शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

रायप्रवीण : जिसके आगे अकबर को भी झुकना पड़ा ( ओरछा गाथा भाग - 3 )

मित्रों अभी तक आपने ओरछा गाथा के प्रथम दो भागों पर जो रूचि दिखाई और मुझ खाकसार का उत्साहवर्धन किया , मेरे लिए बड़े सम्मान की बात है । तो अभी तक हमने माँ बेतवा से ओरछा के उत्थान से लेकर रामराजा के आगमन की कथा जानी , अब उसके आगे की कथा माँ के शब्दों में ही ..
महराज मधुकर शाह की आठ संताने थी । बड़े पुत्र रामशाह अकबर के दरबार में बुंदेलखंड के प्रतिनिधि के तौर पर आगरा में थे । मधुकर शाह जू के निधन के बाद दूसरे पुत्र इंद्रजीत सिंह ओरछा की राजगद्दी पर बैठे । तीसरे पुत्र वीरसिंह को दतिया के पास बडौनी का जागीरदार बनाया गया । इसी तरह अन्य पुत्रों को भी जागीरदार बनाया गया । खैर  हम वापिस ओरछा लौटते है । ओरछा के राजगुरु के पद पर हिंदी के महान कवि रस सिद्ध आचार्य श्री केशवदास जी को बनाया गया । खैर हम बात करेंगे ओरछा की उस जन नायिका राय प्रवीण की , जो न केवल उस वक़्त सम्पूर्ण बुंदेलखंड बल्कि आगरा दरबार में अपने अप्रतिम सौंदर्य के कारण हर व्यक्ति के दिलोदिमाग में बसी थी । इतिहास में कई रूपसियो सह प्रेमिकाओं की चर्चा होती है । शकुंतला, आम्रपाली , करुवाकि, मालविका ,कुमारदेवी, ध्रुवस्वामिनी, संयोगिता, पद्मावती, रूपमती, नूरजहाँ , मुमताज आदि ।
मगर जब बुंदेलखंड को ही इतिहासकारों ने भुला दिया तो फिर राय प्रवीण के साथ कैसे इतिहास न्याय कर सकता था । एक ऐसी सर्वांगसुन्दरी जिसकी विद्वता के आगे मुग़ल दरबार भी अचंभित था । राय प्रवीण को ईश्वर ने न सिर्फ रूप प्रदान किया था , बल्कि वह नृत्य, गान , काव्य , घुड़सवारी , युद्धकला में भी उतनी ही प्रवीण थी । माँ सरस्वती की विशेष कृपापात्र इतिहास में ऐसे बहुत ही बिरले होते है ।
आज की शाम कुछ ज्यादा गहरी है । कृष्ण पक्ष के कारण चाँद भी अभी निकला नही । माँ बेतवा के तट पर ग्रेनाइट की चट्टानें ऐसी लग रही है ,मानो कोई भीमकाय प्राणी सुस्ता रहा हो । ऊपर आसमान में तारे टिमटिमा रहे है । हवा के साथ बादल भी इधर से उधर चक्कर लगा रहे है । ऐसा लगता है , मेरी तरह वो भी ओरछा गाथा सुनने को बेताब है । झींगुरों की आवाजे वातावरण की ख़ामोशी को सुमधुर बना रही है । खैर प्रतीक्षा पूरी हुई , माँ बेतवा से आवाज आई .. आ गये पुत्र!
मैंने कहा - माँ आपकी ममता और ओरछा की गाथा  मुझे यहां खींच ही लाती है ।
माँ बेतवा पुनः बोली-
लेकिन पुत्र आज की गाथा मैं तुम्हे नही सुनाऊँगी ।
ये सुनकर मेरा दिल धक्क सा कर गया । लगा किसी ने मेरा सब कुछ छीन लिया हो । तभी माँ बेतवा की ममतामयी आवाज़ गूंजी - पुत्र निराश न हो ! आज की गाथा तुम्हे कंचना सुनाएगी ।
कौन कंचना ? मैंने आश्चर्य के साथ बोला ।
तभी पायल की झंकार ने वार्ता को विराम दिया । तभी मैंने आवाज की तरफ नजरें घुमाई तो मुझे एक स्त्री की छाया घाट की ओर दिखाई दी ।
उस छाया की तरफ से आवाज़ आई ! आओ पथिक तुम्हे आगे की कथा मैं सुनाती हूँ ।
मैं घाट की ओर बढ़ा , अँधेरे के कारण मुझे चेहरा तो नही दिखा , परंतु आवाज़ और छाया की काया से मैंने अंदाज़ लगाया कि ये कोई युवती है ।
तभी फिर छाया से आवाज़ आयी - चलो पथिक !
कहाँ ?
जहाँ इस कथा का महत्वपूर्ण स्थल है ।
मैं भी भय मिश्रित उत्साह के साथ माँ बेतवा के किनारे किनारे छतरियों से होते हुए शाही दरवाजे पहुचे , फिर बड़ी माता मंदिर से किले के पिछले हिस्से में पहुँचे जहां रायप्रवीण महल बना है । रायप्रवीण महल परिसर में बने उद्यान में जाकर कंचना रुकी । अब भी मैं उसका चेहरा नही देख पा रहा था । उसने मुझे बैठने का इशारा किया , मैं वही चबूतरे पर बैठ गया । मेरे बैठने के बाद कंचना भी बैठ गयी ।
पथिक ! अभी तक माँ बेत्रवती ने तुम्हे ओरछा की स्थापना, रामराजा के आगमन की कथा सुनाई , अब आगे की कथा मुझसे सुनो । महराज मधुकर शाह जू की मृत्यु के पश्चात उनके ज्येष्ठ पुत्र रामशाह को आगरा दरबार में भेजा गया , जहाँ वो बुंदेलखंड के प्रतिनिधि बने । द्वितीय पुत्र इंद्रजीत सिंह को ओरछा की गद्दी पर बिठाया गया । और तृतीय पुत्र वीरसिंह को दतिया के पास बड़ौनी का जागीरदार बनाया गया । तीनो अपने आप में अद्वितीय योद्धा , राजनीतिज्ञ एवं कलाप्रेमी थे । इंद्रजीत सिंह अपने पिता जू की यश पताका बखूबी निभा रहे थे । उन्हें हिंदी के प्रथम आचार्य केशवदास का मार्गदर्शन के साथ मित्रता का सौभाग्य भी प्राप्त था । ओरछा का जीवन बड़ी ही शांति और सुख चैन से बीत रहा था । इंद्रजीत सिंह भी राजकाज में व्यस्त थे । परंतु होनी को तो कुछ और ही मंजूर था ।
रायप्रवीण का सौंदर्य और ओरछा की नियति (ओरछा गाथा भाग-4)
राय प्रवीण का महल , ओरछा 

23 टिप्‍पणियां:

  1. एक तो वैसे ही यह कथा बहुत ही लंबे इंतजार के बाद आई और फिर जैसे ही कहानी ने कुछ रफ्तार पकड़नी शुरू की तो आपने ब्रेक लगा दिया ! This is not fair!
    खैर, राय परवीन का सौंदर्य और वाक चातुर्य तो किवंदितिओं में मशहूर है ही, उम्मीद है जल्द ही श्रृंगार रस से सरोबोर कथा का अगला अंक आएगा।

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  2. अभी तो यह नयी कथा शुरु होकर प्रबल जिज्ञासा जगा गई है। इन्तज़ार है आगे की कथा का।

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    1. ये पोस्ट आपकी इच्छा पर डाली थी सर, जल्द ही अगला भाग

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  3. ऊपर आसमान में तारे टिमटिमा रहे है । हवा के साथ बादल भी इधर से उधर चक्कर लगा रहे है । ऐसा लगता है , मेरी तरह वो भी ओरछा गाथा सुनने को बेताब है । झींगुरों की आवाजे वातावरण की ख़ामोशी को सुमधुर बना रही है ।
    बहुत सुंदर वर्णन, मै तो वही पहुंच गया था, पर आज की पोस्ट बहुत छोटी थी।

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    1. जी सही कहा सचिन भाई ।
      अगली पोस्ट बड़ी होगी

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  4. क्योंकि इतना कहकर कांचन भाग गई :-) जे तो गलत बात है.

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    1. भागी नही सर, जल्द ही रोमांचक वापिसी होगी ।

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  5. मुकेश जी कृपया अगला भाग जल्दी प्रकाशित करें...इंद्रजीत और पुनिया (राय प्रवीण) की कथा का इन्तजार है 👍

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  6. मुकेश जी कृपया अगला भाग जल्दी प्रकाशित करें...इंद्रजीत और पुनिया (राय प्रवीण) की कथा का इन्तजार है 👍

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  7. आज की शाम कुछ ज्यादा गहरी है । कृष्ण पक्ष के कारण चाँद भी अभी निकला नही । माँ बेतवा के तट पर ग्रेनाइट की चट्टानें ऐसी लग रही है ,मानो कोई भीमकाय प्राणी सुस्ता रहा हो । ऊपर आसमान में तारे टिमटिमा रहे है । हवा के साथ बादल भी इधर से उधर चक्कर लगा रहे है । ऐसा लगता है , मेरी तरह वो भी ओरछा गाथा सुनने को बेताब है । झींगुरों की आवाजे वातावरण की ख़ामोशी को सुमधुर बना रही है । बहुत ही रोचक अंदाज़ में लिखा है आपने पाण्डेय जी , लेकिन सबकी तरह मेरी भी उत्सुकता को एकदम से विराम लग गया ! जैसे ही स्वाद आना शुरू हुआ , पराठे ख़त्म हो गए ! जल्दी लिखियेगा

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    1. योगी जी , बिलकुल जल्द ही आप सब की इच्छा माँ बेतवा पूरी करेंगी । स्नेह बनाये रहिएगा ।

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  8. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (11-09-2016) को "प्रयोग बढ़ा है हिंदी का, लेकिन..." (चर्चा अंक-2462) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. आभार शास्त्री जी।
      स्नेह बनाये रखिये

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    2. आभार शास्त्री जी।
      स्नेह बनाये रखिये

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  9. ऐ की गल्ल हुई....गरमागरम पराठे को यूँ फ्रिज में रख दिया। बोत गलत बात।

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    1. रोहिताश जी , थोड़ी ऐतिहासिक पोस्ट होने की वजह से सही तथ्यों की खोज के लिए पढ़ना जरुरी है । तब तो आगे बढ़ पाएंगे । इसलिए इस बार इतना ही लिख पाया । पर वादा करता हूँ , कि अगली पोस्ट परिपूर्ण होगी ।

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  10. पोस्ट शुरू होने वाली थी कि ख़तम हो गई ...किसी तरह नेट और लिंक पकड़ते यहाँ पहुँच पाई थी ,अब पलट कर फिर आने के जुगाड़ में मन अटका रहेगा...

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    1. क्षमा प्राथी हूँ । अगली बार पूरी पोस्ट का वादा । स्नेह बनाये रखिये ।

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  11. रोचक ऐतिहासिक ओरछा गाथा प्रस्तुति हेतु धन्यवाद...

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  12. वाकई पराठे ख़त्म हो गए ! बहुत देर कर दी आने में

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  13. अद्भुत लेखन पांडेय जी शानदार

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ab apki baari hai, kuchh kahne ki ...

orchha gatha

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