रविवार, 10 जून 2018

एक किला जहाँ पूरी बारात ही गायब हो गयी


बुंदेलखंड भारत के इतिहास में एक उपेक्षित क्षेत्र रहा है, जब हम भारतीय इतिहास को पढ़ते हैं ,तो हमें बुंदेलखंड के बारे में बहुत कम या कहें की नाम मात्र की ही जानकारी मिलती है । जबकि बुंदेलखंड की धरती वीरभूमि रही है यहां पर समय समय पर वीर पैदा हुए । बुंदेलखंड की बात चले और हम बुंदेला शासको के  दिनों को याद ना करें यह तो संभव ही नहीं क्योंकि बुंदेले ने  ही तो बुंदेलखंड की स्थापना की ।

                                                      मैंने अपनी ओरछा गाथा सीरीज  में बुंदेलखंड की स्थापना का जिक्र किया है, और बुंदेलखंड की पहली राजधानी बनने का गौरव टीकमगढ़ जिले में स्थित गढ़कुंडार नामक स्थान को प्राप्त हुआ है । बुंदेलों की राजधानी बनने के पूर्व गढ़ कुंडार खंगार वंश की राजधानी रहा और खंगार वंश के प्रतापी राजा खेत सिंह (10 वी सदी )  ने स्थान का पल्लवन पुष्पन किया । राजा खेतसिंह खंगार पृथ्वीराज चौहान के सेनापति रहे थे , उन्होंने पृथ्वीराज की तरफ से कई युद्धों में वीरता का परिचय दिया था , इसी से खुश  होके  पृथ्वीराज ने उन्हें गढ़कुंडार की रियासत प्रदान की।  मुहम्मद गोरी से पृथ्वीराज की हार  बाद  खेतसिंह ने स्वयं को स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया था। 14 वी सदी में  खंगारों से छीनकर बुंदेला शासकों ने गढ़कुंडार को अपनी राजधानी बनाया ।
                                    वर्तमान में गढ़ कुंडार मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले में निवाड़ी तहसील के अंतर्गत आता है । यह झांसी छतरपुर सड़क मार्ग पर निवाड़ी से 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है जबकि झांसी से इसकी दूरी लगभग 58 किलोमीटर है । यहां का नजदीकी रेलवे स्टेशन निवाड़ी है । जो झांसी मानिकपुर रेलवे लाइन पर स्थित है । वर्तमान में गढ़ कुंडार एक छोटा सा कस्बा है और यहां पर दर्शनीय स्थलों में गढ़कुंडार का प्रसिद्ध किला गीद्द वाहिनी का मंदिर तालाब आदि देखने योग्य स्थल हैं । शासन की उपेक्षा के कारण यहां पर बहुत कम लोग ही आते हैं । हां प्रतिवर्ष दिसंबर माह में 27 से 29 दिसंबर तक मध्य प्रदेश शासन द्वारा तीन दिवसीय गढ़ कुंडार महोत्सव का आयोजन किया जाता है । यह महोत्सव भी खंगार जाति का महोत्सव बनकर रह गया है , जबकि से पर्यटन गतिविधियों के साथ जोड़कर और अधिक सफल बनाया जा सकता था ।
अब किले  के कुछ इतिहास पर नजर डाली जाए ।

किले का इतिहास

-यह किला चंदेल काल में चंदेलों का सूबाई मुख्यालय और सैनिक अड्डा था।
- यशोवर्मा चंदेल (925-40 ई.) ने दक्षिणी-पश्चिमी बुंदेलखंड को अपने अधिकार में कर लिया था।
- इसकी सुरक्षा के लिए गढ़कुंडार किले में कुछ निर्माण कराया गया था।
- इसमें किलेदार भी रखा गया। 1182 में चंदेलों-चौहानों का युद्ध हुआ, जिसमें चंदेल हार गए।
- इसमें गढ़कुंडार के किलेदार शियाजू पवार की जान चली गई।
- इसके बाद यहां नायब किलेदार खेत सिंह खंगार ने खंगार राज्य स्थापित कर दिया।
- 1182 से 1257 तक यहां खंगार राज रहा। इसके बाद बुंदेला राजा सोहन पाल ने यहां खुद को स्थापित कर लिया।
- 1257 से 1539 ई. तक यानी 283 साल तक किले पर बुंदेलों का शासन रहा।
- इसके बाद यह किला वीरान होता चला गया। 1605 के बाद ओरछा के राजा वीर सिंह देव ने गढ़कुंडार की सुध ली।
- वीर सिंह ने प्राचीन चंदेला युग, कुठारी, भूतल घर जैसे विचित्र तिलिस्मी गढ़ का जीर्णोधार कराकर गढ़कुंडार को किलों की पहली पंक्ति में स्थापित कर दिया।
- 13वीं से 16 वीं शताब्दी तक यह बुंदेला शासकों की राजधानी रही।
- 1531 में राजा रूद्र प्रताप देव ने गढ़ कुंडार से अपनी राजधानी ओरछा बना ली।

घूमने आई पूरी बारात में हो गई थी गायब..
- बताया जाता है कि काफी समय पहले यहां पास के गांव में एक बारात आई थी। बारात में शामिल 50 से 60 लोग किला घूमन आए। यहां वे किले के अंडरग्राउंड वाले हिस्‍से में चले गए। नीचे गए सभी लोग आज तक वापस नहीं लौटे। इसके बाद भी कुछ इस तरह की घटनाएं हुईं। इन घटनाओं के बाद किले के नीचे जाने वाले सभी दरवाजों को बंद कर दिया गया। किला बिल्‍कुल भूल-भुलैया की तरह है। अगर जानकारी न हो तो ज्‍यादा अंदर जाने पर कोई भी खो सकता है। भूलभुलैया और अंधेरा रहने के कारण दिन में भी यह किला डरावना लगता है।
- गढ़कुंडार को लेकर वृन्दावनलाल वर्मा ने उपन्यास भी लिखा  है। इस उपन्यास  में गढ़कुंडार के कई रहस्य दर्ज किए गए हैं।

                                    गढ़ कुंडार इतिहास प्रेमियों के लिए आज भी आकर्षित करता है और इसी आकर्षण में बंद कर मैं अभी तक 5-6   बार इस जगह जा चुका हूं । यह किला अपनी खूबसूरती के साथ-साथ महत्वपूर्ण सुरक्षा व्यवस्था के लिए जाना जाता है । ऊंचाई पर बने इस किले से आसपास का बहुत ही सुंदर नजारा दिखाई देता है । किले का निर्माण सामने एक पहाड़ी के सापेक्ष इस तरह किया गया है , कि जब हम सड़क मार्ग से किले की ओर आते हैं , तो दूरी पर किला नजर आता है । जैसे जैसे ही हम उसके नजदीक पहुंचते हैं यह दिखाई देना बंद हो जाता है । ऐसा कहा जाता है, कि यह किला सात मंजिला है , जिसमे जमीन  ऊपर तीन मंजिल है, और चार मंजिल जमीन के नीचे बने है।  हालाँकि   दरवाजे सुरक्षा की दृष्टि से बंद कर दिए गए है।  गढ़कुंडार का किला बौना चोर के लिए भी प्रसिद्ध रहा है । कहते है कि उसकी लंबाई 52 अंगुल (साढ़े तीन फुट ) थी, इसलिए उसे बौना चोर कहते थे । कुछ लोग उसका नामकरण 52 चोरियों की वजह से कहते हैं । कहा जाता है कि बोना चोर एक ऐसा चोर था जिससे तत्कालीन समय का बुंदेलखंडी रॉबिनहुड कहा जा सकता है । यह धनाढ्य व्यक्तियों को पहले से चेतावनी देता था , कि वह उसके यहां चोरी करेगा और उनकी तमाम सुरक्षा व्यवस्थाओं को चकमा देकर वह चोरी करने में सफल हो जाता था । धनाढ्यों से लूटे गए धन से वह गरीबों और जरूरतमंदों की मदद भी करता था  । इसलिए वह क्षेत्र में लोकप्रिय था।  बौना चोर धन के  लिए धन लोलुप लोगों किले में बहुत खुदाई भी की है।  फ़िलहाल किले की सुरक्षा के लिए मध्य प्रदेश पुरातत्व विभाग ने प्राइवेट सुरक्षा एजेंसी के कुछ गार्ड नियुक्त किये है , जो दिन में आने वाले लोगो के लिए गाइड का भी काम करते है।   
                            गढ़कुंडार में ही गिद्धवाहनी देवी का मंदिर है।  गिद्ध वाहिनी मंदिर मूलतः विंध्यवासिनी देवी का मंदिर है । उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के विंध्याचल में स्थित विंध्यवासिनी देवी बुंदेलों की कुलदेवी हैं । ऐसी मान्यता है , कि  विंध्यवासिनी ही  बुंदेलों की सहायता करने के लिए विंध्याचल से गिद्ध पर बैठकर गढ़कुंडार आई इसलिए उन्हें यहां पर गिद्ध वाहिनी कहा गया । गिद्धवाहिनी मंदिर के बाहर एक बहुत ही खूबसूरत गिद्ध की प्रतिमा की बनी हुई है । साथ ही मंदिर से लगा हुआ एक बड़ा तालाब है जो इस जगह की खूबसूरती में चार चांद लगा देता है । इस तालाब में सर्दियों में कई प्रकार के प्रवासी पक्षी भी आते है।  हालाँकि पिछले कई सालों  के सूखे के कारण हाल -बेहाल है।
बुंदेलखंड के अन्य दर्शनीय स्थल -
ओरछा
देवगढ़
टीकमगढ़
दतिया
झाँसी
खजुराहो
पन्ना
कालिंजर


गढ़कुंडार किले का प्रवेश द्वार ( हालाँकि दरवाजा नया लगा है ) 
प्रवेश द्वार  से दिखता किला 
किले का एक बुर्ज 
किले में प्रवेश करते ही बनी भूलभुलैया 

किले की भूलभुलैया में में रोशनी के लिए छत में रोशनदान बने है।  (अभी सुरक्षा की दृष्टि से जाली लगाई गयी है।  ) 
किले की दीवार पर शुकदेव जी 
किले का जर्जर हिस्सा 

किले के अंदर का विहंगम दृश्य 
किले की सबसे ऊपरी मंजिल 
किले से शाही प्रवेश द्वार का रास्ता 
किले के पास बनी प्राचीन बाबड़ी  जो कभी किले वासियों की प्यास बुझती होगी।  
छत पर बनी डिजायन  
किले से दिखता गिद्धवाहिनी मंदिर और सूखा पड़ा तालाब 
गढ़कुण्डार के तालाब में प्रवासी पक्षी 
सुधा घर्षण यन्त्र (जिसका आज भी पुनर्निर्माण में प्रयोग होता है।  )

28 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. आप तो लंबी रेस के घोड़े हो । तो बस दो शब्द ही क्यों ?

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, ८ जून को मनाया गया समुद्र दिवस “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. संक्षिप्त विवरण पर बहुत अच्छा सर जी

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  4. Great information. I never been to Jhansi, Orachha or this area.

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  5. यह मेरे लिए नई जगह है। कभी उधर की तरफ आया तब यह जगह भी देखी जाएगी।
    आभार आपका सुंदर पोस्ट के लिए

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    1. खजुराहो का प्लान बना लीजिए फिर रास्ते मे गढ़कुंडार भी देखना हो जाएगा ।
      आभार आपका भी

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  6. वाह.गजब रोचक प्रसंग.. अब ओरछा आया तो आपके साथ गढ़कुंडार भी घुमा जाएगा

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  7. हमने भी देखा है। अंदर कुछ छोटे छोटे कमरे और छोटी सीढ़ियों से बौना चोर की कहानी में विश्वास करना पडा था। बेहतरीन विवरण।

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    1. अब तो कुछ सरंक्षित हो गया है, वरना पहले तो उपेक्षित पड़ा था । आभार सर

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  8. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (12-06-2018) को "मौसम में बदलाव" (चर्चा अंक-2999) (चर्चा अंक-2985) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  9. ये किला न केवल बेजोड़ शिल्पकला का नमूना है बल्कि उस खूनी प्रणय गाथा के अंत का गवाह भी है रोचक प्रसंग बहुत ही बढ़िया और जानकारी आपसे मिली आभार मुकेश जी कभी मौका लगा तो देखेंगे जरूर
    किले के अंदर का विहंगम दृश्य ये तस्वीर बहुत ही पसंद आई

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  10. बढ़िया जानकरी और सुन्दर चित्रों से भरी एक शानदार पोस्ट .

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  11. छोटे -छोटे स्थानों की खोजपरक घुमक्कड़ी भी कोतुहल जगाती है और भारत के विस्तृत इतिहास को मोतियों में पिरोती हुई प्रतीत होती है ! आपका ट्रांसफर होने का एक बड़ा फायदा ये तो हुआ कि अब हमें ओरछा के बाद टीकमगढ़ के आसपास की ऐतिहासिक कहानियां पढ़ने को मिलेंगी !! साधुवाद पांडेय जी बुंदेलखंड के इतिहास को करीब से पढ़वाने के लिए

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    1. वैसे ये घुमक्कड़ी ओरछा पदस्थ रहते ही कि गयी । आभार योगी जी

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  12. जब चालीस पचास लोगों की बारात गायब हो गयी तो लग रहा है भूल भुलैया या निचला हिस्सा वास्तव में आश्चर्यजनक ही होगा वरना तो कई भूल भुलैया ऐसे होते हैं कि उनमें जाना का तो एक ही रास्ता होता है और बाहर आने के कई सारे। इतिहास की जानकारी के मामले में तो आप गागर में सागर भर देते हैं

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  13. Bona chora dhanere chuhana mai se tha chori karte pakadne par kah diya ki mai ghadkundar rajya ka hau tabchod diya gaya or khangar rajput samjane lage loga

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ab apki baari hai, kuchh kahne ki ...

orchha gatha

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