रविवार, 12 अगस्त 2012

यही तो देश का कष्ट है


यही तो देश का कष्ट है
कि सारे नेता भ्रष्ट है
राजनीती तो अब नष्ट है
तब भी नेता स्वस्थ्य है
वे घोटालो के अभ्यस्त है
और आम जनता त्रस्त है
सारे मौका परस्त है
सब अपने में मस्त है
वतन कि हालत पस्त है
खुशहाली अस्त-व्यस्त है
यही तो देश का कष्ट है
कि अब सब ध्रतराष्ट्र  है
- मुकेश पाण्डेय 'चन्दन'

12 टिप्‍पणियां:

  1. जनता भी तो धृतराष्‍ट्र से कम नहीं, जो हर बार उन्‍हें ही ले आती है

    उत्तर देंहटाएं
  2. यही तो कष्ट है ..कैसे ये दूर हो ..सब अपने में मस्त है ..सुन्दर प्रस्तुति..

    उत्तर देंहटाएं
  3. केलव धृतराष्ट्र नहीं उनके उपजाये सौ, उनसे भी एक कदम आगे !

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत अच्छी सन्देशपरक रचना!
    इस बीमारी का इलाज कैसे हो पायेगा?

    उत्तर देंहटाएं

ab apki baari hai, kuchh kahne ki ...

orchha gatha

बेतवा की जुबानी : ओरछा की कहानी (भाग-1)

एक रात को मैं मध्य प्रदेश की गंगा कही जाने वाली पावन नदी बेतवा के तट पर ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा हुआ. बेतवा की लहरों के एक तरफ महान ब...