शुक्रवार, 13 मई 2016

बेतवा की जुबानी : ओरछा की कहानी (भाग-2)

रामराजा मंदिर ओरछा का विहंगम दृश्य

पिछले भाग से अनवरत जारी ...
नमस्कार मित्रों
बहुत दिनों से माँ बेतवा के सानिध्य में नही गया था । मन तो कई बार किया लेकिन नौकरी की व्यस्तता ने पहुचने ही न दिया । खैर जब चांदनी रात में माँ बेतवा के पास पहुचा तो बेतवा की लहरें ग्रेनाईट की चट्टानों से धीरे धीरे टकरा कर रात की शांति को भंग कर रही थी । समय की तरह बेतवा की लहरें बिना रुके अनादि काल से अनवरत अपने सफर पर चले जा रही है । खैर माँ बेतवा ने बड़ी ख़ुशी से स्वागत किया । मैंने पूछा -माँ कहीं नाराज़ तो नही हो ?
वेत्रवती मुस्कुरातें हुए बोली - कोई माँ अपने बच्चों से नाराज़ हो सकती ?
वैसे भी अपनी ओरछा गाथा में प्रभु राम ओरछा आने वाले थे, लेकिन अच्छे कार्यों में बाधाएं तो आती रहती है , पुत्र चन्दन !
माँ बेतवा के मुख से अपना नाम सुनकर बड़ी ख़ुशी हुई । तो माँ गाथा शुरू करो न ! अब मन अधीर हो रहा है ।
पुत्र अभी तक तुमने सुना कि कैसे ओरछा में कृष्ण भक्त महाराज मधुकर शाह और उनकी रामभक्त महारानी गणेश कुंवर के संवाद के बाद महारानी अपने आराध्य राम को अयोध्या से ओरछा लाने निकल पड़ी थी। महारानी की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर भगवन राम बालरूप में प्रकट हुए ! भगवन राम ने महारानी से कहा - माँ मांगो वरदान ! हम आपकी भक्ति से प्रसन्न हुए !
गणेश कुंवर जू की आँखों से अनवरत ख़ुशी के आंसू बह रहे थे । बोली - प्रभु ! मैं आपको ओरछा ले जाने आई हूँ ।
आज भी रानी गणेश कुंवरि के कक्ष में राम दरबार का जीवंत चित्र है ।
राम - लेकिन माते ! अयोध्या तो मेरी जन्मभूमि है , मैं इसे कैसे छोड़ सकता हूँ ?
महारानी - प्रभु अगर आप ओरछा नही चलेंगे तो मुझे अपने प्राण त्यागने की अनुमति प्रदान करे ।
भगवान आखिरकार भक्त की जिद के आगे झुक ही गए । बोले - मैं ओरछा चलने तैयार हूँ , लेकिन मेरी कुछ शर्तें है ।
महारानी - प्रभु ! मुझे आपकी सारी शर्तें मंजूर है ।
राम - माँ , मेरी पहली शर्त ये है , कि ओरछा में राजा मैं होऊंगा ।
दूसरी शर्त - आप मुझे यहाँ से पैदल ही अपनी गोद में ओरछा लेकर चलेंगी ।
तीसरी शर्त - आप केवल पुष्य नक्षत्र में ही चलेंगी ।
चौथी शर्त - एक बार जहाँ रख देंगी मैं वहीँ स्थापित हो जाऊंगा ।
भगवन के अयोध्या से ओरछा जाने की बात सुनकर पुरे अयोध्या में हलचल मच गयी । सारे साधू-संत महारानी गणेश कुंवर को रोकने पहुँच गए । तब भगवान बोले - आप सभी अयोध्या वासी चिंतित न हो , मैं प्रतिदिन दिन में ओरछा में रहूँगा , लेकिन रात्रि शयन अपनी जन्मभूमि अयोध्या में ही करूँगा ।
प्रभु राजाराम के दो निवास है खास ।
दिवस ओरछा रहत है, रात अयोध्या वास ।
महारानी जी , तुरंत सन्देश वाहक से सन्देश महाराज मधुकर शाह के पास भिजवाया कि वो प्रभु राम को लेकर ओरछा आ रही है । प्रभु के लिए भव्य मंदिर का निर्माण करवाया जाये। महरानी जू अपनी गोद में राम लक्षमण की मूर्ति लेकर साधू संतो के जत्थे के साथ भजन कीर्तन करते हुए पुष्य नक्षत्र में ओरछा की और बढ़ने लगी...
बेतवा की लहरें तेजी से उछालने लगी । मनो स्वागतुर हो । मगर अच्छे कार्यो में बाधा तो आती ही रहती है....
कहकर माँ वेत्रवती भगवान के आगमन की ख़ुशी में मगन हो गयी । मैं ग्रेनाइट शिला पर सोच रहा ...कि कैसे प्रभु ओरछा पहुचे ? क्या मधुकर शाह भव्य मंदिर बनवा सके ? क्या महारानी जू प्रभु की सारी शर्तें पूरी कर सकी ? प्रतीक्षा करते है....बेतवा की लहरों की
माँ बेतवा की लहरों से फिर प्रसन्नचित ध्वनि प्रकट हुई  ...

महारानी साधू-सन्तों के साथ भजन-कीर्तन करते हुए पुष्य नक्षत्र में ओरछा की और बढ़ रही थी । बेतवा की लहरें प्रभु राम के ओरछा आगमन की कथा सुनाते हुए उल्लास से ऐसे उछल रही थी , मानो समुद्र में ज्वार आ गया हो । मैं ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठ कर बेतवा जल और राम रास दोनों में पुरी तरह भीग चूका हूँ । आशा है आप तक भी छीटें पहुचें होंगे । खैर माँ बेतवा ने कथा आगे बढ़ाते हुए बताया ... इधर पुरी ओरछा नगरी प्रभु राम के स्वागत के लिए उतावली हो रही थी । महाराज मधुकर शाह ने अपने राजप्रासाद के ठीक सामने बहुत ही भव्य चरमंजिला मंदिर का निर्माण प्रारम्भ करवा दिया था । मंदिर काफी ऊँची और पक्की नींव पर बनाया जा रहा था । विशेषज्ञ कारीगर और मजदुर दिन रात और खून पसीना एक किये हुए थे । महाराज ने मंदिर का ऊंचाई और संरचना इस प्रकार बनवाई थी , कि वे और महारानी अपने राजमहल की खिड़की से सोकर उठते ही प्रभु के दर्शन कर सके । ओरछा के लोग भी मंदिर की भव्यता देख कर अचंभित थे। आखिरकार ओरछा के इंतजार की घड़ियां समाप्त हुई और महारानी जू प्रभु राम को ओरछा लेकर आई । लेकिन मंदिर का थोडा सा कार्य शेष था, तो महाराज ने कहा - रानी जू ! एक दो दिन में मंदिर का निर्माण पूरा हो जायेगा । तब तक आप मंदिर के निकट वाले महल में ही प्रभु को भोग लगा दीजिये । महाराज की बात मानकर महारानी ने भी प्रभु को महल में भोग लगाया । मगर प्रभु की लीला कौन समझ सका है ! रानी जू तो प्रभु की एक शर्त भूल ही गयी । "एक बार जहाँ रख दिया मैं वही स्थापित हो जाऊंगा "
और प्रभु राम अपनी शर्त अनुसार वहीँ महल में ही स्थापित हो गए ।
माँ बेत्रवती से मैंने पूछा - आखिर क्यों भगवान ने अपनी ये लीला दिखाई ? क्यों भव्य मंदिर में नही गए ?
पुत्र ! प्रभु की हर लीला का कोई न कोई कारण होता है। वैसे ही इस लीला का भी का कारण है । पहली बात भगवान राम ओरछा में भगवान नही राजा बनकर आये तो क्या राजा कभी मंदिर में रहता है ? नही न ! राजा सदैव महलों में ही रहता है । दूसरा कारण राजा मधुकर शाह का घमंड भी तोडना था , कि प्रभु अयोध्या से ओरछा आये और वो दर्शन के लिए महल के शैय्या से भी नही उतारना चाहते थे !
बस इसी कारण से प्रभु राजा के बनवाये भव्य मंदिर में नही गए । जो प्रतिमा तब अपनी जगह से नही हिली थी, वो आज वर्ष में कई बार विशेष अवसरों पर जैसे - रामनवमी, श्रावण तीज़, रामजानकी विवाह, दीवाली और होली आदि पर्वो पर गर्भगृह से बाहर आती है ।
मैं जिज्ञासु भाव से माँ बेतवा को निहार रहा था । तो माँ ने कहा पूछो अपने मन का प्रश्न ?
मैंने हाथ जोड़कर पूछा - माते ! फिर उस भव्य मंदिर का क्या हुआ ?
भव्य चतुर्भुज मंदिर 
पुत्र ! वह भव्य मंदिर कई वर्षो तक वीरान और सूना डला रहा । बाद में उसमे भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित की गयी और वो आज चतुर्भुज मंदिर के नाम से रामराजा मंदिर की निकट खड़ा है ।
माँ रामराजा मंदिर की ऐसी क्या विशेषता है , जो उसे अन्य राममंदिरों से विशेष बनाती है ?
पुत्र ! सिर्फ ओरछा के रामराजा मंदिर में ही -
राम राजा के रूप में विराजमान है । बाकि जगह भगवान के रूप में है ।
रामराजा को आज भी सुबह-शाम की आरती के समय सशस्त्र सलामी दी जाती है (मध्य प्रदेश सशस्त्र पुलिस बल द्वारा )
यही पर राम सिंहासन पर ढ़ाल-तलवार लिए बैठे है । बाकि जगह धनुषधारी है ।
यहीं पर राम बैठे अन्य मंदिरो में खड़े स्वरुप में है ।
यहां राम बैठे हुए एवं हनुमान जी खड़े है , अन्य जगह इसका विपरीत है ।
सामान्यतः किसी भी मंदिर में मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा होने के बाद मूर्ति अपने स्थान पर स्थिर होती है । यहां साल में कई बार मूर्ति गर्भगृह से बाहर आती है ।
मंदिर का समय भी सामान्य मंदिरों की तरह न होकर बल्कि एक राजा की दिनचर्या के अनुरूप है ।
मैं मंत्रमुग्ध होकर सुन रहा था,  कि बेतवा की लहरें शांत होने लगी । मैंने मायूस होकर पूछा - माँ क्या ओरछा की गाथा समाप्त हो गयी ?
जल कलरव से आवाज़ आई - नही पुत्र ! गाथा अब प्रारम्भ हुई है । अभी तो राय प्रवीण की अमर प्रणय कथा , वीरसिंह जूदेव का गौरव , हरदौल के लोकदेवता बनने की कहानी और भी बहुत कुछ बाकी है पुत्र ..बड़े दिनों बाद बेतवा के तट पर जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ ।  माँ बेत्रवती का वेग पहले से कम था । सूखे के इस मौसम में माँ भी बड़ी उदास सी लग रही थी । माँ तो आखिर माँ ही होती है । अपने बच्चों के दुःख से कैसे न दुखी होती । आखिर इस वर्ष पुरे बुन्देलखण्ड में लोग सूखे से त्रस्त है । कई जगह नदियों और जलस्रोतों पर पहरे लगाना पड़ रहा है । खैर बहुत दिनों बाद मिलने के कारण तो माँ नाराज नही हो सकती क्योंकि वो अपने बच्चों से नाराज नही हो सकती है । कुछ देर के इंतजार के बाद लहरों में हलचल शुरू हो गयी । मेरे शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गयी । माँ वेत्रवती बोली - पुत्र तुम्हारी व्यस्तता समझ सकती है । मैं तुमसे नाराज़ नही हूँ ।
मैने माँ को प्रणाम किया और पूछा माँ क्या पहले भी इस तरह बुंदेलखंड के लोगो को भी इस तरह सूखे का सामना करना पड़ता था ?
माँ बोली - नही पुत्र , खजुराहो के अद्भुत मंदिरो के निर्माता चंदेल शासको द्वारा पुरे क्षेत्र में सातवी-आठवीं सदी में ही जगह बहुत बड़े और सुन्दर तालाब खुदवायें । आज भी उनके अवशेष है, कई जगह आज भी लोग उन्ही पर निर्भर है । लेकिन आज का मनुष्य अपने स्वार्थ के कारण अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने लगा है । जमीन का पानी तो चूस रहा है, लेकिन ज़मीन में पानी तो पहुँच ही नही रहा है । जो पानी के पुराने स्रोत जैसे तालाब और  कुंऐं या अतिक्रमित कर कॉलोनियां बना दी गयी या कचरेदान बना दिए गए है । माँ की बात सुनकर मैं निशब्द हो गया । सच में हमने प्रकृति का दम घोंट दिया । कुछ देर वातावरण में शांति छाई रही ।
फिर माँ बोली बेटा चलो अपनी ओरछा गाथा शुरू करते है ....
अभी तक हम ने ओरछा में महराज मधुकर शाह और महरानी गणेश कुँवर के माध्यम से रामराजा का आगमन सुना था । अब आगे सुनेंगे ओरछा की जन नायिका राय प्रवीण की कथा जिसके आगे मुग़ल बादशाह अकबर को भी झुकना पड़ा।
क्रमशः अगले भाग में जारी
वर्तमान रामराजा मंदिर में प्रतिष्ठित रामराजा सरकार

मंगलवार, 10 मई 2016

बेतवा की जुबानी : ओरछा की कहानी (भाग-1)

एक रात को मैं मध्य प्रदेश की गंगा कही जाने वाली पावन नदी बेतवा के तट पर ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा हुआ. बेतवा की लहरों के एक तरफ महान बुंदेला शासको की छतरियां बनी हुई है, तो दूसरी तरफ ओरछा अभयारण्य जो कभी तुंगा मुनि की तपोभूमि रहा है. धवल चांदनी में बेतवा की लहरें हिलोर मार रही है .. तभी कलकल के कलरव के बीच कहीं से एक मधुर आवाज आती है...
हे पथिक...
क्या तुम मेरी आवाज सुन रहे हो ?
 हैरान होकर अपने आस पास देखा तो वहां मेरे अलावा कोई भी नही था. मैं आश्चर्य मिश्रित भय के साथ आने वाली आवाज के स्रोत को खोज रहा था. कभी फिर से आवाज ने मेरा ध्यान खींचा...
हे पथिक....
तुम्हे डरने की आवश्यकता नही है..
मैं हूँ....बेत्रवती !
जिसे तुम लोग अब बेतवा कहते हो .
मैंने ध्यान दिया तो आवाज बेतवा की लहरों से ही आ रही थी .....
मैने श्रद्धा वश हाथ जोड़ लिये
बेतवा की आवाज !
सुनकर तो मेरे रोंगटे ही खड़े हो गये . विश्वास ही नही हो रहा है, कि मैं जाग रहा हूँ , या सपना देख रहा हूँ. मुँह से आवाज ही नही निकल पा रही...तभी बेतवा की एक लहर तेजी से ग्रेनाइट की चट्टान से टकराई. पानी के छींटे मेरे ऊपर आये...मेरी तंद्रा टूटी ! हां मैं यथार्थ में ही बेतवा की आवाज सुन रहा हूँ , कोई स्वप्न नही देख रहा हूँ . मैने हाथ जोड़े ही माँ बेतवा से कहा - माता आपने मुझे ही वार्तालाप के लिए क्यों चुना ?
बेतवा- पुत्र मैं तो सदियों से अपनी आवाज सुनाने के लिए बसुधा पर प्रवाहित हो रही है, मगर मानव अपनी कथित प्रगति के शोरगुल में कहां प्रकृति या हम जैसी नदियों की आवाज सुन रहा है. आज तुम्हे अपने आंचल में बैठा देखा तो सोचा शायद तुम सुन पाओ .
मैं - माते मैं स्वयं को सौभाग्यशाली समझता हूँ , कि म० प्र० की गंगा स्वयं संवाद कर रही है.
बेतवा - पुत्र मैं बहन गंगा से बहुत ज्येष्ठ हूँ...वो तो धरा पर लाई गयी..जबकि मैं तो सदा से हूँ.
मैं - माँ जब आप सनातन काल से प्रवाहित हो तो क्या इस शहर की गाथा सुनाओगी ? तुमने तो इस नगर का जन्म, उत्थान, पतन सब देखा होगा.
धीरे-धीरे जैसे अंधेरा बढ़ रहा है, आकाश में चंद्रमा का तेज चरम की ओर जा रहा है, धवल चांदनी में बेतवा के जल में चंद्रमा का प्रतिबिंब भी हिलोरे ले रहा था. मानो बेतवा उसे अपने आंचल में बिठाकर झूला झुला रही हो ! कुछ देर की खामोशी के बाद ..बेतवा की सुमधुर आवाज फिर शुरू हुई ...
तुम इस नगर की कहानी पूछ रहे हो , मैने तो इस सृष्टि का भी उत्थान देखा है.मेरे उद्गम कुमरागांव (रायसेन जिला, म०प्र०) से प्रवाहित होकर यमुना से मिलने तक(हमीरपुर, उ०प्र०) सांची, विदिशा, ओरछा आदि का भूत, वर्तंमान देखा है.
बेतवा की लहरें कुछ शांत हुई , मानो ध्यान मग्न होकर अपने अतीत को याद कर रही हो . चंद्रमा भी आंचल के झूले से उतरकर एक तरफ चुपचाप सा बैठा गया. जैसे कोई शिशु माँ के स्तनपान के बाद सीने से लगकर ही सो गया हो. मैं भी आगे की गाथा सुनने को उत्सुक ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा चारो तरफ आंखे फाड़कर देख रहा हूँ, न जाने कब मां बेत्रवती अपने अतीत के समुद्र में गोता लगाकर वापिस आ जाये. तभी लहरों में हलचल प्रारंभ हुई ...मेरी आंखे खुशी से चमक उठी ...
मैने पूछा- मां क्यों चुप हो गयी थी ?
बेतवा- पुत्र तुम्हारे प्रश्न ने मुझे अतीत की यादों में लौटने को विवश कर दिया. अशोक और कारूवाकी का मेरे तट पर प्रेम पनपने से लेकर पुष्यमित्र शुंग की विजय गाथा, हेलियोडोरस का भागवत धर्म अपनाना, गुप्त शासकों का स्वर्ण काल, ओरछा में बुंदेलाओं का उत्थान-पतन, रामराजा का आगमन, केशव का काव्य, रायप्रवीण की प्रेमगाथा, लक्ष्मीबाई की वीरता , चंद्रशेखर आजाद का अज्ञातवास तक सब स्मरण है. सृष्टिकर्ता ने मुझे कितने गौरव के क्षण प्रदान किये ...आभार परमपिता !
ये बोल कर परम पावन बेत्रवती फिर अपनी यादों में खो गई !
मैने हाथ जोड़कर बेतवा की तंद्रा तोड़ते हुये निवेदन किया . माते ! इस अबोध बालक की धृष्टता को क्षमा करते हुये मुझे ओरछा की गाथा सुनाइये ना .
बेतवा की हिलोरें तेज होने लगी ....लगा चक्रवात बनने लगे .....मुझे लगा मेरी गलती का दंड मिलने वाला है !
लेकिन
कुछ देर बाद लहरें शांत हो गयी . बेतवा बोली -पुत्र ...आज सुनती हूँ ..इस पावन पुण्य भूमि ओरछा की कहानी ......एक लहर तेजी से मेरे ऊपर से बिना भिगोये गुजर गयी, जैसे माँ ने अपना ममतामयी हाथ मेरे सर पर फेरा हो.
इस पुण्य भूमि की कहानी महाभारत काल से प्रारंभ होती है, जिसका वर्णन महाभारत में भी है .उस काल में किसी कारण वश वेदों का ज्ञान नष्ट हो गया था ,तो ब्रम्हा, बिष्णु और महेश ने मेरे ही तट पर मेधावी यज्ञ का आयोजन कर पुन: वेदों का प्राकट्य किया.
मेरा पावन तट मुनियों की तपोभूमि रही है. आज भी ओरछा में मेरा दक्षिण तट तुंगारण्य कहलाता है, वो तुंग मुनि की तपोभूमि रही है . तुंग मुनि के आशीर्वाद से ही बुंदेलाओं ने ओरछा बसाकर अपनी राजधानी बनाई....
धीरे-धीरे चंद्रमा की आभा कम होने लगी , वो छतरियों के पीछे छुपने लगा ...इधर पूर्व दिशा में भगवान भास्कर उदित होने वाले है...माँ बेतवा ओरछा की स्थापना की कहानी कल सुनाने का वादा कर अपनी लहरों में खो गई. मुझे अचेतन छोड़ !
ओरछा की गाथा की जिज्ञासा मुझे फिर बेतवा के किनारे ले आया . सूर्य बुंदेला शासको की छतरियों की पीछे अस्त हो गया . मैं पास ही ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठकर इंतजार करने लगा. बेतवा लहरें अपनी मस्ती में ही बहती हुई चट्टानों पर उछल-कूद कर रही है. मैं भी उन्हे निहार रहा था, तभी लहरों में से मां बेतवा की आवाज आई - स्वागत है , प्रिय पुत्र ! कहो आज क्या सुनना चाहते हो ?
मैं हाथ जोड़े बोला- माँ , आज मुझे इस बुंदेलाओं की गौरव नगरी ओरछा की गाथा प्रारंभ से सुनाओ न !
बेतवा की लहरें शांत हो गयी, जैसे समाधि में लीन हो गयी हो. कुछ देर के बाद आवाज आयी, पुत्र ओरछा की गाथा की शुरूआत के लिए हमे काशी चलना होगा .
पर माँ आप काशी कैसे जायेगी ? मैने पूछा
लहरों के ऊफान के साथ बेतवा मुस्कुराई ! बत्स मेरा संगम सूर्यपुत्री यमुना से हुआ है, और यमुना का संगम गंगा से हुआ ...और गंगा काशी में है , तो फिर मेरा अस्तित्व काशी में हुआ कि नही ?
बिलकुल ! मैं अपनी नासमझी पर शर्मिंदा होते हुये बोला.
तो बात शुरू होती है, 14 वी सदी के काशी से....काशी के राजा ग्रहरवार थे. राजा ग्रहरवार की दो रानियां थी, पहली से चार पुत्र और दूसरी से एक पुत्र जिसका नाम पंचम था. जब सत्ता प्राप्ति के लिए भाइयों में संघर्ष प्रारंभ हुआ तो पंचम ने स्वयं को इस संघर्ष से दूर कर लिया. पंचम बिंध्यवासिनी देवी का बहुत बड़ा भक्त था. वह प्रतिदिन देवी को अपने रक्त की बूंदों से तिलक करता था. पंचम की पूजा से देवी प्रसन्न हुई .
पंचम की रक्त बूंद पूजा से देवी प्रसन्न हुई और पंचम (जिसका मूल नाम हेमकरण है) को साम्राज्य निर्माता होने का वरदान दिया. चूंकि बिंध्यवासिनी की पूजा पांच रक्त की बूंदों से की गयी , तो हेमकरण पंचम बिंध्येला/बुंदेला कहलाये. देवी ने पंचम को बताया कि एक विशेष वृक्ष पर गिद्ध बैठा होगा , वही पर तुम अपने साम्राज्य की नींव डालना. हेमकरण देवी की आज्ञानुसार अपने कुछ विश्वस्त साथियों के साथ बिंध्यांचल की पहाड़ियों में खोजते-जोहते जेजाकभुक्ति क्षेत्र पहुँचा , यहां पर खंगार क्षत्रिय शासक राज कर रहे थे, उनकी राजधानी कुण्डार थी . कुण्डार का अभेद्य किला जो अब तक अपराजेय था, उसके पास ही वह विशेष वृक्ष जिस पर गिद्ध बैठा था, पंचम बुंदेला को नजर आया. पंचम ने आँख बंद कर देवी को स्मरण किया , देवी भी अपने भक्त की पुकार सुनकर गिद्ध पर सवार होकर पंचम की सहायता के लिए आ पहुँची. पंचम ने देवी का आशीर्वाद पाकर अपराजेय गढ़कुण्डार पर आक्रमण कर दिया. अचानक हुये हमले से खंगार शासक को संभलने का मौका ही नही मिला और अपराजेय गढ़कुण्डार पर विजय पंचम का राजतिलक कर रही थी. चूंकि देवी ने गिद्ध पर सवार होकर पंचम बुंदेला की सहायता की तो पंचम ने सर्वप्रथम देवी गिद्धवाहिनी का मंदिर निर्माण करवाया जो आज भी है. अब पंचम बुंदेला खंगारो के राज्य का शासक था, जिसे बुंदेलखंड नाम दिया गया. पंचम के बाद उनके वंशजों ने न केवल गढ़कुण्डार को सुदृढ़ किया बल्कि बुंदेलखंड के क्षेत्र का भी विस्तार किया. पंचम के वंशज रूद्रदेव ने अपने बढ़े हुये राज्य के हिसाब से नई राजधानी की जरूरत महसूस की. बुंदेलाओं का सौभाग्य था, कि उनके उदय के समय चंदेल साम्राज्य अपनी अंतिम सांसे गिन रहा था. पूरे क्षेत्र में कोई ताकतवर प्रतिद्वंदी नही था. हालांकि पश्चिम भारत में मुस्लिमों के आक्रमण शुरू हो चुके थे. पृथ्वीराज चौहान राजपूताना में गौरी के हाथों पराजित हो चुके थे ।
बेतवा की तरंगे आज कुछ ज्यादा ही हिलोरे मार रही है. मैने जब इसका कारण मां बेतवा से जानना चाहा तो बेतवा की एक लहर उछलकर मेरे ऊपर से गुजरी मेरे बालों को गीला करते हुये ..जैसे कोई मां अपने बच्चे के सर पर प्यार से हाथ फेर रही हो . मां का यह स्नेह मुझे हृदय तक भिगो गया. तब मां बेतवा ने बताया - पुत्र ! आज बुंदेला साम्राज्य की गाथा बहुत ही अहम् मोड़ लेने वाली है . आज बुंदेला वीर मेरे तट पर आने वाले है, यही याद कर प्रफुल्लित हो रही हूँ.
ये सुनकर मेरी उत्सुकता बढ़ने लगी . माँ जल्द ही बताओं न ! आगे क्या हुआ ?
बत्स ! जरा धैर्य धारण करो ! सब सुनाती हूँ . जरा मुझे भी तो उस क्षण को याद कर आनंद ले लेने दो. और बेतवा की लहरें ज्वार की भांति ऊंची उठकर शांत हो गयी. मैं ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा प्रतिक्षारत बेतवा की लहरें पर चंद्रमा के प्रतिबिंब को झूला झूलते देखने लगा.
आत्म आनंद के बाद बेतवा की आवाज फिर से आई . रूद्रदेव अपनी राजधानी गढ़कुंडार से शिकार खेलने मेरे और जामनी के संगम से लगे तुंगारण्य क्षेत्र की ओर बढ़े . मेरे दक्षिण तट पर तुंग मुनि का आश्रम व तपोवन था, जिस कारण इस क्षेत्र को तुंगारण्य कहते है. पूरा क्षेत्र प्रकृति की गोद में बसा हुआ था, जिसे प्रकृति ने अपने दोनो हाथों से संवारा था. रूद्रदेव को यहां की प्राकृतिक सुंदरता ने मोह लिया. राजा रूद्रदेव ने तुंग मुनि से आज्ञा प्राप्त कर मेरे उत्तरी तट के घने वन में शिकार के लिए अपने दल-बल को आगे बढ़ाया. राजा का शिविर की व्यवस्था की गई . तभी रूद्र को एक शिकार नजर आया...उसने अपने शिकारी कुत्तों को आदेश दिया. ...ओरछा (मतलब उछलो) शिकार जिस दिशा में भागा वहां की सुंदरता रूद्र देखता ही रह गया ! रूद्र अपने प्रधानमंत्री से बोला - प्रधानमंत्री जू ! मेरे विचार से यह जगह राजधानी हेतु उत्तम रहेगी . आपका क्या विचार है ?
प्रधानमंत्री- महाराज ! आपका विचार अतिउत्तम है , यह जगह एक ओर बेतवा व जामनी की वजह से तो दूसरी ओर ऊंची पहाड़ियों की वजह से सुरक्षित भी है, और प्रकृति ने भी इस पर पूरा दुलार किया है . राजधानी के लिए इससे उत्तम स्थान आसपास कहीं नही है .
रूद्रदेव - लेकिन हम अपनी नई राजधानी का नाम क्या रखेंगे ?
प्रधानमंत्री - महाराज जू ! इस जगह के देखने के पूर्व आपके मुँह से " ओरछा " शब्द निकला था, तो क्यों न इसका नाम ओरछा ही ऱखे ?
रूद्रदेव - बहुत बढिया ! प्रधानमंत्री जू . आगे की तैयारी करें .....
और इस तरह मेरे तट पर बुंदेलाओं की नयी राजधानी ' ओरछा ' का निर्माण जोर शोर से शुरू हो गया .....
ओरछा का राजमहल 
यह कहकर बेतवा शांत हो गयी....
फिर कुछ समय पश्चात् ...
माँ बेतवा आनंदित होकर ओरछा की निर्माण गाथा सुना रही थी , उनकी लहरें प्रसन्नता के मारे हिलोर मार रही थी, ऊपर आकाश में चंद्रमा भी गाथा सुनने मेघ-झरोखे से झांक रहा था ! राजा रूद्रदेव ने सन 1531 में ओरछा किले की नींव रखी जिसे हजारों मजदूरों और सैकड़ो मिस्त्रियों ने दिन-रात मेहनत कर सन 1539 में किले सहित ओरछा का सुंदर व भव्य नगर तैयार किया. कहकर माँ बेतवा चुप हो गई ....लहरों का प्रवाह शांत ही रहा..बेतवा की ध्वनि कुछ पल बाद प्रकट हुई...बत्स ...रूद्रदेव के बाद उसका पुत्र भारतीचंद्र राजा हुआ, जिसने ओरछा को और सजाया संवारा. मगर ओरछा को गौरवमयी क्षण तो भारतीचंद्र के पुत्र मधुकर शाह के राज्यकाल में मिलने वाला था. मधुकर शाह सन 1554 ई० में ओरछा की राजगद्दी पर बैठे. मधुकर शाह कृष्ण भक्त थे, सखी संप्रदाय को मानने के कारण स्त्रियों की भेषभूषा में कृष्ण की भक्ति करते , नाच-गान करते थे. प्रतिवर्ष ब्रज की यात्रा करते थे. मैने पूछा - क्षमा कीजिए माँ , ये सखी संप्रदाय क्या है ?
माँ बेत्रवती मुस्कुराते हुये बोली- पुत्र बहुत से साधु कृष्ण को सखा और स्वयं को उनकी सखी मानकर उनकी भक्ति करते है . आराधना के समय स्त्रियों जैसे वस्त्र आभूषण पहनकर कृृष्ण की प्रतिमा के सामने नाचते गाते है . भले ही मधुकर के आराध्य कृष्ण थे , परंतु ओरछा की नियति में तो राम लिखे थे ! आखिर कैसे मधुकर शाह के जीवन में गणेश कुंवरि ने राम का प्रवेश हुआ ? कैसे अयोध्या के रामलला ओरछा में रामराजा हो गये ? क्यों मधुकर शाह का बनाया भव्य चतुर्भुज मंदिर सूना रह गया ? ये प्रश्न अनुत्तरित छोड़ बेतवा अपने मगन हो मुझे ग्रेनाइट की शिलाओं पर छोड़ गयी...
अगले दिन -
बेतवा की लहरें मध्यम गति से प्रवाहित हो रही है...मैं ओरछा की कहानी सुनने की जिज्ञासा लिए ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा बेतवा के उत्तरी तट पर बनी बुंदेला शासको की छतरियों( समाधियों) में से मधुकर शाह की भव्य छतरी को निहार रहा हूँ...मधुकर शाह हुमांयु व अकबर के काल में भी मुगल हमलों से न केवल वीरता से लड़े बल्कि मुगल सेनाओं को नाको चने चबवायें. बढते मुगल साम्राज्य के बीचो बीच बुंदेला पताका लहरा रही थी . मैंने मन ही मन इस महान बुंदेला को नमन किया. तभी बेतवा की लहरों में हलचल शुरू हुई....मां बेतवा की उल्लासित आवाज़ ने मेरी तंद्रा भंग की. बत्स आगे की कहानी सुनो...मधुकर शाह जहां बहुत बड़े कृष्ण भक्त थे, वहीं उनकी पहली रानी गणेश कुंवरि महान रामभक्त थी. महाराज हर बर्ष की तरह ब्रज यात्रा करने वाले थे, तो उन्होने गणेश कुंवरि को भी साथ लेने का निश्चय किया. जब महाराज ने महारानी से जब ब्रजयात्रा की बात कही तो महारानी जू ने ब्रज की जगह अवध जाने की बात कही. महारानी की बात सुनकर महाराज क्रोधित हो गये , बोले- ठीक है, महारानी जू , अगर आप इतनी बड़ी रामभक्त हो , तो अवध से तभी लौटना जब अपने राम को ओरछा लेके आओ. महारानी गणेश कुंवरि भी क्षत्राणी थी, उन्होने भी संकल्प लिया कि वो ओरछा तभी लौटेंगी जब अपने आराध्य राम को लेकर ही आयेंगी अन्यथा प्राण त्याग देंगी. इधर महाराज मधुकरशाह ब्रज की यात्रा के लिए निकले और उधर महारानी गणेश कुंवरि अवध की यात्रा पर . अवध पहुँचकर महारानी जू ने सरयू तट पर अपने आराध्य श्री राम को पाने के लिए तपस्या शुरू कर दी ...जब प्रभु प्रसन्न नही हुये तो अन्न जल त्यागकर तपस्या शुरू कर दी ....शरीर बिलकुल सूख गया...बस प्राण किसी तरह प्रभु की आस में अटके थे, तब भी प्रभु प्रसन्न नही हुये तो रानी जू ने सरयू में छलांग लगा दी .......बेतवा की लहरें ववंडर की भांति तेजी से घूमने लगी.. मेरा मन भी आशंकित हुआ ...मगर बेतवा मेरे मन में कई प्रश्न छोड़कर चली गयी ..क्या गणेश कुंवरि ने प्राण त्याग दिये ? क्या प्रभु राम कलियुग में भी प्रकट हुये ? क्या राम ओरछा आ पाये ? क्या मधुकरशाह का मन पिघला ?
क्रमशः अगले भागों में भी जारी.....

सोमवार, 9 मई 2016

थरथराता प्लेटफॉर्म और आधी रात को लुटे-पिटे हम !


मित्रों कई बार घुमक्कडी के दौरान कई ऐसी घटनाएं हो जाती है , कि जीवन भर याद रह जाती है । ऐसी एक घटना आज आप से साझा कर रहा हूँ ।
 पांच साल पुरानी है , अप्रैल 2011 की तब भी बंगाल में विधानसभा चुनाव हो रहे थे ।
बिहार लोकसेवा आयोग की प्रारंभिक परीक्षा का परीक्षा केंद्र मुझे किशनगंज मिला । किशनगंज बिहार का एक पिछड़ा मुस्लिम बहुल इलाका है । जो चिकन नेक यानि बांग्लादेशी सीमा के नजदीक है । मैंने इस जगह का नाम सिर्फ शाहनवाज़ हुसैन के लोकसभा क्षेत्र के तौर पर सुना था ।
अकेले जाने की इच्छा नही हो रही थी । तो पटना में रह रहे मेरे मंझले भाई निकेश को तैयार करने को सोचा । मगर वो किशनगंज जाने को तैयार हो कैसे ? आखिर कोई घूमने वाली जगह तो है नही !
खैर दिमाग लगाकर उसे किशनगंज के नजदीक प्रसिद्द हिल स्टेशन दार्जलिंग घुमाने का लालच दिया। तो उसने अपने एक दोस्त आकाश अग्रवाल को भी तैयार कर लिया ।
खैर दार्जलिंग की बात घर में किसी को नही बताया ।खैर जैसे तैसे हम लोग शाम को किशनगंज पहुँच ही गए । मैंने कल्पना की थी , कि जिला मुख्यालय है तो ठीक ठाक शहर होगा । मगर मेरी कल्पना गाड़ी के स्टेशन पर पहुचते ही धराशायी हो गयी । पूरा स्टेशन परीक्षार्थियों से भरा पड़ा था । जहाँ नजरें घुमाओं वही नवयुवा समूह किताब - नोट्स लिए ठसे पड़े थे । खैर ट्रेन से उतरने में ज्यादा मशक्कत नही करनी पड़ी । बस अपने बैग उठा कर सीट से खड़े हुए । लोगों के रेले ने ठेल कर प्लेटफॉर्म पर पहुँचा दिया । उतारकर उन दोनों को खोजा।
अब पटना से ट्रेन पकड़कर कटिहार पहुँचे । वहां ट्रेन बदलनी थी । तो एक पैसेंजर ट्रेन मिली ठसाठस भरी हुई । हम 3 लोग दो बोगी में बैठे । केले के खेतों के नज़ारे खिड़की से दिखाई दे रहे थे । ट्रेन में परीक्षार्थी ही ज्यादा बैठे । वो भी बेटिकट । मैथिलि भाषी युवाओं के हुजूम की बातें सर के ऊपर से जा रही थी ।।

खैर ट्रेन किशनगंज पहुँच ही गयी ।
अब सबसे पहले सोचा कि पहले रात गुजारने की व्यवस्था कर ली जाये , फिर आगे सुध ली जाये । जैसा कि पहले बताया कि किशनगंज बहुत बड़ा शहर नही था । स्टेशन के बाहर निकला लेकिन मुसीबतें आना तो अब शुरू होना था । स्टेशन के आसपास के इक्का दुक्का लॉज नुमा होटल होउसफुल थे । यहां तक कि उनकी छत भी गद्दे लगाकर 50-50 रु0 में फूल हो चुकी थी ।खैर कुछ लोकल्स की बात मानकर मुख्य बाजार की तरफ गए । पूरा शहर (जितना भी था) छान मारा मगर कहीं रुकने का ठिकाना नही मिला । रात गहरी हो चुकी थी । भूख भी चरम पर पहुँच रही थी । फिर वापिस स्टेशन लौटे । खाने की दुकानों पर खाने के भाव बढ़ चुके थे । और खाने में भी बस दाल-चावल-चोखा ही था । बहुत थक चुके थे । इसलिए उसी के लिए तैयार हुए । पर हाय री किस्मत ... हमारे पहुँचने पर वो भी खल्लास !
जैसे तैसे नींद आई । तभी स्टेशन पर कोई ट्रेन आई । ट्रेन के आने से ही पूरा प्लेटफॉर्म थरथराने लगा । मेरी नींद खुल गयी । अब ट्रेन के जाने का इंतजार करने के अलावा कोई विकल्प नही था । चाय- मूंगफली वाले जोर जोर से चिल्ला रहे थे ।
कपडे उतारकर बरमूडा-टी शर्ट पहनी और नीचे चादर बिछाई ।बैग को तकिया बनाया और चादर के नीचे ही जूते छुपाये । मेरे भाई और उसके दोस्त को नींद नही आ रही थी । आती भी कैसे जो मच्छरों की फौज अपनी मौज में तल्लीनता से लगी थी । खैर मुझे सुबह पेपर देना था , तो मैं लेट गया गमछा ओढ़कर ।
अब मरता क्या न करता ।जो मिला उसी से काम चलाया । बिस्किट और नमकीन ।
और रात गुजरने के लिए रेलवे स्टेशन पहुचे । परीक्षार्थियों के बिछोने पुरे प्लेटफार्म पर बिछ चुके थे । अब सुबह से पेपर था तो सोना अनिवार्य था । जैसे तैसे कुछ जगह बनायीं । अप्रैल की गरमी थी ।
खैर कुछ देर में ट्रेन अपना कारवां लेकर चली गयी । धीरे धीरे माहोल पुराने रंग में आया । लेकिन मेरे तो पैरों तले से जमीन ही खिसक गयी .....
मैंने अपने आसपास देखा तो भाई और उसका दोस्त गायब ..और इतना ही नही बैग और जूते भी गायब !!
मेरा तो दिमाग ही सुन्न सा हो गया । आखिर कुछ समझ ही नही आ रहा था । मैं सिर्फ बरमूडा-टी शर्ट पर लुटा-पिटा सा हैरान चारो तरफ दोनों को और सामान को खोज रहा .....
न पास में मोबाइल
न जेब में पर्स या पैसे
न बदन पर पुरे कपडे ..
पुरा प्लेटफॉर्म खचाखच भरा हुआ । अब क्या करूँ ?
कहीं खोजने भी नही जा सकता क्योंकि हो सकता वो दोनों आसपास ही हो । और जब मुझे वहां न देखे तो परेशान हो सकते है । है तो बच्चे ही । अब मेरे पास उसी जगह पर  इंतजार करने के अलावा कोई विकल्प नही था ।संजय जी डर खुद के लिए नही उन दोनों के लिए चिंता थी

आँखों से नींद गायब हो गयी । अब चुपचाप चारो तरफ आँखे फाड़कर उन दोनों को खोज रहा था । सुबह के चार बज गए । लोग जागने लगे थे । लेकिन उन दोनों का कहीं पता ही नही । खैर जैसे तैसे प्लेटफॉर्म का एक चक्कर लगा कर आया , तो देखा दोनों मजे से वेटिंग रूम में चार्जिंग पिन में चार्जर लगाकर मोबाइल चार्ज कर रहे थे । अब मेरा गुस्सा फट पड़ा ।
 दोनों ने कहा कि नींद नही आने के कारण वो यहां मोबाइल चार्ज करने आ गए । बैग और जूते इसलिए उठा लाये ताकि मेरी नींद का फायदा उठाकर चुरा न ले । मुझे इसलिए नही बताया कि मेरी नींद ख़राब न हो । खैर नींद तो ख़राब तो हो ही गयी थी । सुबह पेपर दिया । और अपने वादे के मुताबिक निकल पड़े दार्जलिंग के लिए ।मगर...
और चल पड़े सिलीगुड़ी की  और
उस समय बंगाल में विधान सभा चुनाव होने के कारण बस बंद । बस स्टैंड पर कई घंटे गुजरने के बाद एक ठसाठस भरी बस आई । नीचे जगह न होने के कारण बस की छत पर बैठे (पहली बार )

आगे का सफ़र भी सुहाना नही रहा । चुनाव के कारण वाहन आसानी से नही मिल रहे थे । खैर जब दार्जलिंग में टाइगर हिल से कंचन जंघा को देखा तो सब कष्ट भूल गया ।


orchha gatha

बेतवा की जुबानी : ओरछा की कहानी (भाग-1)

एक रात को मैं मध्य प्रदेश की गंगा कही जाने वाली पावन नदी बेतवा के तट पर ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा हुआ. बेतवा की लहरों के एक तरफ महान ब...