रविवार, 10 जून 2018

एक किला जहाँ पूरी बारात ही गायब हो गयी


बुंदेलखंड भारत के इतिहास में एक उपेक्षित क्षेत्र रहा है, जब हम भारतीय इतिहास को पढ़ते हैं ,तो हमें बुंदेलखंड के बारे में बहुत कम या कहें की नाम मात्र की ही जानकारी मिलती है । जबकि बुंदेलखंड की धरती वीरभूमि रही है यहां पर समय समय पर वीर पैदा हुए । बुंदेलखंड की बात चले और हम बुंदेला शासको के  दिनों को याद ना करें यह तो संभव ही नहीं क्योंकि बुंदेले ने  ही तो बुंदेलखंड की स्थापना की ।

                                                      मैंने अपनी ओरछा गाथा सीरीज  में बुंदेलखंड की स्थापना का जिक्र किया है, और बुंदेलखंड की पहली राजधानी बनने का गौरव टीकमगढ़ जिले में स्थित गढ़कुंडार नामक स्थान को प्राप्त हुआ है । बुंदेलों की राजधानी बनने के पूर्व गढ़ कुंडार खंगार वंश की राजधानी रहा और खंगार वंश के प्रतापी राजा खेत सिंह (10 वी सदी )  ने स्थान का पल्लवन पुष्पन किया । राजा खेतसिंह खंगार पृथ्वीराज चौहान के सेनापति रहे थे , उन्होंने पृथ्वीराज की तरफ से कई युद्धों में वीरता का परिचय दिया था , इसी से खुश  होके  पृथ्वीराज ने उन्हें गढ़कुंडार की रियासत प्रदान की।  मुहम्मद गोरी से पृथ्वीराज की हार  बाद  खेतसिंह ने स्वयं को स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया था। 14 वी सदी में  खंगारों से छीनकर बुंदेला शासकों ने गढ़कुंडार को अपनी राजधानी बनाया ।
                                    वर्तमान में गढ़ कुंडार मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले में निवाड़ी तहसील के अंतर्गत आता है । यह झांसी छतरपुर सड़क मार्ग पर निवाड़ी से 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है जबकि झांसी से इसकी दूरी लगभग 58 किलोमीटर है । यहां का नजदीकी रेलवे स्टेशन निवाड़ी है । जो झांसी मानिकपुर रेलवे लाइन पर स्थित है । वर्तमान में गढ़ कुंडार एक छोटा सा कस्बा है और यहां पर दर्शनीय स्थलों में गढ़कुंडार का प्रसिद्ध किला गीद्द वाहिनी का मंदिर तालाब आदि देखने योग्य स्थल हैं । शासन की उपेक्षा के कारण यहां पर बहुत कम लोग ही आते हैं । हां प्रतिवर्ष दिसंबर माह में 27 से 29 दिसंबर तक मध्य प्रदेश शासन द्वारा तीन दिवसीय गढ़ कुंडार महोत्सव का आयोजन किया जाता है । यह महोत्सव भी खंगार जाति का महोत्सव बनकर रह गया है , जबकि से पर्यटन गतिविधियों के साथ जोड़कर और अधिक सफल बनाया जा सकता था ।
अब किले  के कुछ इतिहास पर नजर डाली जाए ।

किले का इतिहास

-यह किला चंदेल काल में चंदेलों का सूबाई मुख्यालय और सैनिक अड्डा था।
- यशोवर्मा चंदेल (925-40 ई.) ने दक्षिणी-पश्चिमी बुंदेलखंड को अपने अधिकार में कर लिया था।
- इसकी सुरक्षा के लिए गढ़कुंडार किले में कुछ निर्माण कराया गया था।
- इसमें किलेदार भी रखा गया। 1182 में चंदेलों-चौहानों का युद्ध हुआ, जिसमें चंदेल हार गए।
- इसमें गढ़कुंडार के किलेदार शियाजू पवार की जान चली गई।
- इसके बाद यहां नायब किलेदार खेत सिंह खंगार ने खंगार राज्य स्थापित कर दिया।
- 1182 से 1257 तक यहां खंगार राज रहा। इसके बाद बुंदेला राजा सोहन पाल ने यहां खुद को स्थापित कर लिया।
- 1257 से 1539 ई. तक यानी 283 साल तक किले पर बुंदेलों का शासन रहा।
- इसके बाद यह किला वीरान होता चला गया। 1605 के बाद ओरछा के राजा वीर सिंह देव ने गढ़कुंडार की सुध ली।
- वीर सिंह ने प्राचीन चंदेला युग, कुठारी, भूतल घर जैसे विचित्र तिलिस्मी गढ़ का जीर्णोधार कराकर गढ़कुंडार को किलों की पहली पंक्ति में स्थापित कर दिया।
- 13वीं से 16 वीं शताब्दी तक यह बुंदेला शासकों की राजधानी रही।
- 1531 में राजा रूद्र प्रताप देव ने गढ़ कुंडार से अपनी राजधानी ओरछा बना ली।

घूमने आई पूरी बारात में हो गई थी गायब..
- बताया जाता है कि काफी समय पहले यहां पास के गांव में एक बारात आई थी। बारात में शामिल 50 से 60 लोग किला घूमन आए। यहां वे किले के अंडरग्राउंड वाले हिस्‍से में चले गए। नीचे गए सभी लोग आज तक वापस नहीं लौटे। इसके बाद भी कुछ इस तरह की घटनाएं हुईं। इन घटनाओं के बाद किले के नीचे जाने वाले सभी दरवाजों को बंद कर दिया गया। किला बिल्‍कुल भूल-भुलैया की तरह है। अगर जानकारी न हो तो ज्‍यादा अंदर जाने पर कोई भी खो सकता है। भूलभुलैया और अंधेरा रहने के कारण दिन में भी यह किला डरावना लगता है।
- गढ़कुंडार को लेकर वृन्दावनलाल वर्मा ने उपन्यास भी लिखा  है। इस उपन्यास  में गढ़कुंडार के कई रहस्य दर्ज किए गए हैं।

                                    गढ़ कुंडार इतिहास प्रेमियों के लिए आज भी आकर्षित करता है और इसी आकर्षण में बंद कर मैं अभी तक 5-6   बार इस जगह जा चुका हूं । यह किला अपनी खूबसूरती के साथ-साथ महत्वपूर्ण सुरक्षा व्यवस्था के लिए जाना जाता है । ऊंचाई पर बने इस किले से आसपास का बहुत ही सुंदर नजारा दिखाई देता है । किले का निर्माण सामने एक पहाड़ी के सापेक्ष इस तरह किया गया है , कि जब हम सड़क मार्ग से किले की ओर आते हैं , तो दूरी पर किला नजर आता है । जैसे जैसे ही हम उसके नजदीक पहुंचते हैं यह दिखाई देना बंद हो जाता है । ऐसा कहा जाता है, कि यह किला सात मंजिला है , जिसमे जमीन  ऊपर तीन मंजिल है, और चार मंजिल जमीन के नीचे बने है।  हालाँकि   दरवाजे सुरक्षा की दृष्टि से बंद कर दिए गए है।  गढ़कुंडार का किला बौना चोर के लिए भी प्रसिद्ध रहा है । कहते है कि उसकी लंबाई 52 अंगुल (साढ़े तीन फुट ) थी, इसलिए उसे बौना चोर कहते थे । कुछ लोग उसका नामकरण 52 चोरियों की वजह से कहते हैं । कहा जाता है कि बोना चोर एक ऐसा चोर था जिससे तत्कालीन समय का बुंदेलखंडी रॉबिनहुड कहा जा सकता है । यह धनाढ्य व्यक्तियों को पहले से चेतावनी देता था , कि वह उसके यहां चोरी करेगा और उनकी तमाम सुरक्षा व्यवस्थाओं को चकमा देकर वह चोरी करने में सफल हो जाता था । धनाढ्यों से लूटे गए धन से वह गरीबों और जरूरतमंदों की मदद भी करता था  । इसलिए वह क्षेत्र में लोकप्रिय था।  बौना चोर धन के  लिए धन लोलुप लोगों किले में बहुत खुदाई भी की है।  फ़िलहाल किले की सुरक्षा के लिए मध्य प्रदेश पुरातत्व विभाग ने प्राइवेट सुरक्षा एजेंसी के कुछ गार्ड नियुक्त किये है , जो दिन में आने वाले लोगो के लिए गाइड का भी काम करते है।   
                            गढ़कुंडार में ही गिद्धवाहनी देवी का मंदिर है।  गिद्ध वाहिनी मंदिर मूलतः विंध्यवासिनी देवी का मंदिर है । उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के विंध्याचल में स्थित विंध्यवासिनी देवी बुंदेलों की कुलदेवी हैं । ऐसी मान्यता है , कि  विंध्यवासिनी ही  बुंदेलों की सहायता करने के लिए विंध्याचल से गिद्ध पर बैठकर गढ़कुंडार आई इसलिए उन्हें यहां पर गिद्ध वाहिनी कहा गया । गिद्धवाहिनी मंदिर के बाहर एक बहुत ही खूबसूरत गिद्ध की प्रतिमा की बनी हुई है । साथ ही मंदिर से लगा हुआ एक बड़ा तालाब है जो इस जगह की खूबसूरती में चार चांद लगा देता है । इस तालाब में सर्दियों में कई प्रकार के प्रवासी पक्षी भी आते है।  हालाँकि पिछले कई सालों  के सूखे के कारण हाल -बेहाल है।
बुंदेलखंड के अन्य दर्शनीय स्थल -
ओरछा
देवगढ़
टीकमगढ़
दतिया
झाँसी
खजुराहो
पन्ना
कालिंजर


गढ़कुंडार किले का प्रवेश द्वार ( हालाँकि दरवाजा नया लगा है ) 
प्रवेश द्वार  से दिखता किला 
किले का एक बुर्ज 
किले में प्रवेश करते ही बनी भूलभुलैया 

किले की भूलभुलैया में में रोशनी के लिए छत में रोशनदान बने है।  (अभी सुरक्षा की दृष्टि से जाली लगाई गयी है।  ) 
किले की दीवार पर शुकदेव जी 
किले का जर्जर हिस्सा 

किले के अंदर का विहंगम दृश्य 
किले की सबसे ऊपरी मंजिल 
किले से शाही प्रवेश द्वार का रास्ता 
किले के पास बनी प्राचीन बाबड़ी  जो कभी किले वासियों की प्यास बुझती होगी।  
छत पर बनी डिजायन  
किले से दिखता गिद्धवाहिनी मंदिर और सूखा पड़ा तालाब 
गढ़कुण्डार के तालाब में प्रवासी पक्षी 
सुधा घर्षण यन्त्र (जिसका आज भी पुनर्निर्माण में प्रयोग होता है।  )

63 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, ८ जून को मनाया गया समुद्र दिवस “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. संक्षिप्त विवरण पर बहुत अच्छा सर जी

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    1. आल्हा खण्ड में इस जगह का नाम का जिक्र कुंडहार की लड़ाई इस किले पर बौना चोर का कब्ज़ा था

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  3. Great information. I never been to Jhansi, Orachha or this area.

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  4. यह मेरे लिए नई जगह है। कभी उधर की तरफ आया तब यह जगह भी देखी जाएगी।
    आभार आपका सुंदर पोस्ट के लिए

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    1. खजुराहो का प्लान बना लीजिए फिर रास्ते मे गढ़कुंडार भी देखना हो जाएगा ।
      आभार आपका भी

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  5. वाह.गजब रोचक प्रसंग.. अब ओरछा आया तो आपके साथ गढ़कुंडार भी घुमा जाएगा

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  6. हमने भी देखा है। अंदर कुछ छोटे छोटे कमरे और छोटी सीढ़ियों से बौना चोर की कहानी में विश्वास करना पडा था। बेहतरीन विवरण।

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    1. अब तो कुछ सरंक्षित हो गया है, वरना पहले तो उपेक्षित पड़ा था । आभार सर

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    2. इस किले से बोना चोर का कोई सबंध नहीं है। यह एक मात्र दंत कथा है सन 1182 मे पृथ्वी राज चौहान ने बुदेलखंड जो कि जेजकभुक्ति के नाम से जाना जाता है जिसकी राजधानी महोबा थी । चंदेल काल युद्ध में पराजित हुए और पृथ्वी राज चौहान ने बचपन के मित्र खेत सिंह जू खंगार जो कि जूनागढ़ के चूङासमा राजवंश की शाखा खेगार राजपुताना के रूढ़ देव जू के जेष्ठ पुत्र थे उन्हें यहा का शासक नियुक्त किया । सन 1192 में पृथ्वी राज चौहान को मोहम्मद गौरी ने पराजित किया और सम्पूर्ण भारत पर उथल-पुथल मच गई थी तभी खेत सिंह खंगार क्षत्रिय जू ने इसको स्वतंत्र हिन्दू राष्ट्र की घोषणा कर दी थी इसकी राजधानी गढ कुङार बनी गढ़ कुङार किले का निर्माण खंगार शासको किया इसके बाद महाराजा खेत सिंह खंगार, महाराजा हुरमात सिंह खंगार , महाराजा मानसिंह खंगार, महाराजा खूब सिंह खंगार, महाराजा बरदायी खंगार सहित यहाँ पर स्वतंत्र हिन्दू राज 1182 से लेकर 1347तक चला बुदेलखंड का पहला जौहर गढ़ कुङार में हुआ महाराजा मानसिंह खंगार जी की पुत्री केशर दे खंगार गढ़ कुङार पर किया

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  7. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (12-06-2018) को "मौसम में बदलाव" (चर्चा अंक-2999) (चर्चा अंक-2985) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  8. ये किला न केवल बेजोड़ शिल्पकला का नमूना है बल्कि उस खूनी प्रणय गाथा के अंत का गवाह भी है रोचक प्रसंग बहुत ही बढ़िया और जानकारी आपसे मिली आभार मुकेश जी कभी मौका लगा तो देखेंगे जरूर
    किले के अंदर का विहंगम दृश्य ये तस्वीर बहुत ही पसंद आई

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  9. बढ़िया जानकरी और सुन्दर चित्रों से भरी एक शानदार पोस्ट .

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  10. छोटे -छोटे स्थानों की खोजपरक घुमक्कड़ी भी कोतुहल जगाती है और भारत के विस्तृत इतिहास को मोतियों में पिरोती हुई प्रतीत होती है ! आपका ट्रांसफर होने का एक बड़ा फायदा ये तो हुआ कि अब हमें ओरछा के बाद टीकमगढ़ के आसपास की ऐतिहासिक कहानियां पढ़ने को मिलेंगी !! साधुवाद पांडेय जी बुंदेलखंड के इतिहास को करीब से पढ़वाने के लिए

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    1. वैसे ये घुमक्कड़ी ओरछा पदस्थ रहते ही कि गयी । आभार योगी जी

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  11. जब चालीस पचास लोगों की बारात गायब हो गयी तो लग रहा है भूल भुलैया या निचला हिस्सा वास्तव में आश्चर्यजनक ही होगा वरना तो कई भूल भुलैया ऐसे होते हैं कि उनमें जाना का तो एक ही रास्ता होता है और बाहर आने के कई सारे। इतिहास की जानकारी के मामले में तो आप गागर में सागर भर देते हैं

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    1. यह सिर्फ एक मिथक कहानी इस प्रकार की कहानी हम पुराने किले वावङी आदि के सबंध मे सुनते चले आ रहें हैं

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  12. Bona chora dhanere chuhana mai se tha chori karte pakadne par kah diya ki mai ghadkundar rajya ka hau tabchod diya gaya or khangar rajput samjane lage loga

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  13. kabhi jana chahu to kya samayh sahi rahega aur , near by hotel kis jagah par lena sahi rahega ?

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    1. जाने का सही समय 27 दिसम्बर है इस दिन यहाँ के महाराजा खेत सिंह खंगार क्षत्रिय जू का जन्मोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है । जिसमें भारत वर्ष को अनेक सस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं एव बहुत बङा मेला लगता है तीन दिवसीय महोत्सव होता

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  14. बहुत़ ही सुंदर व्याखान। पुरानी धरोहरों को सहेज कर रखना हमारी जिम्मेदारी है। जो हमें विरासत में मिली है। जय़ माँ विंध्यवासिनी

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  15. वाह बहुत खूब, साथ साथ बुन्देला के विंध्येला शब्द से निष्पन्न होने का संदर्भ अपेक्षित था।

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  16. खंगार जाति की उत्पत्ति कहाँ से हुई है? वृन्दावन वर्मा ने बुंदेली भाट इतिहासकारों की रचनाओं को आधार मानते हुए इनको बौना चोर का वंशज बताया है। हालांकि प्रामाणिक इतिहासकार इन्हें गोंड जनजाति से उत्पन्न मानते हैं, जो कि काफी हद तक सत्यता के करीब है। वर्तमान में खंगार जाति अनुसूचित जाति में गिनी जाती है।

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    1. मिश्रा जी खंगार क्षत्रिय राजवंश एक प्रचीन क्षत्रिय है । जिनकी उत्पत्ति जूनागढ़ के चूङासमा राजवंश की शाखा खेगार राजपुताना से हुई है । यह चंद्रवंशी क्षत्रिय गुजरात के कच्छ सोहरष्ट से गिरनर आदि इनके वंशजों की राजधानी रही जिसका प्रमाण गिरनर पर स्थित प्रसिद्ध शिव मन्दिर पर लगे शिलालेखों मे दर्ज है । जूनागढ़ गुजरात अदि में जाङेजा, रायजादा, सरवैया, भाटी, रा खेगार, जो बुदेलखंड में खंगार है यह चंद्रवंशी क्षत्रिय की शाखा है । वर्तमान में यह सिर्फ मध्य प्रदेश को छोड़कर सम्पूर्ण भारत सामान्य जाति में आती है । मे स्वयं उत्तर प्रदेश झांसी का निवासी हूं और जनरल कैटीगिरी में आता हूँ । बात मध्य प्रदेश की की जाए तो यह काग्रेसी राजनीतिकरण था आप अच्छे से जानते हो । सन 1947 में भारत आजाद हुआ परन्तु गोवा में अग्रेंजो का शासन चलता रहा था जिसके लिए निरंतर आन्दोलन चलते रहें । इसी आन्दोलन में भाग लेने सागर जिला मध्य प्रदेश से खंगार समाज से सहोदरा राय जी अपनी टोली लेकर गयी अंग्रजों ने इनकी टोली पर गोलीया चला दी जिसमें सहोदरा राय जी मे पांच गोली लगी और बुरी तरह घायल हो थी इन्द्रा गांधी स्वयं उनसे मिलने गयी और उन्हे सागर से संसाद का प्रत्याशी बनाया । जब वह की सीट जरनल की थी वह दो बार संसाद चुनी गई । परन्तु वहां की सीट अनुसूचित हो गयी । सहोदरा राय को चुनाव लङना था । सीट तो बदल नही सकती उन्होंने खंगार समाज को सिर्फ सागर मे आरक्षण दिलाया । फिर वह संसाद बनी । इस तरह सम्पूर्ण मध्य प्रदेश में खंगार क्षत्रिय समाज अनुसूचित जाति का आरक्षण प्राप्त हुआ । उदाहरण के तौर पर यदि कोई खंगार उत्तर प्रदेश या अन्य प्रदेश का निवासी है और वह मध्य प्रदेश में जा कर निवास करने लगें तो उसको आरक्षण नहीं मिलेगा । क्योंकि जब यह संशोधन होकर पारित हुआ था । उससे पहले का निवासी ही इसका लाभ ले सकता है । चलो अब आगे की बात आपने कहा खंगारो की उत्पत्ति कहाँ से हुई जिसको हमने बता दिया प्रमाणित सहित । अब आप मुझे बताए

      1 बुदेलखंड में सर्दीये नवरात्रि मे गाँव मे सुआटा की परम्परा का निर्वाह होता वह कहा से है?

      2 बुदेलखंड में एक पूजन होता रक्कास का इसकी उत्पत्ति कहाँ से हुई?

      3 भदौरिया राजवंश मे खंगार क्यों पूजते हैं?

      4 बुदेलखंड में पहले एक जेवर हुआ करता था जिसको सिर्फ़ उंची जाति की महिला ही धारण करती थी जो सोने का होता था शायद आपके घर मे भी हो जिसको खंगवारी (खंगोईजा का आभूषण) कहते थे ये किस की देन हैं?


      और अन्तिम बात विजय पराजय ना लिखें यम ना पावें पंथ जय जय भूमि जिझौति की होय जूझ के अन्त । यह लेख जिझौतिखंङ का है बुदेलखंड जिझौतिया ब्राह्मण जो की खंगारो के कुल गुरू है । सम्पूर्ण भारत में ब्राह्मणों को महाराज सिर्फ़ बुदेलखंड मे कहा जाता है क्यो ?????

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    2. चूतिये हो तुम वी.पी.सिंह, झांसी

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  17. खंगार जाति की उत्पत्ति कहाँ से हुई है? वृन्दावन वर्मा ने बुंदेली भाट इतिहासकारों की रचनाओं को आधार मानते हुए इनको बौना चोर का वंशज बताया है। हालांकि प्रामाणिक इतिहासकार इन्हें गोंड जनजाति से उत्पन्न मानते हैं, जो कि काफी हद तक सत्यता के करीब है। वर्तमान में खंगार जाति अनुसूचित जाति में गिनी जाती है।

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    1. Amit bhai khanagar jati gujrat ke khanagar vansh se hai hum kshtriya hai na ki gond or raha sc m aane ka to mp ke 14 distric hai bas jinme aate hai baki sabhi jagah jese general m or kuch jagah obc m bhi aate hai indoor bhopal m obc hai to aap aap pr koi praman hai ki khangar gond vansh se hai hum kshatriya khangar hai or boona chor pratihar rajput ya tomar rajput m se koi tha isliye aap dobara esa nhi bole ok

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  18. Amit mishra g hum kshatriya hai gond nhi or gujarati se hai or dusri baat ye ki sirf mp ke 14 distric m sc m baki kuch jagah gen m ir kuch jagah obc ok or tumhe koi shakh ho to ache se history pado khangar rajput ki ok

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  19. अनाम भाई, जो लोग अपनी सच्चाई से दूर भागते हैं उनको कुछ नहीं मिलता है। खंगार कबसे राजपूत बन गए? और वो भी गुजराती? इससे बड़ा मज़ाक क्या हो सकता है? ���� थोड़ा पढ़ो-लिखो, ज्ञान वर्धन करो, गलतफहमियां मत पालो। खंगार लोग मध्यप्रदेश के अलावा राजस्थान, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में भी अनुसूचित जाति में आते हैं। आपके विधायक, सांसद, पंच, प्रधान, सभासद सभी अनुसूचित जाति की सीटों से चुनाव लड़ते हैं। आपके अधिकारी, जज, क्लर्क, इत्यादि सभी अनुसूचित जाति के आरक्षण का फायदा उठाकर नौकरी पाते हैं। अतः ज़बरदस्ती राजपूत बनने की कोशिश न करें। रंगे सियार वाली कहानी सुनी है न? कहीं वही हाल न हो जाये, अतः जो हैं वही रहें, कुछ और न बनें।

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    1. अमित मिश्रा जी सच्चाई से दूर नहीं भाग रहे अपितु आपको सत्यता स्वीकार करनी चाहिए । मुझे एक बात बताइए सम्पूर्ण भारत वर्ष कही भी नीचे जाति का ना तो कोई किला है ना ही राजवाङे, पृथ्वी राज रासो मे खंगारो का स्पष्ट प्रमाणित लेख है । चंद्रवंशी राजपुताना मे खंगारो का स्पष्ट प्रमाणित लेख, गढ कुङार पर लगे शिलालेखों पर स्पष्ट प्रमाणित लेख है । यह वो ग्रंथ है । जो हम और आप ने नहीं लिखे । भोर मछौ और जात खंगार सोतन वधईयो आधी रात यह कहावत स्पष्ट कराती दहशत मुगलों को

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  20. Tumhi askele m sakal hai sabhi rajput jo hum m avivah aagai karte hai vo sab chutiya hai phir tum ye tum soch lo Google ho to dekh lena ki khangar kshatriya hai ya gond tumhare jese thodi hai jo bharat ke mool nivashi hi nhi hai tibbbbat se aaye ho or tumhare sakal se kya hota jo janta nhi vo kisi ki manta nhi ise hi murkh kehte hai

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  21. हमने सभी जातियों का इतिहास पढ़ा है और जानकारी के लिए बता दूं कि गोंड जाति का इतिहास खंगारों से बहुत अधिक गौरवशाली है। गोंड महारानी दुर्गावती की वीरता तो जग प्रसिद्ध है; गढ़ मंडला, नागपुर जैसे सैकड़ों नगर गोंड राजाओं ने बसाये। अतः मिश्राजी किसी को कम न समझें। खंगारों का इतिहास तो गढ़ कुंडार तक सीमित है। पर आपकी ये बात सत्य है कि खंगार अनुसूचित जाति में आते हैं। यदि वो वास्तव में राजपूत होते तो SC आरक्षण का फायदा कभी नहीं उठाते। इसे दोगलापन कहते हैं।

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    1. पांड़े जी । खंगारो का इतिहास गढ़ कुङार तक सीमित नहीं है । और हम स्वयं इस गौरवशाली खंगार क्षत्रिय राजवंश मे जन्मे हैं । और आपकी तरह हम भी सामान्य जाति में आते हैं । और मेरे दादा सा पर दादा सा भी जरनल कैटीगिरी में आते थे जिन्होंने कभी कोई आरक्षण का लाभ नहीं लिया ।

      आप खंगारो के इतिहास को गहराई से पढ़े । और जानने की कोशिश करें कि इनका शौर्य क्या था।

      जिनकी वीरता का वर्णन स्पष्ट रूप चंदवरदायी जी ने पृथ्वी राज रासो में करा है।
      1 यह वो क्षत्रिय राजपूत है जिन्होंने हिन्दू और सनातन संस्कृति को खत्म नहीं होने दिया ।

      2 हिन्दू के अन्तिम दिल्ली सम्राट पृथ्वी राज चौहान के हार के बाद मुगल काल शुरू हुआ इसके बाद कोई भी दिल्ली की गद्दी पर नहीं बैठ सका इस परिस्थिति मे जिसे आज बुदेलखंड कहा जाता है वह जिझौतिखंङ था यह पर स्वतंत्र हिन्दू राज चल रहा था । जिसके शासक खंगार क्षत्रिय थे । जिनके गुरु जिझौतिया ब्राह्मण थे और ब्राह्मणो का सबसे अधिक सम्मान एक क्षत्रिय ही करता है । परन्तु दुर्भाग्य मुगलों एवं उनके गुलामों ने इस संस्कृति को मिटाने की कोशिश की वह सम्भव नहीं हो सका ।


      3 खंगार क्षत्रिय राजवंश का ङोला किसी अधर्मी ने नहीं ले सका गढ़ कुङार पर पहला जौहर खंगार क्षत्रिणनी केशर दे ने किया जिनका प्रमाणित लेख आज भी अपनी गवाही दे रहा है ।

      4 खंगार क्षत्रिय राजवंश वह स्वाभिमानी क्षत्रिय है जिनकी वंसज खेल खेल में शेर के जबङे तोड़ दिया करते थे ।


      5 खंग अर्थात तलवार हार मतलब धारण करने वाला विराट युद्धा


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  22. बुंदेलखंड के इतिहास में चंदेलों और बुंदेलों का योगदान है। खंगार तो धोखे से गढ़कुंडार के स्वामी हो गए और कुंडार पे इनका स्वामित्व मात्र 80 वर्ष रहा। इस दौरान ये इतना हवा में उड़ने लगे कि अपने मालिक बुन्देलाओं की कन्या से विवाह करने का ख्वाब देखने लगे। नतीजन बुन्देलाओं के अगवा सोहनपाल बुंदेला ने खंगारों का भूसा भरकर उनको नष्ट कर दिया। आज बुंदेलखंड में खंगार अत्यंत नीची जाति में गिने जाते हैं तथा आम जनमानस में ये दर्ज़ी, नाई, बढ़ई से भी नीचे माने जाते हैं। परंतु आज भी ये अपने इतिहास से सबक लेने को तैयार नहीं हैं, जो कि इनकी बुद्धिहीनता को दर्शाता है।

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    1. बुंदेला जी से बुंदेला राजवंश से पहले खंगार जिझौतिखंङ के शासक थे यह बुंदेला भी काशी से चलकर आए थे । वो भी यहाँ के नहीं थे खंगार शाखा पृथ्वी राज चौहान के साथ आयी और बुदेला राजवंश काशी से पहले गढ़ कुङार के राजा खंगार हुए फिर बुंदेला इसमें विवाद की कोई बात ही नहीं है

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    2. बुंदेला जी पहले जब खंगार क्षत्रिय राजवंश शासक थे तो बुंदेला मालिक कैसे हो गये ? बुंदेला राजवंश से पहले खंगार राजा थे और सम्पूर्ण बुदेलखंड पर खंगारो का शासन था और आपके अनुसार ही सही 80 साल खंगार क्षत्रिय राजा तो रहें । बुदेलखंड की धरती पर राज तो किया

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  23. अभी क्या जानते हो तुम खंगार राजवंश के बारे में यह सब तो तुमने बता दिया पर यह कौन बताएगा कि खंगार राजवंश की बहन केसर दे मैं अपनी सभी सहेलियों माता बहनों सभी छतरानियों ने मिलकर जोहर किया था और कन्या पूजन की प्रथा भी महाराजा खेत सिंह खंगार जी की ही देन है

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  24. हिंदुओं में कन्या पूजन खेत सिंह खंगार ने शुरू कराया?? ये तो नई कहानी पता चली। तुम्हारा मतलब है कि पुराणों में जो कन्या पूजन का वर्णन है वो सब झूठ है? अब ये न कहने लगना कि पुराण भी खेत सिंह खंगार ने ही लिखे हैं :D इतने झूठ और मिथ्याभिमान में मत डूबो मित्र।

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    1. आपको गलत जानकारी दी गयी सर्दिये नवरात्रि मे सम्पूर्ण भारत में बुदेलखंड मे कुंवारी कन्याओ द्वारा सुआटा की परम्परा का निर्वाह होता यह 13 वी सदी से शुरू हुआ जो खंगार क्षत्रिय राजवंश की देन है

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  25. किसी के पास बौना चोर की कालअवधि का विवरण उपलब्ध हो तो बताने की कृपा करें।

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  26. बौना चोर का काल 12वीं शताब्दी के मध्य में था और कुंडार में निवास करता था। ये बहादुर था और चोरी में माहिर। आल्हा ऊदल काल में ये मौजूद था। संभवतः इसने अपने पुत्र खेता को पृथ्वीराज की सेवा में भेजा था।

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    1. यार भाई बोना चोर 10 वी सदी में था और गढ़ कुङार 1182 मे आप 12वी सदी का बोल रहे क्या 200-300 साल जिन्दा रहा । क्या तर्क़है सिर्फ़ हस्सपाद

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    2. वी पी सिंह जी आपने पता नहीं किन किताबों से इतिहास पढ़ा है जो खंगारों को चूड़ासमा वंश से जोड़ रहे हैं? सिर्फ इसलिए कि चुड़ासमा वंश कोई खेंगार नाम के राजा हुए हैं? अरे मूर्खाधीश्वर ज़रा चूड़ासमाओं से भी पूछ लो के वो तुमको अपना मानते हैं या नहीं? गौतम ठाकुर भी होते हैं और गौतम दलित भी, इसका ये मतलब ये नहीं कि वो एक दूसरे के वंशज हुए। मध्यप्रदेश के खंगार दलित (SC) हैं और उनका चूड़ासमा राजवंश से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं हैं, न ही उनकी कोई परम्पराएं मिलती जुलती हैं। वो विशुद्ध गुजराती हैं।
      बौना चोर का ज़िक्र आल्हा खंड में आता है कि उसका संवाद आल्हा से होता है। अब खुद ही पता लगा लो कि आल्हा ऊदल किस सदी में हुए? और बौना चोर उनका समकालीन था और गढ़कुंडार से संबंधित था। फ़र्ज़ी इतिहास पुस्तकों से जानकारी लोगे तो हवा में उड़ते रहोगे, वास्तविकता से अनभिज्ञ। खंगार अगर राजपूत होते तो अनुसूचित जाति में कभी नहीं आते।

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    3. पाण्डे जी, इन लोगों को हमने बहुत करीब से देखा है। बहुत दोगले और खोखले लोग हैं। फेसबुक और सोशल मीडिया पर राजपूत, राजपूत, ठाकुर ठाकुर चिल्लाते हैं और SDM कार्यालय में चुपके से जाकर अनुसूचित जाति का सर्टिफिकेट बनवा लेते हैं। यदि ये सच्चे राजपूत हैं तो इनको सरकार से मांग रखनी चाहिए कि खंगार जाति को SC लिस्ट से बाहर किया जाए। है हिम्मत? आये बड़े राजपूत बनने।

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ab apki baari hai, kuchh kahne ki ...

orchha gatha

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