शनिवार, 4 अप्रैल 2020

एक अनजान हसीना के साथ यादगार सफर


नमस्कार मित्रों, वैसे तो पूरी जिंदगी ही एक सफर है , और हम सब यात्री होने के साथ साथ किसी न किसी के हमसफ़र है । खैर मेरी हर यात्रा में कोई न कोई हमसफ़र अवश्य ही रहा है, क्योंकि मुझे अकेले घूमने में मजा नही आता । तो बड़ा मुश्किल होता है , किसी एक यात्रा को चुनकर उसमें एक हम सफर चुनने का ।  चलिए आज एक ऐसे हमसफ़र के बारे में बताते है , जो मेरे लिए आज भी गुमनाम है । बात आज से लगभग 13 साल पहले यानी 2006 के बरस की है । मैं इलाहाबाद में सिविल सेवा की तैयारी कर रहा था । कुछ दिन की दीपावली की छुट्टियां हुई थी, तो बक्सर (बिहार) गया था । फिर वहां से सागर (म0प्र0) अपने नाना जी के पास आना था, क्योंकि माताजी वही थी । बक्सर से हम लोग (मैं और मेरा मंझला भाई निकेश)  श्रमजीवी एक्सप्रेस से वाराणसी आये और वाराणसी से सागर के लिए कामायनी एक्सप्रेस पकड़ी । सामान्यतः कामायनी एक्सप्रेस पूर्वांचल से मुंबई जाने वाले मजदूरों और नौकरीपेशा लोगों से भरी रहती है, लेकिन दीपावली के कारण लोग अपने घरों को लौट रहे थे । इसलिए लोकमान्य तिलक टर्मिनस जाने वाली ट्रेन में लोक कम ही मान्य हो रहा था । दीपावली नजदीक होने के बावजूद उस साल सर्दी अभी ढंग से आई नही थी, लिहाजा हम दोनों भाई एक पतली सी टी शर्ट ही पहने थे । खैर तयशुदा कार्यक्रम अनुसार हम दोनों शयनयान श्रेणी डिब्बे की अपनी सीट पर बैठ गए । हमारी सीट के सामने वाली सीट पर मेहंदी किये लाल बाल और दाढ़ी वाले एक बुजुर्ग मुस्लिम तशरीफ़ रखे थे । बाकी का डिब्बा खाली ही था । हम दोनों भाई आपस में ही बतिया रहे थे । ट्रेन ने सीटी बजाई जो इस बात का इशारा था, कि  छुकछुक गाड़ी यहां से रुखसत होने वाली है । मैं वाराणसी जंक्शन को विदा देने डिब्बे के दरवाजे पर आ खड़ा हुआ । ट्रेन झटके के साथ आगे बढ़ने लगी अभी रफ्तार धीमी ही थी, स्टेशन अपनी भीड़ के साथ पीछे सरकने लगा । तभी एक नवयौवना कंधे पर बैग टांगे मेरी तरफ हाथ बढ़ाये दौड़ी चली आ रही थी । ट्रेन की रफ्तार के साथ मेरे दिल की धड़कन भी तेज होने लगी , तभी मोहतरमा चिल्लाई...मेरा हाथ पकड़ो ! मैंने भी फिल्मी स्टाइल में हाथ बढ़ा दिया और उन्हें अपनी तरफ खींच लिया । अब वो ट्रेन के अंदर आ चुकी थी । ट्रेन और हृदय की रफ्तार तेज हो चुकी थी । हम मानो जागी आंखों से ख्वाब देख रहे थे । साइड हटिये...प्लीज ! की आवाज़ से मेरी तन्द्रा टूटी ।
पूरा डिब्बा खाली था, तो वो नवयुवती हमारी सीट की साइड लोवर बर्थ पर बैठ गयी । मैं भी अपनी सीट पर आया तो देखा निकेश बाबू ऊपर की बर्थ पर चादर तान चुके है । सामने बैठे मौलवी जी अपनी दाढ़ी खुजाते हुए कुछ फ़ारसी में पढ़ रहे है ।  हमने भी अपनी सीट पर आसन जमाया । नवयुवती अपना बैग सीट के किनारे पर लगाकर  उसे तकिया बनाकर उस पर टिककर पैर फैलाकर बैठ गयी थी ।
पूरे डिब्बे में हम चार लोग ही थे । ट्रेन अपनी पूरी रफ्तार में आ गयी थी । खिड़की के बाहर पेड़, खेत , मकान तेजी से पीछे भागने लगे थे । कुछ देर ट्रेन की खटर-पटर सुनने के बाद मैंने अपनी खटर-पटर चालू करने का फैसला किया ।
नमस्कार अंकल  !
जवाब में मौलवी जी  अपनी किताब में से बिना सर उठाये सिर्फ सिर हिला दिया ।
आप कहाँ तक जाएंगे ?
जौनपुर
मतलब आपने बनारस से जौनपुर जाने के लिए रिजर्वेशन करवाया है ?
नही , हम डेली पैसेंजर है । एमएसटी
ओह, मतलब आप बनारस में काम करते है और जौनपुर के रहने वाले है ?
हाँ ,
तभी मैंने कनखियों से देखा तो नवयुवती मेरी तरफ ही देख रही थी । तो मैंने देखकर मुस्कुरा दिया ।
प्रत्युत्तर में भी हल्की सी मुस्कान मिली । तो मैंने मौलवी साहब को किताब में गड़ा देखकर अपना मुंह साइड बर्थ की ओर घुमा लिया ।
मेरे सिर घुमाते ही नजरे दो-चार हुई , उधर मुस्कान थोड़ी लम्बी हुआ और इधर बांछे (शरीर मे जहां कही होती हो ) खिल गयी ।
आप कहाँ तक जाएंगी ?
जी, इलाहाबाद !
अरे, वाह ! इलाहाबाद में ही तो मैं भी सिविल सर्विस की तैयारी कर रहा हूँ । (मैंने रोब जमाने के हिसाब से कहा )
इलाहाबाद में लोग सिविल सर्विस की तैयारी करने आते है, और कुछ साल बाद मास्टर बन जाते है ।  उसकी मुस्कान अब हंसी में बदल गयी ।
नही, उनमे कुछ सफल भी होते है ।
सिर्फ कुछ ही
जी, जो दृढ़निश्चय के साथ मेहनत करते है , वो सफल ही होते है ।
कोई उत्तर नही मिलने पर मैं भी कुछ देर चुप बैठा रहा ।
माहौल की खामोशी को रेल की खटर पटर और मौलवी साहब की बुदबुदाहट तोड़ रही थी ।  अब नवयुवती खिड़की से नजारे देखने लगी । तो हम भी अपनी तरफ वाली खिड़की की तरफ खिसक आये ।  ट्रेन कुछ धीमी सी होने लगी शायद कोई स्टेशन आने वाला था , लेकिन खिड़की से देखने पर ऐसी कोई संभावना नजर नही आ रही थी ।  तभी ट्रेन धीमी होती हुई खड़ी हो गयी , सामने खेतों में जुताई चल रही थी, ट्रैक्टर के पीछे पीछे बगुले झुंड के झुंड में कीड़े खाने के लिए मंडरा रहा और इधर मेरे मन में कई विचार मंडरा रहे थे । तभी एक जोरदार सीटी के साथ बगल की पटरी से एक ट्रेन धड़धड़ाती गुजर गई ।  इसी ट्रेन को गुजारने के लिए हमारी ट्रेन रोक दी गयी थी । अब हमारी ट्रेन भी रेंगने लगी थी , खिड़की में से खेत , ट्रेक्टर और बगुले पीछे छूटने लगे थे ।  मौलवी जी की बुदबुदाहट के साथ मेरे भाई के खर्राटे ताल मिलाने लगे ।  ट्रेन की रफ्तार के साथ खड़खड़ाहट भी तेज होने लगी ।  दूर क्षितिज में सूरज लाल चुनरियाँ फैलाये डूबने की तैयारी में था । ट्रेन की तेजी बढ़ गयी, मगर सूरज अपनी रफ्तार से था । पंछियों के झुंड अपने घोंसलों में लौटने लगे थे ,  जैसे इस ट्रेन में भी लोग त्यौहार के समय अपने अपने घर लौट रहे थे । ट्रेन अपनी रफ्तार में थी ।  नवयुवती खिड़की से बाहर देख रही थी, मौलवी जी अभी भी किताब में गड़े हुए थे, हम भी बोर होने लगे तो बैग से 'प्रतियोगिता दर्पण' निकाल कर पलटने लगे ।  देश-दुनिया की जानकारी में हम उलझने वाले थे, कि नवयुवती की आवाज आई ।
क्या आप मेरी खिड़की का कांच बन्द कर देंगे , मुझसे हो नही रहा ।
मैं अनमने भाव से उठा , खिड़की  का कांच बंद कर अपनी सीट पर लौट आया ।
दो बार मदद करने का कोई अहसान नही । खैर हमे क्या ? हम फिर देश-दुनिया की जानकारी में घुसने वाले थे , कि उधर से एक मधुर आवाज आई । थैंक यू ! 
मैंने  देश-दुनिया की जानकारी में से निकलकर देखा कि नवयुवती के अधरों पर मुस्कुराहट तैर रही है । मैंने भी औपचारिकता वश यॉर वेलकम कह दिया ।
मगर इस बार नवयुवती की आंखों में मुझे नमी सी दिखी, जिसने मुझे पुनः देश-दुनिया की जानकारी में उलझने नही दिया ।  खैर हिम्मत कर मैंने उससे पूछा - इलाहाबाद में आपका घर है ?
नही, इलाहाबाद में मेरी एक सहेली रहती है , उसी के पास जा रही हूँ ।
लेकिन लोग त्यौहार पर अपने घर जाते है, और आप सहेली के पास जा रही है !
मैं अपने घर से भाग रही हूं !
क्या ?
मेरे जोर से क्या बोलने पर मौलवी जी ने गर्दन ऊपर उठाई और मेरी तरफ देखा , फिर किताब में ही गड़ गए ।  मैं खिसक कर साइड बर्थ की तरफ आया ।
आप अपने घर से क्यों भाग रही हो ?
मैं आगे पढ़ना चाहती हूं, और मेरे घरवाले मेरी शादी करना चाहते है ।
तो आप अपने घरवालों को समझा सकती है , भागना कोई सही विकल्प नही है ।
मैं उन्हें समझा समझा कर हार गई हूं, इसलिए मैंने ये फैसला लिया ।
खिड़की के बाहर आसमान अंधेरे के गिरफ्त में आ चुका था ।
आपने ये फैसला बिल्कुल भी गलत लिया । आखिर  आपके घरवाले  भी तो सोच समझकर ये फैसला ले रहे होंगे।
मेरे पिता जी एक छोटी सी नौकरी करते है, और उन पर 4 बेटियों का बोझ है । मैं सबसे बड़ी बेटी हूँ । बेटे की चाह  में चार बेटियां हो गयी , अब किसी तरह से सबकी शादी करनी है ।  कहते है , रिटायरमेंट के पहले चारों की शादी निपटानी है ।
एक तरह से आपके पिता की सोच सही है , लेकिन आप इस तरह से घर से भागकर  अपने पिता की समस्या बढ़ा ही रही है । और लड़कियों को बोझ मानने की सोच को विस्तार दे रही है ।
तो मैं क्या करूँ ? मुझे अभी शादी नही करनी  , मुझे आगे  पढ़ना है ।
आप अपने पिता से एक बार फिर से बात कीजिये और उनसे अपने लिए 2 साल मांगिये , साथ ही हो सके तो  आप पढ़ाई के साथ कोई पार्ट टाइम जॉब भी कर लीजिए , जिससे उनकी आर्थिक मदद भी हो सके । आप अपने पिता का गर्व बनिये न कि शर्म
!  सोचिए गांधी जी के चार बेटे थे, उन्हें आज कोई भी नही जानता है , जबकि नेहरू जी की सिर्फ एक ही बेटी थी, जिसकी वजह आज भी लोग नेहरू जी को याद करते है ।
खिड़की के बाहर उजाला बढ़ने लगा था  । शायद कोई स्टेशन आने वाला है ।
मेरी बातों से वो युवती सहमत नजर आई । और जौनपुर स्टेशन पर गाड़ी रुकते ही , उसने अपना बैग उठाया । आप सही कह रहे । मेरे पापा मेरे लिए परेशान हो रहे होंगे । मैं वापस बनारस जा रही हूं । आपने मेरी आँखें खोल दी । धन्यवाद ....और वो जौनपुर स्टेशन पर उतर गई ।
मौलवी साहब भी अपनी बुदबुदाहट खत्म कर किताब में से उखड़े और स्टेशन की ओर रुखसत हुए । अब शोरगुल बढ़ने लगा , लोग डिब्बे में चढ़ने लगे । और मैं देश-दुनिया की जानकारी में उलझने की कोशिश करने लगा ।

30 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद रोचक यात्रा वृतांत

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  2. बढ़िया जी ... कुछ अलग और रोचक संवाद शैली के साथ आपने रेल यात्रा का वर्णन तो किया ही साथ ही साथ समाज को एक अच्छा संदेश भी दिया ।

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  3. भैया बहुत ही आनन्द आ गया ये रेल यात्रा पढ़ कर।कामायनी और उसकी यात्राएँ सब याद आ गईं एवम किसी लड़की के बगल में बैठने पर नवयुवकों में उठने वाले संवेगों को बड़े ही सुंदर ढंग से बताया है।और एक बड़ा ही सुंदर सन्देश दिया कि हमें भाग कर नहीं लड़ कर जीत हासिल करने का प्रयास करना चाहिए।

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  4. रोचकता के साथ बढिया सन्देश भरा पोस्ट

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  5. काश आप शादी शुदा न होते तो उस युवती से शादी भी कर लेते और साथ साथ पढ़ाई और प्रतियोगिता की तैयारी भी होती रहती। वैसे कहानी मार्मिक और सुखांत है।

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    1. आदरणीय इस घटना के लगभग 8 वर्ष बाद मेरी शादी हुई थी ।

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  6. आपकी इस कहानी से न केवल आपके संवेदनशील युवा हृदय में झांकने का सुअवसर मिला, बल्कि एक जिम्मेदार और परिपक्व नागरिक के दर्शन भी हुए जो भटके हुए बन्दों और बन्दियों को सही राह दिखाता है।

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  7. सुंदर लेख और आपने बहुत अच्छा सुझाव देकर एक परिवार को बचा लिया इसके लिए आपको बहुत बहुत साधुवाद

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  8. रोचक सफर रहा लेकिन आपने भी बहुत समझदारी से उन्हें वापस घर भेजने में सफलता पाई।  

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  9. Great post, thanks for sharing!

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  10. आपने बहुत ही बढिया ढंग से समझाया

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  11. बहुत ही बढ़िया किया आपने जो सही समय पर समझा कर घर वापस जाने के लिए तैयार कर लिया। बहुत खूब रहीं आपकी यात्रा

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  12. आनंद आ गया आज फिर से अनजान युवती के साथ सफर का सफरनामा ।
    शानदार लेखनी

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ab apki baari hai, kuchh kahne ki ...

orchha gatha

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