शनिवार, 30 अप्रैल 2011

दार्जलिंग के चोर........












































दार्जलिंग
की खूबसूरत वादियों में
प्रकृति की गोद, बादलों की आबादियों में
शुभ्र धवल कंचनजंघा की चोटी
हिमालय के भाल का मोती
देवदार के लम्बे ऊँचे पहरेदार
पुकारते, आओ बारम्बार
खेलो बादलों के खिलोनो से
प्रकृति के अद्भुत नमूनों से
है मौन निमंत्रण , न कोई शोर
दिल चुरा ले गया, दार्जलिंग का




हिमालय की खूबसूरत चोटियों में से एक कंचनजंघा जो दार्जलिंग से बड़ी ही ख़ूबसूरती से दिखाई देती है। सचमुच अद्भुत अनुभव .....बादलो के बीच गुजरना ..............ऊँचे पहाड़ो की सुन्दर सर्पीली राहों से चाय के बागानों को निहारना .........
जरा सोचिये आप अपने होटल के कमरे में खिड़की खोले बैठे हो और ....
तभी कोई बादल चोरो की तरह आपके कमरे में आये और तब....
आपकी ख़ुशी की सीमा न रहेगी .... ये बादल आपका सचमुच दिल चुरा ले जायेगा ......
सुबह सुबह जब आप टाईगर हिल से जब सूर्योदय होते देखेंगे तो सब भूल जायेंगे .............बादलो के ऊपर टाईगर हिल से आप जब सूर्योदय के समय जब दूर हिमाच्छादित कंचनजंघा पर नजर डालेंगे तो ....मनो स्वर्ग का अनुभव होगा ..... तब ऐसा लगेगा की इस नज़ारे को हमेशा के लिए आँखों में कैद कर लें .

सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

क्रिकेट किरकिट और एम् एम् एस

नमस्कार दोस्तों ,
इस बार पुरे देश में किरकिट और क्रिकेट की बयार चल रही है । क्रिकेट तो आप सभी को समझ में आया होगा लेकिन आप जरुर ये सोच रहे होंगे की ये किरकिट क्या है ?! अब भाई , बात ये है कि पिछला साल पूरी तरह घोटालो को समर्पित रहा और उसका असर इस साल पर भी पड़ रहा है। और पिछले साल के घोटालेबाज लोगो कि किरकिट ( बे-इज्ज़ती ) इस साल हो रही है ।
अब खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचे वाली कहावत हो रही है। कैसे ।! अब योग वाले बाबा रामदेव ने काला धन का मुद्दा सरे देश के सामने जोर शोर से उठाया , उसमे लिप्त लोगो कि आफत हो गयी । हमारे एम्० एम० एस० साहब यानि मन मोहन सिंह जी भी परेशानी में आ गये है । हमारे ईमान दार प्रधानमंत्री जी कहते है कि , उनके मंत्रियो के घोटालो में उनका कोई योगदान नही है !!!!!!! मतलब जहाज का कप्तान कहे कि जहाज पर कोई कर्मचारी गलती करे तो कप्तान कि कोई जवाबदारी नहीं !!!!
भाई , देश में हो रही इस किरकिट का मजा लेने का नही बल्कि सजा देने का समय आ गया है ......
आपका की कहना है जनाब ?जागो भारत जागो

सोमवार, 31 जनवरी 2011

हो सकती है .. देश में फिर से एक क्रांति ?!!!

दोस्तों ,
बापू की पुण्यतिथि पर देश में बहुत समय के बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ देश लाम बंद हुआ है । दिल्ली में किरण बेदी , अरविन्द केजरीवाल , स्वामी अग्निवेश और भ्रटाचार से पीड़ित असंख्य लोग... ...... जयपुर में अरुणा राय ...बिलासपुर में बाबा रामदेव .........और देश में कई जगह न जाने कितने लोग .................... एक आशा और आक्रोश के साथ .......
टेलीविजन पर जब इन आक्रोशित लोगो को देखा तो यह आन्दोलन कुछ अलग सा था ........?
इसमें स्वार्थी नेता नहीं थे !
इसमें राजनीति नहीं थी !!
इसमें कई अच्छे लोग शामिल थे !
इसमें आम आदमी अपने आम मुद्दे पर एकजुट हुए थे !
अब इन सब को देख कर जेहन में इतिहास में पढ़ी हुई कई क्रांतियाँ याद आ गयी ......... १७७६ में अमेरिका में लोगो ने अंग्रेजो के खिलाफ इसी तरह आवाज उठाई .... और दुनिया के पहले लिखित संविधान के साथ एक लोकतंत्र का जन्म हुआ ............. १७८९ में फ़्रांस में पेरिस में इसी तरह लोगो की भीड़ ने एक क्रांति को जन्म दिया ...... दुनिया को स्वतंत्रता , बंधुता, और समानता का नारा मिला । ....... भारत में लोग इसी तरह ..........गाँधी जी के पीछे अहिंसा के दम पर दुनिया की तब सबसे बड़ी ताकत से लड़ने चल पड़े ........ ........ .......
आज फिर से लोग परेशां है ........... महंगाई .......भ्रष्टाचार .........घोटाले ......आतंकवाद.........नक्सलवाद.... और न जाने क्या क्या ............
लोग क्रांतियाँ तब नही करते जब उन पर अत्याचार हो , जब उन्हें उनके अधिकार न मिले .... जब उनकी कही सुनवाई न हो ...!!!!
लोग क्रांतियाँ तब करते है जब इन सब का ज्ञान हो , अपने अधिकारों की जानकारी हो ..............
अब वक़्त आ गया है ........
बहुत हो गया ......
हम भारत के लोग ......
हमारा संविधान हमारे लिए है ....उनके लिए नही जो हमारा पैसा स्विस बेंको में जमा करते है।
हमारी जनता अब जाग रही है .....

बुधवार, 12 जनवरी 2011

स्वामी विवेकानंद कुछ जाने कुछ अनजानेसे .... युवादिवस की शुभ कामनाएं . फिर हाजिर हूँ ..... एक नए जोश धमाके के साथ !!

नमस्कार मित्रो,
सभी ब्लोगर्स भाई-बहनों , माताओ, चाचाओ, चाचियों , मामियों , मामाओं आदि सभी पढने वालो को देर से ही सही नव वर्ष की शुभकामनाये । इतने दिन तक गायब रहने के लिए क्षमा चाहता हूँ। वजह सिर्फ इतनी सी है की पिछले दिनों मैं मध्य प्रदेश राज्य लोक सेवा आयोग की मुख्य परीक्षा में व्यस्त रहा ।
मित्रो आज स्वामी विवेकानंद जी की जन्म तिथि को सारे देश में युवा दिवस के रूप में मनाया जा रहा हूँ तो सोचा क्यूँ न उनके जीवन के कुछ जाने अनजाने पहलूओ की चर्चा की जाये ........
स्वामी जी को आज हम विवेकानंद के नाम से जानते है , लेकिन सन्यासी होने के बाद स्वामी जी ने अपने बचपन के नाम नरेन्द्र नाथ दत्त को त्यागकर अपना नाम स्वामी विविदिशानंद रखा था । लेकिन जब विश्व धर्म संसद में भाग लेने के पहले जब खेतड़ी महराज ने स्वाजी से कहा की - स्वामीजी आपका यह नाम थोडा कठिन है , अतः आप कोई सरल सा नाम रखे तो लोगो को आसानी होगी । स्वामीजी ने खेतड़ी महराज की बात मानकर अपना नाम विवेक आनंद अर्थात विवेकानंद कर लिया । और ११ सितम्बर १८९३ को शिकागो में साडी दुनिया ने भारत के इस सन्यासी को सनातन धर्म की श्रेष्ठता पर दहाड़ते सुना ।
स्वामी जी चाहते थे कि युवा पहले स्वयं का विकास करे , तभी तो वो देश का विकास कर सकेंगे । स्वामीजी भारत को अनंत संभावनाओं वाला एक सर्वश्रेष्ठ देश मानते थे । उनका मानना था कि भारतीय युवा ही देश को स्वतंत्र कर सकते है । परन्तु स्वामीजी आत्मविकास पर भी बल देते थे।
एक बार स्वामी जी बनारस में बाबा विश्वनाथ के दर्शन से लौट रहे थे , उनके हाथो में प्रसाद कि थैली थी जिसे देख कुछ बन्दर उनकी और लपके .... स्वाजी ने दौड़ लगा दी ..बन्दर भी उनके पीछे भागे ...तभी एक दुकान वाले ने आवाज़ लगी "भागो मत सामना करो " स्वाजी जी रुके ..रुक कर पीछे देखा तो बन्दर उलटे पांव भाग गये । स्वाजी जी ने इस बात को गाँठ बाँध लिया । और अपने जीवन में कभी परेशानियों से भागे नहीं बल्कि उनका रुक कर सामना किया और विजय हासिल की ।
स्वामी जी के जीवन के बहुत सारे किस्से है जिन्हें हम अपने जीवन में उतार सकते है ........
एक बार स्वामी जी कलकत्ता में ठहरे हुए थे , वे रोज सुवह नित्य कि भांति प्रातः भ्रमण पर जाते थे , उसी रस्ते से गवर्नर जनरल भी मोर्निंग वाक को जाता था । गवर्नर जनरल ने स्वामी जी के बारे सुना था , इसलिए वो स्वामी जी कि परीक्षा लेना चाहता था। एक दिन उसने रस्ते कि एक दीवार पर लिखा ' वेयर इज गोड' स्वामी जी ने वेयर कि स्पेलिंग में से डव्लू हटा दिया । अब दीवार पर लिखा था ' हीयर इज गोड "

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

न दिल में हो दूरी

कविता: न दिल में हो कौनो दूरी

लईकी- ऐसन कौन बात बा तहार भजपुरी में
कि काल्ह दुनिया बोली, एकरा के मजबूरी में
लईका -यु० पी० , बिहार के संस्कृति ह ,बड़ा नीक भाषा
दुनिया भर फैलल बा, न ह कौनो तमाशा
राज काज से लेके मनोरंजन तक बा एकरे ही चर्चा
आम आदमी के बानी ह , प्रेम मिलेला बिन खर्चा
गंगा -गंडक ,सोन-घाघरा, सब मिल के डेली आशीष
प्रेम के बोली ह, नईखे एकरा में कौनो खीस
राम, बुद्ध, महावीर के भूमि, देला शांति के सन्देश
हो कतनो बोली, भाषा, भेष , सबके ह ई भारत देश
एगो भज्पुरिया पहले हिन्दुस्तानी ह, फिर यु०पी० बिहारी
मानवता ही धरम हमनी के, करम भी ह हितकारी
बतावा, कैसे न फैले दुनिया में भजपुरी
सबमे हो प्रेम भरल , न हो दिल में कौनो दूरी

बुधवार, 27 जनवरी 2010

जब इंदिरा जी को अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा- कुतिया और डायन.....!!!!

शीर्षक पढ़कर आप चौंक गये न ?!
मैं भी पटना से प्रकाशित हिंदुस्तान समाचार पत्र को २५ जनवरी को " नेहरु को अशिष्ट मानता था चीन " शीर्षक से छपी खबर को पढ़कर चौंका था ।
आपके के लिए हिंदुस्तान की खबर ज्यो के त्यों बिना किसी फेरबदल के प्रस्तुत कर रहा हूँ ।
" नेहरु को अशिष्ट मानता था चीन "
'निक्सन , इंदिरा एंड इंडिया पोलिटिक्स एंड बियोंड ' पुस्तक से हुआ खुलासा

भाषा

नई दिल्ली

प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु ने हालाँकि 'हिंदी चीनी भाई-भाई ' का प्रसिद्ध नारा दिया था , लेकिन चीन ने उन्हें अशिष्ट और भारत को विदेशी मदद के मामले में अँधा कुआं माना था ।

चीन का यह भी नजरिया था कियह काफी दुखद है कि दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने भी अपने पिता से उनकी पुस्तक भारत एक खोज में अभिव्यक्ति फलसफे कि विरासत को अपनाया । इस बारे में चीन का मानना था कि भारत एक खोज नेहरु के इस विचार को जाहिर करती है कि महँ भारत का साम्राज्य मलेसिया , सीलोन (श्रीलंका )
तथा अन्य क्षेत्रो तक फैला हुआ था। ये टिपण्णी चीन के पूर्व प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई ने पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के समय कीथी । निक्सन ही थे , जिन्होंने इंदिरा को कुतिया और डायन कहा था , जबकि उनके राष्ट्रिय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंगर ने भारतीयों को हरामी कहा था।
ये टिप्पणिया अब पुस्तक 'निक्सन , इंदिरा एंड इंडिया : पोलिटिक्स एंड बियोंड ' का हिस्सा है । इसके लेखक वरिष्ठ पत्रकार कल्याणी शंकर है। इस पुस्तक में निक्सन के दौरे के और बाद में गोपनीयता की श्रेणी से हटाये गये दस्तावेजो का संकलन है । इन दस्तावेजो में अमेरिका, चीन और पाकिस्तान का भारतीय राजनितिक प्रणाली तथा जम्मू कश्मीर जैसे विवादस्पद मुद्दे सहित भारत के भविष्य के बारे में अपनाया गया नजरिया शामिल था । निक्सन ने २३ फ़रवरी १९७२ को चीन की अपनी एतिहासिक यात्रा के दौरान भारत पर रूस में हथियार खरीदने के लिए अमेरिकी मदद को परिवर्तित करने का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि वह पाकिस्तान को पर्याप्त आर्थिक मदद भेजेंगे , जिसका इस्तेमाल वह अन्य स्रोतों से हथियार खरीदने के लिए कर सकेगा । निक्सन ने कहा था ,' समस्या एक ऐसा रास्ता तलासने की है, जिसके जरिये पश्चिमी पाकिस्तान कुछ सैन्य उपकरण और मदद हासिल कर सके । हमारी ओर से , हम यह करेंगे किहम पश्चिमी पकिस्तान को पर्याप्त मात्र में आर्थिक मदद देंगे ।
इससे पश्चिमी पाकिस्तान, हमरे विचार से उसकी रक्षा के हित में , अन्य स्रोतों से हथियार खरीद सकेगा । ' उन्होंने कहा था कि असल तथ्य यह है कि यह भारत में हमारी नीति कि त्रासदी है। हमने बीते २० साल में भारत को मदद के तौरपर करीब १० अरब डॉलर दिए ।


उपरोक्त खबर से अमेरिका और चीन कि मानसिकता का पता चलती है । साथ ये भी पता चलता है कि इन दोनों देशो के प्रमुख अन्य देशो के प्रमुखों के लिए कैसी अभद्र भाषा का प्रयोग करते थे । इस पुस्तक के लिए जहाँ बधाई के पात्र है वही हमारे वर्तमान नेताओ को भी क्षुद्र मानसिकता का त्याग करके आगे के लिए सही वैदेशिक नीतियां बनानी होंगी। उपरोक्त खबर से हर भारतीय की तरह मेरा मन भी आहत हुआ है । इसके बाद भी अमेरिका हमारे नेताओ का अपमान कर चुकाहै (जार्ज फर्नाडिज , ए० पी० जे० अब्दुल कलाम आदि ) और हम अमेरिका और अमेरिकी नीतियों के पिछलग्गू बने है !! ....,,,जरा सोचिये ?!


अब बारी पुछल्ले की ...
अपने झल्लू जी से एक बार एक अमेरिकी मिला और बोला - हमारा कंट्री में हमको इतना फ्रीडम है , की हम व्हाईट हॉउस के सामने खड़ा होके अपने प्रेसिडेंट को गली दे सकता है ।
झल्लू जी - इसमें कौन सी बड़ी बात है, हम भी तो अपने राष्ट्रपति भवन के सामने खड़े होकर तुम्हारे प्रेसिडेंट को गाली दे सकते है । और तो और सेल तुम्हारे प्रेसिडेंट को तो सारी दुनिया गाली देती है !!!!
:-)

आपकी प्रतिक्रिया के इंतज़ार में आपका
मुकेश पाण्डेय "चन्दन"

बुधवार, 20 जनवरी 2010

अब गूगल खोजेगा लापता लोगो को .......

जी हाँ , गूगल अब तक जो इंटरनेट पर सामग्री खोजकर हम सब की मदद करता था । वो अब हैती में आये भूकंप के कारन लापता हुए लोगो को खोजने में मदद करेगा। गूगल ने एक सोफ्टवेयर हैती सरकार की सहायता के लिए तैयार किया है । जिसमे हैती में कोई भी व्यक्ति गूगल पर जाकर अपने लापता सम्बन्धी की जानकारी जैसे उसकी उम्र, लिंग, कद, और फोटो के आधार पे खोजने में मदद करेगा। ये सुविधा हैती वासियों को निसुक्ल प्रदान की जाएगी । खैर गूगल का ये कदम न केवल स्वागत योग्य है वल्कि प्रसंसनीय भी है । हमारी तकनीक अगर मुसीबत में इंसानियत के काम आती है तो ही उसकी सार्थकता है। गूगल को शुक्रिया ।

पुछल्ला ;-)
हमारे झल्लू जी के सुपुत्र से जब स्कूल में टीचर ने उसके पिता का नाम पूछा तो झाल्लुपुत्र ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया -जी गूगल !!!
टीचर - क्या मतलब है तुम्हारा ?
झाल्लुपुत्र- जी , क्या है , किमेरे पिताजी जब देखो कुछ न कुछ खोजते रहते है , कभी तौलिया, कभी मोज़े तो कभी मुझे !!
इसलिए मेरी मम्मी ने उनका नाम ही गूगल रख दिया है, मेरे पुरे मोहेल्ले के लोग भी उन्हें ग्गोगल ही पुकारते है ।:-)

शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

झल्लू जी पहुचे हरिद्वार !! फसे नयी परेशानी में .........

नमस्कार दोस्तों, अपने जवाहर सिंह झल्लू जी इस बार मकर संक्रांति के शुभ अवसर पर हरिद्वार में लगे महाकुम्भ पहुच गये। अब जब झल्लू जी जहाँ हो वहां कोई अनोखी बात न हो ऐसा हो ही नही सकता है ! पहली बात अपने झल्लू जी ही अनोखे है ! अब झल्लू जी हरिद्वार में जैसे ही गंगा के किनारे कपडे उतार कर नहाने के लिए घुसे तो पानी ठंडा था। किसी तरह हिम्मत बांध कर झल्लू जी आख़िरकार जल में घुस ही गये । अब जब घुस गये तो डुबकी भी लगा ली। जब झल्लू जी डुबकी लगा के बहार आये तो , गजब हो गया ! भई , कोई महँ पापी जो अपने पाप धोने हरिद्वार कुम्भ में आया होगा , मगर अपनी आदत छोड़ नही पाया और झल्लू जी के कपडे मार ले गया ।
अब झल्लू जी लंगोट पर सर्दी में ठिठुरते खड़े ! समझ में नही आ रहा की क्या करे ? जब ठण्ड ज्यादा लगने लगी तो पोलिस थाने की और जोर से दौड़ लगा दी । मगर झल्लू जी की परेशानी यहीं ख़त्म नही हुई , उनके के पीछे एक आदमी भी दौड़ लगाने लगा ! झल्लू जी अब और परेशां की एक तो नंगे बदन ठण्ड में कुल्फी हो रहे थे , ऊपर से ये मुया पीछे पड़ गया । अब झल्लू जी आगे बड़ी तेजी से अपनी पूरी दम लगा के भागे ................ वह आदमी भी उतनी ही तेजी भगा । झल्लू जी की जान अटकी की अब क्या करे ?!
जब झल्लू जी पुलिस थाने के नजदीक पहुचे तो सोचा अब रुक के देख लिया जाये , आखिर ये इंसान क्यों मेरे पेछ्हे भाग रहा है । झल्लू जी रुके , सांस ली । इतने में वो आदमी भी पहुच गया , बोला - महराज जी आप की भेष भूओषा देख कर लग रहा है, की आप बहुत पहुचे हुए संत है । आप ही मेरा कल्याण कर सकते है । झल्लू जी की जान में जान आई और बोले- पैर छोडो , मैं कोई संत वन्त नही हूँ । मैं तो पुलिस थाने जा रहा हूँ , मेरा कोई वस्त्र हरण कर ले गया । भई मुझे माफ़ करो ।

बुधवार, 13 जनवरी 2010

झल्लू जी की नई परेशानी !

प्रिय मित्रो , अब तक आप जवाहर सिंह "झल्लू " से तो परिचित हो चुके होंगे । जैसा की आप जानते है की झल्लू जी हर बार अपनी अकल मंदी से कोई परेशानी मोल लेते है और हंसी के पात्र बन जाते है । अब सर्दी कड़ाके की पड़ रही है, मगर जल्लू जी का दिमाग भी सर्दी की तरह कड़ाके का दौड़ रहा है ! अब झल्लू जी कुछ सवालो को लेकर परेशां है , उनके सवालो के जवाब मेरे पास तो नही है शायद आप के पास हो ...........?
सवाल -भारत में अभी तक चुटकुले सरे रिश्तो जैसे - माँ-बाप , भाई-बहन , सास-बहु, चाचा-भतीजा, भाई-भाई, जीजा-साली, भाभी-देवर आदि पर बने मगर अभी तक कोई ससुर के ऊपर चुटकुला नही बना ! आखिर क्यों ?
२ आखिर सबसे ज्यादा चुटकुले सरदारों पर ही क्यों बनाये जाते है ?
३ चुटकुला शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई ?

आप सभी को संक्रांति, पोंगल, खिचड़ी, लोहड़ी की हार्दिक शुभकामनाये...... जय हो

मंगलवार, 5 जनवरी 2010

औरत और आंसू !!

औरत और आंसू , है कितनी समानता
दोनों सुख-दुःख के साथी, लेके महानता
सुख दुःख का पर्याय , नयन-नीर और नारी
छलक पड़ते दोनों, सुख हो या दुःख भरी
आजीवन ही नारी की आँखों में होता पानी
हर मुस्कान और तीस से जुडी दोनों की कहानी
बिन आंसू के आँखे , कहलाती संवेदनहीन
बिन नारी के कहाँ समाज भी कहलाता कुलीन
औरत के लिए कब किसने आंसू बहाए ?
औरत के आंसू पर समाज ने खूब गीत गाये
दूजो के लिए ही तो औरत व् आंसू काम आये
अपने लिए भी बह सके , कभी तो ऐसी शाम आये ...
पुछल्ला ;- )
जवाहर सिंह "झल्लू " जब घर पहुचे तो देखा उनका बेटा रो रहा था , जब झल्लू जी ने उससे रोने का कारन पूछा तो उसने रोते-रोते बताया - पापा आज मुझे फिर से मम्मी ने मारा है। अब बहुत हो गया मेरा बा आपकी बीबी के के साथ गुजारा नही हो सकता है। मैं जा रहा हूँ ।
नव वर्ष की पुनः शुभकामनाओ के साथ आपका ही
मुकेश पाण्डेय "चन्दन"


गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

शुभ नव varsh

प्रतिपल उत्कर्ष मिले .....
नव वर्ष और नव्दशक की हार्दिक शुभकामनाये !
आपको जीवन में प्रतिपल उत्कर्ष मिले
सफलताए प्रतिपल और प्रतिवर्ष मिले
आगामी वर्ष आपके लिए खुशिया ही लाये
और यह वर्ष खुशियों की याद बन कर जाये
रंग बिरंगे सुमन खिले आपके ह्रदय आँगन
चन्दन सी खुसबू का हो परिणय मनभावन
गम का कही नाम न हो , नित्य प्रति हर्ष मिले
आपको जीवन में प्रतिपल उत्कर्ष मिले
सूर्य सा हो गौरव आपका , कीर्ति चन्दन सी
स्थान शिखार्तम हो , इच्छा हो वंदन की
हर कदम पे सफलताए मिले , हर राह में रज फूलों की
यही कामना हमारी, विसरित करना बातें कुछ भूलो की
ख़ुशी शांति का पैगाम , यह सन्देश नववर्ष मिले
आपको जीवन में प्रतिपल उत्कर्ष मिले
आपका ही शुभेच्छु मुकेश पाण्डेय "चन्दन"

रविवार, 20 दिसंबर 2009

कोपेनहेगन ; बड़े-बड़ो के चोंचालें....

नमस्कार, दोस्तों
आजकल डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन पर १९२ देशो का विचार मंथन चल रहा है । हमारे प्रधानमंत्री महोदय भी वहां तशरीफ़ ले गये है । जहाँ अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के कारन उन्हें ट्राफिक जाम में फसना पड़ा । जैसा की हम सभी जानते है की , दुनिया में अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश कार्बन डाय ओक्साईड गैस का सबसे ज्यादा उत्सर्जन करते है, जिसके कारन जलवायु परिवर्तन जैसी समस्या सामने आ रही है । मगर ये देश सोचते है की इस समस्या से निपटने का सारा जिम्मा विकासशील देश ही उठाये जो की गलत ही नही बल्कि उनका गैरजिम्मेदारना रवैया दिखलाता है । खैर जैसा की पहले से ही तय लग रहा था की इस सम्मलेन से कोई हल नही निकलने वाला है । वही हो भी रहा है ।
खैर हम सरे देश वासी भी कोई बहुत जागरूक नही है। आज भी हमारे देश में पर्यावरण को लेकर कोई खास जागरूकता नही है। इसकी आगे बहुत ज्यादा जरुरत है। अगर हम जल्द ही चेते नही तो हो सकता है की हमारे देश के नक़्शे से लक्ष्यदीप और अंडमान के कई द्वीप गायब हो जाये ! हमारी जल की बर्बादी का ही नमूना ले लीजिये ॥ बिहार में हर साल बाढ़ आती है तो देश के कई हिस्से पानी को तरसते है। आज ही गाँव में खाना पकाने के कल लिए लकड़ी को जलाया जा रहा है, जबकि देश में जंगल तेजी से ख़त्म हो रहे है । सडको के प्रदुषण का तो हाल आप जानते ही है । खैर खतरे की घंटी बज रही है हम नही जागे तो फिर हो सकता है ,की हमें फिर जागने की नौबत ही न आये (तब तक बहुत देर हो चुकी होगी )
अब बरी है पुछल्ले की ......
अपने जवाहर सिंह झल्लू जो की बहुत प्रतिभाशाली है , उनसे पत्रकारों ने दुनिया में तेजी से बढ़ रही कार्बन डाय ओक्साइड की मात्र कम करने का सुझाव पूछा तो झल्लू जी ने कहा -" सरे पेड़ो को कटवा दो साले सभी पूरी रात कार्बन डे ओक्साइड का उत्सर्जन करते है ।
न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी

शनिवार, 19 दिसंबर 2009

किन्नरों की एतिहासिक गाथा !!

नमस्कार , मित्रो
जबसे मेरे शहर की महापौर किन्नर कमला बुआ बनी है , मैंने सोचा क्यों न इतिहास का छात्र होने के नाते आप सभी को इतिहास में किन्नरों की कुछ गाथाये सुना दू । सबसे पहले किन्न्नारो के बारे में जानकारी रामायण काल में प्राप्त होती है । जब भगवन श्री राम बनवास के लिए जा रहे थे तो उन्हें छोड़ने आये अयोध्या वासियो से उन्होंने कहा- सभी नर- नारी अब वापिस चले जाये ! तो सभी नर- नारी तो चले गये मगर किन्नर खड़े रह गये ! भगवन राम के कारन पूओछ्ने पर किन्नरों ने कहा , प्रभु आपने नर-नारियो को जाने को खा था , मगर हम तो न नर है न नारी , इसलिए हम गये नहीं। तब भगवन ने उन्हें आशीष दिया - " जाओ तुम लोग कलयुग में राज करोगे " (शायद इसीलिए शुरुआत मध्य प्रदेश से हुई है ?!)
महाभारत काल में पांडव अज्ञात वास में जब विरत नरेश के यहाँ गुप्त रूप में रह रहे थे तो अर्जुन ब्रहंल्ला नमक किन्नर बने थे , जो स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी का श्राप था ! आगे महाभारत के युद्ध में भीष्म पितामह की मृत्यु का कारन बना शिखंडी भी किन्नर था ।
मध्यकालीन इतिहास में सल्तनत युग में प्रसिद्द सुलतान अलाउदीन खिलजी के दक्षिण अभियान का सफल नेतृत्व मालिक काफूर नामक हिजड़े ने किया था । उत्तर प्रदेश के शहर को जौनपुर को एक हिजड़े शासक ने इतना सुन्दर बनाया की इसे पूर्व का शीराज खा जाने लगा था । उत्तरवर्ती मुग़ल शासक जहांदार शाह भी एक किन्नर के प्रेम जाल में गिरफ्त था !
आगे भी कुछ इल्चास्प कहानिया है किन्नरों की बहादुरी की मगर फिर कभी ........
अब बारी पुछल्ले की
अपने जवाहर सिंह "झल्लू " एक बार चुपके से स्वर्ग में घुस रहे थे , की तभी स्वर्ग के पहरेदारों ने उन्हें देख लिया। झल्लू जी को पकड़ कर बहुत मारा ।
झल्लू जी झल्ल्ला गये और बोले सालों तुम्हारी इन्ही हरकतों के कारन कोई स्वर्ग नही आना चाहता !!! :-)

मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

न जीता कमल, न जीता पंजा! वाह रे मतदाता जीत गया छक्का !!!!

जी हाँ दोस्तों , शीर्षक सही है और मेरी मानसिक स्थिति भी अभी ठीक है। मध्य प्रदेश के सागर शहर के मतदाताओ ने महापौर (meyar) के पद के लिए एक किन्नर "कमला बुआ " को रिकॉर्ड मतों से जीताया है .जी हाँ मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार और केंद्र में कांग्रेस की सर्कार होने के बाद भी लोगो ने एक निर्दलीय किन्नर को भरी मतों से जिताया है । ये हाल है की , भाजपा की कमजोर स्थिति देख कर खुद मुख्यमंत्री शिवराज चौहान को आना पड़ा मगर उनकी अपील भी मतदाताओ को लुभा नही पाई । मुख्यमंत्री ने कहा था की अगर यहाँ से यदि भाजपा प्रत्याशी जीतती है , तो वे सागर को विशेष पैकेज देंगे । मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुरेश पचौरी सागर को केंद्र सरकार से भारी अनुदान और सहायता राशि दिलाने का वादा भी कांग्रेस को तीसरे नंबर पर जाने से नही रोक पाया । गनीमत है की कांग्रेस की जमानत बच गयी। मतदान के दिन सभी मतदाता खुलकर कह रहे थे की मेरी वोट चाभी (कमला बुआ का चुनावचिंह) को गया है ।
अब प्रश्न ये उठता है की ,
आखिर मतदाता ने क्यों एक किन्नर को चुना ?
क्या कमला बुआ इतनी लोक प्रिय थी ?
क्या भाजपा और कांग्रेस के प्रत्याशी कमजोर थे ?
या फिर जनता कुछ नया चाहती थी ?
क्या लोग भाजपा के नगर निगम में लगाक्तार दस सालो के कार्यकाल से नाखुश थी ?
सबसे पहले मेरे ख्याल से जनता ने कमला बुआ किन्नर को इसलिए चुना की, वो इसके माध्यम से इन दोनों पार्टियों को ये सन्देश देना चाहती है की वो अपनी नपुंसकता को त्यागे ! अपनी जेबे तो भरे मगर विकास का भी ध्यान रखे ! ऐसा नही है की इतिहास में सिर्फ सागर से ही कोई किन्नर जीता हो , इससे पहले मध्य प्रदेश में ही कटनी से महापौर कमला मौसी और सुहागपुर से शबनम मौसी (शबनम मौसी के ऊपर इसी नाम से फिल्म भी बन चुकी है , जिसमे शमनं मौसी की भूमिका सागर के ही आशुतोष राणा ने निभाई थी )विधायक बन चुकी है । मगर इन दोनों की कोई उल्लेखनीय भूमिका नही रही .कमला मौसी कत्निमे कुछ खास नही कर पाई , शबनम मौसी ने कांग्रेस के विधायक को विधान सभा में चप्पल मारी !
मगर सागर में कमला बुआ की स्थिति जरा दूसरी है। कमला बुआ पहले से ही समाजसेविका रही है । इन्होने स्वयं अपने खर्चे से कई गरीब लड़कियों की शादी धूमधाम से कराइ है । विकलांगो की न केवल सहायता की है बल्कि उनके अधिकारों के लिए राष्ट्रिय विकलांग पार्टी का गठन किया। दैनिक भास्कर द्वारा किये गये एक टॉक शो में कमला बुआ ने जनता के गंभीर सवालो ने सटीक जवाब दिए जबकि दोनों पार्टी के उम्मीदवार हिचकिचा गये थे।
खैर आज के दिन सागर में लोग जश्न और ख़ुशी मना रहे है । दोहरी ख़ुशी ! भारत अपना पहला मैच श्री लंका से संघर्ष पूर्ण मुकाबले में जीता , और महपौर के चुनाव में कमला बुआ जीती। दोनों मुकाबले में रिकॉर्ड बने (एक में रनों का , दुसरे में मतों का ) दोनों में छक्को की भूमिका महत्वपूर्ण रही !
खैर इश्वर से दुआ है की किन्नर राजनीति में आये , मगर हमारे नेतायो विकास कर के दिखा दे की इश्वर ने भले उन्हें परपक्वता नही दी है , मगर असल में नपुंसक कौन है !
अब बारी है अपने पुछल्ले की
कमला बुआ के कुछ नारे :-
- कमल नही कमला चाहिय, पंजा नही छक्का चाहिय !
- नकली नही असली चाहिय !
- न भैया से न भाभी से , अब निगम खुलेगा चाभी से !
- जब गूंजेगी कमला की ताल , कंपेगी दिल्ली , हिलेगा भोपाल !
शुक्रिया अपनी टिपण्णी से हमारा उत्साह वर्धन करते रहिये
आपका मुकेश पाण्डेय "चन्दन"

शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

उफ़ ! ये नई मुसीबत आ गई .....?

नमस्कार जी,
सबसे पहले सॉरी जी , इतने दिनों जो ब्लॉग जगत से जो गायब रहा । खैर कुछ परेशानिया तो आती ही रहती है। लेकिन आज मैं जो मुसीबत की बात करने वाला हूँ, वो आम नही कुछ खास है। अब अपने सीधे सादे परधन मंत्री जी की मुसीबत बढ़ गयी है, जनाब जिस अमेरिका से परमाणु समझौता करने के लिए उन्होंने अपनी सरकार तक दांव पर लगा दी। उसी अम्रीका के राष्ट्रपति ओबमाओ (ओबामा+माओ)जो शायद दिखने के लिए हनुमान जी की प्रतिमा अपने साथ रखते है, गाँधी जी की फोटू अपने ऑफिस में लगाते है, व्हाईट हाउस में दिवाली मनाते है. और चीन जाकर इंडो-पाक विवाद में चीन का हस्तक्षेप जरुरी मानते है !
खैर, हिंदुस्तान अपने मसले ख़ुद सुलझाने की समझ रखता है , बशर्ते पाक इसके लिए तैयार हो ?!
अब दुनिया दारी छोडो और मेरी एक कविता पढ़िए ......
नवजीवन
अस्त होते-होते सूर्य क्षितिज से बोला - कि तात
तनिक प्रतीक्षा और कर लेती, ये अंधकारमयी रात
आपके पुत्रो को दिवसभर दिया, ऊर्जा और प्रकाश
अभी मन भरा ही न था कि आपने दे दिया अवकाश
क्षितिज मेघ झरोखा हटाते बोला - कि वत्स
है प्रकृति का नियम यही, है हम-तुम विवश
कल तुम आना , नव ऊर्जा और शक्ति से सम्पूर्ण होके
देना इन्हे नवजीवन , कि विस्मित होके जग देखे
सब लगते निज निज कर्मो से आते ही तुम्हारे
दिवस परिश्रम से थक्के , करते आराम जाते ही तुम्हारे
नियम टूटे या न टूटे, पर मत इनको थकने देना
है आराम भी जरुरी, अब आने दो मधुरिम रैना
नवजीवन लेकर आऊंगा, अब मैं नित्य
क्षितिज से कहते-कहते, अस्त हुआ आदित्य
ये तो हुई कविता जाहिर आपको अच्छी लगी हो , और आप अपनी टिप्पणी भी देंगे ! अब बात करते है , अपने जवाहर सिंह "झल्लू" मतलब पुछल्ले की
एक बार जल्लू जी एक अमेरिकी से मिले । तो अमेरिकी ने कहा कि - मेरे यंहा इतनी स्वतंत्रता है कि आप व्हेइत हाउस के सामने खड़े होकर हमारे प्रेसिडेंट को गाली दे सकते है।
तो जल्लू जी बोले इसमे कौन सी बड़ी बात है , आप हमारे राष्ट्रपति भवन के सामने खड़े होकर भी अपने प्रेसिडेंट को गालियाँ दे सकते है !

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2009

लता जी ; अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो ?!

नमस्कार,
पिछले दिनों आपने भी ये ख़बर पढ़ी सुनी होगी की लता मंगेशकर जी ने कहा - अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो ! उनकी ये बात हमारे कई जख्म कुदेर गयी , जब लता मंगेशकर जी जिन पर सरे भारत को ही नही वल्कि समूचे विश्व को गर्व है , उनके मुह से ये बात सुन्नी पड़ रही है । मतलब आप समझ सकते है, की देश में बेटियों की क्या हालत है ?
वाह रे मेरे देश तुने अपनी बेटियों को क्यो इस हाल पे छोड़ दिया की उन्हें मजबूरन कहना पड़ रहा है - अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो
आज भी हमारे देश बेटियों की हालत बद से बदतर है !
आज भी हमारे घरो में बेटियों को दोयम दर्जे का समझा जाता है !
आज भी हमारी माँ और दादी बेटियों को सलीके से रहने को कहती जबकि बेटा भले ही कैसा घूमे !
आज भी अपने हिस्से से बेटियों को ही कम दिया जाता है !
आज भी बेटियों को अपने सपनो का दम घोटना पड़ता है , क्योंकि भइया का सपना पूरा हो सके !
आज भी बेटिया पैदा होते ही पराया धन समझी जाती है !
आज भी कोई लता, कोई किरण , कोई उषा, कोई आशा, कोई कल्पना ,कोई प्रतिभा बेबस होके कहती है -अगले जनम मोहे बिटियाँ न कीजो ? !
आख़िर क्यों ?????????????????????????
गलती किसकी है ? हमारी और आपकी ही है न ?
चलो अपनी ! galti sudhare !
अब पुछल्ले की बारी .....
जैसा की आप जानते ही है की जवाहर सिंह "झल्लू" एक प्रतिभा शाली वैज्ञानिक है ।
इस बार झाल्लुजी ने नोट छपने की मशीन इजाद कर ली , लगे धडाधड नोट छपने लगे !
लेकिन एक बार गलती से १५ रूपये का नोट छप गया !
झल्लू जी ने सोचा चलो इसे किसी गाँव में चलाया जाए क्योंकि शहर में तो शायद ही कोई इसे लेगा ।
jhallu ji ek kirane ki dukaan pe gye , dukaandaar ko not diya aur kaha- ek gutkha dedo bhai .
dukaan dar ne not liya gutkha dekar bola, abhi khulle lata hoon !
jhallu ji khush !
thodi der baad dukaan dar aaya aur 7-7 ke do not dekar bola lo bhaiya aapke 14 rupye.!
jai raam ji

शनिवार, 10 अक्टूबर 2009

सब गड़बड़ है पर नो प्रोब्लम !!

भइया अब तो हद हो गयी ! नोबल वाले का सठिया गये जो मात्र ०९ माह के कार्यकाल में ओबामा उन्हें शान्ति के मसीहा नजाए आ गये ! हमें तो ठीक ख़ुद ओबामा को भी हैरानी हो गयी , की ससुरा कुछ बहुतै जल्दी नही हो गया !
हमारे राष्ट्रपिता गाँधी जी का पॉँच बार नोबल शान्ति के लिए नामांकन हुआ , पर नोबल समिति वालो को वो इस पुरूस्कार के लायक नही लगे , उनके चेलो तक को नोबल शान्ति मिला (नेल्सन मंडेला, अंग सन सू की , मार्टिन लूथर किंग आदि ) , चलो कोई बात नही पर गाँधी के नये चेले ने ऐसा क्या गुल खिला दिया की नोबल वाले उन पर मोहित हो गये । भइया कुछ गड़बड़ जरुर है !!
सुना था की अपने इहाँ कुछ फिल्मी कलाकार अवार्ड फंक्सन में फिक्सिंग करके अवार्ड ले जाते थे ! मगर दुनिया के सबसे बड़े और निष्पक्ष पाने जाने वाले नोबल में ऐसा होगा ........................
देश के दक्षिणी इलाको में बाढ़ का कहर जारी है, लाखो लोग बेघर हो गये है , हजारो अनाथ , सैकडो काल के गाल में समा गये है। केन्द्र सरकार ने १००० करोड़ रु० की सहायता की घोषणा की है, मेरा आप सभी से करबद्ध निवेदन है की इस संकट की घडी में हमारे बाढ़ पीड़ित भाई बहनों की सहायता जरुर करे , साथ ही साथ अन्य लोगो को भी सहायता करने के लिए प्रेरित करे ।
मेरा मानना है की इस बार दिवाली सादगी से मानकर हम अपने भाई बहनों की सहायता के लिए आराम से पैसे जोड़ सकते है। हाँ इस बार उन लोगो के लिए भी कुछ दिए जरुर जलाये जो इस बार दिवाली नही मन पाएंगे ।
मेरे मन में विश्वास है की आप मेरी बात जरुर मानेंगे । अरे-----रे रे , सॉरी एक बात मैं भूल ही गया की ये मेरी हाफ सेंचुरी यानि पचासवी पोस्ट है ! आज से अपनी पोस्ट में एक न्य आयटम जोड़ रहा हूँ जिसका नाम दिया है मैंने पुछल्ला , इस में अपनी बात के आख़िर में एक गुदगुदाती सी बात कहने की कोशिश करूँगा। अगर पुछल्ला पसंद आए तो सूचित जरुर करे। तो पेश है आज का पुछल्ला
एक नए नवेले वैज्ञानिक (प्रतिभाशाली ) जवाहर सिंह 'झल्लू' ने न्यूटन के गति के तीन नियमो में अपना एक नया चौथा नियम जोड़ा है।
" लूज मोशन कभी भी स्लो मोशन में नही होता है "

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

एक भारतवंशी को नबल पुरूस्कार !! खुश होए या शर्मशार !!!!

नमस्कार , मित्रो
आप सभी लोग मीडिया के किसी न किसी माध्यम से ये जान ही चुके होंगे की भारत वंशी वैज्ञानिक श्री वेंकटरमण रामकृष्णन को राइबोसोम के अध्यनन के लिए रसायन शास्त्र के नोबल पुरूस्कार के लिए चयनित किया गया है । श्री रामकृष्णन जी ने बडोदरा विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर किया है। फ़िर निकल गये विदेश !
अब उनके नोबल मिलने पर जैसा की हर भारतीय को खुशी होनी चाहिय खुशी हुई .मगर मेरे हिसाब से हमें शर्म आणि चाहिए की हम अपने देश के आजाद होने ६० सालो के बाद भी ऐसी परिस्थितिया नही पैदा कर सके की , ऐसी प्रतिभाये अपने ही देश में रहकर अपने देश का नाम ऊँचा कर सके ?१! श्री रामकृष्णन देश के चौथे भारतीय या भारतवंशी वैज्ञानिक है जिन्हें नोबल पुरुस्कार मिला। इन चारो वैज्ञानिको में सिर्फ़ डॉ सी० वी० रामन को अगर छोड़ दिया जाए तो बाकि तीन (डॉ एस चंद्रशेखर, डॉ हरगोविंद खुराना और अब वी रामकृष्णन ) वैज्ञानिक भारतीय नही भारतवंशी है । आख़िर क्यो इन्हे भारत से बाहर जाना पड़ा ? कभी हमारी सरकारों ने सोचा है ?
हम क्यों नही ऐसी सुविधाए उपलब्ध करा सके ताकि इस प्रतिभा पलायन को रोका जा सके ? क्यों देश आजाद होने के बाद हम किसी भारतीय को नबल पुरूस्कार नही दिला पाए ? क्या हमारे यहाँ प्रतिभाये नही है ? (शायद ऐसा नही है )
एक बार सी वी रमन के भतीजे डॉ एस चंद्रशेखर (दोनों नोबल विजेता ) ने तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू से अपने शोध के लिए सुविधाए जुटाने की बात की थी , मगर नेहरू जी तब ब्भारत के गरीब होने की बात कहकर अपनी असमर्थता जाहिर की थी । परिणामस्वरूप डॉ चंदार्शेखर अमेरिका गये , खगोल विज्ञानं में अपना शोध पुरा किया और नोबल भी जीता । क्या हम इस नोबल को एक भारतवंशी की जगह एक भारतीय के नाम नही कर सकते थे? अगर नेहरू जी की बात मान भी ले की उस वक्त भारत की आर्थक हालत ठीक नही थी । तो आज तो ये स्थिति नही है , भारत विश्व की उभरती ताकत बन रहा है । तब क्यो नही हम शिक्षा , शोध और प्रतिभाओ को बढावा देने वाली योजनाये बनाते है ? क्यों नही हमारे विश्वविद्यालयो में मौलिक पी एचडी होती है
खैर मौका खुशी का है , भले किसी और मुल्क ने हमें ये अवसर दिया हो । हम खुशिया तो मन ही ले , इसके सिवा हमें और आता ही क्या है ? (भारत में सबसे ज्यादा छुट्टियाँ और त्यौहार होते है, यानि साल में सबसे कम काम भी होता है )
डॉ रामकृष्णन को हार्दिक बधाई !
आप सभी को भी आने वाले त्योहारों की शुभकामनाये !
जय जय

बुधवार, 7 अक्टूबर 2009

वाह रे ! राष्ट्रिय नाम देखे कितना करेगा काम !

भारत सरकार ने गंगा की डालफिन को राष्ट्रिय जलजीव घोषित कर दिया है। इसके फहले गंगा को राष्ट्रिय नदी घोषित किया गया था। मगर इस तरह राष्ट्रिय घोषित करने से होगा क्या ? इससे पहले भी सरकार ने मोर को राष्ट्रिय पक्षी , बाघ को राष्ट्रिय पशु घोषित किया , उनके संरक्षण के लिए तमाम योजनाये चलायी । मगर फायदा क्या हुआ ? बाघ दिनों दिन कम हो रहे है , मोर १९४९ की तुलना में आधे ही बचे है । गंगा की तो बात ही क्या करे जबसे राष्ट्रिय नदी शायद ही सरकार ने कोई ध्यान देने वाला काम किया हो ! मुझे तो ये समझ में नही आता की आखिर सरकार राष्ट्रिय शब्द जोड़कर अपनी जबब्दारियो से मुह क्यो मोड़ना चाहती है ? अगर वास्तव में सरकार को इनके लिए कुछ करना है तो सबसे पहले लोगो को जागरूक बनाना होगा । मैंने ख़ुद अपने कालेज के ज़माने मेंनौरादेही वन्यजीव अभ्यारण्य के द्वारा आयोजित वन्यजीव संरक्षण सप्ताह प्रतियोगिताओ में भाग लिया और कई पुरूस्कार भी जीते मगर वह वन अधिकारियो का वन और वन्यजीवों के प्रति रवैया देखकर पता चला क्यो सरकार की ये योजनाये फेल हो जाती है ।
सरकार अगर वाकई इन हमारी प्राकृतिक धरोहरों के प्रति गंभीर है तो उसे सबसे पहले अपने विभागों का नजरिया और कार्य पद्धति बदलनी होगी ।

शनिवार, 3 अक्टूबर 2009

गाँधी के बहाने.... दुनिया के तराने

गाँधी के बहाने
दुनिया के तराने
लोग चले भुनाने
कुछ भोले , कुछ सयाने
थरूर- छुट्टी बंद हो !
मोंट-ब्लेक - महंगा पेन हो !
जो अहिंसा के लिए मरा
वो हिंसा की जड़ नोट पे छपा
जब बिग अपना काम हो
तो बनाने गाँधी का नाम हो
हाड़ मांस पे आधी धोती है
वही राजनेताओ की बपौती है
हर शहर में उसके नाम पे सड़के
तीन दिन के लिए हर नेता फडके
अब बेटा सगे बाप को नही पूछता
तो कौन राष्ट्र पिता को पूजता ?
बस दिखाने को कर देते रस्म अदायगी
जाने कब हमें शर्म आएगी ?
जब जिन्दा था वो महात्मा तो अपनों ने ही मार दिया
और हमने तोडके उसके उसपे कितना उपकार किया ?
अब गाँधी, तवा है ! अपनी अपनी रोटी सेंक लो
जब रोटी सिक जाए तो गाँधी को फेंक दो !!
प्रिय मित्रो , मेरा सौभाग्य समझ्यिये की मैं भी गाँधी और शास्त्री की तरह २ अक्तूबर को पैदा हुआ हूँ। मगर आज मुझे बड़ा दुःख होता है की लोग गाँधी को अपने स्वार्थ को साधने के लिए इस्तेमाल कर रहे है ! और शास्त्री जी जैसे महँ नेताओ को तो आजकल अखबार और मीडिया भी अब तबज्जो नही देता । बड़ी शर्म की बात है ! पर क्या करे हम तो मूलतः बे-शर्म है ही ! अगर हमें शर्म आती तो इतहास में हमारे ऊपर इतने लोगो ने शासन किया होता ?
जिनको शर्म आई वो लड़े और मरे हमने कुछ दिन याद किया और फ़िर सकूली किताबो में छपकर बे-शर्म हो गये । दोस्तों माफ़ करना अगर आप की भावनाए आहात हो रही हो तो ....? मैं कुछ सच्चाई बयां कर रहा हूँ । पर क्या करना किसी को कोई पचासक साल पहले कुच्छ लोगो ने लड़-मर कर देश को आजाद कराया ? हम तो बे-शर्म है ही ! अगर आप को कुछ अपने दिल या मन में कुछ महसूस हो रहा हो तो मुझे जरुर बताये
बकौल दुष्यंत कुमार -
तमाशा खड़ा करना मेरा मकसद नही , बस तस्वीर बदलनी चाहिए
जो आग मेरे सीने में है , हर दिल में जलनी चाहिए .........

orchha gatha

बेतवा की जुबानी : ओरछा की कहानी (भाग-1)

एक रात को मैं मध्य प्रदेश की गंगा कही जाने वाली पावन नदी बेतवा के तट पर ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा हुआ. बेतवा की लहरों के एक तरफ महान ब...