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सोमवार, 19 मार्च 2018

कदम कदम बढ़ाये जा.... शौर्य स्मारक -2


पिछली पोस्ट  में आपने भोपाल स्थित शौर्य स्मारक का परिचय और प्रवेश तक पढ़ा था।  अगर नहीं पढ़ा तो शुरुआत के अक्षर पर क्लिक करके पढ़ सकते है।
"आज की पोस्ट को विस्तार देने से पूर्व मैं अपने मित्र कर्नल मनीष मिश्रा जी के कुछ अनुभवों से आपको परिचित कराना चाहूंगा । नौकरी की शुरुआत में मनीष जी की पोस्टिंग राजस्थान सीमा पर टैंकों के साथ हुई । तीन-चार किलो मीटर के अंतर से टैंक तैनात थे । मनीष जी नए-नए अफसर बनकर सीमा पर पहुंचे इस रेगिस्तानी इलाके में जहां दिन में भयंकर गर्मी पड़ती है, वही रातें बहुत ही अधिक सर्द होती है । सीमा पर इस जगह पर महीनों इन सैनिकों को खुद और टैंकों के अलावा अन्य किसी चीजों के दर्शन नहीं होते थे । मनोरंजन का कोई साधन वहां नहीं था कभी कबार रेडियो पर किसी दूर देश के रेडियो स्टेशन इस सिग्नल पकड़ जाते तो उनकी चुं चा वाली आवाज सुनकर ही मनोरंजन करने के प्रयास करने पड़ते । एक टैंक से दूसरे टैंक तक पहुंचने के लिए रेत के टीलों में से होकर गुजरना पड़ता था, जहां कोई रास्ता या सड़क नहीं होती थी । हवा के कारण रेत के टीले रोज अपनी आकृतियां बदलते थे जिससे  उन रास्तों पर कोई पहचान भी अंकित नहीं कर सकते थे । अक्सर सैनिक दूसरे टैंक या अपने कमांडिंग ऑफिसर के कैंप तक पहुंचने में रास्ता भटक जाते थे और दसियों किलोमीटर भटकने के बाद कहीं दूसरी ओर किसी दूसरे टैंक पर पहुंच जाते थे । साथ में ली गई पानी की बोतल जब खत्म हो जाती तो आप कल्पना कर सकते हैं, कितनी भयावह स्थिति होती होगी । कर्नल साहब जो उस समय लेफ्टिनेंट के पद पर थे अपने सूबेदार जेल सिंह के साथ रात को व्यस्त करते-करते रास्ता भटक गए और उन्हें बड़ी जोर से प्यास लगी । कभी अंधेरे में उनके पैर से कोई बड़ी गोल चीज टकराई । सीमा पर अंधेरे में पैरों से किसी बमनुमा चीज के टकराने की आशंका से ही नए अफसर के पसीने छूट गए । जब अंधेरे में ही सूबेदार जेल सिंह ने उस वस्तु का मुआयना किया और निर्णय दिया कि वह खेत में लगा एक तरबूज है जिससे लेफ्टिनेंट साहब अपनी प्यास बुझा सकते हैं । लेफ्टिनेंट साहब बड़े खुश हुए और जब उस से कथित तरबूज को छोड़कर खाया तो उसका स्वाद बड़ा कसैला लगा । स्वाद चखने के बाद सूबेदार साहब ने बताया कि यह तरबूज नहीं तूमा है । अब सारी रात प्यास से बेहाल होकर भटकते भटकते किसी दूसरे टैंक, कैंप या किसी के घर की मिलने की आशा में भटकना ही था । साथ ही अपनी नजरें चौकन्नी रखनी थी क्योंकि सीमा पार से कभी भी गोली आ सकती थी । रात भर भटकने के पश्चात लेफ्टिनेंट साहब सुबह अपने टैंक से कम से कम 15 किलोमीटर दूसरी दिशा में दूसरे टैंक पर पहुंचे और वापस फिर पैदल ही अपने टैंक पर जाना था  । कर्नल साहब ने बताया कि उस समय जब कैंटीन वाला महीना 15 दिन में अपना सामान लेकर आता तो सारे उस पर टूट पड़ते क्योंकि वह ही उनके लिए एक नई चीज होते जो इतने दिनों बाद देख रहे होते । और तो और उसके द्वारा लाए गए रद्दी के अखबारों पर भी सैनिक टूट पड़ते कि चलो कुछ तो देश दुनिया की खबर मिलेगी । महीनों की पोस्टिंग के दौरान बड़ी मुश्किल से मन का खाना नसीब हो पाता था और कई बार तो भटकने के कारण इतनी गर्मी में भी भूख-प्यास से तड़पते दिन गुजर जाता था । यह सब अनुभव सुनाने का मेरा सिर्फ इतना ही तात्पर्य है कि आज हम बड़े आराम से अपने घरों में बैठे हुए हैं तो सिर्फ इन सैनिकों की वजह से जो अपने देश की रक्षा के लिए जी जान लगाए हुए हैं । "
                                                                                                            अब गैलरी में जब हम आगे बढ़े तो सैनिकों के लिए उनकी वीरता और शौर्य के प्रदर्शन पर ससम्मान नवाजे जाने वाले पद को और विजेताओं की तस्वीर हमें दिखाई दी । वहां पर मेडल्स के नमूने भी रखे हुए थे । परमवीर चक्र को देख कर आंखे नम हो गई कि इस पदक को पाने वाले हमारे देश के अदम्य साहस से परिपूर्ण सैनिकों ने देश के लिए अपने प्राण भी न्योछावर किए हैं । दीवारों पर परमवीर चक्र विजेताओं की तस्वीरें लगी हुई थी । जिनके आगे हमने अपना सर झुकाया कि आज हम जिंदा हैं तो सिर्फ तुम्हारी वजह से । उसके बाद आगे गलियारे में भारतीय थल सेना के टैंक, मिसाइल, नौसेना के युद्धपोत, विमान वाहक पोत और पनडुब्बियों के साथ-साथ वायु सेना के युद्धक विमान आदि के मॉडल भारतीय सेना की सफलता को प्रदर्शित कर रहे थे ।

                                                                                          अगले कक्ष में भारतीय सैनिकों को प्रशिक्षण लेते हुए एक बड़ी सी स्क्रीन पर वीडियो के माध्यम से दर्शाया गया । इस वीडियो से हमें यह पता चलता है कि हमारे सैनिक कितने कठिन प्रशिक्षण के बाद सेना में शामिल होते हैं । कड़ी प्रशिक्षण के अलावा सैनिकों को प्रशिक्षण के दौरान घुड़सवारी तीरंदाजी तैराकी आदि खेलों में भी पारंगत बनाया जाता है । यही कारण है कि कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौर ओलंपिक में निशानेबाजी के लिए हमारे देश के लिए रजत पदक जीतकर आते हैं ।
                                                                                               उसके बाद युद्ध का रंगमंच नामक खुले प्रांगण में हमारा प्रवेश होता है जिसके प्रवेश द्वार पर एक दीप प्रज्वलित है जो सैनिकों के सम्मान का प्रतीक है और यहां लगे साउंड से गोलियों की आवाज आ रही है ,जिसे देखकर ऐसा लग रहा है कि हम स्वयं युद्ध भूमि में प्रवेश कर चुके हैं । युद्ध के रंगमंच से युद्ध का जीवंत अनुभव प्राप्त कर हम इससे शौर्य स्मारक संग्रहालय की परिधि से बाहर निकलें । बाहर हमारे देश के तीनों सेनाओं के सैनिकों के प्रतीक में एक स्मारक बनाया गया है जहां पर डिजिटल ज्योति प्रज्वलित की गई है। इसके अलावा तीनों सेनाओं के शौर्य को प्रतीत करता हुआ एक प्रतीक भी बनाया गया है । इसके अलावा शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए बूट और बंदूकों के निशान से दो अलग-अलग प्रतीक चिन्ह शहीदों को समर्पित किए गए हैं । इन प्रतीक चिन्हों के पीछे सफेद गुलाबों की क्यारियां लगाई गई है और यह सफेद गुलाब हमारे शहीदों के लिए भावभीनी श्रद्धांजलि है ।
तो शौर्य स्मारक की यात्रा यही तक पर इन शहीदों और सैनिकों का सम्मान हमारे दिल में हमेशा रहेगा तब तक आप चित्रों का लुत्फ लीजिए ।

हिमालय से भी ऊँची भारतीय सेना की शान 
परमवीर चक्र विजेता मेजर धन सिंह थापा 
परमवीर चक्र विजेता सिपाही पांडुरंग 
ले कमांडर संतोष कुमार 
किसी भी भारतीय सेना के सैनिको द्वारा सर्वोच्च वीरता के प्रदर्शन पर दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्म्मान परम वीर चक्र 
सैनिकों द्वारा वीरता के प्रदर्शन पर दिए जाने वाले मैडल 
शहीदों की स्मृति में 
कारगिल विजय का एक प्रसिद्द चित्र 
सेना के निशान की पृष्ठभूमि में हमारे अमर शहीद 
परमवीर चक्र विजेता नायक जदुनाथ 
भारतीय नौसेना का पोत 
विमान वाहक पोत का एक मॉडल 
पनडुब्बी (सबमरीन ) का मॉडल 
सलामी शस्त्र 

सैन्य प्रशिक्षण के दौरान घुड़सवारी 
प्रशिक्षण के दौरान तैराकी 
तीरंदाजी का प्रशिक्षण 
कमांडो प्रशिक्षण 
प्ररम्भिक विमान 
हिमालय क्षेत्र में रन वे 
युद्ध क्षेत्र के हथियार 
सेना सम्बन्धी साहित्य और सीडी 
यहां आकर रोंगटे खड़े हो गए !
अमर जवान ज्योति 
अंतिम पग 
शौर्य स्मारक 
शौर्य स्तम्भ 
शहीदों को श्रद्धांजलि (पृष्ठभूमि में सफ़ेद गुलाब ) 
तन समर्पित  मन समर्पित और ये जीवन समर्पित...... 

बुधवार, 14 मार्च 2018

कुछ याद उन्हें भी कर लो, जो लौट के घर न आये ! शौर्य स्मारक भोपाल

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले !!

भारत में जब हम हमारे सैनिकों की शहादत को चिरस्मरणीय बनाने वाले किसी स्मारक की बात करते हैं, तो हमारे सामने सिर्फ इंडिया गेट स्थित अमर जवान ज्योति का ही नाम आता है . इंडिया गेट प्रथम विश्व युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के सम्मान में बना हुआ एक स्मारक है, परंतु वह अंग्रेजों द्वारा बनाया गया . स्वतंत्र भारत में अभी तक ऐसे किसी भी स्मारक की स्थापना नहीं की गई थी.  परंतु इस कमी को दूर करने का बीड़ा उठाया मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने और दुनिया के सामने भारतीय शहीदों की वीर गाथाओं का साक्षात प्रतीक शौर्य स्मारक भोपाल की स्थापना हुई । सामान्यता आम लोगों को सैनिकों के कठिन जीवन और उनके अदम्य साहस से रूबरू होने का मौका बहुत कम मिल पाता है । आम लोगों को हमारे शहीदों के बारे में भी बहुत कम जानकारी होती है । इन सब कमियों को दूर करने के लिए भोपाल शहर के केंद्र में अरेरा पहाड़ी पर शौर्य स्मारक द वार मेमोरियल  की स्थापना की गई।  14 अक्टूबर 2016 को 41 करोड़ की लागत से बनाए गए इस शौर्य स्मारक का लोकार्पण माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के द्वारा किया गया । जिस दिन अखबारों में इस स्मारक के निर्माण की जानकारी पढ़ी थी, उसी दिन से इस स्मारक को देखने की तलब लग गई और आखिरकार वह दिन आ ही गया, जिस दिन हम इस अदम्य साहस की प्रतीक शौर्य स्मारक के प्रांगण में खड़े थे । 20 सितंबर 2017 को हम शौर्य स्मारक पहुंचे, दिल की धड़कन तेज हो चुकी थी और पूरा शरीर जोश से भर चुका था । कदम कदम बढ़ाए जा खुशी के गीत गाए  जा  की धुन के साथ हमारा स्वागत शौर्य स्मारक में हुआ ।
         NCC के समय से ही सेना से एक अलग ही जुड़ाव हो गया था । NCC के कैंपों में भारतीय सेना की गतिविधियों से कई बार रूबरू हुआ और आज फिर से वह यादें ताजा हो गई । एक बहुत ही शानदार हरित कॉरीडोर के बाद जब हम शौर्य स्मारक परिसर में पहुंचे तो  एम्फीथिएटर अर्थात खुले रंगमंच की स्क्रीन पर भारतीय सैनिकों पर जांबाजी को दिखाती हुई फिल्म प्रदर्शित हो रही थी और उसे देखकर रोंगटे खड़े हो गए । हल्की हल्की बारिश प्रारंभ हो चुकी थी और लग रहा था कि प्रकृति भी अदम्य साहस के शूरवीरों का अभिनंदन कर रही हो । इसे शौर्य स्मारक के रखरखाव के लिए ₹10 का मामूली सा टिकट रखा गया है, जो कि भारतीय सेना और उनके परिवारजनों के लिए निशुल्क है । शौर्य स्मारक का रखरखाव भोपाल स्थित भारतीय सेना एवं मध्य प्रदेश प्रशासन द्वारा किया जाता है।  बुधवार के अवकाश को छोड़कर यह प्रतिदिन दोपहर 12:00 से शाम 7:00 बजे तक आम जनता के लिए खुला रहता है । खुले रंग मंच की स्क्रीन पर हम भारतीय जवानों के प्रदर्शन की फिल्म देखने के पश्चात तीनों सेनाओं से संबंधित संग्रहालय की ओर आगे बढ़े और हमारा स्वागत संग्रहालय के प्रवेश द्वार पर लगे एक चित्र ने किया जिस पर महाभारत के शांति पर्व का एक श्लोक लिखा हुआ था । गैलरी में आगे बढ़ते ही दोनों तरफ की दीवारों में शौर्य के इतिहास और साहित्य मैं वीरता के उदाहरणों से सुसज्जित चित्रों ने न केवल आनंदित किया बल्कि हमारे रगों में रक्त संचार और तेज कर दिया । चित्रों के माध्यम से प्रारंभिक काल से लेकर वर्तमान काल के युद्ध के तरीकों को बहुत ही अच्छे अंदाज में दिखाया गया पाषाण काल में आदिमानव की लड़ाइयों से शुरुआत होकर रामायण महाभारत के युद्ध प्राचीन भारतीय शासकों के युद्ध से लेकर आधुनिक भारत के युद्धों के चित्र दोनों तरफ की दीवारों पर प्रदर्शित थे । इन चित्रों के माध्यम से न केवल युद्ध शैलियों के उद्विकास की जानकारी मिलती है बल्कि तत्कालीन भारत के इतिहास की भी जानकारी मिलती है ।  इन चित्रों को देखते हुए हम आगे बढ़े और एक कक्ष में प्रवेश करते ही हम अचंभित हो उठे....



शौर्य स्मारक , भोपाल मध्य प्रदेश 
शौर्य स्मारक का प्रवेश द्वार से प्रवेश करते ही 
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदीजी द्वारा लोकार्पण का शिलालेख 
खुला रंगमंच (जिसमे भारतीय सैनिकों के जांबाजी भरे करतब फिल्म के रूप में दिखाए जाते है )
सेना के कोई बड़े अधिकारी भी आये हुए थे 
संग्रहालय की प्रवेश वीथिका 
महाभारत के शांति पर्व के श्लोक से स्वागत 
शौर्य गाथाओं का इतिहास प्रदर्शित करते चित्र 
पाषाणकाल में आदिमानवों की लड़ाइयां 
राम-रावण युद्ध के दृश्य 
महाभारत युद्ध के आरम्भ में अर्जुन को गीता का ज्ञान देते श्रीकृष्ण 
हिन्दू-मुस्लिम शासकों के मध्य एक युद्ध 
सिख-मुग़ल युद्ध के दृश्य 
चेतक पर सवार महाराणा प्रताप युद्ध करते हुए 
टीपू सुल्तान द्वारा मिसाइल का प्रयोग (आंग्ल -मैसूर युद्ध )
1857 के ग़दर में अंग्रेजों के दांत खट्टे करते हुए तात्या टोपे 
गाँधी जी का अहिंसक आंदोलन 
        अगले कक्ष में भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के इतिहास को चित्रों के माध्यम से बताया गया कि किस तरह 22 जुलाई 1947 को हमारे तिरंगे झंडे ने कई रूपों को बदलते हुए अपना वर्तमान स्वरूप धारण किया । उसके पश्चात भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद से लेकर वर्तमान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जी तक के चित्रों को क्रमशः प्रदर्शित किया गया था । इनमें से सभी राष्ट्रपतियों के नाम और उनके कार्यकाल किताबों में तो पढ़े थे परंतु कुछ राष्ट्रपतियों के चेहरे पहली बार देखने को मिले । अगली दीवार पर भारत के थल सेना प्रमुख, नौसेना प्रमुख और वायु सेना प्रमुखों के चित्र क्रमशा प्रदर्शित थे । उसके पश्चात सामने की ओर सेना के द्वारा बनाए गए बनकर और सीमा पर बनाए गए मोर्चे का जीवंत चित्रण प्रतिमाओं के माध्यम से किया गया । आगे बढ़ने पर 1947 में हुए भारत पाकिस्तान के बटवारे के चित्रों को प्रदर्शित किया गया था, कि किस तरह करोड़ों लोगों को इस पार और उस पार आना जाना पड़ा । फिर आगे भारत पाकिस्तान युद्ध और भारत चीन युद्ध के चित्र को प्रदर्शित किया गया । अभी तक के चित्र श्वेत-श्याम थे जबकि 1999 के कारगिल युद्ध के चित्र रंगीन प्रदर्शित किए गए थे । युद्ध चित्रों के पश्चात सेना की शीतकालीन गतिविधियों को भी प्रदर्शित किया गया और बताया गया कि शांति काल में भी हमारे सैनिक आराम से नहीं बैठते देश की सेवा के लिए हर वक्त तत्पर रहते हैं । इसके पश्चात एक छोटा कक्ष दिखाई दिया जहां बाहर सियाचिन ग्लेशियर लिखा हुआ था और सेना की वर्दी धारण किए एक सैनिक खड़ा था । यहां पर हमारे मोबाइल और कैमरे जमा करा लिए गए और जब हम कक्ष के भीतर प्रवेश किए तो हमें उसे वातावरण को महसूस कराया गया जिस वातावरण को सियाचिन ग्लेशियर में हमारे सैनिक महसूस करते हैं । कमरे के अंदर बहुत अधिक ठंड थी और चारों तरफ बर्फ की सफेदी छाई हुई थी हालांकि हम इसकी कोई फोटो नहीं ले सके लेकिन कुछ देर के लिए ही सही सैनिकों के उस भाव को महसूस कर हमने स्वयं को धन्य समझा । 
तिरंगे का इतिहास 
तीनो सेनाओं के सर्वोच्च कमांडर राष्ट्रपतियों की क्रमशः चित्र 
अब तक के थलसेना प्रमुख 
नौसेना प्रमुख 
अब तक के वायुसेना प्रमुख 
एक सैन्य मोर्चे का जीवंत प्रदर्शन 
सियाचिन ग्लेशियर कक्ष 
इस पोस्ट में इतना ही आगे भारतीय सेना के कई रहस्य और रोमांच बाकी है।  क्रमशः जारी 

orchha gatha

बेतवा की जुबानी : ओरछा की कहानी (भाग-1)

एक रात को मैं मध्य प्रदेश की गंगा कही जाने वाली पावन नदी बेतवा के तट पर ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा हुआ. बेतवा की लहरों के एक तरफ महान ब...