शनिवार, 7 अक्तूबर 2017

वीर सिंह ने दोस्ती निभाने के लिए किया अबुल फज़ल का क़त्ल (ओरछा गाथा -5 )

माँ बेतवा से साक्षात्कार 
नमस्कार मित्रों ,
अभी तक आपने मेरे द्वारा लिखी गयी ओरछा गाथा के सभी भाग उम्मीद  से अधिक न केवल पसंद किये बल्कि इतना प्रोत्साहित किया कि मैं इस गाथा को इस मुकाम तक ला पाया।  मेरी यह ओरछा गाथा मेरे ब्लॉग की सबसे लोकप्रिय पोस्ट साबित हुई।  रामराजा सरकार और माँ  बेतवा की असीम कृपा सदैव साथ रही।  अभी तक के भागों में आपने माँ बेतवा की जुबानी से बुन्देलाओं का जन्म , बुंदेलखंड की स्थापना , प्रथम राजधानी गढ़कुंडार से लेकर द्वितीय राजधानी ओरछा की स्थापना , ओरछा में अयोध्या से रामराजा का आगमन , रायप्रवीण को अकबर को झुकाना आदि कहानी सुनी अब उससे आगे...... 

बहुत दिनों के बाद आज फुरसत में माँ बेतवा से मिलने का मौका मिला।  कुछ विभागीय व्यस्तता रही तो कुछ अपना आलसी स्वाभाव  भी रहा।  खैर माँ से बेटा कब तक दूर रहता।  माँ की पुकार पर आखिरकार समय निकाल ही लिया।  चांदनी रात में चंदा  मामा ऊपर आसमान में मुस्कुराते से अपनी चंद्र किरणों को माँ बेतवा के लहराते आँचल पर बिखेर रहे थे।  इधर जमीन पर हम ग्रेनाइट की चट्टानों बैठे हुए माँ से संवाद की प्रतीक्षा में लहराती -बल खाती चट्टानों से टकराती बाल-सुलभ चंचलता वाली लहरों के सौन्दर्य में खोये थे।  अभी तक माँ बेतवा ने मुझे ओरछा के उत्थान से लेकर रामराजा के अयोध्या से ओरछा आने की कथा , रायप्रवीण की सौंदर्य और प्रवीणता की कहानी सुनाई थी।  मैं अपने भाग्य पर इठला रहा था  कि मध्य प्रदेश की गंगा कही जाने वाली पूण्य सलिला माँ वेत्रवती (बेतवा ) ने मुझे ओरछा-गाथा सुनाने के लिए चुना।  और इसी ओरछा गाथा की वजह से देश के लगभग 14 राज्यों के घुमक्कडों का महामिलन भी बेतवा तट पर करने और मेजबान बनने का सुअवसर मिला। इस ओरछा गाथा ने न केवल ओरछा को सोशल मीडिया पर चर्चित किया  बल्कि मुझ जैसे यदा-कदा  ब्लॉगर को स्तरीय ब्लॉगर बनने की प्रेरणा मिली।  इसी ओरछा गाथा की वजह से बड़े घुमक्कड़ और ब्लॉगर जगत में मुझ नाचीज ओ एक पहचान मिली।  कुछ मित्रों का कहना है, कि मेरी वजह से ओरछा का नाम हुआ , मगर असलियत में ओरछा गाथा से मुझे पहचान मिली।  चाँदनी रात में ठंडी-ठंडी हवाओं में मैं इन्ही विचारों में खोया हुआ था , मेरे बांये और से एक लहर उठी और मेरे सर के ऊपर से इस तरह से निकल गयी जैसे कोई माँ अपने बच्चे के सर के ऊपर दुलार से हाथ फेर रही हो।  इस जाने-पहचाने अहसास से मेरे ह्रदय के अंतिम छोर तक प्रफुल्लता समा गयी। माँ बेतवा अपनी ममतामयी आवाज़ में बोली - पुत्र ! तुम्हारा बहुत दिनों बाद आगमन हुआ , फिर भी स्वागत है ! और कैसे हो वत्स ?
माँ की आवाज़ से ही कानों में मिसरी सी घुल गयी थी।  मैंने माँ बेतवा के जल को स्पर्श कर आशीर्वाद लिया  और अपना कुशल मंगल सुनाया।  और अधूरी पड़ी ओरछा गाथा को आगे बढ़ाने का निवेदन किया।
माँ बेतवा - पुत्र ! पिछली बार हमने रायप्रवीण की प्रवीणता के आगे मुग़ल बादशाह अकबर को झुकते देखा था।  अब कहानी मुग़ल काल में आगे बढ़ेगी।  जैसा कि पिछली बार देखा था, भले ही अकबर ने अपने साम्राज्य का विस्तार नर्मदा के आगे दक्कन तक कर लिया था , मगर बुंदेलखंड अभी भी बुन्देलाओं की जागीर था।  महाराज मधुकर शाह के सुपुत्र वीरसिंह बुंदेला वर्तमान दतिया (म प्र)  के  पास बड़ौनी जागीर के जागीरदार थे।  आगरा  में मुगले  आज़म जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर को गद्दी  पर बैठे हुए काफी वक़्त हो चुका था , उसके बेटों में गद्दी के लिए बेकरारी बढ़ने लगी।  सबसे बड़े बेटे सलीम ने तो अपने वालिद बादशाह अकबर के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक  दिया।  अकबर  इलाहाबाद के किले में छिपे अपने अपने बेटे सलीम को सबक सिखाने के लिए अपने सेनापति और मशहूर साहित्यकार (आईने अकबरी और अकबरनामा का का लेखक ) और अकबर के नवरत्नों  में से एक अबुल फज़ल के नेतृत्व में बड़ी सेना भेजी।  ये खबर वीरसिंह बुंदेला को  पता  चल  गयी।  और वीर सिंह बुंदेला ने अपने मंत्री और सलाहकार चंपतराय से सलाह ली और इसे एक बेहतरीन मौका मानते हुए ग्वालियर के पास आतरी गांव में अबुल फजल की हत्या कर दी और उसका सिर इलाहाबाद के किले में शहजादे सलीम के सामने अपनी दोस्ती के तोहफे के रुप में किया । शहजादा सलीम वीर सिंह जूदेव के इस कारनामे से बहुत ही खुश हुए और उन्होंने बीर सिंह को अपना दोस्त बनाया । इस तरह बुंदेलों और मुगलों के बीच दोस्ती का एक नया रिश्ता कायम हुआ ।
                                                    आगे चलकर अकबर की मृत्यु के बाद जब शहजादा सलीम  हिंदुस्तान की गद्दी पर मुगल बादशाह के रूप में जहांगीर नाम से बैठे, तो उन्होंने इस दोस्ती को और मजबूत किया और वीर से को ओरछा का राजा घोषित किया । एक बार  जहांगीर  अपने दक्षिण अभियान  से  लौटते समय  वीर सिंह जूदेव  के  अनुरोध पर ओरछा में एक  विशेष महल में ठहरे । इस महल का निर्माण बुंदेला स्थापत्य और मुगल स्थापत्य के सुंदर संयोजन के साथ किया गया पूरे देश में इस तरह के हिंदू और मुस्लिम मिश्रित स्थापत्य के कॉल 127 इमारते हैं, जिनमें वीर सिंह बुंदेला द्वारा बनवाया गया यह जहांगीर महल अपना एक विशिष्ट स्थान रखता है । जहांगीर महल जहां पत्थर पर की गई अद्भुत नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है, वही इसकी पत्थर की सुंदर जालियां भी देशी और विदेशी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं । वीर सिंह जूदेव ने जहांगीर महल की दूसरी तरफ ठीक ओरछा के दूसरे छोर पर एक पहाड़ी के ऊपर लक्ष्मी नारायण मंदिर का निर्माण कराया जिसका स्थापत्य अपने आप में अनूठा है. इस मंदिर को लक्ष्मी के वाहन उल्लू की आकृति में पंख फैलाए हुए बनाया गया ,इसके मुख्य द्वार के ऊपर चोंच द्वारा यह स्पष्ट परिलक्षित होता है । सामने से देखने पर यह मंदिर त्रिभुजाकार नजर आता है परंतु वास्तव में यह चतुर्भुज आकार में है और प्रत्येक भुजा की शिखर पर सहस्त्रदल अंकन है । वर्तमान में यह मंदिर अपनी चित्रकारी के लिए प्रसिद्ध है । वीर सिंह जूदेव के परवर्ती शासकों ने इस मंदिर की दीवारों पर अद्भुत चित्रकारी करवाई जिनमें रामायण,महाभारत के अलावा लोकजीवन, सैन्य जीवन और युद्धों का बड़ा ही मनोहारी चित्रांकन है ।
            वीर सिंह जूदेव बुंदेला साम्राज्य के सभी शासकों में ना केवल सबसे ज्यादा प्रसिद्ध थे , बल्कि योग्य शासक भी थे । वीर सिंह जूदेव ने ओरछा के साथ साथ आसपास के इलाकों में कई महल और किले बनवाएं । वीर सिंह जू देव के समय में बुंदेला स्थापत्य मुस्लिम स्थापत्य के सुंदर संयोजन के साथ और निखरकर सामने आया । बीर सिंह ने ओरछा का किला, झांसी का किला, दतिया का किला दतिया में वीर सिंह महल, धामोनी का किला और आसपास की कई सुंदर इमारतें बनवाई ।
मां बेतवा के मुंह से मैं बड़े ही इत्मीनान से ओरछा के राजा वीर सिंह जूदेव के बारे में सुन रहा था , पर झांसी के किले का नाम सुनकर मेरे कान खड़े हुए और अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए मैंने मां बेतवा से प्रश्न पूछा कि मैं झांसी का किला तो झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के लिए प्रसिद्ध है तो मेरे ख्याल से तो इसे मराठों ने बनवाया होगा ?
मां वेत्रवती मेरी अज्ञानता पर हल्की सी मुस्कुराई जिसका बताओ मुझे लहरों में हुई हलचल से पता चला ।
 मां बोली- पुत्र मराठे बाद में आये । झांसी शहर की स्थापना भी बुंदेलों द्वारा कराई गई और झांसी का किला भी  वीर सिंह जूदेव द्वारा बनवाया गया । अभी कुछ समय पहले एक फिल्म आई थी बाजीराव मस्तानी शायद तुमने भी देखी होगी ।
मां वेत्रवती के मुंह से फिल्म का नाम सुनकर मुझे थोड़ी सी हैरानी हुई परंतु अभी मेरा ध्यान अपनी जिज्ञासा को शांत करने में था, इसलिए मैंने सिर्फ हामी मैं सिर हिलाया। मां आगे बोली इस फिल्म में दिखाया गया कि वीर छत्रसाल जब बुजुर्ग हो गए और उन पर मुगलों ने आक्रमण किया तब उन्होंने बाजीराव पेशवा की सहायता ली और विजय उपरांत उन्हें  बुंदेलखंड का कुछ  क्षेत्र भी 1728 में मराठों को दिया तबसे मराठे  बुंदेलखंड में अंग्रेजों के आने तक राज करते रहे ।
मां के उत्तर से मैं संतुष्ट तो हो गया परंतु बुंदेलों और मराठाओं को छोड़कर मेरे मन में बाजीराव मस्तानी फिल्म की बात घुमने लगी कि आखिर मां वेत्रवती को इस फिल्म की जानकारी कैसे है ?
जब रहा न गया तो मैंने मां बेतवा से आखिरकार पूछी लिया कि माते आपको फिल्मों के बारे में जानकारी कैसे ?
मेरे इस प्रश्न पर मां बेतवा ने अट्टहास किया जिसकी गर्जना मुझे लहरों के साथ सुनाई दी । मां बोली पुत्र तुम मुझसे सदियों पुरानी कहानी सुन रहे हो ,जब मैं इतिहास से परिचित हूं तो क्या वर्तमान से अनभिज्ञ होउंगी ? ना तो मैं फिल्म देखने जाती हूं और ना ही किसी से कुछ पूछने जाती  हूं , मेरे किनारे जो मुसाफिर आते हैं ,  सदियों से उनके ही द्वारा मुझे इतिहास वर्तमान और भविष्य का ज्ञान होता रहता है । हां तुम जैसा जिज्ञासु बहुत कम आता है कि जो मुझसे प्रश्न पूछता है ! वरना मैं तो बस लोगों की सुनती रहती हूं और बहती रहती हूं । चलो तो फिर हम इतिहास के अनंत सागर में फिर से गोता लगाते हैं । वीर सिंह जूदेव बुंदेला साम्राज्य का ना केवल विस्तार कर रहे थे, बल्कि बुंदेला साम्राज्य का समग्र विकास भी कर रहे थे । उनके राज्य में प्रजा भी बहुत सुखी और संपन्न । वीर सिंह जूदेव के बारे में इतना सुनकर मुझे भी बड़ा अच्छा लगा  । चलिए जिन्हें इतिहासकारों द्वारा भुला दिया गया ऐसे प्रजावत्सल शासकों के बारे में तो पता चला । मैंने मां बेतवा से राजा वीर सिंह जूदेव की प्रजावत्सलता की कोई घटना सुनाने का आग्रह किया ।
मेरा आग्रह सुनकर मां बेतवा फिर से अतीत की गहराइयों में गोता लगाने चली गई और काफी देर तक लहरों में कोई हलचल नहीं हुई,आकाश में टिमटिमाते तारे स्थिर जल में इस तरह प्रतीत हो रहे थे , कि मानो आज सारी आकाशगंगा के तारे बेतवा स्नान करने बेतवा के जल में एक साथ उतर आए हो !
अचानक मां बेतवा का स्थिर जल  हिलोरे लेने लगा और एक लहर मेरे समीप से इस तरह से गुजरी जैसे मां ने अपने बच्चों के गालों को वात्सल्य भाव से सहलाया हो ।
मां बेतवा बोली पुत्र राजा वीर सिंह जूदेव का एक पुत्र बाघबहादुर  एक दिन जंगल में शिकार खेलने गया और एक हिरण का पीछा करते करते वह काफी दूर निकल गया और हिरन उसकी आंखों से ओझल हो गया । तभी राजपुत्र ने देखा कि एक योगी इस घने जंगल में तपस्यारत हैं, तो उसने सोचा अवश्य ही इन्होंने मेरे शिकार को भागते हुए देखा होगा । अतः योगी के समीप पहुंचकर राजपुत्र बाघबहादुर  ने योगी से अपने शिकार के बारे में पूछा । परंतु योगी मौन व्रत किए हुए थे, इसलिए उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया । दिन भर से भूखे-प्यासे शिकार के पीछे भागते हुए राजपुत्र बाघबहादुर  बुरी तरह से थक चुका था अतः योगी द्वारा कोई उत्तर ना दिए जाने पर वह क्रोधित हो गया और उसने अपने शिकारी कुत्तों को योगी पर छोड़ देने का आदेश दिया । आदेश का पालन होते ही शिकारी कुत्ते तपस्यारत योगी पर झपट पड़े और कुछ ही देर में योगी का निधन हो गया । जब यह बात वीर सिंह जूदेव तक पहुंची तो उन्होंने दूसरे दिन भरे राजदरबार में सबके सामने अपने पुत्र बाघबहादुर के इस अक्षम्य अपराध की सजा सुनाते हुए कहा कि इस दुष्ट ने जिस तरह इन भूखे कुत्तों को उन आदरणीय योगी के ऊपर छोड़ा उसी तरह  बाघबहादुर जीरों में बांधकर इन भूखे शिकारी कुत्तों के सामने डाल दिया जाए । तो पुत्र आज जहां वर्तमान शासक पुत्र मोह में देश की दुर्गति कर रहे हैं, वही वीर सिंह जूदेव न्याय का एक अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करते हुए अपने स्वयं के पुत्र को मृत्युदंड दिया ।
इतना कहकर माँ बेतवा शांत हो गयी ,उनकी लहरें अब पहले की तरह मचल नहीं रही थी ! लेकिन अभी तक अपने अनुभव से मैं इतना तो समझ ही गया था , कि ये शांति सिर्फ ऊपर ही ऊपर की है।  अंदर घनघोर मंथन चल रहा होगा , या माँ अपनी यादों के भंवर से कोई अद्भुत रहस्य निकालने गयी होंगी।  जब तक पुनः अपने साथ फिर किसी कहानी को लेकर नहीं आती , आप भी मेरी तरह प्रतीक्षा कीजिये न जाने क्या  मिल जाये ....... 
पावन माँ वेत्रवती गंगा (बेतवा)
बेतवा की एक शाम 
वीरसिंह जूदेव और जहांगीर की दोस्ती की मिसाल जहांगीर महल 
बेतवा तट पर बनी वीरसिंह जूदेव की छतरी (समाधि )
जहांगीर महल का भव्य द्वार 

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

हेलीकॉप्टर से माता वैष्णो देवी की यात्रा (भाग 1)

नमस्कार मित्रों, बहुत दिनों के बाद ब्लॉग लिखने बैठा हूँ।  इस 29 जुलाई को मेरे पिताजी असमय ही एक दुर्घटना में हम सब को छोड़कर अनंत यात्रा पर निकल गए। इस कारण  मन बड़ा ही अशांत और दुखी है।  आज की यह पोस्ट मैं अपने पापा जी को समर्पित कर रहा हूँ।  हो सकता है, कि मेरी इस पोस्ट में भावनाएं ज्यादा हो।  पापा जी के साथ पूरे परिवार  ने एक साथ आखिरी यात्रा  इस अप्रैल को की थी।  इस बार मेरे सबसे छोटे भाई अभिषेक (मोनू ) के कारण  ही माता वैष्णो देवी की यात्रा का कार्यक्रम बन पाया था।  हम लोग वैष्णो देवी की यात्रा पर दूसरी बार जा रहे थे।  पिछली बार मोनू अपनी परीक्षा के कारण  पूरे  परिवार के साथ वैष्णो देवी नहीं जा पाया था।  इसलिए पिछले कई वर्षों से वह सपरिवार यात्रा के लिए प्रयासरत था।  लेकिन हर बार किसी न किसी कारण से माता का बुलावा नहीं आ पा रहा था।  खैर इस बार भी जैसे-तैसे कई विघ्नो के बाद अंततः 9  अप्रैल  जाने का तय हो गया था।  मम्मी -पापा , मंझला भाई निकेश (सोनू ) और मोनू  हिमगिरि एक्सप्रेस से बक्सर से आ रहे थे  मैं ,  मेरी पत्नी निभा , एक वर्षीय पुत्र अनिमेष और नाना जी ओरछा से लखनऊ पहुंचे।  वहां से हमने हिमगिरि एक्सप्रेस में पूरे परिवार का संग पा लिया।  हमारी ट्रैन अपनी रफ़्तार से चली जा रही थी , और साथ ही चल रहा था , यादों का कारवां ! हमारा पूरा परिवार एक साथ बहुत काम ही मौकों पर मिल पाता है।  इसलिए ये यात्रा भी हमारे  लिए किसी उत्सव से कम नहीं थी।  पूरे परिवार के साथ मेरी पत्नी और नन्हे बालक अनिमेष की पहली यात्रा थी।  अनिमेष के लिए तो नाना जी, पापा जी और मम्मी के साथ सोनू-मोनू हाथों हाथ लिए थे।  खैर 10 अप्रैल को हम सभी लोग जम्मू तवी रेलवे स्टेशन उतरे।  पिछली बार हमने जम्मू में ही होटल लिया था , फिर बस से कटरा गए थे।  लेकिन इस बार तो जम्मू से कटरा के लिए रेल लाइन चालू हो गयी थी।  तो फिर बस और टैक्सी  वालों की छुट्टी हो गयी।  हमारे वाहट्सएप्प और फेसबुक ग्रुप "घुमक्कड़ी दिल से "  सदस्य और मित्र प्रकाश यादव जी की सलाह से हमने भी कटरा रुकने का निश्चय किया।  प्रकाश जी ने अपने संपर्क से कटरा में हमारे लिए होटल भवानी इंटरनेशनल में कमरे  तक बुक करा दिया।  जम्मू से हमने भी ट्रैन पकड़ी।  रस्ते में उधमपुर  स्टेशन  पड़ा , यहां हमारे ग्रुप के ही एक बुजुर्ग सदस्य रमेश शर्मा जी रहते है।  पर जम्मू कश्मीर  में अन्य राज्यों के प्रीपेड सिम काम नहीं करते , इसलिए उनसे नहीं मिल पाए।  खैर कटरा बस स्टैंड के पीछे बने होटल में हम लोग शाम को पहुंचे। रास्ते की थकावट के कारण हमने सुबह चढ़ाई करने  फैसला लिया।  सुबह नानाजी की उम्र और मेरी श्रीमती जी द्वारा चढ़ाई चढ़ने में असमर्थता व्यक्त करने के कारण हमने हेलीकॉप्टर सेवा से जाने का फैसला किया । सुबह जब हेलीकॉप्टर सेवा टिकट काउंटर पर पहुंचे तो काफी भीड़ लगी हुई थी और सिर्फ सीनियर सिटीजन और उनके साथ एक अटेंडेंट कोही टिकट दिया जा रहा था। हालांकि जिन लोगों ने ऑनलाइन टिकट बुक किया था उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई सीधे हेलीपैड पर पहुंच कर बजन कराया और टिकट लेकर उड़ते बने । खैर कुछ देर इंतजार करने के बाद एक आशा बंधी। 1070 रुपए प्रति व्यक्ति के हिसाब से हमने टिकट खरीदें। यहां आपको एक उचित सलाह देना चाहूंगा कि यदि आपको भी माता वैष्णो देवी हेलीकॉप्टर से जाना है तो अपने साथ जितने भी लोग हैं सभी की आइडेंटी प्रूफ विशेषकर आधार कार्ड जरूर साथ रख ले क्योंकि मेरी मम्मी और श्रीमती के पास कोई आइडेंटी प्रूफ नहीं था जिसे कारण थोड़ी सी परेशानी हुई । पहले से ऑनलाइन टिकट करवाने पर यहां के 3-4 घंटे बच जाते हैं । टिकट कटवाने के बाद हम लोग ऑटो करके हेलीपैड पहुंचे जहां दो अलग अलग हेलीकॉप्टर सेवाओं के लिए दो अलग काउंटर बने हुए थे अलग हमारी टिकट पर हेलीकॉप्टर कंपनी का नाम दर्ज था इसलिए उस कंपनी के काउंटर पर पहुंचे वहां बजन कराया क्योंकि वजन के हिसाब से ही एक बार में सवारियां ले जा रहे थे। ज्यादा वजन के लोग तो कम सवारी और कम वजन के लोग तो ज्यादा सवारी वैसे अधिकतम एक बार में 6 सवारी ही ले जा रहे थे। काउंटर से हम हेलीकॉप्टर कंपनी की गाड़ियों से ऊपर पहाड़ी पर बने हेलीपैड पर पहुंचे। हम 6 लोग दो हेलीकॉप्टर में बैठे । जब हेलीकॉप्टर ऊपर उठना चालू हुआ तो किसी बड़े झूले में बैठने का जो अनुभव होता है उस तरह का अनुभव हमें भी हुआ। हालांकि थोड़ा सा डर भी लग रहा था क्योंकि नीचे बड़े बड़े पहाड़ और खाई थी अगर अगर गिरे तो नीचे नहीं सीधे ऊपर पहुंचते। खैर माता रानी का नाम लिया और डर दूर और हम उड़न छू। सामने सफेद बर्फ की चादर ओढ़े पीरपंजाल की खूबसूरत पहाड़ियां दिख रही थी बहुत ही मनमोहक नजारा था लेकिन जब तक हम इन नजारों को जी भर कर देखते तब तक हम सांझीछत पर बने हेलीपैड पर लैंड करने वाले थे। कुल 15 मिनट की इस हवाई यात्रा का अनुभव निराला था, हमारे 1 साल के सुपुत्र भी इस यात्रा के सहयात्री थे। हमसे पहले वाले हेलीकॉप्टर में मेरे दोनों भाई निकेश और अभिषेक  हेली पैड पर पहुंच चुके थे और अभिषेक ने तो फोटोग्राफी प्रतिबंधित होने के बावजूद हमारे लैंड होने का वीडियो अपने मोबाइल में बनाया। हेलीपैड पर उतरने के बाद लगभग 2 से ढाई किलोमीटर पैदल यात्रा की चढ़ाई बाकी थी । हम लोग जय माता दी के नारे लगाते हुए माता के दरबार की ओर बढ़ने लगे । मेरे साथ एक समस्या यह थी कि मेरा 1 साल का बेटा मेरे अलावा किसी और के पास जा ही नहीं रहा था इसलिए मुझे उससे अपनी गोद में लेकर चढ़ाई करनी पड़ी ।
अब मातारानी क दरबार पहुँचने के  पूर्व उनकी कथा संक्षेप में जानते है।


 वैष्णो देवी उत्तरी भारत के सबसे पूजनीय और पवित्र स्थलों में से एक है। यह मंदिर पहाड़ पर स्थित होने के कारण अपनी भव्यता व सुंदरता के कारण भी प्रसिद्ध है। वैष्णो देवी भी ऐसे ही स्थानों में एक है जिसे माता का निवास स्थान माना जाता है। मंदिर, 5,200 फीट की ऊंचाई और कटरा से लगभग 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। हर साल लाखों तीर्थ यात्री मंदिर के दर्शन करते हैं।यह भारत में तिरुमला वेंकटेश्वर मंदिर के बाद दूसरा सर्वाधिक देखा जाने वाला धार्मिक तीर्थस्थल है। वैसे तो माता वैष्णो देवी के सम्बन्ध में कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं लेकिन मुख्य 2 कथाएँ अधिक प्रचलित हैं।
Mata Vaishno devi ki kahani
माता वैष्णो देवी की  कथा
मान्यतानुसार एक बार पहाड़ों वाली माता ने अपने एक परम भक्तपंडित श्रीधर की भक्ति से प्रसन्न होकर उसकी लाज बचाई और पूरे सृष्टि को अपने अस्तित्व का प्रमाण दिया। वर्तमान कटरा कस्बे से 2 कि.मी. की दूरी पर स्थित हंसाली गांव में मां वैष्णवी के परम भक्त श्रीधर रहते थे। वह नि:संतान होने से दु:खी रहते थे। एक दिन उन्होंने नवरात्रि पूजन के लिए कुँवारी कन्याओं को बुलवाया। माँ वैष्णो कन्या वेश में उन्हीं के बीच आ बैठीं। पूजन के बाद सभी कन्याएं तो चली गई पर माँ वैष्णो देवी वहीं रहीं और श्रीधर से बोलीं- ‘सबको अपने घर भंडारे का निमंत्रण दे आओ।’ श्रीधर ने उस दिव्य कन्या की बात मान ली और आस – पास के गाँवों में भंडारे का संदेश पहुँचा दिया। वहाँ से लौटकर आते समय गुरु गोरखनाथ व उनके शिष्य बाबा भैरवनाथ जी के साथ उनके दूसरे शिष्यों को भी भोजन का निमंत्रण दिया। भोजन का निमंत्रण पाकर सभी गांववासी अचंभित थे कि वह कौन सी कन्या है जो इतने सारे लोगों को भोजन करवाना चाहती है? इसके बाद श्रीधर के घर में अनेक गांववासी आकर भोजन के लिए एकत्रित हुए। तब कन्या रुपी माँ वैष्णो देवी ने एक विचित्र पात्र से सभी को भोजन परोसना शुरू किया।
भोजन परोसते हुए जब वह कन्या भैरवनाथ के पास गई। तब उसने कहा कि मैं तो खीर – पूड़ी की जगह मांस भक्षण और मदिरापान करुंगा। तब कन्या रुपी माँ ने उसे समझाया कि यह ब्राह्मण के यहां का भोजन है, इसमें मांसाहार नहीं किया जाता। किंतु भैरवनाथ ने जान – बुझकर अपनी बात पर अड़ा रहा। जब भैरवनाथ ने उस कन्या को पकडऩा चाहा, तब माँ ने उसके कपट को जान लिया। माँ ने वायु रूप में बदलकरत्रिकूट पर्वत की ओर उड़ चली। भैरवनाथ भी उनके पीछे गया। माना जाता है कि माँ की रक्षा के लिए पवनपुत्र हनुमान भी थे। मान्यता के अनुसार उस वक़्त भी हनुमानजी माता की रक्षा के लिए उनके साथ ही थे। हनुमानजी को प्यास लगने पर माता ने उनके आग्रह पर धनुष से पहाड़ पर बाण चलाकर एक जलधारा निकाला और उस जल में अपने केश धोए। आज यह पवित्र जलधारा बाणगंगा के नाम से जानी जाती है, जिसके पवित्र जल का पान करने या इससे स्नान करने से श्रद्धालुओं की सारी थकावट और तकलीफें दूर हो जाती हैं।





इस दौरान माता ने एक गुफा में प्रवेश कर नौ माह तक तपस्या की। भैरवनाथ भी उनके पीछे वहां तक आ गया। तब एक साधु ने भैरवनाथ से कहा कि तू जिसे एक कन्या समझ रहा है, वह आदिशक्ति जगदम्बा है। इसलिए उस महाशक्ति का पीछा छोड़ दे। भैरवनाथ साधु की बात नहीं मानी। तब माता गुफा की दूसरी ओर से मार्ग बनाकर बाहर निकल गईं। यह गुफा आज भी अर्धकुमारी या आदिकुमारी या गर्भजून के नाम से प्रसिद्ध है। अर्धक्वाँरी के पहले माता की चरण पादुका भी है। यह वह स्थान है, जहाँ माता ने भागते – भागते मुड़कर भैरवनाथ को देखा था। गुफा से बाहर निकल कर कन्या ने देवी का रूप धारण किया। माता ने भैरवनाथ को चेताया और वापस जाने को कहा। फिर भी वह नहीं माना। माता गुफा के भीतर चली गई। तब माता की रक्षा के लिए हनुमानजी ने गुफा के बाहर भैरव से युद्ध किया।
भैरव ने फिर भी हार नहीं मानी जब वीर हनुमान निढाल होने लगे, तब माता वैष्णवी ने महाकाली का रूप लेकर भैरवनाथ का संहार कर दिया। भैरवनाथ का सिर कटकर भवन से 8 किमी दूर त्रिकूट पर्वत की भैरव घाटी में गिरा। उस स्थान को भैरोनाथ के मंदिर के नाम से जाना जाता है। जिस स्थान पर माँ वैष्णो देवी ने हठी भैरवनाथ का वध किया, वह स्थान पवित्र गुफा’ अथवा ‘भवन के नाम से प्रसिद्ध है। इसी स्थान पर माँ काली (दाएँ), माँ सरस्वती (मध्य) और माँ लक्ष्मी (बाएँ) पिंडी के रूप में गुफा में विराजित हैं। इन तीनों के सम्मिलत रूप को ही माँ वैष्णो देवी का रूप कहा जाता है। इन तीन भव्य पिण्डियों के साथ कुछ श्रद्धालु भक्तों एव जम्मू कश्मीर के भूतपूर्व नरेशों द्वारा स्थापित मूर्तियाँ एवं यन्त्र इत्यादी है। कहा जाता है कि अपने वध के बाद भैरवनाथ को अपनी भूल का पश्चाताप हुआ और उसने माँ से क्षमादान की भीख माँगी।



माता वैष्णो देवी जानती थीं कि उन पर हमला करने के पीछे भैरव की प्रमुख मंशा मोक्ष प्राप्त करने की थी, उन्होंने न केवल भैरव को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति प्रदान की, बल्कि उसे वरदान देते हुए कहा कि मेरे दर्शन तब तक पूरे नहीं माने जाएँगे, जब तक कोई भक्त मेरे बाद तुम्हारे दर्शन नहीं करेगा। उसी मान्यता के अनुसार आज भी भक्त माता वैष्णो देवी के दर्शन करने के बाद 8 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई चढ़कर भैरवनाथ के दर्शन करने को जाते हैं। इस बीच वैष्णो देवी ने तीन पिंड (सिर) सहित एक चट्टान का आकार ग्रहण किया और सदा के लिए ध्यानमग्न हो गईं। इस बीच पंडित श्रीधर अधीर हो गए। वे त्रिकुटा पर्वत की ओर उसी रास्ते आगे बढ़े, जो उन्होंने सपने में देखा था, अंततः वे गुफ़ा के द्वार पर पहुंचे, उन्होंने कई विधियों से ‘पिंडों’ की पूजा को अपनी दिनचर्या बना ली, देवी उनकी पूजा से प्रसन्न हुईं, वे उनके सामने प्रकट हुईं और उन्हें आशीर्वाद दिया। तब से, श्रीधर और उनके वंशज देवी मां वैष्णो देवी की पूजा करते आ रहे हैं।
लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन के बाहर
निर्माणाधीन चारबाग मेट्रो स्टेशन 
दादा अपने पोते की तस्वीर उतारते हुए 
रास्ते के नजारे 


रास्ते  में एक नदी का दृश्य 
सुरंग से गुजरती हमारी ट्रैन 
हरियाली और रास्ता 
जम्मू से कटरा जाते हुए बीच में मिला उधमपुर स्टेशन 
आखिरकार पहुँच  ही गए 
खूबसूरत कटरा स्टेशन (पीछे त्रिकूट पर्वत )
एक सेल्फी कटरा स्टेशन के बाहर 
रात्रि में कटरा से दिखता  माँ का दरबार 
होटल भवानी इंटरनेशनल , कटरा (जहाँ  हम लोग रुके )

माता के दरवार का रास्ता 
हेलीकाप्टर के लिए पहली पर्ची 

हेलिपैड पर बने काउंटर 
हमारे उड़नखटोले का टिकट 
हमारे उड़नखटोले के पहले दर्शन 
उड़ने की तैयारी 
सांझी छत पर उतरने के बाद माता के दरबार  की ओर  
आज की पोस्ट में इतना ही अगली पोस्ट में माता के दरबार तक की यात्रा। .. तब तक के लिए जय माता दी 

रविवार, 16 जुलाई 2017

पवित्र गुफा में बाबा गुप्तेश्वर नाथ के दर्शन के साथ एक अद्भुत रोमांचक यात्रा (अंतिम भाग )

इस श्रृंखला की पिछली तीन पोस्ट से इतना तो आप जान ही गए होंगे , कि  बाबा गुप्तेश्वर के धाम तक पहुंचना इतना आसान नहीं है।  अगर आपने पिछली पोस्ट नहीं पढ़ी तो नीचे  लिंक दे रहा हूँ , क्लिक करके पढ़ लीजिये तभी असली आनंद आएगा।

 अगर पढ़ चुके है , तो बहुत अच्छी बात है , बम भोले करते हुए आगे बढ़ते है।
                                            तो अँधेरी रात में जंगल के बीच  से कठिनतम चढ़ाई करके हम लोग बोल बम का नारा  लगते हुए आएगी बढे।  कई बाधा  आई पर जब बाबा का सहारा हो तो फिर मुश्किल कैसी  ! अब सुबह हो चुकी थी , बिना पेट खाली  किये हम लोग आगे बढ़ रहे थे , सुबह की ठंडी और सुहावनी बयार की मस्ती में बड़े आराम से चल रहे थे।  पर ये आराम ज्यादा देर नहीं टिका।  अब सूरज नारायण धीरे धीरे उग्र होने लगे थे , और शरीर पसीना छोड़ने लगा था।  रस्ते में कई बरसाती झरने मिले तो ऐसे ही एक झरने पर कुछ लोगो ने नहाया।  अब लगातार चलना मुश्किल हो रहा था , तो सुस्ता -सुस्ता के आगे बढ़ रहे थे।  सुबह से नींबू  वाली चाय के अलावा कुछ नहीं लिया था।  अब सुबह होने से हमें लौटने  वाले बम  भी मिलने लगे , जिन्हे देख कर लगने लगा कि  हम करीब आ गए।  अब हम पहाड़ की कठिन उतराई  उतर चुके थे।  उतरते ही कुछ दुकाने मिली  जहाँ हमने हम लोग नींबू  वाली चाय पीने  रुके या इसी बहाने सुस्ताने लगे।  सबसे बुरी हालत मेरी और संजय सिंह जी की हो चली थी।  हमारी शारीरिक मेहनत की आदत लगभग ख़त्म सी हो गयी है  इसलिए यहां इतना चलना अखर रहा था।  जबकि बाकि लोग मजे से चल रहे थे।  खैर चाय पीकर सब चलने तैयार हो गए , हम दोनों भी मजबूरन चल पड़े।  मन तो बहुत चलने को कर रहा था , मगर तन तो साथ दे। 
                                                           आगे दुर्गावती नदी मिली , ये नदी ऊपर से बहुत खूबसूरत चमकती हुई चाँदी  की लकीर सी दिख रही थी, लेकिन आस आने पर तेज प्रवाहनी थी , इसका कारन एक दिन पहले हुई बारिश थी।  स्थानीय लोगों ने या कहे नक्सलियों ने  सीमेंट के पिलर बनाकर लकड़ियों के द्वारा एक अस्थायी पुल  का निर्माण किया था , जो तेज बारिश में नदी का पानी बढ़ने पर बह जाता है।   अभी तक पुरे रस्ते में हमें दर्शनार्थी ो खूब मिले मगर उनके लिए प्रशासन की तरफ से सुविधा के नाम पर हाथ सलाई शून्य ही मिला।  लेकिन इतनी कठिनाई के बाद भी लोग श्रद्धा और भक्ति के बल पर बाबा के दर्शन करने आते है।  हैरानी की बात इतनी कठिनाई में महिलाएं , बच्चे और बुजुर्ग भी आते है।  खैर अपने जीवन में पहली बार लकड़ी के इस तरह के पुल को देखा था।  इस सेतु के निर्माणकर्ताओं ने बाकायदा टोल बसूलने का इंतजाम कर रखा था।  प्रति व्यक्ति मात्र  दस रुपये।  कुछ लोगों ने बिना पैसे दिए ही नदी की  धार में से नदी पार करने की कोशिश की , मगर धार तेज होने से अंततोगत्वा दस रूपया खर्च कर नदी आर करने में ही भलाई समझी।  हम भी इस रोमांचक जुगाड़ू पुल  से नदी पार की।
                                                        अब चढ़ाई- उतराई की जगह समतल जमीन ने ले ली थी।  पर जंगल साथ ही था।  कुछ किलोमीटर चलने पर पगडण्डी से कुछ चौड़ा रास्ता मिला , जिसमे ट्रेक्टर के चक्के  के निशान भी मिले।  राहगीरों से पूछने पर पता चला कि  ये चेनारी वाला रास्ता है।  बरसात होने के पहले स्थानीय लोग ट्रेक्टर से अपनी दुकानों के सामान और रसद सामग्री ले आते है।  और बरसात होते ही दुर्गावती नदी चेनारी वाला रास्ता बंद कर देती है।  हालाँकि महाशिवरात्रि के समय दोनों रास्ते  खुले होते है।  सावन और फागुन के अलावा बाबा के दर्शन बंद रहते है।  फागुन में आसान रास्ते  से तो आया जा सकता है, मगर प्रकृति की इतनी सुंदरता छूट जाती है। आप कुछ देर के लिए अपनी आंखे बंद कर कल्पना कीजिये, कि आप हरे भरे पहाड़ से गुजर रहे है , आसपास के पेड़-पौधे बारिश से नहाकर आपका स्वागत कर रहे।  चलते-चलते पहाड़ो की चोटियों से झरने फूट  पड़े , उनका झर-झर  का कोलाहल शोर नहीं पैदा कर रहा बल्कि संगीत की मधुर तान लग रहा है , इस संगीत में साथ देने पक्षियों की चहचहाट भी  है।  ऊपर नीले  आसमान में रुई केफाहे से सफ़ेद बादल माहौल को चार चाँद लगा रहे है।  सोचिये जब ये सब कल्पना में ही इतना प्यारा लग रहा है , तो वास्तविकता में कितना अच्छा लगेगा।  तो इन नजारो का लुत्फ़ उठाये हुए हमारा कारवां आगे बढ़ रहा था।  लौट रहे लोगो की एक बात बड़ी अच्छी लगी , कि  जिससे भी पूछो - कितनी दूर और चलना है ?  तो पिछले चार-पांच किलोमीटर से हमें एक ही जवाब मिल रहा था।  बस ज्यादा नहीं एक-दो किलोमीटर ! तो वापिसी कर रहे श्रद्धालु जाने वालों का मनोबल नहीं तोडना चाहते।  हम भी एक-दो किलोमीटर की आस में जब एक-दो किलोमीटर आगे बढ़ते और पूछते तो वही ढाक के तीन पात ! 
                        खैर अब सचमुच बाबा के नजदीक पहुँच गए , क्योंकि अब  दुकानें  ज्यादा मात्रा में दिखने लगी थी।  लोग भी भीड़ के रूप में दिखने लगे थे।  बोल बम का नारा गूंज रहा था।  लेकिन दुकानों तक पहुंचने  दुर्गावती नदी फिर रास्ता रोके बह रही थी , ये नदी तीन चार बार रास्ते  में मिली।  हालाँकि यहां ज्यादा गहरी नहीं थी , तो हमने भी दूसरो  की देखादेखी में पैदल ही नदी पार  की।  नदी के ठन्डे पानी से थकान  भरे पैरों  को बड़ा आराम मिला।  कई लोग यही स्नान कर रहे थे , और यही से जल भर रहे थे।  तो कुछ लोग जंगल के दूसरी तरफ प्लास्टिक के लौटे लेकर जा रहे थे।  एक दुकान पर पूछने पर पता चला।  कि  लोग शीतल कुंड से जल भरकर ला रहे है, और वही स्नान भी कर रहे है।  शीतलकुण्ड की दुरी 100 मीटर जंगल के अंदर बताई।  पर  हम  हिम्मत हार चुके थे।  फिर सोचा जब यहां तक  चुके है, तो 100 मीटर और चल लेते है।  
                                                                               एक दुकान से प्लास्टिक के छोटे छोटे लोटे ख़रीदे ताकि जल भरकर बाबा को चढ़ाया जा सके।  अब मन से चल पड़े क्यूंकि तन तो थक चुका था।  शीतलकुण्ड के नाम से ऐसा लग रहा था , कि  कोई कुंड या पोखर होगा , जिसे शीतलकुण्ड कहा जाता है।  लेकिन वहां पहुंचकर नए नज़ारे देखने मिले।  सामने ऊँचे पहाड़ से दो झरने से पानी रहा था।  नजारा देखकर सारी थकान उड़न छू हो गयी।  पैरों में पंख लग गए।   पहले जहाँ 100 मीटर लम्बी दूरी लग रही अब  दूरी ख़त्म हो गयी।  वास्तव में इस नज़ारे की हमें उम्मीद  ही नहीं थी  ये  हमारे लिए बोनस पॉइंट था  संजय जी  हमे शीतलकुण्ड का जिक्र कर रहे , पर हमारे दिमाग में कुंड ही था , झरना नहीं।  अब हम सब तैयार हो गए जल प्रपात स्नान के लिए।  हमने दो बार में तीन-तीन लोग करके स्नान किया।  तीन लोग स्नान करते बाकी तीन लोग सामान की रखवाली करते हुए फोटो खींच रहे थे।  ऐसी जगहों पर सामान का सुरक्षा करना जरुरी होती , वरना सावधानी हटी और दुर्घटना घटी।  अब जहाँ भारी मन से आये थे , वहां से मन भर ही नहीं रहा था।  हम लोग लगभग डेढ़ घंटे नहाये।  फिर जल लेकर चल पड़े बाबा की गुफा ऒर...  अब थकान गायब हो चुकी थी।
                                                अस्थायी दुकानों से होते हुए हम बाबा गुप्तेश्वरनाथ की रहस्यमयी  गुफा की बढ़ चले।  बाबा गुप्तेश्वर नाथ की गुफा के पहले बाहर एक चबूतरा बनाकर मंदिर जैसा नया  निर्माण किया गया है।  उसके बाद अंदर पूरी गुफा प्राकृतिक है।  गुफा के अंदर जनरेटर के माध्यम से बल्ब जलाकर रौशनी की व्यवस्था की जाती है।  अंदर जाने पर ऑक्सीजन की कमी होने लगती है , इसलिए आपातकालीन व्यवस्था के लिए ऑक्सीजन सिलिंडर की भी व्यवस्था भी की गयी है।  हम लोग भी गुफा के अंदर बाबा का जयकारा लगाकर प्रवेश कर गए।  अंदर  जगह की कमी थी , और बल्ब जलने के कारण  गर्मी भी लग रही थी।  जैसे जैसे गुफा के अंदर जा रहे थे , वैसे ही दम घूंट सा रहा था।  इससे पता चलता है, ऑक्सीजन वाकई में कम हो रही थी।  सबकी साँस अपने आप ही तेज चलने लगी थी।  खैर हम अंदर बाबा गुप्तेश्वरनाथ के समीप पहुँच ही गए।  वहां बाबा का प्राकृतिक शिवलिंग था।  इसका आकार सामान्य शिवलिंग जैसे नहीं था।  शिवलिंग के पास एक दाढ़ी वाले साधु बाबा भी बैठे थे।  आश्चर्य इस बात का कि  सामान्य व्यक्तियों का जहाँ थोड़ी देर में ही दम घुंटने लगा , वहां ये साधु बाबा इतनी देर से कैसे बैठे होंगे ? खैर लोग दम घुटने के कारन जल्दी ही प्लास्टिक वाले लौटे सहित जल चढाकर वापिस लौट रहे थे  शिवलिंग के आसपास बहुत से प्लास्टिक के लौटे पड़े हुए थे।  ये देखकर मुझे बड़ा बुरा लगा।  एक तरफ हम ईश्वर के दर्शन के लिए इतने कष्ट सहनकर यहां तक आये और दूसरी तरफ ईश्वर  के पास उन गन्दगी कर रहे है।  कितनी ओछी मानसिकता है ? हम भी बाबा को जल चढ़ाकर लौटे और साथ अपने प्लास्टिक के लौटे भी वापिस लाये। बाहर वो लौटे दुकानदार को वापिस कर दिए। 
                                                                                 अब दर्शन करने के बाद भोजन की इच्छा जोर मार रही थी।  तो एक अच्छी सी दुकान देखकर डेरा जमाया।  यहां पूड़ी तौलकर मिल रही थी।  अतः हम लोगों ने डेढ़ किलोग्राम पूड़ी और सब्जी के साथ जलेबी का भी आर्डर दिया।  भरपेट भोजन के बाद कुछ देर आराम किया और निकल पड़े वापिसी के लिए।  लौटना भी उसी रस्ते से था, जिससे गए थे।  हाँ ईश्वर ने इतना साथ दिया कि  बारिश होती रही तो ठन्डे ठन्डे मौसम में भीगते हुए वापिस लौटे।  बीच बीच में जब धुप निकल आती थी , तो पसीने में भीग जाते थे।  आखिरी उतराई उतरते समय पैर  कांपने लगे थे , लगा कि कहीं लड़खड़ाकर गिर न जाऊ , मगर बाबा की कृपा से सभी लोग सुरक्षित पनारी पहुँच गए।  इस तरह अपने ही गृह राज्य में इतनी शानदार घुमक्क्ड़ी कभी नहीं की थी।  इसके लिए विशेष धन्यवाद के पात्र संजय कुमार सिंह जी है।  हम लोगो को दोनों ओर (पनारी-गुप्तेश्वर धाम-पनारी ) से आने-जाने में कुल समय 12 घंटे लगे।  हालाँकि संजय जी हमेशा इससे दोगुने समय में गए , मगर इस बार तेज चलने वालों के साथ फंस गए थे।  इस यात्रा में सबसे ज्यादा हालत हम दोनों की ही ख़राब थी , क्योंकि चलने की आदत ख़त्म जो  हो  गयी है ।  
गुप्तेश्वर धाम कब जाया जा सकता है -  सिर्फ साल में दो बार महाशिवरात्रि (फ़रवरी में ) के समय और सावन                                      (जुलाई-अगस्त )के पूरे  महीने में ही जाया जा सकता है।  बाकि समय यात्रा बंद रहती है।  
कैसे जाये -  
                 वायु मार्ग - नजदीकी हवाई अड्डे पटना और वाराणसी है।  
               रेल मार्ग -सासाराम मुगलसराय -गया रेल लाइन में एक जंक्शन है।  जहाँ से दिल्ली - हावड़ा रूट की                  गाड़िया गुजरती है।  
             सड़क मार्ग - सासाराम राष्ट्रिय राजमार्ग क्रमांक 2 ( जीटी रोड ) पर स्थित है।  सासाराम से आप टेम्पो ,                   शेयरिंग टैक्सी करके 40 किमी  दूर पनारी तक जा सकते है।  वहां से पैदल ट्रैक करके जान पड़ेगा।  
क्यों जाये ? -  यदि  आपको धार्मिक, प्राकृतिक , साहसिक यात्राओं में थोड़ी भी रूचि है , तो आपको गुप्तेश्वर                          धाम अवश्य जाना चाहिए।  
शीतलकुण्ड जल प्रपात का आनंद 

गुफा का प्रवेश द्वार 

जलप्रपात का एक मनमोहक नजारा 
दूर से दीखता जल प्रपात 

बाबा के भक्त बोल बम के नारे के साथ 
गुफा के अंदर का दृश्य 

गुफा के अंदर 

बाबा गुप्तेश्वर नाथ का प्राकृतिक शिवलिंग 




पार्किंग का एक दृश्य
आपातकालीन व्यवस्था के तहत ऑक्सीजन सिलिंडर भी रखे थे।  

गुफा में प्रवेश करने के पहले 
वापिसी भी आसान न थी 

बाबा का आशीर्वाद और ऐसे दृश्यों के लिए जो कष्ट सही वो कम थे। 
 कुछ फोटोग्राफ हमारे मित्र अभ्यानंद सिन्हा जी ने अपने मित्र वीरेंद्र कुमार जी से लेकर इस पोस्ट के लिए दिए ,  उनका हार्दिक धन्यवाद।  बाबा गुप्तेश्वर नाथ सब कृपा करे।

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

रहस्मयी गुफा वाले गुप्तेश्वर धाम की यात्रा (भाग 3)

पता नहीं क्यों आज एक साल हो गया , लेकिन कई बार चाह कर भी बाबा गुप्तेश्वर नाथ की यात्रा और दर्शन लिख नहीं पाया  इसकी शुरुआत पिछले साल ही कर दी थी , लेकिन शुरूआती दो भाग लिखने के बाद जब तीसरा  बाबा गुप्तेश्वर नाथ के बारे में बताने की बारी आती , तो कुछ न कुछ विघ्न आ जाते थे।  जैसे बाबा गुप्तेश्वर नाथ से लौटते समय ही झरने में नहाते समय मोबाइल से फोटो लेने के कारण मोबाइल में पानी  चला गया , और मोबाइल ख़राब हो गया।  अच्छा ये रहा कि मोबाइल ख़राब होने के पहले ही मैंने फोटो संजय सिंह जी और अनुज मोनू को फोटो शेयर कर दिए थे।  बाद में मोबाइल  होने से वो फोटो गायब हो गए।  और भी कई बाधाएं  आती रही और बाबा गुप्तेश्वर नाथ जी गुप्त ही बने रहे।  खैर ठीक एक साल बाद सावन के महीने में पहले सोमवार को ये पोस्ट लिखने बैठा हूँ  . इससे पहले की राम कहानी आप इन लिंक को क्लिक करके पढ़ सकते है।
अगर आप इस यात्रा को शुरू से पढ़ना चाहते है , तो इन लिंक्स पर क्लिक करके पढ़ सकते है।  (वैसे मजा तो तभी आएगा जब आप इस यात्रा को शुरू से ही पढ़े।  आगे आपकी की मर्जी।
गुप्ता बाबा की यात्रा की शुरुआत (पहला भाग )
माँ ताराचंडी और महाभारतकालीन शिव जी (दूसरा भाग )

अपनी यात्रा पर ले चलने के पहले आपको गुप्तेश्वर धाम के बारे में कुछ जानकारी बता दूँ

बिहार के रोहतास जिले (सासाराम) के गुप्तेश्वर धाम (गुप्ता धाम) गुफा में स्थित शिवलिंग की महिमा का बखान आदिकाल व पौराणिक है। मान्यता है कि इस गुफा में जलाभिषेक करने से भक्तों की सभी मन्नतें, मनोकामनाएं  पूरीं हो जाती हैं।
पुराणों में वर्णित भगवान शंकर व भस्मासुर से जुड़ी कथा को जीवंत रखे हुए ऐतिहासिक गुप्तेश्वरनाथ महादेव का गुफा मंदिर आज भी रहस्यमय बना हुआ है। देवघर के बाबाधाम की तरह गुप्तेश्वरनाथ यानी गुप्ताधाम बेहद श्रद्धा व शक्ति संपन्न है।
यहां रामायण कालीन धार्मिक नगरी बक्सर (जहां राम-लक्ष्मण को विश्वामित्र यज्ञ रक्षा के लिए ले गए थे) से पवित्र गंगाजल लेकर शिवलिंग पर चढ़ाने की परंपरा है। रोहतास में अवस्थित विंध्य पर्वत श्रृख्ला की कैमूर पहाड़ी के जंगलों से घिरे गुप्ताधाम गुफा की प्राचीनता के बारे में कई पुरानी सूचनाएं हैं। हालांकि, इसकी बनावट को देखकर पुरातत्वविद् अब तक यह तय नहीं कर पाए हैं कि यह गुफा मानव निर्मित है या प्राकृतिक।
कई पुस्तकों के लेखक इतिहासकार श्याम सुंदर तिवारी कहते हैं कि गुफा के नाचघर व घुड़दौड़ मैदान के बगल में स्थित पाताल गंगा के पास दीवार पर उत्कीर्ण शिलालेख, जिसे श्रद्धालु ब्रह्मा के लेख के नाम से जानते हैं, को पढ़ने से संभव है, इस गुफा के कई रहस्य खुल जाएं।
गुफा में गहन अंधेरा होता है, बिना कृत्रिम प्रकाश के भीतर जाना संभव नहीं है। पहाड़ी पर स्थित इस पवित्र गुफा का द्वार 18 फीट चौड़ा एवं 12 फीट ऊंचा मेहराबनुमा है। गुफा में लगभग 363 फीट अंदर जाने पर बहुत बड़ा गड्ढा है, जिसमें सालभर पानी रहता है। इसे पातालगंगा कहा जाता है।
गुफा के अंदर प्राचीन काल के दुर्लभ शैलचित्र आज भी मौजूद हैं। इसके कुछ आगे जाने के बाद शिवलिंग के दर्शन होते हैं। गुफा के अंदर अवस्थित प्राकृतिक शिवलिंग पर हमेशा ऊपर से पानी टपकता है। इस पानी को श्रद्धालु प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।

शिव ने यहीं ली थी भस्मासुर से बचने के लिए शरण

इस स्थान पर सावन के महीने के अलावा सरस्वती पूजा और महाशिवरात्रि के मौके पर मेला लगता है। जनश्रृतियों के मुताबिक, कैलाश पर्वत पर मां पार्वती के साथ विराजमान भगवान शिव ने जब भस्मासुर की तपस्या से खुश होकर उसे सिर पर हाथ रखते ही भस्म करने का वरदान दिया था।
भस्मासुर मां पार्वती के सौंदर्य पर मोहित होकर शिव से मिले वरदान की परीक्षा लेने के लिए उन्हीं के सिर पर हाथ रखने के लिए दौड़ा। वहां से भागकर शंकरजी यहां की गुफा के गुप्त स्थान में छुप गए।
भगवान विष्णु से शिव की यह विवशता देखी नहीं गई और उन्होंने मोहिनी रूप धारण कर भस्मासुर का नाश किया। उसके बाद गुफा के अंदर छुपे भोले बाहर निकले।
सासाराम के वरिष्ठ पत्रकार विनोद तिवारी कहते हैं, शाहाबाद गजेटियर में दर्ज फ्रांसिस बुकानन नामक अंग्रेज विद्वान की टिप्पणियों के अनुसार, गुफा में जलने के कारण उसका आधा हिस्सा काला होने के सबूत आज भी देखने को मिलते हैं।
सावन में एक महीने तक बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और नेपाल से हजारों शिवभक्त यहां आकर जलाभिषेक करते हैं। बक्सर से गंगाजल लेकर गुप्ता धाम पहुंचने वाले भक्तों का तांता लगा रहता है।
(साभार -वेब दुनिया और अन्य स्रोत ) 
अब अपनी रामकहानी शुरू 
तो अभी तक आपने पढ़ा था , कि हम लोग सासाराम और ताराचंडी देवी के दर्शन के बाद सासाराम रेलवे स्टेशन के माइक्रो वेब के ऑफिस में संजय कुमार सिंह जी का इंतजार कर रहे थे, तभी बड़ी जोर की बारिश होने लगी थी।  रात के लगभग 10 बजे संजय जी आये और हम लोग निकल पड़े अपनी फोर्ड फिगो कार से सासाराम से बाबा गुप्तेश्वर नाथ धाम की  ओर।  शहर के बाहर होने पर संजय  ने मुझे अपनी गाड़ी के  ऊपर जल रही नीली बत्ती बंद करने का आग्रह किया,  क्यूंकि अब हम नक्सली क्षेत्र की ओर जा रहे थे।  और नीली बत्ती उस क्षेत्र में खतरनाक हो  सकती थी।  इधर रात गहरा रही थी, और मेरा रोमांच भी बढ़ता जा रहा था।  भीगी रात में गांव की सड़क पर पुराने सदाबहार गानों के साथ ही हमारी कार आगे बढ़ रही थी।  एक तो गांवों में लोग जल्दी सो जाते है , और बारिश हो जाने के कारण  हमें गांव सन्नाटे से भरे ही मिल रहे थे, और इन सन्नाटों को चीर कर हमारी कार आगे बढ़ रही थी। मैं खुद कार ड्राइव कर रहा था , मेरे बगल में बैठकर संजय जी मार्गदर्शक की भूमिका में थे।  बारिश हो जाने से सड़क के आस पास के खेत पानी से लबालब भरे थे , चूँकि ये धान  का क्षेत्र था, इसलिए ये पानी धान के लिए बढ़िया था।  रास्ते  में भी कई जगह नाले भरे मिले , जिन्हे अपनी कार से पार करना पड़ा।  कई बार रास्तें को लेकर भ्रम की स्थिति निर्मित हुई , लेकिन संजय जी के आत्मविश्वास पर विश्वास कर बम भोले कर निकल पड़े।  हालाँकि कई जगह संजय जी भी रात  होने के कारण  डगमगाए मगर इतनी रात को कोई बताने वाला भी नहीं था।  बीच में एकाध टेम्पो वाले मिले जो सासाराम से बम लेकर पनियारी (गुप्तेश्वर धाम का बेस कैंप ) जा रहे।  इन टेम्पो को देखकर हमारी भी जान में जान आई , और हम भी तेजी से बोल बम का नारा  लगाकर निकल पड़े।  भोले के भरोसे हम रात के लगभग एक बजे पनारी  पहुंचे। चेनारी वाला रास्ता बरसात की वजह से अभी बंद रहता है।  इसलिये पनारी से दो पहाड़ पार कर लम्बे रस्ते से पैदल ही जाना पड़ता है।  चेनारी वाले मार्ग से ट्रेक्टर आदि से लोग शिवरात्रि के समय जाते है।   यहाँ हमें चहल-पहल मिली।  लोग प्रसाद और रसद की दुकानों में सो रहे थे , कुछ बरसाती नालें में नहा रहे थे , तो कुछ झोला उठाकर बाबा गुप्तेश्वर से मिलने निकल पड़े थे।  हमने भी गाड़ी पार्किंग में लगाई , और साठ रूपये की पार्किंग की रसीद कटवाई।  कहते है , यहां सारी व्यवस्था नक्सली ही करते है।  हमें भी यहां बिहार सरकार का कोई नुमाइंदा नजर नहीं आया।  मैंने सबसे पहले अपनी कार से नीली बत्ती निकालकर गाड़ी के अंदर रखी।
                                                                            अब संजय जी की सलाह थी , कि कुछ देर आराम किया जाये फिर सुबह चार बजे के लगभग चढ़ाई शुरू की जाये।  जबकि मेरा मानना  था, कि अगर सोये तो खोये।  फिर सुबह धूप भी हो जाएगी , तो चढ़ाई मुश्किल होगी।  अभी आलस  भी नहीं है।  सबने मेरे विचार का समर्थन किया , और ऊपर पहाड़ी पर कुछ टोर्च की रौशनी  भी दिख रही थी , अतः हमारा भी मनोबल बढ़ा।  फिर सबने अपने कपडे निकालकर गाड़ी में रखे और बोल बम वाले गेरुए वस्त्र धारण कर बम बन गए।  पास ही एक दुकान से चीन वाली टॉर्च  खरीदी और चल पड़े बाबा गुप्तेश्वर नाथ से मिलने।  दो नाले पार कर चढ़ाई शुरू हुई।  शुरुआत ही खड़ी चढ़ाई से हुई।  अँधेरे में खड़ी चढ़ाई देखकर मन डोलने लगा।  तभी हमारे पीछे से महिलाओं का एक दल चढ़ाई करते हुए निकला , जिनमे कुछ बुजुर्ग महिलाएं भी थी।  अब चूँकि खड़ी चढ़ाई थी, और रास्ता संकरा था।  इसलिए हमें महिलाओं को आगे निकलने देने के लिए खड़ा होना पड़ा।  तो टार्च की रौशनी में बुजुर्ग महिलाओं का जोश देखकर हम भी जोश में आ गए।  और बोल बम का जयकारा लगाकर तीखे-नुकीले पत्थरों के संकरे खड़ी चढ़ाई वाले रस्ते पर अँधेरे में टॉर्च  की रौशनी में आगे बढ़ने लगे।  पहले तो चढ़ाई चढ़ने में मजा आ रहा था , लेकिन एकाध किलोमीटर चढ़ने के बाद थकावट लगने लगी।  अतः  छह लोगो के दल में मैं और संजय जी सबसे पीछे हो गए।  रास्ते में जब चढ़ाई के बाद समतल मैदान आया तो कुछ आराम मिला।  हालाँकि हम मैदान में नहीं बल्कि पहाड़ के ऊपर चल रहे थे।  रास्ते में छोटे छोटे नाले और झरने मिल रहे थे।  अचानक एक बांध मिला जिसके आगे रास्ता ही समझ नहीं आ रहा था।  फिर कुछ देर इंतजार करने पर पीछे से कुछ और लोग आये तब उनके पीछे पीछे हम भी आगे बढे।  तभी एक काला  सा बड़े आकार वाला बिच्छू दिखा , जिसे पहले रास्ता पार करने दिया।  उसके बाद हम आगे बढ़े।  तीन-चार किलोमीटर चलने के बाद कुछ चाय-नाश्ते की दुकानें  मिली।  हालाँकि दूध न मिलने के कारण यहाँ नींबू  वाली चाय (ब्लैक टी ) मिल रही थी।  यहां चाय पीकर कुछ देर सुस्ताये और फिर चल दिए। आगे बढ़ने पर एक तालाबनुमा संरचना मिली , जिसके किनारे सीमेंट से पक्के बने थे।  सीमेंट की उस पट्टी पर से हम लोग पार कर आगे बढे।  लग रहा था, कि ये रात ख़त्म ही नहीं होगी।   जैसे -जैसे आगे बढ़ते जा रहे थे,  वैसे-वैसे शरीर पर  थकान और नींद हावी हो रही थी।  खैर आगे एक जगह चट्टानों पर मैं पसर ही गया।  मुझे पसरा देखकर बाकी  लोग भी मजबूरन वही रुक गए।  खुले आसमान की रजाई और नीचे  चट्टानों का बिछौना पाकर तुरंत नींद आ गयी।
                                                                              लेकिन एक घण्टे भी न हुए थे , और आसमान से पानी टपकने लगा।  अब जागना मज़बूरी थी।  हालाँकि अब सुबह का उजाला होने लगा था।  ठंडी ठंडी बयार चल रही , पानी की बूंदे  गाल सहला रही थी।  झोला उठाकर चल पड़े।  आगे दूसरे पहाड़ और उनके बीच की खाई स्पष्ट दिख रही थी।  लेकिन खाई में रुई  के फाहे से बादल  जब टहलते नजर आये तो मन झूम उठा।  मैंने दौड़कर उनकी फोटो खींची।  सुबह इतनी शानदार होगी सोचा न था।  आगे फिर एक चाय की दुकान पर नींबू  वाली सबने चाय पी  . चाय की दुकान के आगे लाल मुंह के बन्दर और काले मुंह वाले लंगूर एक साथ झुण्ड में बैठे थे।  सामान्यतः लंगूर और बन्दर एक साथ नहीं मिलते।  खैर दुकानदार ने इनसे सतर्क रहने को कहा था।  हमारे सामने ही एक व्यक्ति से बिस्कुट छीन कर बन्दर भागे थे।  हम लोगो  ने इनसे बचने के लिए अपने हाथों में लकड़ियां उठा ली।   इन बंदरों और लंगूरों के बच्चे अपनी अपनी माँओं  के सीने  से चिपके हुए थे।  वैसे बच्चे किसी भी जीव  के हो ,बहुत प्यारे लगते है।  मैं भी तो अपना तीन माह का बच्चा घर छोड़कर आया था। सुबह के सुहावने मौसम से थकान  दूर हो गयी गयी थी , इसलिए कदम तेजी से आगे बढ़ रहे थे।  अब सीधी मगर खतरनाक उतराई  चालू हो गयी थी।  सामने सफ़ेद बादल  मस्ती में घूम रहे  थे।  मैंने सोचा अब उतरने के बाद  ठौर मिल जायेगा।  मगर मोहि कहाँ विश्राम...असली रोमांच  बाकी था।  
रास्ते में इस तरह मिनरल वाटर का आनंद लेते चले ।

ऊंची नीची है डगरिया...

सीधी और खतरनाक उतराई


बांये से संजय जी , चाचा जी , अखिलेश जी , मोनू, टिंकू और मैं 

बम भोले

रास्ते के मनमोहक नजारे
बन्दर और लंगूर एक साथ 

आवारा बादल
अगली पोस्ट में दर्शन कीजिये बाबा गुप्तेश्वर नाथ के और एक ऐसे नजारे के जो हम लोगो के लिए भी सरप्राइज था।  बम भोले 

शनिवार, 8 जुलाई 2017

तिरंगे के तले , घुमक्कड़ यार मिले

अभी एक मेरी दिल्ली यात्रा में दो भाग पढ़ चुके है।  (जिन्होंने नहीं पढ़ा वो दी गयी लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते है -  लाल किले की ओर 
छतरपुर में बहन जी के घर जाकर दिल्ली की दिवाली का लुत्फ़ उठाया  मैंने पहली बार किसी पर्व को दिल्ली जैसे महानगर में मनाया ।  रात में चारो तरफ आतिशबाजी हो रही थी , पटाखों का शोर था।   अमावस्या की घनघोर अँधेरी रात्रि में तारों की जगह धुंए का गुबार दिख रहा था।  खैर खुली हवा में साँस लेने आदी  हम जल्द ही इस दमघोंटू माहौल से आज़ादी पाने के लिए सो गए।  दिल्ली आगमन से ही आ रहे बुखार ने  फिर आगोश में ले लिया। अमित तिवारी जी तो अपने बच्चों को लेकर राजस्थान भ्रमण पर निकल गए ताकि दिल्ली के इस प्रदुषण से बचा जा सके।  

अगली सुबह यानि 31  अक्टूबर 2016 को नींद सोनीपत निवासी घुमक्कड़ मित्र  संजय कौशिक जी के कॉल ने अलार्म का काम किया और हम सोकर उठे।  अपने दिल्ली और आसपास  के घुमक्कड़  दोस्तों से मिलने की प्लानिंग शुरू।  अब मिलने के लिए किस जगह इकठ्ठा हुआ जाये , इस को लेकर चर्चा चल रही थी।  क्यूंकि कुछ लोग सोनीपत , गुरुग्राम से आने वाले थे , कुछ नॉएडा , ग़ज़ियाबाद से तो कुछ दिल्ली से ही आ रहे थे।  दिवाली के कारण ऑटो, कैब कम ही उपलब्ध थी , अतः मेट्रो ही एक सहारा थी।  इसलिए ऐसी जगह चुननी  थी  जो सबको पास पड़े।  खैर जगह फाइनल की गयी , कनॉट प्लेस का सेंट्रल पार्क।  खैर मैं पहुँच गया , छतरपुर मेट्रो स्टेशन , जहाँ सोनीपत से संजय कौशिक जी , गुरुग्राम से महेश सेमवाल जी तो करावल नगर से अनिल दीक्षित जी अपनी इनोवा से आने वाले थे।  मिलने की उत्सुकता इतनी ज्यादा थी, कि समय से पहले ही पहुंच गया था।  अब इंतजार की घड़ियां काटे न कटे।  अंततः प्रतीक्षा समाप्त हुई , और वो आये  .... इन सभी से पहली बार मिल रहा था  . देखते ही गले लग गए .. जैसे कबके बिछड़े .. यहाँ  आके मिले ।  फिर सेमवाल जी के सुझाव पर सरोजनी नगर की ओर इनोवा से निकल पड़े , वहां के प्रसिद्द पकोड़े खाने के लिए। पकोड़े वाकई स्वादिष्ट थे।  यहां लहसुन, प्याज ,अदरक के अलावा भी कई तरह के पकोड़े मिल रहे थे।   पकोड़ो की दुकान पर जब चर्चा हुई , कि लग ही नहीं रहा , हम पहली बार मिल रहे।  ये सुनकर कौशिक को पहली बार मिलने का आभास हुआ , तो फिर से गले मिले।  खैर कई तरह की बातें हुई।  कौशिक जी और अनिल भाई को अपनी ड्यूटी पर जाना था।  इसलिए सेमवाल जी और मैं वही रुक गया और अनिल भाई अपनी इनोवा में कौशिक जी को लेकर ड्यूटी पर निकल लिए।  मैं और सेमवाल जी मेट्रो  से राजीव चौक स्टेशन उतरे , फिर सेंट्रल पार्क पहुंचे .. लेकिन मायूसी हाथ लगी।  आज बुधवार के दिन पार्क मेंटेनस के लिए  रहता है।  तभी बीनू कुकरेती उर्फ़ विजय कुकरेती उर्फ़ रमता जोगी जी का कॉल आया कि वो भी कुछ देर में सेंट्रल पार्क पहुँच रहे है।  तो थोड़ा इंतजार किया , कि छरहरे शरीर वाले गढ़वाली पंडित रमता जोगी जी आ ही गए।  अब भरत-मिलाप के बाद निर्णय लिया गया , कि पालिका बाजार के पार्क पर डेरा जमाया जाये।
अब हम पास ही बने पालिका बाजार के ऊपर बने पार्क में पहुँच गए।  पालिका बाजार भारत का पहला भूमिगत बाजार है।  फ़िलहाल ये बाजार अपने सस्ते सामानों के लिए विख्यात है।  इसका एक कारण  चोरी का माल यहां बिकना भी है।  खैर मेरे लिए अभी अपने घुमक्कड़ मित्रो से मिलना जरुरी था , इसलिए पालिका बाजार से नजरे दो-चार न हो सकी।  पालिका बाजार में डेरा ज़माने के बाद एक -एक करके कमल कुमार सिंह , रुपेश शर्मा जी  (ग्रेटर नॉएडा से ) , सचिन त्यागी जी ( गाजियाबाद से ) आ गए।  सेमवाल जी  ने पालिका बाजार से ही एक गोल टावर नुमा ईमारत को बताते हुए बताया , कि ये भारत का पहला घूमता हुआ रेस्टोरेंट है , फ़िलहाल इसमें कम ही रौनक है।  अब जब सब लोग इकट्ठे हो ही गए तो चर्चाएं घुमक्कड़ी की चलने लगी। मन बड़ा ही प्रसन्न था , आखिर एक दूसरे से अनजान लोग जब किसी आभासी माध्यम (सोशल मीडिया ) से परिचित हो तो ख़ुशी कुछ और ही होती है। रुपेश जी अपने इलाके की प्रसिद्द बालूशाही लेकर आये थे, सचिन की अलग मिठाई लेकर आये थे।  बीनू भाई अपने सोनी के कैमरे से इस यादगार पल को कैद कर रहे थे।  हमारी पृष्ठभूमि में सेंट्रल पार्क का विशालकाय राष्ट्रिय ध्वज तिरंगा माहौल को एक अलग ही रंग भर रहा था।  सबसे मिलने पर किसी को भी नहीं लग रहा था , कि हम पहली बार मिल रहे है।  मेरे मन में तो अलग ही ख़ुशी थी, कि पहले भी दिल्ली आया तो रिश्तेदारों से मिला।  अबकी बार नए रिश्ते बने।  मिलने के बाद बिछड़ना भी तो पड़ता , आखिरकार फिर से जो मिलना है।    खैर चर्चाओं के बाद सब अपने अपने धाम के लिए निकल पड़े .... 
अब हम तीन लोग बचे मैं  मेरी इस दिल्ली यात्रा में छाये रहे कमल कुमार जी और बीनू भाई।  तो कमल भाई अपनी आदतानुसार एक बार में हमे ले गए जो उनके एक पहाड़ी मित्र का था।  फिर कमल भाई  जो खमीर उठे जौ के रस में सराबोर हुए तो महफ़िल उठने का नाम ही ले।  जैसे तैसे बीनू भाई और मैंने उन्हें वहां से बाहर  लेकर आये तो ऑटो से रात में मुझे इंडिया गेट और सचिवालय की सैर कराने ले आये  . रस्ते भर उनकी गजल गायकी सुनते आये  . बड़ी मुश्किल से मुझे छतरपुर छोड़ा , फिर बहन के यहाँ खाना खाया , और शादीपुर के लिए निकला , क्यूंकि सुबह साढ़े छह बजे नई  दिल्ली स्टेशन से  झाँसी के लिए शताब्दी एक्सप्रेस पकड़नी थी।  सुबह ध्रुव के साथ जब शादीपुर मेट्रो स्टेशन पहुंचा तो इतनी सुबह कोई मेट्रो नहीं थी।  मजबूरन एक ऑटो किया और स्टेशन पहुंचकर शताब्दी एक्सप्रेस में सवार  हो गया  अपने साथ कई अनूठी यादें लेकर ....... 
हाँ , इस यात्रा ने एक नई यात्रा का बीज बो दिया था , जहाँ एक जगह पर इससे भी ज्यादा घुमक्कड़ मित्रों को मिलना था  जानने के लिए आगे दी गयी लिंक पर क्लिक कीजिये। ........  महामिलन की पूर्वकथा ; असंभव से संभव तक
पकोड़ों का आनंद लेते हुए हम लोग 


सेंट्रल पार्क में लहराता हमारा तिरंगा 
लो पहुँच गए पालिका बाजार 

बांये से सचिन त्यागी, कमल सिंह, रुपेश शर्मा , महेश सेमवाल और मैं 



अब चलने की तैयारी 

फिर मिलेंगे चलते-चलते 

orchha gatha

बेतवा की जुबानी : ओरछा की कहानी (भाग-1)

एक रात को मैं मध्य प्रदेश की गंगा कही जाने वाली पावन नदी बेतवा के तट पर ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा हुआ. बेतवा की लहरों के एक तरफ महान ब...