बुधवार, 13 जून 2018

दतिया का ऐतिहासिक वीरसिंह महल

मध्य प्रदेश का सबसे छोटा जिला दतिया है।  यह मध्यकाल में बुंदेला शासको की रियासत का महत्वपूर्ण भाग ही नहीं रहा बल्कि राजधानी भी रहा है।  आज भी दतिया में उस समय के महल , छतरियां और स्मारक उस गौरवपूर्ण काल की याद दिलाते  है। मगर आज दतिया भारत में माँ पीताम्बरा शक्तिपीठ के कारण प्रसिद्द है।  भारत में कामाख्या शक्तिपीठ के बाद सबसे ज्यादा तांत्रिक इसी मंदिर में जुटते है।  इसी मंदिर परिसर में माँ धूमावती के मंदिर में तांत्रिक अनुष्ठान लगातार चलते रहते है।  धूमावती माता तामसिक देवी होने के कारण  उन्हें भोग में मीठा की जगह नमकीन खाद्य पदार्थों का लगाया जाता है।  सौभाग्यवती स्त्रियों को उनका दर्शन वर्जित है।  दिन में उनका मंदिर मात्र कुछ देर के लिए खुलता है , जबकि शनिवार के दिन पुरे दिन मंदिर खुले होने की वजह से दूर-दूर से लोग दर्शनों के लिए आते है , इसी कारण  बड़ी लम्बी लाइन लगती है।  कहते है , कि पंडित जवाहर लाल नेहरू भी भारत-चीन युद्ध के लिए दतिया आये थे।  खैर वर्तमान में सिंधिया परिवार , छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह , महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री विलासराव देशमुख हाल ही में मंदिर आये थे।  अन्य चर्चित शख्शियत भी समय -समय पर माता के दरवार में हाजिरी लगाते है।  
                                                             खैर दतिया से सिर्फ 45 किमी की दूरी पर पदस्थापना होने के कारण मैं कई बार दतिया माता के दरबार में हाजिरी लगा चुका हूँ , मगर दतिया के ऐतिहासिक स्थलों को देखने से हर बार ही चूक गया।  मेरे ही मित्र जो दतिया में पदस्थ है, उनके अनुसार दतिया के महल ओरछा से अच्छे नहीं है।  यही बात सुनकर वापिस लौटना पड़ा।  लेकिन इस बार जब मेरा छोटा भाई अभिषेक मेरे पास ओरछा आया तो दतिया के ऐतिहासिक महल वीरसिंह महल देखने की ठानी।  22 मई 2018 को हम सपरिवार ओरछा से अपनी कार से निकले।  धूप बहुत तेज थी , मगर हम निकल पड़े एक घंटे बाद हम वीरसिंह महल के पीछे थे।  महल तो दिख रहा था , मगर पहुंचने का रास्ता समझ ही आ रहा था।  फिर पूछने पर पता चला हम महल के दूसरे हिस्से में आ गए और रास्ता दूसरी तरफ से होकर जाता है।  खैर रिवर्स गियर डाल वापिस हुए , तो एक मैरिज गार्डन से रास्ता मिला , महल के लिए कोई साइन बोर्ड नहीं लगा था , रास्ता बस्ती की गलियों में जा रहा था , खैर आगे पूछने पर ऊपर जाती गली की ओर इशारा मिला।  जैसे ही गली में ऊपर की ओर बढे तो सामने से ट्रेक्टर महोदय धुंआ उगलते उतर रहे थे , तो हमारी छोटी सी कार ने सम्म्मान में पीछे हटकर उन्हें रास्ता दिया।  फिर हम आगे बढे एक तो संकरी गली , दूसरी चढ़ाई , तीसरी आफत लोगों ने अपने घरों के सामने बेतरतीब तरीकों से दुपहिया वाहन सजा रखे थे।  तपती दुपहरी में लोग अपने घरो में कूलर के सामने पड़े थे , और हमारी कार चीख चीखकर हलाकान हुई जा रही थी।  हमारा हॉर्न सुनकर गलियों अपना पुश्तैनी ठिकाना बनाये बैठी गौमाता भी सिर्फ कान हिलाकर पुनः अपनी पुरातन परंपरा जुगाली करने में मस्त हो जाती।  हमें तो ये लगने लगा कि कार यही खड़ी कर पैदल ही निकल ले तो ज्यादा अच्छा रहेगा।  परन्तु मेरे दो वर्षीय सुपुत्र और आसमान में चमकते सूर्य देव को देख कार में ही बैठने का फैसला लेना पड़ा।  हमारी किस्मत इतनी बुरी भी न थी , और हमारी कार किसी तरह रेंगती हुई महल तक पहुंचने में सफल हो गयी।  वही एक मंदिर के सामने जगह न होने पर मंदिर के पुजारी जी ने कार खड़ी करने को कहा।  खैर कार पर मध्य प्रदेश शासन लिखा होने से हम निश्चिन्त होकर आगे बढे।
                                                आगे कही टिकट काउंटर जैसी व्यवस्था नहीं दिखी।  तो नीचे महल के एक दबड़े नुमा कमरे में प्रवेश किया तो चार-पांच नर गुटखा चबाते ऊंघते -अधलेटे से दिखे।  टिकट का पूछने पर एक जीर्ण-शीर्ण हो चुके रजिस्टर की ओर इशारा पाकर हम समझ गए कि टिकट की जगह सिर्फ इसी पुरातात्विक अभिलेखीय प्रविष्टि से काम चल जायेगा।  रजिस्टर में एंट्री करने के बाद पीछे से अधलेटी मुद्रा वाले सज्जन की आवाज आई - यहां कोई गॉइड नहीं मिलेगा , अगर चाहे तो जानकारी के लिए किसी को भेज दें।  मेरी स्वीकृति मिलते ही उन्होंने एक केवट (नाम भूल गया ) उपनाम के व्यक्ति को हमारी नैया पार करने भेज दिया।  
केवट भैया अपने काम में निपुण से लगे।  वीरसिंह जूदेव का परिचय जब देने लगे तो मैंने बताया कि मैं ओरछा से आया हूँ , तो संक्षिप्त परिचय के बाद आगे बढे।  
                                   दतिया के वीरसिंह महल का निर्माण प्रसिद्द बुंदेला शासक वीरसिंह जूदेव द्वारा सन 1620 में कराया गया था।  बुन्देलाओं द्वारा राजपूत और मुग़ल स्थापत्य शैली के मिश्रण से एक नई शैली बुंदेला स्थापत्य शैली की शुरुआत की गयी।  इस शैली के महल दतिया के अलावा ओरछा ,मऊसहानियां , छतरपुर, पन्ना , टीकमगढ़ और झाँसी आदि स्थानों पर बने है।  यह एक पांच मंजिला महल है , जिसके बारे में कहा जाता है , कि  मंजिल जमीं के नीचे है , अतः यह सात मंजिल  का है। मंदिर इस तरीके से बनाया कि ऊपर से देखने पर यह स्वास्तिक आकार का दिखता है।  बिलकुल इसी की तरह का महल ओरछा में जहांगीर महल है।  इन दोनों महलों को भाई-भाई भी कहा जाता है। इन दोनों महल की नकल में गुजरात के मांडवी में भी विजय पैलेस बनाया गया।  वीरसिंह महल को नृसिंह महल या पुराना महल भी कहा जाता है। 
                                         खैर अपने गाइड के साथ महल में प्रवेश किये तो स्वागत चमगादड़ो की तीखी गंध से हुआ।  जैसे तैसे नाक पर रुमाल रख अगली मंजिल पर पहुंचे तो पुरे दतिया शहर का विहंगम दृश्य से रु-ब-रु हुए , सामने एक पहाड़ी पर गोविंददेव महल दिख रहा था , जो राजा के वर्तमान वंशज के अधिपत्य में है , और आम जनता के लिए बंद रहता है।  महल के पास ही एक खंडहर सी ईमारत दिखी तो गाइड जी ने बताया कि ये फाँसीघर था।  अब हम महल में आगे बढे तो एक मंजिल पर गाइड महोदय ने बताया कि इस जगह पर राजा और राजपरिवार के लोग नृत्य -संगीत का लुत्फ़ लेते थे।  बीचोबीच एक रंगमंच सा बना हुआ था।  और उसके ठीक ऊपर छत पर गोलाकार में नर्तक-नर्तिकयों की नृत्यरत खूबसूरत मुद्राएं बनी हुई थी।  छत पर इतनी आकर्षक शिल्पकृति बरबस उस समय के कलाकारों को नमन करने को प्रेरित करती है।  रंगमंच के एक तरह राजा और दूसरी तरफ रानियों और राजपरिवार के लोगों के बैठने की जगह बनी थी। 
                                         अब गाइड के पीछे -पीछे चले जा रहे थे , एक बंद दरवाजे की तरफ इशारा करते हुए केवट जी बोले - यह महारानी का कमरा था।  जर्जर होने की जद्दोजहद वाले दरवाजे से झांककर जब कमरे में देखा तो बहुत ही सुन्दर भित्तिचित्र नजर आये , कैमरे से फोटो खींचने का सफल प्रयास किया।  फिर केवट जी से पूछा - कि ये दरवाजा खुल नहीं सकता।  तो केवट जी मुस्कुराते हुए बोले - बिलकुल खुल सकता है। हमने सोचा कि शायद ताले की चाबी उनके पास हो  लेकिन इधर तो नई तकनीक का इस्तेमाल हुआ।  केवट जी ने दरवाजे का एक पल्ला उठाया और उसे साइड में करते हुए अब आप अंदर जा सकते है।  हम जब अंदर गए तो आश्चर्य चकित रह गए , बहुत ही खूबसूरती से महारानी के कमरे की दीवारों को खूबसूरत डिजायन से सजाया गया था।  हमने भी खूब फोटो खींचे।  फिर बाहर आ गए। अगली मंजिल से गलियारों की खूबसूरती देखने लायक थी।  पत्थर की खूबसूरत जालियों की डिजायन देखते बनती थी।  महल के पीछे की तरफ एक तालाब बना हुआ था , तालाब के उस पार एक पुराना मंदिर भी बना था।  अब गर्मी अपने चरम पर पहुँच रही थी , तो हम सबसे ऊपरी मंजिल देख वापिस लौटे।  केवट जी धन्यवाद सहित उनका मेहनताना (जो उन्होंने माँगा नहीं था ) देकर महल से कई खूबसूरत यादें लेकर लौटे।  
दतिया ग्वालियर - झाँसी  रेल खंड में एक रेलवे स्टेशन है।  इसके दोनों तरफ झाँसी और ग्वालियर जैसे बड़े शहर है।  दतिया  झाँसी , खजुराहो , ओरछा , ग्वालियर से सड़क मार्ग से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है।  दतिया में अब हवाई पट्टी बन गयी है।  दतिया के आसपास घूमने लायक जगहों में गुजर्रा में सम्राट अशोक के नाम वाले शिलालेख है , उनाव -बालाजी में सूर्य मंदिर , रतनगढ़ में देवी जी का प्रसिद्द मंदिर है।  इसके अलावा आप ग्वालियर के दर्शनीय स्थल , झाँसी का किला , ओरछा के दर्शनीय स्थल , खजुराहो के मंदिर , माधव राष्ट्रिय उद्यान शिवपुरी  आदि है। दतिया में रुकने के लिए कई होटल भी है , मध्य प्रदेश पर्यटन निगम का भी एक होटल है , परन्तु पर्यटक दतिया की अपेक्षा ग्वालियर , झाँसी या ओरछा रुकना पसंद करते है।  अब आप चित्रों का आनंद लीजिये हम मिलेंगे फिर किसी मोड़ पर...... 
बुंदेलखंड के अन्य दर्शनीय स्थलों पर दी गयी लिंक पर क्लिक कर मेरी पोस्ट पढ़िए -   
 , ओरछा ,  

वीरसिंह महल का प्रवेश द्वार 
प्रवेश द्वार पर लगी महल की जानकारी 
प्रवेश करते ही नजर आता हिस्सा 
शहर के दूसरे हिस्से में नजर आता गोविंददेव महल और बीच में फाँसीघर नजर आ रहा है।  
महल के दूसरे हिस्से से दिखता तालाब 
मुगलिया शैली की डिजायन 
नृत्यशाला की मनोरम छत 
महल के गलियारे 
बंद दरवाजे से जब पेंटिंग पसंद आयी तो फिर दरवाजा खुलवाया 
महारानी के कमरे की नक्काशी और चित्र 
खूबसूरत चित्र 
मनमोहक डिजायन 
खूबसूरत पत्थर की जालियां 
छत भी कम खूबसूरत नहीं है।  
रंग ऐसे जैसे कल ही रंगाई हुई हो 
सबसे ऊपरी मंजिल 
मयूर अंकन 
पास के तालाब में अठखेलियां करते युवा 
हमें विदा करते किंगफिशर जी 

रविवार, 10 जून 2018

एक किला जहाँ पूरी बारात ही गायब हो गयी


बुंदेलखंड भारत के इतिहास में एक उपेक्षित क्षेत्र रहा है, जब हम भारतीय इतिहास को पढ़ते हैं ,तो हमें बुंदेलखंड के बारे में बहुत कम या कहें की नाम मात्र की ही जानकारी मिलती है । जबकि बुंदेलखंड की धरती वीरभूमि रही है यहां पर समय समय पर वीर पैदा हुए । बुंदेलखंड की बात चले और हम बुंदेला शासको के  दिनों को याद ना करें यह तो संभव ही नहीं क्योंकि बुंदेले ने  ही तो बुंदेलखंड की स्थापना की ।

                                                      मैंने अपनी ओरछा गाथा सीरीज  में बुंदेलखंड की स्थापना का जिक्र किया है, और बुंदेलखंड की पहली राजधानी बनने का गौरव टीकमगढ़ जिले में स्थित गढ़कुंडार नामक स्थान को प्राप्त हुआ है । बुंदेलों की राजधानी बनने के पूर्व गढ़ कुंडार खंगार वंश की राजधानी रहा और खंगार वंश के प्रतापी राजा खेत सिंह (10 वी सदी )  ने स्थान का पल्लवन पुष्पन किया । राजा खेतसिंह खंगार पृथ्वीराज चौहान के सेनापति रहे थे , उन्होंने पृथ्वीराज की तरफ से कई युद्धों में वीरता का परिचय दिया था , इसी से खुश  होके  पृथ्वीराज ने उन्हें गढ़कुंडार की रियासत प्रदान की।  मुहम्मद गोरी से पृथ्वीराज की हार  बाद  खेतसिंह ने स्वयं को स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया था। 14 वी सदी में  खंगारों से छीनकर बुंदेला शासकों ने गढ़कुंडार को अपनी राजधानी बनाया ।
                                    वर्तमान में गढ़ कुंडार मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले में निवाड़ी तहसील के अंतर्गत आता है । यह झांसी छतरपुर सड़क मार्ग पर निवाड़ी से 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है जबकि झांसी से इसकी दूरी लगभग 58 किलोमीटर है । यहां का नजदीकी रेलवे स्टेशन निवाड़ी है । जो झांसी मानिकपुर रेलवे लाइन पर स्थित है । वर्तमान में गढ़ कुंडार एक छोटा सा कस्बा है और यहां पर दर्शनीय स्थलों में गढ़कुंडार का प्रसिद्ध किला गीद्द वाहिनी का मंदिर तालाब आदि देखने योग्य स्थल हैं । शासन की उपेक्षा के कारण यहां पर बहुत कम लोग ही आते हैं । हां प्रतिवर्ष दिसंबर माह में 27 से 29 दिसंबर तक मध्य प्रदेश शासन द्वारा तीन दिवसीय गढ़ कुंडार महोत्सव का आयोजन किया जाता है । यह महोत्सव भी खंगार जाति का महोत्सव बनकर रह गया है , जबकि से पर्यटन गतिविधियों के साथ जोड़कर और अधिक सफल बनाया जा सकता था ।
अब किले  के कुछ इतिहास पर नजर डाली जाए ।

किले का इतिहास

-यह किला चंदेल काल में चंदेलों का सूबाई मुख्यालय और सैनिक अड्डा था।
- यशोवर्मा चंदेल (925-40 ई.) ने दक्षिणी-पश्चिमी बुंदेलखंड को अपने अधिकार में कर लिया था।
- इसकी सुरक्षा के लिए गढ़कुंडार किले में कुछ निर्माण कराया गया था।
- इसमें किलेदार भी रखा गया। 1182 में चंदेलों-चौहानों का युद्ध हुआ, जिसमें चंदेल हार गए।
- इसमें गढ़कुंडार के किलेदार शियाजू पवार की जान चली गई।
- इसके बाद यहां नायब किलेदार खेत सिंह खंगार ने खंगार राज्य स्थापित कर दिया।
- 1182 से 1257 तक यहां खंगार राज रहा। इसके बाद बुंदेला राजा सोहन पाल ने यहां खुद को स्थापित कर लिया।
- 1257 से 1539 ई. तक यानी 283 साल तक किले पर बुंदेलों का शासन रहा।
- इसके बाद यह किला वीरान होता चला गया। 1605 के बाद ओरछा के राजा वीर सिंह देव ने गढ़कुंडार की सुध ली।
- वीर सिंह ने प्राचीन चंदेला युग, कुठारी, भूतल घर जैसे विचित्र तिलिस्मी गढ़ का जीर्णोधार कराकर गढ़कुंडार को किलों की पहली पंक्ति में स्थापित कर दिया।
- 13वीं से 16 वीं शताब्दी तक यह बुंदेला शासकों की राजधानी रही।
- 1531 में राजा रूद्र प्रताप देव ने गढ़ कुंडार से अपनी राजधानी ओरछा बना ली।

घूमने आई पूरी बारात में हो गई थी गायब..
- बताया जाता है कि काफी समय पहले यहां पास के गांव में एक बारात आई थी। बारात में शामिल 50 से 60 लोग किला घूमन आए। यहां वे किले के अंडरग्राउंड वाले हिस्‍से में चले गए। नीचे गए सभी लोग आज तक वापस नहीं लौटे। इसके बाद भी कुछ इस तरह की घटनाएं हुईं। इन घटनाओं के बाद किले के नीचे जाने वाले सभी दरवाजों को बंद कर दिया गया। किला बिल्‍कुल भूल-भुलैया की तरह है। अगर जानकारी न हो तो ज्‍यादा अंदर जाने पर कोई भी खो सकता है। भूलभुलैया और अंधेरा रहने के कारण दिन में भी यह किला डरावना लगता है।
- गढ़कुंडार को लेकर वृन्दावनलाल वर्मा ने उपन्यास भी लिखा  है। इस उपन्यास  में गढ़कुंडार के कई रहस्य दर्ज किए गए हैं।

                                    गढ़ कुंडार इतिहास प्रेमियों के लिए आज भी आकर्षित करता है और इसी आकर्षण में बंद कर मैं अभी तक 5-6   बार इस जगह जा चुका हूं । यह किला अपनी खूबसूरती के साथ-साथ महत्वपूर्ण सुरक्षा व्यवस्था के लिए जाना जाता है । ऊंचाई पर बने इस किले से आसपास का बहुत ही सुंदर नजारा दिखाई देता है । किले का निर्माण सामने एक पहाड़ी के सापेक्ष इस तरह किया गया है , कि जब हम सड़क मार्ग से किले की ओर आते हैं , तो दूरी पर किला नजर आता है । जैसे जैसे ही हम उसके नजदीक पहुंचते हैं यह दिखाई देना बंद हो जाता है । ऐसा कहा जाता है, कि यह किला सात मंजिला है , जिसमे जमीन  ऊपर तीन मंजिल है, और चार मंजिल जमीन के नीचे बने है।  हालाँकि   दरवाजे सुरक्षा की दृष्टि से बंद कर दिए गए है।  गढ़कुंडार का किला बौना चोर के लिए भी प्रसिद्ध रहा है । कहते है कि उसकी लंबाई 52 अंगुल (साढ़े तीन फुट ) थी, इसलिए उसे बौना चोर कहते थे । कुछ लोग उसका नामकरण 52 चोरियों की वजह से कहते हैं । कहा जाता है कि बोना चोर एक ऐसा चोर था जिससे तत्कालीन समय का बुंदेलखंडी रॉबिनहुड कहा जा सकता है । यह धनाढ्य व्यक्तियों को पहले से चेतावनी देता था , कि वह उसके यहां चोरी करेगा और उनकी तमाम सुरक्षा व्यवस्थाओं को चकमा देकर वह चोरी करने में सफल हो जाता था । धनाढ्यों से लूटे गए धन से वह गरीबों और जरूरतमंदों की मदद भी करता था  । इसलिए वह क्षेत्र में लोकप्रिय था।  बौना चोर धन के  लिए धन लोलुप लोगों किले में बहुत खुदाई भी की है।  फ़िलहाल किले की सुरक्षा के लिए मध्य प्रदेश पुरातत्व विभाग ने प्राइवेट सुरक्षा एजेंसी के कुछ गार्ड नियुक्त किये है , जो दिन में आने वाले लोगो के लिए गाइड का भी काम करते है।   
                            गढ़कुंडार में ही गिद्धवाहनी देवी का मंदिर है।  गिद्ध वाहिनी मंदिर मूलतः विंध्यवासिनी देवी का मंदिर है । उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के विंध्याचल में स्थित विंध्यवासिनी देवी बुंदेलों की कुलदेवी हैं । ऐसी मान्यता है , कि  विंध्यवासिनी ही  बुंदेलों की सहायता करने के लिए विंध्याचल से गिद्ध पर बैठकर गढ़कुंडार आई इसलिए उन्हें यहां पर गिद्ध वाहिनी कहा गया । गिद्धवाहिनी मंदिर के बाहर एक बहुत ही खूबसूरत गिद्ध की प्रतिमा की बनी हुई है । साथ ही मंदिर से लगा हुआ एक बड़ा तालाब है जो इस जगह की खूबसूरती में चार चांद लगा देता है । इस तालाब में सर्दियों में कई प्रकार के प्रवासी पक्षी भी आते है।  हालाँकि पिछले कई सालों  के सूखे के कारण हाल -बेहाल है।
बुंदेलखंड के अन्य दर्शनीय स्थल -
ओरछा
देवगढ़
टीकमगढ़
दतिया
झाँसी
खजुराहो
पन्ना
कालिंजर


गढ़कुंडार किले का प्रवेश द्वार ( हालाँकि दरवाजा नया लगा है ) 
प्रवेश द्वार  से दिखता किला 
किले का एक बुर्ज 
किले में प्रवेश करते ही बनी भूलभुलैया 

किले की भूलभुलैया में में रोशनी के लिए छत में रोशनदान बने है।  (अभी सुरक्षा की दृष्टि से जाली लगाई गयी है।  ) 
किले की दीवार पर शुकदेव जी 
किले का जर्जर हिस्सा 

किले के अंदर का विहंगम दृश्य 
किले की सबसे ऊपरी मंजिल 
किले से शाही प्रवेश द्वार का रास्ता 
किले के पास बनी प्राचीन बाबड़ी  जो कभी किले वासियों की प्यास बुझती होगी।  
छत पर बनी डिजायन  
किले से दिखता गिद्धवाहिनी मंदिर और सूखा पड़ा तालाब 
गढ़कुण्डार के तालाब में प्रवासी पक्षी 
सुधा घर्षण यन्त्र (जिसका आज भी पुनर्निर्माण में प्रयोग होता है।  )

रविवार, 3 जून 2018

संघर्षो का अनुपम नगर : बक्सर (गंगा जी कहिन - 1 )

जैसा कि आप जानते है , नदियों से बात करना मुझे हमेशा से ही अच्छा लगता है, क्योंकि नदियां ही हैं, जिनसे आप बहुत कुछ जान सकते हैं, समझ सकते हैं, पहचान सकते हैं । नदियों किनारे ही मनुष्य की सभ्यता और संस्कृति न केवल जन्मी बल्कि पल्लवित-पुष्पित होकर आज के आधुनिक स्वरुप में भी आई । इससे पहले आपने ओरछा में मां वेत्रवती से मेरा संवाद ओरछा गाथा के रूप में पढ़ा ही होगा ,जिन्होंने नहीं पढ़ा वह इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं ।
                                              आज मैं आपको भारत की सबसे प्रसिद्ध और पतित पावनी मां गंगा से हुए अपने संवाद से रूबरू कराऊंगा । मां गंगा के बारे में बताने की आवश्यकता तो है ही नहीं ! क्योंकि शायद ही कोई भारतीय होगा जो गंगा से परिचित नहीं होगा । उत्तर भारत की जीवन रेखा और संपूर्ण भारत की सांस्कृतिक ध्वजा देवनदी गंगा के किनारे जन्म लेने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ । मध्य बिहार के उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे हुए एक गांव में मेरा जन्म हुआ जिसका जिला मुख्यालय बक्सर है । कुछ वर्ष पूर्व अपने गृह प्रवास के दौरान बक्सर के रामरेखा घाट जाने का अवसर प्राप्त हुआ और उसी दौरान मां गंगा से एकांत में कुछ बातें हुई । उसी संवाद को आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूं और उम्मीद ही नहीं पूरा विश्वास है कि आप बेतवा की जुबानी  ओरछा की कहानी  की तरह इस संवाद को भी पसंद करेंगे ।
                                       कुछ साल पहले की बात है मेरे रिश्तेदारी में  एक बच्चे का मुंडन होना था, जो बक्सर के रामरेखा घाट गंगा तट पर निश्चित था । परंतु मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं था, शरीर ज्वर से पीड़ित था और तन का तापमान बढ़ा हुआ था । परंतु जब सब घर वाले वहां जा रहे थे तो मैं अकेला घर पर रहकर करता भी क्या इसलिए बेमन से ही मैं सबके साथ चल पड़ा । अब बीमारी की हालत में मुंडन कार्यक्रम में मेरी कोई रूचि तो नही थी, इसलिए रामरेखा घाट पर एक किनारे पर एक खाली मचान पर मैं बैठ गया । घर परिवार के सदस्य और रिश्तेदार मुंडन कार्यक्रम में व्यस्त हो गए । इधर मैं अनवरत गंगा की लहरों को देख रहा था, गंगा के विशाल पाट में  लहरें समुद्र का अहसास दे रही थी । इन लहरों की तरफ न जाने क्यों मैं सम्मोहित सा एकटक देख रहा था । लहरों का सम्मोहन इतना था कि मेरे आस-पास हो रहे शोरगुल से भी मैं बिल्कुल अनजान बना बैठा था । सूर्यनारायण अपनी मध्य अवस्था में तेजी से चमक रहे थे और सूर्य की किरणें गंगा जल में उछल-कूद कर रही थी । इस शोरगुल के बीच भी न जाने क्यों मुझे एक असीम शांति का अनुभव हो रहा था।  एक तरफ गंगा की लहरें बक्सर के किले के प्राचीर से टकरा कर लौट रही थी तो दूसरी तरफ लहरें अनंत की ओर जाने के प्रयास में थी । लहरों की तरफ देखते देखते अचानक मेरी आंखो के सामने अंधेरा सा छाने लगा और भरी दोपहरी में जो ना सोचा था वह हुआ ।
 एक अति मधुर तुम ध्वनि गंगा की लहरों से गूंजी , कैसे हो पुत्र ? जब मैंने चारों तरफ देखा तो आवाज लहरों की तरफ से आ रही थी और लहरों में एक नारी की आकृति बन रही थी । सूर्य की किरणों के कारण उस आकृति में एक दिव्यता का अद्भुत अनुभव हो रहा था । मेरे आश्चर्य मिश्रित भाव को देख कर तो यह आवाज आई कि वक्त घबराने की बात नहीं मैं गंगा हूं !
गंगा ?
हां मैं गंगा नदी हूं !
सचमुच ?
हां बस मैं सचमुच वही गंगा हूं जो ब्रह्मा के कमंडल से विष्णु के चरणों से होते हुए स्वर्ग में प्रवाहित हुई और भागीरथ के प्रयास से शिव की जटाओं से होते हुए इस पृथ्वी पर अवतरित हुई ।
क्या मैं सपना देख रहा हूं ?
नहीं पुत्र, तुम कोई सपना नहीं देख रहे बल्कि मैं स्वयं तुम से वार्तालाप करने के लिए उपस्थित हुई हूं !
अहोभाग्य मेरे जो आपने मुझ जैसे अधम पातक को वार्तालाप के लिए चुना !
ना पुत्र तुम अधम पातक नहीं हो मेरे स्पर्श के पश्चात तो बड़े-बड़े पापी भी पुण्यात्मा हो जाते हैं । और तुमसे तो साक्षात्कार करने का निर्णय मैंने स्वयं लिया है ।
मेरी खुशी की सीमा नहीं थी, क्योंकि स्वयं देवनदी पतित पावनी मां गंगा मुझसे साक्षात्कार कर रही थी । मां गंगा को मैंने दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया ।
तभी बक्सर किले की प्राचीर से टकराकर एक लहर कुछ जल बिंदुओं को लेकर मेरे ऊपर से गुजरी मानो स्वयं मां गंगा अपना आशीर्वाद दे रही हो ।
मां गंगा से मेरी बातचीत करने की बहुत पुरानी इच्छा थी, जो आज पूरी हो रही थी और मेरे मन में न जाने कितने विषय और प्रश्न थे जो मुझे मां गंगा से पूछने थे परंतु आज बक्सर किले के प्राचीर को देखकर मेरे मन में इस शहर के इतिहास उत्थान पतन के बारे में उत्सुकता थी ।
मां गंगा  को हाथ जोड़े जोड़े ही मैंने पूछा - क्या आप मुझे इस बक्सर शहर की गाथा सुनाएंगी ?
मां गंगा मंद मंद मुस्कुरा आई और बोली क्यों नहीं इस नगर को दो मैंने बड़ी करीब से देखा है बड़ा ही संघर्ष किया है इस नगर ने...

संघर्ष !! क्या शहर भी संघर्ष करते हैं ?

बिल्कुल पुत्र शहर जन्मते हैं बढ़ते हैं और मरते भी हैं उनमें भी जीवन होता है इसलिए वह संघर्ष भी करते हैं ।

तो फिर मुझे सुनाइए ना इस बक्सर शहर की जन्म गाथा से लेकर संघर्ष गाथा तक..

मां गंगा की लहरों में थोड़ा सा ठहराव  आ गया ,  जैसे वह इतिहास में गोता लगाने गई हो और मेरे लिए बक्सर के संघर्ष की गाथा साथ लेकर लौटने वाली हो ।

कुछ देर की शांति पश्चात लहरों से पुनः आवाज़ को गूंजी ! बक्सर को अलग अलग समय मे वेदगर्भपुरी , करूष , तपोवन, चैत्रथ, व्याघ्रसर और सिद्धाश्रम के नाम से जाना गया है । बक्सर के इतिहास के लिए हमें वैदिक काल की तरफ चलना होगा । वैदिक काल में इस स्थान पर बहुत ही घना जंगल होता था और उस जंगल में बाघों का निवास हुआ करता था । जंगल के बीचो-बीच एक बहुत बड़ा सरोवर भी था जहां बाघ पानी पीने आते थे । इसी कारण उस सरोवर का नाम व्याघ्र सर पड़ा । और व्याघ्रसर ही आगे चलकर बक्सर में रूपांतरित हुआ ।

लेकिन माते, जिस सरोवर के नाम पर बक्सर का नामकरण हुआ , वो वर्तमान में कहां गया ?

पुत्र,  वर्तमान रेलवे स्टेशन के पास जो कमलदह पोखरा है, वही कभी व्याघ्रसर सरोवर था । आज वह अतिक्रमण की भेंट में सिकुड़ गया है । व्याघ्रसर में बाघों के अलावा उस जंगल में मेरे तट पर 80,00 ऋषि मुनियों के आश्रम भी थे, जहां पर वह वेद पाठ और यज्ञ हवन आदि भी करते थे । कई वेद मंत्रों के रचयिताओं के आश्रम होने के कारण इस स्थान को वेद गर्भ भी कहा जाता था । इस क्षेत्र के आसपास ही महर्षि विश्वामित्र, गौतम ऋषि, भृगु ऋषि और उनके शिष्य दर्दर ऋषि आदि के प्रसिद्ध आश्रम थे । वर्तमान चरितर वन क्षेत्र में विश्वामित्र ऋषि का आश्रम था जबकि गंगा के दूसरे तट पर अहिरौली गांव में गौतम ऋषि का आश्रम था । नदांव ग्राम में नारद मुनि का आश्रम था , वर्तमान बलिया मैं भृगु ऋषि और उनके शिष्य )दर्दर ऋषि का भी आश्रम था । बक्सर को पुराणों में अनेक नामों से जाना गया है ।
वराह पुराण में लिखा है-
कृते सिद्धाश्रम प्रोक्तः त्रेतायां वामनाश्रमः ।
द्वापरे वेद गर्भेति कलौ व्याघ्रसयः स्मृतम ।।
कृते चैत्र स्थम प्रोक्तः त्रेतायां लटकाश्रम ।
द्वापरे चरितं नाम कलौवनं चरित्रकम ।।

ब्रह्म पुराण में कहा गया है-
महात्म्य वेदगर्भया वक्तं, कोहि क्षमो भवेत ।
यदि वर्ष सहस्रेण ब्रम्हा वक्तं, न शक्यते ।।
 त्रेता युग आते आते इस पुण्यभूमि पर राक्षसों का प्रवेश हुआ और ताड़का, मारीच और सुबाहु के आतंक से यह पूरा क्षेत्र परेशान हो गया । राजा से ऋषि बने राजर्षि विश्व मित्र अयोध्या नरेश दशरथ जी के यहां पहुंचे और उन्होंने अपनी व्यथा सुनाई कि इन राक्षसों के कारण वह यज्ञ हवन आदि कार्य नहीं कर पा रहे हैं । और राक्षसों से मुक्ति के लिए उन्होंने महाराज दशरथ से उनके यशस्वी पुत्र राम और लक्ष्मण को मांगा । कुलगुरु वशिष्ठ जी की आज्ञा के पश्चात बड़ी मुश्किल से महाराज दशरथ ने राजर्षी विश्वामित्र के साथ अपने प्रिय पुत्रों को भेजा । जहां विश्वामित्र जी ने न केवल राम और लक्ष्मण को शिक्षा दी बल्कि उन्हें युद्ध विद्या पर भी पारंगत किया । जब भगवान राम और लक्ष्मण महर्षि विश्वामित्र के आश्रम में शिक्षा प्राप्त कर रहे थे तो प्रतिदिन देखते कि ब्रह्म मुहूर्त के पूर्व ही अंधेरे में गुरुजी निकलकर गायब हो जाते और सूर्य उदय के पश्चात लौटते थे । एक दिन भगवान राम ने आखिरकार गुरु विश्वामित्र से पूछ ही लिया कि इतने अंधेरे में गुरु जी आप प्रतिदिन किधर जाते हैं ?
तब गुरु विश्वामित्र ने उत्तर देते हुए कहा कि वह प्रतिदिन गंगा स्नान करने काशी जाते हैं ।
काशी ! गंगा तो हमारे निकट से ही प्रवाहित होती है तब आपको स्नान करने इतनी दूर काशी क्यों जाना पड़ता है ?
वत्स काशी में गंगा उत्तरवाहिनी है जिसका अधिक पुण्य प्राप्त होता है इसलिए मैं प्रतिदिन गंगा स्नान काशी में ही करता हूं ।
भगवान राम बोले कि सिर्फ उत्तरवाहिनी गंगा के कारण आपको इतना परिश्रम करना पड़ता है तो गुरुदेव आज से आपको काशी जाने की आवश्यकता नहीं है । इतना कहकर भगवान राम ने अपने तरकश से एक बार निकाला और गंगा के पास एक रेखा खींची जिसके कारण गंगा यानी मैं बक्सर में भी उत्तरवाहिनी हो गई और तब से लेकर आज तक लोग उस तट को रामरेखा घाट के नाम से जानते हैं । आज ही यह घाट एक तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध है और दूर-दूर से लोग यहां पर गंगा स्नान करने, मुंडन इत्यादि कर्म करने भी आते हैं ।
                                                        गुरु विश्वामित्र के नित्य नियम हवन में राक्षसी ताड़का और उसके भाई मारीच और सुबाहु विघ्न डालते थे। ताड़का लंकाधिपति रावण की मौसी थी , और उस समय रावण पृथ्वी ही नहीं तीनों लोको में अपराजित था , अतः कोई भी शासक ताड़का और उसके भाइयों को रोकने में डरते थे। विश्वामित्र आदि ऋषि भी इनसे अत्यंत पीड़ित थे , इन राक्षसों के उत्पीड़न से बचने ही तो विश्वमित्र जी अयोध्या नरेश दशरथ जी के दोनों सुपुत्रों को अपने आश्रम लेकर आये थे।  एक दिन गुरुदेव विश्वमित्र जब अपने यज्ञ कर्म में लीन थे, तभी ताड़का अपने दोनों भाइयों के साथ विश्वामित्र आश्रम आ गयी और उत्पात करने लगी , तब विश्वामित्र जी के आदेशानुसार भगवान राम ने ताड़का और सुबाहु का वध किया जबकि मारीचि को अपने एक बाण से दूर समुद्र तट पर फेंक दिया । कहते हैं कि ताड़का के मरने पर उससे इतना अधिक रक्त प्रवाह हुआ कि एक नाला बन गया जिसे आज भी ताड़का नाला कहा जाता है । आगे चलकर यही मारीचि स्वर्ण मृग बना और सीता का रावण  अपहरण किया।  दुःख की बात है , कि  वर्तमान में विश्वमित्र आश्रम की हालत जीर्ण-शीर्ण हो गयी है। इस तरह भगवान राम ने इस पुण्य भूमि से ही असुर संहार कार्यक्रम की शुरुआत की । बक्सर से ही जब गुरु विश्वामित्र मुझे (गंगा को ) पारकर मिथिला में आयोजित धनुष यज्ञ को दिखाने राम और लक्ष्मण को लेकर जा रहे थे तो रास्ते में गौतम ऋषि का आश्रम पड़ा और वहां पर उनकी पत्नी अहिल्या पत्थर की शिला बनी पड़ी थी ।
कहानी में विघ्न डालते हुए मैंने मा गंगा से प्रश्न किया कि आखिर ऐसा क्या हुआ था कि गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या को पत्थर की शिला बनना पड़ा ?
(क्रमशः जारी )
बक्सर रेलवे स्टेशन पर लगा विश्वमित्र जी म्यूरल 
दिल्ली -हावड़ा लाइन पर बक्सर रेलवे स्टेशन 
जिन स्थानों पर भगवान श्रीराम के चरण पड़े 
अहिरौली का गंगा घाट 
नमामि गंगे 
रामरेखा घाट ( चित्र गूगल से साभार )
बक्सर किले की एक पुरानी पेंटिंग ( साभार -बक्सर प्रशासन )

बुधवार, 21 मार्च 2018

मैहर : जहां आज भी आल्हा माईं शारदा का पूजन करने आते हैं ।


51 शक्तिपीठों में से एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ मध्यप्रदेश के सतना जिले में स्थित मैहर है, जहां पर मां शक्ति शारदा के रूप में प्रतिष्ठित है । शक्तिपीठों की स्थापना से संबंधित कथा तीन चरणों में अलग-अलग ग्रंथों में मिलती है जिसमें इस कथा का प्रथम चरण का रूप महाभारत के शांति पर्व में है और इस कथा के दूसरे चरण के रूप में श्रीमद् भागवत महापुराण से लेकर शिवपुराण तक वर्णन मिलता है । जब की कथा के तीसरे चरण का वर्णन देवी पुराण या महाभागवत जैसे उपपुराण में मिलता है ।
कथा के अनुसार भगवान शिव की पत्नी सती जो महाराज दक्ष की पुत्री थी । दक्ष द्वारा एक यज्ञ के आयोजन में सारे देवी देवताओं को निमंत्रण देने के पश्चात् भगवान शिव को ना बुलाने पर नाराज थी । और उन्होंने भगवान शिव से स्वयं अपने पिता दक्ष के यज्ञ में भाग लेने की आज्ञा मानी तब शिव जी ने उन्हें मना कर दिया । परंतु सती अपने पति महादेव शिव के मना करने के बाद भी हठपूर्वक दक्ष के यज्ञ में पहुंचती हैं और अपने पिता दक्ष पर क्रोधित होती हैं । वहां पर दक्ष एवं अन्य लोगों के मुख से अपने पति की बुराई न सुन पाने के कारण सती यज्ञ की अग्नि में कूद जाती हैं । अतः रुष्ट होकर भगवान शिव अपने मुख से वीरभद्र को उत्पन्न करते हैं और वीरभद्र शिव गणों के साथ जाकर यज्ञ का विध्वंस कर डालता है  ।  यज्ञ विध्वंस के पश्चात जब महादेव यज्ञ स्थल पर पहुंचते हैं और सती का शव देखकर दुखी हो जाते हैं और उनके शव को लेकर विक्षिप्त की तरह संपूर्ण ब्रह्मांड में भटकने लगते हैं । तब भगवान विष्णु अपने सुदर्शन चक्र से सती केशव को खंड-खंड रूप में काटते जाते हैं और इस प्रकार सती के शव के विभिन्न अंग 51 स्थानों पर गिरे और उन 51 स्थानों पर शक्तिपीठों का निर्माण हुआ । 
                                        उन  51 स्थानों में से एक स्थान मैहर भी है, जहां कहा जाता है कि शक्ति के गले का हार इस जगह गिरा इसलिए इसका नाम माई का हार  यानी (माई +हार ) मैहर पड़ा ।  हालाँकि  अलग-अलग धर्म ग्रंथों में अलग-अलग संख्या में शक्तिपीठों का जिक्र मिलता है।  जैसे तंत्र चूड़ामणि में शक्तिपीठों की संख्या 52 बताई गई है, तो देवी भागवत में 108 शक्तिपीठों का उल्लेख है।  देवी गीता में 72 शक्तिपीठ का उल्लेख मिलता है । परंतु अधिकांश देवी भक्त देवी पुराण में 51 शक्ति पीठों को ही परंपरागत रूप से मान्यता देते हैं ।

                                     अब अगर हम मंदिर इतिहास की बात करें ऐसी जनश्रुति है कि अपने अज्ञातवास काल में पांडवों द्वारा इस मंदिर का निर्माण किया गया और देवी की पूजा की गई । परंतु इतिहास में अगर दृष्टि डालें तो मां शारदा देवी की पत्थर की मूर्ति के पैर के पास में एक प्राचीन शिलालेख प्राप्त हुआ है जिसमें शक संवत 424 चैत्र कृष्ण पक्ष मंगलवार विक्रम संवत 559 अर्थात 502 ईसवी उल्लेखित है । अतः वर्तमान मंदिर को इससे शिलालेख के आधार पर चौथी और पांचवी सदी का माना जा सकता है । हालांकि  भारत में मंदिर निर्माण की प्रक्रिया भी चौथी सदी से ही प्रारंभ हुई ।
                                   आम जनता में इस मंदिर से एक और मान्यता जुड़ी हुई है वह 12 वीं सदी में पृथ्वीराज चौहान के समय इस चित्र में एक बहुत ही प्रतापी शासक और हुए हैं, जिन्हें राजा परमर्दिदेव या  परमाल कहा गया । राजा के दरबार में आल्हा और उदल नामक दो भाई बहुत ही वीर थे.  जिन्होंने पृथ्वीराज चौहान के विरुद्ध युद्ध भी किया और पृथ्वीराज चौहान को अभयदान तक दिया।  । और ऐसी मान्यता है कि आल्हा को माई शारदा के आशीर्वाद से अमरत्व प्राप्त है । और आज भी आल्हा द्वारा प्रतिदिन माई शारदा का प्रथम पूजन किया जाता है  . बताते हैं कि रात के समय कोई भी व्यक्ति मंदिर में नहीं ठहर सकता।  सुबह जब पुजारी मंदिर का पट खोलते हैं, तो उस समय माई का पूजन किया हुआ मिलता है । आल्हा के बारे में तत्कालीन दरबारी कवि जगनिक द्वारा 'परमाल रासो' नामक ग्रंथ लिखा गया , जिसका एक भाग आल्हा खंड कहलाता है और इसमें आल्हा की वीरता और उनके द्वारा लड़ी गई 52 लड़ाइयों का बखान है । आज भी बुंदेलखंड,अवध , पूर्वांचल  और बघेलखंड क्षेत्र में ग्रामीण लोगों द्वारा बरसात के समय आल्हा का गायन बड़े ही चाव से किया जाता है और आल्हा आज विश्व का सबसे लंबा गेय पद है । आल्हा शैली के बारे में पंडित ललिता प्रसाद मिश्र जी कहते हैं कि  
आल्हा छंद में लिखी उस समय की अलौकिक वीर गाथाओं को तब से लेकर आज तक लोग गाते चले आ रहे हैं और मजे की बात यह है कि कायर तक आल्हा सुनकर जोश से भर जाते हैं यहां तक कि यूरोपीय महायुद्ध में सैनिकों को जोश से भरने के लिए ब्रिटिश सरकार ने भी इसी आल्हा शैली का सहारा लिया था ।

                         अब हम वापस मंदिर की ओर चलते हैं । मैहर सतना जिले में स्थित एक तहसील है जो इलाहाबाद कटनी रेल खंड पर एक रेलवे स्टेशन भी है मैहर रेलवे स्टेशन से 5 किलोमीटर की दूरी परकोटा पर्वत पर माई शारदा का मंदिर स्थापित है । जहां तक पहुंचने के लिए पक्की सीढ़ियां भी निर्मित है और आधी दूरी तक हम वाहनों के माध्यम से भी पहुंच सकते हैं और पिछले कुछ सालों से रोप-वे की भी व्यवस्था प्रारंभ हो गई है । बिहार में नवरात्रि के समय अत्यधिक भीड़ होती है। 

मैहर सिर्फ मां शारदा देवी के मंदिर के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है , बल्कि हिंदुस्तानी संगीत का एक घराना मैहर घराना के रूप में भी प्रसिद्ध है । भारतीय शास्त्रीय संगीत के उस्ताद अलाउद्दीन खान ने इस घराने की स्थापना की थी, वे यहां पर मैहर महाराज के दरबारी संगीतकार थे । उस्ताद अलाउद्दीन खान स्वयं तो कई वाद्ययंत्रों को बजाने में न केवल पारंगत थे बल्कि उन्होंने कई नए वाद्ययंत्रों का आविष्कार भी किया । उस्ताद अलाउद्दीन खान के शिष्य की बड़ी लंबी सूची है जिसमें कुछ प्रमुख हैं ,उनकी पुत्री अन्नपूर्णा देवी, उनके पुत्र उस्ताद अली अकबर खान एवं पंडित रविशंकर ,उस्ताद आशीष खान पंडित पन्नालाल घोष, पंडित निखिल बनर्जी इत्यादि ।मैहर में कई सीमेंट कारखाने भी स्थापित हैं इसके अलावा आल्हा ऊदल का अखाड़ा और तालाब भी दर्शनीय स्थान है ।
हालांकि मैं और मेरा परिवार कई बार मैहर में मां शारदा का दर्शन कर चुका है लेकिन इस पोस्ट में प्रयुक्त की गई फोटोग्राफ्स हमारी 2012 की यात्रा की है जिसमें हम लोगों ने पूरे परिवार के साथ माई शारदा के दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त किया । एक तरफ से हम लोगों ने पूरी सीढ़ियां चढ़कर ऊपर मंदिर में माई के दर्शन किए परंतु बहन जी की तबीयत कुछ खराब होने की वजह से हम लोगों ने वापसी और ऊपर से कि उसका भी अनुभव बड़ा ही मजेदार रहा । इस पोस्ट में बस इतना ही जय माई शारदा ।

मैहर का शारदा माता मंदिर 
मैहर रेलवे स्टेशन के बाहर हमारा परिवार 
मंदिर की चढ़ाई शुरू होने पर प्रवेश द्वार 
चढ़ाई चढ़ते हुए मेरे माता-पिता 
बीच चढ़ाई से दिखता मैहर शहर 
ऊपर पहुँचते ही खड़ी सीढियाँ 
ऊपर से दिखते प्राकृतिक दृश्य 
दर्शनार्थियों की भीड़ 
ऊपर से दिखता आल्हा-उदल का तालाब 
रोप वे 
माँ शारदा मंदिर और प्रतिमा ( फोटो - साभार  पत्रिका डॉट कॉम )

orchha gatha

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