सोमवार, 10 दिसंबर 2012

हाईटेक नही होना चाहता , मेरा गाँव !!

हाईटेक नही होना चाहता , मेरा गाँव 
न धन-दौलत , न  सोना चाहता है मेरा गाँव 
 भरी बरसात में  , जब खेत होते लबालब
किसी घर में प्रसव पीड़ा, सुन कांपते सब 
चारपाई पे रख के दौड़ते ,जब  चार कंधे 
कीचड़ -पानी सब भूल , भागे जाते बनके अंधे 
किस्मत हुई तो , सही वक़्त पे मदद देगा दूजा गाँव 
वरना उन्ही चार कंधो पर , लौटेगा बिलखता बहाव 
सुनसान रातों में , किसी बुजुर्ग को चलती खांसी 
धड़कने तेज , बच पायेगा  या लग जाएगी फांसी 
आज़ादी के इतने साल बाद , हो गया इंडिया शाईन 
पर मेरे गाँव में आज भी बसते, ओझा और डाईन
बिन सड़क, बिन अस्पताल, कैसे चले विकास की नाव    

मित्रो , मेरा गाँव बिहार के बक्सर जिले के सिमरी प्रखंड (ब्लाक ) के अंतर्गत 'गोप भरवली'  है . कहने को तो मेरा गाँव ब्लाक से १ कि०मि० की दुरी पर है , मगर लगभग १००० की आबादी आजादी के ६५ सालों बाद भी विकास की सारी सुविधाओ से दूर है . आज भी सड़क ( कच्ची या पक्की ) न होने के कारण मेरा गाँव बाकि देश - दुनिया से कटा  है  . सड़क बनवाने के लिए ग्रामवासियों ने बी०डी 0 ओ० से लेकर माननीय मुख्यमंत्री ' सुशासन बाबु ' तक अर्जी लगाई, मगर नतीजा वही ढाक के तीन पात. आज भले ही प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना जैसी योजना पुरे देश में चल  रही है , मगर मेरे गाँव से वो दूर ही है . अगर विकास को ढूँढा जाये तो मेरे गाँव में दो प्राथमिक  विद्यालय , कुछ टूटी- फूटी  सिन्धु घाटी  सभ्यता के अवशेषों की तरह  पक्की नालियों  
मेरे गाँव के जांबाज़ युवा जो मिटटी में आनंद ढूंढ रहे !
के अवशेषों के अलावा कुछ नही मिलता . हाँ बिजली आ गयी  है , जिसकी सूचना देता राजीव गाँधी की फोटो व राजीव गाँधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना का बोर्ड गाँव की शुरुआत में ही लगा है . इसके अलावा मनरेगा के कार्य तो बस खानापूर्ति की तरह होते है . हा आधुनिकता की चाह ने लोगो को मोबाइल फोन्स से जरुर जोड़ दिया है , जिसमे प्रोढ़ भोजपुरी गाने देखते-सुनते रहते है , तो युवा पीढ़ी आधुनिक नौकरियों से बेपरवाह फेसबुक और इंटरनेट की रंगीनियों के जाल में फंसा है .गाँव के  कुछ जागरूक लोगो ने गाँव की प्रगति और विकास के लिए अपनी क्षमता अनुसार प्रयास किये ...यहाँ तक कि माननीय मुख्यमंत्री जी को ज्ञापन भी दिया ....आधिकारियो , जनप्रतिनिधियों के आगे गुहार लगाई ...मगर मिला तो बस आश्वासन ...गाँव की समस्याओं का निराकरण न हो पाने का मूल कारण स्वयं की ग्राम पंचायत न हो पाना है , क्योंकि अभी हमारा गाँव 'आशा पड़री ' ग्राम पंचायत में आता है , जहाँ हमारे गाँव की साडी आशाएं पड़ी रहती है ...क्योंकि पंचायत में हमारे गाँव से केवल एक मात्र वार्ड मेंबर है , जिसकी आवाज़ नक्कारखाने में तूती बनके रह जाती है . अब तो गाँव के लोग अपनी  इस आदिम जिन्दगी के आदि हो गये है , और इसी में खुश है.  

4 टिप्‍पणियां:

  1. मन के दर्द और गाँव की व्यथा बहुत उम्दा प्रस्तुति,....बधाई,मुकेश जी,,

    recent post: रूप संवारा नहीं,,,

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  2. बहुत ही यथार्थ चित्रण किया है आपने।। साधुवाद।।

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  3. सरकारी योजनाओं की सत्यता की पोल खोल डाली.

    सुंदर आलेख.

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ab apki baari hai, kuchh kahne ki ...

orchha gatha

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