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गुरुवार, 6 जून 2013

अमीर खुसरो : एक अद्भुत महान हिंदुस्तानी

जब कभी किसी ग़ज़ल की गहराई में डूबता हूँ , या फिर किसी कब्बाली को सुनते हुए दिल झूम उठता है , या किसी भी भारतीय संगीत को सुनते हुए ढोलक - तबले की थाप या सितार की झंकार से दिल नाचने लगता है , तो मन उस महान आत्मा के सम्मान में अपने आप नतमस्तक हो जाता है , जिसकी पहेलियाँ बचपन में खूब बुझी थी . जी हाँ , आज मैं बात  कर रहा हूँ , भारतीय इतिहास के उस महान व्यक्ति की जो अपने आप को " तूती -ए- हिन्द " यानि  हिंदुस्तान का तोता कहता था . क्योंकि रोम -रोम  में हिन्द बसा था . कभी -कभी जब सोचता हूँ , अमीर खुसरो के बारे में तो लगता है , कि क्या सचमुच कोई व्यक्ति इतना प्रतिभाशाली हो सकता है ? या फिर ये इतिहास की कोरी गप्प है ? 
मगर  जब मैंने  इतिहास की कई किताबो को खंगाला तो मालूम चला , कि सचमुच खुसरो इतने प्रतिभाशाली थे  .  खुसरो का जन्म एटा जिले के पटियाली   ( उत्तर  प्रदेश   ) में 1253 ईस्वी में हुआ  था .खुसरो का पूरा नाम अबुल हसन यमीनुद्दीन ख़ुसरौ था . दुनिया खुसरो को सितार , ढोलक ,तबले जैसे वाद्य यंत्रो  और ग़ज़ल , कव्वाली   तथा  कौल , तलबाना, तराना , और   ख्याल  के अविष्कारक के नाम से जानती है , मगर खुसरो अपने वतन हिंदुस्तान से बेइंतिहा मोहब्बत करते थे . भले ही खुसरो के पूर्वज मध्य एशिया से आये तुर्क  हो मगर खुसरों खुद को " हिंदुस्तान का तोता " (तुते-ए- हिन्द ) कहलाना पसंद करते थे . 
खुसरो अपने पीर (गुरु ) सूफी संत हज़रत निजामुद्दीन औलिया को बहुत मानते थे . कहते है , कि जिस दिन
हज़रत निजामुद्दीन औलिया इस दुनिया से रुखसत हुए , और ये खबर खुसरो को पता चली तो खुसरों ने भी अपने प्राण त्याग  दिए. आज भी दिल्ली में  हज़रत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह  के बगल में खुसरों की भी मजार बनी है . खुसरो की मृत्यु १३२५ ईस्वी में हुई थी . 
खुसरों को हिंदी , फारसी , अरबी , पंजाबी और संस्कृत भाषाएँ आती थी , और उर्दू के तो खुसरो जनक ही कहे जाते है . खुसरों जितने भारत में लोकप्रिय है , उतने ही आज भी पाकिस्तान में भी लोकप्रिय है . नुसरत फ़तेह अली खान जैसे कई बड़े गायकों ने खुसरों की गजलें और कब्बालियाँ  गायीं है .  खुसरो लोक काव्य में भी काफी लोकप्रिय रहे है . जहाँ उनके सूफी कलाम आध्यात्मिकता की ओर ले जाते है , वही उनकी मुकरियां और पहेलियाँ आज भी जनमानस के मन से रची बसी है . मैंने तो बचपन में खुसरो की कई पहेलियाँ रट रखी थी . उनमे से कई तो आज भी याद है - 
१- एक थाल मोती से भरा , सबके सर पे औंधा धरा 
थाल चारो ओर फिरे, मोती उसमे से एक न गिरे . 


२- सावन - भादों बहुत चालत है , माघ-पूष में थोरी 
एरी सखी मैं तुझसे पूछूं ,  बूझ  पहेली मोरी  

३- हरी थी , मन भरी थी , 
राजा जी के बाग़ में दुशाला ओढ़े खड़ी थी  
( आपने भी ये पहेलियाँ पढ़ी - सुनी होगी , इसलिए इनके जवाब मैं नही लिख रहा हूँ . देखते है , कितने लोग इनके जवाब दे पाते है , अगर आपको नही पता तो दुसरो से पूछिए ....) 

खुसरों बहुत ही प्रतिभाशाली व्यक्ति होने के साथ ही हाजिर जवाब भी थे . एक बार खुसरों कहीं जा रहे थे , तो उन्हें प्यास लगी गाँव के पनघट में चार पनिहारिन पानी भरती हुई उन्हें नज़र आई , तो खुसरो ने उनसे पानी पिलाने की प्रार्थना की . खुसरो की राजसी पोषक देखकर पनिहारिनों ने खुसरों से परिचय पूछा . तो खुसरों ने जब अपना परिचय दिया . लेकिन पनिहारिनें ये मानने तैयार ही न थी , कि उनके सामने अमीर खुसरो खड़े है . फिर पनिहारिनों  ने खुसरो को कविता सुनाने को कहा , तो खुसरो ने उनसे विषय पूछा . तब एक ने खीर , दूसरी ने चरखा , तीसरी ने कुत्ता और चौथी ने ढोल पर कविता सुनाने को कहा . खुसरों ने तुरत दो पंक्तियाँ बनाकर सुना दी - 
खीर बनाई जतन से , चरखा दिया चलाय
आया कुत्ता खा गया , तू बैठी ढोल बजाय 
और खुसरो पानी पीकर चलते बने . खुसरों मध्यकालीन इतिहास के एकमात्र व्यक्ति है , जिन्होंने सात सुल्तानों का न केवल शासन काल देखा , बल्कि उनके दरबारी भी रहे है . खुसरो की सबसे ज्यादा पूछ-परख मोहमद - बिन - तुगलक के समय रही है . 
खुसरों की मुकरियां भी लोगों में लोकप्रिय रही है , इनमे से एक आपके समक्ष प्रस्तुत है - 

रात समय वह मेरे आवे। भोर भये वह घर उठि जावे॥
यह अचरज है सबसे न्यारा। ऐ सखि साजन? ना सखि तारा॥

नंगे पाँव फिरन नहिं देत। पाँव से मिट्टी लगन नहिं देत॥

पाँव का चूमा लेत निपूता। ऐ सखि साजन? ना सखि जूता॥

वह आवे तब शादी होय। उस बिन दूजा और न कोय॥

मीठे लागें वाके बोल। ऐ सखि साजन? ना सखि ढोल॥

जब माँगू तब जल भरि लावे। मेरे मन की तपन बुझावे॥

मन का भारी तन का छोटा। ऐ सखि साजन? ना सखि लोटा॥

बेर-बेर सोवतहिं जगावे। ना जागूँ तो काटे खावे॥

व्याकुल हुई मैं हक्की बक्की। ऐ सखि साजन? ना सखि मक्खी॥

अति सुरंग है रंग रंगीलो। है गुणवंत बहुत चटकीलो॥

राम भजन बिन कभी न सोता। क्यों सखि साजन? ना सखि तोता॥

सोमवार, 27 फ़रवरी 2012

आहिस्ता आहिस्ता.....(ग़ज़ल)


यूँ ही जिंदगी गुजरती जा रही है, आहिस्ता -आहिस्ता
जैसे सुबह की धुप पसरती जा रही है आहिस्ता-आहिस्ता
रात गुजर गयी पर ख्वाब तक आये
जिन्दगी में मशरूफियत ठहरती जा रही है आहिस्ता-आहिस्ता

जुबान तो जाने कबसे खामोश है
पर
दिल की धड़कने बढती जा रही है आहिस्ता-आहिस्ता
जेहन में खयालो का समंदर सा हो गया है
पर ये आँखे बरसती जा रही आहिस्ता-आहिस्ता
थम गये है, वो सारे सिलसिले अब
पर ये जिंदगी गुजरती जा रही है आहिस्ता-आहिस्ता

बुधवार, 15 जुलाई 2009

चुपके-चुपके भाग -१

चुपके-चुपके-१
गली से गुजरा तुम्हारी, मैं एक शाम चुपके-चुपके
दिल को बैचैन कर गई, तुम्हारी मुस्कान चुपके-चुपके
तुम्हारी मुस्कुराहटों ने घायल कर दिया, इस संगदिल को
बना लो हमे अपना सनम , होगा तुम्हारा एहसान चुपके-चुपके
कब तुम ओगी, है इंतजार इस दिल-ऐ-महफ़िल को
पलके बिछाए खड़े है हम, बन जाओ मेरे मेहमान चुपके-चुपके
आंखे थकने न पाए ,कुछ तो तरस आए मेरी मंजिल को
बता दो कि कब पुरा करोगी , मेरा ये अरमान चुपके-चुपके
राह-ऐ-मोहब्बत के सफर में बन जाओ हमसफ़र तुम
बनके हमदम ,हम दे देंगे तुम्हारी खातिर जान चुपके-चुपके
जिन्दगी में मेरी आकर दे देना एक डगर तुम
बाकि न रहेगा कुछ जिन्दगी में ,होगा एक मुकाम चुपके-चुपके
हालत क्या है हमारे, डाल देना एक नज़र तुम
इंतज़ार तेरी खुशबू का इस "चंदन" को, महकेगा सारा जहाँ चुपके-चुपके
इस रचन में आपने एक लड़के की ख्वाहिश और गुजारिश देखि है , मगर उसकी प्रेमिका का जबाब भी उसे बड़े जोरदार तरीके से मिलता है। प्रेमिका का जबाब मैं आपको अगली पोस्ट में इस शर्त में लिखूंगा की ये रचना आपको पसंद आई इसका प्रमाण आपकी टिप्पणियों से जरुर मिलेगा , इसी आशा के साथ आपका हर बार की तरह स्नेहिल मुकेश पाण्डेय "चंदन"

गुरुवार, 25 जून 2009

मील का पत्थर

काफिले गुजरते रहे, मैं खड़ा रहा बनके मील का पत्थर
मंजिल कितनी दूर है, बताता रहा उन्हें जो थे राही-ऐ-सफर
आते थे मुसिर, जाते थे मुसाफिर , हर किसी पे थी मेरी नज़र
गर्मी,बरसात,और ठण्ड आए गए , पर मैं था बेअसर
हर भूले भटके को मैंने बताया , कहाँ है तेरी डगर
थके थे जो, कहा मैंने -मंजिल बाकि है,थामो जिगर
चलते रहो हरदम तुम, गुजर गये न जाने कितने लश्कर
मुसाफिर हो तुम जिन्दगी में, न सोचना यहाँ बनाने की घर
दिन गुजरना है, सबको यहाँ , नही है कोई अमर
गर रुक गए तो रुक जायगी जिन्दगी, चलते रहो ढूंढ के हमसफ़र
एक ही मंजिल पर रह ख़त्म न होगी, ढूंढो मंजिले इधर उधर
रह काँटों की भी मिलेगी तुम्हे, आते रहेंगे तुम पर कहर
मुश्किलों से न डरना , क्योंकि मिलेगा अमृत के पहले ज़हर
काफिले गुजरते रहे , मैं खड़ा रहा बनके.........मील का पत्थर
आपका अपना ही स्नेहिल
मुकेश पाण्डेय "chandan"














orchha gatha

बेतवा की जुबानी : ओरछा की कहानी (भाग-1)

एक रात को मैं मध्य प्रदेश की गंगा कही जाने वाली पावन नदी बेतवा के तट पर ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा हुआ. बेतवा की लहरों के एक तरफ महान ब...