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रविवार, 25 फ़रवरी 2018

नालंदा :प्राचीन भारतीय ज्ञान के खण्डहरों का अद्भुत अनुभव



जैसा कि आप सभी ने पिछली पोस्ट में पढ़ा कि कैसे मैं और मेरे बड़े साले ध्रुव राजगीर घूम चुके थे और अपनी बाइक से अब नालंदा की ओर चल पड़े थे । नालंदा अपने आप में एक बहुत बड़ा नाम है जो भारत ही नहीं बल्कि पूरे एशिया में एक समय अपने उच्चकोटि ज्ञान की वजह से विख्यात था । हमारी बाइक के पहियों के साथ कालचक्र भी घूम रहा था और मैं अलग ही कल्पना लोक में विचरण करने लगा ।
                                       दिल्ली में अलाउद्दीन खिलजी अपने चाचा और ससुर जलालुद्दीन की हत्या कर सल्तनत की गद्दी पर बैठ चुका था, और उसके कारिंदे पूरे भारत को रौंदने के लिए अलग-अलग दिशा में निकल चुके थे । उन्हीं में से एक कारिंदा दोआब के क्षेत्र से होते हुए गंगा पार करके नालंदा की ओर बढ़ रहा था । बख्तियार खिलजी ! जी हां उस दरिंदे का यही नाम था, जो बंगाल की ओर बढ़ते हुए रास्ते में पड़ने वाले तमाम गांव-शहरों और मंदिरों को न केवल लूटते हुए आ रहा था ,बल्कि लूटने के बाद उन्हें तहस-नहस कर के उनमें आग भी लगा रहा था । बख्तियार खिलजी कि इस लूटपाट की खबर जब नालंदा बौद्ध बिहार के प्रमुख आचार्य के पास पहुंची तो उनके मन में किसी भी प्रकार की घबराहट या बेचैनी नहीं थी, वह निर्विकार रूप से शांत भाव में थे । तभी आचार्य को प्रणाम कर द्वारपाल ने अपनी शंका व्यक्त की। कि आचार्य ! लोग बता रहे हैं बख्तियार बहुत ही नृशंस और अमानवीय तरीके से गांव और नगरों को नष्ट करता आ रहा है । तभी एक अन्य आचार्य  ने कहा- लेकिन उससे हमें भयभीत होने की क्या आवश्यकता ?  हमारे पास तो स्वर्ण भंडार नहीं है, बस ज्ञान भंडार ही है ! हमारे महाविहार को लूटने से उसे कुछ नहीं मिलेगा ।
                                   अब प्रमुख आचार्य मैं अपना मौन तोड़ा और बोले- आचार्य श्री, इन मुस्लिम आक्रांताओं को सैन्य बल से उतना भय नहीं लगता, जितना कि ज्ञान बल से लगता है । यह सैन्य बलों से तो किसी भी तरीके से निपट सकते हैं, परंतु ज्ञान से लड़ने की क्षमता इनमे नहीं है । यह शस्त्र से तो युद्ध कर सकते हैं परंतु शास्त्र से भयभीत रहते हैं । इन का उद्देश्य सिर्फ लूटपाट करना ही नहीं बल्कि अपने धर्म का प्रसार करना भी है । और इनके धर्म के प्रसार में कहीं भी शस्त्र बाधा नहीं बनी जहां भी इन्हें रुकावटें मिली वहां शास्त्र ने ही उन्हें रोका । इसलिए हमारा नालंदा बौद्ध विहार इनके लिए एक महाकाय शत्रु के समान है । तभी इन्हें गांव से दूर की तरफ धूल भरी आंधी नजर आई, जो इस बात का संकेत थी कि बख्तियार खिलजी की सेनाएं नालंदा की सीमा पर पहुंच चुकी है । और पहुंचते ही उन्होंने मारकाट लूटपाट  करना शुरू किया । अहिंसा के उपदेशक और बुद्ध के अनुयाई अपनी कलम से तलवारों से मुकाबला ना कर सके और ज्ञान का यह विश्वविद्यालय धूल धूसरित हो गया । महाविहार के पुस्तकालय में आग लगा दी गई और हजारों बहुमूल्य ग्रंथ धू-धूकर कर जल उठे । चारों तरफ करुण क्रंदन होने लगा नर-नारी ही नहीं अब इतिहास भी रो रहा था ।
                                           ध्रुव के ब्रेक लगाते ही मैं कल्पना लोक से बाहर आया तो देखा सामने ही उस महान नालंदा विश्वविद्यालय की खंडहर खड़े थे ।नालंदा को यूनेस्को ने वर्ष 2016  में विश्व धरोहरों की सूची में शामिल किया । इस तरह से बिहार में महाबोधि मंदिर बोधगया के पश्चात नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहर यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल होने वाले स्थानों में दूसरा है । सड़क के दोनों तरफ दो बड़े गेट लगे हुए हैं एक तरफ का गेट नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहरों की ओर ले जाता है तो दूसरी तरफ का गेट टिकट काउंटर और नालंदा संग्रहालय की ओर ले जाता है । गर्मी अपने चरम पर थी चटक धूप निकली हुई थी और हमारा शरीर पसीने से तरबतर था । टिकट काउंटर से टिकट लेकर हम नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहरों की तरफ बढ़ चले । सामने एक सूचना शिलालेख ने हमारा स्वागत किया । इस शिलालेख के अनुसार छठी शताब्दी ईसापूर्व में भगवान महावीर एवं बुद्ध के काल से ही नालंदा की ऐतिहासिकता के प्रमाण प्राप्त होते हैं बुद्ध के परम प्रिय शिष्यों में से एक सारी पुत्र के जन्म एवं निर्माण के रूप में भी इसे जाना जाता है । प्राच्य कला एवं संस्कृति के विख्यात शिक्षा संस्थान व महाविहार के रूप में इसकी पहचान पांचवी सदी में स्थापित हुई जब चीन सहित अनेक सुदूरवर्ती देशों से बौद्ध भिक्षु ज्ञानार्जन हेतु यहां आते थे । इस संस्थान से जुड़े विद्वानों में नागार्जुन, आर्य देव ,वसुबंधु ,धर्मपाल ,सुविष्णु , असंग ,शीलभद्र ,धर्मकीर्ति ,शांति रक्षित इत्यादि प्रमुख है। इसके अतिरिक्त प्रसिद्ध चीनी यात्रियों में ह्वेनसांग एवं इत्सिंग के नाम उल्लेखनीय है । जिन्होंने अपने यात्रा वृतांतो  में नालंदा के महाविहारों , मंदिरों तथा भिक्षुओं की जीवनचर्या आदि का विशेष वर्णन किया है । धर्मशास्त्र ,व्याकरण ,तर्कशास्त्र ,खगोलिकी ,तत्वज्ञान ,चिकित्सा एवं दर्शनशास्त्र आदि इस शिक्षा केंद्र में अध्ययन के प्रमुख विषय थे । अभिलेखीय प्रमाणों के अनुसार समकालीन शासकों द्वारा दान किए गए अनेक ग्रामों के राजस्व से इन महाविहारों का व्यय  वहन किया जाता था ।
                                                              प्राचीन युग के एक महानतम विश्वविद्यालय के रूप में प्रतिष्ठित नालंदा महाविहार की स्थापना गुप्त सम्राट कुमारगुप्त प्रथम (413-455 ई0) के शासनकाल में की गई थी । कन्नौज नरेश हर्षवर्धन(606-647 ई0)  व पूर्वी भारत के पाल शासकों ( 8 वी -12 वी सदी) के समय में भी महाविहारों को राज्य पर से अनवरत प्राप्त होता रहा । भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा कराए गए उत्खनन (1915-37 तथा 1974-82) से यहां ईट निर्मित 6 मंदिरों एवं 11 विहारों की सुनियोजित श्रंखला अनावृत हुई जिसका विस्तार लगभग 1 वर्ग किलोमीटर से भी अधिक है । लगभग 30 मीटर चौड़े उत्तर दक्षिण पथ के पश्चिम में मंदिरों की एवं पूर्व में विहारों की श्रंखला है । आकार एवं विन्यास में सभी विहार लगभग एक जैसे हैं । सर्वाधिक महत्वपूर्ण संरचना दक्षिणी छोर पर स्थित मंदिर संख्या 3 है ,जिसमें निर्माण के सात चरण है । इस के निकट छोटे छोटे आकार के मनौती स्तूपों का एक विशाल समूह है । महा विहारों एवं मंदिरों के भग्नावशेषों के साथ-साथ प्रस्तर (पत्थर), कांस्य (कांसा) स्टको मैं निर्मित अनेक मूर्तियां तथा कलाकृतियों उत्खनन से प्राप्त हुई हैं । इनमें विभिन्न मुद्राओं में बुद्ध ,अवलोकितेश्वर ,मंजूश्री ,तारा ,प्रज्ञापारमिता ,मारीचि ,जंभल आदि बौद्ध प्रतिमा है तथा विष्णु ,शिव-पार्वती ,महिषासुर-मर्दिनी, गणेश ,सूर्य इत्यादि हिंदू देव प्रतिमाएं प्रमुख हैं । इसके अतिरिक्त भित्तिचित्र ,ताम्र-पत्र, प्रस्तर और ईटों पर उत्कीर्ण अभिलेख मुद्राएं ,फलक ,सिक्के ,टेराकोटा ,मृदभांड आदि की प्राप्ति हुई है । इन सभी कलाकृतियों एवं पूरा वस्तुओं को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संचालित स्थानीय संग्रहालय में दर्शकों के लिए प्रदर्शित किया गया है ।
                                                     इस सूचना शिलालेख से जानकारी पढ़ने के पश्चात हम दोनों खंडहरों की ओर चल दिए । जहां हमारे टिकट चेक किए गए उसके बाद हमें प्रवेश दिया गया । गर्मी धीरे-धीरे बहुत तेज हो रही थी इसलिए हमने खंडहरों में प्रवेश करने के साथ ही एक पेड़ की छाया के नीचे कुछ देर सुस्ताने का निर्णय लिया । ऊपर नीले आसमान में छोटे-छोटे सफेद बादल बहुत ही मनोहारी दृश्य उत्पन्न कर रहे थे, परंतु नीचे आग बरस रही थी । कभी हमारे पास यहां माली का काम करने वाले एक सज्जन आए और बोले गाइड की जरूरत है । अब शक्ल और सूरत से लग तो नहीं रहा था कि वह हमें गाइड कर पाएंगे । परंतु हमने उनका पारिश्रमिक पूछा तो बोले वैसे तो ₹300 गाइड लेते हैं पर आप लोग ₹100 ही दे देना । मैंने सोचा यूं ही खाली भटकने से इन खंडहरों में कुछ समझ में तो आएगा नहीं, इससे अच्छा इन्हें ही साथ रख लिया जाए । तो उन सज्जन के सामने एक शर्त रखी कि अगर हमें वाकई उन्होंने ढंग से गाइड किया तभी पैसे देंगे ।
                                                                                                            अब हम चल पड़े उनके साथ विहार संख्या-1 की ओर । भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा नालंदा में उत्खनन कार्य का प्रारंभ इसी विहार से किया गया था और यह यहां स्थित सभी विभागों में सबसे महत्वपूर्ण विहार भी है । यहां से मुद्राएं ,पाषाण अभिलेख ,ताम्र पत्र इत्यादि अनेक पुरा वस्तुओं के साथ-साथ 9 चरणों में निर्मित एक विशाल विहार भी उत्खनित हुआ जो दो काल खंडों का प्रतिनिधित्व करता है । मूलतः इस विहार का निर्माण छठवीं सातवीं सदी में हुआ है तथा इसका पुनर्निर्माण नालंदा के पतन के दिनों तक अनवरत चलता रहा । इस के प्रांगण में एक छोटा सा मंदिर है जो गुप्त कालीन है ,जबकि उसके निकट ही दूसरा चौकोर मंदिर और उसकी दीवार से सटा गजपृष्टकार (हाथी की पीठ के आकार का) छत एवं डॉट द्वार से युक्त दो कोठियों को जोड़ा गया है ।  यहां से प्राप्त एक ताम्रपत्र के अनुसार नीचे वाला विहार तृतीय पाल वंश के शासक देवपाल के शासनकाल (810-850 ) में सुमात्रा के एक नरेश ने बनवाया था । विहार में अवस्थित सीढ़ी से यह प्रतीत होता है कि यह विहार कम से कम 2 मंजिला अवश्य रहा होगा । विहार में ऊपरी स्तर पर 34 कक्ष बने थे जिनमें कुछ में भिक्षुओं के विश्राम हेतु शैया एवं पुस्तक और सामग्री रखने के लिए कोनो में अलमारी का भी प्रावधान था । विहार की दीवारों से अग्नि द्वारा नालंदा महाविहार के विध्वंस के प्रमाण भी प्राप्त होते हैं जहां आज भी जली हुई दिखाई देती हैं ।
                                                                                                          हमारे गाइड महोदय हमें विद्यार्थियों के कक्ष की ओर ले गए जिनके दरवाजे के सामने नालियां बनी हुई थी । मैं खंडहरों की फोटो लेने में मशगूल था और गाइड महोदय नालियों की तरफ इशारा करके हमारे साले साहब को बता रहे थे कि यहां डाइनिंग सिस्टम था । डाइनिंग सिस्टम सुन कर मेरे कान खड़े हुए और जब मैंने देखा तो गाइड साहब नालियों की तरफ इशारा कर रहे थे । यह देख कर मुझे उनके आंग्लभाषा ज्ञान पर हंसी आई । और मैंने उनकी गलती को सुधारा और बताया कि यह डाइनिंग सिस्टम नहीं ड्रेनेज सिस्टम कहलाता है । हमारे गाइड महोदय हमें अन्य विहारों स्तूपों ,पूजा ग्रहों, छात्रावासों को दिखाते हुए उनकी व्याख्या कर रहे थे । क्योंकि हम भी इतिहास के अध्ययेता रहे हैं ,इसलिए बीच-बीच में उनकी कमियों को सुधार कर उन्हें बता रहे थे । एक तरफ छोटे बड़े कई स्तूप बने हुए थे । स्तूप बौद्ध धर्म में किसी भी व्यक्ति के मृत्यु पश्चात स्मारक स्वरूप बनाए जाते हैं । कई स्तूपों में संबंधित व्यक्ति के अस्थि अवशेष भी रखे होते हैं । यहां बने स्तूपों में बड़े स्तूप विश्वविद्यालय के आचार्यों के और छोटे स्तूप विद्यार्थियों के स्मारक थे । उस समय महामारियां भी फैलती थी जिसके कारण कई बार विद्यार्थी कम उम्र में ही काल कवलित हो जाते थे । और उनके अंतिम संस्कार के लिए उनके घर वालों को सूचना बहुत देर से मिलती थी । इसलिए उन्हें यहीं पर अंतिम विदाई दी जाती थी । चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी आत्मकथा सी-यू-की में नालंदा विश्वविद्यालय के बारे में विस्तार से वर्णन किया है । नालंदा विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए भी प्रवेश परीक्षा ली  जाती थी । विश्वविद्यालय के द्वारपाल  भी इतने विद्वान होते थे, कि सबसे पहले विद्यार्थियों का परीक्षण उन्हीं द्वारपालों के माध्यम से किया जाता था । जब विद्यार्थी उन द्वारपालों के प्रश्नों के उत्तर सही दे पाते तभी उन्हें अगले स्तर के परीक्षण से गुजरना पड़ता । इस तरह नालंदा विश्वविद्यालय में दूर-दूर देशों से भी विद्यार्थी आते और ज्ञान प्राप्त करते । हमारे गाइड महोदय ने छात्रावास के एक कक्ष को ह्वेनसांग का कक्ष बताया । जब हमने कहा कि हम क्यों माने कि यह ह्वेनसांग का ही कक्ष है । तो उनका जवाब था कि अधिकांश चीनी पर्यटक इस कक्ष में अवश्य आते हैं और पूजा पाठ करते हैं । शायद ह्वेनसांग ने अपनी आत्मकथा में अपने कक्ष की स्थिति का वर्णन किया होगा,  जिससे वर्तमान में पर्यटकों को अंदाजा होगा कि उनका कक्ष किस तरफ था । हमारे पास इसे ना मानने का कोई कारण नहीं था तो हम उसे ह्वेनसांग का कक्ष मानकर आगे बढ़ चले । 
                                                                                     विश्वविद्यालय में बहुत बड़े-बड़े भांडागार भी थे जहां पर विश्वविद्यालय के शिक्षकों और छात्रों के लिए अनाज सुरक्षित रखा जाता था । हमारे गाइड महोदय ने हमें उस समय के चूल्हे भी दिखाएं, जो आज की तरह नहीं लेकिन बनावट में विशेष आकार के थे । विश्वविद्यालय परिसर में ही अष्टकोणीय कुए का भी दर्शन हमने किया जिसे आज लोहे की जाली से ढक दिया गया है । अब दिन ढलने लगा था और हमने भी फोटोग्राफी करने के पश्चात वापस लौटने का निर्णय लिया क्योंकि इसके पश्चात हमें संग्रहालय भी देखना था और बाइक से गया भी लौटना था । हमारे गाइड साहब की जिन गलतियों का हमने सुधार किया उन्हें उन्होंने दोबारा पूछ कर अपनी पॉकेट डायरी में नोट किया । जब हम उन्हें उनका पारिश्रमिक देने लगे तो उन्होंने विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़ लिए अब बोलें आप से मुझे भी बहुत कुछ सीखने मिला हम आपसे पैसे नहीं ले सकते । काफी मान-मनौव्वल करने के पश्चात भी जब उन्होंने हम से पैसे नहीं लिए तो हम भी उन से हाथ मिला कर निकल पड़े संग्रहालय की ओर । सड़क पर आकर हमने अनानास का जूस पिया उसके पश्चात संग्रहालय गए । संग्रहालय में नालंदा विश्वविद्यालय और आसपास के क्षेत्रों से उत्खनित वस्तुएं प्रदर्शन के लिए रखी थी । यहां पर फोटोग्राफी प्रतिबंधित थी इसलिए हमने संग्रहालय के भीतर कोई भी फोटो नहीं खींची । मुझे यह बात समझ में नहीं आती कि संग्रहालयों में फोटोग्राफी प्रतिबंधित तो नहीं करनी चाहिए । फोटोग्राफी से उस काल की संस्कृति और सभ्यता का ज्ञान का प्रसार ही होगा । खैर अब हम वापस बाइक से गया की ओर निकल पड़े नालंदा को अपनी यादों में संजोकर । दिन ढलने के कारण पावापुरी नहीं जा सके जो भगवान महावीर से ना केवल जुड़ी है बल्कि जैन धर्म का एक बहुत ही महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है । 
- मुकेश पांडेय 'चँदन '
प्रवेश करते ही ASI का स्वागत 
नालंदा की जानकारी देता शिलापट्ट 
प्रवेश करते ही प्रथम दर्शन 
चटख धूप में नील आसमान में सुन्दर बादल 
हमारे गाइड महोदय हमें जानकारी देते हुए 
छात्रावास के कमरे 
छात्रावास के सामने डाइनिंग सिस्टम नहीं ड्रेनेज सिस्टम बना था।  
दूसरी मंजिल तक जाने के लिए सीढियाँ 
सभागृह का मंच 
यहाँ भगवान बुद्ध की मूर्ति स्थापित रही होगी 
एक कुंआ 
गज पृष्ठाकार छत 
पिरामिड के आकार की छत 
मनौती स्तूप 
एक विशेष प्रकार का चूल्हा 
मैं और ध्रुव स्तूप के अवशेषों के सामने 
यूनेस्को द्वारा घोषित विश्व विरासत स्थल का पटल 
संग्रहालय का प्रवेश द्वार 
इसी तरह का घंटा हमे राजगीर में भी मिला था।  
अप्प दीपो भव  (बुद्ध का अंतिम सन्देश ) के शुभ विदा 

मंगलवार, 23 जनवरी 2018

विश्वशांति स्तूप और सोनभंडार का रहस्य

पिछले भाग गया से राजगीर की राह में आपने पढ़ा कि हमारी यात्रा गया से किस तरह राजगीर के लिए शुरू हुई हम अपनी मोटरसाइकिल से राजगीर की सीमा पर स्थित प्रवेश द्वार तक पहुंच चुके थे । राजगीर यह नाम मैंने इतिहास कि किताबों में बहुत पढ़ा था । मगध राज्य के सबसे प्राचीन वंश का संस्थापक वृहद्रथ (महाभारत काल)  था , और इसकी राजधानी गिरिव्रज थी । चारों तरफ पर्वत या गिरी से घिरा होने के कारण इसका नामकरण गिरिव्रज हुआ । बृहद्रथ के पश्चात उसका पुत्र जरासंघ शासक बना । जरासंध के बारे में तो आपने कहां सुना ही होगा जरासंध की मृत्यु महाबली गदाधारी भीम के हाथों श्री कृष्ण के इशारों से हुई । जरासंध के बाद इस वैभव पूर्ण साम्राज्य के बारे में इतिहास मौन है । परंतु बौद्ध ग्रंथों के अनुसार 544 ईसा पूर्व में बिंबिसार ने हर्यक वंश की स्थापना की और मगध की गद्दी पर बैठे । बिंबिसार नहीं प्राचीन गिरी ब्रज को सुव्यवस्थित कार्यक्रम राजगृह नाम से अपनी राजधानी बनाया । बिंबिसार के समय महात्मा बुद्ध अपने धर्म का प्रचार प्रसार कर रहे थे और मगध के अंतर्गत ही बोधगया में उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी । अतः गौतम बुद्ध से प्रभावित होकर सम्राट बिंबिसार ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया । बिंबिसार के दरबार में उस समय के प्रसिद्ध राजवैद्य जीवक रहा करते थे, जिन्हें बिंबिसार ने महात्मा बुद्ध की सेवा में भी भेजा था । इसके अलावा अवंती के शासक प्रद्योत के पांडु रोग से ग्रसित होने पर राजवैध जीवक ने ही उन्हें निरोगी किया । सम्राट बिंबिसार ने अंग देश (वर्तमान में बिहार का भागलपुर क्षेत्र ) के शासक ब्रम्हदत्त को हराकर उसे मगध का हिस्सा बनाया । आज इतिहास में हम देखते हैं कि मुगल काल में मुगल बादशाह अकबर ने वैवाहिक संबंधों के आधार पर अपने साम्राज्य का विस्तार किया महारानी जोधा इसका एक उदाहरण है । परंतु यह परंपरा भारतीय शासकों में बहुत पहले के समय से ही चली आ रही है । सम्राट बिंबिसार ने वैवाहिक संबंध स्थापित कर कौशल (वर्तमान पूर्वी मध्य प्रदेश) नरेश प्रसेनजित की बहन महाकौशला से वैशाली (हाजीपुर क्षेत्र) नरेश चेतक की पुत्री क्षेमा से और मद्र प्रदेश (वर्तमान पंजाब ) की राजकुमारी क्षेमा से विवाह कर अपने मगध साम्राज्य का विस्तार किया । 52 वर्षों तक बिंबिसार ने मगध साम्राज्य की उत्तरोत्तर प्रगति की लेकिन उसके ही पुत्र अजातशत्रु ने अपने पिता बिंबिसार की हत्या कर गद्दी हथियाई । अजातशत्रु जैन धर्म को मानने वाला था परंतु उसके ही शासनकाल में गौतम बुद्ध की मृत्यु हुई और मृत्यु उपरांत बौद्ध धर्म की प्रथम संगीति 483 ईसा पूर्व में राजगृह में संपन्न हुई इसके अध्यक्ष महा कश्यप को बनाया गया । इस तरह देखा जाए तो बौद्ध धर्म के लिए राजगृह यानी वर्तमान राजगीर बहुत ही महत्वपूर्ण केंद्र बन गया । बौद्ध धर्म के अलावा राजगीर में हिंदुओं, सिखों और जैनियों के भी धर्मस्थल हैं । अर्थात राजगीर सर्व धर्म समभाव वाला एक अनुपम प्राकृतिक परिदृश्य से परिपूर्ण स्थल है ।
                                              अब हम इतिहास के पन्नों से वापस वर्तमान के धरातल की ओर लौटते हैं । समय के साथ हमारी बाइक के पहिए घूम रहे थे और हम विश्व शांति स्तूप का प्रवेश द्वार को देख कर उस तरफ मुड़ गए । विश्व शांति स्तूप एक पहाड़ी के ऊपर बना हुआ है । जहां तक जाने के लिए दो मार्ग हैं एक सीढ़ियों से चढ़कर और दूसरा आकाशीय रज्जुमार्ग या रोपवे । रोपवे बिहार पर्यटन द्वारा संचालित किया जाता है और यहां पर पुरातन कालीन रोपवे के दर्शन हुए । रोपवे के दोनों का टिकट ₹80 है । जबकि एक तरफ ऊपर से नीचे उतरने का एक व्यक्ति का ₹50 टिकट है । नीचे से ऊपर जाने के लिए एक तरफ का टिकट नहीं मिलता  दोनों तरफ की टिकट लेने पड़ते हैं । अतः हम दोनों ने दोनों तरफ के टिकट लिए और लग गए रुपए की लाइन में । इससे पहले मैं मध्य प्रदेश के मैहर के शारदा माता मंदिर और भेड़ाघाट के धुआंधार जलप्रपात के रूप में में बैठ चुका था ,क्योंकि वह रोप वे चारों तरफ से बंद और आधुनिक प्रणाली के थे इसलिए उनमें कम डर लगता है । राजगीर के रोपवे की प्रणाली थोड़ी सी पुरानी है और बैठक व्यवस्था खुला है इसलिए डर होना लाजमी है । रोपवे काउंटर पर मोबाइल से सेल्फी लेना मना है का बोर्ड लगा हुआ था ।इसलिए हमने भी सेल्फी नहीं ली हालांकि वैसे भी हम सेल्फी बहुत कम लेते हैं । कुछ देर पश्चात हमारी बारी आई और हमें भी  खड़खड़ाते हुए आकाशीय रज्जुमार्ग के सिंहासन पर बैठाया गया । और हम चल पड़े विश्व शांति स्तूप को देखने पहाड़ियों के ऊपर हालांकि रुपए की खड़खड़ाहट से हमारी शांति जरूर भंग हो रही थी और नीचे खाई को देख कर सांसे अटक रही थी, मन भटक रहा था और तन लटक रहा था । हमने चलते हुए रोपवे में भी कुछ मोबाइल से फोटो निकाली जिसे ऊपर से नीचे आ रहे लोगों ने देखा आश्चर्यचकित हुए । जब एक सज्जन से रहा ना गया तो उन्होंने चिल्लाते हुए कहे दिया ' ए बाबू तनी देख के न तो मोबाइल गिर जाई ! '
                                                                                 खैर हम गृद्धकूट पर्वत के रत्नगिर शिखर पर पहुंचे जहां पर सफेद रंग का बना हुआ विश्व शांति स्तूप तेज धूप में अपनी अलग ही आभा बिखेर रहा था । एक जापानी लामा की परिकल्पना का शिलान्यास भारत के द्वितीय राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी ने 1965 में किया था, और इसका उद्घाटन 1969 में राष्ट्रपति वेंकट वराह गिरि जी ने किया था । स्तूप के ऊपर भगवान बुद्ध की प्रतिमाएं बनी हुई थी और उन प्रतिमाओं के आसपास जापानी और हिंदी में भगवान बुद्ध के वचन लिखे हुए है । स्तूप के बगल में ही एक जापानी मंदिर बना हुआ है, जिसका उद्घाटन 1978 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई द्वारा किया गया था । स्तूप के ठीक सामने एक बड़ी सी घंटी लगी हुई थी जिसके साथ लोग खड़े होकर फोटो खिंचवा रहे थे । तेज धूप होने के कारण गर्मी बहुत अधिक थी और इस वजह से हम यहां ज्यादा देर नहीं रुके और वापस आकाशीय रज्जुमार्ग से नीचे उतरे ।
                                                                       सूर्य देव चरम पर थे और अब हमें भूख भी लगने लगी थी लेकिन आस पास कोई अच्छा रेस्टोरेंट ना दिखने के कारण हम राजगीर शहर की ओर चल पड़े । राजगीर शहर में प्रवेश करने के पूर्व ही हमें सोन भंडार, जरासंध के अखाड़ा, मनियारी मठ आदि के संकेत बोर्ड देखें और हम चल पड़े सोन भंडार की ओर । सोन भंडार एक प्राकृतिक चट्टानों की गुफा थी जिसे तीसरी या चौथी सदी में जैन मुनि वीर देव ने बनवाया था । इसके बारे में जनश्रुति है कि यह सम्राट बिंबिसार का खजाना है जिसे किसी गुप्त मंत्र द्वारा सुरक्षित किया गया है और खजाने के द्वार पर यह मंत्र लिखा हुआ है । जिसे अब तक कोई पढ़ नहीं पाया । अंग्रेजों द्वारा इस खजाने को पाने के लिए तोप का भी प्रयोग किया गया लेकिन इस सोन भंडार का वे बाल भी बांका ना कर सके । अधिक गर्मी की वजह से जरासंध का अखाड़ा और ब्रिज बिहार जाने का कार्यक्रम निरस्त कर हम वापस उसी रास्ते पर लौटे और मनियारी मठ के दर्शन किए । कुए के जैसे बने इस मठ में अंदर एक देवी का स्थान बताया जाता है जो राजगीर के शासकों की कुलदेवी रही हैं । अब हम पुनः राजगीर जाने वाली मुख्य मार्ग की ओर चल पड़े ।
                                        राजगीर में प्रवेश करने के पश्चात हमने सबसे पहले गर्म पानी के कुंड देखने का मन बनाया । यहां पर सात अलग- अलग कुंड बने हुए हैं जो अलग-अलग ऋषि यों को समर्पित है सबसे बड़ा कुंड ब्रह्म कुंड है । मौसम में गर्माहट के कारण गर्म कुंड में नहाना हमें गवारा ना हुआ । परंतु आचमन अवश्य किया । गर्म कुंड मैं माननीय पटना उच्च न्यायालय द्वारा मुस्लिमों के प्रवेश पर रोक की तख्ती लगी देखकर थोड़ा सा आश्चर्य हुआ । क्योंकि मैंने अभी तक किसी अन्य धार्मिक स्थान पर दूसरे धर्म के लोगों के प्रवेश पर रोक की लगी तख्ती नहीं देखी थी वह भी किसी हाईकोर्ट के आदेश द्वारा । खैर हिंदू मुस्लिम होने की किसी भी प्रकार की जांच नहीं हो रही थी, और लोग बेरोकटोक आ जा रहे थे । गर्म कुंड के पास ही लगा ठंडे जल का मानव निर्मित तरणताल भी था । जो निजी संपत्ति लग रही थी और वहां टिकट लेकर लोग स्नान कर रहे थे । घर हमें तो अभी बड़ी जोरों से भूख लगी थी इसलिए गर्म कुंड के बाहर ही बने सरकारी रेस्टोरेंट में हम लोगों ने दो थाली ऑर्डर की । खाना साधारण ही था, लेकिन भूखे पेट तो सब अच्छा लगता है । उसके बाद हम लोगों ने वेणुवन के दर्शन किए । विष्णु शब्द का अर्थ बांस होता है अर्थात यह बांस का जंगल रहा होगा । यह गौतम बुद्ध का प्रिय स्थल रहा है और वह अक्सर अपने राजगीर प्रवास के दौरान इसी वेणुवन में रुकते थे । यहां उन्होंने कई चौमासे भी बिताए । वेणुवन के निकट ही एक थाई मंदिर बनाया गया है । गौतम बुद्ध को वन अधिक ही पसंद थे उन्हें बोधगया में जंगल में बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्ति हुई । आम्रपाली नामक उनकी प्रसिद्ध शिष्य ने उन्हें एक आम्र बन दान किया था । और अंगुलिमाल से भी वह एक वन में ही मिले थे । अब हमारी मंजिल विश्व विख्यात नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहर थे इसलिए हमने राजगीर को छोड़ नालंदा की राह पकड़ी ।
विश्व शांति स्तूप का प्रवेश द्वार 


कृपया कतार में आये 


आकाशीय रज्जु मार्ग (रोप वे )

आकाशीय रज्जु मार्ग वाहन पर सवार हम 


शिखर पर स्तूप जाने का रास्ता 

विश्व शांति स्तूप 


हम दो हमसफर 

मनमोहक नज़ारे 


जापानी भाषा का शिलालेख 







सोनभंडार 

सोनभंडार के अंदर 




मनियर मठ 


गर्म कुंड 


सप्तकुण्ड 

बुधवार, 25 अक्टूबर 2017

अद्भुत शिल्प और दशावतार मंदिर देवगढ़

देवगढ़ का दशावतार मंदिर 

कुछ यात्राएं नियति द्वारा निर्धारित होती है।  इसी तरह मेरी देवगढ़ (जिला ललितपुर , उत्तर प्रदेश ) की यात्रा रही।  हुआ यूँ , कि 9 अक्टूबर 2017 को  सुबह 10 बजे के लगभग मेरे घुमक्कड़ मित्र और उत्तर प्रदेश पुलिस में दरोगा श्री नयन सिंह जी का कॉल आया और वो ललितपुर जिले के देवगढ़ कसबे जाने की चर्चा करने लगे।  अब इतिहास में गुप्तकालीन देवगढ़ के दशावतार मंदिर को न जाने कितनी बार पढ़ा होगा ! और यह मेरे विश लिस्ट में भी था।  नयन जी ने अगले दिन जाने की बात कही , लेकिन कल किसने देखा ? मैंने बिना समय गंवाए उनसे आज ही चलने का अनुरोध किया।  नयन जी भी तैयार हो गए।  फिर क्या अगले एक घंटे में वो झाँसी से अपनी स्कॉर्पियों से ओरछा स्थित मेरे घर के सामने थे।  नयन जी के पैरों में तकलीफ थी , लेकिन जब पैरों में सनीचर चढ़ जाये तो फिर कुछ नहीं सूझता है। हम निकल पड़े बिना खाये-पिए अपनी मंजिल देवगढ़ की ओर .... 
                                        हम सीधे ललितपुर पहुंचने पर ही रुके , ललितपुर में प्रवेश के पूर्व निरंजन चाय वाले की प्रसिद्ध चाय पीने रुके।  भूख लग आई थी, लेकिन घुमक्क्ड़ी की भूख के आगे सब भूल हमारी सवारी चलती रही।  अभी तक तो फोरलेन (राष्ट्रिय राजमार्ग क्रमांक -26 ) की शानदार सड़क थी, लेकिन अब ललितपुर से देवगढ़ तक का 35 किमी की दूरी सड़क निर्माण कार्य प्रगति पर होने से हमारे वाहन की गति दुर्गति पर आ गयी।  लगभग 3 बजे हम लोग देवगढ़ की पुण्यभूमि पर पहुंचे।
                                  वैसे देवगढ़ बेतवा नदी किनारे बसा छोटा सा क़स्बा है , जो भगवान महावीर वन्यजीव अभ्यारण्य के अंतर्गत आता है।  कसबे में प्रवेश करते ही हमे दशावतार मंदिर का बोर्ड दिखा तो हमारी गाड़ी के पहिये वही थम गए।  दशावतार मंदिर भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण (ASI ) के सरंक्षण में होने से थोड़ा व्यवस्थित था।   हमें सबसे पहले चौकीदार सीताराम तिवारी मिले , जो स्थानीय निवासी भी थे , और हमारा परिचय जानने के बाद हमें बड़े ही आदर के साथ मंदिर दिखाने चल पड़े । दशावतार मंदिर भारतीय इतिहास में स्वर्ण काल के रूप में प्रसिद्ध गुप्त काल मैं बनी हुई एक बहुत ही अद्भुत कारीगरी वाली देवालय की इमारत है । इस इमारत को देख कर लगता ही नहीं कि यह उत्कृष्ट कारीगरी छठवीं सदी में की गई है, यानी कि आज से 1400 वर्ष पूर्व जब पत्थरों पर कारीगरी
सिर्फ छैनी और हथौड़ों से होती थी ।
                                        दशावतार मंदिर पंचायतन  शैली में निर्मित मंदिर था जिसमें चार कोनों पर स्थित मंदिरों के सिर्फ अवशेष  देखने को मिलते हैं और मुख्य मंदिर का शिखर भी ध्वस्त अवस्था में है । सामने से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि मंदिर के शिखर को तोप के गोले से नष्ट करने का प्रयास किया गया है ,परंतु यह प्रयास पूरी तरह सफल नहीं हो सका । मंदिर का द्वार 5 शाखाओं में अनुपम शिल्पाकृतियों से सुसज्जित है । द्वार के सिरदल पर शेषनाग के आसन पर विराजमान विष्णु की प्रतिमा उत्कीर्ण है जिससे पता चलता है कि यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है, हालांकि गर्भ गृह में भगवान की कोई मूर्ति वर्तमान में नहीं है । गर्भगृह की मुख्य मूर्ति को या तो नष्ट कर दिया गया होगा या फिर चोरी कर ली गई होगी । गर्भ ग्रह की मुख्य मूर्ति के नीचे के भाग में जलहरी बनी हुई है, जिस से कई लोग इसे भगवान शिव का मंदिर बताते हैं । लेकिन सिर दल की विष्णु प्रतिमा और देवगढ़ में ही स्थित वराह मंदिर में बनी हुई जलहरी से स्पष्ट होता है कि यहां पर भगवान विष्णु का ही मंदिर था । अगर हम गुप्त शासकों के द्वारा बनवाए गए अन्य मंदिरों का भी अध्ययन करें तो पता चलता है कि गुप्त शासक भगवान विष्णु के उपासक थे और उनका राजकीय चिन्ह भी गरुड़ था । मुख्य द्वार के कोनों पर गंगा और यमुना जलपात्र लिए हुए खड़ी हैं । सूर्य और चंद्रमा भी द्वार पर अंकित है । द्वार के ऊपरी हिस्से मैं सिंह के मुख की आकृति में कीर्तिमुख की कतारबद्ध आकृतियां उत्कीर्ण है । इस मंदिर के द्वार में मैथुन प्रतिमाएं भी उत्कीर्ण की गई है । 
                                           गर्भ गृह  में कोई मूर्ति ना होने की वजह से हम उसका विश्लेषण और अध्ययन नहीं कर सकते इसलिए द्वार के पश्चात हम मंदिर की बाई दीवाल पर बने हुए शिल्प का अवलोकन करते हैं । इस दीवार पर बने हुए शिल्प को देखते ही मन प्रसन्न हो जाता है । यहां पर शिल्पी ओने जीवंत चित्रण करते हुए गजेंद्र मोक्ष नामक पौराणिक कथा का प्रतिमा रूप में अद्भुत अंकन किया है । इस प्रतिमा में न केवल शारीरिक अनुपात का सूक्ष्मता से ध्यान दिया गया है, बल्कि भाव भंगिमाएं भी इतनी अच्छी तरीके से निरूपित की गई है ,कि लगता है कि यह प्रतिमाएं तुरंत बोल उठेंगी । जल में फंसे हुए गज की स्थिति को इस तरह निरूपित किया गया है,  कि उसके मुख पर भी कष्ट  का प्रभाव सहज ही दिखाई दे रहा  हैं । यहां तक कि जिस जलस्रोत में वह फसा है, उस की लहरें और उसमें खिले हुए कमल के पुष्प लहरों की गति अनुसार निरूपित किए गए हैं । भगवान विष्णु और उनके वाहन गरुड़ की भाव-भंगिमाएं यह बताती हैं, कि वह कितनी जल्दबाजी में अपने भक्तों को बचाने के लिए दौड़े चले आए। तत्परता में वह अपना मुकुट भी भूल आए जिसे लेकर उनके सेवक गण पीछे से आए इस बात को भी शिल्प में प्रमुखता से स्थान दिया गया है । सामान्यता हमने गजेंद्र मोक्ष की कथा में भगवान विष्णु द्वारा गज को ग्राह या मगर से बचाते हुए देखा सुना है । लेकिन यहां पर ग्राह्य मगर की जगह नाग और नागिन दिखाए गए हैं । भगवान विष्णु द्वारा छोड़े गए सुदर्शन चक्र को नाग के सीने के मध्य में धंसा हुआ दिखाया गया है । इतिहास के कई जानकारों से जब ग्राह की जगह नाग  के होने के संबंध में चर्चा की तो यह बात सामने आई , कि वास्तव में ग्राह के रूप में एक असुर था जो रूप बदलने में माहिर था , इसलिए कई स्थानों पर उसे मगर तो कुछ स्थानों पर नाग और कुछ स्थानों पर कच्छप के रूप में भी दर्शाया गया है । इस  पाषाण प्रतिमा को देखकर मस्तक गर्व से और ऊंचा हो गया कि आज से 14 सौ वर्ष पूर्व हमारे शिल्पी इतने प्रतिभावान थे कि इस तरह की प्रतिमा को उत्कीर्ण कर सके । जबकि आज तमाम तकनीकी अविष्कार होने के बाद भी मैडम तुसाद वाले मोम के पुतले भी नकली लगते हैं । इस प्रतिमा के आसपास सजावट के लिए नाग वल्लरियों का भी सुंदर प्रयोग हुआ है ।
                     मंदिर के पीछे की दीवाल पर नर और नारायण की प्रतिमा उत्कीर्ण की गई है जिसमें इनके साथ शिव ब्रह्मा आदि देवताओं के अलावा स्वर्ग और अन्य विषयों का भी शिल्पा अंकन किया गया है निर्माण की दृष्टि से इस प्रतिमा की श्रेष्ठता में भी कोई कमी निकालना मुश्किल है । यहां तक कि प्रतिमा के वस्त्रों का अंकन भी बहुत अच्छी तरह से किया गया है । नर नारायण की प्रतिमा के ऊपर की ओर आम्र पल्लवों काफी सुंदर अंकन है । इस दीवार पर एक ओर गजलक्ष्मी का भी सुंदर अंकन है ।
                        अब चलते हैं , मंदिर की दाहिनी दीवाल पर बने हुए प्रतिमा शिल्प की ओर... यह प्रतिमा दशावतार मंदिर की सबसे सुंदर और महत्वपूर्ण शिल्प आकृति  है । इसी शिल्प की वजह से यह मंदिर प्रसिद्ध भी है । इस शिल्प में  भगवान विष्णु को शेषशाई मुद्रा में दिखाया गया है । भगवान की नाभि से निकले कमल पर ब्रह्मा जी विराजमान हैं ,जिसे पद्मनाभ अवस्था भी कहा जाता है । भगवान विष्णु का अभिनंदन करने के लिए भगवान शिव अपने नंदी पर पार्वती सहित  दौड़े चले आ रहे हैं । शिल्प की आकृति नंदी के वेग  को बखूबी प्रदर्शित कर रही है । ब्रह्मा जी के दूसरी ओर ऐरावत पर विराजमान इंद्र और अपने मयूर वाहन पर विराजमान स्वामी कार्तिकेय भी प्रदर्शित हैं । अब अगर मुख्य प्रतिमा की बात की जाए तो भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या पर एक हाथ सर पर लगाए हुए लेटे हैं । भगवान की शरीरों का अंकन और उनके शरीर से शेषनाग पर पड़ने वाले दबावों को बहुत ही सुंदर तरीके से प्रदर्शित किया गया है । भगवान विष्णु की पत्नी लक्ष्मी भगवान विष्णु के चरण दबा रही हैं , और उनके हाथों से पड़े हुए दबावों को भी भगवान के चरणों पर स्पष्ट देखा जा सकता है । इस मुख्य प्रतिमा के नीचे एक और कथानक को प्रदर्शित किया गया है जो कि महाभारत काल से संबंधित है । इसमें पांच पांडव और द्रौपदी का अंकन है । दुर्योधन के खून से अपने केशों को धोने का संकल्प लिए हुए द्रोपदी खोलें केश पकड़े हुए हैं । युधिष्ठिर अर्जुन और भीम के चेहरे मिलते हुए प्रतीत होते हैं जिस से पता चलता है कि वह एक ही मां की संतान हैं, जबकि नकुल और सहदेव इनके चेहरे अलग ही देखने के कारण पता चलता है कि इनकी माता दूसरी थी ।
               दशावतार मंदिर के शिल्प को देखने के बाद काफी समय इन में खोया रहा और इन शिल्पियों की तारीफ में जितने भी शब्द कहे जाएं बहुत कम हैं। आज भी वर्तमान के शिल्पी इनसे बहुत ही पीछे हैं । प्रतिमाओं में शारीरिक अनुपात वस्त्रों का अंकन और उन सब से भी बढ़कर चेहरे पर भाव भंगिमाएं इतनी अच्छी तरह से कर पाना यह भारतीय स्थापत्य और शिल्प की उत्कृष्टता का प्रमाण है ।  हमें देवगढ़ में सिर्फ दशावतार मंदिर के बारे में ही जानकारी थी और इसे ही देखने हम भागे चले आए थे । लेकिन लेकिन जब सीता राम तिवारी जी ने बताया कि यहां पर अभ्यारण के अंतर्गत आठवीं नवी सदी के जैन मंदिर, गुप्त काल का ही वराह मंदिर, सिद्ध गुफा ,नाहर गुफा, राज गुफा और बेतवा का मनोरम तट  भी दर्शनीय है । तो यह हमारे लिए एक बोनस पॉइंट की तरह था ,कि कहां हम रत्न को देखने आए थे और हमें खजाना ही मिल गया।  सूर्य धीरे-धीरे अस्तांचल गामी हो रहे थे।  भूख भी तेज लगी थी।  समयाभाव में हमने क्या किया ? और इस खजाने के बारे में आप अगली पोस्ट में पढ़िए ।
तब तक आप इन चित्रों को देखिये और हमारे प्राचीन शिल्प पर गर्व कीजिये
मंदिर का कलात्मक द्वार 
द्वार के सिरदल पर भगवान विष्णु 
स्वागत में मकरवाहिनी गंगा 
कच्छप वाहिनी यमुना स्वागत द्वार पर 
स्वागत द्वार के अन्य शिल्प 
गजेंद्र मोक्ष का अद्भुत शिल्पांकन 
नर-नारायण और अन्य देवतागण 
गजलक्ष्मी 
शेषशायी और पद्मनाभ भगवान विष्णु और अन्य देवगण 
बांये से नयन जी , मैं और सीताराम तिवारी 

orchha gatha

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