भारत में दुनिया के सबसे ज्यादा युवा है । इनकी आबादी लगभग ५५ करोड़ है , मगर इनमे से अधिकांश बेरोजगार है ! जहाँ विकसित देशो में जनसँख्या को संसाधन माना जाता है, वहीँ भारत में इसे बोझ माना जाता है। आज हम भारत को भविष्य की महाशक्ति कहते है , मगर किस हिसाब से यह महाशक्ति हो पायेगा ? आज सामरिक शक्ति के आधार पर किसी भी देश को महाशक्ति नही माना जाता है ( पाकिस्तान और उत्तर कोरिया जैसे देशो के पास भी नाभिकीय हथियार है ) आज बौद्धिक संसाधन ही महा शक्ति बनने का मुख्य आधार है , कहने को हम भारतीय प्रतिभा का लोहा मानते नही थकते है ! मगर ये भारतीय मेधा शक्ति कितनी कारगर है ? आज़ादी के बाद हमने कितने अविष्कार किये ? कितने विश्वस्तरीय खोजे हुई ? हम अपने विज्ञान और कला के बलबूते दुनिया को तो ठीक अपने ही देश को क्या दे पाए है ? हमारे यह नोबल पुरस्कार पाने वालो की संख्या अँगुलियों पर ही गिनने लायक है , उनमे से भी अधिकतर भारतीय मूल के है , अगर भारत में रहते तो शायद ही कुछ कर पाते !
आखिर हम इस युवा शक्ति के आधार पर विश्व की महाशक्ति बनेंगे , जिसके बारे में कहा जाता है , कि भारत में हर वर्ष ३३ लाख लोग स्नातक होते है , मगर उनमे से १० % को ही मनचाहा रोजगार मिल पाता है । भारत में हजारो इंजीनियरिंग कोलेज है , जिनमे से निकलने वाले १५ % ही उस डिग्री के योग्य होते है। आज भारत में मेनेजमेंट और सॉफ्टवेर कंप्यूटर सॉफ्टवेर जैसे प्रोफेशनल डिग्री बांटने वाले लाखो संसथान है , मगर ये संसथान बाजार में उपलब्ध नौकरियों के योग्य युवा नही दे प् रहे है । मतलब नौकरियों की कमी नही है , मगर उन नौकरियों के योग्य युवा नही है । हमारे यहाँ के शिक्षा संस्थान सिर्फ नाम की डिग्रियां बाँट रहे है । आज हमारे यहाँ के उच्च शिक्षित युवाओ में बहुत ही कम युवाओ को उस स्तर का ज्ञान है ।
अगर हम इसके कारण को देखे तो कई कारण मिलेंगे । जैसे - सबसे पहले तो हमारी शिक्षा प्रणाली ही गलत है । यह डेढ़ सौ साल पुराणी अंग्रेजो की क्लर्क पद्धति पर आधारित है । इसमें सिर्फ रटंत विद्या पर ही जोर दिया जाता है , न की विषय को समझने पर । हमारी शिक्षा प्रणाली की एक कमी यह है, कि हमारे यहाँ प्रथ्मिल शिक्षा को कभी महत्त्व नही दिया गया है । जबकि प्राथमिक शिक्षा ही देश के विकास का आधार है । इसी के फलस्वरूप हमारे देश के भविष्य का आधार ही कमजोर होता है ,तो आगे कि इमारत का गिरना तय ही है । प्राथमिक शिक्षा पर सरकार का कितना ध्यान है , ये इससे ही पता चलता है , कि देश में इतने शिक्षा आयोग और समितियां बनाई गयी , मगर उनमे एक भी प्राथमिक शिक्षा के लिए नही थी । हमारे देश में प्राथमिक शिक्षक को इतना कम वेतन दिया जाता है , कि योग्य शिक्षक इस ओर आते ही नही , नतीजतन कमजोर या मजबूर शिक्षक देश का आधार तैयार करते है , रटंत प्रणाली के माध्यम से !
खैर हम अगर इन बातों को नजरंदाज़ कर भी दे तो , माध्यमिक शिक्षा के बाद कुछ और मुसीबतें छात्रो के सर पर आन पड़ती है । मतलब कभी भी छात्रो को अपने मन का विषय लेने की छूट नही होती है , या तो अभिवाभाक अपने अधूरे सपने अपने बच्चो के माध्यम से पूरा करना चाहते है । या फिर दुसरो की देखा सीखी विषय चयन किया जाता है । ये भी नही देखा जाता कि बच्चा उस विषय में कमजोर है या उसकी रूचि है । फिर उच्च शिक्षा में तो पूरी तरह व्यवसायीकरण हो गया है । अब संस्थानों को शिक्षा कि गुणवत्ता से तो कोई मतलब सा नही रह गया है । खैर जैसे तेसे डिग्री मिलने के बाद बेरोजगार बन भटकने का दौर शुरू होता है । फिर मजबूरन छोटी मोटी जो भी नौकरी हाथ लगी कर लेते है । सबसे बुरी स्थिति तो हमारे देश में शोध कि है । हमारे विश्व विद्यालय तो सही शोध कि परिभाषा ही भूल गये है ।
एक बार उच्चतम न्यायलय के तत्कालीन मुख्य न्यायधीश न्यायमूर्ति श्री के० जी० बालकृष्णन ने कहा था - " इस देश को तो भगवान् ही चला रहा है "
विचारों की रेल चल रही .........चन्दन की महक के साथ ,अभिव्यक्ति का सफ़र जारी है . क्या आप मेरे हमसफ़र बनेगे ?
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सोमवार, 9 अप्रैल 2012
रविवार, 11 मार्च 2012
एक शब्द (कविता )

एक शब्द , जो कहने में बहुत छोटा है
पर दायरा इतना बड़ा, कि उसके लिए हर शख्स रोता है
बचपन में पहली बार , मुह से यही शब्द तो निकला
जीवन में यही पहली दुनिया, यही था आकार पहला
हर दुःख में, हर दर्द में, बस माँ ही तो याद आई
जन्मते ही स्पर्श माँ का पाने , आई पहली रुलाई
सचमुच माँ ही तो , बनी जीवन कि पहली पाठशाला
माँ ने ही सिखाया जीना, खिलाया ज्ञान का पहला निवाला
जीवन के हर प्रथम कि शुरुआत बनी माँ
हर मोड़ पे आने वाले दिन का, सुप्रभात बनी माँ
बस एक शब्द , सारे जीवन से बड़ा हो जाता
माँ, कहते ही मन नतमस्तक हो जाता
सोमवार, 1 अगस्त 2011
भारत रत्न : न जाने कितने जतन
अटल बिहारी वाजपेयी
वर्गीज कुरियन
डॉ एम० एस० स्वामीनाथननमस्कार ,
आज देश में सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न देने की मांग बड़े जोर शोर से उठ रही है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह ने सचिन से पहले हाकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को देने की बात कही है। जबकि मेरा मानना है , कि खिलाडियों को जब उनके खेल में योगदान के लिए पहले से ही राजीव गाँधी खेल रत्न दिया जाता है , तो उन्हें भारत रत्न दिए जाने कि तुक कहाँ तक सही है ? मेरे ख्याल से भारत रत्न सिर्फ उन्ही लोगो को दिया जाना चाहिए जिन्होंने देश के लिए बहुत कुछ किया हो , न कि किसी क्षेत्र विशेष में दिए गये योगदान के आधार पर।
आज भी देश में बहुत से ऐसे लोग है , जिन्होंने देश के लिए सचिन तेंदुलकर से ज्यादा योगदान दिया है। जैसे हरित क्रांति के सूत्रधार डॉ एम्० एस० स्वामीनाथन, श्वेत क्रांति के सूत्रधार डॉ वर्गीज कुरियन तथा ९८ परमाणु परिक्षण के पुरोधा प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी और ऐसे नमो कि सूचि बहुत लम्बी है जिन्होंने देश के लिए सचिन कि तुलना में कहीं ज्यादा योगदान दिया है । मैं सचिन को भारत रत्न दिए जाने का विरोधी नही हू मगर उससे पहले इन लोगो को भी भारत रत्न बनने का हक पहले है।
भारत रत्न जहाँ देश का सर्वोच्च सम्मान है , वही कुछ कमी सी लगती है , जैसे यह सम्मान प्रत्येक वर्ष नही प्रदान किया जाता है । क्या भारत भूमि में रत्नों कि इतनी कमी है , कि हम हर साल एक भारत रत्न नही दे सकते है ?
दूसरी कमी ये महसूस होती है कि इस सम्मान में अभी तक राजनेताओ का ही बोलबाला रहा है , तो क्या देश की सेवा केवल राजनेता ही करते है । नोबल पुरुस्कार कि तर्ज़ पर भारत रत्न को भी मरणोपरांत दिया जाना बंद कर देना चाहिए । क्योंकि लौह पुरुष सरदार पटेल को उनके मरने के पचास साल बाद भारत रत्न दिया जाना किस तरह से उनका सही सम्मान लगता है ।
भारत रत्न के बारे में मेरा एक और सुझाव है कि इसके लिए एक उच्च स्तरीय समिति बनायीं जनि चाहिए जिसमे अलग अलग क्षेत्रो के विशेषज्ञ हो और उनके द्वारा तैयार कि गयी सूचि पर जनता से राय जाननी चाहिए ।
बुधवार, 12 जनवरी 2011
स्वामी विवेकानंद कुछ जाने कुछ अनजानेसे .... युवादिवस की शुभ कामनाएं . फिर हाजिर हूँ ..... एक नए जोश धमाके के साथ !!
नमस्कार मित्रो,
सभी ब्लोगर्स भाई-बहनों , माताओ, चाचाओ, चाचियों , मामियों , मामाओं आदि सभी पढने वालो को देर से ही सही नव वर्ष की शुभकामनाये । इतने दिन तक गायब रहने के लिए क्षमा चाहता हूँ। वजह सिर्फ इतनी सी है की पिछले दिनों मैं मध्य प्रदेश राज्य लोक सेवा आयोग की मुख्य परीक्षा में व्यस्त रहा ।
मित्रो आज स्वामी विवेकानंद जी की जन्म तिथि को सारे देश में युवा दिवस के रूप में मनाया जा रहा हूँ तो सोचा क्यूँ न उनके जीवन के कुछ जाने अनजाने पहलूओ की चर्चा की जाये ........
स्वामी जी को आज हम विवेकानंद के नाम से जानते है , लेकिन सन्यासी होने के बाद स्वामी जी ने अपने बचपन के नाम नरेन्द्र नाथ दत्त को त्यागकर अपना नाम स्वामी विविदिशानंद रखा था । लेकिन जब विश्व धर्म संसद में भाग लेने के पहले जब खेतड़ी महराज ने स्वाजी से कहा की - स्वामीजी आपका यह नाम थोडा कठिन है , अतः आप कोई सरल सा नाम रखे तो लोगो को आसानी होगी । स्वामीजी ने खेतड़ी महराज की बात मानकर अपना नाम विवेक आनंद अर्थात विवेकानंद कर लिया । और ११ सितम्बर १८९३ को शिकागो में साडी दुनिया ने भारत के इस सन्यासी को सनातन धर्म की श्रेष्ठता पर दहाड़ते सुना ।
स्वामी जी चाहते थे कि युवा पहले स्वयं का विकास करे , तभी तो वो देश का विकास कर सकेंगे । स्वामीजी भारत को अनंत संभावनाओं वाला एक सर्वश्रेष्ठ देश मानते थे । उनका मानना था कि भारतीय युवा ही देश को स्वतंत्र कर सकते है । परन्तु स्वामीजी आत्मविकास पर भी बल देते थे।
एक बार स्वामी जी बनारस में बाबा विश्वनाथ के दर्शन से लौट रहे थे , उनके हाथो में प्रसाद कि थैली थी जिसे देख कुछ बन्दर उनकी और लपके .... स्वाजी ने दौड़ लगा दी ..बन्दर भी उनके पीछे भागे ...तभी एक दुकान वाले ने आवाज़ लगी "भागो मत सामना करो " स्वाजी जी रुके ..रुक कर पीछे देखा तो बन्दर उलटे पांव भाग गये । स्वाजी जी ने इस बात को गाँठ बाँध लिया । और अपने जीवन में कभी परेशानियों से भागे नहीं बल्कि उनका रुक कर सामना किया और विजय हासिल की ।
स्वामी जी के जीवन के बहुत सारे किस्से है जिन्हें हम अपने जीवन में उतार सकते है ........
एक बार स्वामी जी कलकत्ता में ठहरे हुए थे , वे रोज सुवह नित्य कि भांति प्रातः भ्रमण पर जाते थे , उसी रस्ते से गवर्नर जनरल भी मोर्निंग वाक को जाता था । गवर्नर जनरल ने स्वामी जी के बारे सुना था , इसलिए वो स्वामी जी कि परीक्षा लेना चाहता था। एक दिन उसने रस्ते कि एक दीवार पर लिखा ' वेयर इज गोड' स्वामी जी ने वेयर कि स्पेलिंग में से डव्लू हटा दिया । अब दीवार पर लिखा था ' हीयर इज गोड "
सभी ब्लोगर्स भाई-बहनों , माताओ, चाचाओ, चाचियों , मामियों , मामाओं आदि सभी पढने वालो को देर से ही सही नव वर्ष की शुभकामनाये । इतने दिन तक गायब रहने के लिए क्षमा चाहता हूँ। वजह सिर्फ इतनी सी है की पिछले दिनों मैं मध्य प्रदेश राज्य लोक सेवा आयोग की मुख्य परीक्षा में व्यस्त रहा ।
मित्रो आज स्वामी विवेकानंद जी की जन्म तिथि को सारे देश में युवा दिवस के रूप में मनाया जा रहा हूँ तो सोचा क्यूँ न उनके जीवन के कुछ जाने अनजाने पहलूओ की चर्चा की जाये ........
स्वामी जी को आज हम विवेकानंद के नाम से जानते है , लेकिन सन्यासी होने के बाद स्वामी जी ने अपने बचपन के नाम नरेन्द्र नाथ दत्त को त्यागकर अपना नाम स्वामी विविदिशानंद रखा था । लेकिन जब विश्व धर्म संसद में भाग लेने के पहले जब खेतड़ी महराज ने स्वाजी से कहा की - स्वामीजी आपका यह नाम थोडा कठिन है , अतः आप कोई सरल सा नाम रखे तो लोगो को आसानी होगी । स्वामीजी ने खेतड़ी महराज की बात मानकर अपना नाम विवेक आनंद अर्थात विवेकानंद कर लिया । और ११ सितम्बर १८९३ को शिकागो में साडी दुनिया ने भारत के इस सन्यासी को सनातन धर्म की श्रेष्ठता पर दहाड़ते सुना ।
स्वामी जी चाहते थे कि युवा पहले स्वयं का विकास करे , तभी तो वो देश का विकास कर सकेंगे । स्वामीजी भारत को अनंत संभावनाओं वाला एक सर्वश्रेष्ठ देश मानते थे । उनका मानना था कि भारतीय युवा ही देश को स्वतंत्र कर सकते है । परन्तु स्वामीजी आत्मविकास पर भी बल देते थे।
एक बार स्वामी जी बनारस में बाबा विश्वनाथ के दर्शन से लौट रहे थे , उनके हाथो में प्रसाद कि थैली थी जिसे देख कुछ बन्दर उनकी और लपके .... स्वाजी ने दौड़ लगा दी ..बन्दर भी उनके पीछे भागे ...तभी एक दुकान वाले ने आवाज़ लगी "भागो मत सामना करो " स्वाजी जी रुके ..रुक कर पीछे देखा तो बन्दर उलटे पांव भाग गये । स्वाजी जी ने इस बात को गाँठ बाँध लिया । और अपने जीवन में कभी परेशानियों से भागे नहीं बल्कि उनका रुक कर सामना किया और विजय हासिल की ।
स्वामी जी के जीवन के बहुत सारे किस्से है जिन्हें हम अपने जीवन में उतार सकते है ........
एक बार स्वामी जी कलकत्ता में ठहरे हुए थे , वे रोज सुवह नित्य कि भांति प्रातः भ्रमण पर जाते थे , उसी रस्ते से गवर्नर जनरल भी मोर्निंग वाक को जाता था । गवर्नर जनरल ने स्वामी जी के बारे सुना था , इसलिए वो स्वामी जी कि परीक्षा लेना चाहता था। एक दिन उसने रस्ते कि एक दीवार पर लिखा ' वेयर इज गोड' स्वामी जी ने वेयर कि स्पेलिंग में से डव्लू हटा दिया । अब दीवार पर लिखा था ' हीयर इज गोड "
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