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गुरुवार, 9 मई 2019

गंगा जी कहिन : अहिल्या का उद्धार (बक्सर गाथा -2)



अहिरौली गंगा घाट (बक्सर , बिहार ) चित्र प्रतीकात्मक है।  
इस श्रृंखला की पहली पोस्ट में आपने पढ़ा, कैसे मेरे और मां गंगा के बीच संवाद शुरु हुआ और मैंने उनसे कैसे बक्सर का प्रारंभिक इतिहास जाना । परंतु मेरा प्रश्न अनुत्तरित रह गया था , कि भगवान राम ने कैसे अहिल्या का उद्धार किया ?  
चूँकि मैं जीवन यापन के लिए मां गंगा से सैकड़ों किलोमीटर दूर बेतवा किनारे ओरछा में रहता हूं और साल में एक या दो बार ही आना हो पाता है, इसलिए मां गंगा से  मुलाकात अधूरी रही और महीनों तक यह प्रश्न मेरे मन में भ्रमण करता रहा, कि आखिर भगवान श्री राम अपने गुरु विश्वामित्र के साथ जब गौतम ऋषि के आश्रम पहुंचे होंगे तो वह दृश्य कैसा होगा और उस स्त्री को जिसको उसके स्वयं तपस्वी पति ने छोड़ दिया हो ,आखिर भगवान ने कैसे उस पर अपनी करुणा दिखाई होगी ?
 मां गंगा की कृपा बहुत जल्दी मुझ पर हुई और उन्होंने अपने तट पर मुझे जल्दी ही बुला लिया और इस बार मैं फिर हाजिर था।  अपने उन्हीं प्रश्नों या जिज्ञासाओं के उत्तर को पाने के लिए और मां गंगा के बक्सर स्थित उसी रामरेखा घाट पर मैं पहुंचा जहां कभी भगवान श्री राम अपने अनुज लक्ष्मण और गुरु विश्वामित्र के साथ स्नान करते थे। मैं मां गंगा के आंचल के  एक छोर पर प्रतीक्षारत बैठा था , कि कब मां गंगा अपनी कृपा मुझ पर बरसा दे  ! और महीनों से अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर मुझे मिले।  मां गंगा की कृपा मुझ पर हुई और गंगा की अविरल धारा से आवाज आई-  हे पुत्र ! आखिर तुम्हें आना ही पड़ा !  मैं हाथ जोड़कर नतमस्तक खड़ा था और मैंने कहा कि क्या ऐसा हो सकता है कि आप बुलाएं और आपका यह अनुग्रहित पुत्र आए ना ।
इसके पश्चात मैंने मां गंगा से अपना वही पुराना प्रश्न दोहराया कि आज मां बताइए पाषाण बनी अहिल्या से कैसे मिले प्रभु राम ? 
कुछ देर की शांति  के पश्चात गंगा की लहरें  शांत हुई और कुछ देर के बाद मां गंगा  बोली - मैं  त्रेता युग में पहुंच गई थी  और मुझसे बोली - पुत्र मुझे अच्छे से याद है, वह दिन जब ऋषि गौतम और उनकी पत्नी की  कथा महर्षि विश्वामित्र ने राम को सुनाई और राम ने अहिल्या के लांछन और अपमान की कथा सुनकर अपने गुरुदेव से कहा - कि मैं उस देवी के दर्शन करना चाहूंगा गुरुदेव !  गुरुदेव ने कुछ कहा नहीं केवल गर्व से देखा था राम की ओर और राम के निकट पहुंच कर उनके कंधे पर हाथ रख कर दूर आकाश की ओर निहारा और अपने शिष्य के मुख से उस तिरस्कृत और लोक निर्वासित महिला के लिए देवी का संबोधन सुन बोले कि आज तुम में मैं अपना आप में मेरा विस्तार देख रहा हूं।   कुछ क्षण  तक महर्षि विश्वामित्र आत्म मुग्ध से खड़े रहे और राम की ओर देखते हुए बोले उसे भी तुम्हारी ही प्रतीक्षा है।  राम ! अपमान और उपेक्षा ने उसकी चेतना को लगभग नष्ट कर दिया है, मनुष्यों की छाया से भी वह डरती है , किसी को दूर से ही देख कर छिपने या भागने का प्रयत्न करती है ,डरती है,  न जाने क्या अपशब्द सुनने पड़े ! चेतना का केवल यही प्रमाण शेष रह गया है।  समाज  उसे दूषित करने वालों की लोग पूजा करता है।   ! पुरुष जो ठहरे शक्तिशाली जो ठहरे वे छल कर सकते हैं ! लूट सकते हैं !दूसरों को अपमानित कर सकते हैं ! और जिन्हें चलते लूटते और अपमानित करते हैं, उन्हीं को इन सब के लिए दोषी भी सिद्ध कर सकते हैं।  आश्चर्य है !  जो सिरजता है, गढ़़ता है लोक  को जीवन और अवलंबन देता है, वही सबसे अधिक अपमानित भी होता है वह धरती हो,स्त्री हो या नदी  हो सबकी एक नियति है । महर्षि विश्वामित्र और उनके दोनों होनहार शिष्य धीरे धीरे मेरे किनारे ही उस स्थान पर पहुंचे जहां पर अहिल्या जीवित होते हुए भी पाषाण की तरह शापित थी।  राम ने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए थे और दूर किसी स्त्री की छाया दिख रही थी, वह हाथ जोड़े उसी दिशा में चलते रहे लक्ष्मण भी उनका अनुगमन करके उनके साथ उसी तरह चल रहे थे, संभवत उन्हें भी लगा था कि वह व्यक्ति अन्य लोगों से भिन्न है ,  वह ना तो अपने स्थान से हिली थी और ना भागी थी।  संभव है उसे आंखों से कुछ दिख ही  ना रहा हो या संभव है कि उसमें हिलने की शक्ति ही ना रह गई हो ! नहीं ! वह शायद इधर देख ही नहीं पा रही थी,  मौन बैठी थी।  किसी सोच में डूबी थी। उसके निकट पहुंचकर राम उसके चरणों में लेट गए थे और बोली आपने बहुत दुख झेला है मां ! मैं समस्त पुरुष जाति की ओर से आपसे क्षमा मांगने आया हूं ! हे देवी मैं आपको अपमानित करने वाली उस दम्भी पुरुष जाति का प्रतिनिधि आपसे दंड मांगने आया हूं ।
उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था।   यदि राम के शब्द उसके कानों में पड़ भी रहे थे, तो उनका अर्थ शायद उसकी समझ में नहीं आ रहा था ! वह जड़ सी एकटक राम को देखी जा रही थी ! नहीं,  उसके कानों में कोई ध्वनि आवश्यक टकराई थी उसने बोलने का प्रयत्न किया था,  होठ हिले थे, पर शब्द बाहर नहीं आ पा रहे थे।   कोई मरणासन्न व्यक्ति जैसे कुछ कहने का प्रयत्न करें और उसकी आवाज एक अस्पष्ट फुसफूसाहट बनकर रह जाए और बहुत ध्यान देने पर कुछ समझ में आए वैसे ही उसने कहा था - मैं लंछिता हूँ !  पतिता हूं !  उसने राम के सिर को अपनी दुर्बल अंगुलियों से कुछ इस तरह छुआ था, जैसे उठाने का प्रयत्न कर रही हो !
                                               और फिर वही शब्द 'पतिता  ' .. आप पतित नहीं हो सकती मां , जो पतित होते हैं,  वह अपने जघन्य कृत्य पर भी अपने को पतित नहीं कहते।  वह अपने पापों  को लेकर गर्व करते हैं , उनकी चेतना अहंकार से इतनी मलिन हो चुकी होती है , कि वे अपने पातकों को समझ ही नहीं पाते।  जिनमें पतित होने का बोध है,  जो उन अहंकारियों द्वारा पातिकी कहीं जाते हैं।  वे या तो अज्ञान अपज्ञान या व्यवस्था के कारण उनके ही पापों और पातकों का बोझ धोने को बाध्य कर दिए जाते हैं । राम ने प्रतिवाद करते हुए कहा था ।
                                             अहिल्या की समझ में कुछ नहीं आ रहा था।   वह केवल आश्चर्य से राम को निहार रही थी राम ने कुछ स्पष्ट स्वर में एक एक शब्द पर रुकते हुए और एक एक शब्द का स्पष्ट उच्चारण करते हुए फिर कहा  " तुम पतित नहीं हो मां तुमने दूसरों के पातक का प्रक्षालन अपनी पीड़ा और यात्रा से किया है । जैसे मां अपनी गोद के बच्चों की मल का प्रक्षालन करती है । हाँ मां, अपने समस्त अहंकार के बावजूद पुरुष जाति स्त्री के सम्मुख एक शिशु ही बना रह जाता है अपनी धात्री और पोषिका को ही दूषित और मलिन करके किलकारियां भरने वाले शिशु से अधिक क्या है वह "
तुम्हारी बातें मेरी समझ में नहीं आती अहिल्या ने दुर्बल और कांपते हुए स्वर में कहा था।  उसकी समझ में कुछ तो आ ही रहा था,  अन्यथा वाणी में यह परिवर्तन कहां से आता । उसके नकार में भी आत्मविश्वास कहां से लौटता ।  ' कुछ समझ में नहीं आता बेटा" बेटा शब्द का उच्चारण उसने इतने विलगित होकर किया था ,कि अपना संयम ना खोने वाले राम की भी आंखें भर आई थी ।
आततायी  होते हैं मां ,जो दूसरों को कुचलकर अकेले ऊपर उठना चाहते हैं ,सिर तान कर शिखर बनना चाहते हैं।  मैंने शिखरों को भूचाल तो दूर मात्र मेह से खिसकते और लुढकते देखा है । पर्वतों को अपने अहंकार के दरबार से बिना किसी बाहरी ठोकर या आघात के चूर चूर होते देखा है । लेकिन मैंने धरती को द्रवित होकर बहते तो देखा है, पर पतित होते नहीं देखा । स्त्री तो जननी होती है ! वह तो धरती होती है !  मां वह पतित नहीं हो सकती !  पतितो को भी वही संभालती है और वहीं संभाल सकती है । यदि वह पतित होगी तो उसे कौन संभालेगा । राम ने अपने संयत पर कोमल स्वर में कहा था । उस समय वृद्धा के मुख पर हो रहे भाव परिवर्तन को देखकर आश्चर्य हो रहा था उसमें एक ऐसी प्राणशक्ति आ गई थी मानो कोई सूखी लता वर्षा की झड़ी से एक ही क्षण में हरी हो गई हो ।

तुम कौन हो ? कौन हो तुम ? उसने अपने आंतरिक आह्लाद को दबाते हुए भर आई सी आवाज में कहा था । " तुम मनुष्य नहीं हो सकते " नहीं तुम मनुष्य नहीं हो सकते , तुम भगवान हो । तुम पतित पावन भगवान हो , पतितों को भी पवित्र मानने वाले, उपेक्षित और वंचितों को उनका लूटा हुआ सौभाग्य और गौरव दिलाने वाले अवतार हो तुम " वह बढ़कर राम के चरणों में लिपट गई और फूट-फूट कर रोने लगी थी राम बार-बार उठो मां ! उठो देवी !  कहकर बुला रहे थे ! 

मां गंगा की लहरें शांत हो चली थी , इधर मेरा मन अशांत हो चला था , आँखों से अविरल धारा बह रही थी  ......
( क्रमशः अगले भाग में जारी )
चित्रकला - अलका दास 


रविवार, 3 जून 2018

संघर्षो का अनुपम नगर : बक्सर (गंगा जी कहिन - 1 )

जैसा कि आप जानते है , नदियों से बात करना मुझे हमेशा से ही अच्छा लगता है, क्योंकि नदियां ही हैं, जिनसे आप बहुत कुछ जान सकते हैं, समझ सकते हैं, पहचान सकते हैं । नदियों किनारे ही मनुष्य की सभ्यता और संस्कृति न केवल जन्मी बल्कि पल्लवित-पुष्पित होकर आज के आधुनिक स्वरुप में भी आई । इससे पहले आपने ओरछा में मां वेत्रवती से मेरा संवाद ओरछा गाथा के रूप में पढ़ा ही होगा ,जिन्होंने नहीं पढ़ा वह इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं ।
                                              आज मैं आपको भारत की सबसे प्रसिद्ध और पतित पावनी मां गंगा से हुए अपने संवाद से रूबरू कराऊंगा । मां गंगा के बारे में बताने की आवश्यकता तो है ही नहीं ! क्योंकि शायद ही कोई भारतीय होगा जो गंगा से परिचित नहीं होगा । उत्तर भारत की जीवन रेखा और संपूर्ण भारत की सांस्कृतिक ध्वजा देवनदी गंगा के किनारे जन्म लेने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ । मध्य बिहार के उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे हुए एक गांव गोप भरौली में मेरा जन्म हुआ जिसका जिला मुख्यालय बक्सर है । कुछ वर्ष पूर्व अपने गृह प्रवास के दौरान बक्सर के रामरेखा घाट जाने का अवसर प्राप्त हुआ और उसी दौरान मां गंगा से एकांत में कुछ बातें हुई । उसी संवाद को आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूं और उम्मीद ही नहीं पूरा विश्वास है कि आप बेतवा की जुबानी  ओरछा की कहानी  की तरह इस संवाद को भी पसंद करेंगे ।
                                       कुछ साल पहले की बात है मेरे रिश्तेदारी में  एक बच्चे का मुंडन होना था, जो बक्सर के रामरेखा घाट गंगा तट पर निश्चित था । परंतु मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं था, शरीर ज्वर से पीड़ित था और तन का तापमान बढ़ा हुआ था । परंतु जब सब घर वाले वहां जा रहे थे तो मैं अकेला घर पर रहकर करता भी क्या इसलिए बेमन से ही मैं सबके साथ चल पड़ा । अब बीमारी की हालत में मुंडन कार्यक्रम में मेरी कोई रूचि तो नही थी, इसलिए रामरेखा घाट पर एक किनारे पर एक खाली मचान पर मैं बैठ गया । घर परिवार के सदस्य और रिश्तेदार मुंडन कार्यक्रम में व्यस्त हो गए । इधर मैं अनवरत गंगा की लहरों को देख रहा था, गंगा के विशाल पाट में  लहरें समुद्र का अहसास दे रही थी । इन लहरों की तरफ न जाने क्यों मैं सम्मोहित सा एकटक देख रहा था । लहरों का सम्मोहन इतना था कि मेरे आस-पास हो रहे शोरगुल से भी मैं बिल्कुल अनजान बना बैठा था । सूर्यनारायण अपनी मध्य अवस्था में तेजी से चमक रहे थे और सूर्य की किरणें गंगा जल में उछल-कूद कर रही थी । इस शोरगुल के बीच भी न जाने क्यों मुझे एक असीम शांति का अनुभव हो रहा था।  एक तरफ गंगा की लहरें बक्सर के किले के प्राचीर से टकरा कर लौट रही थी तो दूसरी तरफ लहरें अनंत की ओर जाने के प्रयास में थी । लहरों की तरफ देखते देखते अचानक मेरी आंखो के सामने अंधेरा सा छाने लगा और भरी दोपहरी में जो ना सोचा था वह हुआ ।
 एक अति मधुर तुम ध्वनि गंगा की लहरों से गूंजी , कैसे हो पुत्र ? जब मैंने चारों तरफ देखा तो आवाज लहरों की तरफ से आ रही थी और लहरों में एक नारी की आकृति बन रही थी । सूर्य की किरणों के कारण उस आकृति में एक दिव्यता का अद्भुत अनुभव हो रहा था । मेरे आश्चर्य मिश्रित भाव को देख कर तो यह आवाज आई कि वक्त घबराने की बात नहीं मैं गंगा हूं !
गंगा ?
हां मैं गंगा नदी हूं !
सचमुच ?
हां बस मैं सचमुच वही गंगा हूं जो ब्रह्मा के कमंडल से विष्णु के चरणों से होते हुए स्वर्ग में प्रवाहित हुई और भागीरथ के प्रयास से शिव की जटाओं से होते हुए इस पृथ्वी पर अवतरित हुई ।
क्या मैं सपना देख रहा हूं ?
नहीं पुत्र, तुम कोई सपना नहीं देख रहे बल्कि मैं स्वयं तुम से वार्तालाप करने के लिए उपस्थित हुई हूं !
अहोभाग्य मेरे जो आपने मुझ जैसे अधम पातक को वार्तालाप के लिए चुना !
ना पुत्र तुम अधम पातक नहीं हो मेरे स्पर्श के पश्चात तो बड़े-बड़े पापी भी पुण्यात्मा हो जाते हैं । और तुमसे तो साक्षात्कार करने का निर्णय मैंने स्वयं लिया है ।
मेरी खुशी की सीमा नहीं थी, क्योंकि स्वयं देवनदी पतित पावनी मां गंगा मुझसे साक्षात्कार कर रही थी । मां गंगा को मैंने दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया ।
तभी बक्सर किले की प्राचीर से टकराकर एक लहर कुछ जल बिंदुओं को लेकर मेरे ऊपर से गुजरी मानो स्वयं मां गंगा अपना आशीर्वाद दे रही हो ।
मां गंगा से मेरी बातचीत करने की बहुत पुरानी इच्छा थी, जो आज पूरी हो रही थी और मेरे मन में न जाने कितने विषय और प्रश्न थे जो मुझे मां गंगा से पूछने थे परंतु आज बक्सर किले के प्राचीर को देखकर मेरे मन में इस शहर के इतिहास उत्थान पतन के बारे में उत्सुकता थी ।
मां गंगा  को हाथ जोड़े जोड़े ही मैंने पूछा - क्या आप मुझे इस बक्सर शहर की गाथा सुनाएंगी ?
मां गंगा मंद मंद मुस्कुरा आई और बोली क्यों नहीं इस नगर को दो मैंने बड़ी करीब से देखा है बड़ा ही संघर्ष किया है इस नगर ने...

संघर्ष !! क्या शहर भी संघर्ष करते हैं ?

बिल्कुल पुत्र शहर जन्मते हैं बढ़ते हैं और मरते भी हैं उनमें भी जीवन होता है इसलिए वह संघर्ष भी करते हैं ।

तो फिर मुझे सुनाइए ना इस बक्सर शहर की जन्म गाथा से लेकर संघर्ष गाथा तक..

मां गंगा की लहरों में थोड़ा सा ठहराव  आ गया ,  जैसे वह इतिहास में गोता लगाने गई हो और मेरे लिए बक्सर के संघर्ष की गाथा साथ लेकर लौटने वाली हो ।

कुछ देर की शांति पश्चात लहरों से पुनः आवाज़ को गूंजी ! बक्सर को अलग अलग समय मे वेदगर्भपुरी , करूष , तपोवन, चैत्रथ, व्याघ्रसर और सिद्धाश्रम के नाम से जाना गया है । बक्सर के इतिहास के लिए हमें वैदिक काल की तरफ चलना होगा । वैदिक काल में इस स्थान पर बहुत ही घना जंगल होता था और उस जंगल में बाघों का निवास हुआ करता था । जंगल के बीचो-बीच एक बहुत बड़ा सरोवर भी था जहां बाघ पानी पीने आते थे । इसी कारण उस सरोवर का नाम व्याघ्र सर पड़ा । और व्याघ्रसर ही आगे चलकर बक्सर में रूपांतरित हुआ ।

लेकिन माते, जिस सरोवर के नाम पर बक्सर का नामकरण हुआ , वो वर्तमान में कहां गया ?

पुत्र,  वर्तमान रेलवे स्टेशन के पास जो कमलदह पोखरा है, वही कभी व्याघ्रसर सरोवर था । आज वह अतिक्रमण की भेंट में सिकुड़ गया है । व्याघ्रसर में बाघों के अलावा उस जंगल में मेरे तट पर 80,00 ऋषि मुनियों के आश्रम भी थे, जहां पर वह वेद पाठ और यज्ञ हवन आदि भी करते थे । कई वेद मंत्रों के रचयिताओं के आश्रम होने के कारण इस स्थान को वेद गर्भ भी कहा जाता था । इस क्षेत्र के आसपास ही महर्षि विश्वामित्र, गौतम ऋषि, भृगु ऋषि और उनके शिष्य दर्दर ऋषि आदि के प्रसिद्ध आश्रम थे । वर्तमान चरितर वन क्षेत्र में विश्वामित्र ऋषि का आश्रम था जबकि गंगा के दूसरे तट पर अहिरौली गांव में गौतम ऋषि का आश्रम था । नदांव ग्राम में नारद मुनि का आश्रम था , वर्तमान बलिया मैं भृगु ऋषि और उनके शिष्य )दर्दर ऋषि का भी आश्रम था । बक्सर को पुराणों में अनेक नामों से जाना गया है ।
वराह पुराण में लिखा है-
कृते सिद्धाश्रम प्रोक्तः त्रेतायां वामनाश्रमः ।
द्वापरे वेद गर्भेति कलौ व्याघ्रसयः स्मृतम ।।
कृते चैत्र स्थम प्रोक्तः त्रेतायां लटकाश्रम ।
द्वापरे चरितं नाम कलौवनं चरित्रकम ।।

ब्रह्म पुराण में कहा गया है-
महात्म्य वेदगर्भया वक्तं, कोहि क्षमो भवेत ।
यदि वर्ष सहस्रेण ब्रम्हा वक्तं, न शक्यते ।।
 त्रेता युग आते आते इस पुण्यभूमि पर राक्षसों का प्रवेश हुआ और ताड़का, मारीच और सुबाहु के आतंक से यह पूरा क्षेत्र परेशान हो गया । राजा से ऋषि बने राजर्षि विश्व मित्र अयोध्या नरेश दशरथ जी के यहां पहुंचे और उन्होंने अपनी व्यथा सुनाई कि इन राक्षसों के कारण वह यज्ञ हवन आदि कार्य नहीं कर पा रहे हैं । और राक्षसों से मुक्ति के लिए उन्होंने महाराज दशरथ से उनके यशस्वी पुत्र राम और लक्ष्मण को मांगा । कुलगुरु वशिष्ठ जी की आज्ञा के पश्चात बड़ी मुश्किल से महाराज दशरथ ने राजर्षी विश्वामित्र के साथ अपने प्रिय पुत्रों को भेजा । जहां विश्वामित्र जी ने न केवल राम और लक्ष्मण को शिक्षा दी बल्कि उन्हें युद्ध विद्या पर भी पारंगत किया । जब भगवान राम और लक्ष्मण महर्षि विश्वामित्र के आश्रम में शिक्षा प्राप्त कर रहे थे तो प्रतिदिन देखते कि ब्रह्म मुहूर्त के पूर्व ही अंधेरे में गुरुजी निकलकर गायब हो जाते और सूर्य उदय के पश्चात लौटते थे । एक दिन भगवान राम ने आखिरकार गुरु विश्वामित्र से पूछ ही लिया कि इतने अंधेरे में गुरु जी आप प्रतिदिन किधर जाते हैं ?
तब गुरु विश्वामित्र ने उत्तर देते हुए कहा कि वह प्रतिदिन गंगा स्नान करने काशी जाते हैं ।
काशी ! गंगा तो हमारे निकट से ही प्रवाहित होती है तब आपको स्नान करने इतनी दूर काशी क्यों जाना पड़ता है ?
वत्स काशी में गंगा उत्तरवाहिनी है जिसका अधिक पुण्य प्राप्त होता है इसलिए मैं प्रतिदिन गंगा स्नान काशी में ही करता हूं ।
भगवान राम बोले कि सिर्फ उत्तरवाहिनी गंगा के कारण आपको इतना परिश्रम करना पड़ता है तो गुरुदेव आज से आपको काशी जाने की आवश्यकता नहीं है । इतना कहकर भगवान राम ने अपने तरकश से एक बार निकाला और गंगा के पास एक रेखा खींची जिसके कारण गंगा यानी मैं बक्सर में भी उत्तरवाहिनी हो गई और तब से लेकर आज तक लोग उस तट को रामरेखा घाट के नाम से जानते हैं । आज ही यह घाट एक तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध है और दूर-दूर से लोग यहां पर गंगा स्नान करने, मुंडन इत्यादि कर्म करने भी आते हैं ।
                                                        गुरु विश्वामित्र के नित्य नियम हवन में राक्षसी ताड़का और उसके भाई मारीच और सुबाहु विघ्न डालते थे। ताड़का लंकाधिपति रावण की मौसी थी , और उस समय रावण पृथ्वी ही नहीं तीनों लोको में अपराजित था , अतः कोई भी शासक ताड़का और उसके भाइयों को रोकने में डरते थे। विश्वामित्र आदि ऋषि भी इनसे अत्यंत पीड़ित थे , इन राक्षसों के उत्पीड़न से बचने ही तो विश्वमित्र जी अयोध्या नरेश दशरथ जी के दोनों सुपुत्रों को अपने आश्रम लेकर आये थे।  एक दिन गुरुदेव विश्वमित्र जब अपने यज्ञ कर्म में लीन थे, तभी ताड़का अपने दोनों भाइयों के साथ विश्वामित्र आश्रम आ गयी और उत्पात करने लगी , तब विश्वामित्र जी के आदेशानुसार भगवान राम ने ताड़का और सुबाहु का वध किया जबकि मारीचि को अपने एक बाण से दूर समुद्र तट पर फेंक दिया । कहते हैं कि ताड़का के मरने पर उससे इतना अधिक रक्त प्रवाह हुआ कि एक नाला बन गया जिसे आज भी ताड़का नाला कहा जाता है । आगे चलकर यही मारीचि स्वर्ण मृग बना और सीता का रावण  अपहरण किया।  दुःख की बात है , कि  वर्तमान में विश्वमित्र आश्रम की हालत जीर्ण-शीर्ण हो गयी है। इस तरह भगवान राम ने इस पुण्य भूमि से ही असुर संहार कार्यक्रम की शुरुआत की । बक्सर से ही जब गुरु विश्वामित्र मुझे (गंगा को ) पारकर मिथिला में आयोजित धनुष यज्ञ को दिखाने राम और लक्ष्मण को लेकर जा रहे थे तो रास्ते में गौतम ऋषि का आश्रम पड़ा और वहां पर उनकी पत्नी अहिल्या पत्थर की शिला बनी पड़ी थी ।
कहानी में विघ्न डालते हुए मैंने मा गंगा से प्रश्न किया कि आखिर ऐसा क्या हुआ था कि गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या को पत्थर की शिला बनना पड़ा ?
(क्रमशः जारी )
बक्सर रेलवे स्टेशन पर लगा विश्वमित्र जी म्यूरल 
दिल्ली -हावड़ा लाइन पर बक्सर रेलवे स्टेशन 
जिन स्थानों पर भगवान श्रीराम के चरण पड़े 
अहिरौली का गंगा घाट 
नमामि गंगे 
रामरेखा घाट ( चित्र गूगल से साभार )
बक्सर किले की एक पुरानी पेंटिंग ( साभार -बक्सर प्रशासन )

रविवार, 25 फ़रवरी 2018

नालंदा :प्राचीन भारतीय ज्ञान के खण्डहरों का अद्भुत अनुभव



जैसा कि आप सभी ने पिछली पोस्ट में पढ़ा कि कैसे मैं और मेरे बड़े साले ध्रुव राजगीर घूम चुके थे और अपनी बाइक से अब नालंदा की ओर चल पड़े थे । नालंदा अपने आप में एक बहुत बड़ा नाम है जो भारत ही नहीं बल्कि पूरे एशिया में एक समय अपने उच्चकोटि ज्ञान की वजह से विख्यात था । हमारी बाइक के पहियों के साथ कालचक्र भी घूम रहा था और मैं अलग ही कल्पना लोक में विचरण करने लगा ।
                                       दिल्ली में अलाउद्दीन खिलजी अपने चाचा और ससुर जलालुद्दीन की हत्या कर सल्तनत की गद्दी पर बैठ चुका था, और उसके कारिंदे पूरे भारत को रौंदने के लिए अलग-अलग दिशा में निकल चुके थे । उन्हीं में से एक कारिंदा दोआब के क्षेत्र से होते हुए गंगा पार करके नालंदा की ओर बढ़ रहा था । बख्तियार खिलजी ! जी हां उस दरिंदे का यही नाम था, जो बंगाल की ओर बढ़ते हुए रास्ते में पड़ने वाले तमाम गांव-शहरों और मंदिरों को न केवल लूटते हुए आ रहा था ,बल्कि लूटने के बाद उन्हें तहस-नहस कर के उनमें आग भी लगा रहा था । बख्तियार खिलजी कि इस लूटपाट की खबर जब नालंदा बौद्ध बिहार के प्रमुख आचार्य के पास पहुंची तो उनके मन में किसी भी प्रकार की घबराहट या बेचैनी नहीं थी, वह निर्विकार रूप से शांत भाव में थे । तभी आचार्य को प्रणाम कर द्वारपाल ने अपनी शंका व्यक्त की। कि आचार्य ! लोग बता रहे हैं बख्तियार बहुत ही नृशंस और अमानवीय तरीके से गांव और नगरों को नष्ट करता आ रहा है । तभी एक अन्य आचार्य  ने कहा- लेकिन उससे हमें भयभीत होने की क्या आवश्यकता ?  हमारे पास तो स्वर्ण भंडार नहीं है, बस ज्ञान भंडार ही है ! हमारे महाविहार को लूटने से उसे कुछ नहीं मिलेगा ।
                                   अब प्रमुख आचार्य मैं अपना मौन तोड़ा और बोले- आचार्य श्री, इन मुस्लिम आक्रांताओं को सैन्य बल से उतना भय नहीं लगता, जितना कि ज्ञान बल से लगता है । यह सैन्य बलों से तो किसी भी तरीके से निपट सकते हैं, परंतु ज्ञान से लड़ने की क्षमता इनमे नहीं है । यह शस्त्र से तो युद्ध कर सकते हैं परंतु शास्त्र से भयभीत रहते हैं । इन का उद्देश्य सिर्फ लूटपाट करना ही नहीं बल्कि अपने धर्म का प्रसार करना भी है । और इनके धर्म के प्रसार में कहीं भी शस्त्र बाधा नहीं बनी जहां भी इन्हें रुकावटें मिली वहां शास्त्र ने ही उन्हें रोका । इसलिए हमारा नालंदा बौद्ध विहार इनके लिए एक महाकाय शत्रु के समान है । तभी इन्हें गांव से दूर की तरफ धूल भरी आंधी नजर आई, जो इस बात का संकेत थी कि बख्तियार खिलजी की सेनाएं नालंदा की सीमा पर पहुंच चुकी है । और पहुंचते ही उन्होंने मारकाट लूटपाट  करना शुरू किया । अहिंसा के उपदेशक और बुद्ध के अनुयाई अपनी कलम से तलवारों से मुकाबला ना कर सके और ज्ञान का यह विश्वविद्यालय धूल धूसरित हो गया । महाविहार के पुस्तकालय में आग लगा दी गई और हजारों बहुमूल्य ग्रंथ धू-धूकर कर जल उठे । चारों तरफ करुण क्रंदन होने लगा नर-नारी ही नहीं अब इतिहास भी रो रहा था ।
                                           ध्रुव के ब्रेक लगाते ही मैं कल्पना लोक से बाहर आया तो देखा सामने ही उस महान नालंदा विश्वविद्यालय की खंडहर खड़े थे ।नालंदा को यूनेस्को ने वर्ष 2016  में विश्व धरोहरों की सूची में शामिल किया । इस तरह से बिहार में महाबोधि मंदिर बोधगया के पश्चात नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहर यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल होने वाले स्थानों में दूसरा है । सड़क के दोनों तरफ दो बड़े गेट लगे हुए हैं एक तरफ का गेट नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहरों की ओर ले जाता है तो दूसरी तरफ का गेट टिकट काउंटर और नालंदा संग्रहालय की ओर ले जाता है । गर्मी अपने चरम पर थी चटक धूप निकली हुई थी और हमारा शरीर पसीने से तरबतर था । टिकट काउंटर से टिकट लेकर हम नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहरों की तरफ बढ़ चले । सामने एक सूचना शिलालेख ने हमारा स्वागत किया । इस शिलालेख के अनुसार छठी शताब्दी ईसापूर्व में भगवान महावीर एवं बुद्ध के काल से ही नालंदा की ऐतिहासिकता के प्रमाण प्राप्त होते हैं बुद्ध के परम प्रिय शिष्यों में से एक सारी पुत्र के जन्म एवं निर्माण के रूप में भी इसे जाना जाता है । प्राच्य कला एवं संस्कृति के विख्यात शिक्षा संस्थान व महाविहार के रूप में इसकी पहचान पांचवी सदी में स्थापित हुई जब चीन सहित अनेक सुदूरवर्ती देशों से बौद्ध भिक्षु ज्ञानार्जन हेतु यहां आते थे । इस संस्थान से जुड़े विद्वानों में नागार्जुन, आर्य देव ,वसुबंधु ,धर्मपाल ,सुविष्णु , असंग ,शीलभद्र ,धर्मकीर्ति ,शांति रक्षित इत्यादि प्रमुख है। इसके अतिरिक्त प्रसिद्ध चीनी यात्रियों में ह्वेनसांग एवं इत्सिंग के नाम उल्लेखनीय है । जिन्होंने अपने यात्रा वृतांतो  में नालंदा के महाविहारों , मंदिरों तथा भिक्षुओं की जीवनचर्या आदि का विशेष वर्णन किया है । धर्मशास्त्र ,व्याकरण ,तर्कशास्त्र ,खगोलिकी ,तत्वज्ञान ,चिकित्सा एवं दर्शनशास्त्र आदि इस शिक्षा केंद्र में अध्ययन के प्रमुख विषय थे । अभिलेखीय प्रमाणों के अनुसार समकालीन शासकों द्वारा दान किए गए अनेक ग्रामों के राजस्व से इन महाविहारों का व्यय  वहन किया जाता था ।
                                                              प्राचीन युग के एक महानतम विश्वविद्यालय के रूप में प्रतिष्ठित नालंदा महाविहार की स्थापना गुप्त सम्राट कुमारगुप्त प्रथम (413-455 ई0) के शासनकाल में की गई थी । कन्नौज नरेश हर्षवर्धन(606-647 ई0)  व पूर्वी भारत के पाल शासकों ( 8 वी -12 वी सदी) के समय में भी महाविहारों को राज्य पर से अनवरत प्राप्त होता रहा । भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा कराए गए उत्खनन (1915-37 तथा 1974-82) से यहां ईट निर्मित 6 मंदिरों एवं 11 विहारों की सुनियोजित श्रंखला अनावृत हुई जिसका विस्तार लगभग 1 वर्ग किलोमीटर से भी अधिक है । लगभग 30 मीटर चौड़े उत्तर दक्षिण पथ के पश्चिम में मंदिरों की एवं पूर्व में विहारों की श्रंखला है । आकार एवं विन्यास में सभी विहार लगभग एक जैसे हैं । सर्वाधिक महत्वपूर्ण संरचना दक्षिणी छोर पर स्थित मंदिर संख्या 3 है ,जिसमें निर्माण के सात चरण है । इस के निकट छोटे छोटे आकार के मनौती स्तूपों का एक विशाल समूह है । महा विहारों एवं मंदिरों के भग्नावशेषों के साथ-साथ प्रस्तर (पत्थर), कांस्य (कांसा) स्टको मैं निर्मित अनेक मूर्तियां तथा कलाकृतियों उत्खनन से प्राप्त हुई हैं । इनमें विभिन्न मुद्राओं में बुद्ध ,अवलोकितेश्वर ,मंजूश्री ,तारा ,प्रज्ञापारमिता ,मारीचि ,जंभल आदि बौद्ध प्रतिमा है तथा विष्णु ,शिव-पार्वती ,महिषासुर-मर्दिनी, गणेश ,सूर्य इत्यादि हिंदू देव प्रतिमाएं प्रमुख हैं । इसके अतिरिक्त भित्तिचित्र ,ताम्र-पत्र, प्रस्तर और ईटों पर उत्कीर्ण अभिलेख मुद्राएं ,फलक ,सिक्के ,टेराकोटा ,मृदभांड आदि की प्राप्ति हुई है । इन सभी कलाकृतियों एवं पूरा वस्तुओं को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संचालित स्थानीय संग्रहालय में दर्शकों के लिए प्रदर्शित किया गया है ।
                                                     इस सूचना शिलालेख से जानकारी पढ़ने के पश्चात हम दोनों खंडहरों की ओर चल दिए । जहां हमारे टिकट चेक किए गए उसके बाद हमें प्रवेश दिया गया । गर्मी धीरे-धीरे बहुत तेज हो रही थी इसलिए हमने खंडहरों में प्रवेश करने के साथ ही एक पेड़ की छाया के नीचे कुछ देर सुस्ताने का निर्णय लिया । ऊपर नीले आसमान में छोटे-छोटे सफेद बादल बहुत ही मनोहारी दृश्य उत्पन्न कर रहे थे, परंतु नीचे आग बरस रही थी । कभी हमारे पास यहां माली का काम करने वाले एक सज्जन आए और बोले गाइड की जरूरत है । अब शक्ल और सूरत से लग तो नहीं रहा था कि वह हमें गाइड कर पाएंगे । परंतु हमने उनका पारिश्रमिक पूछा तो बोले वैसे तो ₹300 गाइड लेते हैं पर आप लोग ₹100 ही दे देना । मैंने सोचा यूं ही खाली भटकने से इन खंडहरों में कुछ समझ में तो आएगा नहीं, इससे अच्छा इन्हें ही साथ रख लिया जाए । तो उन सज्जन के सामने एक शर्त रखी कि अगर हमें वाकई उन्होंने ढंग से गाइड किया तभी पैसे देंगे ।
                                                                                                            अब हम चल पड़े उनके साथ विहार संख्या-1 की ओर । भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा नालंदा में उत्खनन कार्य का प्रारंभ इसी विहार से किया गया था और यह यहां स्थित सभी विभागों में सबसे महत्वपूर्ण विहार भी है । यहां से मुद्राएं ,पाषाण अभिलेख ,ताम्र पत्र इत्यादि अनेक पुरा वस्तुओं के साथ-साथ 9 चरणों में निर्मित एक विशाल विहार भी उत्खनित हुआ जो दो काल खंडों का प्रतिनिधित्व करता है । मूलतः इस विहार का निर्माण छठवीं सातवीं सदी में हुआ है तथा इसका पुनर्निर्माण नालंदा के पतन के दिनों तक अनवरत चलता रहा । इस के प्रांगण में एक छोटा सा मंदिर है जो गुप्त कालीन है ,जबकि उसके निकट ही दूसरा चौकोर मंदिर और उसकी दीवार से सटा गजपृष्टकार (हाथी की पीठ के आकार का) छत एवं डॉट द्वार से युक्त दो कोठियों को जोड़ा गया है ।  यहां से प्राप्त एक ताम्रपत्र के अनुसार नीचे वाला विहार तृतीय पाल वंश के शासक देवपाल के शासनकाल (810-850 ) में सुमात्रा के एक नरेश ने बनवाया था । विहार में अवस्थित सीढ़ी से यह प्रतीत होता है कि यह विहार कम से कम 2 मंजिला अवश्य रहा होगा । विहार में ऊपरी स्तर पर 34 कक्ष बने थे जिनमें कुछ में भिक्षुओं के विश्राम हेतु शैया एवं पुस्तक और सामग्री रखने के लिए कोनो में अलमारी का भी प्रावधान था । विहार की दीवारों से अग्नि द्वारा नालंदा महाविहार के विध्वंस के प्रमाण भी प्राप्त होते हैं जहां आज भी जली हुई दिखाई देती हैं ।
                                                                                                          हमारे गाइड महोदय हमें विद्यार्थियों के कक्ष की ओर ले गए जिनके दरवाजे के सामने नालियां बनी हुई थी । मैं खंडहरों की फोटो लेने में मशगूल था और गाइड महोदय नालियों की तरफ इशारा करके हमारे साले साहब को बता रहे थे कि यहां डाइनिंग सिस्टम था । डाइनिंग सिस्टम सुन कर मेरे कान खड़े हुए और जब मैंने देखा तो गाइड साहब नालियों की तरफ इशारा कर रहे थे । यह देख कर मुझे उनके आंग्लभाषा ज्ञान पर हंसी आई । और मैंने उनकी गलती को सुधारा और बताया कि यह डाइनिंग सिस्टम नहीं ड्रेनेज सिस्टम कहलाता है । हमारे गाइड महोदय हमें अन्य विहारों स्तूपों ,पूजा ग्रहों, छात्रावासों को दिखाते हुए उनकी व्याख्या कर रहे थे । क्योंकि हम भी इतिहास के अध्ययेता रहे हैं ,इसलिए बीच-बीच में उनकी कमियों को सुधार कर उन्हें बता रहे थे । एक तरफ छोटे बड़े कई स्तूप बने हुए थे । स्तूप बौद्ध धर्म में किसी भी व्यक्ति के मृत्यु पश्चात स्मारक स्वरूप बनाए जाते हैं । कई स्तूपों में संबंधित व्यक्ति के अस्थि अवशेष भी रखे होते हैं । यहां बने स्तूपों में बड़े स्तूप विश्वविद्यालय के आचार्यों के और छोटे स्तूप विद्यार्थियों के स्मारक थे । उस समय महामारियां भी फैलती थी जिसके कारण कई बार विद्यार्थी कम उम्र में ही काल कवलित हो जाते थे । और उनके अंतिम संस्कार के लिए उनके घर वालों को सूचना बहुत देर से मिलती थी । इसलिए उन्हें यहीं पर अंतिम विदाई दी जाती थी । चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी आत्मकथा सी-यू-की में नालंदा विश्वविद्यालय के बारे में विस्तार से वर्णन किया है । नालंदा विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए भी प्रवेश परीक्षा ली  जाती थी । विश्वविद्यालय के द्वारपाल  भी इतने विद्वान होते थे, कि सबसे पहले विद्यार्थियों का परीक्षण उन्हीं द्वारपालों के माध्यम से किया जाता था । जब विद्यार्थी उन द्वारपालों के प्रश्नों के उत्तर सही दे पाते तभी उन्हें अगले स्तर के परीक्षण से गुजरना पड़ता । इस तरह नालंदा विश्वविद्यालय में दूर-दूर देशों से भी विद्यार्थी आते और ज्ञान प्राप्त करते । हमारे गाइड महोदय ने छात्रावास के एक कक्ष को ह्वेनसांग का कक्ष बताया । जब हमने कहा कि हम क्यों माने कि यह ह्वेनसांग का ही कक्ष है । तो उनका जवाब था कि अधिकांश चीनी पर्यटक इस कक्ष में अवश्य आते हैं और पूजा पाठ करते हैं । शायद ह्वेनसांग ने अपनी आत्मकथा में अपने कक्ष की स्थिति का वर्णन किया होगा,  जिससे वर्तमान में पर्यटकों को अंदाजा होगा कि उनका कक्ष किस तरफ था । हमारे पास इसे ना मानने का कोई कारण नहीं था तो हम उसे ह्वेनसांग का कक्ष मानकर आगे बढ़ चले । 
                                                                                     विश्वविद्यालय में बहुत बड़े-बड़े भांडागार भी थे जहां पर विश्वविद्यालय के शिक्षकों और छात्रों के लिए अनाज सुरक्षित रखा जाता था । हमारे गाइड महोदय ने हमें उस समय के चूल्हे भी दिखाएं, जो आज की तरह नहीं लेकिन बनावट में विशेष आकार के थे । विश्वविद्यालय परिसर में ही अष्टकोणीय कुए का भी दर्शन हमने किया जिसे आज लोहे की जाली से ढक दिया गया है । अब दिन ढलने लगा था और हमने भी फोटोग्राफी करने के पश्चात वापस लौटने का निर्णय लिया क्योंकि इसके पश्चात हमें संग्रहालय भी देखना था और बाइक से गया भी लौटना था । हमारे गाइड साहब की जिन गलतियों का हमने सुधार किया उन्हें उन्होंने दोबारा पूछ कर अपनी पॉकेट डायरी में नोट किया । जब हम उन्हें उनका पारिश्रमिक देने लगे तो उन्होंने विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़ लिए अब बोलें आप से मुझे भी बहुत कुछ सीखने मिला हम आपसे पैसे नहीं ले सकते । काफी मान-मनौव्वल करने के पश्चात भी जब उन्होंने हम से पैसे नहीं लिए तो हम भी उन से हाथ मिला कर निकल पड़े संग्रहालय की ओर । सड़क पर आकर हमने अनानास का जूस पिया उसके पश्चात संग्रहालय गए । संग्रहालय में नालंदा विश्वविद्यालय और आसपास के क्षेत्रों से उत्खनित वस्तुएं प्रदर्शन के लिए रखी थी । यहां पर फोटोग्राफी प्रतिबंधित थी इसलिए हमने संग्रहालय के भीतर कोई भी फोटो नहीं खींची । मुझे यह बात समझ में नहीं आती कि संग्रहालयों में फोटोग्राफी प्रतिबंधित तो नहीं करनी चाहिए । फोटोग्राफी से उस काल की संस्कृति और सभ्यता का ज्ञान का प्रसार ही होगा । खैर अब हम वापस बाइक से गया की ओर निकल पड़े नालंदा को अपनी यादों में संजोकर । दिन ढलने के कारण पावापुरी नहीं जा सके जो भगवान महावीर से ना केवल जुड़ी है बल्कि जैन धर्म का एक बहुत ही महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है । 
- मुकेश पांडेय 'चँदन '
प्रवेश करते ही ASI का स्वागत 
नालंदा की जानकारी देता शिलापट्ट 
प्रवेश करते ही प्रथम दर्शन 
चटख धूप में नील आसमान में सुन्दर बादल 
हमारे गाइड महोदय हमें जानकारी देते हुए 
छात्रावास के कमरे 
छात्रावास के सामने डाइनिंग सिस्टम नहीं ड्रेनेज सिस्टम बना था।  
दूसरी मंजिल तक जाने के लिए सीढियाँ 
सभागृह का मंच 
यहाँ भगवान बुद्ध की मूर्ति स्थापित रही होगी 
एक कुंआ 
गज पृष्ठाकार छत 
पिरामिड के आकार की छत 
मनौती स्तूप 
एक विशेष प्रकार का चूल्हा 
मैं और ध्रुव स्तूप के अवशेषों के सामने 
यूनेस्को द्वारा घोषित विश्व विरासत स्थल का पटल 
संग्रहालय का प्रवेश द्वार 
इसी तरह का घंटा हमे राजगीर में भी मिला था।  
अप्प दीपो भव  (बुद्ध का अंतिम सन्देश ) के शुभ विदा 

मंगलवार, 23 जनवरी 2018

विश्वशांति स्तूप और सोनभंडार का रहस्य

पिछले भाग गया से राजगीर की राह में आपने पढ़ा कि हमारी यात्रा गया से किस तरह राजगीर के लिए शुरू हुई हम अपनी मोटरसाइकिल से राजगीर की सीमा पर स्थित प्रवेश द्वार तक पहुंच चुके थे । राजगीर यह नाम मैंने इतिहास कि किताबों में बहुत पढ़ा था । मगध राज्य के सबसे प्राचीन वंश का संस्थापक वृहद्रथ (महाभारत काल)  था , और इसकी राजधानी गिरिव्रज थी । चारों तरफ पर्वत या गिरी से घिरा होने के कारण इसका नामकरण गिरिव्रज हुआ । बृहद्रथ के पश्चात उसका पुत्र जरासंघ शासक बना । जरासंध के बारे में तो आपने कहां सुना ही होगा जरासंध की मृत्यु महाबली गदाधारी भीम के हाथों श्री कृष्ण के इशारों से हुई । जरासंध के बाद इस वैभव पूर्ण साम्राज्य के बारे में इतिहास मौन है । परंतु बौद्ध ग्रंथों के अनुसार 544 ईसा पूर्व में बिंबिसार ने हर्यक वंश की स्थापना की और मगध की गद्दी पर बैठे । बिंबिसार नहीं प्राचीन गिरी ब्रज को सुव्यवस्थित कार्यक्रम राजगृह नाम से अपनी राजधानी बनाया । बिंबिसार के समय महात्मा बुद्ध अपने धर्म का प्रचार प्रसार कर रहे थे और मगध के अंतर्गत ही बोधगया में उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी । अतः गौतम बुद्ध से प्रभावित होकर सम्राट बिंबिसार ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया । बिंबिसार के दरबार में उस समय के प्रसिद्ध राजवैद्य जीवक रहा करते थे, जिन्हें बिंबिसार ने महात्मा बुद्ध की सेवा में भी भेजा था । इसके अलावा अवंती के शासक प्रद्योत के पांडु रोग से ग्रसित होने पर राजवैध जीवक ने ही उन्हें निरोगी किया । सम्राट बिंबिसार ने अंग देश (वर्तमान में बिहार का भागलपुर क्षेत्र ) के शासक ब्रम्हदत्त को हराकर उसे मगध का हिस्सा बनाया । आज इतिहास में हम देखते हैं कि मुगल काल में मुगल बादशाह अकबर ने वैवाहिक संबंधों के आधार पर अपने साम्राज्य का विस्तार किया महारानी जोधा इसका एक उदाहरण है । परंतु यह परंपरा भारतीय शासकों में बहुत पहले के समय से ही चली आ रही है । सम्राट बिंबिसार ने वैवाहिक संबंध स्थापित कर कौशल (वर्तमान पूर्वी मध्य प्रदेश) नरेश प्रसेनजित की बहन महाकौशला से वैशाली (हाजीपुर क्षेत्र) नरेश चेतक की पुत्री क्षेमा से और मद्र प्रदेश (वर्तमान पंजाब ) की राजकुमारी क्षेमा से विवाह कर अपने मगध साम्राज्य का विस्तार किया । 52 वर्षों तक बिंबिसार ने मगध साम्राज्य की उत्तरोत्तर प्रगति की लेकिन उसके ही पुत्र अजातशत्रु ने अपने पिता बिंबिसार की हत्या कर गद्दी हथियाई । अजातशत्रु जैन धर्म को मानने वाला था परंतु उसके ही शासनकाल में गौतम बुद्ध की मृत्यु हुई और मृत्यु उपरांत बौद्ध धर्म की प्रथम संगीति 483 ईसा पूर्व में राजगृह में संपन्न हुई इसके अध्यक्ष महा कश्यप को बनाया गया । इस तरह देखा जाए तो बौद्ध धर्म के लिए राजगृह यानी वर्तमान राजगीर बहुत ही महत्वपूर्ण केंद्र बन गया । बौद्ध धर्म के अलावा राजगीर में हिंदुओं, सिखों और जैनियों के भी धर्मस्थल हैं । अर्थात राजगीर सर्व धर्म समभाव वाला एक अनुपम प्राकृतिक परिदृश्य से परिपूर्ण स्थल है ।
                                              अब हम इतिहास के पन्नों से वापस वर्तमान के धरातल की ओर लौटते हैं । समय के साथ हमारी बाइक के पहिए घूम रहे थे और हम विश्व शांति स्तूप का प्रवेश द्वार को देख कर उस तरफ मुड़ गए । विश्व शांति स्तूप एक पहाड़ी के ऊपर बना हुआ है । जहां तक जाने के लिए दो मार्ग हैं एक सीढ़ियों से चढ़कर और दूसरा आकाशीय रज्जुमार्ग या रोपवे । रोपवे बिहार पर्यटन द्वारा संचालित किया जाता है और यहां पर पुरातन कालीन रोपवे के दर्शन हुए । रोपवे के दोनों का टिकट ₹80 है । जबकि एक तरफ ऊपर से नीचे उतरने का एक व्यक्ति का ₹50 टिकट है । नीचे से ऊपर जाने के लिए एक तरफ का टिकट नहीं मिलता  दोनों तरफ की टिकट लेने पड़ते हैं । अतः हम दोनों ने दोनों तरफ के टिकट लिए और लग गए रुपए की लाइन में । इससे पहले मैं मध्य प्रदेश के मैहर के शारदा माता मंदिर और भेड़ाघाट के धुआंधार जलप्रपात के रूप में में बैठ चुका था ,क्योंकि वह रोप वे चारों तरफ से बंद और आधुनिक प्रणाली के थे इसलिए उनमें कम डर लगता है । राजगीर के रोपवे की प्रणाली थोड़ी सी पुरानी है और बैठक व्यवस्था खुला है इसलिए डर होना लाजमी है । रोपवे काउंटर पर मोबाइल से सेल्फी लेना मना है का बोर्ड लगा हुआ था ।इसलिए हमने भी सेल्फी नहीं ली हालांकि वैसे भी हम सेल्फी बहुत कम लेते हैं । कुछ देर पश्चात हमारी बारी आई और हमें भी  खड़खड़ाते हुए आकाशीय रज्जुमार्ग के सिंहासन पर बैठाया गया । और हम चल पड़े विश्व शांति स्तूप को देखने पहाड़ियों के ऊपर हालांकि रुपए की खड़खड़ाहट से हमारी शांति जरूर भंग हो रही थी और नीचे खाई को देख कर सांसे अटक रही थी, मन भटक रहा था और तन लटक रहा था । हमने चलते हुए रोपवे में भी कुछ मोबाइल से फोटो निकाली जिसे ऊपर से नीचे आ रहे लोगों ने देखा आश्चर्यचकित हुए । जब एक सज्जन से रहा ना गया तो उन्होंने चिल्लाते हुए कहे दिया ' ए बाबू तनी देख के न तो मोबाइल गिर जाई ! '
                                                                                 खैर हम गृद्धकूट पर्वत के रत्नगिर शिखर पर पहुंचे जहां पर सफेद रंग का बना हुआ विश्व शांति स्तूप तेज धूप में अपनी अलग ही आभा बिखेर रहा था । एक जापानी लामा की परिकल्पना का शिलान्यास भारत के द्वितीय राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी ने 1965 में किया था, और इसका उद्घाटन 1969 में राष्ट्रपति वेंकट वराह गिरि जी ने किया था । स्तूप के ऊपर भगवान बुद्ध की प्रतिमाएं बनी हुई थी और उन प्रतिमाओं के आसपास जापानी और हिंदी में भगवान बुद्ध के वचन लिखे हुए है । स्तूप के बगल में ही एक जापानी मंदिर बना हुआ है, जिसका उद्घाटन 1978 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई द्वारा किया गया था । स्तूप के ठीक सामने एक बड़ी सी घंटी लगी हुई थी जिसके साथ लोग खड़े होकर फोटो खिंचवा रहे थे । तेज धूप होने के कारण गर्मी बहुत अधिक थी और इस वजह से हम यहां ज्यादा देर नहीं रुके और वापस आकाशीय रज्जुमार्ग से नीचे उतरे ।
                                                                       सूर्य देव चरम पर थे और अब हमें भूख भी लगने लगी थी लेकिन आस पास कोई अच्छा रेस्टोरेंट ना दिखने के कारण हम राजगीर शहर की ओर चल पड़े । राजगीर शहर में प्रवेश करने के पूर्व ही हमें सोन भंडार, जरासंध के अखाड़ा, मनियारी मठ आदि के संकेत बोर्ड देखें और हम चल पड़े सोन भंडार की ओर । सोन भंडार एक प्राकृतिक चट्टानों की गुफा थी जिसे तीसरी या चौथी सदी में जैन मुनि वीर देव ने बनवाया था । इसके बारे में जनश्रुति है कि यह सम्राट बिंबिसार का खजाना है जिसे किसी गुप्त मंत्र द्वारा सुरक्षित किया गया है और खजाने के द्वार पर यह मंत्र लिखा हुआ है । जिसे अब तक कोई पढ़ नहीं पाया । अंग्रेजों द्वारा इस खजाने को पाने के लिए तोप का भी प्रयोग किया गया लेकिन इस सोन भंडार का वे बाल भी बांका ना कर सके । अधिक गर्मी की वजह से जरासंध का अखाड़ा और ब्रिज बिहार जाने का कार्यक्रम निरस्त कर हम वापस उसी रास्ते पर लौटे और मनियारी मठ के दर्शन किए । कुए के जैसे बने इस मठ में अंदर एक देवी का स्थान बताया जाता है जो राजगीर के शासकों की कुलदेवी रही हैं । अब हम पुनः राजगीर जाने वाली मुख्य मार्ग की ओर चल पड़े ।
                                        राजगीर में प्रवेश करने के पश्चात हमने सबसे पहले गर्म पानी के कुंड देखने का मन बनाया । यहां पर सात अलग- अलग कुंड बने हुए हैं जो अलग-अलग ऋषि यों को समर्पित है सबसे बड़ा कुंड ब्रह्म कुंड है । मौसम में गर्माहट के कारण गर्म कुंड में नहाना हमें गवारा ना हुआ । परंतु आचमन अवश्य किया । गर्म कुंड मैं माननीय पटना उच्च न्यायालय द्वारा मुस्लिमों के प्रवेश पर रोक की तख्ती लगी देखकर थोड़ा सा आश्चर्य हुआ । क्योंकि मैंने अभी तक किसी अन्य धार्मिक स्थान पर दूसरे धर्म के लोगों के प्रवेश पर रोक की लगी तख्ती नहीं देखी थी वह भी किसी हाईकोर्ट के आदेश द्वारा । खैर हिंदू मुस्लिम होने की किसी भी प्रकार की जांच नहीं हो रही थी, और लोग बेरोकटोक आ जा रहे थे । गर्म कुंड के पास ही लगा ठंडे जल का मानव निर्मित तरणताल भी था । जो निजी संपत्ति लग रही थी और वहां टिकट लेकर लोग स्नान कर रहे थे । घर हमें तो अभी बड़ी जोरों से भूख लगी थी इसलिए गर्म कुंड के बाहर ही बने सरकारी रेस्टोरेंट में हम लोगों ने दो थाली ऑर्डर की । खाना साधारण ही था, लेकिन भूखे पेट तो सब अच्छा लगता है । उसके बाद हम लोगों ने वेणुवन के दर्शन किए । विष्णु शब्द का अर्थ बांस होता है अर्थात यह बांस का जंगल रहा होगा । यह गौतम बुद्ध का प्रिय स्थल रहा है और वह अक्सर अपने राजगीर प्रवास के दौरान इसी वेणुवन में रुकते थे । यहां उन्होंने कई चौमासे भी बिताए । वेणुवन के निकट ही एक थाई मंदिर बनाया गया है । गौतम बुद्ध को वन अधिक ही पसंद थे उन्हें बोधगया में जंगल में बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्ति हुई । आम्रपाली नामक उनकी प्रसिद्ध शिष्य ने उन्हें एक आम्र बन दान किया था । और अंगुलिमाल से भी वह एक वन में ही मिले थे । अब हमारी मंजिल विश्व विख्यात नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहर थे इसलिए हमने राजगीर को छोड़ नालंदा की राह पकड़ी ।
विश्व शांति स्तूप का प्रवेश द्वार 


कृपया कतार में आये 


आकाशीय रज्जु मार्ग (रोप वे )

आकाशीय रज्जु मार्ग वाहन पर सवार हम 


शिखर पर स्तूप जाने का रास्ता 

विश्व शांति स्तूप 


हम दो हमसफर 

मनमोहक नज़ारे 


जापानी भाषा का शिलालेख 







सोनभंडार 

सोनभंडार के अंदर 




मनियर मठ 


गर्म कुंड 


सप्तकुण्ड 

orchha gatha

बेतवा की जुबानी : ओरछा की कहानी (भाग-1)

एक रात को मैं मध्य प्रदेश की गंगा कही जाने वाली पावन नदी बेतवा के तट पर ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा हुआ. बेतवा की लहरों के एक तरफ महान ब...