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मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017

ओरछा का सुन्दर पक्षी संसार

मानव के मन को पक्षी हमेशा से आकर्षित करते रहे है।  इन्ही पक्षियों को देखकर मानव ने उड़ने के स्वप्न देखे जो आज हवाई जहाज , हेलीकाप्टर आदि के रूप में साकार हुए है।  पक्षियों को लेकर साहित्य में न जाने कितने काव्य और कहानियां लिखी गयी।  भारत में कविता का उदय बाल्मीकि क द्वारा क्रोच पक्षी को देखकर ही तो हुआ था।  तोता-मैना की कहानिया सदियों तक लोगो का मन बहलाती रही।  कबूतरों ने सन्देश वाहको का कार्य किया तो बाज़ शिकार में सहायक हुए।  तोते का महत्त्व भारतीय माइथोलॉजी में कितना है , कि एक ऋषि का नाम ही शुक देव मुनि है।  भगवान राम की सहायता भी जटायु नामक गिद्ध ने की।  काकभुशुण्डि के रूप में कौए इ ऋषि का स्थान पाया।  कृष्ण ने तो मयूरपंख को शिरोधार्य किया।  हमारे देवी देवताओं ने  वाहन के रूप में पक्षियों का साथ पसंद किया।  जहाँ सरस्वती माता ने हंस , लक्ष्मी जी ने उल्लू , कार्तिकेय ने मयूर तो शनि देव ने कबूतर को अपना वाहन बनाया।  जब पक्षियों को देवताओं ने इतना चाहा है , तो हम मनुष्य पीछे क्यों रहे ? आज मैं आपको ओरछा अभ्यारण्य में पाए जाने वाले रंग-बिरंगे पक्षियों से मिलवाता हूँ। 
                                                   ओरछा वैसे तो रामराजा मंदिर के साथ ही अपनी ऐतिहासिक विरासत के लिए देश-विदेश में ज्यादा प्रसिद्द है।  लेकिन  ओरछा वन्यजीव अभ्यारण्य में पक्षी प्रेमियों के लिए भी यह कम महत्वपूर्ण स्थल नहीं है।  यहां देशी पक्षियों के अतिरिक्त प्रवासी पक्षी भी देखने मिल जाते है।  तो चलिए आज आपको ओरछा के पक्षी परिवार से मिलवाते है।
गिद्ध की परवाज़ 

ओरछा अभ्यारण्य 
ओरछा अभ्यारण मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ जिले में उत्तर प्रदेश की सीमा से लगा हुआ है । यह अभ्यारण बेतवा और जामनी नदी के बीच में स्थित टापू पर बसा हुआ है । दोनों नदियों के बीच में होने के कारण पूरा अभ्यारण्य वेटलैंड है , इस कारण  यहां पक्षियों के लिए आदर्श वातावरण है।  यह लगभग 45  वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में स्थापित है । इसकी स्थापना 1994 में की गई थी । ओरछा अभ्यारण्य में सियार ,लकड़बग्घा ,भेड़िया ,नीलगाय ,सांभर ,चीतल ,बंदर ,लंगूर ,जंगली सूअर आदि वन्य जीव है । परंतु ओरछा अभ्यारण मुख्यतः पक्षियों के लिए प्रसिद्ध है । यहां देश विदेश से पक्षी प्रेमी सर्दियों में पक्षियों को देखने और उनकी फोटोग्राफी करने के लिए आते हैं ।

छतरियों पर आराम करते गिद्ध 
अभ्यारण्य में पायें जाने वाले पक्षी
ओरछा में लगभग 200 प्रजाति के पक्षी पाये जाते हैं, जिनमे प्रमुख हैं । कार्मोरेंट, डार्टर , ग्रे हेरॉन, पोंड हेरॉन , एरगेट , ब्रह्मिनी डक , बार-हेडेड गूज , ब्लैक विंग्ड काइट , शिकरा ,ईगल , वाइट ब्रेस्टेड वाटरमेन , जकाना ,कॉमन ग्रे हॉर्नबिल,  कॉपर स्मिथ बारबेट, कॉमन स्वालो रेड रेमपेड, गोल्डन ओरियल, ग्रे वैगटेल, दूधराज, मोर ,बुलबुल ,नीलकंठ, किंगफिशर, जल मुर्गी ,बगुला ,गौरैया, बयां ,रॉबिन ,बबलर ,कठफोड़वा, मैना ,पहाड़ी मैना, हुदहुद, हॉक कुक्कू, कोयल, पपीहा, तोता, सनबर्ड ,उल्लू, चील ,बाज़ आदि पक्षी प्रमुख रूप से पाए जाते हैं ।
कॉमन स्टोन चैट 

ओरछा में गिद्ध
 ओरछा प्रमुख रुप से गिद्धों के लिए प्रसिद्ध है । ओरछा की ऐतिहासिक इमारतों के शिखर गिद्धों क रहने के लिए उपयुक्त जगह है।  इसलिए ओरछा में छतरिया , जहांगीर महल के गुम्बद और चतुर्भुज मंदिर का शिखर गिद्धों के प्रिय आवास स्थल है।   एक तरफ जहां पूरी दुनिया में गिद्ध  खत्म हो रहे हैं ,वही ओरछा में चार प्रजाति के गिद्ध पाए जाते हैं ।
लॉन्ग बिल्ड वल्चर का जोड़ा 

1 लांग बिल्ड वल्चर (gyps indicus )
भारत में सबसे ज्यादा पाए जाने वाले गिद्धों में लौंग बिल्ड वल्चर है।  यह ओरछा में स्थित ऐतिहासिक इमारतों और पहाड़ों की कंदराओं में पाए जाते हैं । यह ज्यादा तर लंबी उड़ान भरते हैं और जमीन पर धीरे-धीरे बतख की तरह चलते हैं और झुक कर बैठते हैं । इनके पैरों की ऊपरी भाग पर सफेद व नर्म पंख होते हैं । नंगी एवं पंख रहित गर्दन के निचले हिस्से पर नरम हल्के भूरे श्वेत पंखों की कॉलर सी होती है। नर और मादा एक समान होते हैं ।
गोबर गिद्ध या कॉल गिद्ध 
2 गोबर गिध्द या कोल गिद्ध ( Neophron percnopterus /Egyptian culture)
यह गिद्ध अपने घोंसले चट्टानों पेड़ों और पुराने भवनों पर बनाता है । यह डील से आकार में मिलता जुलता है इसके पंख सफेद होते हैं जो किनारों पर काले होते हैं । चेहरा छोटा रोंएदार और पीले रंग का होता है सोच बदली पीलिया ग्रे रंग की होती है । बच्चे काले रंग के होते हैं ।
3 चमड़ गिद्ध/भारतीय सफेद गिद्ध (Oriental white backed Vulture)
रात्रि निवास ऊंचे वृक्षों और ऊंची ऐतिहासिक इमारतों में करने वाला इस गिद्ध का सर्वप्रमुख भी हुआ गला पतला होता है पीठ पर एक सफेद चिन्ह रहता है, जो उड़ते समय दिखाई देता है यही इसकी मुख्य पहचान है ।
4 राज गिद्ध/किंग वल्चर (Red headed Vulture )
इसका सिर टांग गर्दन और सीना लाल रंग के होते हैं । लाल और काली पंखों के बीच सफेद पंखों की पट्टी होती है, शेष शरीर काला होता है । यह दूसरे गिद्धों की तुलना में डरपोक होता है यह मृत जानवर भी बाकी गिद्धों के जाने के बाद खाते हैं और मनुष्यों को देखकर उड़ जाते हैं ।
वाइट ब्रेस्टेड किंगफ़िशर 

ओरछा में बर्ड वॉचिंग के लिए व्यवस्था -
ओरछा अभ्यारण्य के प्रभारी रेंजर आशुतोष अग्निहोत्री ने बताया कि अभ्यारण में वर्ड वाचिंग के लिए अलग से जंतुर टावर बनाया गया है, जिसके ऊपर खड़े होकर अभ्यारण में मिलने वाले विभिन्न पक्षियों को ना केवल देखा जा सकता है बल्कि उनकी फोटोग्राफी भी की जा सकती है । यहां पर कई पक्षी प्रेमी दूरबीन की सहायता से घंटो पक्षियों को निहारते हैं । पक्षियों को देखने के लिए ओरछा अभ्यारण कार्यालय से दूरबीन की भी व्यवस्था की जाती है । ओरछा में गिद्धों के संरक्षण के लिए जटायु संरक्षण केंद्र भी स्थापित किया है , जो गिद्ध संरक्षण के लिए समय -समय पर जान जागरूकता फैलाता है।  भविष्य में गिद्धों के लिए ' वल्चर रेस्टोरेंट ' बनाया जाना प्रस्तावित है , जिसमे एक नियत स्थान पर आसपास के गाँवो में मरे पशुओं को लेकर गिद्धों के लिए रखा जायेगा। यदि कोई भी पर्यटक या पक्षी प्रेमी अभ्यारण्य केंद्र से संपर्क करता है , तो अभ्यारण्य की ओर से एक वनरक्षक कम गाइड भी उपलब्ध कराया जा सकता है।  पक्षियों को देखने का सबसे बढ़िया समय सूर्योदय के थोड़े पहले और सूर्यास्त के समय का है।   
स्थानीय पक्षी प्रेमी रामा मुकेश केवट ने बताया की ओरछा अभ्यारण जो कि दोनों ओर से बेतवा और जामिनी नदियों से घिरे होने के कारण पक्षियों को देखने के लिए एक आदर्श स्थान हैं । ओरछा अभ्यारण्य के अलावा ओरछा में पक्षी पुराने स्मारकों और महलों के शिखरों पर भी देखने मिलते है।  रामा मुकेश स्वयं अभी तक ओरछा में लगभग 135 पक्षियों की पहचान कर चुके हैं और उनके संग्रह में उनकी फोटोग्राफ्स भी हैं ।
बयाँ अपने सुन्दर घोंसले के साथ 
ब्लू रॉक पिजन 

कॉमन मैना 

रोज रिंग्ड पैराकीट 
एशियाई पाइड स्टर्लिंग 

लार्ज एर्गेट 
ओरिएण्टल मैगपिगी रोबिन 
ओरछा पहुंचने के लिए नजदीकी बड़ा शहर झांसी है, जो संपूर्ण देश में सड़क और रेल मार्गों से जुड़ा हुआ है ओरछा से झांसी की दूरी मात्र 18 किलोमीटर है । इसके अलावा ओरछा में रामराजा मंदिर कई ऐतिहासिक इमारतें बेतवा नदी में रिवर राफ्टिंग कयाकिंग नौकायन आदि कि सुविधाएं भी देशी विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करती हैं ।

- मुकेश पाण्डेय
आबकारी कार्यालय ,GT -2  राजघाट कॉलोनी ,
ओरछा , जिला -टीकमगढ़ (मध्य प्रदेश )
मोबाइल नंबर  9039438781
ईमेल - mp 5951 @gmail.com 

शुक्रवार, 22 जून 2012

गरुड़ : एक दैवीय पक्षी को जानिए

मित्रो नमस्कार ,
मैंने अपनी पक्षी श्रृंखला के अंतर्गत भारत में पाए जाने वाले कुछ जाने -पहचाने तो कुछ अनजाने से प्यारे- प्यारे पक्षियों के बारे में बताया था . मेरी ये श्रृंखला काफी लोकप्रिय भी हुई थी . जो लोग इसे पहले नही पढ़ पाए है , वे मेरे ब्लॉग पर 'पक्षी' या' पर्यावरण 'लेबल पर क्लिक करके पढ़ सकते है . आज फिर से मैं उसी श्रृंखला के आगे बढ़ाते हुए गरुड़ पक्षी पर कुछ जानकारी बटोर के लाया हूँ .उम्मीद है पसंद आएगी
गरुड़ को हम अक्सर भगवान विष्णु के वाहन के तौर पर  एक पौराणिक चरित्र के रूप में जानते है .एक पूरा पुराण ही गरुड़ को समर्पित है "गरुड़ पुराण " . कहा जाता है , कि गरुड़ पक्षीराज (पक्षियों का राजा ) है , और वो साँपों को खाता है . भगवान राम और लक्ष्मण को जब मेघनाथ ने नागपाश में बांध दिया था , तब हनुमान जी गरुड़ को लेकर आये थे , तब कहीं जाकर भगवान को मुक्ति मिली थी .महाभारत के अनुसार भगवान कृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ गरुड़ पर बैठ कर नरकासुर को मारने गये  थे .एक अन्य कथानुसार गज और ग्राह की लड़ाई में ग्राह (मगर ) को मारने भगवान विष्णु गरुड़ पर ही बैठ कर गये थे . पंचतंत्र (बाईबल के बाद दुनिया  की दूसरी सबसे ज्यादा अनुवादित पुस्तक ) में भी गरुड़ की कई कहानिया है .

भगवान् विष्णु के वाहन के रूप में गरुड़
होयसल काल की एक गरुड़ प्रतिमा
 गरुड़ हिन्दू धर्म के साथ ही बौद्ध धर्म में भी लोकप्रिय है. बौद्ध ग्रंथो में गरुड़ को सुपर्ण (अच्छे पंख  वाला ) कहा गया है . जातक कथाओ में भी गरुड़ के बारे में कई कहानिया  है. भारत के इतिहास में स्वर्ण युग के रूप में जाना जाने वाले गुप्त शासको का प्रतीक चिन्ह गरुड़ ही था . कर्नाटक के होयसल  शासको का भी प्रतीक गरुड़ था .

थाईलैंड में गरुड़ का एक रूप
 
भारत के अलावा गरुड़ इंडोनेशिया ,  थाईलैंड और मंगोलिया आदि  में भी सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में लोकप्रिय है .इंडोनेसिया का राष्ट्रिय प्रतीक गरुड़ है , वहां की राष्ट्रिय एयरलाईन का नाम भी गरुड़ है . इंडोनेसिया की सेनाये संयुक्त  राष्ट्र मिशन पर गरुड़ नाम से जाती है .थाईलैंड  का शाही  परिवार भी प्रतीक के रूप में गरुड़ का प्रयोग करता है . थाईलैंड के कई बौद्ध मंदिर में गरुड़ की मूर्तियाँ और चित्र बने है . मंगोलिया की राजधानी उलनबटोर का प्रतीक गरुड़ है , जिसे पर्वत का संरक्षक और ईमानदारी का प्रतीक मन गया है .  
हवा में उड़ता एक नर गरुड़ पक्षी
गरुड़  चील की ही एक प्रजाति है .इसकी आवाज़ मिमियाती हुई कीयु जैसी होती है.इसका रंग विशिष्ट तथा विरोधाभासी होता है जिसे सफ़ेद सर तथा छाती को छोड़ कर अखरोट के रंग से मिलता-जुलता माना जा सकता है, पंखों के किनारे काले होते हैं. किशोरों पक्षी अधिक भूरे होते हैं, परन्तु फिर भी इन्हें पीलेपन, छोटे पंखों तथा गोलाकार पूंछ के कारण एशिया में गरुड़  की प्रवासी तथा अप्रवासी प्रजातियों से अलग पहचाना जा सकता है. पंख के नीचे की तरफ कलाई के क्षेत्र में पीला धब्बा वर्ग के आकर में होता है तथा ब्यूटियो गिद्धों से अलग दिखता है.
गरुड़  को श्रीलंका, भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश तथा दक्षिण-पूर्व एशिया में देखा जाना आम था , साथ ही यह दक्षिण में न्यू साउथ वेल्सऑस्ट्रेलिया तक में यह व्यापक रूप से फैली तथा रहता था . अपने क्षेत्र में मौसम के अनुसार, जो कि विशेष रूप से वर्षा से सम्बंधित है, वे स्थान परिवर्तन करती हैं.
वे मुख्य रूप से मैदानों में दिखते  हैं, परन्तु हिमालय में 5000 फीट ऊंचाई तक भी आते  हैं.
खतरे में आ गयी प्रजातियों की आईयूसीएन की रेड लिस्ट में उनका मूल्यांकन सबसे कम चिंताजनक प्रजाति के रूप में किया गया है. हालांकि जावा के रूप में कुछ भागों यह प्रजाति कम हो रही है
                                  दक्षिण एशिया में प्रजनन का मौसम अप्रैल से दिसंबर है. दक्षिणी और पूर्वी ऑस्ट्रेलिया में यह अगस्त से अक्तूबर तक तथा उत्तर व पश्चिम में अप्रैल से जून तक होता है. घोंसले छोटी शाखाओं एवं तीलियों से बनाये जाते हैं तथा इनके अंडे प्यालेनुमा आकार का निर्माण होता है, इसे पत्तियों से भी आरामदेह बनाया जाता है, कई प्रकार के पेड़ों पर इसे बनाते देखा गया है, मुख्य रूप से मैनग्रोव पर. वे एक ही क्षेत्र में कई वर्षों तक घोंसले बना कर उस स्थल के प्रति निष्ठा दिखाते हैं. कुछ दुर्लभ उदाहरणों में उन्हें पेड़ के नीचे जमीन पर घोंसला बनाते देखा गया है. एक बार में दो फीके-सफेद या नीले-सफेद अंडाकार अंडे जिनकी माप लगभग 52x41 मिमी होती है, दिए जाते हैं. माता-पिता दोनों ही घोंसला बनाने तथा बच्चों को खिलाने में भाग लेते हैं, परन्तु ऐसा देखा गया है कि अण्डों को सिर्फ मादा ही सेती है. अंडे 26-27 दिनों तक सेये जाते हैं.
ये मुख्यतः मुर्दाखोर पक्षी है , लेकिन कभी-कभी सांप , खरगोश , चूहा और चमगादड़ का शिकार भी कर लेते है. मित्रो हमारी ये सांस्कृतिक पहचान और भगवान विष्णु का वाहन तेजी से विलुप्त हो रहा है , कारण वही हम मनुष्यों का कृषि हेतु कीटनाशको का प्रयोग , इनके आवासों का नष्ट होना , पर्यावरण प्रदुषण ..........!
हे प्रभु ! हम तो नासमझ है , आप जरुर अपने वाहन की रक्षा करना ............... 
साभार - गूगल , विकिपीडिया

रविवार, 25 मार्च 2012

एक था गुल , और एक थी बुलबुल........


मित्रो,
नमस्कार ,
आपने एक पुरानी हिंदी फिल्म (जब जब फूल खिले ) का यह गीत जरुर सुना होगा "एक था गुल और एक थी बुलबुल , दोनों चमन में रहते थे " फिल्म में अभिनेता शशि कपूर बड़ी मस्ती में ये गीत गाते है । इसी तरह राजेश खन्ना एक फिल्म में गाते हुए नज़र आते - नाच मेरी बुलबुल तुझे पैसा मिलेगा ' इस तरह न जाने कितनी फिल्मो में और कितने गीतों में बुलबुल चिड़िया का बखान हुआ है. क्या आप जानते है ? बुलबुल नामक यह प्यारी सुरीली चिड़िया भारतीय साहित्य और संस्कृति में बहुत लोकप्रिय है । बुलबुल चिड़िया न केवल अपनी सुरीली आवाज़ के लिए लोकप्रिय है , बल्कि यह लड़ाकू स्वाभाव के लिए भी जानी जाती है । पुराने समय में लोग इसे लड़ाई के लिए पालते थे । केवल नर बुलबुल ही गता है , जबकि मादा नही गा पाती है ।
भूरे मटमैले रंग का ये पक्षी अपनी लम्भी पूंछ और उठी हुई चोटी के कारन आसानी से पहचान में आ जाता है । पूरी दुनिया में इसकी ९७०० प्रजातीय पाई जाती है , जिनमे बहुत सी भारत में पाई जाती है । भारत में गुलदुम बुलबुल, सिपाही बुलबुल , मछरिया बुलबुल , पीली बुलबुल और कांगड़ा बुलबुल आदि प्रजातियाँ पाई जाती है ।
क्रांति करी अमर शहीद रामप्रसाद 'बिस्मिल ' की लिखी ग़ज़ल का एक मुखड़ा बहुत लोकप्रिय हुआ था -

क्या हुआ गर मिट गये अपने वतन के वास्ते।
बुलबुलें कुर्बान होती हैं चमन के वास्ते।।

अक्सर नर बुलबुल अपनी मादा को आकर्षित करने के लिए बिजली के तारों या पेड़ो की टहनियों पर बैठ कर अपनी मधुर आवाज़ में गाकर लुभाता है । बुलबुल एक कीड़े-मकोड़े खाने वाला पक्षी है , जो खेतो में होने वाले इन कीड़े-मकोडो को खाकर किसानो की सहायता करता है ।

तो मित्रो , गौरैया, कौए , गिद्ध, नीलकंठ, दूधराज, बया और बुलबुल आदि पक्षियों के श्रंखला को आगे फिर जारी रखेंगे ............अपने विचार जरुर दे ...........जय जय

साभार- गूगल , विकिपीडिआ


शुक्रवार, 23 मार्च 2012

कुदरत का अद्भुत इंजीनियर : बया




मित्रो नमस्कार ,
पक्षी श्रृंखला की लोकप्रियता को देखते हुए गौरैया , कौवा ,दूधराज, गिद्ध , नीलकंठ , पपीहा के बाद आज मैं एक बहुत ही कुशल इंजीनियर पक्षी से आपको रु-ब-रु करने वाला हूँ । आपने कई बार पेड़ो से लटके हुए गोल-मटोल घोंसले देखे होंगे ? इन घोंसलों को देख कर कभी कोई जिज्ञासा हुई होगी , कि किसने बनाये ये सुन्दर घोंसले ? किस की है कमाल की कारीगरी ?ये घोंसले अक्सर कंटीले वृक्षों पर या खजूर प्रजाति के वृक्षों पर ऐसी जगह पर होते है , जहाँ आसानी से अन्य जीव नही पहुँच पाते है । वैसे ये कमाल की कारीगरी भारत की दूसरी सबसे छोटी चिड़िया बया (विविंग बर्ड )की है। इन घोंसलों का निर्माण ये नन्ही (मात्र १५ से० मी० ) सी चिड़िया तिनको और घास से करती है । इन घोंसलों की सबसे बड़ी विशेषता ये है , कि कितनी भी बारिश हो इन घोंसलों में एक बूँद पानी भी नही जाता । इनकी इंजीनियरिंग का लोहा वैज्ञानिक भी मानते है , क्योंकि जीव वैज्ञानिको और इंजीनियरों द्वारा बहुत प्रयास करने के बाद भी इस तरह के घोंसले तैयार नही हो पाए । वैज्ञानिको के पास तो तमाम तरह के उपकरण होते है , मगर यह नन्ही सी चिड़िया सिर्फ अपनी छोटी सी चोंच की बदौलत बिना किसी उपकरण , बिना गोंद के सिर्फ तिनको और घास से इतना सुन्दर, मजबूत और वाटर प्रूफ घोंसला बनाती है ।ये सुन्दर सा घोंसला नर बया मादा बया को आकर्षित करने को बनता है। मादा बया सबसे सुन्दर घोंसले आकर्षित होती है , फिर घोंसले को बनाने वाले नर के साथ समागम करती है । कुछ समय बाद इसी घोंसले में मादा बया अंडे देती है।यह दो से चार सफ़ेद रंग के अंडे देती है । अंडे से निकले बच्चे जब बड़े हो जाते है , तो नर बया अपने बनाये घोंसले को नष्ट कर देता है ।बया पक्षी बड़े ही सामाजिक होते है , ये अक्सर झुण्ड में रहते है ।
प्लोसिउस फिलिप्नस नाम से वैज्ञानिक जगत में जानी जाने वाली यह नन्ही चिड़िया मुख्यतः दक्षिण एशिया क्षेत्र में पाई जाती है । अलग अलग भाषाओ में इसे अलग अलग नाम से जाना जाता है । जैसे -बया और सोन-चिरी (हिंदी क्षेत्र में ), बया चिड़िया (उर्दू में ), सुघरी (गुजराती में ), सुगरण (मराठी में ), बबुई (बंगला में ) और विविंग बर्ड (अंग्रेजी में )। देखने में यह चिड़िया जंगली गौरैया जैसी लगती है . यह नन्ही सी चिड़िया शाकाहारी होती है , यह पौधों से या खेत में गिरे हुए दानो को खाती है । इसे चावल के दाने बहुत पसंद है। घास में फुदकना भी इसे बहुत पसंद है। वैसे ये घरो में भी चक्कर लगाती हुई चहकती रहती है ।इसकी चहचाहट चिट-चिट .........ची ची की ध्वनि जैसी होती है . इसमें कोई दो मत नही है , कि बया बहुत ही बुद्धिमान और चालक पक्षी है । कई जगह इसका मनुष्यों द्वारा उपयोग किया जाता है । ये आसानी से मनुष्यों द्वारा प्रशिक्षित की जा सकती है । कई जगह फुटपाथ पर कुछ ज्योत्षी तोते की तरह इसका प्रयोग ज्योतिष कार्ड उठवाने में करते है । यह छोटे सिक्को को भी बड़ी आसानी से उठा कर अपने मालिक को दे देती है । इतिहास में इसका प्रयोग अकबर के समय से मिलता है। इसका कुछ शासको ने जासूसी में भी प्रयोग किया है । तो मित्रो, ये थी भारत की दूसरी सबसे छोटी चिड़िया से नन्ही सी मुलाकात , कैसी लगी ?
अगली बार फिर किसी चिड़िया से मिलते है , तब तक के लिए जय जय ...............

बुधवार, 21 मार्च 2012

पपीहा; पिया को तलाशता हुआ एक पक्षी


बोले रे पपिहरा ............
पिया बोले पीहू बोले ...........
हिंदी फिल्मो के ये गीत कभी आपने सुने होंगे , मगर इस पपिहरा या पीहू को देखा सुना कभी ?
अगर हाँ तो अच्छी बात है , अगर नही तो कोई बात नही आज मैं आपकी मुलाकात इस मधुर आवाज वाले पक्षी से करवाता हूँ । हिंदी फिल्मो में ही नही हिंदी साहित्य में भी ये पक्षी बहुत लोकप्रिय है । इस कर्णप्रिय आवाज वाले पक्षी को अंग्रेजी में 'ब्रेन फीवर बर्ड ' कहा जाता है । इसकी आवाज के आधार पर अलग अलग भाषा के लोगो द्वारा इसे अलग परिभाषित किया गया है । हिंदी भाषा के लोग मानते है , कि पपीहा अपने प्रियतम को ढूढने के लिए " पिया कहाँ " पुकारता है । जबकि बंगाली लोगो का मानना है, कि ये "चोख गेलो' ( मेरी आँख चली गयी ) कहता है। वहीँ मराठी लोगो का मानना है , कि ये "पयोस आला' ( वरिश आने वाली है ) चिल्लाता है । लेकिन अगर ध्यान से सुना जाये तो हिंदी का "पिया कहाँ " या "पी कहाँ " या "पपीहा " ही इसकी बोली "पी-पियह " के ज्यादा नजदीक है । पिया को पुकारने के कारण ही हिंदी साहित्य के कवियों ने प्रियतम के विछोह या मिलन के सन्दर्भ में इस पक्षी बहुत प्रयोग किया है । हिंदी फिल्मो में भी कई गीतकारो ने पपीहा का अपने गीतों में सुन्दर प्रयोग किया है ।
पक्षियों में चील परिवार का यह मध्यम आकर वाला सदस्य लगभग कबूतर के आकर का होता है । सामान्यतया यह दूर से देखने में चील जैसा लगता है । यह दक्षिण एशिया में बड़ी आसानी से दिखाई देता है । कुछ अंग्रेजी लेखको ने इसे एशियन कोयल भी कहा है। भारत के अलावा यह पाकिस्तान, बंगलादेश और श्रीलंका में भी मिलता है । भूरे रंग वाला ये पक्षी देखने में तो बहुत ज्यादा सुन्दर तो नही होता , मगर इसकी आवाज के कारण यह बहुत लोकप्रिय होता है । यह चांदनी रातो में , सुबह और दोपहर में अपनी सुरीली आवाज में गाता है, कहते इसका बोलना वर्षा के आगमन का सूचक होता है । इसके बारे में एक मिथक ये भी है , कि ये सिर्फ स्वाति नक्षत्र के बरसने वाले जल से ही अपनी प्यास बुझाता है , और फिर वर्ष भर चिल्लाता है , प्यासा हूँ , प्यासा हूँ । यह ग्रीष्म ऋतू के बाद मानसून के पूर्व अपनी मधुर ध्वनि निकलने लगता है ।अपनी सुमधुर ध्वनि में ये रुक रुक कर पांच या छः बार पी-पियह , पी-पियह कहता है । मानों वर्षा के स्वागत में ख़ुशी से गीत गा रहा हो.........

मंगलवार, 20 मार्च 2012

सोन चिड़िया : जो न बन पाई राष्ट्रिय पक्षी




मित्रो नमस्कार,
आज मैं फिर से उपस्थित हूँ , अपनी पक्षी श्रृंखला में गौरैया, गिद्ध, कौआ, दूधराज, नीलकंठ के बाद आपको एक भारतीय मनमोहक चिड़िया सोन चिड़िया से रु-ब-रु करने के लिए । सोन चिड़िया को जिन्होंने नही देखा वे उसके नाम के कारन ये सोचते है , कि ये कोई छोटी सी चिड़िया होगी । मगर आपको बता दूं कि सोन चिड़िया भारत ही नही दुनिया कि सबसे बड़ी उड़ने वाली चिड़िया है । यह आकर में काफी बड़ी होती है , ये आप चित्र देख कर समझ गये होंगे । सोन चिड़िया आज विलुप्त होने के कगार पर खड़ी है। यह पहले भारत में बहुतायत से पाई जाती थी । मुग़ल बादशाह बाबर ने अपनी आत्म्काथ 'तुजुक-ऐ-बाबरी' में सोंचिदिया कि ख़ूबसूरती के बारे में लिखा है । यह प्राचीन काल में सैनिको के जोर आजमाइश के लिए प्रयुक्त कि जाती थी । यह बहुत तेजी से भागती है , इसे भागते हुए देख कर आपको शुतुरमुर्ग का भ्रम हो सकता है । मगर शुतुरमुर्ग के विपरीत यह उड़ भी सकती है । इस कि ख़ूबसूरती के कारण ही इसका बड़ी तेजी से शिकार हुआ और यह आज लुप्त होने के कगार पर है ।इसकी संख्या मात्र २५० ही बची है । इसका शिकार इसके स्वादिष्ट मांस और खेलो के लिए किया गया। वैसे सोन चिड़िया का शिकार करना कोई आसन काम नही है , मगर भील आदिवासी इसमें सिद्धहस्त होते है । यह भारत में खुले घास के मैदानों में पाई जाती है । खास बात यह है कि जिन क्षेत्रो में कृष्ण मृग पाए जाते है , उन्ही क्षेत्रो में सोन चिड़िया भी पाई जाती है । इसका वैज्ञानिक नाम आर्दिओतिस नैग्रेसेप्स है , जबकि इसे अंग्रेजी में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड या इंडियन बस्टर्ड कहा जाता है । भूरे सुनहरे रंग के शरीर और गहरे रंग के पंखो वाली इस खूबसूरत चिड़िया को मशहूर पक्षी विज्ञानी सलीम अली ने इसे भारत का राष्ट्रिय पक्षी बनाने कि सिफारिश की थी , मगर मयूर से यह हार गयी और राष्ट्रिय पक्षी मोर को घोषित किया गया । यह सामान्यतः भारत और उससे लगे पाकिस्तान में पाई जाती है । मध्य प्रदेश के करेरा और घंतिगओं के अलावा गुजरात के नालिया अभ्यारण्य में इसके संरक्षण की व्यवस्था की गयी है । यह एक सर्वभक्षी पक्षी है , जो बीजो के अलावा कीट-पतंगों को भी खाता है । इसके सर पर काले रंग की टोपी इसे और भी खूबसूरत बनाती है । तो कैसी लगी सोन चिरैया से मुलाकात .............अगली बार मिलते है भारतीय साहित्य में लोकप्रिय पपीहा से

सोमवार, 19 मार्च 2012

नीलकंठ : एक और सुन्दर भारतीय पक्षी





नमस्कार मित्रो ,
मैंने अपनी पक्षी श्रृंखला के अंतर्गत अभी तक आप लोगो को गौरैया, कौआ, गिद्ध और दूधराज आदि भारतीय पक्षियों के बारे में जानकारी दी । (जो लोग देर से आये वो मेरी पुरानी पोस्टो पर नज़र डाल सकते है) इस पोस्ट में मैं एक और सुन्दर भारतीय पक्षी नीलकंठ के बारे में बताने जा रहा हूँ । हालाँकि यह पक्षी हमारी संस्कृति में इतना रचा-बसा है , कि चार राज्यों ने इसे अपना राज्य पक्षी घोषित किया है ।( बिहार, कर्नाटक , आन्ध्र प्रदेश और ओड़िसा )। इसी से आप इस सुन्दर पक्षी के महत्त्व को जान सकते है ।
भारतीय संस्कृति में इस पक्षी का बहुत महत्व है । विजयदशमी यानि दशहरा के दिन नीलकंठ के दर्शन करना बड़ा शुभ माना जाता है । कहा जाता है कि अगर दशहरा के दिन नीलकंठ दिखे तो उससे यह कहना चाहिए -
नीलकंठ तुम नीले रहियो , दूध भात के भोजन करियो
हमार बात राम से कहियो, जगत हिये तो जोर से कहियो
सोअत हिये तो धीरे से कहियो, नीलकंठ तुम नीले रहियो
नीलकंठ का नाम उसके शारीरिक रंग के नीले होने के कारण पड़ा । इसका नाम हिन्दू देवता शिव के नाम नीलकंठ का पर्याय है । भगवान् शिव को अपने कंठ में विष धारण करने से नीले हुए कंठ के कारण नीलकंठ कहा जाता है । अक्सर लोग किलकिला या मछारखावा (किंगफिशर ) को गलती से नीलकंठ समझ लेते है । वैसे एक अजीब बात ये है , कि नीलकंठ पक्षी का कंठ नीला नही बादामी रंग का होता है । हाँ सर के ऊपर का हिस्सा , पंख और पूंछ का रंग जरुर नीला होता है ।
नीलकंठ का जीव वैज्ञानिक नाम 'कोरासियास बेंगालेन्सिस ' है , जबकि इसे अंग्रेजी में 'इंडियन रोलर' कहा जाता है है । यह सम्पूर्ण भारत में पाया जाता है । इंडियन रोलर के अलावा पर्सियन रोलर और यूरोपियन रोलर विश्व में नीलकंठ की अन्य प्रजातियाँ है। यह अक्सर खेतों में , बिजली के तारों पर बैठा दिख जाता है । खेतों में उड़ने और मिलने वाले कीटों, टिड्डोऔर झींगुरों को यह बड़े मजे से खाता है । इस तरह से ये भारतीय किसानो का सच्चा मित्र है । लेकिन यह कृषक मित्र पक्षी भारतीय किसानो द्वारा कीटनाशको के प्रयोग के कारण आज खतरें में है । पहले ये खेतो में आसानी से दिख जाते थे, लेकिन दिनों दिन इनकी संख्या में गिरावट हुई है । बस हम यही दुआ कर सकते है कि
नीलकंठ तुम नीले रहियो ...........

स्वर्ग का पक्षी : दूधराज (मध्य प्रदेश का राज्य पक्षी )


मित्रो,
नमस्कार आज पक्षी श्रृंखला में गौरैया, गिद्ध और कौए के बाद आपको एक बहुत ही खूबसूरत पक्षी के बारे में बताने जा रहा हूँ . इस पक्षी को मध्य प्रदेश में राज्य पक्षी का दर्जा प्राप्त है । इस पक्षी के अनेक नाम है , जैसे - दूधराज, दुग्धराज, पेरदाइज फ्लाई कैचर आदि । यह पक्षी देखने में बहुत ही खूबसूरत लगता है । भारत में यह सामान्यतः दो रंगों में देखने में मिलता है । पहला दूधिया सफ़ेद रंग का , इसके दूधिया रंग के कारण ही शायद इसे दूधराज या दुग्धराज कहा जाता है। और दूसरा हल्का नारंगी रंग का । सामान्यतः इसे स्थानीय लोग 'करेंजुआ' के नाम से जानते है । इसकी सबसे बड़ी पहचान इसकी लम्बी पूंछ है, (नर की लम्बी पूंछ होती है , जबकि मादा की पूंछ छोटी होती है ) जो दूर से ही स्पष्ट दिखाई देती है । यह दो भागो में अलग अलग होती है . इसके सर पर काले रंग की प्यारी सी कलगी होती है । और इसकी आँखों सहित सर का रंग काला होता है । जैसा कि इसके अंग्रेजी नाम से स्पष्ट होता है , कि इसका मुख्य भोजन कीट-पतंगे है । यह हवा में ही इनको पकड़ता है . यह मूलतः एशिया महाद्वीप का निवासी है ।यह भारत के अलावा पाकिस्तान, अफगानिस्तान, श्रीलंका, नेपाल , तुर्कमेनिस्तान और ईरान आदि देशो में पाया जाता है । भारत में यह कश्मीर , पंजाब , हिमांचल प्रदेश , बिहार , मध्य प्रदेश और राजस्थान के साथ ही उत्तर-मध्य भारत में पाया जाता है . यह घने जंगले में पाया जाता है , जहाँ बहुत ऊँचे-ऊँचे वृक्ष पाए जाते हो । यह अपना अधिकांश समय वृक्षों की ऊँची शाखाओ पर गुजरता है , और दोपहर के समय ऊपर से ही हवा में गोता लगते हुए कीट-पतंगों का शिकार करता है ।यह गोटा लगते समय बहुत तेजी से कर्कश ध्वनि में चिल्लाता है । खैर अब देश में गाने जंगल धीरे धीरे कम हो रहे है , अतः दूधराज की संख्या भी कम होने लगी है । आज भी अपने देश में बहुत से लोगो ने ढूधराज को देखना को दूर उसका नाम भी नही सुना है। हैरत तो इस बात की होती है , कि मध्य प्रदेश जहाँ इसे राज्य पक्षी का दर्जा दिया गया है , वहां के लोग भी इससे अपरिचित से है । खैर कैसी लगी स्वर्ग के पक्षी दूधराज से आपकी मुलाकात ? अगली बार मिलते है फिर किसी वन्य जीव से मिलने के लिए

रविवार, 18 मार्च 2012

कौए : अब दुर्लभ होने लगे है !

बचपन में जब घर की छत या मुंडेर पर किसी कौए को काँव-काँव करते देखता देखता तो बड़ा खुश होता । पडौसी भी कहने लगते कि कोई मेहमान आने वाला है । मगर अब बड़ी मुश्किल से शहरो में कौए ढूँढने से भी नही मिलते है । भले ही ये कर्कश ध्वनि वाला पक्षी लोगो को पसंद न आता हो मगर भारतीय संस्कृति में इसका बड़ा ही महत्त्व है । पितर पक्ष में लोग कौओ को धोंध कर भोजन करते है । मन जाता है , कि हमरे पूर्वज इन दिनों कौए का रूप लेकर हमारे पास आते है । धार्मिक साहित्य जैसे रामायण और महाभारत आदि में भी कौओं का वर्णन है । कागभुशुंड जी नामक एक कौआ भगवन राम का प्रिय भक्त होता है । भगवान राम ने इन्द्र के पुत्र को सीता पर कुद्रष्टि डालने पर काना बना दिया था । भगवान कृष्ण ने भी कौए के रूप में आये कागासुर का वध किया था।
बचपन में हम सब ने चालक कौए कि कहानी पढ़ी है , जिसमे एक प्यासा कौआ घड़े में कम पानी होने पर उसमे कंकड़ दाल कर जल स्तर ऊपर लता है । फिर अपनी प्यास बुझाता है । कौए कि एक कहानी चालक लोमड़ी के साथ है , जिसमे लोमड़ी कौए से गाना सुनाने कि कह कर उसकी रोटी छीन लेती है । इस तरह और भी कई कहानियो से कौआ हमारी स्मृति में बना हुआ है । मगर आज कौए तेजी कम होते जा रहे है । इसका प्रमुख कारन है , शहरो में तेजी से बड़े पदों का कम होते जाना है , क्योंकि कौए अक्सर अपने घोंसले विशाल वृक्षों की उपरी शाखाओ पर बनाते है। पहले हम बगीचों में गमले लगते थे , और अब गमलो में बगीचे लगाने लगे है . कौए के घोसलों में कोयल कौए के अन्डो को गिराकर अपने अंडे देती है । सी० स्प्लेंदेंस नाम से प्राणी शास्त्र में जाने जाने वाला यह पक्षी पर्यावरण प्रदुषण का शिकार हो रहा है । क्योंकि बढ़ते वायु प्रदुषण के कारण इसके अन्डो के केल्शियम कार्बोनेट के बने खोल पतले हो रहे है । जिससे अन्डो में से बहुत ही कम बच्चे सुरक्षित जीवित बच पा रहे है ।
जन सामान्य में अप्सगुनी मन जाने वाला ये कौआ हकीकत में पर्यावरण हितेषी होता है । पर्यावरण की सफाई और खेती को कीट पतंगों से बचने में इसकी बड़ी भूमिका है । बस जरुरत है , हम मानव भी इस प्यारे पक्षी को बचने में योगदान दे । क्योंकि हमारे पूर्वज सिर्फ पितर पक्ष में ही नही आते होंगे ।
अगर हम अभी नही संभले तो भविष्य में हमारे बच्चे सिर्फ तस्वीरो और फिल्मो में ही इसे देख पाएंगे .

न जाने कहाँ चले गये ये प्रकृति के सफाई कर्मी


मित्रो ,
बचपन में जब भी कोई जानवर मरता था , तो उसके चारो तरफ न जाने कहाँ से बहुत सारे गिद्ध मंडराने लगते थे । कई बार तो जंगल में या सुनसान क्षेत्र में किसी जानवर के मरने का पता गिद्धों के मंडराने से ही चलता था । देखने में बड़े डरावने से लगने वाले ये नुकीली चोंच वाले दैत्याकार पक्षी बचपन कौतुहल का विषय होते थे। ये मरे हुए जानवर के शरीर से मांस नोच नोच कर खाते थे । अक्सर मांस खाते समय देशी कुत्तों से इनकी झडपे हो जाती थी । इनका मांस नोचना बड़ा ही घ्रणित लगता था। मगर जब बड़ा हुआ तो पता चला कि ये मरे हुए जानवरों का मांस खाकर प्रकृति कि सेवा करते है । मतलब जैसे ही कोई जानवर मरता है , तो ये झुण्ड के झुण्ड में पहुच कर उसे तुरंत खाकर उसे साफ़ कर देते है । इस तरह तुरंत ही उस मरे हुए जानवर का मांस सड़ने से बच जाता है , और प्रकृति की सफाई हो जाती है। सोचिये अगर ये न होते तो जंगल तो रोज कहीं न कहीं कोई जानवर मरता था , और पूरा जंगल सड़ांध से भर जाता । ( मैं आज की नही तब की बात कर रहा हूँ जब जंगल बहुत थे ) । तो डरावने से लगने वाले ये भीमकाय पक्षी प्रकृति के सफाई कर्मी है।

मगर आज कल ये जीव संकट में है । क्योंकि हम मनुष्यों द्वारा खेतो में उपयोग किये गये खतरनाक कीटनाशक (दिक्लोफेनक) के कारन आज संकट ग्रस्त है । हालाँकि भारत सरकार ने इस कीटनाशक को प्रतिबंधित कर दिया है । लेकिन ये कीटनाशक गिद्धों की प्रजाति को संकट में तो डाल चुकी है । अब गिद्ध तो सामान्यतः दिखाई ही नही देते । याद कीजिये आपने इन्हें आखिरी बार कब देखा था ? उत्तर प्रदेश के आगरा जिले में सूर्य विहार पक्षी अभ्यारण्य में गिद्धों के संरक्षण किया जा रहा है । आ० यु० सी० एन० ने भारतीय गिद्ध (गिप्स इंडीकास ) को अति संकटग्रस्त प्राणी की श्रेणी में रखा है।
सन्दर्भ - गूगल , विकिपीडिया

पहले मेरे घर खूब आती , गौरैया














पहले
मेरे घर खूब आती , गौरैया

पर अब जाने क्यों शर्माती, गौरैया
जब नानी आँगन में बिखेरती चावल के दाने
तब फुदककर आ जाती गौरैया उसे खाने
घर की मुंडेर के पास थी जगह खाली
उसमे गौरैया ने अपने नीड़ की जगह बनाली
फ़िर दिन भर अंडे रखाते चिरवा-चिरैया
पर अब जाने क्यो शर्माती गौरैया
छत की मुंडेर हुई पक्की , नही रही नानी
किसे फुर्सत ? जो दे गौरैया को दाना पानी
बैशाख में अब कहाँ टंगता , पानी का कटोरा
आख़िर पेड़ भी तो कट गए , जहाँ हो बसेरा
अपने घौंसलो की खातिर, छिनी हमने छैंया
पहले मेरे घर ,खूब आती गौ....रैया !!





दोस्तों , पहले हमारे हर घर घर में आसानी से फुदकती छोटो सी चिड़िया गौरैया अब मुश्किल से दिखती है । गौरैया का गायब होना एक साथ बहुत से प्रश्न खड़े करता है ।

जैसे - क्यो गौरैया ख़त्म हो रही है ?

आज हम मनुष्यो पर निर्भर इस चिडिया के आवास क्यो ख़त्म हो गए है ?

गौरैया अगर ख़त्म हो गई तो समझो हम बहुत बड़े धर्म संकट में पड़ जायेंगे ! क्योंकि हमारे धर्म ग्रंथो के अनुसार पीपल और बरगद जैसे पेड़ देवता तुल्य है। हमारे पर्यावरण में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है । पीपल और बरगद ऐसे वृक्ष है जो कभी सीधे अपने बीजो से नही लगते , इनके बीजो को जब गौरैया खाती है और बीज जब तक उसके पाचन तंत्र से होकर नही गुजरते तब तक उनका अंकुरण नही होता है । इसीलिए अपने देखा होगा की ये वृक्ष अधिकांशतः मंदिरों और खंडहरों के नजदीक अधिक उगते है , क्योंकि इनके आस-पास गौरैया का जमावडा होता है । मेरी ये बात निराधार नही है । मोरिशस और मेडागास्कर में पाया जाने वाला एक पेड़ सी० मेजर लुप्त होने कगार पर है , क्योंकि उसे खाकर अपने पाचन तंत्र से गुजारने वाला पक्षी डोडो अब विलुप्त हो चुका है। यही हाल हमारे यंहा गौरैया और पीपल का हो सकता है । अगर हम न चेते तो ........? अतः आप सभी से निवेदन है की आप स्वयं और अपने जान पहचान के लोगो को इस बारे में बताये और हमारी संस्कृति और पर्यावरण को एक संकट से बचने में सहयोग करे । मुझे आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा ।

आपका अपना- मुकेश पाण्डेय "चंदन"

orchha gatha

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