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शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2012

कितने रावण जलाओगे , हर घर में रावण छुपा है !

अभी हाल में पूरे देश में धूम धाम से रावण  का पुतला जलाया गया . समाचार पत्रों और टी ० वी० न्यूज चैनलों पर " बुराई पर अच्छाई की जीत " ," जीत गयी अच्छाई ", " हो गया बुराई का अंत "  जैसे जुमले प्रयोग हुए . लेकिन क्या सचमुच बुराई ख़त्म हो गयी ? बहुत पहले दशहरा पर एक कविता लिखी थी , जो शायद आज भी प्रासंगिक है . उस पर अपने विचार जरुर दें -
कितने रावण जलाओगे , हर घर में रावण छुपा है 
कितनी बार आग लगाओगे  , हर पग पर तम जाल बिछा है 
एक पुतला जल जाने से , सारा पाप नही मर जाता 
पुतले में आग लगाने से , हर नर राम नही बन जाता 
जब होगा अहम् , तब तक रावण नही मरेगा 
'अहम् ब्रम्हास्मी ' मरके भी यही कहेगा 
स्वार्थ, ईर्ष्या, घृणा , पाप चारो और यही मचा है  
कितने रावण जलाओगे , हर घर में रावण छुपा है 
हर दिन सीता का अपहरण हो रहा है 
पुलिस, प्रशासन कुम्भकरण सो रहा है 
गीध-जटायु ,मूक हुए , मनो सब छिपा है 
आज रावण एक नही , उसके रूप कई है 
अन्याय , अत्याचार के बाद भी , वह सही है 
मारते-मारते रावण को , आज राम भी थक  जायेंगे 
इतने रावण है , कि कई राम भी मार न पाएंगे 
कितने रावण जलाओगे , हर घर में रावण छुपा है 
कितनी बार आग लगाओगे  , हर पग पर तम जाल बिछा है 




गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

अक्टूबर माह की महानता !

नमस्कार  मित्रो ,
आज एक बात आप सभी से शेयर करना चाहता हूँ , खैर हो सकता है  , आप मेरी बात बातसहमत न हो मगर मेरी बात सुनकर अपनी राय तो दे सकते है . तो मैं ये कहना चाहता हूँ , कि अक्तूबर ( क्वांर -कातिक ) माह में पैदा होने वाले लोग अधिक विशेष होते है . इसका पर्यावरणीय कारण ये है , कि ये महिना संधि काल होता है , मतलब वर्षा ऋतु के जाने का और शीत ऋतु के आने का होता है . अतः वातावरण की सर्वश्रेष्ठ अनुकूल जलवायु और तापमान होता है, जिससे पैदा हुए बच्चे के लक्षणों ( जो दैहिक कोशिकाओ द्वारा नियंत्रित होते है , न कि जनन कोशिकाओ द्वारा नियंत्रित लक्षण , क्योंकि जनन कोशिकाओ के लक्षण तो आनूवंशिक होते है , और माता -पिता से प्राप्त होते है  )  पर विशेष प्रभाव डालते है . हिन्दू मान्यताओ में भी इस काल को पवित्र मान कर इसमें जगत्जननी माँ दुर्गा की आराधना नवरात्री में की जाती है . इस माह में पैदा हुए कुछ महापुरुषों के बारे में जानते है . 
अकबर महान- १५ अक्टूबर १५४२ 
महत्मा गाँधी - २ अक्टूबर १८६९ 
लाल बहदुर शास्त्री - २ अक्टूबर १९०२ 
जयप्रकाश नारायण - ११ अक्टूबर १९०२
अमिताभ बच्चन - ११ अक्टूबर १९४२ 
रेखा - १० अक्टूबर 
शर्मीला टैगोर- २ अक्टूबर 
महराजा  अग्रसेन - १६ अक्टूबर  
जिम्मी कोर्टर ( अमेरिकी राष्ट्रपति  ) - 1 अक्टूबर 
केट विंसलेट (हालीवुड अभिनेत्री  )-5 अक्टूबर 
बिशप डेसमंड टूटू (राष्ट्रपति -द० अफ्रीका )- 7 अक्टूबर 
मेरियन जोन्स (महान एथलीट  )-१२ अक्टूबर   
दीपक चोपड़ा (मेनेजमेंट गुरु )- २२ अक्टूबर 
केटी  पैरी  (हालीवुड गायिका   )- २५ अक्टूबर 
हिलेरी  क्लिंटन (अमेरिकी विदेश मंत्री )- २४ अक्टूबर 
बिल गेट्स ( दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति )-२८ अक्टूबर  
 मित्रो इन पंक्तियों का लेखक भी सौभाग्य से २ अक्टूबर के महान दिन पैदा हुआ था . इसके अलावा अक्टूबर माह से और भी कई विशेष बातें जुडी हुई है.अक्टूबर महत्त्व  को  इस लिंक पर भी आप देख सकते है . 
तो भैया सबको ram ram !
































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बुधवार, 22 अगस्त 2012

राग दरवारी :हिंदी साहित्य का व्यंग्य का सर्वश्रेष्ठ और कालजयी उपन्यास

नमस्कार मित्रो ,

बहुत दिनों बाद मैं आज ब्लॉग लिखने बैठा हूँ . कुछ दिन सोचा इन्टरनेट की दुनिया से दूर होकर साहित्य की दुनिया की सैर की जाये . इस लिए मैं पिछले हफ्ते हिंदी  साहित्य का व्यंग्य का सर्वश्रेष्ठ और कालजयी उपन्यास " राग दरवारी " पढने में व्यस्त था . सच पूछो तो श्रीलाल शुक्ल जी का लिखित उपन्यास हर भारतीय को पढना चाहिए . इस उपन्यास में शुक्ल जी ने एक कसबे 'शिवपालगंज ' और उसके निवासियों ( जिन्हें उपन्यास में गंजहा कहा गया है ) के बहाने भारतीय संस्कृति और मानसिकता पर करारा व्यंग्य किया है . जैसे :- " वर्तमान शिक्षा पद्धति रास्ते में पड़ी हुई कुतिया है , जिसे कोई भी लात मार सकता है . "
स्व० श्रीलाल शुक्ल जी
शुक्ल जी ने शिवपालगंज कसबे के बहाने देश  की लगभग हर समस्या को जोरदार तरीके से उठाते है . यही कारण है, कि 1960 के दशक में लिखा  गया ये उपन्यास आज भी प्रासंगिक  है. शुक्ल जी जिस सरल भाषा शैली में अपनी बात रखते  है ,वह लाजवाब है ! उदहारण के लिए  "  इस देश के निवासी परंपरा से कवि है , चीज  को समझने से पहले वे उस पर मुग्ध होकर कविता कहते है . भाखड़ा नांगल बांध को देखकर वे कह सकते है 'अहा ! अपना चमत्कार दिखाने  के लिए , देखो प्रभु ने फिर से भारतभूमि को चुना . '
मेरे अभी तक पढ़े गए साहित्य में निश्चय ही 'राग दरवारी ' सर्वश्रेष्ट है . राग दरवारी के पात्र वैद्य जी , रंगनाथ , रुप्पन बाबु , बद्री पहलवान , प्रिंसपल साहब , खन्ना मास्टर , सनीचर , लंग्गड़  और अन्य पात्र हमारे आस-पास के ही लगते है . और उपन्यास को पढ़ते समय हम भी उन्ही में शामिल हो जाते है . लगता है शुक्ल जी हमारी ही कहानी कह रहे है . आज भी ग्रामीण भारत 'राग दरवारी ' के शिवपाल गंज कि तरह है . आज देश के लोग वैद्य जी तरह देश को अच्छाई का मुखौटा पहन कर लूट रहे है , आज भी प्रिंसिपल साहब जैसे चापलूस देश की व्यवस्था को चूस रहे है . आज भी सत्ता का विरोध करने वालों  को खन्ना मास्टर की तरह परेशान किया जा रहा है . आज भी लंग्गड़ जैसे कई ईमानदार लोग अपनी जमीन  की नक़ल लेने  के लिए तहसीली  का चक्कर काट रहे है. आज भी बद्री पहलवान जैसे गुंडे सत्ता के उत्तराधिकारी बन रहे है . आज भी गयादीन जैसे सीधे-सादे  लोग  अपनी बेटी की इज्जत बचाने के लिए पलायन कर रहे है . आज भी सनीचर जैसे लोग सत्ता की कठपुतली बन कर दुसरो की उंगलियों पर नाच रहे है . आज भी देश के लोग भंग और गांजे के नशे में धूत्त होकर मतदान कर रहे है , आज भी रुप्पन बाबु और रंगनाथ  जैसे पढ़े लिखे हम जैसे लोग शुरूआती विरोध का भ्रम रच कर बाद में उसी सड़ी हुई व्यवस्था का अंग बनने को  बेबस है !!!
स्वर्गीय श्रीलाल शुक्ल जी को नमन !
इन्टरनेट प्रेमियों के लिए खुशखबरी ' राग दरबारी ' जो कि राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है , अब ऑनलाइन भी उपलब्ध है .

रविवार, 12 अगस्त 2012

यही तो देश का कष्ट है


यही तो देश का कष्ट है
कि सारे नेता भ्रष्ट है
राजनीती तो अब नष्ट है
तब भी नेता स्वस्थ्य है
वे घोटालो के अभ्यस्त है
और आम जनता त्रस्त है
सारे मौका परस्त है
सब अपने में मस्त है
वतन कि हालत पस्त है
खुशहाली अस्त-व्यस्त है
यही तो देश का कष्ट है
कि अब सब ध्रतराष्ट्र  है
- मुकेश पाण्डेय 'चन्दन'

मंगलवार, 7 अगस्त 2012

बूंदों में जाने क्या ......नया है ?

अले याल फिल पानी गिलने लगा ,...तू भी तो अपने पापा से छतरी मँगा !

छई छप्पा छई ...चलो उठो ...फिर से खेलते है छई छप्पा छई !
अक्सर बच्चे ही बारिश की बूंदों का मजा ले पाते ....हमारे भीतर तो बचपना बचा ही नही है . अब देखो न कितने मजे से खेल रहे बच्चो के झुण्ड में जब एक बच्चा गिर जाता है , तो बाकि उसे उठाने को दौड़ पड़े है . और हम इसे देख कर बस इतना कह पाते है ........काश !
बरसे चाहे कितना भी  पानी , पर माँ कहती पढने से न करना आना-कानी
बारिश में सबसे बुरा लगता है , स्कूल जाना ! लेकिन मन मार कर जाना पड़ता है . और जब मम्मी मेरे लिए इतनी परेशान हो सकती है , तो मैं तो उनका लाडला राजकुमार स्कूल क्यों  नही जाऊंगा ? एएँ !
गिरा अबकी खूब पानी ...सड़क पे आ गयी जल की रानी लाओ बंसी पकडे मछली खूब सारी, माँ भी होगी खुश बनेगी इसी की तरकारी
अरे यार छोडो स्कूल ...वहां भी तो पानी टपक रहा है , चलो  मछली पकड़ते है .........देखो कौन सबसे ज्यादा मछली पकड़ता है ? अरे ...वो  देखो मछ्....छ्ली !!!!!!!!!!!
हम तो है बाल मजदूर , हर हाल में काम करने को मजबूर
माँ बीमार है , घर में पानी भरा है , बापू का पता नही , माँ की दवा लेने  के लिए पैसे की व्यवस्था भी तो करनी है . अब काम तो करना ही होगा ........घर पर माँ इन्तजार कर रही होगी ......मुझे नही खेलना .......लाया साब ....गर्म ही ला रहा हूँ !
बारिश चाहे करें कितनी भी खटपट , पर अपना धंधा न होने दूंगा  चौपट 
अरे साब , बारिश आप बड़े लोगो को ख़ुशी देती होगी , अपने लिए तो मुसीबत ही होती है ....अब देखो न , कल रात हुई तूफानी बारिश में दुकान बह गयी .किसी तरह  काम तो करना होगा , वरना पेट कैसे भरेगा ?
जब बारिश हो जोरदार , तब ऐसी करें आड़ , जय भारत और जय जुगाड़



सीप न सही मकड़ी होके भी है स्वाति की चाह , बोलो वाह वाह

बूंदों में जाने क्या ......नया है ?

एक बूंद में समायी सारी कायनात .......

मगर आजकल शहरी आपा-धापी में ऐसे नज़ारे देखने वाले लोग बारिश की खुबसूरत कहानियो को कहाँ पढ़ पाते है ?
आपको इन चित्रों के माध्यम से सुनाई गयी कहानियों में से कौन सी कहानी अच्छी लगी ? जरुर बताना

शुक्रवार, 22 जून 2012

गरुड़ : एक दैवीय पक्षी को जानिए

मित्रो नमस्कार ,
मैंने अपनी पक्षी श्रृंखला के अंतर्गत भारत में पाए जाने वाले कुछ जाने -पहचाने तो कुछ अनजाने से प्यारे- प्यारे पक्षियों के बारे में बताया था . मेरी ये श्रृंखला काफी लोकप्रिय भी हुई थी . जो लोग इसे पहले नही पढ़ पाए है , वे मेरे ब्लॉग पर 'पक्षी' या' पर्यावरण 'लेबल पर क्लिक करके पढ़ सकते है . आज फिर से मैं उसी श्रृंखला के आगे बढ़ाते हुए गरुड़ पक्षी पर कुछ जानकारी बटोर के लाया हूँ .उम्मीद है पसंद आएगी
गरुड़ को हम अक्सर भगवान विष्णु के वाहन के तौर पर  एक पौराणिक चरित्र के रूप में जानते है .एक पूरा पुराण ही गरुड़ को समर्पित है "गरुड़ पुराण " . कहा जाता है , कि गरुड़ पक्षीराज (पक्षियों का राजा ) है , और वो साँपों को खाता है . भगवान राम और लक्ष्मण को जब मेघनाथ ने नागपाश में बांध दिया था , तब हनुमान जी गरुड़ को लेकर आये थे , तब कहीं जाकर भगवान को मुक्ति मिली थी .महाभारत के अनुसार भगवान कृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ गरुड़ पर बैठ कर नरकासुर को मारने गये  थे .एक अन्य कथानुसार गज और ग्राह की लड़ाई में ग्राह (मगर ) को मारने भगवान विष्णु गरुड़ पर ही बैठ कर गये थे . पंचतंत्र (बाईबल के बाद दुनिया  की दूसरी सबसे ज्यादा अनुवादित पुस्तक ) में भी गरुड़ की कई कहानिया है .

भगवान् विष्णु के वाहन के रूप में गरुड़
होयसल काल की एक गरुड़ प्रतिमा
 गरुड़ हिन्दू धर्म के साथ ही बौद्ध धर्म में भी लोकप्रिय है. बौद्ध ग्रंथो में गरुड़ को सुपर्ण (अच्छे पंख  वाला ) कहा गया है . जातक कथाओ में भी गरुड़ के बारे में कई कहानिया  है. भारत के इतिहास में स्वर्ण युग के रूप में जाना जाने वाले गुप्त शासको का प्रतीक चिन्ह गरुड़ ही था . कर्नाटक के होयसल  शासको का भी प्रतीक गरुड़ था .

थाईलैंड में गरुड़ का एक रूप
 
भारत के अलावा गरुड़ इंडोनेशिया ,  थाईलैंड और मंगोलिया आदि  में भी सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में लोकप्रिय है .इंडोनेसिया का राष्ट्रिय प्रतीक गरुड़ है , वहां की राष्ट्रिय एयरलाईन का नाम भी गरुड़ है . इंडोनेसिया की सेनाये संयुक्त  राष्ट्र मिशन पर गरुड़ नाम से जाती है .थाईलैंड  का शाही  परिवार भी प्रतीक के रूप में गरुड़ का प्रयोग करता है . थाईलैंड के कई बौद्ध मंदिर में गरुड़ की मूर्तियाँ और चित्र बने है . मंगोलिया की राजधानी उलनबटोर का प्रतीक गरुड़ है , जिसे पर्वत का संरक्षक और ईमानदारी का प्रतीक मन गया है .  
हवा में उड़ता एक नर गरुड़ पक्षी
गरुड़  चील की ही एक प्रजाति है .इसकी आवाज़ मिमियाती हुई कीयु जैसी होती है.इसका रंग विशिष्ट तथा विरोधाभासी होता है जिसे सफ़ेद सर तथा छाती को छोड़ कर अखरोट के रंग से मिलता-जुलता माना जा सकता है, पंखों के किनारे काले होते हैं. किशोरों पक्षी अधिक भूरे होते हैं, परन्तु फिर भी इन्हें पीलेपन, छोटे पंखों तथा गोलाकार पूंछ के कारण एशिया में गरुड़  की प्रवासी तथा अप्रवासी प्रजातियों से अलग पहचाना जा सकता है. पंख के नीचे की तरफ कलाई के क्षेत्र में पीला धब्बा वर्ग के आकर में होता है तथा ब्यूटियो गिद्धों से अलग दिखता है.
गरुड़  को श्रीलंका, भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश तथा दक्षिण-पूर्व एशिया में देखा जाना आम था , साथ ही यह दक्षिण में न्यू साउथ वेल्स व ऑस्ट्रेलिया तक में यह व्यापक रूप से फैली तथा रहता था . अपने क्षेत्र में मौसम के अनुसार, जो कि विशेष रूप से वर्षा से सम्बंधित है, वे स्थान परिवर्तन करती हैं.
वे मुख्य रूप से मैदानों में दिखते  हैं, परन्तु हिमालय में 5000 फीट ऊंचाई तक भी आते  हैं.
खतरे में आ गयी प्रजातियों की आईयूसीएन की रेड लिस्ट में उनका मूल्यांकन सबसे कम चिंताजनक प्रजाति के रूप में किया गया है. हालांकि जावा के रूप में कुछ भागों यह प्रजाति कम हो रही है
                                  दक्षिण एशिया में प्रजनन का मौसम अप्रैल से दिसंबर है. दक्षिणी और पूर्वी ऑस्ट्रेलिया में यह अगस्त से अक्तूबर तक तथा उत्तर व पश्चिम में अप्रैल से जून तक होता है. घोंसले छोटी शाखाओं एवं तीलियों से बनाये जाते हैं तथा इनके अंडे प्यालेनुमा आकार का निर्माण होता है, इसे पत्तियों से भी आरामदेह बनाया जाता है, कई प्रकार के पेड़ों पर इसे बनाते देखा गया है, मुख्य रूप से मैनग्रोव पर. वे एक ही क्षेत्र में कई वर्षों तक घोंसले बना कर उस स्थल के प्रति निष्ठा दिखाते हैं. कुछ दुर्लभ उदाहरणों में उन्हें पेड़ के नीचे जमीन पर घोंसला बनाते देखा गया है. एक बार में दो फीके-सफेद या नीले-सफेद अंडाकार अंडे जिनकी माप लगभग 52x41 मिमी होती है, दिए जाते हैं. माता-पिता दोनों ही घोंसला बनाने तथा बच्चों को खिलाने में भाग लेते हैं, परन्तु ऐसा देखा गया है कि अण्डों को सिर्फ मादा ही सेती है. अंडे 26-27 दिनों तक सेये जाते हैं.
ये मुख्यतः मुर्दाखोर पक्षी है , लेकिन कभी-कभी सांप , खरगोश , चूहा और चमगादड़ का शिकार भी कर लेते है. मित्रो हमारी ये सांस्कृतिक पहचान और भगवान विष्णु का वाहन तेजी से विलुप्त हो रहा है , कारण वही हम मनुष्यों का कृषि हेतु कीटनाशको का प्रयोग , इनके आवासों का नष्ट होना , पर्यावरण प्रदुषण ..........!
हे प्रभु ! हम तो नासमझ है , आप जरुर अपने वाहन की रक्षा करना ............... 
साभार - गूगल , विकिपीडिया

बुधवार, 20 जून 2012

अपने को बौना पाता हूँ


इन लम्बे -लम्बे दरख्तों के बीच अपने को  बौना पाता हूँ 
इन जिंदगियों  की खरीद-फरोख्त के बीच , अपने को खिलौना पाता हूँ
कुछ हसीं चेहरों में न जाने क्यों खौफ  नज़र आता  है 
फैशन के नाम पर बदन  पर बस चिथड़ा नज़र आता है 
दर्दनाक चीखो में अपनी मुस्कान भी छीन गयी 
मौत के सौदागरों के बीच जिन्दगी  कहाँ गुम गयी 
पत्थर की इन दीवारों में, अपने लिए छोटा कोना पाता हूँ  
इन जिंदगियों  की खरीद-फरोख्त के बीच , अपने को खिलौना पाता हूँ  
हर तरफ छाई भीड़ पर तन्हाई ही दिखती  है 
पैसे हो गर जेब में , तो यहाँ हर चीज बिकती   है 
खो गये है हर रिश्ते-नाते , खो गया है अपनापन 
बस गयी है मतलब की दुनिया , मतलबी है हर मन 
यहीं रईसों के ठहाके , तो यहीं गरीबो की आँखों में रोना पाता हूँ 
इन जिंदगियों  की खरीद-फरोख्त के बीच , अपने को खिलौना पाता हूँ 
 

बुधवार, 13 जून 2012

एक अकेला पेड़ !

सोया  पेड़ के नीचे एक थका राही
तभी कहीं से एक दर्द भरी आवाज़ कराही
नींद खुली राही की , देखा चारो तरफ सुनसान 
एक अकेला पेड़ था, बाकि इलाका था वीरान 
क्या देख रहे हो तुम , अचरज होके आसपास 
मैं अकेला पेड़ बचा, बाकी का इंसानों ने किया नाश 
थी यहाँ भी हरियाली  , थे अनेक पशु और पक्षी 
सबका नाश किया मानव ने, बनके पर्यावरण भक्षी 
असहाय बनके खड़ा रहा , देखता रहा सहोदरों का नाश
मेरी बांहों को भी काट दिया, है अंतिम क्षण की आस 
क्या शत्रुता थी इन मनवो से, सदा  ही उनका कल्याण किया 
मीठे-मीठे फल  दिए उनको, और ऑक्सीजन  सा प्राण दिया   
पर वो हमारा मोल समझ न सका अब तक 
यूँ ही अपने पैरो पर कुल्हाड़ी मारेगा  कब तक
        

गुरुवार, 31 मई 2012

भारत बंद !

आज भाजपा ने रखा भारत बंद
जो संसद में खाते  रहे कलाकंद
इतने घोटाले, इतनी महंगाई
फिर इनके मुह में लगी थी जंग
आपस में लड़ने से फुर्सत नही
और सड़क पर झंडा बुलंद
इतनी नाकारा  है सरकार
फिर भी न लगा सके  पेबंद
बस आम    आदमी हो परेशान
इसी शान में करते रहो भारत बंद
टू जी, आदर्श, कॉमन  वेल्थ
महंगाई , भ्रष्टाचार ,के कितने रंग
बस तुम करते रहना , भारत बंद
बंद की जगह , खोलो दिमाग  के ताले
तब देश का सुधरेगा रंग ढंग
फिर भी कुछ न कर सके
तो कार्लो अपनी दुकान बंद
-मुकेश पाण्डेय "चन्दन"  

रविवार, 27 मई 2012

अब मर रहे रहे है, ताल-तलैया

अब मर रहे रहे है, ताल-तलैया 
कहाँ गए  ?  उनमे थे जो नाव खिवैया
 नदियों के भी आंसू सूख गये 
अब कठौती में होती, जय गंगा मैया 
माँ थी कभी सारी नदिया 
आज मात् हंता बने हम सब भैया 
धरती का सीना, चीर के चूसा 
अब पानी को करते ता-ता थैया 
मार के कुल्हाड़ी अपने पैरो पर 
 समझदार बने है, आज सैंया
सारे जंगल काट दिए है हमने 
 और ढूंढ  रहे , क्रांकीट में छैंया
अब तो जागो , कुम्भकरणो
डूब रही है , चन्दन की नैया
-mukesh pandey "chandan"

गुरुवार, 24 मई 2012

आई जेठ की दुपहरी

झुलसते से पेड़ खड़े हो जाते   , आई जेठ की दुपहरी 
 पंछी भी निश्वास  हो जाते , आई जेठ की दुपहरी 
आसमान से मनो बरस रहे हो, आग के गोले 
ताप इतना है, कि लगे सूर्य अनलकोष होले 
नंदिनी गाय पेड़ टेल बैठी, पर वहां भी आराम  कहाँ 
भूरी कुतिया जीभ निकाले ,ढूँढती मानो शाम कहाँ
ताल-नदी सब सूखे, कालू कुआ ढूंढ रहा है पानी 
सांवली भैंस कीचड़ से लथपथ. सबसे ज्यादा उसे परेशानी 
हवा भी बहती नही , मिले कैसे गर्मी से छुटकारा 
अब जाये कहाँ सब, जल रहा है जग सारा 
पुसी बिल्ली आराम फरमाती , छोड़ चूहों कि चिंता 
सब चुपचाप दुबके , पंख न फैलाये कोई परिंदा 
सारा तन पसीना से नहाये,आई जेठ की दुपहरी 
सब जन है अलसाये , आई जेठ की दुपहरी      
 - मुकेश पाण्डेय "चन्दन"

सोमवार, 7 मई 2012

अजन्मी की पुकार

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अजन्मी की पुकार

सुना है माँ तुम मुझे , जीने के पहले ही मार रही हो
कसूर क्या मेरा लड़की होना , इसलिए नकार रही हो
सच कहती हूँ माँ , आने दो मुझे जीवन में एक बार
न मांगूंगी खेल-खिलौने , न मांगूंगी तुमसे प्यार
रुखी सूखी खाकर पड़ी रहूंगी, मैं एक कोने में
हर बात तुम्हारी मानूंगी , न रखूंगी अधिकार रोने में
न करुँगी जिद तुमसे , जिद से पहले ही क्यों फटकार रही हो
कसू क्या मेरा लड़की होना , इसीलिए नकार रही हो
माँ तुम भी तो लड़की थी, तो समझो मेरा दुःख
न करना मुझे दुलार, फ़िर भी तुम्हे दूंगी सुख
भइया से न लडूंगी , न छिनुंगी उसके खेल खिलौने
मेहनत मैं खूब करुँगी , पुरे करुँगी सपने सलौने
आख़िर क्या मजबूरी है , जो जीने के पहले मार रही हो
कसूर की मेरा लड़की होना , इसीलिए नकार रही हो
कहते है दुनिया वाले , लड़का-लड़की होते है सामान
तो फ़िर क्यों नही देखने देते , मुझे ये प्यारा जहाँ
आने दो एक बार मुझे माँ , फ़िर न तुम पछताओगी
है मुझे विश्वाश माँ, तुम मुझे जरूर बुलाउगी
क्या देख लू मैं सपने , जिसमे तुम मुझे दुलार रही हो
देकर मुझको जनम माँ, तुम मेरा जीवन सवांर रही हो


मेरे प्यारे दोस्तों मेरी ये कविता अब तक की श्रेष्ठतम एवं सर्वाधिक सराही गयी कविताओ में से एक है। इस कविता को लिखते समय मेरे मन में  देश में हो रहे भ्रूण हत्याओं से लगातार  कम हो रही लड़कियों की मार्मिक दशा थी ।इसे मैं पूर्व में भी अपने ब्लॉग पर पोस्ट कर चूका हूँ .  सचमुच जिस देश में कन्या को देवी माना जाता हो वहां कन्या भ्रूण हत्या वाकई शर्म की बात है । मेरी कविता का उद्देश्य केवल सराहना पाना नही है , बल्कि मैं चाहता हूँ की कोई बदलाव की बयार बहे .................
इस बदलाव में आपका साथ अपेक्षित  है , अपना सहयोग अवश्य दे क्योंकि हम कल भी देख सके
इसी आशा के साथ आपका अपना ही अनुज
- मुकेश पाण्डेय "चन्दन "

सोमवार, 30 अप्रैल 2012

बांस के पत्ते का मृत्यु गीत !

शीर्षक देख चौंके नही ..........कभी आपने बांस  के सूखे  हुए पत्ते को बांस पर से गिरते हुए देखा है ? अगर नही तो अब कभी मौका मिले तो देखना ! अभी कुछ दिनों पहले मैं अपने गाँव ( गाँव- भरौली, पोस्ट - सिमरी, जिला बक्सर , बिहार ) गया हुआ था . मेरे घर के पीछे बांसों का एक छोटा सा जंगल जिसे भोजपुरी में कोठी कहते है . इस बार गरम दोपहरी में जब मैं दुवार (घर के बाहर बिहार में पुरुषो के बैठक खाने को कहते  है ) में लेटा रहता था ( मजबूरन बिजली न होने के कारण ) , तो मैंने बांस के पत्तो को बांस से गिरते हुए देखा , देखा तो पहले भी था, मगर कभी इस तरह से नही देखा था . बांस के पत्ते आम पेड़-पौधो की तरह नही सीधे जमीन पर गिरते है . बल्कि बांस के पत्ते जब सूख कर बांस से नीचे गिरते है , तो हवा में कलाबाजियां खाते हुए ऐसे गिरते है , जैसे अपनी  मृत्यु पर नृत्य कर रहे हो .............इस संसार सागर से छूटने का उत्सव मना रहे हो . ..बांस के पत्ते जब बांस से नीचे गिरते है , तो कभी सीधे नही गिरते, वे हवा को काटते हुए..........नाचते से धीरे-धीरे जमीन को ओर बढ़ते है . 
अब इस पर कुछ वैज्ञानिक सोच के लोग कहेंगे कि.....बांस के पत्ते सामान्य पत्तो कि अपेक्षा पतले होते है , और सूखने पर किनारों से मुड़ जाते है . और उनकी संरचना इस तरह कि बन जाती है , कि वो हवा को काट सके .और हवा को काटने के क्रम में वो जमीन पर सीधे न गिर कर घुमते हुए जमीन पर ऐसे गिरते है , मानो नाच रहे हो !  
  मैं  इनकी बात सही होते हुए भी मानने से इनकार कर दूंगा , क्योंकि विज्ञान कितना भी  तर्कपूर्ण हो , मगर वह हरदम संवेदना को नही जान पाता है . वरना इतने विनाशक हथियार ही क्यों बनते ? मैं  तो बांस के  सूखे  पत्तो के  गिरने में  एक कवि की तरह  संवेदना को  बार - बार  निहारूंगा  ! 

बांस के पत्ते  जब सूख कर गिरते है डाल से
तो नाचते हुए कहते है  काल से
रे काल  मुझे कब थी जिन्दगी प्यारी 
पर  तुझे पाने की थी  बेकरारी


 अपनी राय से  अवश्य  अवगत करायें...........इन्तजार रहेगा 

 
  

सोमवार, 9 अप्रैल 2012

कैसे बनेगा देश महाशक्ति !

भारत में दुनिया के सबसे ज्यादा युवा है । इनकी आबादी लगभग ५५ करोड़ है , मगर इनमे से अधिकांश बेरोजगार है ! जहाँ विकसित देशो में जनसँख्या को संसाधन माना जाता है, वहीँ भारत में इसे बोझ माना जाता है। आज हम भारत को भविष्य की महाशक्ति कहते है , मगर किस हिसाब से यह महाशक्ति हो पायेगा ? आज सामरिक शक्ति के आधार पर किसी भी देश को महाशक्ति नही माना जाता है ( पाकिस्तान और उत्तर कोरिया जैसे देशो के पास भी नाभिकीय हथियार है ) आज बौद्धिक संसाधन ही महा शक्ति बनने का मुख्य आधार है , कहने को हम भारतीय प्रतिभा का लोहा मानते नही थकते है ! मगर ये भारतीय मेधा शक्ति कितनी कारगर है ? आज़ादी के बाद हमने कितने अविष्कार किये ? कितने विश्वस्तरीय खोजे हुई ? हम अपने विज्ञान और कला के बलबूते दुनिया को तो ठीक अपने ही देश को क्या दे पाए है ? हमारे यह नोबल पुरस्कार पाने वालो की संख्या अँगुलियों पर ही गिनने लायक है , उनमे से भी अधिकतर भारतीय मूल के है , अगर भारत में रहते तो शायद ही कुछ कर पाते !
आखिर हम इस युवा शक्ति के आधार पर विश्व की महाशक्ति बनेंगे , जिसके बारे में कहा जाता है , कि भारत में हर वर्ष ३३ लाख लोग स्नातक होते है , मगर उनमे से १० % को ही मनचाहा रोजगार मिल पाता है । भारत में हजारो इंजीनियरिंग कोलेज है , जिनमे से निकलने वाले १५ % ही उस डिग्री के योग्य होते है। आज भारत में मेनेजमेंट और सॉफ्टवेर कंप्यूटर सॉफ्टवेर जैसे प्रोफेशनल डिग्री बांटने वाले लाखो संसथान है , मगर ये संसथान बाजार में उपलब्ध नौकरियों के योग्य युवा नही दे प् रहे है । मतलब नौकरियों की कमी नही है , मगर उन नौकरियों के योग्य युवा नही है । हमारे यहाँ के शिक्षा संस्थान सिर्फ नाम की डिग्रियां बाँट रहे है । आज हमारे यहाँ के उच्च शिक्षित युवाओ में बहुत ही कम युवाओ को उस स्तर का ज्ञान है ।
अगर हम इसके कारण को देखे तो कई कारण मिलेंगे । जैसे - सबसे पहले तो हमारी शिक्षा प्रणाली ही गलत है । यह डेढ़ सौ साल पुराणी अंग्रेजो की क्लर्क पद्धति पर आधारित है । इसमें सिर्फ रटंत विद्या पर ही जोर दिया जाता है , न की विषय को समझने पर । हमारी शिक्षा प्रणाली की एक कमी यह है, कि हमारे यहाँ प्रथ्मिल शिक्षा को कभी महत्त्व नही दिया गया है । जबकि प्राथमिक शिक्षा ही देश के विकास का आधार है । इसी के फलस्वरूप हमारे देश के भविष्य का आधार ही कमजोर होता है ,तो आगे कि इमारत का गिरना तय ही है । प्राथमिक शिक्षा पर सरकार का कितना ध्यान है , ये इससे ही पता चलता है , कि देश में इतने शिक्षा आयोग और समितियां बनाई गयी , मगर उनमे एक भी प्राथमिक शिक्षा के लिए नही थी । हमारे देश में प्राथमिक शिक्षक को इतना कम वेतन दिया जाता है , कि योग्य शिक्षक इस ओर आते ही नही , नतीजतन कमजोर या मजबूर शिक्षक देश का आधार तैयार करते है , रटंत प्रणाली के माध्यम से !
खैर हम अगर इन बातों को नजरंदाज़ कर भी दे तो , माध्यमिक शिक्षा के बाद कुछ और मुसीबतें छात्रो के सर पर आन पड़ती है । मतलब कभी भी छात्रो को अपने मन का विषय लेने की छूट नही होती है , या तो अभिवाभाक अपने अधूरे सपने अपने बच्चो के माध्यम से पूरा करना चाहते है । या फिर दुसरो की देखा सीखी विषय चयन किया जाता है । ये भी नही देखा जाता कि बच्चा उस विषय में कमजोर है या उसकी रूचि है । फिर उच्च शिक्षा में तो पूरी तरह व्यवसायीकरण हो गया है । अब संस्थानों को शिक्षा कि गुणवत्ता से तो कोई मतलब सा नही रह गया है । खैर जैसे तेसे डिग्री मिलने के बाद बेरोजगार बन भटकने का दौर शुरू होता है । फिर मजबूरन छोटी मोटी जो भी नौकरी हाथ लगी कर लेते है । सबसे बुरी स्थिति तो हमारे देश में शोध कि है । हमारे विश्व विद्यालय तो सही शोध कि परिभाषा ही भूल गये है ।
एक बार उच्चतम न्यायलय के तत्कालीन मुख्य न्यायधीश न्यायमूर्ति श्री के० जी० बालकृष्णन ने कहा था - " इस देश को तो भगवान् ही चला रहा है "

रविवार, 18 मार्च 2012

न जाने कहाँ चले गये ये प्रकृति के सफाई कर्मी


मित्रो ,
बचपन में जब भी कोई जानवर मरता था , तो उसके चारो तरफ न जाने कहाँ से बहुत सारे गिद्ध मंडराने लगते थे । कई बार तो जंगल में या सुनसान क्षेत्र में किसी जानवर के मरने का पता गिद्धों के मंडराने से ही चलता था । देखने में बड़े डरावने से लगने वाले ये नुकीली चोंच वाले दैत्याकार पक्षी बचपन कौतुहल का विषय होते थे। ये मरे हुए जानवर के शरीर से मांस नोच नोच कर खाते थे । अक्सर मांस खाते समय देशी कुत्तों से इनकी झडपे हो जाती थी । इनका मांस नोचना बड़ा ही घ्रणित लगता था। मगर जब बड़ा हुआ तो पता चला कि ये मरे हुए जानवरों का मांस खाकर प्रकृति कि सेवा करते है । मतलब जैसे ही कोई जानवर मरता है , तो ये झुण्ड के झुण्ड में पहुच कर उसे तुरंत खाकर उसे साफ़ कर देते है । इस तरह तुरंत ही उस मरे हुए जानवर का मांस सड़ने से बच जाता है , और प्रकृति की सफाई हो जाती है। सोचिये अगर ये न होते तो जंगल तो रोज कहीं न कहीं कोई जानवर मरता था , और पूरा जंगल सड़ांध से भर जाता । ( मैं आज की नही तब की बात कर रहा हूँ जब जंगल बहुत थे ) । तो डरावने से लगने वाले ये भीमकाय पक्षी प्रकृति के सफाई कर्मी है।

मगर आज कल ये जीव संकट में है । क्योंकि हम मनुष्यों द्वारा खेतो में उपयोग किये गये खतरनाक कीटनाशक (दिक्लोफेनक) के कारन आज संकट ग्रस्त है । हालाँकि भारत सरकार ने इस कीटनाशक को प्रतिबंधित कर दिया है । लेकिन ये कीटनाशक गिद्धों की प्रजाति को संकट में तो डाल चुकी है । अब गिद्ध तो सामान्यतः दिखाई ही नही देते । याद कीजिये आपने इन्हें आखिरी बार कब देखा था ? उत्तर प्रदेश के आगरा जिले में सूर्य विहार पक्षी अभ्यारण्य में गिद्धों के संरक्षण किया जा रहा है । आ० यु० सी० एन० ने भारतीय गिद्ध (गिप्स इंडीकास ) को अति संकटग्रस्त प्राणी की श्रेणी में रखा है।
सन्दर्भ - गूगल , विकिपीडिया

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

ये कैसा बसंत आया ?


ये कैसा बसंत आया ?
हर दिन एक यौवना पे किसी ने सितम ढाया
प्रेम , उल्लास के मौसम में कैसी रुत आई
जाने क्यों हवस हर तरफ छाई
गर ऐसा हो बसंत तो मत आना अबकी बार
पतझर ही अच्छा , ऐसा बसंत बेकार
हे ऋतुराज ! क्यों आये ऐसे इस बार
क्या यही है ? ऋतुराज का ऐसा दरबार
धरती को आज भी है तुम्हारा इन्तजार
पर अब न आना ऐसे , जैसे आये इस बार
- मुकेश पाण्डेय 'चन्दन'

रविवार, 12 फ़रवरी 2012

ऐसी निभाना तुम प्रीत .........

सब भूल जाना चाहता हूँ , तुम्हारी बांहों में
रच-बस जाना चाहता हूँ, तुम्हारी निगाहों में
स्वर भी तुम हो , ह्रदय का स्पंदन भी तुम हो
तीर्थ सा पावन सरस, चन्दन भी हो तुम
तुम से शुरू होकर , तुम पर ही ख़त्म हो जीवन
मन में बसी एक सुन्दर सी मूरत हो प्रियतम
मेरा  सर्वस्य तुम, और मैं हूँ पर्याय तुम्हारा
रीत भले ही कुछ हो , पर तुम पर ही सब कुछ हारा
जिन्दगी भी तुम्हारे बिना, ख़त्म हो जाएगी
दम निकलने के बाद, मिलने की आरज़ू रह जाएगी
गीत अब तुम्हारे लिए होंगे. तुम जीवन का संगीत 
हो अमर अपना बंधन . ऐसी निभाना  तुम प्रीत       
मुकेश पाण्डेय " चन्दन "


सोमवार, 9 जनवरी 2012

उपहार :कविता


एक दिन जरुरी काम से , मैं गया एक कार्यालय
वहां सब मस्ती में थे, सब की थी अपनी लय
काम करवाने की नीयत से मैं, पहुंचा अधिकारी कक्ष की ओर
चपरासी ने रोका, साहब बिजी है! आना किसी दिन और
बहुत जरुरी काम है , नही है मेरे पास फिर आने का वक़्त
लौट जाओ , बिना उपहार वालो के लिए कानून है सख्त
"उपहार " आपके कहने का क्या प्रयास है ? क्या साहब का जन्मदिन आसपास है ?
जन्मदिन वाला उपहार साहब स्वीकार नही करते बिना उपहार वालो के लिए अपना समय बेकार नही करते
अरे भाई , ऑफिस में क्या है उपहार का काम ? उपहार तो है समारोहों का ताम झाम
ऑफिस में बिन उपहार के नही बनता है कोई काम
क्योंकि भैया उपहार है, "रिश्वत" का नया नाम

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2011

दिवाली : एक पर्व और उद्देश्य



दिवाली पर्व के बारे में अनेक कथाएँ और किंवदंतियाँ प्रचलित है। वैसे तो यह त्यौहार धन और प्रकश से जुदा है । मगर इस त्यौहार पर साफ़-सफाई और स्वच्छता की परंपरा भी जुडी है । हमारे ग्रंथो में कहा गया है - तमसो माँ ज्योतिरगमय अर्थात हे माँ ! मुझे अन्धकार से प्रकाश की और ले चलो । इसी उद्देश्य की सार्थकता को प्रतिबिंबित करता है ये त्यौहार । मगर आज हम बाजारवाद और आधुनिकता के अन्धानुकरण के कारन इस त्यौहार के मूल उद्देश्यों को भूल कर केवल आडम्बरो और कर्मकांडो के पीछे भाग रहे है ।



हम बाहरी चमक दमक को बढ़ने में तो खूब लगे है , मगर कभी खुद के भीतर झांक कर देखा है कि कितनी गंदगी है ?



हमने घरो के बाहर रोशनियों से जगमग कर दिया है , मगर कभी अपने भीतर के अँधेरे को दूर कर पाए है ?



हम धन कि आस में लक्ष्मी को पूजते है , मगर कभी धन का सही अर्थ समझ पाए है ?



दुसरो को मिठाईयां तो खूब बांटते है , मगर उनसे कितनी बार मीठे बोल बोले है ?






दीपावली को भगवन राम से भी जोड़ कर देखा जाता है । कहते है कि, भगवान राम रावन को मार कर इसी दिन अयोध्या वापिस लौटे और इस ख़ुशी में अयोध्या वासियों ने दीप मालाये सजाकर उनका आमवस्या कीअँधेरी रात में स्वागत किया तभी से दीप जलने की परंपरा चल पड़ी । एक कथा ये भी है ,किइसी दिन देव- असुर द्वारा किये गये समुद्र-मंथन के दौरान कार्तिक आमवस्या के दिन ही समुद्र से लक्ष्मी अवतरित हुई थी । इसीलिए इस दिन लक्ष्मी कि पूजा कि जाती है।



प्राचीन काल में हिन्दुओ के चार प्रमुख त्योहारों को चार वर्णों के आधार पर विभाजित किया गया था। ब्राम्हणों के लिए रक्षाबंधन, क्षत्रियो के लिए दशहरा, वैश्यों के लिए दीपावली और शूद्रो के लिए होली । इस तरह से दीपावली का ये पर्व वैश्यों के लिए अति महत्वपूर्ण होता है , सभी वैश्य इस दिन अपने पुराने बही खातो को बंद कर नए बही खातो का पूजन कर व्यापार की पुनः शुरुआत करते है ।



हिन्दू धर्म में सदैव ही प्रकाश को महत्वपूर्ण मन गया है , प्रत्येक शुभ अवसर की शुरुआत दीप जलाकर की जाती है । अग्नि को देवता का दर्ज़ा दिया गया है । भगवान बुद्ध ने जो अपना अंतिम उपदेश दिया था - अप्प दीपो भाव अर्थात अपना दीपक स्वयं बनो । बुद्ध की इस बात के निहातार्थ बहुत थे , जैसे जीवन के अन्धकार से लड़ने के लिए हमें स्वयं ही दीवाक बनना होगा,तभी जीवन के सरे अन्धकार दूर हो पाएंगे ........






अबकी दिवाली ऐसी मनाना



दियो में ही नही, दिल में भी ज्योत जलाना



दूर हो मन का अँधेरा, ऐसा हो प्रकाश



बस घरो में ही नही , जीवन में उजास



दीपमालाओं सा, प्रकाशित हो जीवन



दूर हो अँधेरा , उज्जवल हो मन



दूजो के जीवन में खुशियाँ लाना



अबकी दिवाली ऐसी मनाना



खुशियों से उन्हें भर दो, जो दिल है खली



रोशन हो उनको घर भी, जिनकी सूनी थाली



सबके घर हो रोशन , ऐसी हो दिवाली



दियो में ही नही , दिल में भी ज्योत जलाना



अबकी दिवाली ऐसी मनाना


सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

चिर ऋणी रहूँगा गुरुवर का ....











परम पूज्य स्वामी श्री सुकान्तानंद जी के श्री चरणों में सादर समर्पित !


जब चारो तरफ था अँधेरा, माँ थी मुझसे दूर

जिन्दगी उलझनों से घिरी, मैं था मजबूर

राह कोई सूझी नही, प्यास मेरी बुझी नही

जीवन में थी एक कमी, और आँखों में थी नमी

किस डगर पर चालू , कैसे जीवन में संभालू

मन में थे कई विचार , पर मैं न था तैयार

तब किसी ने हाथ थमा , जिन्दगी को दिया अमलीजामा

अब तक था मैं गुमराह , फिर मिली मुझे सही राह

दूर हटी परेशानियों की छाया , जीवन में उजाला आया

भटकते- भटकते पहुंचा जहाँ , अहसान है उस दर का

आगे अब शब्द नही, चिर ऋणी रहूँगा गुरुवर का


आपका चरण सेवक

मुकेश पाण्डेय "चन्दन "

orchha gatha

बेतवा की जुबानी : ओरछा की कहानी (भाग-1)

एक रात को मैं मध्य प्रदेश की गंगा कही जाने वाली पावन नदी बेतवा के तट पर ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा हुआ. बेतवा की लहरों के एक तरफ महान ब...