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मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017

ओरछा का सुन्दर पक्षी संसार

मानव के मन को पक्षी हमेशा से आकर्षित करते रहे है।  इन्ही पक्षियों को देखकर मानव ने उड़ने के स्वप्न देखे जो आज हवाई जहाज , हेलीकाप्टर आदि के रूप में साकार हुए है।  पक्षियों को लेकर साहित्य में न जाने कितने काव्य और कहानियां लिखी गयी।  भारत में कविता का उदय बाल्मीकि क द्वारा क्रोच पक्षी को देखकर ही तो हुआ था।  तोता-मैना की कहानिया सदियों तक लोगो का मन बहलाती रही।  कबूतरों ने सन्देश वाहको का कार्य किया तो बाज़ शिकार में सहायक हुए।  तोते का महत्त्व भारतीय माइथोलॉजी में कितना है , कि एक ऋषि का नाम ही शुक देव मुनि है।  भगवान राम की सहायता भी जटायु नामक गिद्ध ने की।  काकभुशुण्डि के रूप में कौए इ ऋषि का स्थान पाया।  कृष्ण ने तो मयूरपंख को शिरोधार्य किया।  हमारे देवी देवताओं ने  वाहन के रूप में पक्षियों का साथ पसंद किया।  जहाँ सरस्वती माता ने हंस , लक्ष्मी जी ने उल्लू , कार्तिकेय ने मयूर तो शनि देव ने कबूतर को अपना वाहन बनाया।  जब पक्षियों को देवताओं ने इतना चाहा है , तो हम मनुष्य पीछे क्यों रहे ? आज मैं आपको ओरछा अभ्यारण्य में पाए जाने वाले रंग-बिरंगे पक्षियों से मिलवाता हूँ। 
                                                   ओरछा वैसे तो रामराजा मंदिर के साथ ही अपनी ऐतिहासिक विरासत के लिए देश-विदेश में ज्यादा प्रसिद्द है।  लेकिन  ओरछा वन्यजीव अभ्यारण्य में पक्षी प्रेमियों के लिए भी यह कम महत्वपूर्ण स्थल नहीं है।  यहां देशी पक्षियों के अतिरिक्त प्रवासी पक्षी भी देखने मिल जाते है।  तो चलिए आज आपको ओरछा के पक्षी परिवार से मिलवाते है।
गिद्ध की परवाज़ 

ओरछा अभ्यारण्य 
ओरछा अभ्यारण मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ जिले में उत्तर प्रदेश की सीमा से लगा हुआ है । यह अभ्यारण बेतवा और जामनी नदी के बीच में स्थित टापू पर बसा हुआ है । दोनों नदियों के बीच में होने के कारण पूरा अभ्यारण्य वेटलैंड है , इस कारण  यहां पक्षियों के लिए आदर्श वातावरण है।  यह लगभग 45  वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में स्थापित है । इसकी स्थापना 1994 में की गई थी । ओरछा अभ्यारण्य में सियार ,लकड़बग्घा ,भेड़िया ,नीलगाय ,सांभर ,चीतल ,बंदर ,लंगूर ,जंगली सूअर आदि वन्य जीव है । परंतु ओरछा अभ्यारण मुख्यतः पक्षियों के लिए प्रसिद्ध है । यहां देश विदेश से पक्षी प्रेमी सर्दियों में पक्षियों को देखने और उनकी फोटोग्राफी करने के लिए आते हैं ।

छतरियों पर आराम करते गिद्ध 
अभ्यारण्य में पायें जाने वाले पक्षी
ओरछा में लगभग 200 प्रजाति के पक्षी पाये जाते हैं, जिनमे प्रमुख हैं । कार्मोरेंट, डार्टर , ग्रे हेरॉन, पोंड हेरॉन , एरगेट , ब्रह्मिनी डक , बार-हेडेड गूज , ब्लैक विंग्ड काइट , शिकरा ,ईगल , वाइट ब्रेस्टेड वाटरमेन , जकाना ,कॉमन ग्रे हॉर्नबिल,  कॉपर स्मिथ बारबेट, कॉमन स्वालो रेड रेमपेड, गोल्डन ओरियल, ग्रे वैगटेल, दूधराज, मोर ,बुलबुल ,नीलकंठ, किंगफिशर, जल मुर्गी ,बगुला ,गौरैया, बयां ,रॉबिन ,बबलर ,कठफोड़वा, मैना ,पहाड़ी मैना, हुदहुद, हॉक कुक्कू, कोयल, पपीहा, तोता, सनबर्ड ,उल्लू, चील ,बाज़ आदि पक्षी प्रमुख रूप से पाए जाते हैं ।
कॉमन स्टोन चैट 

ओरछा में गिद्ध
 ओरछा प्रमुख रुप से गिद्धों के लिए प्रसिद्ध है । ओरछा की ऐतिहासिक इमारतों के शिखर गिद्धों क रहने के लिए उपयुक्त जगह है।  इसलिए ओरछा में छतरिया , जहांगीर महल के गुम्बद और चतुर्भुज मंदिर का शिखर गिद्धों के प्रिय आवास स्थल है।   एक तरफ जहां पूरी दुनिया में गिद्ध  खत्म हो रहे हैं ,वही ओरछा में चार प्रजाति के गिद्ध पाए जाते हैं ।
लॉन्ग बिल्ड वल्चर का जोड़ा 

1 लांग बिल्ड वल्चर (gyps indicus )
भारत में सबसे ज्यादा पाए जाने वाले गिद्धों में लौंग बिल्ड वल्चर है।  यह ओरछा में स्थित ऐतिहासिक इमारतों और पहाड़ों की कंदराओं में पाए जाते हैं । यह ज्यादा तर लंबी उड़ान भरते हैं और जमीन पर धीरे-धीरे बतख की तरह चलते हैं और झुक कर बैठते हैं । इनके पैरों की ऊपरी भाग पर सफेद व नर्म पंख होते हैं । नंगी एवं पंख रहित गर्दन के निचले हिस्से पर नरम हल्के भूरे श्वेत पंखों की कॉलर सी होती है। नर और मादा एक समान होते हैं ।
गोबर गिद्ध या कॉल गिद्ध 
2 गोबर गिध्द या कोल गिद्ध ( Neophron percnopterus /Egyptian culture)
यह गिद्ध अपने घोंसले चट्टानों पेड़ों और पुराने भवनों पर बनाता है । यह डील से आकार में मिलता जुलता है इसके पंख सफेद होते हैं जो किनारों पर काले होते हैं । चेहरा छोटा रोंएदार और पीले रंग का होता है सोच बदली पीलिया ग्रे रंग की होती है । बच्चे काले रंग के होते हैं ।
3 चमड़ गिद्ध/भारतीय सफेद गिद्ध (Oriental white backed Vulture)
रात्रि निवास ऊंचे वृक्षों और ऊंची ऐतिहासिक इमारतों में करने वाला इस गिद्ध का सर्वप्रमुख भी हुआ गला पतला होता है पीठ पर एक सफेद चिन्ह रहता है, जो उड़ते समय दिखाई देता है यही इसकी मुख्य पहचान है ।
4 राज गिद्ध/किंग वल्चर (Red headed Vulture )
इसका सिर टांग गर्दन और सीना लाल रंग के होते हैं । लाल और काली पंखों के बीच सफेद पंखों की पट्टी होती है, शेष शरीर काला होता है । यह दूसरे गिद्धों की तुलना में डरपोक होता है यह मृत जानवर भी बाकी गिद्धों के जाने के बाद खाते हैं और मनुष्यों को देखकर उड़ जाते हैं ।
वाइट ब्रेस्टेड किंगफ़िशर 

ओरछा में बर्ड वॉचिंग के लिए व्यवस्था -
ओरछा अभ्यारण्य के प्रभारी रेंजर आशुतोष अग्निहोत्री ने बताया कि अभ्यारण में वर्ड वाचिंग के लिए अलग से जंतुर टावर बनाया गया है, जिसके ऊपर खड़े होकर अभ्यारण में मिलने वाले विभिन्न पक्षियों को ना केवल देखा जा सकता है बल्कि उनकी फोटोग्राफी भी की जा सकती है । यहां पर कई पक्षी प्रेमी दूरबीन की सहायता से घंटो पक्षियों को निहारते हैं । पक्षियों को देखने के लिए ओरछा अभ्यारण कार्यालय से दूरबीन की भी व्यवस्था की जाती है । ओरछा में गिद्धों के संरक्षण के लिए जटायु संरक्षण केंद्र भी स्थापित किया है , जो गिद्ध संरक्षण के लिए समय -समय पर जान जागरूकता फैलाता है।  भविष्य में गिद्धों के लिए ' वल्चर रेस्टोरेंट ' बनाया जाना प्रस्तावित है , जिसमे एक नियत स्थान पर आसपास के गाँवो में मरे पशुओं को लेकर गिद्धों के लिए रखा जायेगा। यदि कोई भी पर्यटक या पक्षी प्रेमी अभ्यारण्य केंद्र से संपर्क करता है , तो अभ्यारण्य की ओर से एक वनरक्षक कम गाइड भी उपलब्ध कराया जा सकता है।  पक्षियों को देखने का सबसे बढ़िया समय सूर्योदय के थोड़े पहले और सूर्यास्त के समय का है।   
स्थानीय पक्षी प्रेमी रामा मुकेश केवट ने बताया की ओरछा अभ्यारण जो कि दोनों ओर से बेतवा और जामिनी नदियों से घिरे होने के कारण पक्षियों को देखने के लिए एक आदर्श स्थान हैं । ओरछा अभ्यारण्य के अलावा ओरछा में पक्षी पुराने स्मारकों और महलों के शिखरों पर भी देखने मिलते है।  रामा मुकेश स्वयं अभी तक ओरछा में लगभग 135 पक्षियों की पहचान कर चुके हैं और उनके संग्रह में उनकी फोटोग्राफ्स भी हैं ।
बयाँ अपने सुन्दर घोंसले के साथ 
ब्लू रॉक पिजन 

कॉमन मैना 

रोज रिंग्ड पैराकीट 
एशियाई पाइड स्टर्लिंग 

लार्ज एर्गेट 
ओरिएण्टल मैगपिगी रोबिन 
ओरछा पहुंचने के लिए नजदीकी बड़ा शहर झांसी है, जो संपूर्ण देश में सड़क और रेल मार्गों से जुड़ा हुआ है ओरछा से झांसी की दूरी मात्र 18 किलोमीटर है । इसके अलावा ओरछा में रामराजा मंदिर कई ऐतिहासिक इमारतें बेतवा नदी में रिवर राफ्टिंग कयाकिंग नौकायन आदि कि सुविधाएं भी देशी विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करती हैं ।

- मुकेश पाण्डेय
आबकारी कार्यालय ,GT -2  राजघाट कॉलोनी ,
ओरछा , जिला -टीकमगढ़ (मध्य प्रदेश )
मोबाइल नंबर  9039438781
ईमेल - mp 5951 @gmail.com 

शनिवार, 7 अक्टूबर 2017

वीर सिंह ने दोस्ती निभाने के लिए किया अबुल फज़ल का क़त्ल (ओरछा गाथा -5 )

माँ बेतवा से साक्षात्कार 
नमस्कार मित्रों ,
अभी तक आपने मेरे द्वारा लिखी गयी ओरछा गाथा के सभी भाग उम्मीद  से अधिक न केवल पसंद किये बल्कि इतना प्रोत्साहित किया कि मैं इस गाथा को इस मुकाम तक ला पाया।  मेरी यह ओरछा गाथा मेरे ब्लॉग की सबसे लोकप्रिय पोस्ट साबित हुई।  रामराजा सरकार और माँ  बेतवा की असीम कृपा सदैव साथ रही।  अभी तक के भागों में आपने माँ बेतवा की जुबानी से बुन्देलाओं का जन्म , बुंदेलखंड की स्थापना , प्रथम राजधानी गढ़कुंडार से लेकर द्वितीय राजधानी ओरछा की स्थापना , ओरछा में अयोध्या से रामराजा का आगमन , रायप्रवीण को अकबर को झुकाना आदि कहानी सुनी अब उससे आगे...... 

बहुत दिनों के बाद आज फुरसत में माँ बेतवा से मिलने का मौका मिला।  कुछ विभागीय व्यस्तता रही तो कुछ अपना आलसी स्वाभाव  भी रहा।  खैर माँ से बेटा कब तक दूर रहता।  माँ की पुकार पर आखिरकार समय निकाल ही लिया।  चांदनी रात में चंदा  मामा ऊपर आसमान में मुस्कुराते से अपनी चंद्र किरणों को माँ बेतवा के लहराते आँचल पर बिखेर रहे थे।  इधर जमीन पर हम ग्रेनाइट की चट्टानों बैठे हुए माँ से संवाद की प्रतीक्षा में लहराती -बल खाती चट्टानों से टकराती बाल-सुलभ चंचलता वाली लहरों के सौन्दर्य में खोये थे।  अभी तक माँ बेतवा ने मुझे ओरछा के उत्थान से लेकर रामराजा के अयोध्या से ओरछा आने की कथा , रायप्रवीण की सौंदर्य और प्रवीणता की कहानी सुनाई थी।  मैं अपने भाग्य पर इठला रहा था  कि मध्य प्रदेश की गंगा कही जाने वाली पूण्य सलिला माँ वेत्रवती (बेतवा ) ने मुझे ओरछा-गाथा सुनाने के लिए चुना।  और इसी ओरछा गाथा की वजह से देश के लगभग 14 राज्यों के घुमक्कडों का महामिलन भी बेतवा तट पर करने और मेजबान बनने का सुअवसर मिला। इस ओरछा गाथा ने न केवल ओरछा को सोशल मीडिया पर चर्चित किया  बल्कि मुझ जैसे यदा-कदा  ब्लॉगर को स्तरीय ब्लॉगर बनने की प्रेरणा मिली।  इसी ओरछा गाथा की वजह से बड़े घुमक्कड़ और ब्लॉगर जगत में मुझ नाचीज ओ एक पहचान मिली।  कुछ मित्रों का कहना है, कि मेरी वजह से ओरछा का नाम हुआ , मगर असलियत में ओरछा गाथा से मुझे पहचान मिली।  चाँदनी रात में ठंडी-ठंडी हवाओं में मैं इन्ही विचारों में खोया हुआ था , मेरे बांये और से एक लहर उठी और मेरे सर के ऊपर से इस तरह से निकल गयी जैसे कोई माँ अपने बच्चे के सर के ऊपर दुलार से हाथ फेर रही हो।  इस जाने-पहचाने अहसास से मेरे ह्रदय के अंतिम छोर तक प्रफुल्लता समा गयी। माँ बेतवा अपनी ममतामयी आवाज़ में बोली - पुत्र ! तुम्हारा बहुत दिनों बाद आगमन हुआ , फिर भी स्वागत है ! और कैसे हो वत्स ?
माँ की आवाज़ से ही कानों में मिसरी सी घुल गयी थी।  मैंने माँ बेतवा के जल को स्पर्श कर आशीर्वाद लिया  और अपना कुशल मंगल सुनाया।  और अधूरी पड़ी ओरछा गाथा को आगे बढ़ाने का निवेदन किया।
माँ बेतवा - पुत्र ! पिछली बार हमने रायप्रवीण की प्रवीणता के आगे मुग़ल बादशाह अकबर को झुकते देखा था।  अब कहानी मुग़ल काल में आगे बढ़ेगी।  जैसा कि पिछली बार देखा था, भले ही अकबर ने अपने साम्राज्य का विस्तार नर्मदा के आगे दक्कन तक कर लिया था , मगर बुंदेलखंड अभी भी बुन्देलाओं की जागीर था।  महाराज मधुकर शाह के सुपुत्र वीरसिंह बुंदेला वर्तमान दतिया (म प्र)  के  पास बड़ौनी जागीर के जागीरदार थे।  आगरा  में मुगले  आज़म जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर को गद्दी  पर बैठे हुए काफी वक़्त हो चुका था , उसके बेटों में गद्दी के लिए बेकरारी बढ़ने लगी।  सबसे बड़े बेटे सलीम ने तो अपने वालिद बादशाह अकबर के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक  दिया।  अकबर  इलाहाबाद के किले में छिपे अपने अपने बेटे सलीम को सबक सिखाने के लिए अपने सेनापति और मशहूर साहित्यकार (आईने अकबरी और अकबरनामा का का लेखक ) और अकबर के नवरत्नों  में से एक अबुल फज़ल के नेतृत्व में बड़ी सेना भेजी।  ये खबर वीरसिंह बुंदेला को  पता  चल  गयी।  और वीर सिंह बुंदेला ने अपने मंत्री और सलाहकार चंपतराय से सलाह ली और इसे एक बेहतरीन मौका मानते हुए ग्वालियर के पास आतरी गांव में अबुल फजल की हत्या कर दी और उसका सिर इलाहाबाद के किले में शहजादे सलीम के सामने अपनी दोस्ती के तोहफे के रुप में किया । शहजादा सलीम वीर सिंह जूदेव के इस कारनामे से बहुत ही खुश हुए और उन्होंने बीर सिंह को अपना दोस्त बनाया । इस तरह बुंदेलों और मुगलों के बीच दोस्ती का एक नया रिश्ता कायम हुआ ।
                                                    आगे चलकर अकबर की मृत्यु के बाद जब शहजादा सलीम  हिंदुस्तान की गद्दी पर मुगल बादशाह के रूप में जहांगीर नाम से बैठे, तो उन्होंने इस दोस्ती को और मजबूत किया और वीर से को ओरछा का राजा घोषित किया । एक बार  जहांगीर  अपने दक्षिण अभियान  से  लौटते समय  वीर सिंह जूदेव  के  अनुरोध पर ओरछा में एक  विशेष महल में ठहरे । इस महल का निर्माण बुंदेला स्थापत्य और मुगल स्थापत्य के सुंदर संयोजन के साथ किया गया पूरे देश में इस तरह के हिंदू और मुस्लिम मिश्रित स्थापत्य के कॉल 127 इमारते हैं, जिनमें वीर सिंह बुंदेला द्वारा बनवाया गया यह जहांगीर महल अपना एक विशिष्ट स्थान रखता है । जहांगीर महल जहां पत्थर पर की गई अद्भुत नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है, वही इसकी पत्थर की सुंदर जालियां भी देशी और विदेशी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं । वीर सिंह जूदेव ने जहांगीर महल की दूसरी तरफ ठीक ओरछा के दूसरे छोर पर एक पहाड़ी के ऊपर लक्ष्मी नारायण मंदिर का निर्माण कराया जिसका स्थापत्य अपने आप में अनूठा है. इस मंदिर को लक्ष्मी के वाहन उल्लू की आकृति में पंख फैलाए हुए बनाया गया ,इसके मुख्य द्वार के ऊपर चोंच द्वारा यह स्पष्ट परिलक्षित होता है । सामने से देखने पर यह मंदिर त्रिभुजाकार नजर आता है परंतु वास्तव में यह चतुर्भुज आकार में है और प्रत्येक भुजा की शिखर पर सहस्त्रदल अंकन है । वर्तमान में यह मंदिर अपनी चित्रकारी के लिए प्रसिद्ध है । वीर सिंह जूदेव के परवर्ती शासकों ने इस मंदिर की दीवारों पर अद्भुत चित्रकारी करवाई जिनमें रामायण,महाभारत के अलावा लोकजीवन, सैन्य जीवन और युद्धों का बड़ा ही मनोहारी चित्रांकन है ।
            वीर सिंह जूदेव बुंदेला साम्राज्य के सभी शासकों में ना केवल सबसे ज्यादा प्रसिद्ध थे , बल्कि योग्य शासक भी थे । वीर सिंह जूदेव ने ओरछा के साथ साथ आसपास के इलाकों में कई महल और किले बनवाएं । वीर सिंह जू देव के समय में बुंदेला स्थापत्य मुस्लिम स्थापत्य के सुंदर संयोजन के साथ और निखरकर सामने आया । बीर सिंह ने ओरछा का किला, झांसी का किला, दतिया का किला दतिया में वीर सिंह महल, धामोनी का किला और आसपास की कई सुंदर इमारतें बनवाई ।
मां बेतवा के मुंह से मैं बड़े ही इत्मीनान से ओरछा के राजा वीर सिंह जूदेव के बारे में सुन रहा था , पर झांसी के किले का नाम सुनकर मेरे कान खड़े हुए और अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए मैंने मां बेतवा से प्रश्न पूछा कि मैं झांसी का किला तो झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के लिए प्रसिद्ध है तो मेरे ख्याल से तो इसे मराठों ने बनवाया होगा ?
मां वेत्रवती मेरी अज्ञानता पर हल्की सी मुस्कुराई जिसका बताओ मुझे लहरों में हुई हलचल से पता चला ।
 मां बोली- पुत्र मराठे बाद में आये । झांसी शहर की स्थापना भी बुंदेलों द्वारा कराई गई और झांसी का किला भी  वीर सिंह जूदेव द्वारा बनवाया गया । अभी कुछ समय पहले एक फिल्म आई थी बाजीराव मस्तानी शायद तुमने भी देखी होगी ।
मां वेत्रवती के मुंह से फिल्म का नाम सुनकर मुझे थोड़ी सी हैरानी हुई परंतु अभी मेरा ध्यान अपनी जिज्ञासा को शांत करने में था, इसलिए मैंने सिर्फ हामी मैं सिर हिलाया। मां आगे बोली इस फिल्म में दिखाया गया कि वीर छत्रसाल जब बुजुर्ग हो गए और उन पर मुगलों ने आक्रमण किया तब उन्होंने बाजीराव पेशवा की सहायता ली और विजय उपरांत उन्हें  बुंदेलखंड का कुछ  क्षेत्र भी 1728 में मराठों को दिया तबसे मराठे  बुंदेलखंड में अंग्रेजों के आने तक राज करते रहे ।
मां के उत्तर से मैं संतुष्ट तो हो गया परंतु बुंदेलों और मराठाओं को छोड़कर मेरे मन में बाजीराव मस्तानी फिल्म की बात घुमने लगी कि आखिर मां वेत्रवती को इस फिल्म की जानकारी कैसे है ?
जब रहा न गया तो मैंने मां बेतवा से आखिरकार पूछी लिया कि माते आपको फिल्मों के बारे में जानकारी कैसे ?
मेरे इस प्रश्न पर मां बेतवा ने अट्टहास किया जिसकी गर्जना मुझे लहरों के साथ सुनाई दी । मां बोली पुत्र तुम मुझसे सदियों पुरानी कहानी सुन रहे हो ,जब मैं इतिहास से परिचित हूं तो क्या वर्तमान से अनभिज्ञ होउंगी ? ना तो मैं फिल्म देखने जाती हूं और ना ही किसी से कुछ पूछने जाती  हूं , मेरे किनारे जो मुसाफिर आते हैं ,  सदियों से उनके ही द्वारा मुझे इतिहास वर्तमान और भविष्य का ज्ञान होता रहता है । हां तुम जैसा जिज्ञासु बहुत कम आता है कि जो मुझसे प्रश्न पूछता है ! वरना मैं तो बस लोगों की सुनती रहती हूं और बहती रहती हूं । चलो तो फिर हम इतिहास के अनंत सागर में फिर से गोता लगाते हैं । वीर सिंह जूदेव बुंदेला साम्राज्य का ना केवल विस्तार कर रहे थे, बल्कि बुंदेला साम्राज्य का समग्र विकास भी कर रहे थे । उनके राज्य में प्रजा भी बहुत सुखी और संपन्न । वीर सिंह जूदेव के बारे में इतना सुनकर मुझे भी बड़ा अच्छा लगा  । चलिए जिन्हें इतिहासकारों द्वारा भुला दिया गया ऐसे प्रजावत्सल शासकों के बारे में तो पता चला । मैंने मां बेतवा से राजा वीर सिंह जूदेव की प्रजावत्सलता की कोई घटना सुनाने का आग्रह किया ।
मेरा आग्रह सुनकर मां बेतवा फिर से अतीत की गहराइयों में गोता लगाने चली गई और काफी देर तक लहरों में कोई हलचल नहीं हुई,आकाश में टिमटिमाते तारे स्थिर जल में इस तरह प्रतीत हो रहे थे , कि मानो आज सारी आकाशगंगा के तारे बेतवा स्नान करने बेतवा के जल में एक साथ उतर आए हो !
अचानक मां बेतवा का स्थिर जल  हिलोरे लेने लगा और एक लहर मेरे समीप से इस तरह से गुजरी जैसे मां ने अपने बच्चों के गालों को वात्सल्य भाव से सहलाया हो ।
मां बेतवा बोली पुत्र राजा वीर सिंह जूदेव का एक पुत्र बाघबहादुर  एक दिन जंगल में शिकार खेलने गया और एक हिरण का पीछा करते करते वह काफी दूर निकल गया और हिरन उसकी आंखों से ओझल हो गया । तभी राजपुत्र ने देखा कि एक योगी इस घने जंगल में तपस्यारत हैं, तो उसने सोचा अवश्य ही इन्होंने मेरे शिकार को भागते हुए देखा होगा । अतः योगी के समीप पहुंचकर राजपुत्र बाघबहादुर  ने योगी से अपने शिकार के बारे में पूछा । परंतु योगी मौन व्रत किए हुए थे, इसलिए उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया । दिन भर से भूखे-प्यासे शिकार के पीछे भागते हुए राजपुत्र बाघबहादुर  बुरी तरह से थक चुका था अतः योगी द्वारा कोई उत्तर ना दिए जाने पर वह क्रोधित हो गया और उसने अपने शिकारी कुत्तों को योगी पर छोड़ देने का आदेश दिया । आदेश का पालन होते ही शिकारी कुत्ते तपस्यारत योगी पर झपट पड़े और कुछ ही देर में योगी का निधन हो गया । जब यह बात वीर सिंह जूदेव तक पहुंची तो उन्होंने दूसरे दिन भरे राजदरबार में सबके सामने अपने पुत्र बाघबहादुर के इस अक्षम्य अपराध की सजा सुनाते हुए कहा कि इस दुष्ट ने जिस तरह इन भूखे कुत्तों को उन आदरणीय योगी के ऊपर छोड़ा उसी तरह  बाघबहादुर जीरों में बांधकर इन भूखे शिकारी कुत्तों के सामने डाल दिया जाए । तो पुत्र आज जहां वर्तमान शासक पुत्र मोह में देश की दुर्गति कर रहे हैं, वही वीर सिंह जूदेव न्याय का एक अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करते हुए अपने स्वयं के पुत्र को मृत्युदंड दिया ।
इतना कहकर माँ बेतवा शांत हो गयी ,उनकी लहरें अब पहले की तरह मचल नहीं रही थी ! लेकिन अभी तक अपने अनुभव से मैं इतना तो समझ ही गया था , कि ये शांति सिर्फ ऊपर ही ऊपर की है।  अंदर घनघोर मंथन चल रहा होगा , या माँ अपनी यादों के भंवर से कोई अद्भुत रहस्य निकालने गयी होंगी।  जब तक पुनः अपने साथ फिर किसी कहानी को लेकर नहीं आती , आप भी मेरी तरह प्रतीक्षा कीजिये न जाने क्या  मिल जाये ....... 
पावन माँ वेत्रवती गंगा (बेतवा)
बेतवा की एक शाम 
वीरसिंह जूदेव और जहांगीर की दोस्ती की मिसाल जहांगीर महल 
बेतवा तट पर बनी वीरसिंह जूदेव की छतरी (समाधि )
जहांगीर महल का भव्य द्वार 

रविवार, 22 जनवरी 2017

ओरछा महामिलन :साउंड एंड लाइट शो , परिचय ,तुंगारण्य में वृक्षारोपण


अभी तक आपने ओरछा महामिलन का पहले दिन का विवरण पढ़ा।  सभी लोग तय कार्यक्रम के अनुसार निश्चित समय पर रामराजा मंदिर पहुँच चुके थे।  आरती शुरू हो चुकी थी, मगर मैं अभी तक घर पर था। जब अनिमेष गोद  से उतरने  का नाम ही नही ले रहा था , तो उसे साथ ही लेकर कार से मंदिर पहुंचा ...


ओरछा का साउंड और लाइट शो 


अगर आप ओरछा के बारे में जानना चाहते है , तो इन लिंक्स पर क्लिक करके पढ़िए 

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अभी तक आपने ओरछा महामिलन का पहले दिन का विवरण पढ़ा।  सभी लोग तय कार्यक्रम के अनुसार निश्चित समय पर रामराजा मंदिर पहुँच चुके थे।  आरती शुरू हो चुकी थी, मगर मैं अभी तक घर पर था। जब अनिमेष गोद  से उतरने  का नाम ही नही ले रहा था , तो उसे साथ ही लेकर कार से मंदिर पहुंचा , तो देखा ग्रुप के अधिकांश पुरुष सदस्य रामराजा के दर्शन कर चुके है।  हाँ महिलाये जरूर लाइन में लगकर दर्शन की प्रतीक्षा में थी।  पुरुष दूर से ही दर्शन बिना लाइन में लगे कर चुके थे।  ओरछा के रामराजा मंदिर में यह अच्छी व्यवस्था है, कि अगर आप लाइन में नही लगना चाहते है , तो दूर से मंदिर के आंगन से भी बड़े आराम से दर्शन कर सकते है।  दूसरी तरफ वी आइ पी दर्शन की व्यवस्था भी है , इसके लिए मंदिर के पदेन प्रवन्धक यानि टीकमगढ़ कलेक्टर  / निवाड़ी  एस  डी एम /ओरछा के तहसीलदार से अनुमति  लेकर दर्शन किये जा सकते है।  वैसे स्थानीय प्रशासन में जान-पहचान भी काम आ जाती है।  मैं भी सबको वी आई पी दर्शन की फ़िराक में था।  पर रामराजा को शायद ये मंजूर न था।  अब मंदिर के बाहर सब महिलाओं का इंतजार कर रहे थे , तो कुछ सदस्य  मंदिर के बाहर अपने कैमरे का सदुपयोग कर रहे थे।  ( मंदिर के अंदर फोटोग्राफी / वीडियोग्राफी प्रतिबंधित है। )  अनिमेष को देखकर डॉ प्रदीप त्यागी जी पास आये , और उसे गोद में उठाकर खिलाने  लगे।  
                                                    अब साउंड एंड लाइट शो का समय होने वाला था।  अगर आपको ओरछा घूमने का सही आनंद लेना है , तो पहले साउंड एंड लाइट शो को देखिये , जिससे ओरछा और इसके इतिहास , पुरातत्व और महत्व की जानकारी मिल जाएगी।  अब आप बिना गाइड के भी ओरछा में घूम सकते है।  क्योंकि ओरछा की महत्वपूर्ण इमारतों और इतिहास के बारे में मोटी -मोटी बातें  आपको पता ही चल जाएगी।  हाँ अब अगर आपको छोटी-छोटी बातें भी जननी है , तो आप आराम से गाइड कर सकते है।  सर्दियों में एक घंटे का हिंदी का शो 7 :45 शाम से शुरू होता है।  जब देर होती देखी  तो मैंने संजय कौशिक जी को कहा कि जितने लोग दर्शन कर चुके है , वो पहले चले बाकी लोग गाड़ियों से आ जायेंगे।  हम अधिकांश लोग पैदल ही रामराजा मंदिर से सीधे राजा महल के बहरी हिस्से दीवान -ए -आम से सटे मैदान में पहुँच गए।  सब लोग जो आ चुके थे , उन्हें अंदर बिठाया , तभी मध्य प्रदेश पर्यटन विकास निगम के होटल शीश महल और होटल बेतवा रिट्रीट के प्रबंधक और मेरे मित्र अमित कुमार मिल गए।  तो बाकी लोगों का इंतजार करते हुए उनसे गप्पे की।  फिर जब सचिन त्यागी जी बाकी बचे हुए सदस्यों को साथ लेकर आये।  सबके बैठने के बाद मैंने टिकट कटवाई।  ( भारतियों के लिए 100 रूपये और विदेशियों के लिए 250 रूपये )  . मध्य प्रदेश में अभी तक ग्वालियर , खजुराहो के अलावा सिर्फ ओरछा में ही साउंड एंड लाइट शो होता है।  जिन लोगों ये तीनो शो देखा है, उनके अनुसार इनमे ओरछा का शो सबसे अच्छा है।  क्योंकि इसमें कई कहानियां  है।  ओरछा के शो में बुन्देलाओं के उद्भव से लेकर उत्कर्ष तक की कहानियाँ  बड़े ही सुन्दर तरीके से बताई गयी है।  इन कहानियों में ओरछा की स्थापना  , रामराजा का अयोध्या से ओरछा  आना , वीरसिंह जूदेव की जहांगीर से दोस्ती, उनके यशस्वी कार्य, रायप्रवीण का सौंदर्य और ओरछा की नियति ,हरदौल के लोकदेवता बनने की कथा, बदरुनिशां (औरंगजेब की बेटी ) का चतुर्भुज मंदिर को बचाना , छत्रसाल और बाजीराव पेशवा की विजय आदि बड़े ही रोचक तरीके से बताया गया है।  ओरछा में ये साउंड एंड लाइट शो मध्य प्रदेश पर्यटन विकास निगम के हेरिटेज होटल शीशमहल के माध्यम से संचालित होता है।  ये राजमहल के दीवान-ए -आम के सामने बने खुले मैदान में होता है।  अब मैं अपने आभासी  माध्यम (ब्लॉग/फेसबुक ) से बने मित्रो यथा संदीप पंवार जाटदेवता जी , ललित शर्मा जी, मनु प्रकाश त्यागी जी , कमल कुमार सिंह आदि के साथ ये शानदार शो देख  चुका हूँ।   
                                               मैं चूँकि कई बार ये शो देख चुका था , इसलिए मैं नही गया।  मेरे साथ मेरे अनिमेष बाबु भी थे , इसलिए उन्हें लेकर घर छोड़ा। लौटकर अकेला किला परिसर पहुंचा।  ( ड्राइवर कैलाश को छोड़ दिया )  इतने में पंकज शर्मा जी का कॉल हुआ।  वो झाँसी से ओरछा पहुँच चुके थे।  उन्होंने मंदिर चौराहे पर खुद के खड़ा होने की बात बताई , तो मैंने उन्हें खड़े रहने की हिदायत दी।  जल्दबाजी में जैसे ही गाड़ी रिवर्स की तो पीछे खड़ी कार से मेरी कार टकराई।  तो उसके ड्राइवर से थोड़ी बहस करनी पड़ी , अब चूँकि गलती मेरी थी, तो सॉरी बोलकर निकल पड़ा , क्योंकि टक्कर जोरदार नही थी।  खैर मैं मंदिर चौराहे पहुंचा तो पंकज शर्मा जी सड़क किनारे किसी व्यक्ति के साथ खड़े थे।  मेरे पहुँचने पर उस व्यक्ति से मिलाया , जो मऊरानीपुर का रहने वाला था , और मुझे जानता था। लेकिन मैं उसे नही जानता था।  खैर पंकज जी को लेकर किला परिसर पहुंचा।  शो ख़त्म होने वाला ही था।  तब तक उनका हाल समाचार प्राप्त किया।  पंकज जी का ओरछा आना भी काम रोमांचक नही था।  यही हमारे महामिलन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी।  शो समाप्ति पर सभी जब बहार आये तो पंकज जी से सबका मिलना हुआ।  
                                                     फिर सब गाड़ियों से होटल वापिस हुए।  होटल लौटने पर खाना लग चुका था।  परंतु संस्थापक एडमिन मुकेश भालसे जी का आग्रह था , कि खाने से पहले सबका एक बार परस्पर परिचय हो जाये।  अतः उनका आग्रह मानकर परिचय प्रारम्भ हुआ।  पर भूखे पेट भजन न होय गुसाई।  और बच्चों को तो रहा ही नही जा रहा था।  अतः मैंने बाकी लोगों का परिचय भोजन पश्चात् करने का निवेदन किया , जिसे सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया।  अब भोजन करने के बाद पुनः परिचय शुरू हुआ।  परिचय शुरू होते ही सब फ्लैशबैक में चले गए।  सचमुच ये बड़ा भावुक क्षण था।  सब ग्रुप से जुड़ने और सदस्यों से अपने मिलने -जुलने की बात सुना रहे थे।  मुकेश भालसे जी ने ग्रुप की स्थापना की कहानी सुनाई , तो बुआ जी ने अपनी परिवार के बिना अनजान शहर में अनजान लोगों से मिलने के लिए बिना टिकट लिए ही ट्रेन से ओरछा आने की भावुक दास्ताँ सुनाई।  सब यादों के झरोखों में खो रहे थे।  ग्रुप के प्रति समर्पित प्रतीक गाँधी जी ने बताया कैसे उनकी यात्रा से उनके गांव इ दोस्त भी न केवल घुमक्कड़ बने , बल्कि घुमक्कड़ी दिल से ग्रुप के सदस्य भी बने।  मूलतः बंगाली संदीप मन्ना जी ( इन्हें बाइक यात्राएं ज्यादा पसंद है।  ) हिंदी में कमजोर होने के बाद भी अपनी कहानी हिंदी में सबसे साझा की।  ग्रुप के अन्य एडमिन संजय कौशिक जी , रितेश गुप्ता जी ने भी अपने अनुभव बांटे।  सूरज मिश्र , प्रकाश यादव जी, रूपेश शर्मा  जी , रामदयाल प्रजापति भाई , कविता भालसे  जी , हेमा सिंह जी , संजय सिंह जी , रमेश शर्मा जी , सचिन जांगड़ा जी , सचिन त्यागी जी , हरेन्द्र धर्रा भाई आदि ने भी अपनी रामकहानी बताई।  इस बीच प्रतीक जी की विशेष फरमाइश पर एक बार चाय का दौर चल चुका है।  रात गहराने लगी थी , सबके चेहरे पर थकान और नींद छा  रही थी। अतः अब सभा विसर्जन का निर्णय लिया गया।  और सुबह आठ बजे तैयार रहने को कहा गया।  ताकि ओरछा अभ्यारण्य में होने वाले दो विशेष और यादगार आयोजन में शामिल हुआ जा सके।
            25 दिसंबर 2017 को सुबह नहा धोकर जल्दी ही मैं तैयार होकर 8 बजे होटल ओरछा रेसीडेंसी पहुँचा तो देखा अभी बहुत से लोग तैयार नही हुए है।  मुम्बई वाली दर्शन कौर यानि  बुआ जी मेरी पत्नी और अनिमेष से मिलना चाहती थी।  तो मैं बुआ जी ,  श्रीमती नीलम कौशिक जी ( सोनीपत , हरियाणा से ) , श्रीमती  कविता भालसे ( इंदौर से ), श्रीमती रश्मि  गुप्ता जी (आगरा से ) और श्रीमती हेमा सिंह जी (रांची , झारखण्ड से ) को अपने परिवार से मिलाने अपनी कार में बिठाकर अपने शासकीय आवास सह कार्यालय लेकर गया।  चूँकि मैंने इसके बारे में अपने घर  पूर्व सूचना  दी थी , इसलिए जब मैं घर पर पहुँचा  तो मेरी धर्मपत्नी निभा पांडेय जी  नहा रही थी , और अनिमेष बाबु सो रहे थे।  तो मैंने ही अपने अतिथियों को पानी का पूछा।  बिना सूचना के अचानक घर  लोगो को लाने  पर पत्नी का सामना करना पड़े , इसलिए बुआ जी को बागडोर सौपकर मैं निकल लिया।  इधर होटल आया तो पता चला कि श्रीमती नयना यादव जी ( रायगढ़ ,छत्तीसगढ़ से ) तो रह ही गयी।  तो अपने ड्राइवर जगदीश को इन्हें घर तक पहुँचाने और सभी को वापिस लेकर आने की जिम्मेदारी देकर मैं आगे के कार्यक्रम की व्यवस्था में लग गया। हमारे अगले कार्यक्रम में बुआ जी , प्रतीक गाँधी जी और उनके दो मित्र अलोक जी और मनोज जी ट्रैन से वापिस लौटने वाले थे।  ग्रुप में सबका प्रेम देखकर विनोद गुप्ता जी खुद को जाने से रोक लिए और फैसला किये कि 25 दिसंबर का पूरा दिन महामिलन के नाम करेंगे।  गाजियाबाद से अपनी कार से सपरिवार आये सचिन त्यागी जी भी इस अविस्मरणीय महमिलन की यादें अपने साथ लेकर  लौट रहे थे।
                                         आज हम लोगो को तुंगारण्य में वृक्षारोपण करना था , ये मेरा ही विचार था , कि इतने राज्यों से एक साथ इतने लोग ओरछा आ रहे है , तो वो ओरछा से सिर्फ लेकर न जाये , बल्कि ओरछा को कुछ देकर भी जाये।  और किसी भी स्थान को पेड़ों से बढ़कर और क्या दिया जा सकता था ? इसके बारे में मैंने ओरछा अभ्यारण्य के प्रभारी अधिकारी रेंजर श्री आशुतोष अग्निहोत्री जी से पूर्व में ही चर्चा कर ली थी।  तुंगारण्य जगह चुनने के पीछे कारण   इतना ही था , कि वहां वन विभाग द्वारा इन वृक्षों की देखभाल होती रहेगी।  श्री अग्निहोत्री जी ने गुलमोहर , कनक-चंपा , कदंब जैसे वृक्ष लगाने को कहा था  अतः मैंने वरुआ सागर की नर्सरी से यही पौधे मंगाए थे।
 होटल में सभी सदस्य तैयार हो चुके थे , मेरे घर गयीं महिलाएं भी वापिस आ चुकी थी।  और नाश्ता तैयार हो चुका था , अतः सभी ने होटल में ही नाश्ता किया।  उसके बाद पूर्व की तरह सभी लोग निकल पड़े तुंगारण्य की ओर।  गाड़ी से जाने वाले लोग पहले पहुंचे , लेकिन बिना टिकट के होने के कारण उन्हें तुंगारण्य में प्रवेश नही मिला।  तो आदतानुसार बाहर सड़क पर ही फोटोग्राफी होने लगी।  अब घुमक्कड़ी दिल से का बैनर भी साथ था।  बाद में जब मैं पहुंचा तो तुंगारण्य में सब लोगों ने प्रवेश किया।  मेरी रेंजर श्री अग्निहोत्री जी से मोबाइल पर बात  हुई  तो वो भी दस मिनट में पहुचने की कह रहे थे।  उनके आने तक खाली समय का सदुपयोग हमारे धुरंधर फोटोग्राफर्स की प्रतिभा का भरपूर दोहन किया गया।  खैर रेंजर साहब के आने के बाद हमारा वृक्षारोपण का कार्यक्रम संपन्न हुआ।  मुम्बई वाले  विनोद गुप्ता  जी ने हमारे ग्रुप के एक सदस्य देवेंद्र कोठारी जी ( जयपुर से )  जो किसी कारणवश ओरछा नही आ पाए , उनसे किये वादे के अनुसार उनके नाम का भी एक पौधा लगाया।  ये ग्रुप के सभी सदस्यों का एक दूसरे के प्रति प्रेम और सम्मान ही तो है , जो न आये हुए सदस्य की भी बात पूरी की गयी, जबकि विनोद भाई कभी कोठारी जी से भी मिले भी नही है।  खैर हमारे महामिलन के स्मारक के रूप में ये वृक्ष तैयार होंगे।  मेरे ख्याल से इस तरह के जिन्दा स्मारक शायद ही किसी घुमक्कड़ समूह ने बनाया होगा।  अब मैं ओरछा रहूँ या न रहूँ , कोई भी सदस्य या उनसे जुड़े व्यक्ति कभी ओरछा आये तो उन्हें बताने के लिए हमारे ये जीवित स्मारक विशेष होंगे  पौधा रोपण के इस पावन कार्यक्रम में सभी यानि बूढ़े, बच्चे और जवान तन-मन और तन्मयता से लगे थे।
 अब वृक्षारोपण के पुनीत कार्य के बाद हम सभी ओरछा अभ्यारण्य में स्थित पचमढ़िया में अपने वनभोज कार्यक्रम के लिए चल पड़े।  हमारे कुक पहले ही पहुँच चुके थे।  गाड़ी में सबसे पहले बच्चों-महिलाओं और बुजुर्गों को तरजीह दी गयी।  मैं  अभ्यारण्य के प्रवेश की टिकट कटाने रुक गया था , तो देखा हमारे ग्रुप के नौजवान सदस्य मिसिर जी यानि सूरज मिश्र जी शौचालय की तरफ भाग रहे है।  बाद में उन्होंने बताया कि उनके खाने पर लोगों ने नजर लगा दी है।  खैर सब लोग इस महामिलन के सबसे यादगार भाग के हिस्सा बनने के लिए पचमढ़िया पहुँच गए थे।  वहां का नजारा देख कर सबका दिल बल्लियां उछालने लगा , बच्चों को तो मन मांगी मुराद पूरी हो गयी थी।  आखिर पचमढ़ियां में ऐसा क्या हुआ हम जानेंगे इस महामिलन की आखिरी मगर सबसे बेहतरीन किश्त में। .....तब तक के लिए राम -राम



साउंड एंड लाइट शो के लिए जाने वाला रास्ता 
साउंड और लाइट शो की एक झलक
दीवान-ए -आम में खास रौशनी

वृक्षारोपण करते हुए 
ग्रुप की महिलाएं भी किसी कार्य में कम नही थी।  

ओरछा अभ्यारण्य के रेंजर श्री आशुतोष अग्निहोत्री के साथ चर्चारत 

मिलेंगे फिर से .. .घुमक्कड़ी दिल से 


अब 25 दिसंबर का दिन हो  और सांता क्लास न आये !
घुमक्कड़ी दिल से 

बुधवार, 18 जनवरी 2017

कटरीना ट्री और सूर्यास्त : ओरछा महामिलन का प्रथम दिवस

ओरछा में बेतवा किनारे छतरियों के पीछे : सूर्यास्त 

इसके पहले के भाग पढ़ने के लिए क्लिक करें 
 राम राम मित्रों ,
                      जैसे कि आपने अभी तक पढ़ा , कि ओरछा भ्रमण के प्रथम सत्र के बाद सभी वापिस होटल खाना  खाने के लिए लौट आये। खाने में पूड़ी, मटर-पनीर की सब्जी , आलू-गोभी की सूखी सब्जी के साथ पुलाव, दाल , रायता और रसगुल्ला के साथ सलाद के साथ सभी हँसते - हँसाते  खाने का लुत्फ़ ले रहे थे।  माहौल ऐसा बना था , मानो किसी अपने की शादी में सब आये हो , और सब एक-दूसरे के रिश्तेदार या पुराने परिचित  हो।  लग ही नही रहा था, कि सब सोशल मीडिया की आभासी दुनिया में एक दूसरे से परिचित हुए और पहली बार मिल रहे है।  इस कथित आभासी दुनिया ने हम सब को न केवल यथार्थ के धरातल पर मिलाया बल्कि एक परिवार के रूप में जोड़ा था।  अपनी अपनी जिंदगी की आपाधापी से दूर एक दूसरे के साथ हंसी-ठिठोली के साथ बड़े -बड़े ठहाके भी लग रहे।  जी हाँ , ठहाके !  जो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में लगभग लापता से ही हो गए। ऐसे ठहाके हम अपने परिवार या दोस्तों के साथ ही लगा पाते , वो इस पल इन  घुमक्कडों के परिवार में लग रहे थे।  महिलाएं जो इस ग्रुप में शामिल नही थी , और अपने पतियों के साथ आई थी,  वो भी पुरानी सहेलियों की तरह गप्पे मार रही थी।  बच्चे भी अपने हमजोलियों के साथ मस्ती कर  रहे थे।  मुकेश भालसे जी को तो खाना इतना अच्छा लगा कि मुझसे चार बार तारीफ कर चुके।  
                                                                         अभी हम सब खाने में संलग्न थे , कि खबर मिली मुम्बई से दर्शन कौर धनोय जिन्हें सभी प्यार से बुआ जी पुकारते है , विनोद गुप्ता जी , जो इस महामिलन के प्रस्तावक थे, और प्रतीक गाँधी जी जिन्होंने कार्यक्रम में आने के लिए कई लोगों को प्रेरणा दी, अपने सेंधवा (जिला-खरगोन, मध्य प्रदेश) निवासी दो मित्र अलोक और मनोज के साथ झाँसी स्टेशन पहुँच गए है , मैंने उन्हें लिवाने गाड़ी और ड्राइवर भेज दी।   बुआ जी के ओरछा आने की कहानी कम रोमांचक नही है , जो आप उनके ब्लॉग  पर विस्तार से पढ़ सकते है।  बुआ जी , बिना टिकट मुम्बई से झाँसी तक हम सबके प्रेम से चली आयी।  विनोद गुप्ता जी , तो अपने घर में मेरी शादी में आने का बहाना  करके अपने घर से अनुमति लेकर आ पाए।  अब इसे आपस का प्रेम ही न कहे तो क्या कहे ? कि अनजान लोगों से मिलने 1200 किमी दूर से लोग हर मुश्किल को पार कर इकठ्ठा हुए।  हमारे खाना समाप्त करने के पूर्व ही मुम्बईकर लोगों का आगमन हुआ।  और बुआ को देखते ही  पूरे हॉल में सिर्फ बुआ-बुआ का शोर था।  जैसे कोई बड़ा सेलेब्रिटी आ गया हो।  लोग खाना छोड़ बुआ और अन्य लोगों से मिलने खड़े हो गए।  कोई गले मिल रहा , तो कोई पैर छू रहा था।  अद्भुत ही माहौल था।  उस माहौल को वर्णन करने के लिए मेरी स्थिति  फिर गूंगे के गुड़ जैसी हो गयी थी।  
                                                                           प्रेमपूर्ण माहौल में भोजन से निवृत होने के बाद अब आगे के कार्यक्रम हेतु फिर से सब तैयार।  चूँकि साढ़े चार बज चुके थे , और पांच बजे तक सभी ऐतिहासिक इमारतें बंद हो जाती है।  इसलिए अब कार्यक्रम में परिवर्तन करते हुए बेतवा नदी के दूसरे छोर पर वन विभाग के बनाये पिकनिक स्पॉट तुंगारण्य से बुंदेला शासकों की छतरियों के पीछे सूर्यास्त  दर्शन का कार्यक्रम बनाया गया।  अब गाड़ियां  सिर्फ दो थी , और लोग लगभग 35 से ज्यादा हो गये  थे । इसलिए पहले महिलाएं और बच्चों को गाड़ियों से तथा बाकि पुरुष सदस्यों को पैदल चलने का निर्णय लिया गया।  ( वैसे भी ओरछा बहुत बड़ी जगह नही है।  )
                                                                    ओरछा की गलियों - सड़को पर घुमक्कड़ी दिल से की टोपी लगा कर सब चल पड़े।  सब्जी मंडी होकर मुख्य मार्ग से बस स्टैंड होते हुए बेतवा पर बने राजशाही पुराने पुल से होकर सब तुंगारण्य पहुंचे।  इधर रास्ते में भी हमारे धुरंधर फोटोग्राफर अपनी हरकतों से बाज नही आये।  रास्ते में जो कुछ भी अलग सा दिखा सब उनके कैमरे में कैद हो गया।  मुम्बई वाले विनोद गुप्ता जी को रास्ते में मेरी बारात की बस भी मिल गयी फोटो खिंचवाने के लिए।  हम लोग तुंगारण्य पहुँच गए।  सुशांत सिंघल जी , जो न केवल एक बढ़िया सकारात्मक व्यक्ति है, बल्कि एक बेहतरीन फोटोग्राफर , लेखक और 58 साल के नौजवान है।  वो पुराने पुल से बेतवा, छतरियों और सूर्यास्त की  शानदार  छवियों को अपने कैद कर रहे थे।  वही हम लोग तुंगारण्य की  उस जगह पर पहुंचे , जहाँ से सूर्यास्त की सबसे बढ़िया झलक मिलती है।  इधर सूरज धीरे -धीरे छतरियों के पीछे बेतवा के जल में उतर रहा था , और हम लोगो पर महामिलन का नशा धीरे धीरे चढ़ रहा था।                    सब सूरज को कैद करने में लगे थे, वही जो लोग कैमरे से दूर थे, उनको कटरीना ट्री अपनी ओर खींच रहा था। कटरीना ट्री दरअसल  बेतवा किनारे एक अर्जुन (जिसे बुंदेलखंड में कोहा कहते है।  ) का पेड़ है , जिस पर नकली आम लटका कर कटरीना कैफ ने शीतल पेय  स्लाइस के विज्ञापन की शूटिंग हुई थी।  आपने भी टीवी पर स्लाइस का वो आमसूत्र वाला विज्ञापन देखा होगा।  इस पेड़ के बारे में व्हाट्स एप्प ग्रुप में पहले ही बता चुका था , इसलिए   कुछ पुरुष ( नाम नही बताऊंगा ) उस पेड़ को छूना चाहते थे , जिसे कटरीना कैफ ने छुआ था , उसके साथ फोटो भी खिचाना चाहते थे।  तो अब तुंगारण्य में तीन ग्रुप बन गए थे, एक जो बेतवा के पुल पर सूर्यास्त की फोटो खींच रहे थे , दूसरे ग्रुप में महिलाएं तुंगारण्य में पड़ी बेंच पर अपनी फोटो खिंचवा रही थी , तीसरे ग्रुप में कटरीना के दीवाने थे।  अब जब हमारे इनडोर वाले एडमिन मुकेश भालसे जी को ज्यादा देर तक आउटडोर देखकर कविता भालसे जी  तुरंत कटरीना वृक्ष के पास आयी , फिर क्या दूसरे एक तरह और ये सेलिब्रिटी जोड़ी महफ़िल लूट गयी।  बाकी लोग अब फोटोग्राफर बनकर फोटो खींचे के सिवा कर और क्या कर सकते थे।  बड़ी देर से ये मजमा देख रही पुरानी इंदौरी यानि ग्रुप की बुआ (जो मिनी मुम्बई से वाया कोटा असली मुम्बई पहुँच गयी है ) भी पहुँच गयी , तो असली मुम्बई के सामने मिनी मुम्बई कितनी देर टिकता ! और बुआ तो लाइट , कैमरा और एक्शन की मायानगरी की मायावी थी , बुआ की माया जो उनके आने से असरकारी थी, यहां भी काम कर गयी , और सारे फ़्लैश बुआ पर चमकने लगे।  इधर अपनी तरफ से मोहभंग होते देखकर सूर्यदेव ने भी डूबने में ही भलाई समझी।  हंसी-ठिठोली के साथ बढ़ते अँधेरे के साथ सब लोग बेतवा के पुराने पुल से वापिस बसेरे की ओर लौटने लगे।  
                                                                      पुल को पार करने पर कुछ लोगों को च्यास ( चाय की प्यास ) लग आयी , तो वही गुमटी पर चाय का आर्डर दिया गया , अब दुकान छोटी और टोली बड़ी तो वक़्त लगना जायज था।  खैर ज्यादा देर लगने पर कुछ लोग बिना चाय पीये ही चलने को तैयार हो गए , जो चाय पी चुके वो भी चल पड़े।  खैर साँझ ढल चुकी थी, बत्तियां जल चुकी थी , और ठण्ड भी जोर मारने लगी थी।  इसलिए मैंने होटल पहुंचकर सबको शाम पौने सात बजे तैयार होकर रामराजा मंदिर पहुँचने को कहा।  सात बजे से मंदिर के पट खुलते है, और शाम की आरती शुरू होती है। यहां दोनों समय की आरती में विशेष बात मध्य प्रदेश सशस्त्र बल के जवान द्वारा सशस्त्र सलामी दिया जाना है।  क्योंकि यहां राम भगवान ही राजा है , और उन्हें राजा के रूप में सलामी देने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।  इसे मध्य प्रदेश शासन ने भी बनाये रखा।  आरती के बाद ओरछा का एक और आकर्षण ध्वनि और प्रकाश कार्यक्रम  ( sound and light show ) देखने जाना था।  सबको तैयार होने का बोलकर मैं अपने घर कुछ गरम कपडे पहनने आ गया।  इधर खबर मिली हरिद्वार से आ रहे मशहूर फोटोग्राफर घुमक्कड़ और इन सबसे विशेष एक आकर्षक व्यक्तिव पंकज शर्मा जी  झाँसी  पहुँच चुके थे  . ( जो अपनी ट्रेन 12  घंटे लेट होने से लेट हो गए ) मैं जब घर दिन भर से गायब रहने के बाद पहुंचा तो पत्नी जी ने कुछ नही कहा।  मगर मेरा आठ महीने का बेटा  जिसने पूरा  दिन  बीत जाने के बाद ही मुझे देखा तो मेरी गोद में आया तो फिर उतरने का नाम ही नही ले रहा।  इधर मंदिर की आरती का समय हो रहा था , उधर पंकज जी झाँसी पहुँच गए और घर पर अनिमेष बाबु गोद से उतारना ही नही चाहते थे।  जानते है , अगले भाग में


परिचर्चा में लगे घुमक्कड़ 


इस महामिलन के प्रस्तावक मुम्बई वाले विनोद गुप्ता जी 




कुछ इस तरह से प्रेम बढ़ गया 
                                       
जहाँ मौका मिला हमारे फोटोग्राफर्स चुके नही 


घुमक्कड़ी, फोटोग्राफी और ब्लॉगिंग में एक बड़ा नाम - सुशांत सिंघल जी 
                                     
तुंगारण्य से दिखता बेतवा का मनोरम दृश्य 

बच्चो ने वोटिंग का मस्ती के साथ खूब मजा लिया 

तो एक महिला ग्रुप फोटो हो जाये 

इधर पुरुष कटरीना वृक्ष को गले लगाए हुए थे 

कटरीना वृक्ष सबका आकर्षण बन गया था। 
भालसे दंपत्ति - कटरीना वृक्ष के तले 

ये बुआ जी की जीत हुई और कटरीना हार गयी 
                                       
लो अब ये दिन आ गए ... 
बेतवा के पुल से दिखती छतरियां 


तुंगारण्य से बेतवा का एक पैनोरमा फोटो 
... 

गुरुवार, 12 जनवरी 2017

ओरछा महा मिलन : पहला दिन ( फूल बाग़ , चन्दन कटोरा , पालकी महल, हरदौल बैठक , रामराजा मंदिर , चतुर्भुज मंदिर )



राजा महल से दिखता भव्य चतुर्भुज मंदिर 

राम राम मित्रों ,
अभी तक के दो भागों में ओरछा महामिलन के सम्बन्ध में पूर्व तैयारी और अधिकांश सदस्यों के आगमन के बारे में पढ़ चुके है।  अब आगे पढ़िए ....
चाय -नाश्ता से निवृत होकर सभी ओरछा भ्रमण हेतु तैयार हो गए थे , इधर मैं भी अपने घर से तैयार होकर और सूरज मिश्र को साथ लेकर होटल पहुँच गया। झाँसी रेलवे स्टेशन पर हुई अनावश्यक देरी के कारण मेरे द्वारा सभी सदस्यों के लिए बनाये  ओरछा भ्रमण कार्यक्रम में भारी मन से कटौती करनी पड़ी।  खैर होटल से पैदल ही घुमक्कड़ों का काफिला  मेरे साथ निकल पड़ा।  सभी सदस्य घुमक्कड़ी दिल से के लोगो वाली टोपी पहने निकले।  होटल से हम लोग सब्जीमंडी होते हुए फूलबाग पहुंचे। 
                                          फूलबाग और इसमें बना महल बुंदेला राजाओं का ग्रीष्म ऋतू का आरामगाह था।  महल सिर्फ ऊपर ही नही जमीन के नीचे भी बना था।  महल के पीछे दो मीनारें बनी हुई है , जिसमे कई छेद बने हुए है।  यह मध्यकाल में गर्मी से बचने की वातानूकूलित व्यवस्था थी।  उन्नत स्थापत्य कला के ये नमूने आज उपेक्षित पड़े है। इन मीनारों के नीचे पानी को संगृहीत करने के लिए बड़े-बड़े हौद बने थे।  गर्मियों जब हवा मीनारों के छेदों से होकर नीछे हौद तक आती , तो पानी के प्रभाव से ठंडी होकर महल में प्रवेश करती थी।  इस तरह बुंदेला शासक गर्मी में भी सर्दी का अहसास करते थे। कभी कभी राजाओं को सनक भी चढ़ जाती थी , तो इन मीनारों के ऊपर वादको को बिठाया जाता , और वादकगण जब मीनारों के ऊपर से ढोल, नगाड़े बजाते तो नीचे महल में उनकी आवाज़ सावन-भादों के बादलों की गर्जना जैसी लगती थी।  इसलिए इन दोनों मीनारों का नामकरण सावन-भादों किया गया।  लेकिन आज के ओरछा में इन सावन - भादों की अलग ही कहानी प्रचलित है।  कहते है, कि सावन और भादों नाम से एक प्रेमी-प्रेमिका थे।  ज़माने ने उनके प्रेम को स्वीकार नही किया , अतः उन दोनों ने एक साथ अपने प्राण त्याग दिए।  जब लोगो को इस के बारे में पता चला तो उनकी याद में ये दो मीनारें बनवाई।  यहाँ तक कहा जाता है , ये सावन-भादों के महीने में ये दोनों मीनारें आपस में मिलती है।  अब मुझे भी ओरछा में पदस्थ हुए तीन साल हो गए , मुझे तो आजतक कभी ये मिलते हुए दिखाई-सुनाई नही दिए।  खैर इस कहानी की वजह से ये लोगों के आकर्षण का विषय जरूर है।   सावन-भादों के नीचे महल के भूतल को असामाजिक लोगो की वजह से  बंद कर दिया गया है।
                                              अब वर्तमान में लौटते है , हम लोग फूलबाग में सबसे पहले चन्दन कटोरा  से रु-ब-रु हुए।  ये पत्थर का बना हुआ , एक बड़ा सा नक्काशीदार कटोरा है , जिसका प्रयोग युद्ध में जाने वाले सैनिको को चन्दन घोलकर तिलक लगाने में होता था।  लेकिन इसका सबसे बड़ा आकर्षण पत्थर के बने होने के वावजूद धातु की तरह आवाज करना है।  लोगो ने धातू जैसी आवाज़ सुनने के लिए इसमें खूब पत्थर मारे , जिससे इसका एक तरफ का हिस्सा दरक गया , इसलिए अब इसे चारो तरफ से जाली से घेर दिया है।  पता नही कब हम लोगों को अपनी विरासतों को सहेजने की अकल आएगी ! ग्रुप के फोटोग्राफर्स सक्रीय हुए और चन्दन कटोरा को अपने कैमरे में  कैद किया।   
                                            अब हम लोग हरदौल बैठक में दाखिल हुए जो पालकी महल का एक हिस्सा है।  पालकी जैसी आकृति होने के कारण इसे पालकी महल कहा जाता है।  लोक देवता के रूप में प्रतिष्टित हरदौल के बारे में मैंने अपने घुमक्कड़ सदस्यों को  ज्यादा नही बताया , क्योंकि तब लाइट एंड साउंड शो में उत्सुकता नही रहती। लेकिन आप को संक्षेप में बता देना चाहूंगा।
              "महाराजा वीर सिंह के आठ पुत्र थे, जिनमें सबसे बड़े का नाम जुझार सिंह व सबसे छोटे हरदौल थे। जुझार को आगरा दरबार और हरदौल को ओरछा से राज्य संचालन का जिम्मा विरासत में मिला हुआ था। लोग जुझार सिंह को कान का कच्चा व हरदौल को ब्रह्मचारी एवं धार्मिक प्रवृत्ति का मानते हैं। , "सन 1688 में एक खंगार सेनापति पहाड़ सिंह, प्रतीत राय व महिला हीरादेवी के भड़कावे में आकर राजा जुझार सिंह ने अपनी पत्नी चंपावती से छोटे भाई हरदौल को ‘विष' पिला कर पतिव्रता होने की परीक्षा ली, विषपान से महज 23 साल की उम्र में हरदौल की मौत हो गई। हरदौल के शव को बस्ती से अलग बीहड़ में दफनाया गया। जुझार की बहन कुंजावती, जो दतिया के राजा रणजीत सिंह को ब्याही थी, अपनी बेटी के ब्याह में भाई जुझार से जब भात मांगने गई तो उसने यह कह कर दुत्कार दिया क्‍योंकि वह हरदौल से ज्यादा स्नेह करती थी, श्मशान में जाकर उसी से भात मांगे। बस, क्या था कुंजावती रोती-बिलखती हरदौल की समाधि (चबूतरा) पहुंची और मर्यादा की दुहाई देकर भात मांगा तो समाधि से आवज आई कि वह (हरदौल) भात लेकर आएगा। इस बुजुर्ग के अनुसार, "भांजी की शादी में राजा हरदौल की रूह भात लेकर गई, मगर भानेज दामाद (दूल्हे) की जिद पर मृतक राजा हरदौल को सदेह प्रकट होना पड़ा। बस, इस चमत्कार से उनकी समाधि में भव्य मन्दिर का निर्माण कराया गया और लोग राजा हरदौल को ‘देव' रूप में पूजने लगे।" कुंजावती की बेटी की शादी में हुए चमत्कार के बाद आस-पास के हर गांव में ग्रामीणों ने प्रतीक के तौर पर एक-एक ‘हरदौल चबूतरा' का निर्माण कराया, जो कई गांवों में अब भी मौजूद हैं। शादी-विवाह हो या यज्ञ-अनुश्ठानों का भंड़ारा, लोग सबसे पहले चबूतरों में जाकर राजा हरदौल को आमंत्रित करते हैं, उन्हें निमंत्रण देने से भंड़ारे में कोई कमी नहीं आती।"
                                                   लाला हरदौल  को मैंने भी अपनी शादी में निमंत्रण पत्र दिया था , और उनकी कृपा से भंडारे में कोई कमी नही हुई थी।  वैसे आपको बताता चलूँ मैं ही नही मेरे विभाग में मुझसे पहले भी ओरछा में पदस्थ लोगों की शादी ओरछा में आने के बाद ही हुई।  खैर हम लोग पालकी महल से होते हुए , फूलबाग बाजार में से रामराजा मंदिर की ओर बढे  जहाँ सभी ने सावन-भादों  मीनारों के साथ फोटो खिंचवाई , ग्रुप फोटो भी खींचा गया।  अब रामराजा मंदिर प्रांगण में सब पहुँच चुके थे।  लेकिन मंदिर बंद हो चूका था।  क्योंकि ओरछा में भगवान राम भगवान नही बल्कि राजा बनकर अयोध्या से आये थे।  इसकी पूरी कहानी आप मेरी ओरछा-गाथा  पर क्लिक करके पढ़ सकते है। अतः यहाँ रामराजा के मंदिर में खुलने -बंद होने की अलग ही समय-सारिणी है।  सुबह 9 बजे मंदिर के पट खुलते है।  और साढ़े 12 बजे बंद होकर कुछ देर के लिए  1  बजे राजभोग लगाने के लिए खुलते है।  सबने मंदिर के बाहर से ही ग्रुप फोटो खिंचवाई।  दर्शन शाम को नियत किये गए।  और काफिला बढ़ चूका पास ही बने भव्य चतुर्भुज मंदिर की ओर..... अब ये मंदिर क्यों नही रामराजा मंदिर बन सका , इसकी भी कहानी आप ओरछा-गाथा में पढ़ सकते है।  चारमंजिला मंदिर के पीछे के द्वार से सबने प्रवेश किया।  सबसे पहले सबने चतुर्भुज मंदिर में भगवान कृष्ण (चतुर्भुज ) के दर्शन किये और इसकी भव्यता से मोहित हुए बिना नही रह पाए।  अब इस मंदिर की खड़ी और ऊँची सीढ़ियों को चढ़ते हुए सब मंदिर की छत की और चल पड़े। प्रसिद्द फोटोग्राफर और ब्लॉगर सुशांत सिंघल जी अपनी उम्र का तकाजा करते हुए ऊपर नही आये  जबकि लगभग उनके हमउम्र रमेश शर्मा जी बेधड़क सीढियाँ चढ़ते चले आये।  जम्मू और कश्मीर का निवसी होना शायद काम आया होगा।  चतुर्भुज मंदिर की सीढियाँ , गलियारे , झरोखे से लेकर छत -खिड़की भी फोटोग्राफर्स के कैमरों की कैद में आने लगे।  चतुर्भुज मंदिर में मैंने अपना मार्गदर्शक बनाया , मंदिर में ही ड्यूटी करने वाले लड़के मनोज सेन को।  मनोज को इस मंदिर के चप्पे-चप्पे का ज्ञान है , जबकि नए व्यक्ति को इसकी मंजिले भूलभुलैयाँ लगेगी।  
                                                             जब सब छत पर पहुंचे तो यहाँ से पूरे ओरछा  का नजारा देखकर सब विस्मित होने के साथ ही हर्षित भी थे।  अब सारे फोटोग्राफर अपने अपने कैमरे लेकर मोर्चा संभाल लिए।  कई कैमरों के फ़्लैश एक साथ चमकने लगे।  जिनके पास कैमरे नही थे , वो अपने मोबाइल से ओरछा की खूबसूरती कैद करने लगे।  तभी सचिन त्यागी जी ( जो  दिल्ली से अपने परिवार को लेकर कार से  ग्वालियर , दतिया  घूमते हुए आ रहे थे  )का कॉल आया , कि वो ओरछा बस स्टैंड पहुँच चुके है , उन्हें लेने के लिए मैंने पंकज और प्रवीण को भेज दिया  इधर फोटो सेशन  के दौरान ही सचिन त्यागी जी सपरिवार शामिल हुए।  सचिन जी से मेरी पहली मुलाकात  अपने  हाल के दिल्ली प्रवास पर हुई थी।  सचिन जी अधिकाशतः अपने परिवार के साथ ही घुमक्कड़ी करते है।  दिल्ली में भी हमसे मिलने जब कनॉट प्लेस आये तो परिवार भी साथ लेकर आये थे, हालाँकि परिवार को बाजार में शॉपिंग करने छोड़ कर हमसे मिले।  सचिन जी भी अपना कैमरा लेकर फोटो खींचने के दंगल में कूद पड़े।  तभी हमारे खाना बनाने वाले नत्थू का कॉल अंकज के पास आया , कि  खाना तैयार हो चुका आई।  बड़ी मुश्किल से सबको खाने की दुहाई देकर चतुर्भुज मंदिर से नीचे उतारा।  नीचे उतरने के बाद भी मंदिर के मुख्य द्वार और नीचे बने बाजार में भी फोटो सेशन चलता रहा।  खैर हम होटल पहुंचे , और हाथ मुँह होकर खाना खाने बैठे पर अभी एक धमाका बाकी था .......क्रमशः  
सावन -भादो  के सामने ग्रुप के सदस्य 

रामराजा मंदिर प्रांगण  में 

हरदौल बैठक 


चतुर्भुज मंदिर की भव्यता को कैमरे में कैद करते महारथी 


चतुर्भुज मंदिर की राहें 

चतुर्भुज मंदिर की खड़ी सीढियाँ 


ऊंचाई पर पूरा ग्रुप 

घुमक्कड़ी दिल से 

सारे शूटर्स शूट करने को तैयार 


हम सारे घुमक्कड़ है .. दिल से 


हम भी किसी से कम नही ( बांये से श्रीमती रितेश गुप्ता , श्रीमती कविता भालसे , श्रीमती नयना यादव, श्रीमती संजय कौशिक , श्रीमती हेमा सिंह )


चिल्लर पार्टी के संग मम्मी पार्टी
















orchha gatha

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