गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

शुभ नव varsh

प्रतिपल उत्कर्ष मिले .....
नव वर्ष और नव्दशक की हार्दिक शुभकामनाये !
आपको जीवन में प्रतिपल उत्कर्ष मिले
सफलताए प्रतिपल और प्रतिवर्ष मिले
आगामी वर्ष आपके लिए खुशिया ही लाये
और यह वर्ष खुशियों की याद बन कर जाये
रंग बिरंगे सुमन खिले आपके ह्रदय आँगन
चन्दन सी खुसबू का हो परिणय मनभावन
गम का कही नाम न हो , नित्य प्रति हर्ष मिले
आपको जीवन में प्रतिपल उत्कर्ष मिले
सूर्य सा हो गौरव आपका , कीर्ति चन्दन सी
स्थान शिखार्तम हो , इच्छा हो वंदन की
हर कदम पे सफलताए मिले , हर राह में रज फूलों की
यही कामना हमारी, विसरित करना बातें कुछ भूलो की
ख़ुशी शांति का पैगाम , यह सन्देश नववर्ष मिले
आपको जीवन में प्रतिपल उत्कर्ष मिले
आपका ही शुभेच्छु मुकेश पाण्डेय "चन्दन"

रविवार, 20 दिसंबर 2009

कोपेनहेगन ; बड़े-बड़ो के चोंचालें....

नमस्कार, दोस्तों
आजकल डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन पर १९२ देशो का विचार मंथन चल रहा है । हमारे प्रधानमंत्री महोदय भी वहां तशरीफ़ ले गये है । जहाँ अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के कारन उन्हें ट्राफिक जाम में फसना पड़ा । जैसा की हम सभी जानते है की , दुनिया में अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश कार्बन डाय ओक्साईड गैस का सबसे ज्यादा उत्सर्जन करते है, जिसके कारन जलवायु परिवर्तन जैसी समस्या सामने आ रही है । मगर ये देश सोचते है की इस समस्या से निपटने का सारा जिम्मा विकासशील देश ही उठाये जो की गलत ही नही बल्कि उनका गैरजिम्मेदारना रवैया दिखलाता है । खैर जैसा की पहले से ही तय लग रहा था की इस सम्मलेन से कोई हल नही निकलने वाला है । वही हो भी रहा है ।
खैर हम सरे देश वासी भी कोई बहुत जागरूक नही है। आज भी हमारे देश में पर्यावरण को लेकर कोई खास जागरूकता नही है। इसकी आगे बहुत ज्यादा जरुरत है। अगर हम जल्द ही चेते नही तो हो सकता है की हमारे देश के नक़्शे से लक्ष्यदीप और अंडमान के कई द्वीप गायब हो जाये ! हमारी जल की बर्बादी का ही नमूना ले लीजिये ॥ बिहार में हर साल बाढ़ आती है तो देश के कई हिस्से पानी को तरसते है। आज ही गाँव में खाना पकाने के कल लिए लकड़ी को जलाया जा रहा है, जबकि देश में जंगल तेजी से ख़त्म हो रहे है । सडको के प्रदुषण का तो हाल आप जानते ही है । खैर खतरे की घंटी बज रही है हम नही जागे तो फिर हो सकता है ,की हमें फिर जागने की नौबत ही न आये (तब तक बहुत देर हो चुकी होगी )
अब बरी है पुछल्ले की ......
अपने जवाहर सिंह झल्लू जो की बहुत प्रतिभाशाली है , उनसे पत्रकारों ने दुनिया में तेजी से बढ़ रही कार्बन डाय ओक्साइड की मात्र कम करने का सुझाव पूछा तो झल्लू जी ने कहा -" सरे पेड़ो को कटवा दो साले सभी पूरी रात कार्बन डे ओक्साइड का उत्सर्जन करते है ।
न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी

शनिवार, 19 दिसंबर 2009

किन्नरों की एतिहासिक गाथा !!

नमस्कार , मित्रो
जबसे मेरे शहर की महापौर किन्नर कमला बुआ बनी है , मैंने सोचा क्यों न इतिहास का छात्र होने के नाते आप सभी को इतिहास में किन्नरों की कुछ गाथाये सुना दू । सबसे पहले किन्न्नारो के बारे में जानकारी रामायण काल में प्राप्त होती है । जब भगवन श्री राम बनवास के लिए जा रहे थे तो उन्हें छोड़ने आये अयोध्या वासियो से उन्होंने कहा- सभी नर- नारी अब वापिस चले जाये ! तो सभी नर- नारी तो चले गये मगर किन्नर खड़े रह गये ! भगवन राम के कारन पूओछ्ने पर किन्नरों ने कहा , प्रभु आपने नर-नारियो को जाने को खा था , मगर हम तो न नर है न नारी , इसलिए हम गये नहीं। तब भगवन ने उन्हें आशीष दिया - " जाओ तुम लोग कलयुग में राज करोगे " (शायद इसीलिए शुरुआत मध्य प्रदेश से हुई है ?!)
महाभारत काल में पांडव अज्ञात वास में जब विरत नरेश के यहाँ गुप्त रूप में रह रहे थे तो अर्जुन ब्रहंल्ला नमक किन्नर बने थे , जो स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी का श्राप था ! आगे महाभारत के युद्ध में भीष्म पितामह की मृत्यु का कारन बना शिखंडी भी किन्नर था ।
मध्यकालीन इतिहास में सल्तनत युग में प्रसिद्द सुलतान अलाउदीन खिलजी के दक्षिण अभियान का सफल नेतृत्व मालिक काफूर नामक हिजड़े ने किया था । उत्तर प्रदेश के शहर को जौनपुर को एक हिजड़े शासक ने इतना सुन्दर बनाया की इसे पूर्व का शीराज खा जाने लगा था । उत्तरवर्ती मुग़ल शासक जहांदार शाह भी एक किन्नर के प्रेम जाल में गिरफ्त था !
आगे भी कुछ इल्चास्प कहानिया है किन्नरों की बहादुरी की मगर फिर कभी ........
अब बारी पुछल्ले की
अपने जवाहर सिंह "झल्लू " एक बार चुपके से स्वर्ग में घुस रहे थे , की तभी स्वर्ग के पहरेदारों ने उन्हें देख लिया। झल्लू जी को पकड़ कर बहुत मारा ।
झल्लू जी झल्ल्ला गये और बोले सालों तुम्हारी इन्ही हरकतों के कारन कोई स्वर्ग नही आना चाहता !!! :-)

मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

न जीता कमल, न जीता पंजा! वाह रे मतदाता जीत गया छक्का !!!!

जी हाँ दोस्तों , शीर्षक सही है और मेरी मानसिक स्थिति भी अभी ठीक है। मध्य प्रदेश के सागर शहर के मतदाताओ ने महापौर (meyar) के पद के लिए एक किन्नर "कमला बुआ " को रिकॉर्ड मतों से जीताया है .जी हाँ मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार और केंद्र में कांग्रेस की सर्कार होने के बाद भी लोगो ने एक निर्दलीय किन्नर को भरी मतों से जिताया है । ये हाल है की , भाजपा की कमजोर स्थिति देख कर खुद मुख्यमंत्री शिवराज चौहान को आना पड़ा मगर उनकी अपील भी मतदाताओ को लुभा नही पाई । मुख्यमंत्री ने कहा था की अगर यहाँ से यदि भाजपा प्रत्याशी जीतती है , तो वे सागर को विशेष पैकेज देंगे । मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुरेश पचौरी सागर को केंद्र सरकार से भारी अनुदान और सहायता राशि दिलाने का वादा भी कांग्रेस को तीसरे नंबर पर जाने से नही रोक पाया । गनीमत है की कांग्रेस की जमानत बच गयी। मतदान के दिन सभी मतदाता खुलकर कह रहे थे की मेरी वोट चाभी (कमला बुआ का चुनावचिंह) को गया है ।
अब प्रश्न ये उठता है की ,
आखिर मतदाता ने क्यों एक किन्नर को चुना ?
क्या कमला बुआ इतनी लोक प्रिय थी ?
क्या भाजपा और कांग्रेस के प्रत्याशी कमजोर थे ?
या फिर जनता कुछ नया चाहती थी ?
क्या लोग भाजपा के नगर निगम में लगाक्तार दस सालो के कार्यकाल से नाखुश थी ?
सबसे पहले मेरे ख्याल से जनता ने कमला बुआ किन्नर को इसलिए चुना की, वो इसके माध्यम से इन दोनों पार्टियों को ये सन्देश देना चाहती है की वो अपनी नपुंसकता को त्यागे ! अपनी जेबे तो भरे मगर विकास का भी ध्यान रखे ! ऐसा नही है की इतिहास में सिर्फ सागर से ही कोई किन्नर जीता हो , इससे पहले मध्य प्रदेश में ही कटनी से महापौर कमला मौसी और सुहागपुर से शबनम मौसी (शबनम मौसी के ऊपर इसी नाम से फिल्म भी बन चुकी है , जिसमे शमनं मौसी की भूमिका सागर के ही आशुतोष राणा ने निभाई थी )विधायक बन चुकी है । मगर इन दोनों की कोई उल्लेखनीय भूमिका नही रही .कमला मौसी कत्निमे कुछ खास नही कर पाई , शबनम मौसी ने कांग्रेस के विधायक को विधान सभा में चप्पल मारी !
मगर सागर में कमला बुआ की स्थिति जरा दूसरी है। कमला बुआ पहले से ही समाजसेविका रही है । इन्होने स्वयं अपने खर्चे से कई गरीब लड़कियों की शादी धूमधाम से कराइ है । विकलांगो की न केवल सहायता की है बल्कि उनके अधिकारों के लिए राष्ट्रिय विकलांग पार्टी का गठन किया। दैनिक भास्कर द्वारा किये गये एक टॉक शो में कमला बुआ ने जनता के गंभीर सवालो ने सटीक जवाब दिए जबकि दोनों पार्टी के उम्मीदवार हिचकिचा गये थे।
खैर आज के दिन सागर में लोग जश्न और ख़ुशी मना रहे है । दोहरी ख़ुशी ! भारत अपना पहला मैच श्री लंका से संघर्ष पूर्ण मुकाबले में जीता , और महपौर के चुनाव में कमला बुआ जीती। दोनों मुकाबले में रिकॉर्ड बने (एक में रनों का , दुसरे में मतों का ) दोनों में छक्को की भूमिका महत्वपूर्ण रही !
खैर इश्वर से दुआ है की किन्नर राजनीति में आये , मगर हमारे नेतायो विकास कर के दिखा दे की इश्वर ने भले उन्हें परपक्वता नही दी है , मगर असल में नपुंसक कौन है !
अब बारी है अपने पुछल्ले की
कमला बुआ के कुछ नारे :-
- कमल नही कमला चाहिय, पंजा नही छक्का चाहिय !
- नकली नही असली चाहिय !
- न भैया से न भाभी से , अब निगम खुलेगा चाभी से !
- जब गूंजेगी कमला की ताल , कंपेगी दिल्ली , हिलेगा भोपाल !
शुक्रिया अपनी टिपण्णी से हमारा उत्साह वर्धन करते रहिये
आपका मुकेश पाण्डेय "चन्दन"

शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

उफ़ ! ये नई मुसीबत आ गई .....?

नमस्कार जी,
सबसे पहले सॉरी जी , इतने दिनों जो ब्लॉग जगत से जो गायब रहा । खैर कुछ परेशानिया तो आती ही रहती है। लेकिन आज मैं जो मुसीबत की बात करने वाला हूँ, वो आम नही कुछ खास है। अब अपने सीधे सादे परधन मंत्री जी की मुसीबत बढ़ गयी है, जनाब जिस अमेरिका से परमाणु समझौता करने के लिए उन्होंने अपनी सरकार तक दांव पर लगा दी। उसी अम्रीका के राष्ट्रपति ओबमाओ (ओबामा+माओ)जो शायद दिखने के लिए हनुमान जी की प्रतिमा अपने साथ रखते है, गाँधी जी की फोटू अपने ऑफिस में लगाते है, व्हाईट हाउस में दिवाली मनाते है. और चीन जाकर इंडो-पाक विवाद में चीन का हस्तक्षेप जरुरी मानते है !
खैर, हिंदुस्तान अपने मसले ख़ुद सुलझाने की समझ रखता है , बशर्ते पाक इसके लिए तैयार हो ?!
अब दुनिया दारी छोडो और मेरी एक कविता पढ़िए ......
नवजीवन
अस्त होते-होते सूर्य क्षितिज से बोला - कि तात
तनिक प्रतीक्षा और कर लेती, ये अंधकारमयी रात
आपके पुत्रो को दिवसभर दिया, ऊर्जा और प्रकाश
अभी मन भरा ही न था कि आपने दे दिया अवकाश
क्षितिज मेघ झरोखा हटाते बोला - कि वत्स
है प्रकृति का नियम यही, है हम-तुम विवश
कल तुम आना , नव ऊर्जा और शक्ति से सम्पूर्ण होके
देना इन्हे नवजीवन , कि विस्मित होके जग देखे
सब लगते निज निज कर्मो से आते ही तुम्हारे
दिवस परिश्रम से थक्के , करते आराम जाते ही तुम्हारे
नियम टूटे या न टूटे, पर मत इनको थकने देना
है आराम भी जरुरी, अब आने दो मधुरिम रैना
नवजीवन लेकर आऊंगा, अब मैं नित्य
क्षितिज से कहते-कहते, अस्त हुआ आदित्य
ये तो हुई कविता जाहिर आपको अच्छी लगी हो , और आप अपनी टिप्पणी भी देंगे ! अब बात करते है , अपने जवाहर सिंह "झल्लू" मतलब पुछल्ले की
एक बार जल्लू जी एक अमेरिकी से मिले । तो अमेरिकी ने कहा कि - मेरे यंहा इतनी स्वतंत्रता है कि आप व्हेइत हाउस के सामने खड़े होकर हमारे प्रेसिडेंट को गाली दे सकते है।
तो जल्लू जी बोले इसमे कौन सी बड़ी बात है , आप हमारे राष्ट्रपति भवन के सामने खड़े होकर भी अपने प्रेसिडेंट को गालियाँ दे सकते है !

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2009

लता जी ; अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो ?!

नमस्कार,
पिछले दिनों आपने भी ये ख़बर पढ़ी सुनी होगी की लता मंगेशकर जी ने कहा - अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो ! उनकी ये बात हमारे कई जख्म कुदेर गयी , जब लता मंगेशकर जी जिन पर सरे भारत को ही नही वल्कि समूचे विश्व को गर्व है , उनके मुह से ये बात सुन्नी पड़ रही है । मतलब आप समझ सकते है, की देश में बेटियों की क्या हालत है ?
वाह रे मेरे देश तुने अपनी बेटियों को क्यो इस हाल पे छोड़ दिया की उन्हें मजबूरन कहना पड़ रहा है - अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो
आज भी हमारे देश बेटियों की हालत बद से बदतर है !
आज भी हमारे घरो में बेटियों को दोयम दर्जे का समझा जाता है !
आज भी हमारी माँ और दादी बेटियों को सलीके से रहने को कहती जबकि बेटा भले ही कैसा घूमे !
आज भी अपने हिस्से से बेटियों को ही कम दिया जाता है !
आज भी बेटियों को अपने सपनो का दम घोटना पड़ता है , क्योंकि भइया का सपना पूरा हो सके !
आज भी बेटिया पैदा होते ही पराया धन समझी जाती है !
आज भी कोई लता, कोई किरण , कोई उषा, कोई आशा, कोई कल्पना ,कोई प्रतिभा बेबस होके कहती है -अगले जनम मोहे बिटियाँ न कीजो ? !
आख़िर क्यों ?????????????????????????
गलती किसकी है ? हमारी और आपकी ही है न ?
चलो अपनी ! galti sudhare !
अब पुछल्ले की बारी .....
जैसा की आप जानते ही है की जवाहर सिंह "झल्लू" एक प्रतिभा शाली वैज्ञानिक है ।
इस बार झाल्लुजी ने नोट छपने की मशीन इजाद कर ली , लगे धडाधड नोट छपने लगे !
लेकिन एक बार गलती से १५ रूपये का नोट छप गया !
झल्लू जी ने सोचा चलो इसे किसी गाँव में चलाया जाए क्योंकि शहर में तो शायद ही कोई इसे लेगा ।
jhallu ji ek kirane ki dukaan pe gye , dukaandaar ko not diya aur kaha- ek gutkha dedo bhai .
dukaan dar ne not liya gutkha dekar bola, abhi khulle lata hoon !
jhallu ji khush !
thodi der baad dukaan dar aaya aur 7-7 ke do not dekar bola lo bhaiya aapke 14 rupye.!
jai raam ji

शनिवार, 10 अक्टूबर 2009

सब गड़बड़ है पर नो प्रोब्लम !!

भइया अब तो हद हो गयी ! नोबल वाले का सठिया गये जो मात्र ०९ माह के कार्यकाल में ओबामा उन्हें शान्ति के मसीहा नजाए आ गये ! हमें तो ठीक ख़ुद ओबामा को भी हैरानी हो गयी , की ससुरा कुछ बहुतै जल्दी नही हो गया !
हमारे राष्ट्रपिता गाँधी जी का पॉँच बार नोबल शान्ति के लिए नामांकन हुआ , पर नोबल समिति वालो को वो इस पुरूस्कार के लायक नही लगे , उनके चेलो तक को नोबल शान्ति मिला (नेल्सन मंडेला, अंग सन सू की , मार्टिन लूथर किंग आदि ) , चलो कोई बात नही पर गाँधी के नये चेले ने ऐसा क्या गुल खिला दिया की नोबल वाले उन पर मोहित हो गये । भइया कुछ गड़बड़ जरुर है !!
सुना था की अपने इहाँ कुछ फिल्मी कलाकार अवार्ड फंक्सन में फिक्सिंग करके अवार्ड ले जाते थे ! मगर दुनिया के सबसे बड़े और निष्पक्ष पाने जाने वाले नोबल में ऐसा होगा ........................
देश के दक्षिणी इलाको में बाढ़ का कहर जारी है, लाखो लोग बेघर हो गये है , हजारो अनाथ , सैकडो काल के गाल में समा गये है। केन्द्र सरकार ने १००० करोड़ रु० की सहायता की घोषणा की है, मेरा आप सभी से करबद्ध निवेदन है की इस संकट की घडी में हमारे बाढ़ पीड़ित भाई बहनों की सहायता जरुर करे , साथ ही साथ अन्य लोगो को भी सहायता करने के लिए प्रेरित करे ।
मेरा मानना है की इस बार दिवाली सादगी से मानकर हम अपने भाई बहनों की सहायता के लिए आराम से पैसे जोड़ सकते है। हाँ इस बार उन लोगो के लिए भी कुछ दिए जरुर जलाये जो इस बार दिवाली नही मन पाएंगे ।
मेरे मन में विश्वास है की आप मेरी बात जरुर मानेंगे । अरे-----रे रे , सॉरी एक बात मैं भूल ही गया की ये मेरी हाफ सेंचुरी यानि पचासवी पोस्ट है ! आज से अपनी पोस्ट में एक न्य आयटम जोड़ रहा हूँ जिसका नाम दिया है मैंने पुछल्ला , इस में अपनी बात के आख़िर में एक गुदगुदाती सी बात कहने की कोशिश करूँगा। अगर पुछल्ला पसंद आए तो सूचित जरुर करे। तो पेश है आज का पुछल्ला
एक नए नवेले वैज्ञानिक (प्रतिभाशाली ) जवाहर सिंह 'झल्लू' ने न्यूटन के गति के तीन नियमो में अपना एक नया चौथा नियम जोड़ा है।
" लूज मोशन कभी भी स्लो मोशन में नही होता है "

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

एक भारतवंशी को नबल पुरूस्कार !! खुश होए या शर्मशार !!!!

नमस्कार , मित्रो
आप सभी लोग मीडिया के किसी न किसी माध्यम से ये जान ही चुके होंगे की भारत वंशी वैज्ञानिक श्री वेंकटरमण रामकृष्णन को राइबोसोम के अध्यनन के लिए रसायन शास्त्र के नोबल पुरूस्कार के लिए चयनित किया गया है । श्री रामकृष्णन जी ने बडोदरा विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर किया है। फ़िर निकल गये विदेश !
अब उनके नोबल मिलने पर जैसा की हर भारतीय को खुशी होनी चाहिय खुशी हुई .मगर मेरे हिसाब से हमें शर्म आणि चाहिए की हम अपने देश के आजाद होने ६० सालो के बाद भी ऐसी परिस्थितिया नही पैदा कर सके की , ऐसी प्रतिभाये अपने ही देश में रहकर अपने देश का नाम ऊँचा कर सके ?१! श्री रामकृष्णन देश के चौथे भारतीय या भारतवंशी वैज्ञानिक है जिन्हें नोबल पुरुस्कार मिला। इन चारो वैज्ञानिको में सिर्फ़ डॉ सी० वी० रामन को अगर छोड़ दिया जाए तो बाकि तीन (डॉ एस चंद्रशेखर, डॉ हरगोविंद खुराना और अब वी रामकृष्णन ) वैज्ञानिक भारतीय नही भारतवंशी है । आख़िर क्यो इन्हे भारत से बाहर जाना पड़ा ? कभी हमारी सरकारों ने सोचा है ?
हम क्यों नही ऐसी सुविधाए उपलब्ध करा सके ताकि इस प्रतिभा पलायन को रोका जा सके ? क्यों देश आजाद होने के बाद हम किसी भारतीय को नबल पुरूस्कार नही दिला पाए ? क्या हमारे यहाँ प्रतिभाये नही है ? (शायद ऐसा नही है )
एक बार सी वी रमन के भतीजे डॉ एस चंद्रशेखर (दोनों नोबल विजेता ) ने तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू से अपने शोध के लिए सुविधाए जुटाने की बात की थी , मगर नेहरू जी तब ब्भारत के गरीब होने की बात कहकर अपनी असमर्थता जाहिर की थी । परिणामस्वरूप डॉ चंदार्शेखर अमेरिका गये , खगोल विज्ञानं में अपना शोध पुरा किया और नोबल भी जीता । क्या हम इस नोबल को एक भारतवंशी की जगह एक भारतीय के नाम नही कर सकते थे? अगर नेहरू जी की बात मान भी ले की उस वक्त भारत की आर्थक हालत ठीक नही थी । तो आज तो ये स्थिति नही है , भारत विश्व की उभरती ताकत बन रहा है । तब क्यो नही हम शिक्षा , शोध और प्रतिभाओ को बढावा देने वाली योजनाये बनाते है ? क्यों नही हमारे विश्वविद्यालयो में मौलिक पी एचडी होती है
खैर मौका खुशी का है , भले किसी और मुल्क ने हमें ये अवसर दिया हो । हम खुशिया तो मन ही ले , इसके सिवा हमें और आता ही क्या है ? (भारत में सबसे ज्यादा छुट्टियाँ और त्यौहार होते है, यानि साल में सबसे कम काम भी होता है )
डॉ रामकृष्णन को हार्दिक बधाई !
आप सभी को भी आने वाले त्योहारों की शुभकामनाये !
जय जय

बुधवार, 7 अक्टूबर 2009

वाह रे ! राष्ट्रिय नाम देखे कितना करेगा काम !

भारत सरकार ने गंगा की डालफिन को राष्ट्रिय जलजीव घोषित कर दिया है। इसके फहले गंगा को राष्ट्रिय नदी घोषित किया गया था। मगर इस तरह राष्ट्रिय घोषित करने से होगा क्या ? इससे पहले भी सरकार ने मोर को राष्ट्रिय पक्षी , बाघ को राष्ट्रिय पशु घोषित किया , उनके संरक्षण के लिए तमाम योजनाये चलायी । मगर फायदा क्या हुआ ? बाघ दिनों दिन कम हो रहे है , मोर १९४९ की तुलना में आधे ही बचे है । गंगा की तो बात ही क्या करे जबसे राष्ट्रिय नदी शायद ही सरकार ने कोई ध्यान देने वाला काम किया हो ! मुझे तो ये समझ में नही आता की आखिर सरकार राष्ट्रिय शब्द जोड़कर अपनी जबब्दारियो से मुह क्यो मोड़ना चाहती है ? अगर वास्तव में सरकार को इनके लिए कुछ करना है तो सबसे पहले लोगो को जागरूक बनाना होगा । मैंने ख़ुद अपने कालेज के ज़माने मेंनौरादेही वन्यजीव अभ्यारण्य के द्वारा आयोजित वन्यजीव संरक्षण सप्ताह प्रतियोगिताओ में भाग लिया और कई पुरूस्कार भी जीते मगर वह वन अधिकारियो का वन और वन्यजीवों के प्रति रवैया देखकर पता चला क्यो सरकार की ये योजनाये फेल हो जाती है ।
सरकार अगर वाकई इन हमारी प्राकृतिक धरोहरों के प्रति गंभीर है तो उसे सबसे पहले अपने विभागों का नजरिया और कार्य पद्धति बदलनी होगी ।

शनिवार, 3 अक्टूबर 2009

गाँधी के बहाने.... दुनिया के तराने

गाँधी के बहाने
दुनिया के तराने
लोग चले भुनाने
कुछ भोले , कुछ सयाने
थरूर- छुट्टी बंद हो !
मोंट-ब्लेक - महंगा पेन हो !
जो अहिंसा के लिए मरा
वो हिंसा की जड़ नोट पे छपा
जब बिग अपना काम हो
तो बनाने गाँधी का नाम हो
हाड़ मांस पे आधी धोती है
वही राजनेताओ की बपौती है
हर शहर में उसके नाम पे सड़के
तीन दिन के लिए हर नेता फडके
अब बेटा सगे बाप को नही पूछता
तो कौन राष्ट्र पिता को पूजता ?
बस दिखाने को कर देते रस्म अदायगी
जाने कब हमें शर्म आएगी ?
जब जिन्दा था वो महात्मा तो अपनों ने ही मार दिया
और हमने तोडके उसके उसपे कितना उपकार किया ?
अब गाँधी, तवा है ! अपनी अपनी रोटी सेंक लो
जब रोटी सिक जाए तो गाँधी को फेंक दो !!
प्रिय मित्रो , मेरा सौभाग्य समझ्यिये की मैं भी गाँधी और शास्त्री की तरह २ अक्तूबर को पैदा हुआ हूँ। मगर आज मुझे बड़ा दुःख होता है की लोग गाँधी को अपने स्वार्थ को साधने के लिए इस्तेमाल कर रहे है ! और शास्त्री जी जैसे महँ नेताओ को तो आजकल अखबार और मीडिया भी अब तबज्जो नही देता । बड़ी शर्म की बात है ! पर क्या करे हम तो मूलतः बे-शर्म है ही ! अगर हमें शर्म आती तो इतहास में हमारे ऊपर इतने लोगो ने शासन किया होता ?
जिनको शर्म आई वो लड़े और मरे हमने कुछ दिन याद किया और फ़िर सकूली किताबो में छपकर बे-शर्म हो गये । दोस्तों माफ़ करना अगर आप की भावनाए आहात हो रही हो तो ....? मैं कुछ सच्चाई बयां कर रहा हूँ । पर क्या करना किसी को कोई पचासक साल पहले कुच्छ लोगो ने लड़-मर कर देश को आजाद कराया ? हम तो बे-शर्म है ही ! अगर आप को कुछ अपने दिल या मन में कुछ महसूस हो रहा हो तो मुझे जरुर बताये
बकौल दुष्यंत कुमार -
तमाशा खड़ा करना मेरा मकसद नही , बस तस्वीर बदलनी चाहिए
जो आग मेरे सीने में है , हर दिल में जलनी चाहिए .........

रविवार, 27 सितंबर 2009

हर घर में रावण छिपा है !!

कितने पुतले जलाओगे, हर घर में रावण छिपा है
कितनी बार आग लगाओगे, हर पग पर तम जाल बिछा है
एक्पुतला जल जाने से, सारा पाप नही मर जाता
पुतले में आग लगाने से , हर नर राम नही बन जाता
जब होगा अहम् , तब तक रावण नही मरेगा
अहम् ब्रम्हास्मि मार्के भी रावण यही कहेगा
स्वार्थ, ईर्ष्या, घृणा, पाप चारो और यही मचा है
कितने पुतले जलाओगे हर घर में रावण छिपा है ।
हर दिन सीता का अपहरण हो रहा है
पुलिस प्रशासन कुम्भकरण सो रहा है
गीध जटायु मूक बनके सब छिपा है
कितने पुतले.................................
आज रावण एक नही , उसके रूप कई है
अन्याय , अत्याचार के बाद भी वह सही है
मारते मारते रावण को आज राम थक जायेंगे
इतने रावण है की कई राम भी न मार पाएंगे
कितने पुतले जलाओगे , हर घर में रावण छिपा है
कितनी बार आग लगाओगे , हर पग पर तम जाल बिछा

मित्रो आप को विजय दशमी की हार्दिक शुभकामनाये । जैसा की हम जानते है की विजय दशमी बुराई
पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है । हम भारतीय ढोंग ज्यादा करते है, मतलब हम जो त्यौहार मानते है उनमे सन्देश तो बहुत अच्छे होते है , मगर वो सिर्फ लिखने कहने के लिए ही होते है । उन पर हम अमल करने की कंजूसी करते है । ऐसा क्यों ? हम इतने दोगले क्यों है ? सिर्फ परंपरा निर्वाह के लिए ही हम पर्व-त्यौहार कब तक मानते रहेंगे ?
मेरी ये बातें हो सकता है कुछ लोगो को जरुर बुरी लग सकती है ! मगर मुझे नादाँ समझ कर क्षमा करे क्योंकि सच यही है । जो कड़वा है । आप अपनी प्रतिक्रिया से जरुर अवगत कराये ताकि मुझे पता चल सके की मैं कितना सही और गलत हूँ ।
जय जय .......

बुधवार, 23 सितंबर 2009

ये जननी, ये माता !!

बड़ी तन्यमयता के साथ , सृजनहार कर रहे थे सृजन
इतने में नारद ने पूछा - क्या कर रहे हो भगवन ?
नारद, मैं आज बना रहा हूँ , ब्रम्हांड की अनमोल काया
जिसमे होगा प्यार का सागर , और मेरी माया
या कह सकते हो, की मैं बना रहा हूँ अपना प्रतिरूप
जो देगी सबको छाया, करके सहन जीवन की धूप
वो हंसकर झेलेगी कष्ट, पर फ़िर भी करेगी सृजन
सृजनहार भले ही मैं हूँ , पर वो देगी सबको जीवन
उसके बिना अकल्पनीय होगी , सारी सृष्टि
प्रेम का प्रतीक , होगी उसकी वात्सल्य पूर्ण दृष्टि
आज मैं करके उसका सृजन , अपने को धन्य पाता
मुझसे भी बढ़कर होगी, ये जननी, ये माता !!

जैसा की आप सभी जानते है की आजकल पूरे देश में आदि शक्ति जगत जननी दुर्गा का महापर्व नवरात्री मनाया जा रहा है । इस पर्व में लोग दुर्गा के नारी स्वरुप का पूजन करते है , कन्याओ को देवी मान कर उनकी पूजा करते है । मगर क्या हम सचमुच इस पर्व का औचित्य या मतलब समझ पाए है ? क्या हम झूठ मूठ ही नही देवी के दिखावे के लिए दर्शन प्रदर्शन नही कर रहे है ? क्या बड़ी बड़ी झांकिया और पंडाल सजाने से देवी प्रसन्न हो जायेगी ? क्या नो दिन भूखे रहने से देवी की हम पर कृपा हो जायेगी ?
जब तक इस परम पवित्र देव भूमि भारत वर्ष में कन्या भ्रूण हत्या , दहेज़ के लिए बहुओं की हत्या ,घटता लिंगानुपात , महिलाओ के प्रति बढती हिंसा, अश्लीलता आदि कई अपराध उपस्थित है , तब तक हमारी आराधना निश्फक ही होगी ! ये मेरे अपने विचार है आप भी अपने विचारो से जरूर अवगत कराये ।जय जय ............

सोमवार, 21 सितंबर 2009

कुछ बचपन की यादें, शायद आपके साथ भी ऐसा हुआ हो !

दोस्तों , बचपन बहुत ही निराला होता है । न कोई चिंता , न कोई फिकर बस अपने में मस्त ! मेरी इस बात से आप सभी सहमत होंगे ? हर किसी के बचपन की तरह मेरा बचपन भी बड़ा ही सुंदर रहा । मेरे बचपन की बड़ी प्यारी सी याद आपसे बांटने का जी कर रहा है । मेरा जन्म जरूर बिहार के बक्सर जिले में हुआ मगर चार साल की उम्र के बाद मैं सागर (म०प्र०) में ही खेला कूदा हूँ ।
मैं जिस कसबे में रहता था वहां हर साल कसबे के लोगो के द्वारा दशहरा के समय रामलीला खेली जाती थी । मेरे उम्र के भी कई बच्चे भी रामलीला में भाग लेते थे । मुझे भी राम लीला देखने में मजा आता और उसमे भाग लेने का मन करता था। कई बार कोशिश की मगर कोई फायदा नही हुआ । मुझे किसी पत्र के लायक नही समझा गया । पर अपनी किस्मत भी जोरदार थी , एक जब दशहरा के दिन रावन बध का मंचन होना था । रामलीला का यह प्रसंग देखने दूर दूर के गांवों से लोग आए थे । राम-हनुमान में जोरदारhओ रही थी । मैं रामलीला के प्रबंधक के यहाँ हर दिन की तरह एक आशा के साथ पंहुचा । मगर आज तो गजब हो गया इस विशेष दिन मुझे वानर सेना के एक वानर के रोल के लिए चुना गया। मैं स्वाभाविक रूप से बड़ा खुश !!
अब रामलीला शुरू राम और हनुमान के बीच युद्ध प्रारम्भ :
मैं मुह में लाल रंग पोते हाफपेंट लाल रंग के पहने और पीछे छोटी सी पुँछ लगाये मंच पर जेश्रीराम चिल्लाते हुए आया । मैं मन में सोच रहा था की शायद मेरा मुकाबला महाबली रावन से होगा । अपनी इस उपलब्धि पर मैं इतना खुश था , की शायद रामायण सीरियल के बानर भी इतने न हुए होंगे !
पर ये क्या हो गया !!
मेरे मंच पर आते ही विशालकाय शरीर वाले बड़ी मूछो वाले दुष्ट रावन ने अट्टहास किया -
हीही हां हा हा और मैं छोटा सा बानर कुछ डर सा गया ! फ़िर रावन मेरी तरफ़ लपका ...... मैं डर के मरे मंच के पीछे भगा ........ मगर बलिष्ट दुष्ट रावन ने मुझे पकड़ लिया । सरे दर्शक हस हस के लोट पोत हो रहे थे , मगर मेरी हाफ पेंट गीली हो रही थी !!
.....मैं मम्मी मम्मी चिल्लाया मगर उस दुष्ट को तरस न आया !......उसने मुझे उठाया ......और .......और....... फ़िर उठाकर हनुमान की तरफ़ फेक दिया ....हनुअमान ने लपका ... दर्शको ने जोरदार ताली बजाई । मुझे नानी याद आई ..... हनुमान जी ने भी गुस्सा दिखाया और ..... हाय ! मेरी फूटी किस्मत ........हनुमान जी ने भी मुझे लपक के रावन की ओरफेंका ....... संकट मोचन मेरे लिए संकट दायक हो गये!! ..... फ़िर रावन ने लपका ....फेका ... हनुमान ...लपका ..... फेका.... रावन ...... हनुमान .......रावन ......हनुमान ......रावन ........फ़िर अचानक रावन ने लपकने में ढील की मैं धडाम से नीचे गिरा... ... जान बची तो लाखो पाए !....... मैंने फ़िर आव देखा न तव ........फ़िर ऐसे भगा की सीधे अपने घर जाकर ही रुका !
हूउह अरे भाई साँस तो ले लेने दो ......जेश्रीराम

अब बस आज थक गया हूँ । अभी जब जब दशहरा आता है, या तेलेविसन पर रामायण चलती है तो मेरे रोंगटे खड़े हो जाते है !!
तब से मैंने कभी रामलीला नही देखि !
आखिर में बचपन में खेली ज्ञऐ कुछ खेलो की लीने शायद आपने भी ये खेले हो ?
आजकल के होनहार तो कम्पूटर और मोबाईल से ही काम चला लेते है । जे जे ....

1.) मछली जल की रानी है,जीवन उसका पानी है।हाथ लगाओ डर जायेगीबाहर निकालो मर जायेगी।
2.) पोशम्पा भाई पोशम्पा,सौ रुपये की घडी चुराई।अब तो जेल मे जाना पडेगा,जेल की रोटी खानी पडेगी,जेल का पानी पीना पडेगा।थै थैयाप्पा थुशमदारी बाबा खुश।
3.) झूठ बोलना पाप है,नदी किनारे सांप है।काली माई आयेगी,तुमको उठा ले जायेगी।
4.) आज सोमवार है,चूहे को बुखार है।चूहा गया डाक्टर के पास,डाक्टर ने लगायी सुई,चूहा बोला उईईईईई।
5.) आलू-कचालू बेटा कहा गये थे,बन्दर की झोपडी मे सो रहे थे।बन्दर ने लात मारी रो रहे थे,मम्मी ने पैसे दिये हंस रहे थे।
6।) तितली उडी, बस मे चढी।सीट ना मिली,तो रोने लगी।।driver बोला आजा मेरे पास,तितली बोली " हट बदमाश "।
7.) चन्दा मामा दूर के,पूए पकाये भूर के।आप खाएं थाली मे,मुन्ने को दे प्याली में
क्यों आपको भी अपना बचपन याद आया की नही ? सही बताना !

रविवार, 20 सितंबर 2009

मजहब

मजहब सिखाता है , आपस में सब भाई भाई

तो भइया क्यो होती है , मजहब के नाम पे लडाई

क्या मजहब के बन्दों को मजहब का पाठ समझ न आया

क्यों मजहब के नाम पर, इन बन्दों ने खुनी रंग चढाया

इनको मजहब का पाठ पढ़ा दे कोई ज्ञानी

समझा दे इनको खून खून है , नही है पानी

अमन का संदेसा देकर इनको, बंद करवा दे मौत का तमाशा

होता रहा ये सब तो कुछ न बचेगा, न मजहब न खुनी प्यासा

मन्दिर के घंटे चीखे, चिल्लाएं मस्जिद की अजाने

मजहब की लडाई बंद कर दो, ओ मजहबी दीवाने

अपने मंसूबो की खातिर, क्यों करते हो मजहब बदनाम

एक संदेशे नानक ईसा के , एक ही आल्लाताला राम

मित्रो , आप सभी को नवरात्री और ईद की दिल से ढेर शुभकामनाये ।

रविवार, 13 सितंबर 2009

कुर्सी खामोश है !!

अजब सा हो गया है, देश का हाल
सबसे सस्ती कारऔर सबसे महंगी दाल
कहीं बाढ़ से लोग त्रस्त,कहीं पर सूखा
आम इन्सान परेशां खड़ा , नंगा और भूखा
जिन्दगी की साडी मिठास ले महँगी हुई चीनी
बची खुची इज्ज़त भी कुदरत ने छिनी
आंकडो में महंगाई और मुद्रास्फीति घट रही है
हकीकत में क़र्ज़ से किसान की छाती फट रही है
कहीं पानीसे तबाही, कहीं पानी की कमी
पर कुर्सी खामोश है, सलामत जो उसकी जमीं
मित्रो , देश के हालत आपसे छुपे नही है , मगर हमरी खाशी ही कुर्सी को खामोश किए है । आज बढती महंगाई के कारन एक आम आदमी को दाल रोटी भी ढंग से नसीब नही हो पा रही है , आम आदमी की सरकार के मंत्री तो फाइव स्टार होटलों में मजे कर रहे मगर आम आदमी .............?
यही हाल आम आदमी की भाषा हिन्दी का भी है , जिस तरह सत्तानशीं लोगो को आम आदमी की याद चुनावो में आती है , उसी तरह हिन्दी की याद भी सितम्बर के महीने आती है । कल हिन्दी की पुण्यतिथि ओफ्फ्हो क्षमा करना हिन्दी दिवस है । हम क्यों साल के कुछ दिन हिन्दी को कुछ दिन याद कर उसे श्रद्धांजलि देते है ? मैं आप सभी हिन्दी ब्लोगेर्स को नमन करता हूँ , जो हमेशा हिन्दी की लाज बचाए रखते है । उड़नतश्तरी वाले समीर जी तो विशेष रूप से नमन योग्य है जो परदेश में भी हिन्दी की अलख जगाये हुए है । खैर मुझ अज्ञानी से जो भी भूल हुई हो उसे क्षमा करना ! आप सभी को भारत की रास्त्रभाषा दिवस की कोटि कोटि शुभकामनाये ॥
जे हो हिन्दी , हिंदुस्तान की शान

शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

भैंस चालीसा

भैंस चालीसा महामूर्ख दरबार में, लगा अनोखा केस फसा हुआ है मामला, अक्ल बङी या भैंस अक्ल बङी या भैंस, दलीलें बहुत सी आयीं महामूर्ख दरबार की अब,देखो सुनवाई मंगल भवन अमंगल हारी- भैंस सदा ही अकल पे भारी भैंस मेरी जब चर आये चारा- पाँच सेर हम दूध निकारा कोई अकल ना यह कर पावे- चारा खा कर दूध बनावे अक्ल घास जब चरने जाये- हार जाय नर अति दुख पाये भैंस का चारा लालू खायो- निज घरवारि सी।एम. बनवायो तुमहू भैंस का चारा खाओ- बीवी को सी.एम. बनवाओ मोटी अकल मन्दमति होई- मोटी भैंस दूध अति होई अकल इश्क़ कर कर के रोये- भैंस का कोई बाँयफ्रेन्ड ना होये अकल तो ले मोबाइल घूमे- एस.एम.एस. पा पा के झूमे भैंस मेरी डायरेक्ट पुकारे- कबहूँ मिस्ड काल ना मारे भैंस कभी सिगरेट ना पीती- भैंस बिना दारू के जीती भैंस कभी ना पान चबाये - ना ही इसको ड्रग्स सुहाये शक्तिशालिनी शाकाहारी- भैंस हमारी कितनी प्यारी अकलमन्द को कोई ना जाने- भैंस को सारा जग पहचाने जाकी अकल मे गोबर होये- सो इन्सान पटक सर रोये मंगल भवन अमंगल हारी- भैंस का गोबर अकल पे भारी भैंस
मित्रो ये मेरी रचना नही है , इसे किसी मित्र ने ही मुझे ऑरकुट पर स्क्रैप किया था , मुझे लगा की आप सभी को इससे रु-ब-रु करू। कैसी लगी जरुर बताना ।

मंगलवार, 8 सितंबर 2009

भारत भी बन सकता है , शत प्रतिशत साक्षर !!

आज यानि ८ सितम्बर को विश्व साक्षरता दिवस है । आज का दिन हमें सोचने को मजबूर करता है , की हम क्यो १०० % साक्षर नही है ? यदि केरल को छोड़ दिया जाए तो बाकि राज्यों की स्थिति बहुत अच्छी नही कह जा सकती है । सरकार द्वारा साक्षरता को बढ़ने के लिए सर्व शिक्षा अभियान, मिड दे मील योजना , प्रोढ़ शिक्षा योजना , राजीव गाँधी साक्षरता मिशन आदि न जाने कितने अभियान चलाये गये , मगर सफलता आशा के अनुरूप नही मिली । मिड दे मील में जहाँ बच्चो को आकर्षित करने के लिए स्कूलों में भोजन की व्यवस्था की गयी , इससे बच्चे स्कूल तो आते है , मगर पढने नही खाना खाने आते है । शिक्षक लोग पढ़ाई की जगह खाना बनवाने की फिकर में लगे रहते है । हमारे देश में सरकारी तौर पर (वास्तव में ) जो व्यक्ति अपना नाम लिखना जानता है , वह साक्षर है । आंकड़े जुटाने के समय जो घालमेल होता है , वो किसी से छुपा नही है । अगर सही तरीके से साक्षरता के आंकडे जुटाए जाए तो देश में ६४.९ % लोग शायद साक्षर न हो । खैर अगर सरकारी आंकडो पर विश्वास कर भी लिया जाए तो भारत में ७५.३ % पुरूष और ५३.७ % महिलाये ही साक्षर है । मगर सच्चाई इससे अलग है । (ये आंकड़े साक्षरता के है , न की शिक्षित लोगो के नही है )
चलिए सरकार की खामिया बहुत है , जब सरे कुएं में भंग हो तो किसे दोष दे ?
अब बात करते है , की भारत १०० % साक्षर कैसे बने ? भारत में सबसे ज्यादा विश्वविद्यालय है । हमारे देश में हर साल लगभग ३३ लाख विद्यार्थी स्नातक होते है । उसके बाद बेरोजगारों की भीड़ में खो जाते है ! (अगर किस्मत या पैसे वाले न हो तो ) मेरे अनुसार हम हर साल स्नातक होने वाले विद्यार्थियो का सही उपयोग साक्षरता को बढ़ने में कर सकते है । स्नातक के पाठ्यक्रम में एक अतिरिक्त विषय जोड़ा जाए , जो सभी के लिए अनिवार्य हो । इस विषय मे सभी chhatro को एक व्यक्ति को साक्षर बनने की jababdari लेनी होगी । shikshako के द्वारा इसका mulyankan किया जाएगा । अन्तिम वर्ष मे mulyankan के aaadhar पर anksoochi मे इसके ank भी जोड़े जाए । इससे हर साल लगभग ३३ लाख लोग साक्षर होंगे । वो भी बिना किसी सरकारी kharch के !
इस vyawstha का ये फायदा होगा की , सरकार का bahumulya पैसा तो bhachega ही sath ही chhatro को uttardyitv की भावना भी utpan होगी ।
maaf कीजिये takniki gadbadi के karan मैं इस lekh को यही samapt करने को मजबूर हूँ ।

गुरुवार, 3 सितंबर 2009

गणेशोत्सव और कांटा लगा !!

गणेश चतुर्थी के पहले लोग पंडाल सजा रहे थे
लेकिन धार्मिक की जगह, फिल्मी गीत बजा रहे थे
बंगले के पीछे कांटा लगा, बुद्धि विनायक सुन रहे थे
मनो काँटों से बचने के लिए जाल कोई बुन रहे थे
बेरी के नीचे लगा हुआ था, काँटों का अम्बार
लहूलुहान से बैठे गजानन , होके बेबस और लाचार
सोच रहे थे , कब अनंत चतुर्दर्शी आएगी ?
जाने कब बेरी के काँटों से मुक्ति मिल पायेगी ?
मुश्किल हो गया, इस लोक में शान्ति का ठिकाना
नाक में दम कर दिया , और कहते अगले बरस जल्दी आना !
मैं इसी बरस जल्दी जाने की सोच रहा हूँ
अपने फिल्मी भक्तो के लिए अपने आंसू पोछ रहा हूँ
मुझसे बढ़कर , इनके लिए फिल्मे और फिल्मी संसार
फ़िर गणेशोत्सव क्यों मनाते ? करते क्यों मुझ पर उपकार ?
मित्रो , गणेश विसर्जन के साथ गणेशोत्सव समाप्त हो गया , पर दुःख की बात है की लोकमान्य तिलक ने जिस उद्देश्य के साथ इसे शुरू किया उसकी पवित्रतता तो जाने कब की ख़त्म हो गयी है। अब लोग इस परम्परा को बस निभा रहे है ! उनमे वो श्रद्धा और भक्ति की भावना नही बची है । शेष भगवन मालिक है । गणपति बाप्पा मोरिया रे ......

मंगलवार, 1 सितंबर 2009

वाजपेयी का काव्य पाठ और खली पड़ी कुर्सियां !!

नमस्कार मित्रो,
पिछले दिनों १३ औगस्त को डॉ हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय, सागर (म०प्र०) के हिन्दी विभाग द्वारा हिन्दी के जाने माने कवि, राजनयिक और पत्रकार डॉ अशोक वाजपेयी जी का काव्य पाठ aआयोजित किया गया था । पर हाय रे विडम्बना और विश्वविद्यालय प्रशासन की व्यवस्था की इतने नामी कवि का काव्य पाठ और उसकी सूचना तक आम लोगो को नही दी गयी । परिणामस्वरूप कार्यक्रम में जब डॉ वाजपेयी अपने जन्मस्थान में आयोजित इस कार्यक्रम में अपना काव्य पाठ कर रहे थे ,तो विश्वविद्यालय के स्वर्ण जयंती हाल में बमुश्किल पचास लोग भी नही थे । अपने जन्म स्थान पर इतने नामी कवि के काव्य पाठ पर दिल रो आया , की विश्वविद्यालय प्रशासन ने अगर सिर्फ़ स्थानीय समाचार पत्रों में छोटी सी ख़बर भी दे दी होती तो डॉ वाजपेयी के हजारो प्रशंशक टूट पड़ते । डॉ वाजपेयी ने कार्यक्रम में अपनी १९ कविताये और सागर (म० प्र० ) शहर के अपने अनुभव सुनाये । पर उनकी आँखों में कही नामी भी नज़र आई कि जिस शहर कि तारीफ वो अपने हर कार्यक्रम में बड़ी शिद्दत के साथ करते है , उस शहर को हर जगह बड़े गर्व के साथ अपना जन्म स्थान बताते है । उस शहर ने उनके साथ इतनी बेरूखी दिखाई । पर मैं अपनी इस पोस्ट के माध्यम से डॉ अशोक वाजपेयी जी को ये बताना चाहता हूँ कि बेरूखी सागर वासियो ने नही बल्कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने की , वरना शहर के लोग अब भी आप को अपने शहर का गौरव मानते है । आज भी सागर वासी बड़े फक्र से बताते है , की डॉ अशोक वाजपेयी जी सागर शहर की देन है ।
बड़े शर्म की बात है की प्रशासन की गलतियाँ लोगो को भुगतनी पड़ती है , आज भी मुझ जैसे सैकडो लोगो को इस बात का रंज है , की हम डॉ वाजपेयी जी का काव्यपाठ नही सुन पाए ।
खैर दर्द सहने के लिए है ,मुल्क का आम इंसान
खुशियाँ तो खास लोगो की होती है , शान !
जब दर्द की बात चली है तो , आज आपसे कुछ दर्द और बाँटना चाहता हूँ। घबराइये मत जनाब मैं अपनी निजी समस्याए लेकर नही बैठ रहा हूँ । अमा मियां दुनिया में वैसे क्या कम पिरोब्लम है , जो मैं आपको अपनी पिरोब्लम में उलझाऊ । खामखा मेरी टाइम पास करने की आदत तो है , नही ! पिछली दो पोस्टो से मेरे कुछ पाठक मित्रो ने आदेश किया की जनाब थोडी बड़ी पोस्ट लिखा करो और कुछ फोटो शोतो भी लगाया करो !
अब मैं आपको बताऊ की पहली बात समय आभाव की है । और दूसरी ये की मैं ठहरा नया नया बिलागर !! मुझे अभी भी खुदा कसम अपनी पोस्ट में फोटू लगाना नही आया , एक बार उड़नतश्तरी वाले समीर जी से पूछा था , मगर उनकी बताई बातें मेरे भेजे के ऊपर से निकल गई , इसमे समीर का कोई दोषः नही , मैं ही अल्पबुद्धि जो ठहरा । समीर जी तो बड़े परोपकारी है , मेरी बुद्धि में जरा तकनिकी बातें देर से आती है , इसलिए चाहकर भी मैं अपनी पोस्ट में फोटू नही दे पा रहा हूँ । अगर आप में कोई सज्जन जरा सरल भाषा में मेरी मदद करे तो उसका मैं आभारी रहूँगा । लो मियाँ मुआफ करना मैं नादाँ अपनी ही लेके बैठ गया ।
अभी आज के अखबार में एक अच्छी ख़बर पढने को मिली की , अपने पड़ोसी देश भूटान में स्थानीय चुनावो में उम्मेद्वारो की न केवल लिखित परीक्षा होगी , और उनका मौखिक साक्षात्कार भी होगा जिसमे में उनसे प्रशासनिक, राजनेतिक और सामाजिक सवाल पूछे जायेंगे !
इश्वर से प्राथना कीजिये की हमारे नेताओ को सद्बुद्धि दे ताकि वे भी कोई इसी तरह का कानून बनाये ! अरे भाई जब पाकिस्तान में भी जब चुनाव लड़ने की योग्यता स्नातक है , तो हम यार इतने गये गुजरे नही है ?! खैर अपनी तो हमें मालूम है , नेताओ की खुदा जाने ? क्यो आप ही कुछ बोले ?

orchha gatha

बेतवा की जुबानी : ओरछा की कहानी (भाग-1)

एक रात को मैं मध्य प्रदेश की गंगा कही जाने वाली पावन नदी बेतवा के तट पर ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा हुआ. बेतवा की लहरों के एक तरफ महान ब...