बुधवार, 7 मार्च 2018

सांची : पत्थरों पर लिखा अध्यात्म

मेरी पिछली पोस्ट में आप बोधगया ,राजगीर और नालंदा जैसे बौद्ध स्थलों की मेरी यात्रा को पढ़ चुके हैं और जो इन पोस्टों को पढ़ने से चूक गए हैं वह दी गई लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं । बौद्ध स्थानों की श्रंखला को आगे बढ़ाते हुए आज हम सांची के बौद्ध स्तूपों की यात्रा पर चलेंगे ।

                                                              मध्य प्रदेश माध्यमिक शिक्षा मंडल से शिक्षा प्राप्त मैंने बचपन से किताबों में सांची के बारे में खूब पढ़ा और उसके चित्र बचपन से ही आकर्षित करते आ रहे हैं। परंतु कई बार भोपाल जाने के बावजूद भी सांची के संयोग नहीं बन पा रहे थे । 20 सितंबर 2017 को पासपोर्ट बनवाने के लिए भोपाल जाना था तो इस बार ठान लिया था कि भोपाल से लौटते हुए सांची जरूर जाऊंगा । मैं ओरछा से अपनी कार से सड़क मार्ग से भोपाल के लिए निकला । भोपाल पहुंच कर पासपोर्ट ऑफिस में पासपोर्ट संबंधी औपचारिकताएं निभाने के पश्चात वापस लौटा । और बहुप्रतीक्षित मेरी सांची यात्रा शुरू हुई । साँची वैसे तो रायसेन जिले में आता है परंतु विदिशा जिले के मुख्यालय से इसकी दूरी मात्र 10 किलोमीटर है जबकि भोपाल से 40 किलोमीटर पूर्वोत्तर दिशा में स्थित है । दिल्ली से भोपाल रेल मार्ग के मध्य यह विदिशा के बाद एक रेलवे स्टेशन साँची भी है । और सड़क मार्ग से भी अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है । अब हम दिन ढलने के कुछ देर पहले ही सांची पहुंचे । सड़क से ही पहाड़ियों के ऊपर स्तूप नजर आ रहे थे । और हमने अपनी कार पहाड़ी के ऊपर बनी स्तूपों वाली मार्ग पर मोड़ दी, परंतु कुछ दूर चलने चलने के बाद पता चला कि टिकट घर तो नीचे ही है ।  वापस लौटे और टिकट लिया ।  पुनः पहाड़ी के शीर्ष की ओर चल दिए । 
            सांची के स्तूपों को देखने से पूर्व मैं सांची के इतिहास के बारे में थोड़ा सा चर्चा करना चाहूंगा । सांची के स्तूप एक बौद्ध स्मारक हैं, जिनका निर्माण काल तीसरी शताब्दी ईसापूर्व से बारहवीं शताब्दी के बीच माना जाता है । सबसे पहले महान सम्राट अशोक ने सांची स्तूपों का निर्माण तीसरी शताब्दी ईसापूर्व में कराया । और सांची स्तूप मौर्यकालीन कला के सबसे सुंदर उदाहरणों में से एक है । सांची स्तूप को सम्राट अशोक ने गौतम बुद्ध और बौद्ध धर्म के संदेशों को पूरे विश्व में प्रसारित करने कि एक सुनियोजित योजना के तहत स्थापित किया । सम्राट अशोक ने पुराने  स्तूपों को खुदवाकर उनसे मिले गौतम बुद्ध और उनके प्रिय शिष्य के अवशेषों को 84000 भागों में बांट कर अपने साम्राज्य साहित्य निकटवर्ती देशों में भेजकर बड़ी संख्या में स्तूपों का निर्माण करवाया । इसके अलावा मिट्टी और ईटों से बने स्तूपों को स्थाई रूप देने के लिए उन्हें पत्थरों से निर्मित कराया और मौर्यकालीन सुंदर शिल्प कला से सुसज्जित किया । सांची को प्राचीन काल में कांकेन्वा, ककन्या और ककनादबोट आदि नामों से जाना जाता रहा है । सम्राट अशोक की एक पत्नी श्रीदेवी विदिशा की ही रहने वाली थी और हो सकता है कभी वह अपनी ससुराल विदिशा आए हो और सांची कि यह पहाड़ियां उन्हें आकर्षित की होंगी इसलिए उन्होंने इस क्रम में स्थान को स्तूप बनाने के लिए चुना होगा ।
                                                   सांची का स्तूप बौद्ध शिक्षा के प्रमुख केंद्रों के रूप में विकसित हो चुका था चीनी यात्री व्हेनसॉन्ग के यात्रा वृतांतों में भी सांची का उल्लेख मिलता है । दूसरे चीनी यात्री फाहियान ने तो साँची  और उसके आसपास के क्षेत्र जिसे मालवा के नाम से जाना जाता है यहां की जलवायु को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ जलवायु कहा । गुप्त काल में विदिशा या भेलसा नगरी का महत्व अत्यधिक बढ़ गया था तो जाहिर सी बात है साँची इससे अछूता कैसे रह पाता। गुप्त काल में गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम के शासनकाल का एक शिलालेख सांची से भी मिला है । जिसके अनुसार बौद्ध उपासक संसद की पत्नी उपासिका हरी स्वामिनी द्वारा काकना दबोट यानी वर्तमान सांची में स्थित आर्य संघ के नाम कुछ मात्रा में धन दान में दिए जाने का उल्लेख है । सांची का महत्व राजपूत काल तक बना रहा परंतु मुस्लिम आक्रमण के पश्चात सांची की प्रतिष्ठा धूमिल हो गई और वह पहाड़ियों के बीच घनी झाड़ियों और पेड़ों में छुप गया । पूरे मध्य काल तक सांची गुमनामी में गुम हो चुका था ।    फिर 19वीं सदी में एक अंग्रेज अधिकारी कर्नल टेलर जब इस तरफ से गुजरे तो उन्हें सांची के स्तूप जर्जर अवस्था में मिले । कर्नल टेबल द्वारा स्तूपों का उत्खनन करवाया गया और इन्हें व्यवस्थित कर कर इनका जीर्णोद्धार किया । स्थानीय लोग बताते हैं कि कर्नल टेलर ने इसके अंदर धन संपदा होने की आशा में इसकी खुदाई करवाई जिससे इस संरचना को काफी नुकसान हुआ बाद में पुरातत्वविद् मार्शल ने इसका जीर्णोद्धार कराया ।
                                  अब इतिहास से वर्तमान की ओर आते हैं हम जब सांची के स्तूपों को देखने पहाड़ियों के ऊपर पहुंचे तो यह स्तूप देर देखने में भले ही मामूली अर्ध गोलाकार संरचनाएं प्रतीत होते हैं लेकिन निकट जाने पर इनकी भव्यता विशिष्टता और बारीकियों को देखकर लोग आश्चर्यचकित हो जाते हैं । सांची के स्तूप के पत्थरों पर की गई विशिष्ट कारीगरी न केवल देसी बल्कि विदेशी पर्यटकों को भी आकर्षित करती है ।  स्तूपों के चारों और सुंदर परिक्रमा पथ बने हुए हैं और सेंड स्टोन के बने चार तोरण द्वार चारों दिशाओं में निर्मित है जिन पर भगवान बुद्ध के जीवन से संबंधित विशेषकर जातक कथाओं में वर्णित कथाओं का अद्भुत शिल्प अंकन किया गया है । मानव जीवन के विभिन्न रूपों के अलावा पशु पक्षी और पेड़-पौधों का जीवंत चित्रण अद्भुत है । सांची के स्तूप में कहीं भी भगवान बुद्ध का अंकन नहीं है । इसका कारण यह है कि जब यह स्तूप बनाया गया उस समय तक भगवान बुद्ध की मूर्तियां बनाकर उन्हें पूजा नहीं जाता था। भगवान बुद्ध की मूर्तियों का बनना कनिष्क के काल में पहली सदी ईस्वी में प्रारंभ हुआ जबकि यह स्तूप तीसरी सदी ईसा पूर्व का है । हालांकि भगवान बुद्ध के जीवन से संबंधित प्रतीक चिन्हों का शिल्प अंकन हुआ है । जैसे भगवान बुद्ध के ग्रह त्यागने का चित्रण अश्वारोही के रूप में हुआ है या दौड़ते हुए घोड़े के द्वारा जिस पर एकछत्र स्थापित है उस के माध्यम से दर्शाया गया है । इसी तरह भगवान बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति को बोधि वृक्ष के माध्यम से दिखाया गया है । साक्षी के इन रूपों में भगवान बुद्ध के प्रिय शिष्य सारिपुत्र और मोग्गलायन के अस्थि अवशेष को स्थानीय संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया ।  सम्राट के अशोक के काल का एक दूसरा छोटा स्तूप भी यहां स्थापित है जिसमें तोरणद्वार नहीं बने हैं  । इसके अलावा एक प्रस्तर स्तंभ जिस पर सम्राट अशोक का शिलालेख उत्कीर्ण है वह स्तंभ अवस्था में यहां है । सम्राट अशोक द्वारा जिन पत्थरों का प्रयोग किया गया वह स्थानीय पत्थर ना होकर यहां से सैकड़ों किलोमीटर दूर मिर्जापुर जिले में स्थित चुनार से यहां लाए गए । स्तूप के आस-पास ही गुप्तकालीन मंदिर के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं । इसके अलावा यहां पर बौद्ध मठों के भी अवशेष प्राप्त हुए हैं जहां पर बौद्ध भिक्षु और बौद्ध गुरु रहते होंगे और शिक्षा दीक्षा का कार्य करते रहे होंगे । 1989 में यूनेस्को द्वारा सांची को विश्व विरासत स्थलों की सूची में शामिल किया गया ।
घर सांची के स्तूपों को देखते-देखते शाम ढलने लगी थी और एक व्यक्ति द्वारा बताए जाने पर हम पास ही स्थित कैंटीन पहुंचे जहां एक बाड़े के भीतर सुंदर सफेद रंग के खरगोश कबूतर और बत्तखें के पाली गई थी । स्वल्पाहार लेकर हम नीचे उतरो और चल पड़े अपने घर की ओर सांची को अपनी यादों में बसा कर..
साँची के आसपास दर्शनीय स्थलों में भोपाल , विदिशा , कर्क रेखा , उदयगिरि गुफा , नीलकंठेश्वर मंदिर , रायसेन , रातापानी टाइगर रिज़र्व , भीमबैठका , भोजपुर आदि प्रमुख है  

अब चित्रों का आनंद लीजिये और हाँ नीचे टिपण्णी में हमें अपनी प्रतिक्रियाओं से अवश्य अवगत कराइये।  धन्यवाद। 
साँची स्तूप का एक दृश्य 

प्रवेश शुल्क की जानकारी 

यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर में शामिल साँची 

स्तूप के द्वार के स्थापत्य की जानकारी 
स्तूप का मुख्य द्वार 
द्वार के शीर्ष पर चार हाथी और आम्रपालिका 

द्वार की अद्भुत शिल्प कला 


द्वार शीर्ष पर बने पंखो वाले सिंह 

बोधि वृक्ष की पूजा करते अनुयायी 

कमल और पक्षी ा सुन्दर अंकन 

अश्व : बौद्ध प्रतीकों में महत्वपूर्ण 

गज : बौद्ध धर्म में महत्वपूर्ण प्रतीक 

हमारा राष्ट्रिय चिन्ह - चार सिंह 
अश्वारोही 

मुख्य स्तूप का मुख्य द्वार 

नाग मर्दन और नाग आसन 

धम्म चक्र 

राजा और सेवक 
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एक कक्ष के अवशेष 

अन्य कक्ष 

एक स्तम्भ 

खरगोश 
शांति का प्रतीक : कपोत 

28 टिप्‍पणियां:

  1. सांची का इतिहास पढ़ कर मजा आ गया...84000 भागो में विभाजित करके स्तुपा आकर के संरचनाओं को बुद्धिज़्म के प्रसार के लिये पूरे विश्व में बनाया गया इसकी शुरुआत साँची से हुई थी....बढ़िया पोस्ट

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    1. आभार प्रतीक भाई । आपको पहली टिप्पणी करने पर एक विशेष उपहार दिया जाएगा ।

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  2. सुन्दर यात्रा वृतांत। समुचित जानकारी आपने दे दी है। दो तीन टंकन त्रुटियां है जैसे स्तूप के चारों ओर के बदले स्कूल के हो गया है। सांची के बदले साक्षी टंकित हुआ और अंत में एक व्यक्ति के द्वारा बताए जाने के बदले आने हो गया। एक बार देख लें संभव है कुछ छूट भी गए हों।

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  3. सांची से हम भी गुजरे हैं चलती ट्रेन में और ट्रेन वहां रुकी भी नहीं, बस खिड़की से सांची स्टेशन को देख लिया। जाने का भी सोचता हूं पर जा नहीं पाता हूं। आखिर कहां कहां कोई जाए इतने सारे जगह है, पर वहां न जाने का मलाल आज खत्म हो गया, क्योंकि आपकी पोस्ट पढ़कर हमने भी सांची की सैर कर लिया। फोटो बहुत अच्छे है खासकर खरगोश वाले ने तो दिल लूट लिया।

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    1. हमे तो कबूतर वाले फ़ोटो अच्छे लगे । शुक्रिया अभय जी

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  4. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (09-03-2017) को "अगर न होंगी नारियाँ, नहीं चलेगा वंश" (चर्चा अंक-2904) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. सम्राट अशोक ने पुराने स्तूपों को खुदवाकर उनसे मिले गौतम बुद्ध और उनके प्रिय शिष्य के अवशेषों को 84000 भागों में बांट कर अपने साम्राज्य साहित्य निकटवर्ती देशों में भेजकर बड़ी संख्या में स्तूपों का निर्माण करवाया । इसके अलावा मिट्टी और ईटों से बने स्तूपों को स्थाई रूप देने के लिए उन्हें पत्थरों से निर्मित कराया और मौर्यकालीन सुंदर शिल्प कला से सुसज्जित किया । सांची को प्राचीन काल में कांकेन्वा, ककन्या और ककनादबोट आदि नामों से जाना जाता रहा है । सम्राट अशोक की एक पत्नी श्रीदेवी विदिशा की ही रहने वाली थी और हो सकता है कभी वह अपनी ससुराल विदिशा आए हो और सांची कि यह पहाड़ियां उन्हें आकर्षित की होंगी इसलिए उन्होंने इस क्रम में स्थान को स्तूप बनाने के लिए चुना होगा । गज़ब की जानकारी ! श्रीदेवी का जिक्र आपने जो किया है पांडेय जी , उसका उल्लेख अशोका सीरियल में तो नहीं बताया था। मैंने कलर्स टीवी चैनल पर आने वाले इस धारावाहिक की हर किश्त देखी है लेकिन कभी उनकी इस नाम की पत्नी का उल्लेख नहीं दिया। मैं आपकी जानकारी पर संदेह नहीं जता रहा बल्कि अपनी जानकारी के लिए पक्का करना चाहता हूँ :)

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    1. आजकल जो सीरियल टीवी पर आ रहे है,उनमें इतिहास का तो सिर्फ नाम ही होता है । अशोक जब अपने पिता बिंदुसार के कार्यकाल में उज्जयिनी का उपरिक ( गवर्नर) था, तब उसने तत्कालीन दशार्ण (वर्तमान विदिशा) के श्रेष्ठी की पुत्री श्री देवी या देवी से विवाह किया था ।

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  6. साँची के स्तूप के बारे में अच्छी जानकारी दी आपने ,रोचक ओर अच्छी पोस्ट ,पढ़कर अच्छा लगा |

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  7. सांची के स्तूप दूर से देखने में भले मामूली अर्द्धगोलाकार संरचनाएं लगती हैं लेकिन इसकी वैभव, विशिष्टता व बारीकियों का पता सांची आकर देखने पर ही लगता है गौतम बुद्ध के निर्वाण के बाद बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार इन स्तूपों को प्रतीक मानकर होने लगा...साँची के स्तूप के बारे में अच्छी जानकारी दी आपने !

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  8. भोपाल जाते हुए ट्रेन से जगह का मालूम था, इतिहास की किताबो में पढ़ा भी था सांची के स्तुपो के बारे के ।

    आपके जीवंत लेख ने इतिहास में फिर से डुबकी लगाने को मजबूर कर दिया... जानकारी लिए सांची का सार्थक लेख ।

    चित्र तो पहले से भी बहुत अच्छे हो गए है

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  9. इस पोस्ट में आपने साँची के स्तूप के बारे में अच्छी जानकारी दी है . इस जगह से तो कई बार निकले हैं लेकिन पास से नहीं देख पाए .आपके चित्रों के माध्यम से आज ये कमी भी पूरी हो गयी .

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  10. ये भारत का दुर्भाग्य रहा कि जितनी भी फलती-फूलती संस्कृतियां थी सब को उजाड़ने वाले वही लोग थे। इन चीजों के कारण ही ये देश सोने की चिडि़या कहा जाता होगा। वृत्तांत पढ़कर बहुत अच्छा लगा, मेरा भी जाने का मन करता है पर जाना नहीं हो पाता। एक बार रास्ते में सांची नाम के स्टेशन को देखा था चेन्नई जाते हुए। फोटो तो सभी ऐसे लग रहे हैं जैसे अभी बोल उठेंगे। वो तीन खरगोश और सफेद कबूतर तो दिल लूट कर ले गया।

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ab apki baari hai, kuchh kahne ki ...

orchha gatha

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