शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2020

बृहस्पति कुण्ड का रहस्य (भाग 1)



 बृहस्पति कुण्ड का रहस्य (भाग 1) 

                           एक दिन मन बड़ा ही उदास था, अपनी चार पहिया गाड़ी से ऐसे ही पन्ना से पहाड़ीखेड़ा मार्ग पर अनायास ही चल पड़ा । शाम का समय हो रहा, आकाश में बादल घुमड़ रहे है, बादलों की रंगत श्यामल हो चली है । मौसम ठंडा हो चला यानी आसपास कही बारिश हो चुकी है, हवा में भी ठंडक घुलने लगी थी । गाड़ी के शीशे उतार कर हम भी आराम से चले जा रहे थे । अभी तक खाली चल रहे मन में प्रकृति धीरे धीरे प्रवेश करने लगी । आसपास के खेत, पहाड़ियाँ और उनके ऊपर घुमड़ते आवारा बादल मन को प्रसन्न कर रहे थे । प्रकृति में इतना खोया रहा कि पता ही नही चला कि कब बृजपुर आ गया । बृजपुर आने पर मन बृहस्पति कुण्ड जाने का बनने लगा । गाड़ी अपने पथ पर चली जा रही थी । मैंने गाड़ी बृहस्पति कुण्ड की तरफ मोड़ दी । रास्ते में बाघिन नदी का पुल पड़ा । बाघिन नदी जो बृहस्पति कुण्ड जलप्रपात बनाती है, आज अलग ही अंदाज में बह रही थी । मैंने पुल के थोड़े पहले ही गाड़ी रोकी । पता नही क्यों एक अलग ही सम्मोहन मुझे नदी की ओर खींच रहा था । इससे पहले मैं कई बार बृहस्पति कुण्ड जाते समय यहाँ से गुजरा हूँ, मगर कभी रुका नही । आज एक अलग ही अहसास हो रहा था । लग रहा था, कि जैसे कोई मुझे बुला रहा हो ! यह अनुभव लौकिक तो बिल्कुल भी नही लग रहा था । मैं धीरे धीरे नदी की तरफ बढ़ने लगा ।      

                                     आसमान बादल काले हो रहे थे, हवा भी अपनी रफ्तार बढ़ा रही थी । अचानक बहुत तेज बिजली चमकती है ! मेघ गर्जना की बहुत तेज आवाज से हाथ अपने आप कानो को ढक लेते है । मुझसे कुछ दूर ही नदी में बज्रपात होता है , नदी का पानी बहुत ऊपर तक उछलता है ! यह दृश्य देख कर भय मिश्रित आश्चर्य होने लगता है, ऐसा दृश्य मैंने अपने जीवन में पहली बार देखा था । मस्तिष्क विचार शून्य हो गया । पैर अपनी जगह पर जम से गये, मैं चाहकर भी न आगे बढ़ पा रहा था, न पीछे हट पा रहा था । हृदय की गति भी इतनी तेज हो गयी कि स्पंदन स्पष्ट सुनाई दे रहा था । मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे । 

                                                                 खैर झंझावात  हुआ, नदी की लहरें सामान्य हुई , ये सामान्य भी मेरे लिए असामान्य सा था । लगा जैसे को स्वप्न देख रहा हूँ, और अचानक नींद टूट गयी हो । तभी पृष्ठभूमि से एक गुर्राहट मिश्रित आवाज आई - कैसे हो पुत्र ! स्वर मधुर था, मगर गुर्राहट मिश्रण से भय लगा । आसपास देखा तो कोई दिखा नही !

फिर से आवाज़ आई, 

भयभीत क्यों हो पुत्र ?

 तुम तो नदियों से पहले भी वार्तालाप कर चुके हो न ! यह सुन हृदय स्पंदन कम हुआ , आवाज नदी से ही आ रही थी । लगता है, आज फिर से मुझे नदी-संवाद का सौभाग्य मिलेगा ! 

पुत्र ! मैं बाघिन हूँ ! 

मैंने दोनो हाथ जोड़ प्रणाम किया । माते मुझ अकिंचन पर कृपा करें । 

तथास्तु ! आखिरकार विधाता ने तुम्हे मेरी कथा सुनने भेज ही दिया । युगों युगों से प्रवाहित मैं हर युग में किसी न किसी को अपनी कहानी सुनाती आई हूँ । सतयुग में देवगुरु बृहस्पति, त्रेता युग स्वयं नारायण अवतार श्रीराम , जगत जगनी सीता और शेषावतार सौमित्र के अलावा अगस्त्य मुनि, द्वापर में अज्ञातवास बिता रहे पाण्डव और कृष्णा (द्रोपदी) के बाद कलिकाल में आज तुम मिले हो ! 

अभी तक हाथ जोड़े खड़ा मैं अब नतमस्तक हो गया । आज मुझे बेतवा, गंगा और नर्मदा के बाद अरण्यानी बाघिन से भी संवाद का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है । 

आपके इस अनुग्रह से यह पातकी पावन हुआ ! 

आकाश में घुमड़ते मेघों के बीच भगवान भास्कर अस्तांचल गामी होने लगे । गोधूलि बेला में गौ-महिषी वन से गांवों की ओर वापिस लौटने लगे । उनके बछड़े रंभा रहे थे । पक्षी भी कलरव करते हुए नीड़ की ओर उड़ चले थे । बगुले त्रिभुजाकार अनुशासन में उड़ रहे थे । मैं भी नदी किनारे एक चट्टान पर हाथ जोड़े बैठ गया । पृष्ठभूमि में झींगुर अपना राग अलाप रहे थे, और तबले पर उनकी संगत मेंढ़क बखूबी दे रहे थे । 

सुनो पुत्र ! मैं अपनी कथा आरंभ से सुनाती हूँ । 

माते, एक निवेदन स्वीकार करें, यदि कथा के मध्य में कोई जिज्ञासा या प्रश्न हो तो उसका भी निवारण अवश्य करती चलें ।

ठीक है !  महाप्रलय के पश्चात सृष्टि का पुनः निर्माण हो रहा था । श्रीहरि मत्स्य अवतार ले चुके थे । वर्तमान स्थल जहाँ तुम अभी बैठे हो यह आधुनिक अफ्रीका महाद्वीप का भाग था । यहाँ बड़े बड़े घास के मैदान थे , जिसमें सिंह, बाघ, चीता, तेंदुआ, भालू, जिराफ और हाथी जैसे बड़े जीव विचरण करते थे । 

लेकिन माते ! जिराफ तो भारत में पाए नही जाते । 

पुत्र मैं आज से करोड़ो वर्ष पूर्व की बात कर रही हूँ, तब तो यहाँ भीमकाय सरीसृप जिसे पाश्चात्य जगत डायनासुर कहता है, वो भी विचरते थे । फिर श्रीहरि का कच्छप अवतार हुआ, कच्छप की पीठ पर ही मंदरांचल पर्वत रख कर समुद्र मंथन हुआ । चौदह रत्नों की प्राप्ति हुई । समुद्र मंथन से वसुंधरा के गर्भ में हलचल हुई । महाद्वीप टूटने लगे । अफ्रीका का एक भाग टूटकर उत्तर भारत के नीचे आ लगा । इस भौगोलिक प्रक्रिया से भूगर्भीय हलचल होने लगी , संयोजक स्थल पर ज्वालामुखी सक्रिय होने लगे । विंध्याचल पर्वत धीरे धीरे उच्च होने लगा । ज्वालामुखी का लावा प्रवाहित होने लगा । उत्तर भारतीय जन को नवीन भूमि और वहाँ के लोगों के जानने की उत्सुकता बढ़ रही थी । परंतु विंध्याचल और जवालामुखी बाधा बन रहे थे । लेकिन परिवर्तन संसार का नियम है । अफ्रीका से टूटकर अलग हुआ भाग वर्तमान भारत से जुड़ा और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में ज्वालामुखी धधक रहे थे । ज्वालामुखी के लावे से नए नए पहाड़ो का निर्माण हो रहा था, जिनमे सबसे प्रमुख विंध्याचल पर्वत श्रेणी थी । धरती के अंदर चल रही भूगर्भीय हलचलों के कारण विंध्याचल ऊपर उठता जा रहा था । 

माते ! क्या पर्वत अपने निर्माण के बाद भी ऊपर उठते है ? 

एक मधुर मुस्कान के साथ बाघिन माता आगे बोली -

पुत्र , बिल्कुल पर्वत भी निरंतर परिवर्तन शील होते है । जैसे आज हिमालय में परिवर्तन हो रहे है । चूंकि ये परिवर्तन इतनी धीमी गति से होते है, कि मानवों को दिखाई नही देते है । इन परिवर्तनों में हजारों साल लग जाते है, तब तक मनुष्य की आयु ही समाप्त हो जाती है । 

हाथ जोड़े मैंने निवेदन किया - माते आपका नाम बाघिन क्यों पड़ा ? 

माता बाघिन कुछ देर तक मंद मंद मुस्कुराती रही है । मैं हाथ जोड़े खड़ा रहा । तभी उत्तर देने की जगह बोली - ईश्वर भी कैसे संयोग बनाता है ! पुत्र तुम्हारा गोत्र क्या है ? 

मैं - माते, मैं वशिष्ठ गोत्र का कान्यकुब्ज ब्राह्मण हूँ । 

तुम्हारा जन्म कहाँ हुआ ? 

बक्सर, बिहार में 

बक्सर का भगवान राम से क्या सम्बन्ध है ? 

माते, भगवान राम बक्सर में महर्षि विश्वामित्र के आश्रम में शिक्षा पाए, ताड़का और सुबाहु का वध किये । और वर्तमान अहिरौली गांव में अहिल्या का उद्धार किये । बक्सर से भगवान मिथिला की ओर प्रस्थान किये । 

तब बाघिन माता बोली - आज इसीलिए तुम मेरी गाथा सुनने चयनित हुए हो ! मेरी कथा भी भगवान राम से जुड़ी है ! तुम्हारा गोत्र बशिष्ठ है, अर्थात तुम महर्षि बशिष्ठ के वंशज हुए न ! 

जी , 

तुम्हारा जन्म राशि का नाम क्या है ?

 अवध बिहारी !

अभी तक जिन जगहों पर रहे हो, उनके पते क्या रहे ? 

सागर में राम मंदिर के पास, पुलिस लाइन सागर , हनुमान मंदिर के पीछे, सिविल लाइन सागर । फिर टीकमगढ़ में रामजानकी मन्दिर के पास, पपौरा चौराहा, उसके बाद रामराजा की नगरी ओरछा में पदस्थ रहा । 

इसका संकेत समझे ? 

तुम्हारे जीवन में हर जगह राम किसी न किसी रूप में जुड़े है । 

पता है, महर्षि बशिष्ठ के भाई कौन थे ? 

नही माते,

महान वैज्ञानिक, अविष्कारक महर्षि अगस्त्य ! जिनकी कृपा से मैं कृतार्थ हुई । महर्षि का जन्म भगवान विश्वनाथ की नगरी काशी में एक घड़े से हुआ था । वे बचपन से ही प्रखर बुद्धि और तपोबल वाले थे ।  उन्होंने सूर्यवंशी राजाओं के कुलगुरु का पद स्वयं न लेकर अपने भाई  बशिष्ठ को दिया । वे राजकाज के बंधन में नही बंधना चाहते थे । वे एक महान वैज्ञानिक थे । मुझे वो दिन अच्छे से याद जब महर्षि अगस्त्य ने अपने भाई को रघुवंश का कुलगुरु बनने की कथा सुनाई थी । 

बाघिन नदी की धारा शांत हो गयी, सूर्यास्त पश्चात अंधकार बढ़ने लगा था । झींगुरों की आवाज तेज हो गयी थी । इधर मेरी जिज्ञासा भी बढ़ने लगी थी । धीरे धीरे जल में हलचल हुई । माते बाघिन ने जैसे यादों में गोता लगाया हो । अगस्त ऋषि को सूर्यवंश का राजपुरोहित या राजगुरु बनने का निमंत्रण प्राप्त हुआ । परंतु अगस्त्य मुनि अपने अविष्कारों को अधबीच में छोड़कर पुरोहताई नही करना चाहते थे । लेकिन तत्कालीन विश्व के सर्वश्रेष्ठ कुल से सम्बन्ध विच्छेद भी नही करना चाहते थे । वो अपने भाई महर्षि बशिष्ठ के पास गए और उन्हें रघुकुल का राजपुरोहित बनने को कहा । बशिष्ठ भी अपने गुरुकुल के माध्यम से न केवल वैदिक शिक्षा को समाज में प्रसारित कर रहे थे, बल्कि कुछ वैज्ञानिक शोधों पर भी लगे हुए थे । 

अगस्त्य मुनि - प्रिय भ्राता बशिष्ठ, तुम्हे अयोध्या का राजपुरोहित बन जाना चाहिए ! 

बशिष्ठ - आदरणीय आप स्वयं जानते है, राजपुरोहित बनना एक बन्धन है । मुझे राज्य की नियमों से चलना होगा, मेरा गुरुकुल भी प्रभावित होगा ।

अगस्त्य - भ्राता, किसी महान उद्देश्य के लिए लघु वस्तुओं का त्याग करना होता है । 

बशिष्ठ - महान उद्देश्य ! राजपुरोहित बनना कौन सा महान उद्देश्य है ? 

अगस्त्य - बशिष्ठ, राजपुरोहित बनना तो एक माध्यम है । तुम्हे राक्षस राज दशानन के अत्याचार से पूरी पृथ्वी को मुक्ति दिलानी है ! 

बशिष्ठ - आदरणीय आप पहेली न बुझाये ! स्पष्ट बताये, कि मेरे राजपुरोहित बनने से लंकाधीश से मुक्ति कैसे होगी ? 

अगस्त्य - स्नेहिल बशिष्ठ, रघुकुल में भगवान श्री हरि अवतार के रूप में जन्म लेंगे और वही दसकन्धर का उद्धार भी करेंगे । 

बशिष्ठ - श्री नारायण रघुकुल में जन्म लेंगे ! कब , जल्दी बताइये कब  आदरणीय ? 

अगस्त्य -धैर्य धारण करो, श्री नारायण त्रेता युग में सूर्यकुल के सूर्य के रूप जन्म लेंगे । 

बशिष्ठ - धन्य है, आदरणीय ! अभी सतयुग चल रहा है, फिर द्वापर आएगा उसके पश्चात कही त्रेता युग में नारायण का अवतार होगा । तब तक मुझे प्रतीक्षा करते हुए पुरोहताई करनी होगी । मैं पूरे एक युग तक पुरोहताई नही करना चाहता । आप अयोध्या नरेश को संदेश भिजवा दीजिये वो किसी और को अपना राजपुरोहित बना ले । चाहे तो आप ही बन जाये । मुझसे इतनी प्रतीक्षा न हो पाएगी । 

अगस्त्य - सोचो , तुम्हे भगवान को शिक्षा देने का सौभाग्य मिल रहा है ! वो तुम्हारे गुरुकुल में पढ़ेंगे । तुम्हारे आदेशों का पालन करेंगे । तुम प्रतीक्षा के कारण इस परम सौभाग्य को त्यागना चाहते हो । 

बशिष्ठ - आप ही क्यों नही बन जाते ।

अगस्त्य - मुझे प्रभु के अवतार हेतु और भी कार्य करने है ।

बशिष्ठ - ऐसा कौन सा कार्य करना है ? 

अगस्त्य - प्रभु का अवतार रावण के उद्धार हेतु होने वाला है , रावण बहुत ही शक्तिशाली है, उसे महादेव और परमपिता ब्रह्मा का आशीर्वाद भी प्राप्त है । उससे युद्ध के लिये प्रभु को बड़े शक्तिशाली आयुधों की आवश्यकता होगी । उनका निर्माण हमे करना है । 

बशिष्ठ - जब वो स्वयं नारायण के अवतार है, तो उन्हें आपके आयुधों की आवश्यकता होगी ? 

अगस्त्य -  भ्राता, उनका ये अवतार मर्यादा पुरुषोत्तम का होगा । वो मानव की मर्यादा को पार नही करेंगे । वो ईश्वर की तरह नही बल्कि एक सामान्य मनुष्य की तरह युद्ध करेंगे ।

बशिष्ठ - बाकी सब उचित है, परंतु एक युग तक प्रतीक्षा करने का धैर्य मुझमें नही है । 

अगस्त्य - बालहठ न करो बशिष्ठ, विधि के विधान में सब निश्चित है । प्रभु का जन्म त्रेता युग में नियत है । और त्रेता प्रत्येक सृष्टि में द्वापर के पश्चात ही आता है । 

बशिष्ठ - यदि त्रेता द्वापर से पूर्व आ जाये तो ?

अगस्त्य - यह तो असंभव है ! 

बशिष्ठ - मैं परम् पिता ब्रम्हा की आराधना कर उन्हें प्रसन्न करूंगा । और इस असंभव को संभव बनाने का प्रयास करूंगा ।

अगस्त्य - अर्थात तुम राजपुरोहित बनने तैयार हो ? 

बशिष्ठ - आप ही बताइये जब श्री हरि विष्णु के अवतार का सानिध्य मिल रहा हो, तो कोई मूढ़ ही होगा जो तैयार न हो । 

इसके बाद महर्षि बशिष्ठ ने ब्रह्मा जी की उपासना कर प्रसन्न किया तो विधि के विधान को परिवर्तित करते हुए सतयुग के बाद द्वापर के स्थान पर त्रेता का आविर्भाव हुआ । इतना कह बाघिन माता ने विराम लिया । लेकिन मेरे मन में प्रश्न घुमड़ने लगे । 

सूर्य नारायण अस्तांचल से धरा के दूसरे भाग को प्रकाशित करने चले गए । इधर सूर्यवंश की राजपुरोहित बनने की कथा ने मेरे मस्तिष्क में हलचल मचा दी । मां बाघिन मंद मंद मुस्कान के साथ चुप हो गयी । लहरें भी मंद मंद गति से प्रवाहित हो रही थी, मगर मेरे हृदय में जिज्ञासा के ज्वार उठ रहे थे । अंधकार बढ़ने के साथ ही अज्ञानता के तिमिर में मैं स्वयं को असहाय पा रहा था । विवश होकर मैंने पुनः बाघिन नदी की ओर करबद्ध होकर विनती की । 

हे माते ! मेरे मन में उमड़ रहे प्रश्नों का निवारण कीजिये ? 

लहरों की गति में कुछ तीव्रता आई । ऊपर आकाश में हंसिये के आकार के चन्द्र देव निकल आये थे । अंधकार कुछ कम हुआ । चंद्र देव की परछाई नीचे नदी के जल में बन रही थी, लेकिन लहरों की गति के कारण ऐसा प्रतीत हो रहा था , कि जैसे स्वर्ण मयी कोई हंसिया जल में तैर रहा हो ! 

पृष्ठभूमि से आवाज़ आई - पुत्र, पूछो अपने प्रश्न ! 

माते, वशिष्ठ जी इतनी लंबी आयु के थे, कि सतयुग से त्रेता तक उपस्थित रहे ? 

बिल्कुल पुत्र, ऋषि-मुनि अपने तप के बल पर लम्बी आयु प्राप्त कर लेते है । आज भी बहुत से ऋषि मुनि हिमालय की कंदराओं में सैकड़ो वर्षों से तपस्यारत है । वैसे एक रोचक तथ्य बताऊँ , इंद्र की तरह वशिष्ठ भी एक पद है, जो समय समय पर अनेक ऋषि-मुनियों ने अपने तप के बल पर प्राप्त किया है । 

माते, थोड़ा समझाकर बताइये ।

जैसे आज के जमाने में प्रधानमंत्री एक व्यक्ति न होकर पद है, जो समय समय पर अलग अलग व्यक्तियों द्वारा धारण किया गया है । उसी प्रकार इंद्र, वशिष्ठ और व्यास भी एक पद है, जो समय समय पर अलग अलग ऋषि रहे है । इनमें से कुछ प्रमुख वशिष्ठ के बारे में संक्षेप में बताती हूँ । पहले वशिष्ठ ब्रह्मा जी के मानस पुत्र हुए ।

माते ! ये मानस पुत्र क्या होते है ? 

पु

त्र, जब महाप्रलय के पश्चात फिर से सृष्टि की रचना करनी थी, तो ब्रह्माजी ने अपनी योगमाया से 14 मानसपुत्र उत्‍पन्‍न किए:- मन से मारिचि, नेत्र से अत्रि,  मुख से अंगिरस, कान से पुलस्त्य, नाभि से पुलह, हाथ से कृतु, त्वचा से भृगु, प्राण से वशिष्ठ, अंगुष्ठ से दक्ष, छाया से कंदर्भ, गोद से नारद, इच्छा से सनक, सनन्दन, सनातन और सनतकुमार, शरीर से स्वायंभुव मनु और शतरुपा व ध्यान से चित्रगुप्त। 

ब्रह्माजी के उक्‍त मानस पुत्रों में से प्रथम सात मानस पुत्र तो वैराग्‍य योग में लग गए तथा शेष सात मानस पुत्रों ने गृहस्‍थ जीवन अंगीकार किया। गृहस्‍थ जीवन के साथ-साथ वे योग, यज्ञ, तपस्‍या तथा अध्‍ययन एवं शास्‍त्रास्‍त्र प्रशिक्षण का कार्य भी करने लगे। अपने सात मानस पुत्रों को, जिन्‍होंने गृहस्‍थ जीवन अंगीकार किया था ब्रह्माजी ने उन्‍हें विभिन्‍न क्षेत्र देकर उस क्षेत्र का विशेषज्ञ बनाया था ।


'सप्‍त ब्रह्मर्षि देवर्षि महर्षि परमर्षय:। 

कण्‍डर्षिश्‍च श्रुतर्षिश्‍च राजर्षिश्‍च क्रमावश:।।


1. ब्रह्मर्षि   2. देवर्षि   3. महर्षि   4. परमर्षि   5. काण्‍डर्षि   6. श्रुतर्षि    7. राजर्षि


उक्‍त ऋषियों का कार्य अपने क्षेत्र में खोज करना तथा प्राप्‍त परिणामों से दूसरों को अवगत कराना व शिक्षा देना था। मन्‍वन्‍तर में वशिष्‍ठ ऋषि हुए हैं, उस मन्वन्‍तर में उन्‍हें ब्रह्मर्षि की उपाधि मिली है। वशिष्‍ठ जी ने गृहस्‍थाश्रम की पालना करते हुए सृष्टि वर्धन, रक्षा, यज्ञ आदि से संसार को दिशा बोध दिया।

 

वशिष्ठ नाम से कालांतर में कई ऋषि हो गए हैं। एक वशिष्ठ ब्रह्मा के पुत्र हैं, दूसरे इक्क्षवाकु के काल में हुए, तीसरे राजा हरिशचंद्र के काल में हुए और चौथे राजा दिलीप के काल में, पांचवें राजा दशरथ के काल में हुए और छठवें महाभारत काल में हुए। पहले ब्रह्मा के मानस पुत्र, दूसरे मित्रावरुण के पुत्र, तीसरे अग्नि के पुत्र कहे जाते हैं। पुराणों में कुल बारह वशिष्ठों का जिक्र है।


 आगे बाघिन माते बताती है,

एक वशिष्ठ ब्रह्मा के पुत्र हैं, दूसरे इक्क्षवाकुवंशी त्रिशुंकी के काल में हुए जिन्हें वशिष्ठ देवराज कहते थे। तीसरे कार्तवीर्य सहस्रबाहु के समय में हुए जिन्हें वशिष्ठ अपव कहते थे। चौथे अयोध्या के राजा बाहु के समय में हुए जिन्हें वशिष्ठ अथर्वनिधि (प्रथम) कहा जाता था। पांचवें राजा सौदास के समय में हुए थे जिनका नाम वशिष्ठ श्रेष्ठभाज था। कहते हैं कि सौदास ही सौदास ही आगे जाकर राजा कल्माषपाद कहलाए। छठे वशिष्ठ राजा दिलीप के समय हुए जिन्हें वशिष्ठ अथर्वनिधि (द्वितीय) कहा जाता था। इसके बाद सातवें भगवान राम के समय में हुए जिन्हें महर्षि वशिष्ठ कहते थे और आठवें महाभारत के काल में हुए जिनके पुत्र का नाम पराशर था। इनके अलावा वशिष्ठ मैत्रावरुण, वशिष्ठ शक्ति, वशिष्ठ सुवर्चस जैसे दूसरे वशिष्ठों का भी जिक्र आता है। 

मैं अवाक सा सुन रहा था, कि मेरे गोत्र ऋषि वशिष्ठ के बारे में इतनी विस्तृत जानकारी के बारे में अब तक अनजान ही रहा है । मध्य रात्रि हो चुकी थी । लेकिन मन प्रसन्न था, भूख और नींद गायब थी । चन्द्र देव बिल्कुल सिर के ऊपर आ गए थे । पृष्ठभूमि तो जान गया, परंतु अभी तक बृहस्पति कुण्ड का रहस्य तो बाकी ही था । 

मां बाघिन मेरे मन की बात जानती हुई बोली,

पुत्र अभी पृष्ठभूमि पूर्ण नही हुई है, जब तक पृष्ठभूमि पूर्ण नही होगी, आगे बृहस्पति कुण्ड के रहस्यों को नही जान पाओगे । रहस्य इतने आसान होते तो रहस्य ही क्यों होते है । पृष्ठभूमि की एक एक बात आगे चलकर किसी न किसी रहस्य की परत खोलेगी ! अभी इन रहस्यों में बहुत से पात्रों का प्रवेश होगा, कुछ जाने होंगे कुछ अनजाने होंगे । लेकिन कोई भी पात्र कही से कमजोर नही बल्कि इन रहस्यों को समझने के लिए महत्वपूर्ण होगा । अब बहुत देर हो गयी पुत्र आज के लिये इतना बहुत है । फिर आना तो अगले किसी पात्र से परिचित कराउंगी ।
नदी के जल में अचानक हलचल हुई, जैसे ज्वार उठ रहा हो, एक लहर तेजी से उछल कर मेरे सिर का स्पर्श करती हुई, पुलिया के दूसरी ओर चली गयी । उस अलौकिक स्पर्श से ऐसा लगा जैसे बाघिन माता मुझे आशीर्वाद दे रही हो । मैं प्रणाम करते हुए अपनी गाड़ी में बैठ गया । मोड़दार रास्तों में स्टेरिंग की तरह मेरे मन में बहुत सारे प्रश्न घूम रहे थे । वशिष्ठ जी राजपुरोहित कैसे और क्यों बने ? भगवान राम के जीवन में अगस्त्य ऋषि की क्या भूमिका थी ?  अगस्त्य मुनि ने बृहस्पति कुण्ड को ही क्यों चुना ? 

( क्रमशः )




10 टिप्‍पणियां:

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