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रविवार, 27 मई 2012

अब मर रहे रहे है, ताल-तलैया

अब मर रहे रहे है, ताल-तलैया 
कहाँ गए  ?  उनमे थे जो नाव खिवैया
 नदियों के भी आंसू सूख गये 
अब कठौती में होती, जय गंगा मैया 
माँ थी कभी सारी नदिया 
आज मात् हंता बने हम सब भैया 
धरती का सीना, चीर के चूसा 
अब पानी को करते ता-ता थैया 
मार के कुल्हाड़ी अपने पैरो पर 
 समझदार बने है, आज सैंया
सारे जंगल काट दिए है हमने 
 और ढूंढ  रहे , क्रांकीट में छैंया
अब तो जागो , कुम्भकरणो
डूब रही है , चन्दन की नैया
-mukesh pandey "chandan"

शनिवार, 10 अक्टूबर 2009

सब गड़बड़ है पर नो प्रोब्लम !!

भइया अब तो हद हो गयी ! नोबल वाले का सठिया गये जो मात्र ०९ माह के कार्यकाल में ओबामा उन्हें शान्ति के मसीहा नजाए आ गये ! हमें तो ठीक ख़ुद ओबामा को भी हैरानी हो गयी , की ससुरा कुछ बहुतै जल्दी नही हो गया !
हमारे राष्ट्रपिता गाँधी जी का पॉँच बार नोबल शान्ति के लिए नामांकन हुआ , पर नोबल समिति वालो को वो इस पुरूस्कार के लायक नही लगे , उनके चेलो तक को नोबल शान्ति मिला (नेल्सन मंडेला, अंग सन सू की , मार्टिन लूथर किंग आदि ) , चलो कोई बात नही पर गाँधी के नये चेले ने ऐसा क्या गुल खिला दिया की नोबल वाले उन पर मोहित हो गये । भइया कुछ गड़बड़ जरुर है !!
सुना था की अपने इहाँ कुछ फिल्मी कलाकार अवार्ड फंक्सन में फिक्सिंग करके अवार्ड ले जाते थे ! मगर दुनिया के सबसे बड़े और निष्पक्ष पाने जाने वाले नोबल में ऐसा होगा ........................
देश के दक्षिणी इलाको में बाढ़ का कहर जारी है, लाखो लोग बेघर हो गये है , हजारो अनाथ , सैकडो काल के गाल में समा गये है। केन्द्र सरकार ने १००० करोड़ रु० की सहायता की घोषणा की है, मेरा आप सभी से करबद्ध निवेदन है की इस संकट की घडी में हमारे बाढ़ पीड़ित भाई बहनों की सहायता जरुर करे , साथ ही साथ अन्य लोगो को भी सहायता करने के लिए प्रेरित करे ।
मेरा मानना है की इस बार दिवाली सादगी से मानकर हम अपने भाई बहनों की सहायता के लिए आराम से पैसे जोड़ सकते है। हाँ इस बार उन लोगो के लिए भी कुछ दिए जरुर जलाये जो इस बार दिवाली नही मन पाएंगे ।
मेरे मन में विश्वास है की आप मेरी बात जरुर मानेंगे । अरे-----रे रे , सॉरी एक बात मैं भूल ही गया की ये मेरी हाफ सेंचुरी यानि पचासवी पोस्ट है ! आज से अपनी पोस्ट में एक न्य आयटम जोड़ रहा हूँ जिसका नाम दिया है मैंने पुछल्ला , इस में अपनी बात के आख़िर में एक गुदगुदाती सी बात कहने की कोशिश करूँगा। अगर पुछल्ला पसंद आए तो सूचित जरुर करे। तो पेश है आज का पुछल्ला
एक नए नवेले वैज्ञानिक (प्रतिभाशाली ) जवाहर सिंह 'झल्लू' ने न्यूटन के गति के तीन नियमो में अपना एक नया चौथा नियम जोड़ा है।
" लूज मोशन कभी भी स्लो मोशन में नही होता है "

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

एक भारतवंशी को नबल पुरूस्कार !! खुश होए या शर्मशार !!!!

नमस्कार , मित्रो
आप सभी लोग मीडिया के किसी न किसी माध्यम से ये जान ही चुके होंगे की भारत वंशी वैज्ञानिक श्री वेंकटरमण रामकृष्णन को राइबोसोम के अध्यनन के लिए रसायन शास्त्र के नोबल पुरूस्कार के लिए चयनित किया गया है । श्री रामकृष्णन जी ने बडोदरा विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर किया है। फ़िर निकल गये विदेश !
अब उनके नोबल मिलने पर जैसा की हर भारतीय को खुशी होनी चाहिय खुशी हुई .मगर मेरे हिसाब से हमें शर्म आणि चाहिए की हम अपने देश के आजाद होने ६० सालो के बाद भी ऐसी परिस्थितिया नही पैदा कर सके की , ऐसी प्रतिभाये अपने ही देश में रहकर अपने देश का नाम ऊँचा कर सके ?१! श्री रामकृष्णन देश के चौथे भारतीय या भारतवंशी वैज्ञानिक है जिन्हें नोबल पुरुस्कार मिला। इन चारो वैज्ञानिको में सिर्फ़ डॉ सी० वी० रामन को अगर छोड़ दिया जाए तो बाकि तीन (डॉ एस चंद्रशेखर, डॉ हरगोविंद खुराना और अब वी रामकृष्णन ) वैज्ञानिक भारतीय नही भारतवंशी है । आख़िर क्यो इन्हे भारत से बाहर जाना पड़ा ? कभी हमारी सरकारों ने सोचा है ?
हम क्यों नही ऐसी सुविधाए उपलब्ध करा सके ताकि इस प्रतिभा पलायन को रोका जा सके ? क्यों देश आजाद होने के बाद हम किसी भारतीय को नबल पुरूस्कार नही दिला पाए ? क्या हमारे यहाँ प्रतिभाये नही है ? (शायद ऐसा नही है )
एक बार सी वी रमन के भतीजे डॉ एस चंद्रशेखर (दोनों नोबल विजेता ) ने तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू से अपने शोध के लिए सुविधाए जुटाने की बात की थी , मगर नेहरू जी तब ब्भारत के गरीब होने की बात कहकर अपनी असमर्थता जाहिर की थी । परिणामस्वरूप डॉ चंदार्शेखर अमेरिका गये , खगोल विज्ञानं में अपना शोध पुरा किया और नोबल भी जीता । क्या हम इस नोबल को एक भारतवंशी की जगह एक भारतीय के नाम नही कर सकते थे? अगर नेहरू जी की बात मान भी ले की उस वक्त भारत की आर्थक हालत ठीक नही थी । तो आज तो ये स्थिति नही है , भारत विश्व की उभरती ताकत बन रहा है । तब क्यो नही हम शिक्षा , शोध और प्रतिभाओ को बढावा देने वाली योजनाये बनाते है ? क्यों नही हमारे विश्वविद्यालयो में मौलिक पी एचडी होती है
खैर मौका खुशी का है , भले किसी और मुल्क ने हमें ये अवसर दिया हो । हम खुशिया तो मन ही ले , इसके सिवा हमें और आता ही क्या है ? (भारत में सबसे ज्यादा छुट्टियाँ और त्यौहार होते है, यानि साल में सबसे कम काम भी होता है )
डॉ रामकृष्णन को हार्दिक बधाई !
आप सभी को भी आने वाले त्योहारों की शुभकामनाये !
जय जय

गुरुवार, 3 सितंबर 2009

गणेशोत्सव और कांटा लगा !!

गणेश चतुर्थी के पहले लोग पंडाल सजा रहे थे
लेकिन धार्मिक की जगह, फिल्मी गीत बजा रहे थे
बंगले के पीछे कांटा लगा, बुद्धि विनायक सुन रहे थे
मनो काँटों से बचने के लिए जाल कोई बुन रहे थे
बेरी के नीचे लगा हुआ था, काँटों का अम्बार
लहूलुहान से बैठे गजानन , होके बेबस और लाचार
सोच रहे थे , कब अनंत चतुर्दर्शी आएगी ?
जाने कब बेरी के काँटों से मुक्ति मिल पायेगी ?
मुश्किल हो गया, इस लोक में शान्ति का ठिकाना
नाक में दम कर दिया , और कहते अगले बरस जल्दी आना !
मैं इसी बरस जल्दी जाने की सोच रहा हूँ
अपने फिल्मी भक्तो के लिए अपने आंसू पोछ रहा हूँ
मुझसे बढ़कर , इनके लिए फिल्मे और फिल्मी संसार
फ़िर गणेशोत्सव क्यों मनाते ? करते क्यों मुझ पर उपकार ?
मित्रो , गणेश विसर्जन के साथ गणेशोत्सव समाप्त हो गया , पर दुःख की बात है की लोकमान्य तिलक ने जिस उद्देश्य के साथ इसे शुरू किया उसकी पवित्रतता तो जाने कब की ख़त्म हो गयी है। अब लोग इस परम्परा को बस निभा रहे है ! उनमे वो श्रद्धा और भक्ति की भावना नही बची है । शेष भगवन मालिक है । गणपति बाप्पा मोरिया रे ......

शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

कभी बाढ़ कभी सूखा , भारत भूखा का भूखा

नमस्कार दोस्तों,
देर के लिए क्षमा चाहता हूँ। दरअसल मैं इन दिनों में बिहार ,बंगाल, उडीसा और आन्ध्र परदेस की सैर पर था । इन राज्यों की सैर में मैंने अतुल्य भारत की असली छवि देखि । जहाँ आंध्र की चमक देखि वही उडीसा की उधासी भी आँखों में आंसू लेन के लिए काफी थी । बिहार में बदलाव की आहात सुनी तो आमार सोनार बांगला भी देखा । चिल्का झील की विराटता देखि विशाखापत्तनम में जीवन में पहली बार सागर दर्शन भी किया । दोस्तों , अभी वरिश का मौसम चल रहा है , लेकिन देश के २५० से ज्यादा जिलो में सूखा फैला है । जमीन में पड़ी दरारों को देख कर किसानो की छाती फट पड़ने को आतुर है , आँखों में पानी हाई मगर आसमान सूना है । ये कहर कम नही था , रही सही कसार महंगाई ने पुरी कर दी । दाल १०० रूपये किलो बिकी तो शक्कर ४० रूपये किलो । देश के कुछ इलाको में पानी इतना गिरा की sailab सब कुछ भा ले gya । बिहार के ३८ में से 26 सूखा grast है तो baaki १२ baadhgrast है । हाँ वरिश पर मेरी कविता "pahli fuhaar " hind yugm के july के padcast kvi sammelan में jarur सुने ।
.podcast.hindyugm.कॉम

orchha gatha

बेतवा की जुबानी : ओरछा की कहानी (भाग-1)

एक रात को मैं मध्य प्रदेश की गंगा कही जाने वाली पावन नदी बेतवा के तट पर ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा हुआ. बेतवा की लहरों के एक तरफ महान ब...