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शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

जिन्द्गी न जाने , क्यूँ खफा हो गयी है ...

 जिन्द्गी  न जाने , क्यूँ खफा हो गयी है

हैतन्हाई के आलम में , ख़ुशी बेवफा हो गयी है 

जो लिखे मोहब्बत के तराने , आज हुए बेगाने
दिल में बसी तेरी खुशबु , जाने कहाँ दफा हो गयी है


सोचा था , एक दिन पूरी होगी मोहब्बत की किताब
अफ़सोस , बचे कुछ पन्ने, कुछ फलसफा हो गयी 

जेहन में बची यादें, दिल भी वीरान हुआ 
दफन हो सब बातें , जिंदगी भी सफा हो गयी 

महक न रह गयी बाकि, चली ऐसी आंधियां 
वीरान 'चन्दन' के दरख्त , अब ऐसी फ़िज़ा हो गयी है . 
- मुकेश पाण्डेय 'चन्दन'

मंगलवार, 18 जून 2013

हर कसौटी पर कम निकले ....

हार गये सारी बाजी, हर कसौटी पर कम निकले 
अब आरज़ू है , कि किसी तरह बस दम निकले 
हर तरह की आजमाईश , हमने की हर तरकीब 
क्या पता था ? हमरी कोशिशें उन पर सितम निकलें 
जीने की आरज़ू नही अब , ख़त्म हो गया जहाँ 
खुश रहे वो , जब कभी हमारा कफ़न निकलें 
हो गये तबाह , पर अब गम क्या करें ,
 मिले खुशियाँ  उन्हें , जब-जब हमारा सनम निकलें
महक बाकि रहेगी ताउम्र, मेरी मोहब्बत की 
चिता की राख को संभल के रखना , क्या पता वो 'चन्दन 'निकले

सोमवार, 10 दिसंबर 2012

हाईटेक नही होना चाहता , मेरा गाँव !!

हाईटेक नही होना चाहता , मेरा गाँव 
न धन-दौलत , न  सोना चाहता है मेरा गाँव 
 भरी बरसात में  , जब खेत होते लबालब
किसी घर में प्रसव पीड़ा, सुन कांपते सब 
चारपाई पे रख के दौड़ते ,जब  चार कंधे 
कीचड़ -पानी सब भूल , भागे जाते बनके अंधे 
किस्मत हुई तो , सही वक़्त पे मदद देगा दूजा गाँव 
वरना उन्ही चार कंधो पर , लौटेगा बिलखता बहाव 
सुनसान रातों में , किसी बुजुर्ग को चलती खांसी 
धड़कने तेज , बच पायेगा  या लग जाएगी फांसी 
आज़ादी के इतने साल बाद , हो गया इंडिया शाईन 
पर मेरे गाँव में आज भी बसते, ओझा और डाईन
बिन सड़क, बिन अस्पताल, कैसे चले विकास की नाव    

मित्रो , मेरा गाँव बिहार के बक्सर जिले के सिमरी प्रखंड (ब्लाक ) के अंतर्गत 'गोप भरवली'  है . कहने को तो मेरा गाँव ब्लाक से १ कि०मि० की दुरी पर है , मगर लगभग १००० की आबादी आजादी के ६५ सालों बाद भी विकास की सारी सुविधाओ से दूर है . आज भी सड़क ( कच्ची या पक्की ) न होने के कारण मेरा गाँव बाकि देश - दुनिया से कटा  है  . सड़क बनवाने के लिए ग्रामवासियों ने बी०डी 0 ओ० से लेकर माननीय मुख्यमंत्री ' सुशासन बाबु ' तक अर्जी लगाई, मगर नतीजा वही ढाक के तीन पात. आज भले ही प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना जैसी योजना पुरे देश में चल  रही है , मगर मेरे गाँव से वो दूर ही है . अगर विकास को ढूँढा जाये तो मेरे गाँव में दो प्राथमिक  विद्यालय , कुछ टूटी- फूटी  सिन्धु घाटी  सभ्यता के अवशेषों की तरह  पक्की नालियों  
मेरे गाँव के जांबाज़ युवा जो मिटटी में आनंद ढूंढ रहे !
के अवशेषों के अलावा कुछ नही मिलता . हाँ बिजली आ गयी  है , जिसकी सूचना देता राजीव गाँधी की फोटो व राजीव गाँधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना का बोर्ड गाँव की शुरुआत में ही लगा है . इसके अलावा मनरेगा के कार्य तो बस खानापूर्ति की तरह होते है . हा आधुनिकता की चाह ने लोगो को मोबाइल फोन्स से जरुर जोड़ दिया है , जिसमे प्रोढ़ भोजपुरी गाने देखते-सुनते रहते है , तो युवा पीढ़ी आधुनिक नौकरियों से बेपरवाह फेसबुक और इंटरनेट की रंगीनियों के जाल में फंसा है .गाँव के  कुछ जागरूक लोगो ने गाँव की प्रगति और विकास के लिए अपनी क्षमता अनुसार प्रयास किये ...यहाँ तक कि माननीय मुख्यमंत्री जी को ज्ञापन भी दिया ....आधिकारियो , जनप्रतिनिधियों के आगे गुहार लगाई ...मगर मिला तो बस आश्वासन ...गाँव की समस्याओं का निराकरण न हो पाने का मूल कारण स्वयं की ग्राम पंचायत न हो पाना है , क्योंकि अभी हमारा गाँव 'आशा पड़री ' ग्राम पंचायत में आता है , जहाँ हमारे गाँव की साडी आशाएं पड़ी रहती है ...क्योंकि पंचायत में हमारे गाँव से केवल एक मात्र वार्ड मेंबर है , जिसकी आवाज़ नक्कारखाने में तूती बनके रह जाती है . अब तो गाँव के लोग अपनी  इस आदिम जिन्दगी के आदि हो गये है , और इसी में खुश है.  

शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2012

कितने रावण जलाओगे , हर घर में रावण छुपा है !

अभी हाल में पूरे देश में धूम धाम से रावण  का पुतला जलाया गया . समाचार पत्रों और टी ० वी० न्यूज चैनलों पर " बुराई पर अच्छाई की जीत " ," जीत गयी अच्छाई ", " हो गया बुराई का अंत "  जैसे जुमले प्रयोग हुए . लेकिन क्या सचमुच बुराई ख़त्म हो गयी ? बहुत पहले दशहरा पर एक कविता लिखी थी , जो शायद आज भी प्रासंगिक है . उस पर अपने विचार जरुर दें -
कितने रावण जलाओगे , हर घर में रावण छुपा है 
कितनी बार आग लगाओगे  , हर पग पर तम जाल बिछा है 
एक पुतला जल जाने से , सारा पाप नही मर जाता 
पुतले में आग लगाने से , हर नर राम नही बन जाता 
जब होगा अहम् , तब तक रावण नही मरेगा 
'अहम् ब्रम्हास्मी ' मरके भी यही कहेगा 
स्वार्थ, ईर्ष्या, घृणा , पाप चारो और यही मचा है  
कितने रावण जलाओगे , हर घर में रावण छुपा है 
हर दिन सीता का अपहरण हो रहा है 
पुलिस, प्रशासन कुम्भकरण सो रहा है 
गीध-जटायु ,मूक हुए , मनो सब छिपा है 
आज रावण एक नही , उसके रूप कई है 
अन्याय , अत्याचार के बाद भी , वह सही है 
मारते-मारते रावण को , आज राम भी थक  जायेंगे 
इतने रावण है , कि कई राम भी मार न पाएंगे 
कितने रावण जलाओगे , हर घर में रावण छुपा है 
कितनी बार आग लगाओगे  , हर पग पर तम जाल बिछा है 




गुरुवार, 27 सितंबर 2012

हो रहा भारत निर्माण ( व्यंग्य कविता )

 १२ सितम्बर को साहित्य अकादमी , मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद्  भोपाल तथा  हिंदी विभाग , डॉ हरी सिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय , सागर द्वारा आयोजित ' पद्माकर समारोह ' काव्यपाठ हुआ . जिसमे कई बड़े कवि-कवियत्रियो के साथ मैंने भी अपनी कवितायेँ पढ़ी . उनमे से एक कविता आप सभी के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ .
हो रहा भारत निर्माण  !

ऐ जी , ओ जी , लो जी  , सुनो जी 
हम करते रहे जी -जी , वो कर गए 2  जी 
महंगाई का चढ़ा पारा , बिगड़ी वतन की हेल्थ 
सब मिल के खा गए , खेला ऐसा कामनवेल्थ 
दुनिया करे छि-छि , हो कितना भी अपमान 
अबे चुप रहो ! हो रहा भारत निर्माण ..... 
पेट्रोल इतना महंगा , पकड़ो अब टमटम
खी-खी करके , कर गए वे स्पेक्ट्रम 
हम मरें भूख , महंगाई, गरीबी , बदहाली से 
और वो ख़ामोशी ओढ़े  ,कोयले की दलाली से 
दाग अच्छे है ! कोयले से भी न टूटा ईमान
अबे चुप रहो ! हो रहा भारत निर्माण .....  
कार्टून बनाने पर , मचा दिया कार्टूनों ने बवाल 
फिर कैसी ख़ामोशी , कौआ चले हंस की चाल 
होते रहे आतंकी हमले , जीते रहे नक्सलवादी 
खामोश रहना ही भला , ऐसी मिली आज़ादी 
आये चाहे बाढ़ या सूखा , मरते रहे चाहे किसान 
अबे चुप रहो ! हो रहा भारत निर्माण ..... 


बुधवार, 19 सितंबर 2012

कांटा लगा !!!!!

 बहुत पहले गणेश चतुर्थी के समय ये कविता लिखी थी , आज आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ .

गणेश चतुर्थी के पहले लोग पंडाल सजा रहे थे
लेकिन धार्मिक की जगह , फ़िल्मी गीत बजा रहे थे
बंगले के पीछे कांटा लगा, बुद्धि विनायक  सुन रहे थे
मानो काँटों से बचने के लिए , जाल कोई बुन रहे थे
बेरी के नीचे लगा हुआ था, काँटों का अम्बार
लहूलुहान से गजानन , होके बेबस और लाचार
सोच रहे थे कब अनंत चतुर्दशी आएगी
जाने कब इन  बेरी के काँटों से मुक्ति मिल पायेगी
मुश्किल हो गया , इस लोक में शांति का ठिकाना
नाक में दम कर दिया ,और कहते अगले बरस जल्दी आना
मैं इसी बरस जल्दी जाने की सोच रहा हूँ
अपने फ़िल्मी भक्तों के लिए , अपने आंसू पोछ रहा हूँ
मुझसे भी बढ़कर है , इनके लिए फिल्मे और फ़िल्मी संसार
फिर गणेशोत्सव क्यों मानते , करते क्यों मुझ पर उपकार ?
- मुकेश पाण्डेय 'चन्दन '
गणेश चतुर्थी और पर्युषण पर्व की शुभकामनाएं

रविवार, 12 अगस्त 2012

यही तो देश का कष्ट है


यही तो देश का कष्ट है
कि सारे नेता भ्रष्ट है
राजनीती तो अब नष्ट है
तब भी नेता स्वस्थ्य है
वे घोटालो के अभ्यस्त है
और आम जनता त्रस्त है
सारे मौका परस्त है
सब अपने में मस्त है
वतन कि हालत पस्त है
खुशहाली अस्त-व्यस्त है
यही तो देश का कष्ट है
कि अब सब ध्रतराष्ट्र  है
- मुकेश पाण्डेय 'चन्दन'

शनिवार, 4 अगस्त 2012

इत्तफाक (कविता )

तब बारिश हो रही थी , था शायद सावन का महिना 
जब भीगता देख मुझे , मुस्कुराई थी एक हसीना 
उसकी मुस्कराहट , दिल में हलचल मचा गई 
एक पल में ही न जाने , कितने सपने सजा गई 
पास आते उसके कदमो ने , दिल में उमंग जगाई 
मन ख़ुशी से झूमा , मनो उसके कदमों में दुनिया समाई 
कदम-दर-कदम दिल की धड़कन तेज हो रही थी 
आँखे उसकी कुछ उम्मीदों का बीज बो रही थी 
होंठ मानो उसके कुछ कहने को थे बेताब
इधर हम जागी आँखों से देख रहे थे ख्वाब 
जिन्दगी भीगते-भागते कर गयी मजाक 
पर कैसे मानू  की ये हकीकत थी या इत्तफाक 
  उसकी छुअन  से तन में एक बिजली समाई 
हाथ में राखी लिए बोली , आज रक्षाबंधन है मेरे भाई !!!!

गुरुवार, 2 अगस्त 2012

तुम्हारे जाने से .........

सभी ब्लोगेर्स साथियों को पावन रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाये . रक्षाबंधन भारतीय संस्कृति का एक अनूठा त्यौहार है . इस दिन का सभी बहनों को बड़ी बेसब्री से इन्तजार होता है . लेकिन इस बार रक्षाबंधन के दिन मैं अपनी बहन को राखी बंधवाने के बाद  उसे जब स्टेशन छोड़ने जा रहा था , तो मन बड़ा व्यथित था .अभी तक तो सभी रक्ष्बंधन साथ मनाये थे , लेकिन उसकी शादी के बाद ये विछोह ...पुरानी यादों को फिल्म की रील की तरह फ्लेश बैक में ले जा रहा था . बचपन की बातों से लेकर अब तक की सारी बातें एक एक करके याद आ रही थी . वो बात -बात में लड़ना -झगड़ना , रूठना-मनाना और न जाने कितनी बातें ............
तुम्हारे जाने से, जीवन में एक कमी सी तो है 
आँखे कुछ ढूंढे  , इनमे भी नमी सी तो है 
दुनिया की रीत है, एक दिन था तुम्हे जाना 
आखिर क्यों कोई अपना , हो जाता बेगाना 
वो बचपन की बातें , वो होती तकरार 
बस तेरी याद बची , कहाँ  तेरा प्यार ?
मेरे लिए सब कुछ थी तुम , अब जाने कहाँ गुम
वो तुम्हारी बकबक , अब तुम्हारी तस्वीर गुमसुम 
हर पल हर लम्हा तुम्हारी याद दिलाता 
अब जाना, कि ये रिश्ता क्या कहलाता 
मुझे पता है , वहां तुम्हारी आँखों में भी होगा पानी 
 पर शायद , मिलना-बिछड़ना ही है जिंदगानी 
कैसे भूलूं , कैसे याद करूँ , प्यारी बहना 
जब बोलते आंसू , तो जुबाँ से कहना 
सोच के तुम्हारी मुस्कराहट , आंसू निकल आते 
काश ! फिर कहीं से वो बीते पल मिल जाते

गुरुवार, 26 जुलाई 2012

बाकी रह गये कुछ निशाँ....

जिन्दगी में कुछ छूट जाता है , जाने कहाँ 
होता है सब कुछ साथ, है पर दिल तनहा 
अतीत  की होती है , कुछ रंगीली यादें
कुछ खाली पन्ने , तो कुछ अधूरे फ़लसफ़ा
मन करता है, कि फिर लौट चले पीछे 
 पर बाकी है, अभी देखना आगे का जहाँ 
हम तनहा ही चले थे , इस सफ़र में 
फिर तनहा , छूटे जाने कितने कारवां 
ख़ुशी सी होती नही , पर गम भी नही
निकले कितने अश्क, लगे कितने कहकहा 
 लहरें यूँ ही आती रही , साहिल पे खड़े हम 
आखिर समंदर में , डूब ही गया ये आसमाँ
टूट गये वो बनाये हुए रेत के महल
पर अभी भी बाकी रह गये कुछ निशाँ

बुधवार, 20 जून 2012

अपने को बौना पाता हूँ


इन लम्बे -लम्बे दरख्तों के बीच अपने को  बौना पाता हूँ 
इन जिंदगियों  की खरीद-फरोख्त के बीच , अपने को खिलौना पाता हूँ
कुछ हसीं चेहरों में न जाने क्यों खौफ  नज़र आता  है 
फैशन के नाम पर बदन  पर बस चिथड़ा नज़र आता है 
दर्दनाक चीखो में अपनी मुस्कान भी छीन गयी 
मौत के सौदागरों के बीच जिन्दगी  कहाँ गुम गयी 
पत्थर की इन दीवारों में, अपने लिए छोटा कोना पाता हूँ  
इन जिंदगियों  की खरीद-फरोख्त के बीच , अपने को खिलौना पाता हूँ  
हर तरफ छाई भीड़ पर तन्हाई ही दिखती  है 
पैसे हो गर जेब में , तो यहाँ हर चीज बिकती   है 
खो गये है हर रिश्ते-नाते , खो गया है अपनापन 
बस गयी है मतलब की दुनिया , मतलबी है हर मन 
यहीं रईसों के ठहाके , तो यहीं गरीबो की आँखों में रोना पाता हूँ 
इन जिंदगियों  की खरीद-फरोख्त के बीच , अपने को खिलौना पाता हूँ 
 

बुधवार, 13 जून 2012

एक अकेला पेड़ !

सोया  पेड़ के नीचे एक थका राही
तभी कहीं से एक दर्द भरी आवाज़ कराही
नींद खुली राही की , देखा चारो तरफ सुनसान 
एक अकेला पेड़ था, बाकि इलाका था वीरान 
क्या देख रहे हो तुम , अचरज होके आसपास 
मैं अकेला पेड़ बचा, बाकी का इंसानों ने किया नाश 
थी यहाँ भी हरियाली  , थे अनेक पशु और पक्षी 
सबका नाश किया मानव ने, बनके पर्यावरण भक्षी 
असहाय बनके खड़ा रहा , देखता रहा सहोदरों का नाश
मेरी बांहों को भी काट दिया, है अंतिम क्षण की आस 
क्या शत्रुता थी इन मनवो से, सदा  ही उनका कल्याण किया 
मीठे-मीठे फल  दिए उनको, और ऑक्सीजन  सा प्राण दिया   
पर वो हमारा मोल समझ न सका अब तक 
यूँ ही अपने पैरो पर कुल्हाड़ी मारेगा  कब तक
        

मंगलवार, 5 जून 2012

आज पर्यावरण दिवस पे फिर से कुछ ढोंग किया जाये !

आज पर्यावरण  दिवस पे फिर से कुछ ढोंग किया जाये
ताकि अपनी भी तस्वीर कल अखबारों में आ जाये
प्लास्टिक के फ्लेक्स पर छपवायें , सुन्दर पोस्टर
 पौधे लगाये उन्ही गमलो में , जिन्हें भूले थे पिछली बार रोपकर
इतनी गर्मी हो रही है , जल्दी से चलाओ  ए सी
भले ही कितना बढ़ जाये , दुनिया में सी ऍफ़ सी
काटने दो सारे जंगल, नए शहर बसायेंगे
जानवरों का क्या है , शहर में रहने आ जायेंगे
वैसे भी अब क्या फर्क जानवर  और इंसान में
वो रहते हा चिड़ियाघर में और हम रहते मकान में 
चलो बहुत हुआ , कुछ तो फोटो खिच जाये
आज पर्यावरण  दिवस पे फिर से कुछ ढोंग किया जाये
- मुकेश पाण्डेय "चन्दन "

गुरुवार, 31 मई 2012

भारत बंद !

आज भाजपा ने रखा भारत बंद
जो संसद में खाते  रहे कलाकंद
इतने घोटाले, इतनी महंगाई
फिर इनके मुह में लगी थी जंग
आपस में लड़ने से फुर्सत नही
और सड़क पर झंडा बुलंद
इतनी नाकारा  है सरकार
फिर भी न लगा सके  पेबंद
बस आम    आदमी हो परेशान
इसी शान में करते रहो भारत बंद
टू जी, आदर्श, कॉमन  वेल्थ
महंगाई , भ्रष्टाचार ,के कितने रंग
बस तुम करते रहना , भारत बंद
बंद की जगह , खोलो दिमाग  के ताले
तब देश का सुधरेगा रंग ढंग
फिर भी कुछ न कर सके
तो कार्लो अपनी दुकान बंद
-मुकेश पाण्डेय "चन्दन"  

रविवार, 27 मई 2012

अब मर रहे रहे है, ताल-तलैया

अब मर रहे रहे है, ताल-तलैया 
कहाँ गए  ?  उनमे थे जो नाव खिवैया
 नदियों के भी आंसू सूख गये 
अब कठौती में होती, जय गंगा मैया 
माँ थी कभी सारी नदिया 
आज मात् हंता बने हम सब भैया 
धरती का सीना, चीर के चूसा 
अब पानी को करते ता-ता थैया 
मार के कुल्हाड़ी अपने पैरो पर 
 समझदार बने है, आज सैंया
सारे जंगल काट दिए है हमने 
 और ढूंढ  रहे , क्रांकीट में छैंया
अब तो जागो , कुम्भकरणो
डूब रही है , चन्दन की नैया
-mukesh pandey "chandan"

शुक्रवार, 25 मई 2012

मैं एक आम इन्सान हूँ

मैं एक आम इन्सान हूँ 
हर कदम जिन्दगी से परेशान हूँ
मैं जन्म लेता हूँ , गंदे सरकारी अस्पतालों में 
या फिर अँधेरे कमरों, सूखे खेतो या नालो में 
पलता-बढ़ता  हूँ, संकरी-छोटी गलियों में 
खेलता फिरता हूँ, मिटटी-कीचड़ और नालियों में 
ऊँची इमारतों को देखकर , मैं हैरान हूँ 
मैं एक आम इन्सान हूँ 
खंडहर  से सरकारी स्कूलों से की पढाई 
 क्लास बनी मैदान ,साथियों  से होती लडाई   
होश सँभालते ही, शुरू होती काम की तलाश 
आँखों में सपने , होती कर गुजरने की आस 
पर लगता मैं बेरोजगारी की शान हूँ 
मैं एक आम इन्सान हूँ 
जैसे-तैसे मिलती रोजी-रोटी, चलती जीवन की गाड़ी 
हर राह  पर पिसता , इस देश का ये खिलाडी 
 हर विपदा हमारे लिए होती, देखो जिंदगी का खेल 
हर बार हम  होते बर्बाद, करती मौत हमसे मेल 
बाढ़, सुखा, भूकंप, अकाल का मैं बर्बाद हुआ सामान हूँ 
मैं एक आम इन्सान हूँ  
- मुकेश पाण्डेय "चन्दन" 

 

सोमवार, 7 मई 2012

अजन्मी की पुकार

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अजन्मी की पुकार

सुना है माँ तुम मुझे , जीने के पहले ही मार रही हो
कसूर क्या मेरा लड़की होना , इसलिए नकार रही हो
सच कहती हूँ माँ , आने दो मुझे जीवन में एक बार
न मांगूंगी खेल-खिलौने , न मांगूंगी तुमसे प्यार
रुखी सूखी खाकर पड़ी रहूंगी, मैं एक कोने में
हर बात तुम्हारी मानूंगी , न रखूंगी अधिकार रोने में
न करुँगी जिद तुमसे , जिद से पहले ही क्यों फटकार रही हो
कसू क्या मेरा लड़की होना , इसीलिए नकार रही हो
माँ तुम भी तो लड़की थी, तो समझो मेरा दुःख
न करना मुझे दुलार, फ़िर भी तुम्हे दूंगी सुख
भइया से न लडूंगी , न छिनुंगी उसके खेल खिलौने
मेहनत मैं खूब करुँगी , पुरे करुँगी सपने सलौने
आख़िर क्या मजबूरी है , जो जीने के पहले मार रही हो
कसूर की मेरा लड़की होना , इसीलिए नकार रही हो
कहते है दुनिया वाले , लड़का-लड़की होते है सामान
तो फ़िर क्यों नही देखने देते , मुझे ये प्यारा जहाँ
आने दो एक बार मुझे माँ , फ़िर न तुम पछताओगी
है मुझे विश्वाश माँ, तुम मुझे जरूर बुलाउगी
क्या देख लू मैं सपने , जिसमे तुम मुझे दुलार रही हो
देकर मुझको जनम माँ, तुम मेरा जीवन सवांर रही हो


मेरे प्यारे दोस्तों मेरी ये कविता अब तक की श्रेष्ठतम एवं सर्वाधिक सराही गयी कविताओ में से एक है। इस कविता को लिखते समय मेरे मन में  देश में हो रहे भ्रूण हत्याओं से लगातार  कम हो रही लड़कियों की मार्मिक दशा थी ।इसे मैं पूर्व में भी अपने ब्लॉग पर पोस्ट कर चूका हूँ .  सचमुच जिस देश में कन्या को देवी माना जाता हो वहां कन्या भ्रूण हत्या वाकई शर्म की बात है । मेरी कविता का उद्देश्य केवल सराहना पाना नही है , बल्कि मैं चाहता हूँ की कोई बदलाव की बयार बहे .................
इस बदलाव में आपका साथ अपेक्षित  है , अपना सहयोग अवश्य दे क्योंकि हम कल भी देख सके
इसी आशा के साथ आपका अपना ही अनुज
- मुकेश पाण्डेय "चन्दन "

शनिवार, 5 मई 2012

जिन्दगी तुम्हारे आने के बाद ........

जिन्दगी तुम्हारे आने के बाद कितनी बदल गयी है
क्या  कहे जिंदगी भटकी या फिर संभल गयी है  
पहले जिंदगी  ही चलती  रही थी जा रही थी 
पर अब तुमसे , मिलने जिन्दगी ठहर गयी है 
धड़कने धड़कती है , बस तुम्हारे लिए ही 
और सांसें , तो बस तुम्हारे लिए मचल गयी है 
जिन्दगी की , रह की मंजिल हो गयी हो  तुम
अब तो इस महकते 'चन्दन' की  बदल गयी है 

गुरुवार, 3 मई 2012

कुदरत के हर रंग में तुम

हर फूल में होती है, तुम्हारी खुशबू
हर बहार में होता है, तुम्हारा जादू
हर कली में दिख जाती है, तुम्हारी मुस्कान
हर भंवरे  से करता हूँ ,  तुम्हारा अरमान
कुदरत के हर रंग में दिख जाती तुम
बादलों में भी बिजली सी आती जाती तुम
ठंडी हवा से मुझे सहलाती तुम
बारिश की बूंदों में जी बहलाती तुम
चाँद भी हर रात करता, तुम्हारा ही अहसास
सुबह की पहली किरण सी ताजा तुम्हारी आस 
बहते झरने की कलकल सी तुम्हारी प्यास 
शबनम की ठंडक में है, तुम्हारा विश्वास 
कोंपल sa प्रफुल्लित , है तुम्हारा मन 
सरिता का निर्मल जल है , तुम्हारा दर्पण 
बस तुम्हारे लिए , मैं भटकता वन-उपवन 
और तुम महकती , मेरे भीतर बनके 'चन्दन'      
 
 

मंगलवार, 1 मई 2012

सत्यमेव जयते !

जब भी तनहा रहता हूँ , तो जीवन के बारे में सोचता हूँ . थोडा सा अध्यात्मिक सा होने लगता हूँ . सोच जन्म-मरण से भी आगे जाने लगती है . कभी भाग्य पर चिंतन होता है , तो कभी कर्म पर , कभी जीवन के औचित्य पर ही मन खुद से  सवाल करने लगता है . कभी जवाब  मिलते है तो कभी नही भी .....इसी उधेड़ बुन में लगा था, कि ये कुछ पंक्तियाँ उत्पन्न हुई .....

सत्यमेव जयते  !
हम हरदम ये कहते
पर आखिर क्या है सत्य ?
रहता जो शाश्वत
ये जीवन, ये धरा
ये ब्रम्हांड, ये परा
सब तो है नश्वर
बस सत्य है ईश्वर
लौकिक सत्य के पीछे क्यों भागें
 जब सब मिथ्या है , उसके आगे
बस सत्य सनातन !!
क्या प्राचीन, क्या अधुनातन ?
जन्म-मृत्यु आनी जानी है 
हम तुम बस झूठी कहानी है
 जीवन का क्या औचित्य है
राम नाम ही सत्य है !

orchha gatha

बेतवा की जुबानी : ओरछा की कहानी (भाग-1)

एक रात को मैं मध्य प्रदेश की गंगा कही जाने वाली पावन नदी बेतवा के तट पर ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा हुआ. बेतवा की लहरों के एक तरफ महान ब...