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शुक्रवार, 8 सितंबर 2023

मोबाइल और आजकल का बचपन



मोबाइल अंग्रेजी भाषा का शब्द है, जिसका हिंदी अर्थ 'गतिशील' होता है। मगर आज मोबाइल फोन के लिए रूढ़ हो चुके शब्द 'मोबाइल' ने आजकल के बच्चों को गतिहीन कर दिया है । अब बच्चों में बचपना बचा ही नही । पैदा होते ही उन्हें खेलने के लिए मोबाइल सौंप दिया जाता है, जो उनके बचपन को ही लील जाता है । 

आज लगभग हर भारतीय परिवार जिनमें छोटे बच्चे है, उनमें बच्चों को मोबाइल की लत आम है । इसका सबसे बड़ा कारण स्वयं अभिभावक ही है । माताएं अपने घरेलू कार्यों के बीच बच्चों का मन बहलाने के लिए मोबाइल पकड़ा देती है, शुरू-शुरू में तो उन्हें यह आदत बड़ी राहत देती है । मगर अब बच्चों को हर समय मोबाइल चाहिए । उनकी दिन भर की सारी गतिविधियों में मोबाइल अनिवार्य हो जाता है, और समस्या यही से शुरू होती है । खाते समय मोबाइल, पढ़ते समय मोबाइल, खेलते समय भी मोबाइल । खेल भी मोबाइल गेम वाले खेल हो गए है । अब यूपीआई और पेमेंट एप्प के कारण इन गेम से खेलते समय कई बार बच्चे हजारों रुपये इन गेम भी खर्च कर देते है, अभिभावकों को जब पता चलता है, तब तक एक बड़ी रकम खर्च हो चुकी है । पबजी गेम के कारण बच्चे आक्रामक और चिड़चिड़े होने लगे थे, तो एक कदम आगे बढ़ते हुए ब्लू व्हेल गेम के कारण तो बच्चे आत्महत्या तक करने लगे थे । मजबूरन कई देशों को इन मोबाइल गेम पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाना पड़ा । 

मोबाइल फोन से हानिकारक रेडिएशन किरणें निकलती है, जो न केवल शरीर को हानि पहुँचाती है, बल्कि मस्तिष्क पर भी बुरा असर डालती है । बच्चों के मानसिक स्तर को प्रभावित करती है । शुरू शुरू में बच्चा चिड़चिड़ा और जिद्दी होता है, बाद में वो पागलों जैसी हरकतें करने लगता है । मोबाइल न मिल पाने पर वो घर के सामान की तोड़-फोड़ भी करने लगता है । 

अब अभिभावक इस समस्या से निजात कैसे पाये ? क्योंकि आज हमारे दैनिक जीवन में मोबाइल जरूरत नही मजबूरी बन गया है । इसके बिना आज के जीवन की कल्पना नही की जा सकती है । नौकरी और व्यवसाय भी मोबाइल के माध्यम से चल रहे है।  पैसे का लेन-देन भी मोबाइल के माध्यम से हो रहे है । यहाँ तक बच्चों के होमवर्क भी स्कूल वाले मोबाइल पर ही भेजते है । तो आज मोबाइल से बच्चों को दूर करना तो असंभव है, लेकिन हम अपनी निगरानी में बच्चों के मोबाइल उपयोग को सीमित कर सकते है । बच्चों के मोबाइल प्रयोग का समय निश्चित कर दें । उन्हें इकट्ठा लंबे समय के लिए मोबाइल न देकर थोड़े-थोड़े समय के लिए मोबाइल दे सकते है । उनके मोबाइल इस्तेमाल के समय अभिभावकों की निगरानी जरूरी है, ताकि हमें पता रहे कि बच्चे मोबाइल पर क्या कर रहे है । बच्चों को मोबाइल देते समय उसे चाइल्ड मोड (आजकल लगभग सभी स्मार्ट फोन में यह फीचर आता है ।) में करके दें । इसके अलावा पेमेंट वाले एप ऐसे पासवर्ड से लॉक कर दें, जिसके पासवर्ड बच्चे उपयोग नही कर पाये । जैसे फिंगर प्रिंट या फेस लॉक कर सकते है । सोशल मीडिया वाले एप पर उनका अकाउंट कम से कम 15 वर्ष के होने के बाद ही बनाये । अपने सोशल मीडिया के अकाउंट वाले एप लॉक रखे । पासवर्ड में पैटर्न या पिन की जगह फिंगरप्रिंट या फेस लॉक रखे ताकि आपकी जानकारी के बगैर किसी एप का इस्तेमाल न हो । बच्चों को आउटडोर गेम खेलने तो प्रेरित करें, हो सके तो उनके साथ भी खेले । समय-समय पर उनके साथ घर से बाहर घूमने जाए । घर पर भी उन्हें पर्याप्त समय दें, उन्हें कहानियां और किस्से सुनाए । उनकी बातें सुने, उनकी स्कूल की गतिविधियों को सुने, अपने स्कूल के अनुभव भी उन्हें सुनाये । जब आप घर पर हो तो खुद भी मोबाइल का कम से कम इस्तेमाल करें । रात को खाने के समय से लेकर सुबह तक यदि बहुत जरूरी न हो तो मोबाइल का प्रयोग न करें । मोबाइल में सीमित और उपयोगी एप रखे । गेम और टिकटोक सरीखे एप न रखे । बच्चों के लिए कामिक्स और किताबें पढ़ने की आदत डालें । रचनात्मक गतिविधियों को बढ़ावा देने, जैसे चित्रकला, क्राफ्ट बनाना, गायन-वादन आदि कलाओं से जोड़े ताकि उनका फुरसत का समय उसमें व्यतीत हो । बच्चे जितना अधिक अन्य गतिविधियों में व्यस्त रहेंगे वो उतना ही मोबाइल से दूर रहेंगे ।

उन्हें ये आदत डालें कि मोबाइल का उतना ही इस्तेमाल करें, जितनी जरूरत हो ताकि मोबाइल लत न बन पाये । हालांकि इसके लिए अभिभावकों को भी अपनी मोबाइल से जुड़ी आदतें कम करनी होगी । 


गुरुवार, 6 जून 2013

अमीर खुसरो : एक अद्भुत महान हिंदुस्तानी

जब कभी किसी ग़ज़ल की गहराई में डूबता हूँ , या फिर किसी कब्बाली को सुनते हुए दिल झूम उठता है , या किसी भी भारतीय संगीत को सुनते हुए ढोलक - तबले की थाप या सितार की झंकार से दिल नाचने लगता है , तो मन उस महान आत्मा के सम्मान में अपने आप नतमस्तक हो जाता है , जिसकी पहेलियाँ बचपन में खूब बुझी थी . जी हाँ , आज मैं बात  कर रहा हूँ , भारतीय इतिहास के उस महान व्यक्ति की जो अपने आप को " तूती -ए- हिन्द " यानि  हिंदुस्तान का तोता कहता था . क्योंकि रोम -रोम  में हिन्द बसा था . कभी -कभी जब सोचता हूँ , अमीर खुसरो के बारे में तो लगता है , कि क्या सचमुच कोई व्यक्ति इतना प्रतिभाशाली हो सकता है ? या फिर ये इतिहास की कोरी गप्प है ? 
मगर  जब मैंने  इतिहास की कई किताबो को खंगाला तो मालूम चला , कि सचमुच खुसरो इतने प्रतिभाशाली थे  .  खुसरो का जन्म एटा जिले के पटियाली   ( उत्तर  प्रदेश   ) में 1253 ईस्वी में हुआ  था .खुसरो का पूरा नाम अबुल हसन यमीनुद्दीन ख़ुसरौ था . दुनिया खुसरो को सितार , ढोलक ,तबले जैसे वाद्य यंत्रो  और ग़ज़ल , कव्वाली   तथा  कौल , तलबाना, तराना , और   ख्याल  के अविष्कारक के नाम से जानती है , मगर खुसरो अपने वतन हिंदुस्तान से बेइंतिहा मोहब्बत करते थे . भले ही खुसरो के पूर्वज मध्य एशिया से आये तुर्क  हो मगर खुसरों खुद को " हिंदुस्तान का तोता " (तुते-ए- हिन्द ) कहलाना पसंद करते थे . 
खुसरो अपने पीर (गुरु ) सूफी संत हज़रत निजामुद्दीन औलिया को बहुत मानते थे . कहते है , कि जिस दिन
हज़रत निजामुद्दीन औलिया इस दुनिया से रुखसत हुए , और ये खबर खुसरो को पता चली तो खुसरों ने भी अपने प्राण त्याग  दिए. आज भी दिल्ली में  हज़रत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह  के बगल में खुसरों की भी मजार बनी है . खुसरो की मृत्यु १३२५ ईस्वी में हुई थी . 
खुसरों को हिंदी , फारसी , अरबी , पंजाबी और संस्कृत भाषाएँ आती थी , और उर्दू के तो खुसरो जनक ही कहे जाते है . खुसरों जितने भारत में लोकप्रिय है , उतने ही आज भी पाकिस्तान में भी लोकप्रिय है . नुसरत फ़तेह अली खान जैसे कई बड़े गायकों ने खुसरों की गजलें और कब्बालियाँ  गायीं है .  खुसरो लोक काव्य में भी काफी लोकप्रिय रहे है . जहाँ उनके सूफी कलाम आध्यात्मिकता की ओर ले जाते है , वही उनकी मुकरियां और पहेलियाँ आज भी जनमानस के मन से रची बसी है . मैंने तो बचपन में खुसरो की कई पहेलियाँ रट रखी थी . उनमे से कई तो आज भी याद है - 
१- एक थाल मोती से भरा , सबके सर पे औंधा धरा 
थाल चारो ओर फिरे, मोती उसमे से एक न गिरे . 


२- सावन - भादों बहुत चालत है , माघ-पूष में थोरी 
एरी सखी मैं तुझसे पूछूं ,  बूझ  पहेली मोरी  

३- हरी थी , मन भरी थी , 
राजा जी के बाग़ में दुशाला ओढ़े खड़ी थी  
( आपने भी ये पहेलियाँ पढ़ी - सुनी होगी , इसलिए इनके जवाब मैं नही लिख रहा हूँ . देखते है , कितने लोग इनके जवाब दे पाते है , अगर आपको नही पता तो दुसरो से पूछिए ....) 

खुसरों बहुत ही प्रतिभाशाली व्यक्ति होने के साथ ही हाजिर जवाब भी थे . एक बार खुसरों कहीं जा रहे थे , तो उन्हें प्यास लगी गाँव के पनघट में चार पनिहारिन पानी भरती हुई उन्हें नज़र आई , तो खुसरो ने उनसे पानी पिलाने की प्रार्थना की . खुसरो की राजसी पोषक देखकर पनिहारिनों ने खुसरों से परिचय पूछा . तो खुसरों ने जब अपना परिचय दिया . लेकिन पनिहारिनें ये मानने तैयार ही न थी , कि उनके सामने अमीर खुसरो खड़े है . फिर पनिहारिनों  ने खुसरो को कविता सुनाने को कहा , तो खुसरो ने उनसे विषय पूछा . तब एक ने खीर , दूसरी ने चरखा , तीसरी ने कुत्ता और चौथी ने ढोल पर कविता सुनाने को कहा . खुसरों ने तुरत दो पंक्तियाँ बनाकर सुना दी - 
खीर बनाई जतन से , चरखा दिया चलाय
आया कुत्ता खा गया , तू बैठी ढोल बजाय 
और खुसरो पानी पीकर चलते बने . खुसरों मध्यकालीन इतिहास के एकमात्र व्यक्ति है , जिन्होंने सात सुल्तानों का न केवल शासन काल देखा , बल्कि उनके दरबारी भी रहे है . खुसरो की सबसे ज्यादा पूछ-परख मोहमद - बिन - तुगलक के समय रही है . 
खुसरों की मुकरियां भी लोगों में लोकप्रिय रही है , इनमे से एक आपके समक्ष प्रस्तुत है - 

रात समय वह मेरे आवे। भोर भये वह घर उठि जावे॥
यह अचरज है सबसे न्यारा। ऐ सखि साजन? ना सखि तारा॥

नंगे पाँव फिरन नहिं देत। पाँव से मिट्टी लगन नहिं देत॥

पाँव का चूमा लेत निपूता। ऐ सखि साजन? ना सखि जूता॥

वह आवे तब शादी होय। उस बिन दूजा और न कोय॥

मीठे लागें वाके बोल। ऐ सखि साजन? ना सखि ढोल॥

जब माँगू तब जल भरि लावे। मेरे मन की तपन बुझावे॥

मन का भारी तन का छोटा। ऐ सखि साजन? ना सखि लोटा॥

बेर-बेर सोवतहिं जगावे। ना जागूँ तो काटे खावे॥

व्याकुल हुई मैं हक्की बक्की। ऐ सखि साजन? ना सखि मक्खी॥

अति सुरंग है रंग रंगीलो। है गुणवंत बहुत चटकीलो॥

राम भजन बिन कभी न सोता। क्यों सखि साजन? ना सखि तोता॥

सोमवार, 17 दिसंबर 2012

जानिए देहभाषा (बॉडी लेङ्गुएज ) से दूसरो की अनकही बातें ..!

मित्रो ,
क्षमा सहित  नमस्कार ,
                    आजकल  मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा की तैयारी में व्यस्त होने के कारण ब्लॉग जगत को समय नही दे पा रहा हूँ . परीक्षा के नए पैटर्न में प्रारंभिक परीक्षा के द्वितीय प्रश्न पत्र में  मैंने संचार कौशल टॉपिक के अंतर्गत देहभाषा (बॉडी लेङ्गुएज ) के बारे में कई रोचक बातें पढ़ी . जो कि हमारे दैनिक जीवन में भी बहुत उपयोगी है . तो मैंने सोचा क्यों न इसे आप सभी से बांटा जाये . हैं न ?
              शाब्दिक भाषा के विकास के पूर्व मानव अपने विचारों एवं भावनाओं का विनिमय संकेतों अथवा देहभाषा के माध्यम से ही करता था .यह भाषा अचेतन मन को समझने हेतु अत्यंत उपयोगी होती है . अगर हम देहभाषा को समझना जान ले , तो लोगों की उन बातों को भी जान सकते है , जो वो हमें बताना नही चाहते  है. या फिर हमसे कोई बात छुपा रहे हो .हालाँकि कुछ चतुर और धूर्त लोग देहभाषा के माध्यम से बेबकूफ बना सकते है . मगर सामान्यतः हम देहभाषा से लोगों के मनोभावों को समझ सकते है .
तो चलिए जानते है , कुछ महत्वपूर्ण तथ्य :-
- अँगुलियों को मोड़ना या चटकाना व्यक्ति के अंतर्द्वंद को बताता है .
- हथेलियों को रगड़ना (जब ये ठण्ड के कारण नही हो ) प्रतीक्षा या शुभ फल की आशा का संकेत है .
- जब व्यक्ति अपने हाथ टेबल पर रखकर उनकी संयुक्त मुट्ठी बनाये  और इस पर पर्याप्त जोर रखे तो यह स्थिति विचार- भिन्नता का सूचक है . इतना ही नही ऐसी स्थिति व्यक्ति अपने विचारो को व्यक्त करने के लिए व्यग्र रहता है .
- जब बांहों को छाती के इर्द-गिर्द बांधना नकाराक्त्मकता , बोझिलता व् उदासीनता का परिचायक है . कभी-कभी व्यक्ति प्रतिकूल परिस्थिति के कारण जब व्यक्ति अचानक सोचने हेतु विवश होता है , तो भी ऐसा करता है .
- यदि किसी व्यक्ति का चेहरा सामान्य अवस्था में है तथा चेहरा मुड़ा हुआ है , तो यह मानिये कि वह आपसे ऊब चुका है.
- यदि व्यक्ति का चेहरा सामान्य अवस्था में है , उसके ओंठों पर कृत्रिम मुस्कान नही है , और ठुड्डी आगे की ओर है , तो वह आपकी उपस्थिति को महत्व दे रहा है
- व्यक्ति के आयताकार या चौड़ी मुस्कान का अर्थ होता है , कि वह अपनी इच्छा के विपरीत न चाहते हुए भी विन्रमता प्रदर्शित करता है .इस मुस्कान में ओंठ ऊपरी व् निचले दांतों पर आयताकार रूप लेते हुए खिंच जाते है . प्रायः ऐसा किसी अधिकारी के कार्यालय भ्रमण के दौरान उसके अधिनस्थो द्वारा किया जाता है.
- आत्मविश्वास से परिपूर्ण व्यक्ति आँखों में आँखें डालकर बात करता है .ऐसा व्यक्ति वार्ता के दौरान पलकें भी कम झपकाता है .
-कम आत्मविश्वास वाले व्यक्ति बात करते समय अधिक देर तक आँखे नही मिला पाते है , जो लोग कुछ छुपाना चाहते है , वे भी आँखे मिलाने से कतराते है . (हालाँकि कुछ लोग शर्म के कारण भी आँखे नही मिलाते )
 - ऊपर की ओर उठी हुई भौहें व्यक्ति के अविश्वास और ईर्ष्या को प्रकट करती है .
-जो लोग अपनी भुजाओं को तेजी से झुलाते हुए ( परेड करते सैनिको जैसे ) वे अपने लक्ष्य को यथाशीघ्र प्राप्त करने वाले होते है .
- जिन लोगो का स्वाभाव अपनी जेबों में हाथ डालकर चलने का होता है , भले ही सर्दी का मौसम  न हो, वे सामान्यतः विचित्र व् रहस्यमय स्वाभाव वाले होते है . ये मौका पड़ने पर शैतान का भी पक्ष ले सकते है . इनका प्रयास हमेशा दूसरों को झुकाने का होता है .
- खुले हुए हाथो के द्वारा स्पष्टता के भाव की अभिव्यक्ति होती है . खुले हुए हाथो के साथ कंधे उचकाते हुए दोनों हथेलियों को आगे कर देना यह भाव व्यक्त करता है , की - " तुम मेरा क्या कर लोगे "
- भुजाओं को अपने सीने पर क्रॉस  के रूप में बांध लेना एक सुरक्षात्मक भाव भंगिमा है . इसके अतिरिक्त जब कोई व्यक्ति किसी मांग या निवेदन को स्वीकार नही करना चाहता , तब भी वह अपने हाथों की कैंची के रूप में सीने पर बांध लेता है .
- गाल पर हाथ रख कर बैठने  की मुद्रा किसी विचार में लीन होना दर्शाता है
- जब कोई व्यक्ति कोई ऐसी बात  सुनता  है , जिसमे उसकी रूचि होती है , तो वह अपने सर को थोडा ऊपर उठा लेता है .
- यदि श्रोता का सर तिरछे आकार में झुका हुआ नही है , तो इसका मतलब वे सुनने में रूचि नही ले रहे है .
- यदि कोई व्यक्ति (स्वाभाव वश नही ) बड़ी कोमलता से अपना चश्मा उतारकर सावधानीपूर्वक उसका लेंस साफ़ करता है  (यदि लेंस पहले से ही साफ़ है ) , तो वह टाल-मटोल करने के भाव को प्रकट करता है . ऐसा व्यक्ति अधिक स्पष्टीकरण मांगने या प्रश्न पूछने के लिए समय चाहता है .
- आँखों को बंद कर नाक के सिरे को दबाने का अर्थ है , कि अंतिम निर्णय पर गहन विचार चल रहा है .
- नाक को धीरे से छूना या मलना ( यदि जुकाम  न हो तो ) अपनी अनिच्छा , अरुचि , नापसंदगी या नकारात्मकता को व्यक्त करता है .
-कोट के बटन खोलकर बैठने की भंगिमा यह प्रकट करती है , कि व्यक्ति आपके विचारों को ध्यानपूर्वक सुन रहा है .
- श्रोता का तिरछा सर यह प्रकट करता है , कि वह वक्ता के शब्दों में गहन रूचि ले रहा है .
- अपने हाथों को कस कर और एक-दुसरे से जकड़कर बैठना संदेह की मुद्रा है .
- अपनी तर्जनी ( अंगूठे के पास वाली अंगुली )    उठाकर बात करने वाले व्यक्ति महत्वाकांक्षी होते है .
- अपनी वरिष्ठता या प्रधानता का प्रदर्शन करते समय व्यक्ति कुछ तन जाता है . 
- अपने दोनों हाथों को पीछे करके या पकड़कर  चलने का अर्थ है , कि व्यक्ति परेशां या तनावग्रस्त है  .
- बाल पेन का खोलना या बंद करना - व्यक्ति की व्याकुलता  का परिचायक होता है. इसी प्रकार हथेली  पर सर टिकाकर आँखे अधमुंधी कर लेना भी ऊब  या उदासीनता का प्रतीक है .
              इन  तथ्यों का दैनिक जीवन में बहुत उपयोग है . आपको ये पोस्ट कैसी लगी  ..जरुर बताएं ...ताकि मैं इसी तरह और भी महत्वपूर्ण जानकारियां लाता रहूँ .


जय - जय
कैसा रहा २०१२ : जानिए महत्वपूर्ण तथ्य

रविवार, 21 अक्टूबर 2012

तीन रूप में दर्शन देने वाली माँ हरसिद्धि !

माँ हरसिद्धि


नमस्कार मित्रो ,
अभी पुरे देश में शारदीय नवरात्र बड़े धूम - धाम से मनाया जा रहा है , हिन्दू लोग माँ दुर्गा की उपासना  में रत है . आज मैं आप को बुंदेलखंड की एक प्रसिद्द देवी स्थल " माँ हरसिद्धि , रानगिर " के बारे में बताना चाहता हूँ .
माँ हरसिद्धि स्वयं प्रकट होने के साथ ही , सभी की मनोकामना पूर्ण  करने के लिए विख्यात है . मनोकामना पूर्ण करने के कारन ही उन्हें हरसिद्धि कहा जाता है . मान्यता है कि माँ हरसिद्धि एक दिन में तीन रूप में लोगो दर्शन देती  है . सुबह बालिका  के रूप में , दोपहर में युवती के रूप में और शाम  के समय वृद्धा के रूप में माँ हरसिद्धि की प्रतिमा से दर्शन होते है .वर्तमान में नया भव्य  मंदिर बना है , जबकि इसके पूर्व एक किले (गढ़ ) के रूप में था .  
माँ हरसिद्धि मंदिर
माता के प्रकट होने के बारे में एक कथा प्रचलित है - बहुत पहले रानगिर गाँव में बच्चों के साथ जंगल की ओर से एक दिव्य बालिका खेलने आती थी .गाँव के बच्चे घर जाकर उस दिव्य बालिका की चर्चा करते तो ग्रामीणों को आश्चर्य होता . एक बार सभी ने उस बालिका के बारे में पता लगाने का निश्चय किया , नियत समय पर बालिका खेलने आई , तो ग्रामीणों ने उसे पकड़ने का प्रयास किया . लेकिन वो बालिका अंतर्धान हो गयी . फिर कुछ दिनों बाद ग्रामीणों को सपने में बालिका आई और बताया मैं हरसिद्धि माता हूँ , और गाँव स्थित कुएं में मेरी प्रतिमा है , जिसे कच्चे सूत से निकलकर उसकी स्थापना करो , हाँ ध्यान रखना एक बार जहाँ रख डोज मैं वही स्थापित हो जाउंगी . दुसरे दिन ग्रामीणों ने कुएं में कच्चा सूत डाला तो एक प्रतिमा उसमे चिपक कर बाहर आई . लोगो में पास में ही एक नीम के पेड़ के नीचे प्रतिमा रखा , तो प्रतिमा वही स्थापित हो गयी , बाद में ग्रामीणों द्वारा बहुत प्रयास किये गए , कि किसी तरह गड्ढा खोद कर  भी प्रतिमा निकाल ली जाये , ताकि व्यवस्थित तरीके से मंदिर बना कर प्रतिमा प्रतिष्ठापित की जाये . लेकिन सारे प्रयास विफल रहे . आज भी गड्ढा खोदे जाने के कारण मंदिर में प्रवेश करने हमें प्रतिमा सामान्य धरातल से नीचे दिखती है . माँ हरसिद्धि की प्रतिमा का मुख नदी और जंगल की ओर है .(जहाँ से वह बालिका आती थी ) मंदिर काफी प्राचीन बताया जाता है .  
                                                            एक जनश्रुति के अनुसार - पहले नवरात्री में ब्रम्ह मुहूर्त में बाघ माँ के दर्शन करने आता  था और बिना किसी को हानि पहुचाये जंगल लौट जाता था . हालाँकि अब न तो घना जंगल बचा है , और न ही जंगल में बाघ बचे  है . बारहमासी  सड़क बन जाने से  जंगल तेजी कटा . मैं जब बचपन में जाता था , और अब जाने पर फर्क साफ़ नज़र आता है . जंगल वन्यजीवों के नाम पर बन्दर, लंगूर और सियार ही दिखते  है. हाँ पक्षियों के कुछ दुर्लभ प्रजातियाँ थोड़े प्रयास से जरुर दिख जाती है . मंदिर के किनारे ही देहार नदी का विहंगम तट है . वैसे तो ये एक छोटी नदी है , लेकिन अद्भुत है , इसके किनारों पर जब आप बड़ी-बड़ी नदी द्वारा काटी गयी चट्टानों को देखते है , तो लगता है , कि शायद चट्टानों को भी इसने हार दी , इसीलिए इसे " दे हार " कहा गया . नदी के दोनों किनारों पर बंदरों और लंगूरों की अठखेलियाँ मन मोह लेती है . गौर करने की बात है , कि यहाँ के बन्दर शैतान नहीं है . 
                                                           नदी के दुसरे ओर घने जंगल में " बूढी रानगिर " देवी का मंदिर है . जो स्टाप डेम पर करके जाया जाता है . जंगल में और भीतर  जाने पर " गौरी दांत " नामक देवी स्थल है . कहा जाता है , कि भगवान् शिव जब माता सती का शव लेकर विलाप कर रहे थे , और भगवान् विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से  शव के ५१ टुकड़े गिरे , जहाँ बाद में ५१ शक्ति पीठो की स्थापना हुई . उन्ही में से यह भी एक स्थल है , यहाँ सती का दांत गिरा था , इसलिए इसे गौरिदांत कहा जाता है . हालाँकि यह स्थान दुर्गम होने के कारण सामान्य जन की पहुच से दूर है . इस स्थान पर प्रागैतिहासिक काल के साक्ष्य भी है . जो इसकी प्राचीनता का प्रमाण है .  
दर्शनार्थियों की भीड़
                                           रानगिर में प्रतिवर्ष चैत्र माह की नवरात्री में मेला लगता है . जिसमे बुंदेलखंड ही नहीं दूर -दूर से लोग आते है .     माँ हरसिद्धि का धाम मध्य प्रदेश के सागर जिला मुख्यालय से ५० किमि० दूर विंध्यांचल पर्वतमाला की सुरम्य पहाड़ियों के मध्य देहार नदी के तट पर स्थित है . यहाँ पहुचने के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन सागर है , जो बीना -कटनी रेलखंड पर है . सागर से नवरात्री के समय बस और जीप आसानी से मिल जाती है .लेकिन अन्य दिनों लोग स्वयं के वाहन या निजी वाहन रिजर्व करके जाते है . सागर से राष्ट्रिय राजमार्ग क्र० २६ (झाँसी -लखनदों ) पर नरसिहपुर की तरफ लगभग ३० किमि० पर बांये ओर 8 किमि० जंगल  में पक्की सड़क से जाया जा सकता  है .

गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

अक्टूबर माह की महानता !

नमस्कार  मित्रो ,
आज एक बात आप सभी से शेयर करना चाहता हूँ , खैर हो सकता है  , आप मेरी बात बातसहमत न हो मगर मेरी बात सुनकर अपनी राय तो दे सकते है . तो मैं ये कहना चाहता हूँ , कि अक्तूबर ( क्वांर -कातिक ) माह में पैदा होने वाले लोग अधिक विशेष होते है . इसका पर्यावरणीय कारण ये है , कि ये महिना संधि काल होता है , मतलब वर्षा ऋतु के जाने का और शीत ऋतु के आने का होता है . अतः वातावरण की सर्वश्रेष्ठ अनुकूल जलवायु और तापमान होता है, जिससे पैदा हुए बच्चे के लक्षणों ( जो दैहिक कोशिकाओ द्वारा नियंत्रित होते है , न कि जनन कोशिकाओ द्वारा नियंत्रित लक्षण , क्योंकि जनन कोशिकाओ के लक्षण तो आनूवंशिक होते है , और माता -पिता से प्राप्त होते है  )  पर विशेष प्रभाव डालते है . हिन्दू मान्यताओ में भी इस काल को पवित्र मान कर इसमें जगत्जननी माँ दुर्गा की आराधना नवरात्री में की जाती है . इस माह में पैदा हुए कुछ महापुरुषों के बारे में जानते है . 
अकबर महान- १५ अक्टूबर १५४२ 
महत्मा गाँधी - २ अक्टूबर १८६९ 
लाल बहदुर शास्त्री - २ अक्टूबर १९०२ 
जयप्रकाश नारायण - ११ अक्टूबर १९०२
अमिताभ बच्चन - ११ अक्टूबर १९४२ 
रेखा - १० अक्टूबर 
शर्मीला टैगोर- २ अक्टूबर 
महराजा  अग्रसेन - १६ अक्टूबर  
जिम्मी कोर्टर ( अमेरिकी राष्ट्रपति  ) - 1 अक्टूबर 
केट विंसलेट (हालीवुड अभिनेत्री  )-5 अक्टूबर 
बिशप डेसमंड टूटू (राष्ट्रपति -द० अफ्रीका )- 7 अक्टूबर 
मेरियन जोन्स (महान एथलीट  )-१२ अक्टूबर   
दीपक चोपड़ा (मेनेजमेंट गुरु )- २२ अक्टूबर 
केटी  पैरी  (हालीवुड गायिका   )- २५ अक्टूबर 
हिलेरी  क्लिंटन (अमेरिकी विदेश मंत्री )- २४ अक्टूबर 
बिल गेट्स ( दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति )-२८ अक्टूबर  
 मित्रो इन पंक्तियों का लेखक भी सौभाग्य से २ अक्टूबर के महान दिन पैदा हुआ था . इसके अलावा अक्टूबर माह से और भी कई विशेष बातें जुडी हुई है.अक्टूबर महत्त्व  को  इस लिंक पर भी आप देख सकते है . 
तो भैया सबको ram ram !
































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रविवार, 9 सितंबर 2012

इंडियन मीडिया सेंटर :उज्जैन यात्रा

भस्म आरती के लिए पंक्तिबद्ध
नमस्कार मित्रो , बहुत दिनों बाद आप से रु-ब-रु हो रहा हूँ . मैं मालवा दौरे में व्यस्त रहा . इस दौरे में उज्जैन में 'इंडियन  मीडिया सेंटर ' के मध्य प्रदेश चैप्टर में शामिल हुआ . जहाँ उज्जैन के चर्चित ब्लोगर ' श्री सुरेश चिपलूनकर ' से मुलाकात हुई . इसके अलावा कार्यक्रम में साधना न्यूज के संपादक श्री एन 0 के ० सिंह , माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रिय पत्रकारिता विश्वविद्यालय , भोपाल के कुलपति  श्री  बी ० के ० कुठियाला और अन्य कुछ बड़े पत्रकारों से मिला . 
महाकाल का प्रसाद लिए हुए , पृष्ठभूमि में महाकाल मंदिर
काल भैरव मंदिर के बाहर  शराब बिकते   हुए ....साथ ही पुलिस वाले भी अपनी ड्यूटी में  !
अब अपनी यात्रा के बारे में कुछ बताता हूँ . मैंने अपने मैराथन दौरे के दौरान उज्जैन - इंदौर -ओम्कारेश्वर - इंदौर - धार- मांडू का सफ़र तय किया . इस दौरान जहाँ उज्जैन -ओम्कारेश्वर जैसे धार्मिक तीर्थ स्थल गया तो वही धार -मांडू (मांडव ) जैसे ऐतिहासिक शहर भी देखे . अब मैं दौरे के बारे में कुछ  विस्तार से बताता हूँ . मैं रात के ११ बजे 'महाकाल की नगरी '  उज्जैन पंहुचा . सुबह ४ बजे महाकाल की भस्म आरती (इसमें भगवान महाकाल की भस्म से श्रृंगार किया जाता है ) में शामिल होना था , इसलिए जल्द खाना खा कर सो गया .भस्म आरती में शामिल होने एक दिन पहले पंजीयन करना पड़ता  है .भस्म आरती में शामिल होने के लिए पुरुष केवल धोती (सोला ) और महिलाएं केवल साड़ी ( बिना पेटीकोट के ) में जा सकती है .हालाँकि महिलाओ वाली बात मुझे अटपटी जान पड़ी , क्योंकि मंदिर के अन्दर महिला पुलिस महिलाओं की साड़ी उठाकर उनके पेटीकोट चेक कर रही थी . भस्म आरती लगभग एक घंटे चलती है . जब भगवान् महाकाल को भस्म का विशेष श्रृंगार किया जाता है , तब नंदी हाल में उपस्थित महिलाओं  को घूँघट करने को कहा जाता है , ताकि वो भगवान् का ये विशेष श्रृंगार न देखे ! भगवान् महाकाल द्वादश ज्योतिर्लिंगों में विशेष माने जाते है, क्योंकि कहा जाता है , कि जो एक बार महाकाल के दर्शन कर लेता है , वो जीवन में अकाल मृत्यु से मुक्त हो जाता है . महाकाल को उज्जैन का राजा और रक्षक मन जाता है . सावन के सोमवार को महाकाल की शाही सवारी निकलती है , जिसमे मध्य प्रदेश शासन महाकाल को बन्दूको की सलामी ( गार्ड ऑफ़ ऑनर ) दी जाती है 
क्षिप्रा के किनारे राम घाट
                                                                        . उज्जैन को मंदिरों की नगरी कहा जाता है , क्योंकि यहाँ हर गली- चौराहे पर आपको मंदिर मिल जायेंगे . महाकाल परिसर में ही कई मंदिर है . इसके अलावा उज्जैन के अन्य प्रसिद्द मंदिरों में काल भैरव मंदिर जो कि भगवन शिव का क्रुद्ध अवतार है , इन्हें शराब का भोग लगता है , आश्चर्य की बात ये है , कि काल भैरव इसका सेवन करते हुए दिखाई पड़ते है , जब  पुजारी एक प्याले में शराब डाल कर काल भैरव की मूर्ति के मुख के पास  रखते है,  तो प्याले में से मदिरा धीरे-धीरे ख़त्म हो जाती है ! अन्य मंदिरों में हरसिद्धि देवी मंदिर , सिद्धवट , गढ़कालिका , मंगलनाथ ,चार धाम  मंदिर , बड़े  गणेश , क्षिप्रा घाट आदि . इसके अलावा एतिहासिक स्थानों में राजा भ्रत हरि की गुफा , किला , जंतर-मंतर ( ये पृथ्वी के केंद्र पर है ) , संदीपनि आश्रम ( जहाँ कृष्ण-बलराम और सुदामा पढ़े ) आदि .
सिंहासन   बत्तीसी जल कुम्भी भरे गंदे तालाब के नीचे है , हालाँकि  इसमें बगुले सैर कर रहे है !

सिंहासन बत्तीसी वाले तालाब के किनारे हष्ट-पुष्ट भिखारी
महाकाल मंदिर से हरसिद्धि मंदिर की और जाते समय रास्ते में एक गन्दा तालाब सा मिला , जिसमे बहुत सारी जलकुम्भी लगी थी , बताते इस स्थान पर राजा विक्रमादित्य का सभागार था ,यहीं सिंहासन बत्तीसी  है . भारत के हर तीर्थ स्थान की तरह उज्जैन  में भी भांति -भांति के भिखारी है , जिसमे  कुछ बड़े ही हष्ट-पुष्ट मिले . विक्रम विश्वविद्यालय के अतिथि गृह में 'इंडियन मीडिया सेंटर ' के कार्यक्रम के पश्चात् हम लोग उज्जैन भ्रमण पर निकले , जिसमे काल-भैरव , गढ़ कालिका , भरथरी की गुफा , सिद्ध   वट , मंगल नाथ होते हुए महाकाल धर्मशाला पहुचे ........फिर दुसरे दिन सुबह इंदौर होते हुए ओम्कारेश्वर की यात्रा पर निकल गए ..उसकी कहानी अगली  पोस्ट में    

सोमवार, 30 जुलाई 2012

सरदार को एक रुपया भीख दे देना..!

कुछ दोस्त मिलकर डेल्ही घूमने का प्रोग्राम बनाते है और रेलवे
स्टेशन से बहार निकलकर एक टेक्सी किराए पर लेते है , उस
टेक्सी का ड्राइवर बुढ्ढा सरदार था,

यात्रा के दौरान बच्चो को मस्ती सुजती है और
सब दोस्त मिलकर बारी बारी सरदार पर बने
जोक्स को एकदुसरे को सुनाते है

उनका मकसद उस ड्राइवर को चिढाना था . लेकिनवो बुढ्ढा सरदार चिढाना तो दूर पर उनके साथ
हर जोक पर हस रहा था ,
सब साईट सीन को देख बच्चे वापस रेलवे स्टेशन आ जाते है ...और तय
किया किराया उस सरदार को चुकाते है , सरदार
भी वो पैसे ले लेता है , पर हर बच्चे को अपनी और से एक एक
रूपया हाथ में देता है

एक लड़का बोलता है "पाजी हम सुबह से आपकी कोम
पर जोक मार रहे है , आप गुस्स्सा तो दूर पर हर जोक में
हमारे साथ हस रहे थे , और जब ये यात्रा पूरी हो गई आप हर लडके
को प्यार से एक-एक रूपया दे रहे है , ऐसा क्यों ? "

सरदार बोला " बच्चो आप अभी जवान
हो आपका नया खून है आप मस्ती नहीं करोगे तो कौन
करेगा ? लेकिन मेने आपको एक- एक रूपया इस लिए दिया के जब
वापस आप अपने अपने शहर जाओगे तो ये रूपया आप उस सरदार
को दे देना जो रास्ते में भीख मांग रहा हो ,
इस बात
को दो साल हो गए है और जितने लडके डेल्ही घूमने गए थे सब
के पास वो एक रुपये का सिक्का आज भी जेब में
पड़ा है ...उन्हें कोई सरदार भीख
मांगता नहीं  मिला .

 

गुरुवार, 12 जुलाई 2012

ब्राह्मणों की कहानी ........

नमस्कार ,
मित्रो आज हम इतिहास से कुछ खोज कर बड़ी ही मजेदार चीज लाये है !
अरे भाई ! इतना जल्दी क्या है ?
जब खोज कर लाये है , तो आप को भी बताएँगे ही , यहाँ तो आप ही के लिए आते है न !
आज हम ब्राह्मणों के बारे में कुछ ज्ञान खोज के लाये है ! हां लेकिन ये सब आपकी जानकारी के लिए है , इसमें कोई जातिवाद नही है.
तो भैया तो सबसे पहले ब्राह्मण शब्द का प्रयोग अथर्वेद के उच्चारण कर्ता ऋषियों के लिए किया गया था . फिर प्रत्येक वेद को समझनेके लिए ग्रन्थ लिखे गये उन्हें भी  ब्रह्मण साहित्य कहा गया है . 
अब देखा जाये तो भारत में सबसे ज्यादा विभाजन या वर्गीकरण ब्राह्मणों में ही है . जैसे :- सरयू पारीण, कान्यकुब्ज , जिझौतिया , मैथिल , मराठी , बंगाली ,भार्गव ,कश्मीरी , सनाढ्य , गौड़ , महा-बामन और भी बहुत कुछ . इसी प्रकार ब्राह्मणों में सबसे ज्यादा उपनाम (सरनेम या टाईटल )  भी प्रचलित है , तो इन्ही  में कुछ लोकप्रिय उपनामों और उनकी उत्पत्ति के बारे में जानते है . 
एक वेद को पढने  वाले ब्रह्मण को पाठक कहा गया 
दो वेद पढने वाले को द्विवेदी कहा गया , जो कालांतर में दुबे हो गया 
तीन वेद को पढने वाले को त्रिवेदी/ त्रिपाठी  कहा गया , जो कालांतर में तिवारी हो गया 
चार वेदों को पढने वाले चतुर्वेदी कहलाये , जो कालांतर में चौबे हुआ 
शुक्ल यजुर्वेद को पढने वाले शुक्ल या शुक्ला  कहलाये 
चारो वेदों , पुराणों और उपनिषदों के ज्ञाता को पंडित कहा गया , जो आगे चलकर पाण्डेय .पाध्याय ( ये कालांतर में उपाध्याय हुआ ) बने .
इनके अलावा प्रसिद्द ऋषियों के वंशजो ने अपने  ऋषिकुल या गोत्र के नाम को ही उपनाम की तरह अपना लिया , जैसे :- 
भगवन परसुराम भी भृगु कुल के थे
भृगु कुल के वंशज भार्गव कहलाये , इसी तरह गौतम , अग्निहोत्री , गर्ग . भरद्वाज  आदि 


इन्हें तो आप पहचान गये होंगे ! अगर नही पहचाने तो जानकारी के लिए बता दे ये इन पंक्तियों का लेखक है .

शास्त्र धारण करने वाले या शास्त्रार्थ करने वाले शास्त्री की उपाधि से विभूषित हुए . बहुत से ब्राह्मणों को अनेक शासको  ने भी कई  तरह की उपाधियाँ  दी  , जिसे बाद में उनके  वंशजो ने उपनाम   की तरह उपयोग  किया . इस  तरह से ब्राह्मणों के उपनाम प्रचलन में आये . बाकि अगली किसी पोस्ट में ............
तब तक के लिए राम राम 

शनिवार, 10 सितंबर 2011

बस सफलता से एक कदम दूर ............


नमस्कार मित्रो ,
एक खुशखबरी है !
हाल ही में मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित राज्य सेवा परीक्षा २००९ की मुख्य परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ है । और ख़ुशी की बात ये है , कि इस परीक्षा में आपका ये परिचित इस परीक्षा में सफल हो गया है । और ५ दिसंबर से साक्षात्कार शुरू हो रहे है ..........मतलब मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग में अंतिम चयन में बस एक कदम दूर हूँ । आपकी दुआओं के साथ इस सफलता की उम्मीद में आपका ही ...........

बुधवार, 20 जनवरी 2010

अब गूगल खोजेगा लापता लोगो को .......

जी हाँ , गूगल अब तक जो इंटरनेट पर सामग्री खोजकर हम सब की मदद करता था । वो अब हैती में आये भूकंप के कारन लापता हुए लोगो को खोजने में मदद करेगा। गूगल ने एक सोफ्टवेयर हैती सरकार की सहायता के लिए तैयार किया है । जिसमे हैती में कोई भी व्यक्ति गूगल पर जाकर अपने लापता सम्बन्धी की जानकारी जैसे उसकी उम्र, लिंग, कद, और फोटो के आधार पे खोजने में मदद करेगा। ये सुविधा हैती वासियों को निसुक्ल प्रदान की जाएगी । खैर गूगल का ये कदम न केवल स्वागत योग्य है वल्कि प्रसंसनीय भी है । हमारी तकनीक अगर मुसीबत में इंसानियत के काम आती है तो ही उसकी सार्थकता है। गूगल को शुक्रिया ।

पुछल्ला ;-)
हमारे झल्लू जी के सुपुत्र से जब स्कूल में टीचर ने उसके पिता का नाम पूछा तो झाल्लुपुत्र ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया -जी गूगल !!!
टीचर - क्या मतलब है तुम्हारा ?
झाल्लुपुत्र- जी , क्या है , किमेरे पिताजी जब देखो कुछ न कुछ खोजते रहते है , कभी तौलिया, कभी मोज़े तो कभी मुझे !!
इसलिए मेरी मम्मी ने उनका नाम ही गूगल रख दिया है, मेरे पुरे मोहेल्ले के लोग भी उन्हें ग्गोगल ही पुकारते है ।:-)

orchha gatha

बेतवा की जुबानी : ओरछा की कहानी (भाग-1)

एक रात को मैं मध्य प्रदेश की गंगा कही जाने वाली पावन नदी बेतवा के तट पर ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा हुआ. बेतवा की लहरों के एक तरफ महान ब...