेरी गलती का दंड मिलने वाला है !
लेकिन
कुछ देर बाद लहरें शांत हो गयी . बेतवा बोली -पुत्र ...आज सुनती हूँ ..इस पावन पुण्य भूमि ओरछा की कहानी ......एक लहर तेजी से मेरे ऊपर से बिना भिगोये गुजर गयी, जैसे माँ ने अपना ममतामयी हाथ मेरे सर पर फेरा हो.
इस पुण्य भूमि की कहानी महाभारत काल से प्रारंभ होती है, जिसका वर्णन महाभारत में भी है .उस काल में किसी कारण वश वेदों का ज्ञान नष्ट हो गया था ,तो ब्रम्हा, बिष्णु और महेश ने मेरे ही तट पर मेधावी यज्ञ का आयोजन कर पुन: वेदों का प्राकट्य किया.
मेरा पावन तट मुनियों की तपोभूमि रही है. आज भी ओरछा में मेरा दक्षिण तट तुंगारण्य कहलाता है, वो तुंग मुनि की तपोभूमि रही है . तुंग मुनि के आशीर्वाद से ही बुंदेलाओं ने ओरछा बसाकर अपनी राजधानी बनाई....
धीरे-धीरे चंद्रमा की आभा कम होने लगी , वो छतरियों के पीछे छुपने लगा ...इधर पूर्व दिशा में भगवान भास्कर उदित होने वाले है...माँ बेतवा ओरछा की स्थापना की कहानी कल सुनाने का वादा कर अपनी लहरों में खो गई. मुझे अचेतन छोड़ !
ओरछा की गाथा की जिज्ञासा मुझे फिर बेतवा के किनारे ले आया . सूर्य बुंदेला शासको की छतरियों की पीछे अस्त हो गया . मैं पास ही ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठकर इंतजार करने लगा. बेतवा लहरें अपनी मस्ती में ही बहती हुई चट्टानों पर उछल-कूद कर रही है. मैं भी उन्हे निहार रहा था, तभी लहरों में से मां बेतवा की आवाज आई - स्वागत है , प्रिय पुत्र ! कहो आज क्या सुनना चाहते हो ?
मैं हाथ जोड़े बोला- माँ , आज मुझे इस बुंदेलाओं की गौरव नगरी ओरछा की गाथा प्रारंभ से सुनाओ न !
बेतवा की लहरें शांत हो गयी, जैसे समाधि में लीन हो गयी हो. कुछ देर के बाद आवाज आयी, पुत्र ओरछा की गाथा की शुरूआत के लिए हमे काशी चलना होगा .
पर माँ आप काशी कैसे जायेगी ? मैने पूछा
लहरों के ऊफान के साथ बेतवा मुस्कुराई ! बत्स मेरा संगम सूर्यपुत्री यमुना से हुआ है, और यमुना का संगम गंगा से हुआ ...और गंगा काशी में है , तो फिर मेरा अस्तित्व काशी में हुआ कि नही ?
बिलकुल ! मैं अपनी नासमझी पर शर्मिंदा होते हुये बोला.
तो बात शुरू होती है, 14 वी सदी के काशी से....काशी के राजा ग्रहरवार थे. राजा ग्रहरवार की दो रानियां थी, पहली से चार पुत्र और दूसरी से एक पुत्र जिसका नाम पंचम था. जब सत्ता प्राप्ति के लिए भाइयों में संघर्ष प्रारंभ हुआ तो पंचम ने स्वयं को इस संघर्ष से दूर कर लिया. पंचम बिंध्यवासिनी देवी का बहुत बड़ा भक्त था. वह प्रतिदिन देवी को अपने रक्त की बूंदों से तिलक करता था. पंचम की पूजा से देवी प्रसन्न हुई .
पंचम की रक्त बूंद पूजा से देवी प्रसन्न हुई और पंचम (जिसका मूल नाम हेमकरण है) को साम्राज्य निर्माता होने का वरदान दिया. चूंकि बिंध्यवासिनी की पूजा पांच रक्त की बूंदों से की गयी , तो हेमकरण पंचम बिंध्येला/बुंदेला कहलाये. देवी ने पंचम को बताया कि एक विशेष वृक्ष पर गिद्ध बैठा होगा , वही पर तुम अपने साम्राज्य की नींव डालना. हेमकरण देवी की आज्ञानुसार अपने कुछ विश्वस्त साथियों के साथ बिंध्यांचल की पहाड़ियों में खोजते-जोहते जेजाकभुक्ति क्षेत्र पहुँचा , यहां पर खंगार क्षत्रिय शासक राज कर रहे थे, उनकी राजधानी कुण्डार थी . कुण्डार का अभेद्य किला जो अब तक अपराजेय था, उसके पास ही वह विशेष वृक्ष जिस पर गिद्ध बैठा था, पंचम बुंदेला को नजर आया. पंचम ने आँख बंद कर देवी को स्मरण किया , देवी भी अपने भक्त की पुकार सुनकर गिद्ध पर सवार होकर पंचम की सहायता के लिए आ पहुँची. पंचम ने देवी का आशीर्वाद पाकर अपराजेय गढ़कुण्डार पर आक्रमण कर दिया. अचानक हुये हमले से खंगार शासक को संभलने का मौका ही नही मिला और अपराजेय गढ़कुण्डार पर विजय पंचम का राजतिलक कर रही थी. चूंकि देवी ने गिद्ध पर सवार होकर पंचम बुंदेला की सहायता की तो पंचम ने सर्वप्रथम देवी गिद्धवाहिनी का मंदिर निर्माण करवाया जो आज भी है. अब पंचम बुंदेला खंगारो के राज्य का शासक था, जिसे बुंदेलखंड नाम दिया गया. पंचम के बाद उनके वंशजों ने न केवल गढ़कुण्डार को सुदृढ़ किया बल्कि बुंदेलखंड के क्षेत्र का भी विस्तार किया. पंचम के वंशज रूद्रदेव ने अपने बढ़े हुये राज्य के हिसाब से नई राजधानी की जरूरत महसूस की. बुंदेलाओं का सौभाग्य था, कि उनके उदय के समय चंदेल साम्राज्य अपनी अंतिम सांसे गिन रहा था. पूरे क्षेत्र में कोई ताकतवर प्रतिद्वंदी नही था. हालांकि पश्चिम भारत में मुस्लिमों के आक्रमण शुरू हो चुके थे. पृथ्वीराज चौहान राजपूताना में गौरी के हाथों पराजित हो चुके थे ।
बेतवा की तरंगे आज कुछ ज्यादा ही हिलोरे मार रही है. मैने जब इसका कारण मां बेतवा से जानना चाहा तो बेतवा की एक लहर उछलकर मेरे ऊपर से गुजरी मेरे बालों को गीला करते हुये ..जैसे कोई मां अपने बच्चे के सर पर प्यार से हाथ फेर रही हो . मां का यह स्नेह मुझे हृदय तक भिगो गया. तब मां बेतवा ने बताया - पुत्र ! आज बुंदेला साम्राज्य की गाथा बहुत ही अहम् मोड़ लेने वाली है . आज बुंदेला वीर मेरे तट पर आने वाले है, यही याद कर प्रफुल्लित हो रही हूँ.
ये सुनकर मेरी उत्सुकता बढ़ने लगी . माँ जल्द ही बताओं न ! आगे क्या हुआ ?
बत्स ! जरा धैर्य धारण करो ! सब सुनाती हूँ . जरा मुझे भी तो उस क्षण को याद कर आनंद ले लेने दो. और बेतवा की लहरें ज्वार की भांति ऊंची उठकर शांत हो गयी. मैं ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा प्रतिक्षारत बेतवा की लहरें पर चंद्रमा के प्रतिबिंब को झूला झूलते देखने लगा.
आत्म आनंद के बाद बेतवा की आवाज फिर से आई . रूद्रदेव अपनी राजधानी गढ़कुंडार से शिकार खेलने मेरे और जामनी के संगम से लगे तुंगारण्य क्षेत्र की ओर बढ़े . मेरे दक्षिण तट पर तुंग मुनि का आश्रम व तपोवन था, जिस कारण इस क्षेत्र को तुंगारण्य कहते है. पूरा क्षेत्र प्रकृति की गोद में बसा हुआ था, जिसे प्रकृति ने अपने दोनो हाथों से संवारा था. रूद्रदेव को यहां की प्राकृतिक सुंदरता ने मोह लिया. राजा रूद्रदेव ने तुंग मुनि से आज्ञा प्राप्त कर मेरे उत्तरी तट के घने वन में शिकार के लिए अपने दल-बल को आगे बढ़ाया. राजा का शिविर की व्यवस्था की गई . तभी रूद्र को एक शिकार नजर आया...उसने अपने शिकारी कुत्तों को आदेश दिया. ...ओरछा (मतलब उछलो) शिकार जिस दिशा में भागा वहां की सुंदरता रूद्र देखता ही रह गया ! रूद्र अपने प्रधानमंत्री से बोला - प्रधानमंत्री जू ! मेरे विचार से यह जगह राजधानी हेतु उत्तम रहेगी . आपका क्या विचार है ?
प्रधानमंत्री- महाराज ! आपका विचार अतिउत्तम है , यह जगह एक ओर बेतवा व जामनी की वजह से तो दूसरी ओर ऊंची पहाड़ियों की वजह से सुरक्षित भी है, और प्रकृति ने भी इस पर पूरा दुलार किया है . राजधानी के लिए इससे उत्तम स्थान आसपास कहीं नही है .
रूद्रदेव - लेकिन हम अपनी नई राजधानी का नाम क्या रखेंगे ?
प्रधानमंत्री - महाराज जू ! इस जगह के देखने के पूर्व आपके मुँह से " ओरछा " शब्द निकला था, तो क्यों न इसका नाम ओरछा ही ऱखे ?
रूद्रदेव - बहुत बढिया ! प्रधानमंत्री जू . आगे की तैयारी करें .....
और इस तरह मेरे तट पर बुंदेलाओं की नयी राजधानी ' ओरछा ' का निर्माण जोर शोर से शुरू हो गया .....
ओरछा का राजमहल 
यह कहकर बेतवा शांत हो गयी....
फिर कुछ समय पश्चात् ...
माँ बेतवा आनंदित होकर ओरछा की निर्माण गाथा सुना रही थी , उनकी लहरें प्रसन्नता के मारे हिलोर मार रही थी, ऊपर आकाश में चंद्रमा भी गाथा सुनने मेघ-झरोखे से झांक रहा था ! राजा रूद्रदेव ने सन 1531 में ओरछा किले की नींव रखी जिसे हजारों मजदूरों और सैकड़ो मिस्त्रियों ने दिन-रात मेहनत कर सन 1539 में किले सहित ओरछा का सुंदर व भव्य नगर तैयार किया. कहकर माँ बेतवा चुप हो गई ....लहरों का प्रवाह शांत ही रहा..बेतवा की ध्वनि कुछ पल बाद प्रकट हुई...बत्स ...रूद्रदेव के बाद उसका पुत्र भारतीचंद्र राजा हुआ, जिसने ओरछा को और सजाया संवारा. मगर ओरछा को गौरवमयी क्षण तो भारतीचंद्र के पुत्र मधुकर शाह के राज्यकाल में मिलने वाला था. मधुकर शाह सन 1554 ई० में ओरछा की राजगद्दी पर बैठे. मधुकर शाह कृष्ण भक्त थे, सखी संप्रदाय को मानने के कारण स्त्रियों की भेषभूषा में कृष्ण की भक्ति करते , नाच-गान करते थे. प्रतिवर्ष ब्रज की यात्रा करते थे. मैने पूछा - क्षमा कीजिए माँ , ये सखी संप्रदाय क्या है ?
माँ बेत्रवती मुस्कुराते हुये बोली- पुत्र बहुत से साधु कृष्ण को सखा और स्वयं को उनकी सखी मानकर उनकी भक्ति करते है . आराधना के समय स्त्रियों जैसे वस्त्र आभूषण पहनकर कृृष्ण की प्रतिमा के सामने नाचते गाते है . भले ही मधुकर के आराध्य कृष्ण थे , परंतु ओरछा की नियति में तो राम लिखे थे ! आखिर कैसे मधुकर शाह के जीवन में गणेश कुंवरि ने राम का प्रवेश हुआ ? कैसे अयोध्या के रामलला ओरछा में रामराजा हो गये ? क्यों मधुकर शाह का बनाया भव्य चतुर्भुज मंदिर सूना रह गया ? ये प्रश्न अनुत्तरित छोड़ बेतवा अपने मगन हो मुझे ग्रेनाइट की शिलाओं पर छोड़ गयी...
अगले दिन -
बेतवा की लहरें मध्यम गति से प्रवाहित हो रही है...मैं ओरछा की कहानी सुनने की जिज्ञासा लिए ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा बेतवा के उत्तरी तट पर बनी बुंदेला शासको की छतरियों( समाधियों) में से मधुकर शाह की भव्य छतरी को निहार रहा हूँ...मधुकर शाह हुमांयु व अकबर के काल में भी मुगल हमलों से न केवल वीरता से लड़े बल्कि मुगल सेनाओं को नाको चने चबवायें. बढते मुगल साम्राज्य के बीचो बीच बुंदेला पताका लहरा रही थी . मैंने मन ही मन इस महान बुंदेला को नमन किया. तभी बेतवा की लहरों में हलचल शुरू हुई....मां बेतवा की उल्लासित आवाज़ ने मेरी तंद्रा भंग की. बत्स आगे की कहानी सुनो...मधुकर शाह जहां बहुत बड़े कृष्ण भक्त थे, वहीं उनकी पहली रानी गणेश कुंवरि महान रामभक्त थी. महाराज हर बर्ष की तरह ब्रज यात्रा करने वाले थे, तो उन्होने गणेश कुंवरि को भी साथ लेने का निश्चय किया. जब महाराज ने महारानी से जब ब्रजयात्रा की बात कही तो महारानी जू ने ब्रज की जगह अवध जाने की बात कही. महारानी की बात सुनकर महाराज क्रोधित हो गये , बोले- ठीक है, महारानी जू , अगर आप इतनी बड़ी रामभक्त हो , तो अवध से तभी लौटना जब अपने राम को ओरछा लेके आओ. महारानी गणेश कुंवरि भी क्षत्राणी थी, उन्होने भी संकल्प लिया कि वो ओरछा तभी लौटेंगी जब अपने आराध्य राम को लेकर ही आयेंगी अन्यथा प्राण त्याग देंगी. इधर महाराज मधुकरशाह ब्रज की यात्रा के लिए निकले और उधर महारानी गणेश कुंवरि अवध की यात्रा पर . अवध पहुँचकर महारानी जू ने सरयू तट पर अपने आराध्य श्री राम को पाने के लिए तपस्या शुरू कर दी ...जब प्रभु प्रसन्न नही हुये तो अन्न जल त्यागकर तपस्या शुरू कर दी ....शरीर बिलकुल सूख गया...बस प्राण किसी तरह प्रभु की आस में अटके थे, तब भी प्रभु प्रसन्न नही हुये तो रानी जू ने सरयू में छलांग लगा दी .......बेतवा की लहरें ववंडर की भांति तेजी से घूमने लगी.. मेरा मन भी आशंकित हुआ ...मगर बेतवा मेरे मन में कई प्रश्न छोड़कर चली गयी ..क्या गणेश कुंवरि ने प्राण त्याग दिये ? क्या प्रभु राम कलियुग में भी प्रकट हुये ? क्या राम ओरछा आ पाये ? क्या मधुकरशाह का मन पिघला ?
क्रमशः अगले भागों में भी जारी.....

65 टिप्‍पणियां:

  1. एक दम रोमांचति हो गया पढ़ के दिल की धड़कन बड़ गयी अगले भाग का बेसब्री से इंतजार रहेगा।

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    1. आप सबकी सराहना एवं प्रोत्साहन से ही अगले भाग की प्रस्तुति जल्द ही संभव होगी ।

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    2. आप सबकी सराहना एवं प्रोत्साहन से ही अगले भाग की प्रस्तुति जल्द ही संभव होगी ।

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    3. आपका प्रस्तुति कारण का ढंग अनूठा है।

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    4. आपका प्रस्तुति कारण का ढंग अनूठा है।

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  2. एक दम रोमांचति हो गया पढ़ के दिल की धड़कन बड़ गयी अगले भाग का बेसब्री से इंतजार रहेगा।

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  3. बहुत बढिया, मेरी भानगढकथा इसी शैली में है।

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    1. आप की पुस्तकों का इंतज़ार अभी तक है ।

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    2. आप की पुस्तकों का इंतज़ार अभी तक है ।

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  4. बेहतरीन .....तो सीधे सीधे कहिये न तिलस्म रच रहे हैं ...बिलकुल माहिष्मती साम्राज्य सरीखा | अद्भुत ..रोमांचकारी ...जारी रहिये ..

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    1. आभार ।
      आप सभी का प्रोत्साहन ही अगली कड़ी का आधार बनेगा ।

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  5. एक योग्य व्यक्ति ही माता बेत्रवती से संवाद स्थापित कर सकता था,और ओरछा गाधा श्रवण का पात्र बन सकता था।
    आपने यह गाधा बहुत ही शांत भाव से सुनी,
    और इस गाधा के स्वर्णिम शब्दों को एक सूत्र में पीरो कर हमे भी रसपान करा कर कतार्थ कर दिया।

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    1. अरे डॉ साहब ! आपने तो चने के झाड़ पर चढ़ा दिया । खैर माँ बेत्रवती और रामराजा सरकार की कृपा तो है ही । आभार

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  6. दिल से लिखी गई, कथा व इतिहास बताने(कहने) का बेहतरीन उपाय सुझाया है आपने। इतना स्पष्ट संवाद की बस सुनते रहो........

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    1. आभार सचिन भाई ..
      आप लोगों का भी सहयोग और प्रोत्साहन रहा है । आभार

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  7. नि:शब्द कर दिया ! पहले यूं ही पढ़ना शुरू किया पर कुछ लाईने पढ़ने के बाद एक साईड में बैठकर पूरी पोस्ट पढ़ी ! जबरदस्त !
    मुझे लगता है आपने जी की जगह जू लिखा है जैसे रानी जू , प्रधानमंत्री जू !

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    1. हरेंदर भाई बुन्देली और ब्रजभाषा में जी को जू ही बोलते है । जैसे वीर सिंह जू देव , राधा जू , किशोरी जू आदि
      प्रोत्साहन हेतु आभार

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  8. मजा आ गया...शहद का छत्ता जो हाथ लग गया।

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    1. जोगी जी
      बस यूँ ही स्नेह बनाये रखे शहद मिलती रहेगी ।

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  9. अनुराग जी आप जैसे ओरछा वासियों के अनुभव का प्रतिफल है ।

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  10. Adbhut panday ji.orcha ka itihas ma betwa k madhayam se man ko aanandit kar gaya.able part k intzar me....

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  11. क्या बात है पांडेय जी बहुत बढ़िया। अगले भाग का इंतज़ार रहेगा। फोटो कम रही और फोटो का साइज बड़ा कर दीजिये।

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    1. सुशिल जी , अभी अधिक फ़ोटो की जरुरत महसूस नही हुई । क्योंकि कथा ही इतनी कसी हुई थी । अधिक फ़ोटो कथा से भटकाव ही पैदा करती । स्नेह बनाये रखियेगा ।

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  12. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  13. पहले भी अपने ग्रुप पर हम बेतवा में नहा कर पावन हो चुके है आज तो इस तिलिस्म से निकलने का मन ही नहीं हो रहा है ..बहुत खूब

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    1. बुआ जी ग्रुप की ही देन है । जो इस पोस्ट को लिख पाया वरना ब्लॉगिंग बंद सी हो गयी थी । स्नेह बनाये रखिये ।

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  14. वाह इतिहास का वर्णन करना कोई आपसे सीखे! शानदार पद्धति, शानदार शब्द, शानदार शैली और बाकि सब कुछ www.travelwithrd.com! बस आप लिखते बहुत कम ही हो!

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    1. प्रजापति जी कम लिखने का कारण नौकरी की व्यस्तता है । हालाँकि इतिहास पर लिखने के लिए बहुत पढना और शोध करना पड़ता है । साथ ही ध्यान रखना पड़ता है , कि रोचकता भी बनी रहे । आपके प्रोत्साहन पूर्ण शब्दों के लिए आभार

      हटाएं
  15. मुकेश जी, मैं उन खुशकिस्मत लोगों में से हूँ जिन्होंने इस गाथा के प्रारम्भिक ड्राफ्ट को सर्वप्रथम एक धारावाहिक के रूप में पढ़ा है। आज जब, वह सभी खण्ड एक पोस्ट के रूप में सामने हैं तो मन बहुत अधिक आह्लादित है।
    आपकी लेखन शैली के तो हम सब पहले से ही मुरीद रहे हैं, और ऐसे पौराणिक और मिथकीय गल्प को लिखने के लिए जिस भाषा शैली, रोचकता के साथ साथ कथा प्रवाह को बनाये रखने के साथ साथ जिस प्रकार के शब्द चयन की आवश्यकता होती है यह पोस्ट पूरी तरह से उस पर खरी उतरती है।
    यकीन मानिए, इसे पढ़ते हुए एक बार फिर से उस समय में पहुँच गया जब इस गाथा के अंकों के आरंभिक ड्राफ्ट्स को पढ़ने हेतु हम सब परम् जिज्ञासावश उत्सुक रहते थे।

    इस लेखन हेतु आपका बहुत बहुत आभार और आगे के अंकों के लिए बहुत बहुत शुभकामनाएं :)

    सादर

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  16. मुकेश जी, मैं उन खुशकिस्मत लोगों में से हूँ जिन्होंने इस गाथा के प्रारम्भिक ड्राफ्ट को सर्वप्रथम एक धारावाहिक के रूप में पढ़ा है। आज जब, वह सभी खण्ड एक पोस्ट के रूप में सामने हैं तो मन बहुत अधिक आह्लादित है।
    आपकी लेखन शैली के तो हम सब पहले से ही मुरीद रहे हैं, और ऐसे पौराणिक और मिथकीय गल्प को लिखने के लिए जिस भाषा शैली, रोचकता के साथ साथ कथा प्रवाह को बनाये रखने के साथ साथ जिस प्रकार के शब्द चयन की आवश्यकता होती है यह पोस्ट पूरी तरह से उस पर खरी उतरती है।
    यकीन मानिए, इसे पढ़ते हुए एक बार फिर से उस समय में पहुँच गया जब इस गाथा के अंकों के आरंभिक ड्राफ्ट्स को पढ़ने हेतु हम सब परम् जिज्ञासावश उत्सुक रहते थे।

    इस लेखन हेतु आपका बहुत बहुत आभार और आगे के अंकों के लिए बहुत बहुत शुभकामनाएं :)

    सादर

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    उत्तर
    1. पाहवा जी , आपकी उज्जैन गाथा ही इस पोस्ट की प्रेरणा रही है । और आप सभी के प्रोत्साहन से ही ये इस रूप में आ पायी है। स्नेह और मार्गदर्शन बनाएं रखिये ।

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    2. पाहवा जी , आपकी उज्जैन गाथा ही इस पोस्ट की प्रेरणा रही है । और आप सभी के प्रोत्साहन से ही ये इस रूप में आ पायी है। स्नेह और मार्गदर्शन बनाएं रखिये ।

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  17. शब्द नहीं हैं चन्दन जी ,आपकी सराहना में |पढ़ते पढ़ते ऐसा लगा जैसे उसी काल में पहुंच गये हों |ऐसे शब्दों में रचकर आपने माँ बेतवा की कहानी लिखी कहीं से भी ऐसा नहीं लगा की आप साक्षात् माँ से बात नहीं कर रहे हों ,बहुत खूब |

    उत्तर देंहटाएं
  18. बेतवा की कहानी समग्र रूप में पहली बार पढ़ रहा हूँ , ऐसे टुकड़ों -टुकड़ों में आपकी ही लेखनी से कई बार सुनी है ! बहुत सी नई जगह , नयी बात देखने समझने को मिली ! लेकिन एक सवाल - अशोक की प्रेयसी का नाम -कारुवाकी था या कौरवकी ? बहुत ही बढ़िया फ्लो में लिखी पोस्ट के लिए साधुवाद पाण्डेय जी !!

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    उत्तर
    1. अशोक की प्रेयसी जो बाद में पत्नी भी बनी उसका नाम कारुवकी था ।वो विदिशा की रहने वाली थी । उस समय अशोक उज्जैन का राज्यपाल था ।

      हटाएं
  19. साधुवाद मुकेश जी👏👏👏
    बहुत सुन्दर शैली , माँ बेत्रवती से अनूठा सम्वाद, बेहतरीन शब्द चयन । कहीं कोई कमी नही । इतिहास को देखने कअ नया दृष्टिकोण ।

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  22. पाण्डेय जी नमस्कार ,
    सच कहूं तो मैं ब्लॉग बहुत ही कम पढता हूँ कारण मुझसे हबड तबड में पढ़ा ही नहीं जाता .... और न ही पढ़ना चाहिए ! मेरा मानना है के एक लेखक ने जिस आत्मीयता और समय के साथ उसे लिखा है, पढ़ने वाले को भी कम से कम उसी तन्मयता और समझ का सहारा तो लेना ही चाहिए .. आओ ,पढ़ो, और टिप्पणी करो, जाओ ..... ये मुझसे न हो पाता! क्षमा चाहूंगा !! लेकिन आज मैंने उसी तन्मयता से पढ़ा बहुत ही उम्दा शुरुवात, ऐसा लगा मैं स्वयं सब देख रहा हूँ .. इतिहास के इतने सुंदर रूप को वर्तमान में कैसे जिवंत कियाआपने, वो कबीले तारीफ़ है! एक सुझाव हर रात एक जैसा माहौल और शाब्दिक वर्णन समरूपता पैदा कर नीरसता ला सकता है .. आपकी अगली पोस्ट का इंतज़ार नहीं करूँगा .... अभी पढ़े देता हूँ हा हा हा ....और हाँ इसबार जाओ तो माँ बेतवा को मेरा प्रणाम बोल देना कहना . आपका एक छोरा, गंगा किनारे वाले ने सप्रेम भेजा है

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  23. आपका सुझाव विचारणीय है । अगली पोस्ट में माहौल को आज से जोड़ा है । आपका प्रणाम माँ बेतवा ने स्वीकार कर लिया है । आभार
    स्नेह बनाये रखिये

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  25. mukesh ji bhut uttam tarike se vivran diya aap ne, kya aap ki koi yah gatha market me puustak ke roop me uplabdh he kya...

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    1. फ़िलहाल तो नही है । आप लोगों की दुआओं से जल्द ही होगी । आभार

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  26. बहुत ही शानदार लिखा है भाई साहब आपने पड़के मज़ा आगया, एक दम हट कर लेकिन बहुत ही प्रभावशाली। आपकी लेख़न क्षमता ने बहुत ही प्रभावित किया है, बहुत बहुत बधाई

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  27. पारियात्र पर्वत से निकलती बेत्रवती इसी का पानी पी कर कालीदास कवि कालीदास,राजा विक्रमादित्य की गद्दी जमी,सिंहासन बत्तीसी का मसाला जुटा,
    एक एक पुतली हजारो पर भारी, बत्तीसों की हलक में बेत्रवती का पानी :)
    SUraj mishra, bhadohi

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  28. वाह पांडेय जी,
    मज़ा आ गया पढ़कर.कितने सुन्दर शब्द, कितनी उत्कृष्ट भाषा शैली, कितना सुन्दर तथा सजीव वर्णन. हम तो आपके लेखन के फैन हो गए.

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  29. मुकेश जी , एक सच्ची बात कहुं! वाह मज़ा आ गया पढ़कर, ऐसा प्रतीत हो रहा है कि जैसे हम खुद वहां पर हैं

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ab apki baari hai, kuchh kahne ki ...

orchha gatha

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