झुलसते से पेड़ खड़े हो जाते , आई जेठ की दुपहरी
पंछी भी निश्वास हो जाते , आई जेठ की दुपहरी
आसमान से मनो बरस रहे हो, आग के गोले
ताप इतना है, कि लगे सूर्य अनलकोष होले
नंदिनी गाय पेड़ टेल बैठी, पर वहां भी आराम कहाँ
भूरी कुतिया जीभ निकाले ,ढूँढती मानो शाम कहाँ
ताल-नदी सब सूखे, कालू कुआ ढूंढ रहा है पानी
सांवली भैंस कीचड़ से लथपथ. सबसे ज्यादा उसे परेशानी
हवा भी बहती नही , मिले कैसे गर्मी से छुटकारा
अब जाये कहाँ सब, जल रहा है जग सारा
पुसी बिल्ली आराम फरमाती , छोड़ चूहों कि चिंता
सब चुपचाप दुबके , पंख न फैलाये कोई परिंदा
सारा तन पसीना से नहाये,आई जेठ की दुपहरी
सब जन है अलसाये , आई जेठ की दुपहरी
- मुकेश पाण्डेय "चन्दन"

