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रविवार, 12 फ़रवरी 2012

ऐसी निभाना तुम प्रीत .........

सब भूल जाना चाहता हूँ , तुम्हारी बांहों में
रच-बस जाना चाहता हूँ, तुम्हारी निगाहों में
स्वर भी तुम हो , ह्रदय का स्पंदन भी तुम हो
तीर्थ सा पावन सरस, चन्दन भी हो तुम
तुम से शुरू होकर , तुम पर ही ख़त्म हो जीवन
मन में बसी एक सुन्दर सी मूरत हो प्रियतम
मेरा  सर्वस्य तुम, और मैं हूँ पर्याय तुम्हारा
रीत भले ही कुछ हो , पर तुम पर ही सब कुछ हारा
जिन्दगी भी तुम्हारे बिना, ख़त्म हो जाएगी
दम निकलने के बाद, मिलने की आरज़ू रह जाएगी
गीत अब तुम्हारे लिए होंगे. तुम जीवन का संगीत 
हो अमर अपना बंधन . ऐसी निभाना  तुम प्रीत       
मुकेश पाण्डेय " चन्दन "


सोमवार, 29 जून 2009

पहली फुहार

मन को भिगो गई पहली फुहार
धरती पर बरस पड़ा, बादलों का प्यार
मेघो से न देखि गई, वसुधा की तपन
तर-बतर करके किया जल अर्पण
रिम झिम बूंदों में, मन मयूर सा नाचा
भीगकर सबने, राग मल्हार बांचा
सूनी आंखे भर आई , ख़त्म हुआ इंतजार
मन को भिगो गई पहली फुहार
किसान काका की आँखों में आई चमक
गरजे बादल , जब हुई बिजली की दमक
पानी नही उनके लिए अमृत बरसा
आओ झूमे ,नाचे, मिलके करे जलसा
पर याद रखना , पानी है जीवन का आधार
कल भी ये बरसे , मत जाने दो इसे बेकार
सभी लोगो को मानसून की पहली वारिश मुबारक हो ! दोस्तों इस बार मानसून जरा देर से आया है अगर हम पानी को न सहेजे तो हो सकता है कल मानसून आए ही न ! अतः सभी लोगो से करबद्ध निवेदन है की इस बार पानी को ज्यादा से ज्यादा जमीन में पहुचने की कोशिश करे । चाहे वो रेन वाटर हार्वेस्टिंग हो या कोई अन्य तरीका पर अपनी अगली पीढी के लिए पानी बचाए , जल है तो कल है !
- आपका स्नेहिल मुकेश पाण्डेय "चंदन"

गुरुवार, 25 जून 2009

मील का पत्थर

काफिले गुजरते रहे, मैं खड़ा रहा बनके मील का पत्थर
मंजिल कितनी दूर है, बताता रहा उन्हें जो थे राही-ऐ-सफर
आते थे मुसिर, जाते थे मुसाफिर , हर किसी पे थी मेरी नज़र
गर्मी,बरसात,और ठण्ड आए गए , पर मैं था बेअसर
हर भूले भटके को मैंने बताया , कहाँ है तेरी डगर
थके थे जो, कहा मैंने -मंजिल बाकि है,थामो जिगर
चलते रहो हरदम तुम, गुजर गये न जाने कितने लश्कर
मुसाफिर हो तुम जिन्दगी में, न सोचना यहाँ बनाने की घर
दिन गुजरना है, सबको यहाँ , नही है कोई अमर
गर रुक गए तो रुक जायगी जिन्दगी, चलते रहो ढूंढ के हमसफ़र
एक ही मंजिल पर रह ख़त्म न होगी, ढूंढो मंजिले इधर उधर
रह काँटों की भी मिलेगी तुम्हे, आते रहेंगे तुम पर कहर
मुश्किलों से न डरना , क्योंकि मिलेगा अमृत के पहले ज़हर
काफिले गुजरते रहे , मैं खड़ा रहा बनके.........मील का पत्थर
आपका अपना ही स्नेहिल
मुकेश पाण्डेय "chandan"














बुधवार, 24 जून 2009

अजन्मी की पुकार

सुना है माँ तुम मुझे , जीने के पहले ही मार रही हो
कसूर क्या मेरा लड़की होना , इसलिए नकार रही हो
सच कहती हूँ माँ , आने दो मुझे जीवन में एक बार
न मांगूंगी खेल-खिलौने , न मांगूंगी तुमसे प्यार
रुखी सूखी खाकर पड़ी रहूंगी, मैं एक कोने में
हर बात तुम्हारी मानूंगी , न रखूंगी अधिकार रोने में
न करुँगी जिद तुमसे , जिद से पहले ही क्यों फटकार रही हो
कसू क्या मेरा लड़की होना , इसीलिए नकार रही हो
माँ तुम भी तो लड़की थी, तो समझो मेरा दुःख
न करना मुझे दुलार, फ़िर भी तुम्हे दूंगी सुख
भइया से न लडूंगी , न छिनुंगी उसके खेल खिलौने
मेहनत मैं खूब करुँगी , पुरे करुँगी सपने सलौने
आख़िर क्या मजबूरी है , जो जीने के पहले मार रही हो
कसूर की मेरा लड़की होना , इसीलिए नकार रही हो
कहते है दुनिया वाले , लड़का-लड़की होते है सामान
तो फ़िर क्यों नही देखने देते , मुझे ये प्यारा जहाँ
आने दो एक बार मुझे माँ , फ़िर न तुम पछताओगी
है मुझे विश्वाश माँ, तुम मुझे जरूर बुलाउगी
क्या देख लू मैं सपने , जिसमे तुम मुझे दुलार रही हो
देकर मुझको जनम माँ, तुम मेरा जीवन सवांर रही हो
मेरे प्यारे दोस्तों मेरी ये कविता अब तक की श्रेष्ठतम एवं सर्वाधिक सराही गयी कविताओ में से एक है। इस कविता को लिखते समय मैंने अपने देश में हो रहे भ्रूण हत्याओं से लातार कम हो रही लड़कियों की मार्मिक दशा थी । सचमुच जिस देश में कन्या को देवी मन जाता हो वहां कन्या भ्रूण हत्या वाकई शर्म की बात है । मेरी कविता का उद्देश्य केवल सराहना पाना नही है , बल्कि मैं चाहता हूँ की कोई बदलाव की बयार बहे .................
इस बदलाव में आपका साथअप्र्क्षित है , अपना सहयोग अवश्य दे क्योंकि हम कल भी देख सके
इसी आशा के साथ आपका अपना ही अनुज
- मुकेश पाण्डेय "chandan"

मंगलवार, 12 मई 2009

बिन नौकरी सब सून !!

बिन नौकरी सब सून ॥!!
मैं पढा लिखा बेरोजगार
ढूंढ नौकरी हो गया लाचार
सोचा चलो , करलू भंगवान पर विश्वाश
शायद दिलवा दे कोई नौकरी ख़ास
तन मन से जुट गया करने उनकी तपस्या
दिन गुजरा गुजरी पूर्णिमा , आ गयी अमावस्या
अन्धकार का था घनघोर प्रदर्शन
इतने में प्रकाश चमका दिए भगवन ने दर्शन
बोले - वत्स ! मांग लो अपने मन का वरदान
ज्ञान , भक्ती मांग कार्लो अपना कल्याण
मैंने कहा प्रभु, ज्ञान भक्ती से पेट नही भरता
वह इन्सान, इन्सान नही जो नौकरी नही करता
बिन नौकरी सब सून , आते नही विवाह प्रस्ताव
मैं क्या करू अब आप ही दे कोई सुझाव
प्रभु- चाहे जितना मांग लो ज्ञान और भक्ति
पर इस बेरोजगारी में रोजगार देने की नही है मेरी शक्ति
ये तेरी ही नही मेरी भी परेशानी है
पत्नी कहे - कुछ करते क्यो नही ? क्या बैठे-२ रोटी खानी है
गया जमाना जब बैठे -२ रोटी मिल जाती
बिन नौकरी तो अब पत्नी भी पास नही आती
वत्स !! अगर कही हो नौकरी की भरती
तो अपने साथ लगा देना मेरी भी अर्जी !!

आपका ही मुकेश पांडे 'चंदन'

orchha gatha

बेतवा की जुबानी : ओरछा की कहानी (भाग-1)

एक रात को मैं मध्य प्रदेश की गंगा कही जाने वाली पावन नदी बेतवा के तट पर ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा हुआ. बेतवा की लहरों के एक तरफ महान ब...