
दिवाली पर्व के बारे में अनेक कथाएँ और किंवदंतियाँ प्रचलित है। वैसे तो यह त्यौहार धन और प्रकश से जुदा है । मगर इस त्यौहार पर साफ़-सफाई और स्वच्छता की परंपरा भी जुडी है । हमारे ग्रंथो में कहा गया है - तमसो माँ ज्योतिरगमय अर्थात हे माँ ! मुझे अन्धकार से प्रकाश की और ले चलो । इसी उद्देश्य की सार्थकता को प्रतिबिंबित करता है ये त्यौहार । मगर आज हम बाजारवाद और आधुनिकता के अन्धानुकरण के कारन इस त्यौहार के मूल उद्देश्यों को भूल कर केवल आडम्बरो और कर्मकांडो के पीछे भाग रहे है ।
हम बाहरी चमक दमक को बढ़ने में तो खूब लगे है , मगर कभी खुद के भीतर झांक कर देखा है कि कितनी गंदगी है ?
हमने घरो के बाहर रोशनियों से जगमग कर दिया है , मगर कभी अपने भीतर के अँधेरे को दूर कर पाए है ?
हम धन कि आस में लक्ष्मी को पूजते है , मगर कभी धन का सही अर्थ समझ पाए है ?
दुसरो को मिठाईयां तो खूब बांटते है , मगर उनसे कितनी बार मीठे बोल बोले है ?
दीपावली को भगवन राम से भी जोड़ कर देखा जाता है । कहते है कि, भगवान राम रावन को मार कर इसी दिन अयोध्या वापिस लौटे और इस ख़ुशी में अयोध्या वासियों ने दीप मालाये सजाकर उनका आमवस्या कीअँधेरी रात में स्वागत किया तभी से दीप जलने की परंपरा चल पड़ी । एक कथा ये भी है ,किइसी दिन देव- असुर द्वारा किये गये समुद्र-मंथन के दौरान कार्तिक आमवस्या के दिन ही समुद्र से लक्ष्मी अवतरित हुई थी । इसीलिए इस दिन लक्ष्मी कि पूजा कि जाती है।
प्राचीन काल में हिन्दुओ के चार प्रमुख त्योहारों को चार वर्णों के आधार पर विभाजित किया गया था। ब्राम्हणों के लिए रक्षाबंधन, क्षत्रियो के लिए दशहरा, वैश्यों के लिए दीपावली और शूद्रो के लिए होली । इस तरह से दीपावली का ये पर्व वैश्यों के लिए अति महत्वपूर्ण होता है , सभी वैश्य इस दिन अपने पुराने बही खातो को बंद कर नए बही खातो का पूजन कर व्यापार की पुनः शुरुआत करते है ।
हिन्दू धर्म में सदैव ही प्रकाश को महत्वपूर्ण मन गया है , प्रत्येक शुभ अवसर की शुरुआत दीप जलाकर की जाती है । अग्नि को देवता का दर्ज़ा दिया गया है । भगवान बुद्ध ने जो अपना अंतिम उपदेश दिया था - अप्प दीपो भाव अर्थात अपना दीपक स्वयं बनो । बुद्ध की इस बात के निहातार्थ बहुत थे , जैसे जीवन के अन्धकार से लड़ने के लिए हमें स्वयं ही दीवाक बनना होगा,तभी जीवन के सरे अन्धकार दूर हो पाएंगे ........
अबकी दिवाली ऐसी मनाना
दियो में ही नही, दिल में भी ज्योत जलाना
दूर हो मन का अँधेरा, ऐसा हो प्रकाश
बस घरो में ही नही , जीवन में उजास
दीपमालाओं सा, प्रकाशित हो जीवन
दूर हो अँधेरा , उज्जवल हो मन
दूजो के जीवन में खुशियाँ लाना
अबकी दिवाली ऐसी मनाना
खुशियों से उन्हें भर दो, जो दिल है खली
रोशन हो उनको घर भी, जिनकी सूनी थाली
सबके घर हो रोशन , ऐसी हो दिवाली
दियो में ही नही , दिल में भी ज्योत जलाना
अबकी दिवाली ऐसी मनाना
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ab apki baari hai, kuchh kahne ki ...