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बुधवार, 21 मार्च 2018

मैहर : जहां आज भी आल्हा माईं शारदा का पूजन करने आते हैं ।


51 शक्तिपीठों में से एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ मध्यप्रदेश के सतना जिले में स्थित मैहर है, जहां पर मां शक्ति शारदा के रूप में प्रतिष्ठित है । शक्तिपीठों की स्थापना से संबंधित कथा तीन चरणों में अलग-अलग ग्रंथों में मिलती है जिसमें इस कथा का प्रथम चरण का रूप महाभारत के शांति पर्व में है और इस कथा के दूसरे चरण के रूप में श्रीमद् भागवत महापुराण से लेकर शिवपुराण तक वर्णन मिलता है । जब की कथा के तीसरे चरण का वर्णन देवी पुराण या महाभागवत जैसे उपपुराण में मिलता है ।
कथा के अनुसार भगवान शिव की पत्नी सती जो महाराज दक्ष की पुत्री थी । दक्ष द्वारा एक यज्ञ के आयोजन में सारे देवी देवताओं को निमंत्रण देने के पश्चात् भगवान शिव को ना बुलाने पर नाराज थी । और उन्होंने भगवान शिव से स्वयं अपने पिता दक्ष के यज्ञ में भाग लेने की आज्ञा मानी तब शिव जी ने उन्हें मना कर दिया । परंतु सती अपने पति महादेव शिव के मना करने के बाद भी हठपूर्वक दक्ष के यज्ञ में पहुंचती हैं और अपने पिता दक्ष पर क्रोधित होती हैं । वहां पर दक्ष एवं अन्य लोगों के मुख से अपने पति की बुराई न सुन पाने के कारण सती यज्ञ की अग्नि में कूद जाती हैं । अतः रुष्ट होकर भगवान शिव अपने मुख से वीरभद्र को उत्पन्न करते हैं और वीरभद्र शिव गणों के साथ जाकर यज्ञ का विध्वंस कर डालता है  ।  यज्ञ विध्वंस के पश्चात जब महादेव यज्ञ स्थल पर पहुंचते हैं और सती का शव देखकर दुखी हो जाते हैं और उनके शव को लेकर विक्षिप्त की तरह संपूर्ण ब्रह्मांड में भटकने लगते हैं । तब भगवान विष्णु अपने सुदर्शन चक्र से सती केशव को खंड-खंड रूप में काटते जाते हैं और इस प्रकार सती के शव के विभिन्न अंग 51 स्थानों पर गिरे और उन 51 स्थानों पर शक्तिपीठों का निर्माण हुआ । 
                                        उन  51 स्थानों में से एक स्थान मैहर भी है, जहां कहा जाता है कि शक्ति के गले का हार इस जगह गिरा इसलिए इसका नाम माई का हार  यानी (माई +हार ) मैहर पड़ा ।  हालाँकि  अलग-अलग धर्म ग्रंथों में अलग-अलग संख्या में शक्तिपीठों का जिक्र मिलता है।  जैसे तंत्र चूड़ामणि में शक्तिपीठों की संख्या 52 बताई गई है, तो देवी भागवत में 108 शक्तिपीठों का उल्लेख है।  देवी गीता में 72 शक्तिपीठ का उल्लेख मिलता है । परंतु अधिकांश देवी भक्त देवी पुराण में 51 शक्ति पीठों को ही परंपरागत रूप से मान्यता देते हैं ।

                                     अब अगर हम मंदिर इतिहास की बात करें ऐसी जनश्रुति है कि अपने अज्ञातवास काल में पांडवों द्वारा इस मंदिर का निर्माण किया गया और देवी की पूजा की गई । परंतु इतिहास में अगर दृष्टि डालें तो मां शारदा देवी की पत्थर की मूर्ति के पैर के पास में एक प्राचीन शिलालेख प्राप्त हुआ है जिसमें शक संवत 424 चैत्र कृष्ण पक्ष मंगलवार विक्रम संवत 559 अर्थात 502 ईसवी उल्लेखित है । अतः वर्तमान मंदिर को इससे शिलालेख के आधार पर चौथी और पांचवी सदी का माना जा सकता है । हालांकि  भारत में मंदिर निर्माण की प्रक्रिया भी चौथी सदी से ही प्रारंभ हुई ।
                                   आम जनता में इस मंदिर से एक और मान्यता जुड़ी हुई है वह 12 वीं सदी में पृथ्वीराज चौहान के समय इस चित्र में एक बहुत ही प्रतापी शासक और हुए हैं, जिन्हें राजा परमर्दिदेव या  परमाल कहा गया । राजा के दरबार में आल्हा और उदल नामक दो भाई बहुत ही वीर थे.  जिन्होंने पृथ्वीराज चौहान के विरुद्ध युद्ध भी किया और पृथ्वीराज चौहान को अभयदान तक दिया।  । और ऐसी मान्यता है कि आल्हा को माई शारदा के आशीर्वाद से अमरत्व प्राप्त है । और आज भी आल्हा द्वारा प्रतिदिन माई शारदा का प्रथम पूजन किया जाता है  . बताते हैं कि रात के समय कोई भी व्यक्ति मंदिर में नहीं ठहर सकता।  सुबह जब पुजारी मंदिर का पट खोलते हैं, तो उस समय माई का पूजन किया हुआ मिलता है । आल्हा के बारे में तत्कालीन दरबारी कवि जगनिक द्वारा 'परमाल रासो' नामक ग्रंथ लिखा गया , जिसका एक भाग आल्हा खंड कहलाता है और इसमें आल्हा की वीरता और उनके द्वारा लड़ी गई 52 लड़ाइयों का बखान है । आज भी बुंदेलखंड,अवध , पूर्वांचल  और बघेलखंड क्षेत्र में ग्रामीण लोगों द्वारा बरसात के समय आल्हा का गायन बड़े ही चाव से किया जाता है और आल्हा आज विश्व का सबसे लंबा गेय पद है । आल्हा शैली के बारे में पंडित ललिता प्रसाद मिश्र जी कहते हैं कि  
आल्हा छंद में लिखी उस समय की अलौकिक वीर गाथाओं को तब से लेकर आज तक लोग गाते चले आ रहे हैं और मजे की बात यह है कि कायर तक आल्हा सुनकर जोश से भर जाते हैं यहां तक कि यूरोपीय महायुद्ध में सैनिकों को जोश से भरने के लिए ब्रिटिश सरकार ने भी इसी आल्हा शैली का सहारा लिया था ।

                         अब हम वापस मंदिर की ओर चलते हैं । मैहर सतना जिले में स्थित एक तहसील है जो इलाहाबाद कटनी रेल खंड पर एक रेलवे स्टेशन भी है मैहर रेलवे स्टेशन से 5 किलोमीटर की दूरी परकोटा पर्वत पर माई शारदा का मंदिर स्थापित है । जहां तक पहुंचने के लिए पक्की सीढ़ियां भी निर्मित है और आधी दूरी तक हम वाहनों के माध्यम से भी पहुंच सकते हैं और पिछले कुछ सालों से रोप-वे की भी व्यवस्था प्रारंभ हो गई है । बिहार में नवरात्रि के समय अत्यधिक भीड़ होती है। 

मैहर सिर्फ मां शारदा देवी के मंदिर के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है , बल्कि हिंदुस्तानी संगीत का एक घराना मैहर घराना के रूप में भी प्रसिद्ध है । भारतीय शास्त्रीय संगीत के उस्ताद अलाउद्दीन खान ने इस घराने की स्थापना की थी, वे यहां पर मैहर महाराज के दरबारी संगीतकार थे । उस्ताद अलाउद्दीन खान स्वयं तो कई वाद्ययंत्रों को बजाने में न केवल पारंगत थे बल्कि उन्होंने कई नए वाद्ययंत्रों का आविष्कार भी किया । उस्ताद अलाउद्दीन खान के शिष्य की बड़ी लंबी सूची है जिसमें कुछ प्रमुख हैं ,उनकी पुत्री अन्नपूर्णा देवी, उनके पुत्र उस्ताद अली अकबर खान एवं पंडित रविशंकर ,उस्ताद आशीष खान पंडित पन्नालाल घोष, पंडित निखिल बनर्जी इत्यादि ।मैहर में कई सीमेंट कारखाने भी स्थापित हैं इसके अलावा आल्हा ऊदल का अखाड़ा और तालाब भी दर्शनीय स्थान है ।
हालांकि मैं और मेरा परिवार कई बार मैहर में मां शारदा का दर्शन कर चुका है लेकिन इस पोस्ट में प्रयुक्त की गई फोटोग्राफ्स हमारी 2012 की यात्रा की है जिसमें हम लोगों ने पूरे परिवार के साथ माई शारदा के दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त किया । एक तरफ से हम लोगों ने पूरी सीढ़ियां चढ़कर ऊपर मंदिर में माई के दर्शन किए परंतु बहन जी की तबीयत कुछ खराब होने की वजह से हम लोगों ने वापसी और ऊपर से कि उसका भी अनुभव बड़ा ही मजेदार रहा । इस पोस्ट में बस इतना ही जय माई शारदा ।

मैहर का शारदा माता मंदिर 
मैहर रेलवे स्टेशन के बाहर हमारा परिवार 
मंदिर की चढ़ाई शुरू होने पर प्रवेश द्वार 
चढ़ाई चढ़ते हुए मेरे माता-पिता 
बीच चढ़ाई से दिखता मैहर शहर 
ऊपर पहुँचते ही खड़ी सीढियाँ 
ऊपर से दिखते प्राकृतिक दृश्य 
दर्शनार्थियों की भीड़ 
ऊपर से दिखता आल्हा-उदल का तालाब 
रोप वे 
माँ शारदा मंदिर और प्रतिमा ( फोटो - साभार  पत्रिका डॉट कॉम )

रविवार, 21 अक्टूबर 2012

तीन रूप में दर्शन देने वाली माँ हरसिद्धि !

माँ हरसिद्धि


नमस्कार मित्रो ,
अभी पुरे देश में शारदीय नवरात्र बड़े धूम - धाम से मनाया जा रहा है , हिन्दू लोग माँ दुर्गा की उपासना  में रत है . आज मैं आप को बुंदेलखंड की एक प्रसिद्द देवी स्थल " माँ हरसिद्धि , रानगिर " के बारे में बताना चाहता हूँ .
माँ हरसिद्धि स्वयं प्रकट होने के साथ ही , सभी की मनोकामना पूर्ण  करने के लिए विख्यात है . मनोकामना पूर्ण करने के कारन ही उन्हें हरसिद्धि कहा जाता है . मान्यता है कि माँ हरसिद्धि एक दिन में तीन रूप में लोगो दर्शन देती  है . सुबह बालिका  के रूप में , दोपहर में युवती के रूप में और शाम  के समय वृद्धा के रूप में माँ हरसिद्धि की प्रतिमा से दर्शन होते है .वर्तमान में नया भव्य  मंदिर बना है , जबकि इसके पूर्व एक किले (गढ़ ) के रूप में था .  
माँ हरसिद्धि मंदिर
माता के प्रकट होने के बारे में एक कथा प्रचलित है - बहुत पहले रानगिर गाँव में बच्चों के साथ जंगल की ओर से एक दिव्य बालिका खेलने आती थी .गाँव के बच्चे घर जाकर उस दिव्य बालिका की चर्चा करते तो ग्रामीणों को आश्चर्य होता . एक बार सभी ने उस बालिका के बारे में पता लगाने का निश्चय किया , नियत समय पर बालिका खेलने आई , तो ग्रामीणों ने उसे पकड़ने का प्रयास किया . लेकिन वो बालिका अंतर्धान हो गयी . फिर कुछ दिनों बाद ग्रामीणों को सपने में बालिका आई और बताया मैं हरसिद्धि माता हूँ , और गाँव स्थित कुएं में मेरी प्रतिमा है , जिसे कच्चे सूत से निकलकर उसकी स्थापना करो , हाँ ध्यान रखना एक बार जहाँ रख डोज मैं वही स्थापित हो जाउंगी . दुसरे दिन ग्रामीणों ने कुएं में कच्चा सूत डाला तो एक प्रतिमा उसमे चिपक कर बाहर आई . लोगो में पास में ही एक नीम के पेड़ के नीचे प्रतिमा रखा , तो प्रतिमा वही स्थापित हो गयी , बाद में ग्रामीणों द्वारा बहुत प्रयास किये गए , कि किसी तरह गड्ढा खोद कर  भी प्रतिमा निकाल ली जाये , ताकि व्यवस्थित तरीके से मंदिर बना कर प्रतिमा प्रतिष्ठापित की जाये . लेकिन सारे प्रयास विफल रहे . आज भी गड्ढा खोदे जाने के कारण मंदिर में प्रवेश करने हमें प्रतिमा सामान्य धरातल से नीचे दिखती है . माँ हरसिद्धि की प्रतिमा का मुख नदी और जंगल की ओर है .(जहाँ से वह बालिका आती थी ) मंदिर काफी प्राचीन बताया जाता है .  
                                                            एक जनश्रुति के अनुसार - पहले नवरात्री में ब्रम्ह मुहूर्त में बाघ माँ के दर्शन करने आता  था और बिना किसी को हानि पहुचाये जंगल लौट जाता था . हालाँकि अब न तो घना जंगल बचा है , और न ही जंगल में बाघ बचे  है . बारहमासी  सड़क बन जाने से  जंगल तेजी कटा . मैं जब बचपन में जाता था , और अब जाने पर फर्क साफ़ नज़र आता है . जंगल वन्यजीवों के नाम पर बन्दर, लंगूर और सियार ही दिखते  है. हाँ पक्षियों के कुछ दुर्लभ प्रजातियाँ थोड़े प्रयास से जरुर दिख जाती है . मंदिर के किनारे ही देहार नदी का विहंगम तट है . वैसे तो ये एक छोटी नदी है , लेकिन अद्भुत है , इसके किनारों पर जब आप बड़ी-बड़ी नदी द्वारा काटी गयी चट्टानों को देखते है , तो लगता है , कि शायद चट्टानों को भी इसने हार दी , इसीलिए इसे " दे हार " कहा गया . नदी के दोनों किनारों पर बंदरों और लंगूरों की अठखेलियाँ मन मोह लेती है . गौर करने की बात है , कि यहाँ के बन्दर शैतान नहीं है . 
                                                           नदी के दुसरे ओर घने जंगल में " बूढी रानगिर " देवी का मंदिर है . जो स्टाप डेम पर करके जाया जाता है . जंगल में और भीतर  जाने पर " गौरी दांत " नामक देवी स्थल है . कहा जाता है , कि भगवान् शिव जब माता सती का शव लेकर विलाप कर रहे थे , और भगवान् विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से  शव के ५१ टुकड़े गिरे , जहाँ बाद में ५१ शक्ति पीठो की स्थापना हुई . उन्ही में से यह भी एक स्थल है , यहाँ सती का दांत गिरा था , इसलिए इसे गौरिदांत कहा जाता है . हालाँकि यह स्थान दुर्गम होने के कारण सामान्य जन की पहुच से दूर है . इस स्थान पर प्रागैतिहासिक काल के साक्ष्य भी है . जो इसकी प्राचीनता का प्रमाण है .  
दर्शनार्थियों की भीड़
                                           रानगिर में प्रतिवर्ष चैत्र माह की नवरात्री में मेला लगता है . जिसमे बुंदेलखंड ही नहीं दूर -दूर से लोग आते है .     माँ हरसिद्धि का धाम मध्य प्रदेश के सागर जिला मुख्यालय से ५० किमि० दूर विंध्यांचल पर्वतमाला की सुरम्य पहाड़ियों के मध्य देहार नदी के तट पर स्थित है . यहाँ पहुचने के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन सागर है , जो बीना -कटनी रेलखंड पर है . सागर से नवरात्री के समय बस और जीप आसानी से मिल जाती है .लेकिन अन्य दिनों लोग स्वयं के वाहन या निजी वाहन रिजर्व करके जाते है . सागर से राष्ट्रिय राजमार्ग क्र० २६ (झाँसी -लखनदों ) पर नरसिहपुर की तरफ लगभग ३० किमि० पर बांये ओर 8 किमि० जंगल  में पक्की सड़क से जाया जा सकता  है .

orchha gatha

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