शनिवार, 27 जून 2009

मैं एक आम इन्सान हूँ

मैं एक आम इन्सान हूँ
हर कदम जिन्दगी से परेशान हूँ
जन्म लेता हूँ, गंदे सरकारी अस्पतालों में
या फ़िर अंधेरे कमरों, सूखे खेतो या नालो में
पलता-बढ़ता हूँ , संकरी छोटी गलियों में
खेलता फिरता हूँ , मिटटी-कीचड और नालियों में
ऊँची इमारतो को देख , मैं हैरान हूँ !
मैं एक आम इन्सान हूँ
खंडहर से सरकारी स्कूलों की पढ़ाई
क्लास बनी प्लेग्राउंड, साथियों से होती लडाई
होश सँभालते ही, शुरू होती काम की तलाश
आँखों में सपने, होती कर गुजरने की आस
पर लगता मैं बेरोजगारी की शान हूँ
मैं एक आम इन्सान हूँ
जैसे तैसे मिलती रोजी-रोटी, चलती जीवन की गाड़ी
हर राह पर पिसता देश का ये खिलाड़ी
हर विपदा हमारे लिए होती, देखो जिन्दगी का खेल
हर बार हम होते बर्बाद, करती मौत हमसे ही मेल
बाढ़,सूखा,भूकंप,अकाल का मैं बरबाद हुआ सामान हूँ
मैं एक आम ......
आपका ही मुकेश पाण्डेय "चंदन "

2 टिप्‍पणियां:

  1. Mukesh aaapne bahot hi acchi tarah se ek aam insaan ke jeevan ko vyakt kiya hain...

    aapko baatadu mein bhi civil services ke liye tayarri shuru kar rahi hu..

    aap apne blog ka colour thoda change karde to padne mein dikkat nahi hogi...jst a suggestion...at d end itz ur blog..u can use vchever colour..

    btw..thnx fr dropping by my blog..nd thnk u very mch fr commenting..

    Regards,
    Mayuri

    उत्तर देंहटाएं
  2. जिंदगी जीने का हक़ तो कुछ खास आदमियों को ही हैं,
    आम आदमी की जिंदगी तो ठीक वैसे ही चलती है जैसा आपने बताया,

    सुंदर रचना ..अति सुंदर..

    उत्तर देंहटाएं

ab apki baari hai, kuchh kahne ki ...

orchha gatha

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