रविवार, 2 जून 2019

ब्राह्मणों के गोत्रों की जानकारी




ब्राह्मणों की कहानी  अपनी एक पुरानी पोस्ट में ब्राह्मणों के बारे जानकारी दी थी, जिसे पाठकों द्वारा जबरदस्त प्रतिसाद मिला । मित्रों, आइये आज हम ब्राह्मणों के सभी गोत्रों के विषय में जानने का प्रयास करें ।।

गोत्र ज्ञान -  गोत्र सामान्यतः एक प्रतीक होता है, कि किसी व्यक्ति या वंश की उत्पत्ति कहाँ से हुई । ब्राह्मणों के अधिकांश वंश ऋषियों से ही उत्पन्न हुए है । इसलिये अधिकांश गोत्रों के नाम ऋषियों के नाम पर ही है ।

मित्रों, उन ११५ ऋषियों के नाम, जो कि ब्राह्मणों के गोत्र भी है.......

१.अत्रि गोत्र,
२.भृगुगोत्र,
३.आंगिरस गोत्र,
४.मुद्गल गोत्र,
५.पातंजलि गोत्र,
६.कौशिक गोत्र,
७.मरीच गोत्र,
८.च्यवन गोत्र,
९.पुलह गोत्र,
१०.आष्टिषेण गोत्र,
११.उत्पत्ति शाखा,
१२.गौतम गोत्र,
१३.वशिष्ठ और संतान (क) पर वशिष्ठ गोत्र, (ख)अपर वशिष्ठ गोत्र, (ग) उत्तर वशिष्ठ गोत्र, (घ)
पूर्व वशिष्ठ गोत्र, (ड) दिवा वशिष्ठ गोत्र !!!
१४.वात्स्यायन गोत्र,
१५.बुधायन गोत्र,
१६.माध्यन्दिनी गोत्र,
१७.अज गोत्र,
१८.वामदेव गोत्र,
१९.शांकृत्य गोत्र,
२०.आप्लवान गोत्र,
२१.सौकालीन गोत्र,
२२.सोपायन गोत्र,
२३.गर्ग गोत्र,
२४.सोपर्णि गोत्र,
२५.शाखा,
२६.मैत्रेय गोत्र,
२७.पराशर गोत्र,
२८.अंगिरा गोत्र,
२९.क्रतु गोत्र,
३०.अधमर्षण गोत्र,
३१.बुधायन गोत्र,
३२.आष्टायन कौशिक गोत्र,
३३.अग्निवेष भारद्वाज गोत्र, ३४.कौण्डिन्य गोत्र,
३५.मित्रवरुण गोत्र,
३६.कपिल गोत्र,
३७.शक्ति गोत्र,
३८.पौलस्त्य गोत्र,
३९.दक्ष गोत्र,
४०.सांख्यायन कौशिक गोत्र, ४१.जमदग्नि गोत्र,
४२.कृष्णात्रेय गोत्र,
४३.भार्गव गोत्र,
४४.हारीत गोत्र,
४५.धनञ्जय गोत्र,
४६.पाराशर गोत्र,
४७.आत्रेय गोत्र,
४८.पुलस्त्य गोत्र,
४९.भारद्वाज गोत्र,
५०.कुत्स गोत्र,
५१.शांडिल्य गोत्र,
५२.भरद्वाज गोत्र,
५३.कौत्स गोत्र,
५४.कर्दम गोत्र,
५५.पाणिनि गोत्र,
५६.वत्स गोत्र,
५७.विश्वामित्र गोत्र,
५८.अगस्त्य गोत्र,
५९.कुश गोत्र,
६०.जमदग्नि कौशिक गोत्र, ६१.कुशिक गोत्र,
६२. देवराज गोत्र,
६३.धृत कौशिक गोत्र,
६४.किंडव गोत्र,
६५.कर्ण गोत्र,
६६.जातुकर्ण गोत्र,
६७.काश्यप गोत्र,
६८.गोभिल गोत्र,
६९.कश्यप गोत्र,
७०.सुनक गोत्र,
७१.शाखाएं गोत्र,
७२.कल्पिष गोत्र,
७३.मनु गोत्र,
७४.माण्डब्य गोत्र,
७५.अम्बरीष गोत्र,
७६.उपलभ्य गोत्र,
७७.व्याघ्रपाद गोत्र,
७८.जावाल गोत्र,
७९.धौम्य गोत्र,
८०.यागवल्क्य गोत्र,
८१.और्व गोत्र,
८२.दृढ़ गोत्र,
८३.उद्वाह गोत्र,
८४.रोहित गोत्र,
८५.सुपर्ण गोत्र,
८६.गालिब गोत्र,
८७.वशिष्ठ गोत्र,
८८.मार्कण्डेय गोत्र,
८९.अनावृक गोत्र,
९०.आपस्तम्ब गोत्र,
९१.उत्पत्ति शाखा गोत्र,
९२.यास्क गोत्र,
९३.वीतहब्य गोत्र,
९४.वासुकि गोत्र,
९५.दालभ्य गोत्र,
९६.आयास्य गोत्र,
९७.लौंगाक्षि गोत्र,
९८.चित्र गोत्र,
९९.विष्णु गोत्र,
१००.शौनक गोत्र,
१०१.पंचशाखा गोत्र,
१०२.सावर्णि गोत्र,
१०३.कात्यायन गोत्र,
१०४.कंचन गोत्र,
१०५.अलम्पायन गोत्र,
१०६.अव्यय गोत्र,
१०७.विल्च गोत्र,
१०८.शांकल्य गोत्र,
१०९.उद्दालक गोत्र,
११०.जैमिनी गोत्र,
१११.उपमन्यु गोत्र,
११२.उतथ्य गोत्र,
११३.आसुरि गोत्र,
११४.अनूप गोत्र,
११५.आश्वलायन गोत्र !!!!!

कुल संख्या १०८. ही है, लेकिन इनकी छोटी-छोटी ७ शाखा और हुई है ! इस प्रकार कुल मिलाकर इनकी पुरी संख्या ११५ है ! मैं स्वयं वशिष्ठ गोत्र से हूँ ।
आज की पोस्ट में इतना ही ।

गुरुवार, 9 मई 2019

गंगा जी कहिन : अहिल्या का उद्धार (बक्सर गाथा -2)



अहिरौली गंगा घाट (बक्सर , बिहार ) चित्र प्रतीकात्मक है।  
इस श्रृंखला की पहली पोस्ट में आपने पढ़ा, कैसे मेरे और मां गंगा के बीच संवाद शुरु हुआ और मैंने उनसे कैसे बक्सर का प्रारंभिक इतिहास जाना । परंतु मेरा प्रश्न अनुत्तरित रह गया था , कि भगवान राम ने कैसे अहिल्या का उद्धार किया ?  
चूँकि मैं जीवन यापन के लिए मां गंगा से सैकड़ों किलोमीटर दूर बेतवा किनारे ओरछा में रहता हूं और साल में एक या दो बार ही आना हो पाता है, इसलिए मां गंगा से  मुलाकात अधूरी रही और महीनों तक यह प्रश्न मेरे मन में भ्रमण करता रहा, कि आखिर भगवान श्री राम अपने गुरु विश्वामित्र के साथ जब गौतम ऋषि के आश्रम पहुंचे होंगे तो वह दृश्य कैसा होगा और उस स्त्री को जिसको उसके स्वयं तपस्वी पति ने छोड़ दिया हो ,आखिर भगवान ने कैसे उस पर अपनी करुणा दिखाई होगी ?
 मां गंगा की कृपा बहुत जल्दी मुझ पर हुई और उन्होंने अपने तट पर मुझे जल्दी ही बुला लिया और इस बार मैं फिर हाजिर था।  अपने उन्हीं प्रश्नों या जिज्ञासाओं के उत्तर को पाने के लिए और मां गंगा के बक्सर स्थित उसी रामरेखा घाट पर मैं पहुंचा जहां कभी भगवान श्री राम अपने अनुज लक्ष्मण और गुरु विश्वामित्र के साथ स्नान करते थे। मैं मां गंगा के आंचल के  एक छोर पर प्रतीक्षारत बैठा था , कि कब मां गंगा अपनी कृपा मुझ पर बरसा दे  ! और महीनों से अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर मुझे मिले।  मां गंगा की कृपा मुझ पर हुई और गंगा की अविरल धारा से आवाज आई-  हे पुत्र ! आखिर तुम्हें आना ही पड़ा !  मैं हाथ जोड़कर नतमस्तक खड़ा था और मैंने कहा कि क्या ऐसा हो सकता है कि आप बुलाएं और आपका यह अनुग्रहित पुत्र आए ना ।
इसके पश्चात मैंने मां गंगा से अपना वही पुराना प्रश्न दोहराया कि आज मां बताइए पाषाण बनी अहिल्या से कैसे मिले प्रभु राम ? 
कुछ देर की शांति  के पश्चात गंगा की लहरें  शांत हुई और कुछ देर के बाद मां गंगा  बोली - मैं  त्रेता युग में पहुंच गई थी  और मुझसे बोली - पुत्र मुझे अच्छे से याद है, वह दिन जब ऋषि गौतम और उनकी पत्नी की  कथा महर्षि विश्वामित्र ने राम को सुनाई और राम ने अहिल्या के लांछन और अपमान की कथा सुनकर अपने गुरुदेव से कहा - कि मैं उस देवी के दर्शन करना चाहूंगा गुरुदेव !  गुरुदेव ने कुछ कहा नहीं केवल गर्व से देखा था राम की ओर और राम के निकट पहुंच कर उनके कंधे पर हाथ रख कर दूर आकाश की ओर निहारा और अपने शिष्य के मुख से उस तिरस्कृत और लोक निर्वासित महिला के लिए देवी का संबोधन सुन बोले कि आज तुम में मैं अपना आप में मेरा विस्तार देख रहा हूं।   कुछ क्षण  तक महर्षि विश्वामित्र आत्म मुग्ध से खड़े रहे और राम की ओर देखते हुए बोले उसे भी तुम्हारी ही प्रतीक्षा है।  राम ! अपमान और उपेक्षा ने उसकी चेतना को लगभग नष्ट कर दिया है, मनुष्यों की छाया से भी वह डरती है , किसी को दूर से ही देख कर छिपने या भागने का प्रयत्न करती है ,डरती है,  न जाने क्या अपशब्द सुनने पड़े ! चेतना का केवल यही प्रमाण शेष रह गया है।  समाज  उसे दूषित करने वालों की लोग पूजा करता है।   ! पुरुष जो ठहरे शक्तिशाली जो ठहरे वे छल कर सकते हैं ! लूट सकते हैं !दूसरों को अपमानित कर सकते हैं ! और जिन्हें चलते लूटते और अपमानित करते हैं, उन्हीं को इन सब के लिए दोषी भी सिद्ध कर सकते हैं।  आश्चर्य है !  जो सिरजता है, गढ़़ता है लोक  को जीवन और अवलंबन देता है, वही सबसे अधिक अपमानित भी होता है वह धरती हो,स्त्री हो या नदी  हो सबकी एक नियति है । महर्षि विश्वामित्र और उनके दोनों होनहार शिष्य धीरे धीरे मेरे किनारे ही उस स्थान पर पहुंचे जहां पर अहिल्या जीवित होते हुए भी पाषाण की तरह शापित थी।  राम ने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए थे और दूर किसी स्त्री की छाया दिख रही थी, वह हाथ जोड़े उसी दिशा में चलते रहे लक्ष्मण भी उनका अनुगमन करके उनके साथ उसी तरह चल रहे थे, संभवत उन्हें भी लगा था कि वह व्यक्ति अन्य लोगों से भिन्न है ,  वह ना तो अपने स्थान से हिली थी और ना भागी थी।  संभव है उसे आंखों से कुछ दिख ही  ना रहा हो या संभव है कि उसमें हिलने की शक्ति ही ना रह गई हो ! नहीं ! वह शायद इधर देख ही नहीं पा रही थी,  मौन बैठी थी।  किसी सोच में डूबी थी। उसके निकट पहुंचकर राम उसके चरणों में लेट गए थे और बोली आपने बहुत दुख झेला है मां ! मैं समस्त पुरुष जाति की ओर से आपसे क्षमा मांगने आया हूं ! हे देवी मैं आपको अपमानित करने वाली उस दम्भी पुरुष जाति का प्रतिनिधि आपसे दंड मांगने आया हूं ।
उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था।   यदि राम के शब्द उसके कानों में पड़ भी रहे थे, तो उनका अर्थ शायद उसकी समझ में नहीं आ रहा था ! वह जड़ सी एकटक राम को देखी जा रही थी ! नहीं,  उसके कानों में कोई ध्वनि आवश्यक टकराई थी उसने बोलने का प्रयत्न किया था,  होठ हिले थे, पर शब्द बाहर नहीं आ पा रहे थे।   कोई मरणासन्न व्यक्ति जैसे कुछ कहने का प्रयत्न करें और उसकी आवाज एक अस्पष्ट फुसफूसाहट बनकर रह जाए और बहुत ध्यान देने पर कुछ समझ में आए वैसे ही उसने कहा था - मैं लंछिता हूँ !  पतिता हूं !  उसने राम के सिर को अपनी दुर्बल अंगुलियों से कुछ इस तरह छुआ था, जैसे उठाने का प्रयत्न कर रही हो !
                                               और फिर वही शब्द 'पतिता  ' .. आप पतित नहीं हो सकती मां , जो पतित होते हैं,  वह अपने जघन्य कृत्य पर भी अपने को पतित नहीं कहते।  वह अपने पापों  को लेकर गर्व करते हैं , उनकी चेतना अहंकार से इतनी मलिन हो चुकी होती है , कि वे अपने पातकों को समझ ही नहीं पाते।  जिनमें पतित होने का बोध है,  जो उन अहंकारियों द्वारा पातिकी कहीं जाते हैं।  वे या तो अज्ञान अपज्ञान या व्यवस्था के कारण उनके ही पापों और पातकों का बोझ धोने को बाध्य कर दिए जाते हैं । राम ने प्रतिवाद करते हुए कहा था ।
                                             अहिल्या की समझ में कुछ नहीं आ रहा था।   वह केवल आश्चर्य से राम को निहार रही थी राम ने कुछ स्पष्ट स्वर में एक एक शब्द पर रुकते हुए और एक एक शब्द का स्पष्ट उच्चारण करते हुए फिर कहा  " तुम पतित नहीं हो मां तुमने दूसरों के पातक का प्रक्षालन अपनी पीड़ा और यात्रा से किया है । जैसे मां अपनी गोद के बच्चों की मल का प्रक्षालन करती है । हाँ मां, अपने समस्त अहंकार के बावजूद पुरुष जाति स्त्री के सम्मुख एक शिशु ही बना रह जाता है अपनी धात्री और पोषिका को ही दूषित और मलिन करके किलकारियां भरने वाले शिशु से अधिक क्या है वह "
तुम्हारी बातें मेरी समझ में नहीं आती अहिल्या ने दुर्बल और कांपते हुए स्वर में कहा था।  उसकी समझ में कुछ तो आ ही रहा था,  अन्यथा वाणी में यह परिवर्तन कहां से आता । उसके नकार में भी आत्मविश्वास कहां से लौटता ।  ' कुछ समझ में नहीं आता बेटा" बेटा शब्द का उच्चारण उसने इतने विलगित होकर किया था ,कि अपना संयम ना खोने वाले राम की भी आंखें भर आई थी ।
आततायी  होते हैं मां ,जो दूसरों को कुचलकर अकेले ऊपर उठना चाहते हैं ,सिर तान कर शिखर बनना चाहते हैं।  मैंने शिखरों को भूचाल तो दूर मात्र मेह से खिसकते और लुढकते देखा है । पर्वतों को अपने अहंकार के दरबार से बिना किसी बाहरी ठोकर या आघात के चूर चूर होते देखा है । लेकिन मैंने धरती को द्रवित होकर बहते तो देखा है, पर पतित होते नहीं देखा । स्त्री तो जननी होती है ! वह तो धरती होती है !  मां वह पतित नहीं हो सकती !  पतितो को भी वही संभालती है और वहीं संभाल सकती है । यदि वह पतित होगी तो उसे कौन संभालेगा । राम ने अपने संयत पर कोमल स्वर में कहा था । उस समय वृद्धा के मुख पर हो रहे भाव परिवर्तन को देखकर आश्चर्य हो रहा था उसमें एक ऐसी प्राणशक्ति आ गई थी मानो कोई सूखी लता वर्षा की झड़ी से एक ही क्षण में हरी हो गई हो ।

तुम कौन हो ? कौन हो तुम ? उसने अपने आंतरिक आह्लाद को दबाते हुए भर आई सी आवाज में कहा था । " तुम मनुष्य नहीं हो सकते " नहीं तुम मनुष्य नहीं हो सकते , तुम भगवान हो । तुम पतित पावन भगवान हो , पतितों को भी पवित्र मानने वाले, उपेक्षित और वंचितों को उनका लूटा हुआ सौभाग्य और गौरव दिलाने वाले अवतार हो तुम " वह बढ़कर राम के चरणों में लिपट गई और फूट-फूट कर रोने लगी थी राम बार-बार उठो मां ! उठो देवी !  कहकर बुला रहे थे ! 

मां गंगा की लहरें शांत हो चली थी , इधर मेरा मन अशांत हो चला था , आँखों से अविरल धारा बह रही थी  ......
( क्रमशः अगले भाग में जारी )
चित्रकला - अलका दास 


शुक्रवार, 29 जून 2018

ताजमहल की छत पर आइंस्टीन !!

ताजमहल की छत पर आइंस्टीन 
भारत में लगभग हर घुमक्कड़ या पर्यटक का सपना होता है , कि वह अपनी जिंदगी में एक बार ताजमहल जरूर देखे।  यहां तक विदेशी पर्यटक भी भारत घूमते वक़्त ताजमहल घूमना चाहते है।  विदेशी राजप्रमुख भी अपने व्यस्त दौरे में ताजमहल के लिए समय निकल ही लेते है।  तो इसी तरह से हमारी भी बचपन से इच्छा थी, कि हम भी ताजमहल के दीदार करे।  जब 2007 में दुनिया के नए अजूबों के लिए प्रतियोगिता चल रही थी , तो हमने भी ताजमहल के समर्थन के लिए ताबड़तोड़ सात कवितायेँ लिख डाली और दैनिक भास्कर में भेज भी दी , अब सात कवितायेँ तो नहीं छपी , हाँ एक कविता की चार लाइन जरूर छाप गयी थी।  वही दूसरी तरह टुच्चे से लोग अपनी ताजमहल के साथ फोटो भेज दें तो तुरंत छप रही थी। खैर " वक़्त के गाल पर ठहरे हुए आंसू  " (गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने ताजमहल के लिए कहा था  ) के लिखी कविताओं के लिए हमने भी गाल पर आंसू बहा लिए।  ये तो हुई पुरानी बातें अब आते है , ताजमहल की वर्तमान यात्रा के सन्दर्भ के बारे में ...  तो मेरे बेटे अनिमेष के दूसरे जन्मदिन (25 अप्रैल ) पर मेरे साढ़ू और बड़ी साली आने वाले थे, और उन्हें ताजमहल देखने जाना था। हालाँकि मेरा मन नहीं था ,क्यूंकि गर्मी अपने चरम पर थी, और आगरा में गर्मी भी भीषणतम रूप में पड़ रही है।  लेकिन जब ससुराल पक्ष से प्रस्ताव आया तो मन मारकर भी जाना ही पड़ेगा।  खैर जन्मदिन के बाद आनन -फानन में कार्यक्रम बनाया।  आगरा में गॉइड मित्र आशीष कुमार के माध्यम से होटल में रूम बुक कराया।  उस दिन विवाह के लग्न अधिक होने से बड़ी मुश्किल से कमरे मिले , और इधर ओरछा में बड़ी मुश्किल से इनोवा।  अब 28 अप्रैल को हम चल पड़े 6 व्यस्क और 3 बच्चे आगरा की ओर......  झाँसी , दतिया , ग्वालियर , मुरैना , धौलपुर होकर आखिरकार 6  घंटे में आगरा पहुँच ही गए।   
आगरा पहुंचकर होटल सीरीस 18 में चेक इन किया , होटल बढ़िया था।  हमारे होटल पहुँचने के कुछ देर बाद ही हमारे मित्र आशीष भाई भी सपरिवार आ गये, साथ आगरा का मशहूर पंछी पेठा लेकर आये  थे ।  आशीष भाई का अधिकार पूर्वक आग्रह था , कि आज का रात्रिभोज उनकी तरफ से होगा।  हम न भी नहीं कर सकते थे , आखिर इलाहबाद में हमारे संघर्ष के साथी का जो आग्रह था।  हम लोग फ्रेश होने के बाद फतेहाबाद में ही केसर रेस्टोरेंट आशीष भाई के साथ पहुँचे।  आशीष भाई की पत्नी यानि हमारी भाभी जी और उनके बच्चो से हम पहली बार मिल रहे थे , मगर लगा ही नहीं कि पहली मुलाकात है।  उसी दौरान आगरा में रहने वाले एक और मित्र रितेश गुप्ता जी को भी कॉल किया , तो वे भी अपनी बाइक से केसर रेस्टोरेंट आ गए और रितेश जी भी हमारे लिए पेठा लेकर आये ।  रितेश जी सोशल मीडिया का एक जाना-माना नाम है।  रितेश जी सफर है सुहाना  नाम से एक यात्रा ब्लॉग भी लिखते है। घुमक्कड़ी दिल से फेसबुक ग्रुप के एडमिन भी है।  इस ग्रुप में देश-विदेश के लगभग 14 हजार से भी ज्यादा सदस्य है।  खैर आज का दिन का सफर हमरे लिए दिल से सुहाना हो गया था।  भोजन पश्चात् हम होटल वापिस हुए।  आशीष भाई से सुबह 6 बजे तैयार मिलने का कहकर विदा लिया। 
                                                      29 अप्रैल की सुबह हम दुनिया के सात आश्चयों  में से एक आश्चर्य को देखने 6 बजे तैयार हो गए।  आशीष भाई के आते ही हम निकल पड़े।  आशीष भाई ने कल ही बता दिया था , कि ताजमहल में कोई भी खाने-पीने की सामग्री अन्य अतिरिक्त सामान न रखे , क्यूंकि शुरुआत में ही सिक्योरिटी चेक में सब बाहर ही रखवा दिया जायेगा।  तब भी हमारी श्रीमती जी पेठा अपने बैग में डालकर आ गयी।  सिक्योरिटी चेक में ही पेठा बाहर निकलवा दिया गया , उसे फेंकने से अच्छा हम लोगों ने उसे खा लिया।  एक चीज और बताना चाहूंगा , जितने भी लोग ताजमहल देखने जा रहे हो , टिकट लेते समय सबका परिचय पत्र अवश्य साथ रखे।  हमारे साथ तो आशीष भाई थे, तो कोई दिक्कत नहीं हुई।  वरना  कई बार बिना परिचय पत्र के टिकट ही नहीं देते।  आतंकवादियों की हिटलिस्ट में होने के कारण ताजमहल में सिक्योरिटी के इतने चोचले है।  खैर सुरक्षा भी जरुरी है। ताजमहल के बाहर ही जुते-चप्पलो का कवर मिलता है , क्यूंकि आप सीधे जुते चप्पल पहने ताजमहल के अंदर नहीं जा सकते।  हमने भी बाहर ही शू कवर खरीद लिए , क्यूंकि अंदर महंगे भी मिलते है।  अब हम चल पड़े दीदारे ताज के लिए  ------सबसे पहले शाही दरवाजे से ताज का हल्का -हल्का दीदार होने लगा।  दरवाजे के पास हमने एक ग्रुप फोटो खिंचवाई फिर दरवाजे में से प्रवेश किया। अंदर घुसते ही लोगों का सैलाब दिखा , हर तरह लोग मोबाइल और कैमरा लेकर ताज के साथ खुद को कैद करने में लगे थे।  जिन जगहों से ताजमहल की अच्छी फोटो आ सकती है, वहां कतारबद्ध होकर इंतजार करना पड़ता था।  कई बार तो जबरन भीड़ में घुस कर जगह बनानी पड़ती थी।  हमने भी घुसते ही भीड़ में घुसकर जगह बनाई और फोटो खिंचवाई।  ग्रुप फोटो आशीष भाई खींच रहे थे। 
शाही दरवाजे से अंदर आने के बाद हम चारबाग में आ चुके थे।  ये बाग मुख्य मकबरे और मुख्य द्वार के मध्य बनाया गया है।  इसके बीचोबीच एक नहर बनी है , जिसमे फब्बारे लगे है।  नहर के पानी में ताजमहल का सुन्दर प्रतिबिम्ब दिखता है।  नहर के किनारे कतारबद्ध पेड़ लगे हुए है।  ये बाग फ़ारसी बाग की तर्ज पर बने है , जिसका भारत में पहली बार प्रयोग बाबर ने किया था। सामन्यतः मुग़ल बागों के मध्य में मंडप या मकबरा बाग के बीचोबीच बने है , जबकि इसके उलट ताजमहल में मकबरा बाग के आखिर में बना है।  हालाँकि यमुना के दूसरी तरफ मेहताब बाग होने से वास्तुकार यमुना और मेहताब बाग को शामिल कर ताजमहल को बीच में ही मानते है।  वर्तमान में जो बाग में पेड़-पौधे लगे है , मुगल शैली के नहीं बल्कि ब्रिटिश शैली के है।  जी हाँ , अंग्रेजो ने अपने शासन के दौरान जीर्ण - शीर्ण हो चुके बाग़ की जगह ब्रिटिश शैली का बाग लगवाया।  अंग्रेजो से एक इतिहास में पढ़ा किस्सा याद आया।  अंग्रेज खुद को दुनिया में सर्वश्रेष्ठ मानते थे , तो वे ये कैसे स्वीकार कर सकते थे , कि दुनिया की सबसे सुन्दर ईमारत अंग्रेजो ने नहीं मुगलो ने बनाई।  तो उन्होंने ताजमहल को नीलाम करने का ठान लिया।  सौभाग्य से ताजमहल को खरीदने वाला कोई खरीददार नहीं मिला।  और ताजमहल बिकने से बच गया।  खैर अंग्रेजों  ने ताजमहल से भी खूबसूरत इमारत भारत की तात्कालिक राजधानी कोलकाता में बनवाना शुरू की , संगमरमर से बनी ये ईमारत खूबसूरत तो बनी , लेकिन ताजमहल से खूबसूरत न बन सकी।  अंग्रेजों ने अपनी इस खूबसूरत ईमारत का नाम अपनी महारानी विक्टोरिया के नाम पर विक्टोरिया मेमरियल नाम रखा।  आज ये कोलकाता में है।    
अब ताजमहल  के बारे में कुछ परिचयात्मक जानकारी दे दूँ , हालाँकि ताजमहल किसी परिचय का मोहताज  नहीं है।  फिर भी एक सैलानी या घुमक्कड़ को एक जिज्ञासा तो रहती ही है।  वर्तमान में ताजमहल को हिन्दू या मुस्लिम ईमारत होने पर चर्चा गरम है।  लेकिन इस चर्चा को इतिहासकारों और वास्तुकारों के लिए छोड़ उन जानकारियों की चर्चा करेंगे जो अभी तक सर्वमान्य है।  अभी तक इसलिए क्यूंकि इतिहास भी नई नई खोजों के हिसाब से बदलता रहता है।  जैसे 1921 के पहले भारत का इतिहास सिर्फ ऋग्वैदिक काल (1500 ईसापूर्व ) तक ही सिमटा था , लेकिन रायबहादुर दयाराम साहनी की सिंधु घाटी सभ्यता की खोज ने भारतीय इतिहास को 5000 वर्ष पीछे ही नहीं धकेला बल्कि दुनिया को ये बताया कि जब दुनिया में लोग अभी जंगली अवस्था में थे , तब हम भारतीय नगरीय सभ्यता का निर्माण कर चुके थे।  अब आप सोच रहे कि मैं ताजमहल से कहाँ सिंधु घाटी पहुँच गया ! तो आपको बता दूँ, कि ताजमहल भी उसी तरह नदी के किनारे बना है , जिस तरह से सिंधु घाटी के लोग अपनी इमारतें बनाते थे।  वैसे इतिहास की किताबों में मैंने लाजबर्द मणि के बारे में सिंधु घाटी और ताजमहल में प्रयोग होते पढ़ा है।  खैर अब सीधी बात नो बकवास ! 
जैसा कि सभी जानते है , कि ताजमहल का निर्माण मुग़ल बादशाह शाहजहां ने अपनी प्रिय बेगम मुमताज महल के मरने के बाद उसकी याद में किया था।  हालाँकि मुमताज महल  की मौत प्रसव पीड़ा के दौरान वर्तमान मध्य प्रदेश के बुरहानपुर नामक जगह पर हुई थी।  उपेक्षा के कारण बुरहानपुर  ताजमहल खंडहर सा पड़ा है। अब वापिस आगरा लौटते है, शाहजहां को जहाँ इमारतों को बनवाने का शौक था , वही उसे संगमरमर बहुत प्यारा लगता था , उसने संगमरमर की इमारतों का निर्माण तो करवाया ही था , साथ ही पहले से बनी इमारतों पर संगमरमर की परतें भी चढ़वाई थी।  जैसे अपने पिता जहांगीर द्वारा बनवाई मोती मस्जिद पर संगमरमर चढ़वाया था।  तो ताजमहल बनवाने के वक़्त भी उसने संगमरमर को चुना।  मुमताज ने अपने पिता एतमाद-उल्ला के मकबरे में पिट्रा ड्यूरे शैली 
Jump to navigationJump to searchपोप क्लेमेण्ट अष्टम, पीट्रा ड्यूरे में
(पीट्रा ड्यूरे या पर्चिनकारी, दक्षिण एशिया में, या पच्चीकारी हिन्दी में), एक ऐतिहासिक कला है। इसमें उत्कृष्ट पद्धति से कटे, व जड़े हुए, तराशे हुए एवं चमकाए हुए रंगीन पत्थरों के टुकड़ो से पत्थर में चित्रकारी की जाती है। यह सजावटी कला है। इस कार्य को, बनने के बाद, एकत्र किया जाता है, एवं अधः स्तर पर चिपकाया जाता है। यह सब इतनी बारीकी से किया जाता है, कि पत्थरों के बीच का महीनतम खाली स्थान भी अदृश्य हो जाता है। इस पत्थरों के समूह में स्थिरता लाने हेतु इसे जिग सॉ पहेली जैसा बानाया जाता है, जिससे कि प्रत्येक टुकडा़ अपने स्थान पर मजबूती से ठहरा रहे। कई भिन्न रंगीन पत्थर, खासकर संगमरमर एवं बहुमूल्य पत्थरों का प्रयोग किया जाता है। यह प्रथम रोम (इटली) में प्रयोग की दिखाई देती है 1500 के आसपास। ) का सुन्दर प्रयोग किया था। भारत में सबसे पहले इस शैली का प्रयोग मुमताज बेगम के अब्बाजान के मकबरे में ही हुआ। उसी शैली का प्रयोग ताजमहल में भी किया गया। ताजमहल की बाहरी दीवारों में इस्लाम में वर्जित मानवाकृति के अंकन का प्रयोग न करके सिर्फ विभिन्न ज्यामितीय आकारों को उकेरा गया है।  ऊपरी हिस्से में कुरान की आयतों को लिखा गया है।  ये आयतें फ़ारसी लिपि में अमानत खां द्वारा संगमरमर पर जैस्पर से लिखा गया है।  जैसे ही हम ताजमहल के अंदर करते है , तो प्रवेश द्वार पर जो आयात लिखी है , उसका अर्थ है -

 हे आत्मा ! तू ईश्वर के पास विश्राम कर। ईश्वर के पास शांति के साथ रहे तथा उसकी परम शांति तुझ पर बरसे।   
जाहिर है , ये आयत मुमताज बीबी के लिए लिखवाई गयी होंगी।  खैर हम जब अंदर प्रवेश करते है , तो शांति तो नहीं , बल्कि उमस भरी गर्मी जरूर हम पर बरसी।  कारण अंदर कम जगह में अधिक भीड़ होना था।  लेकिन  शाहजहां और मुमताज की नकली कब्रों की पच्चीकारी देखकर मुंह खुला का खुला रह गया।  अंदर एक अटेंडेंट एक पत्थर पर टॉर्च से रौशनी डाल रहा था , और वह पत्थर चमक उठा। शाहजहां और मुमताज की असली कब्रे नीचे के तल में है , जो साधारण ही है , क्यूंकि इस्लाम में कब्रों पर ज्यादा नक्काशी की मनाही है।  मतलब हमने जो कब्रें देखी वो नकली थी , और सिर्फ दिखाने के लिए बनवाई गयी थी।  खैर भीड़ और गर्मी से हलाकान होकर हम पीछे की तरफ से बाहर आये। बाहर आते ही आशीष भाई ने गुम्बद की डायमंड कटिंग के साथ ही गुम्बद पर कुछ अलग ही दिखाया।  जी हाँ गुम्बद पर एक आकृति 20 सदी के महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन के चेहरे जैसी लग रही थी।  (क्रमशः अगले भाग में जारी )
तब तक आप चित्रों का आनंद लीजिये 




ताजमहल का प्रवेश द्वार 

ताजमहल का पहला दीदार 

ताजमहल का पूरा दीदार 
प्रवेश द्वार का प्रतिबिम्ब 
ताज की एक मीनार सूरज के सामने 
ताज का एक अलग एंगल 
ताज की छत पर हमे आइंस्टीन का चेहरा भी नजर आया 
ताज अलग नजर से 
ताज की मुंडेर पर हमें बाल जटायू (इजिप्शियन वल्चर ) भी दिख गए 
हमारा घुमक्कड़ी दल 
हमारे मित्र और हम 
ताजमहल का प्रतिबिम्ब 

बुधवार, 13 जून 2018

दतिया का ऐतिहासिक वीरसिंह महल

मध्य प्रदेश का सबसे छोटा जिला दतिया है।  यह मध्यकाल में बुंदेला शासको की रियासत का महत्वपूर्ण भाग ही नहीं रहा बल्कि राजधानी भी रहा है।  आज भी दतिया में उस समय के महल , छतरियां और स्मारक उस गौरवपूर्ण काल की याद दिलाते  है। मगर आज दतिया भारत में माँ पीताम्बरा शक्तिपीठ के कारण प्रसिद्द है।  भारत में कामाख्या शक्तिपीठ के बाद सबसे ज्यादा तांत्रिक इसी मंदिर में जुटते है।  इसी मंदिर परिसर में माँ धूमावती के मंदिर में तांत्रिक अनुष्ठान लगातार चलते रहते है।  धूमावती माता तामसिक देवी होने के कारण  उन्हें भोग में मीठा की जगह नमकीन खाद्य पदार्थों का लगाया जाता है।  सौभाग्यवती स्त्रियों को उनका दर्शन वर्जित है।  दिन में उनका मंदिर मात्र कुछ देर के लिए खुलता है , जबकि शनिवार के दिन पुरे दिन मंदिर खुले होने की वजह से दूर-दूर से लोग दर्शनों के लिए आते है , इसी कारण  बड़ी लम्बी लाइन लगती है।  कहते है , कि पंडित जवाहर लाल नेहरू भी भारत-चीन युद्ध के लिए दतिया आये थे।  खैर वर्तमान में सिंधिया परिवार , छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह , महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री विलासराव देशमुख हाल ही में मंदिर आये थे।  अन्य चर्चित शख्शियत भी समय -समय पर माता के दरवार में हाजिरी लगाते है।  
                                                             खैर दतिया से सिर्फ 45 किमी की दूरी पर पदस्थापना होने के कारण मैं कई बार दतिया माता के दरबार में हाजिरी लगा चुका हूँ , मगर दतिया के ऐतिहासिक स्थलों को देखने से हर बार ही चूक गया।  मेरे ही मित्र जो दतिया में पदस्थ है, उनके अनुसार दतिया के महल ओरछा से अच्छे नहीं है।  यही बात सुनकर वापिस लौटना पड़ा।  लेकिन इस बार जब मेरा छोटा भाई अभिषेक मेरे पास ओरछा आया तो दतिया के ऐतिहासिक महल वीरसिंह महल देखने की ठानी।  22 मई 2018 को हम सपरिवार ओरछा से अपनी कार से निकले।  धूप बहुत तेज थी , मगर हम निकल पड़े एक घंटे बाद हम वीरसिंह महल के पीछे थे।  महल तो दिख रहा था , मगर पहुंचने का रास्ता समझ ही आ रहा था।  फिर पूछने पर पता चला हम महल के दूसरे हिस्से में आ गए और रास्ता दूसरी तरफ से होकर जाता है।  खैर रिवर्स गियर डाल वापिस हुए , तो एक मैरिज गार्डन से रास्ता मिला , महल के लिए कोई साइन बोर्ड नहीं लगा था , रास्ता बस्ती की गलियों में जा रहा था , खैर आगे पूछने पर ऊपर जाती गली की ओर इशारा मिला।  जैसे ही गली में ऊपर की ओर बढे तो सामने से ट्रेक्टर महोदय धुंआ उगलते उतर रहे थे , तो हमारी छोटी सी कार ने सम्म्मान में पीछे हटकर उन्हें रास्ता दिया।  फिर हम आगे बढे एक तो संकरी गली , दूसरी चढ़ाई , तीसरी आफत लोगों ने अपने घरों के सामने बेतरतीब तरीकों से दुपहिया वाहन सजा रखे थे।  तपती दुपहरी में लोग अपने घरो में कूलर के सामने पड़े थे , और हमारी कार चीख चीखकर हलाकान हुई जा रही थी।  हमारा हॉर्न सुनकर गलियों अपना पुश्तैनी ठिकाना बनाये बैठी गौमाता भी सिर्फ कान हिलाकर पुनः अपनी पुरातन परंपरा जुगाली करने में मस्त हो जाती।  हमें तो ये लगने लगा कि कार यही खड़ी कर पैदल ही निकल ले तो ज्यादा अच्छा रहेगा।  परन्तु मेरे दो वर्षीय सुपुत्र और आसमान में चमकते सूर्य देव को देख कार में ही बैठने का फैसला लेना पड़ा।  हमारी किस्मत इतनी बुरी भी न थी , और हमारी कार किसी तरह रेंगती हुई महल तक पहुंचने में सफल हो गयी।  वही एक मंदिर के सामने जगह न होने पर मंदिर के पुजारी जी ने कार खड़ी करने को कहा।  खैर कार पर मध्य प्रदेश शासन लिखा होने से हम निश्चिन्त होकर आगे बढे।
                                                आगे कही टिकट काउंटर जैसी व्यवस्था नहीं दिखी।  तो नीचे महल के एक दबड़े नुमा कमरे में प्रवेश किया तो चार-पांच नर गुटखा चबाते ऊंघते -अधलेटे से दिखे।  टिकट का पूछने पर एक जीर्ण-शीर्ण हो चुके रजिस्टर की ओर इशारा पाकर हम समझ गए कि टिकट की जगह सिर्फ इसी पुरातात्विक अभिलेखीय प्रविष्टि से काम चल जायेगा।  रजिस्टर में एंट्री करने के बाद पीछे से अधलेटी मुद्रा वाले सज्जन की आवाज आई - यहां कोई गॉइड नहीं मिलेगा , अगर चाहे तो जानकारी के लिए किसी को भेज दें।  मेरी स्वीकृति मिलते ही उन्होंने एक केवट (नाम भूल गया ) उपनाम के व्यक्ति को हमारी नैया पार करने भेज दिया।  
केवट भैया अपने काम में निपुण से लगे।  वीरसिंह जूदेव का परिचय जब देने लगे तो मैंने बताया कि मैं ओरछा से आया हूँ , तो संक्षिप्त परिचय के बाद आगे बढे।  
                                   दतिया के वीरसिंह महल का निर्माण प्रसिद्द बुंदेला शासक वीरसिंह जूदेव द्वारा सन 1620 में कराया गया था।  बुन्देलाओं द्वारा राजपूत और मुग़ल स्थापत्य शैली के मिश्रण से एक नई शैली बुंदेला स्थापत्य शैली की शुरुआत की गयी।  इस शैली के महल दतिया के अलावा ओरछा ,मऊसहानियां , छतरपुर, पन्ना , टीकमगढ़ और झाँसी आदि स्थानों पर बने है।  यह एक पांच मंजिला महल है , जिसके बारे में कहा जाता है , कि  मंजिल जमीं के नीचे है , अतः यह सात मंजिल  का है। मंदिर इस तरीके से बनाया कि ऊपर से देखने पर यह स्वास्तिक आकार का दिखता है।  बिलकुल इसी की तरह का महल ओरछा में जहांगीर महल है।  इन दोनों महलों को भाई-भाई भी कहा जाता है। इन दोनों महल की नकल में गुजरात के मांडवी में भी विजय पैलेस बनाया गया।  वीरसिंह महल को नृसिंह महल या पुराना महल भी कहा जाता है। 
                                         खैर अपने गाइड के साथ महल में प्रवेश किये तो स्वागत चमगादड़ो की तीखी गंध से हुआ।  जैसे तैसे नाक पर रुमाल रख अगली मंजिल पर पहुंचे तो पुरे दतिया शहर का विहंगम दृश्य से रु-ब-रु हुए , सामने एक पहाड़ी पर गोविंददेव महल दिख रहा था , जो राजा के वर्तमान वंशज के अधिपत्य में है , और आम जनता के लिए बंद रहता है।  महल के पास ही एक खंडहर सी ईमारत दिखी तो गाइड जी ने बताया कि ये फाँसीघर था।  अब हम महल में आगे बढे तो एक मंजिल पर गाइड महोदय ने बताया कि इस जगह पर राजा और राजपरिवार के लोग नृत्य -संगीत का लुत्फ़ लेते थे।  बीचोबीच एक रंगमंच सा बना हुआ था।  और उसके ठीक ऊपर छत पर गोलाकार में नर्तक-नर्तिकयों की नृत्यरत खूबसूरत मुद्राएं बनी हुई थी।  छत पर इतनी आकर्षक शिल्पकृति बरबस उस समय के कलाकारों को नमन करने को प्रेरित करती है।  रंगमंच के एक तरह राजा और दूसरी तरफ रानियों और राजपरिवार के लोगों के बैठने की जगह बनी थी। 
                                         अब गाइड के पीछे -पीछे चले जा रहे थे , एक बंद दरवाजे की तरफ इशारा करते हुए केवट जी बोले - यह महारानी का कमरा था।  जर्जर होने की जद्दोजहद वाले दरवाजे से झांककर जब कमरे में देखा तो बहुत ही सुन्दर भित्तिचित्र नजर आये , कैमरे से फोटो खींचने का सफल प्रयास किया।  फिर केवट जी से पूछा - कि ये दरवाजा खुल नहीं सकता।  तो केवट जी मुस्कुराते हुए बोले - बिलकुल खुल सकता है। हमने सोचा कि शायद ताले की चाबी उनके पास हो  लेकिन इधर तो नई तकनीक का इस्तेमाल हुआ।  केवट जी ने दरवाजे का एक पल्ला उठाया और उसे साइड में करते हुए अब आप अंदर जा सकते है।  हम जब अंदर गए तो आश्चर्य चकित रह गए , बहुत ही खूबसूरती से महारानी के कमरे की दीवारों को खूबसूरत डिजायन से सजाया गया था।  हमने भी खूब फोटो खींचे।  फिर बाहर आ गए। अगली मंजिल से गलियारों की खूबसूरती देखने लायक थी।  पत्थर की खूबसूरत जालियों की डिजायन देखते बनती थी।  महल के पीछे की तरफ एक तालाब बना हुआ था , तालाब के उस पार एक पुराना मंदिर भी बना था।  अब गर्मी अपने चरम पर पहुँच रही थी , तो हम सबसे ऊपरी मंजिल देख वापिस लौटे।  केवट जी धन्यवाद सहित उनका मेहनताना (जो उन्होंने माँगा नहीं था ) देकर महल से कई खूबसूरत यादें लेकर लौटे।  
दतिया ग्वालियर - झाँसी  रेल खंड में एक रेलवे स्टेशन है।  इसके दोनों तरफ झाँसी और ग्वालियर जैसे बड़े शहर है।  दतिया  झाँसी , खजुराहो , ओरछा , ग्वालियर से सड़क मार्ग से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है।  दतिया में अब हवाई पट्टी बन गयी है।  दतिया के आसपास घूमने लायक जगहों में गुजर्रा में सम्राट अशोक के नाम वाले शिलालेख है , उनाव -बालाजी में सूर्य मंदिर , रतनगढ़ में देवी जी का प्रसिद्द मंदिर है।  इसके अलावा आप ग्वालियर के दर्शनीय स्थल , झाँसी का किला , ओरछा के दर्शनीय स्थल , खजुराहो के मंदिर , माधव राष्ट्रिय उद्यान शिवपुरी  आदि है। दतिया में रुकने के लिए कई होटल भी है , मध्य प्रदेश पर्यटन निगम का भी एक होटल है , परन्तु पर्यटक दतिया की अपेक्षा ग्वालियर , झाँसी या ओरछा रुकना पसंद करते है।  अब आप चित्रों का आनंद लीजिये हम मिलेंगे फिर किसी मोड़ पर...... 
बुंदेलखंड के अन्य दर्शनीय स्थलों पर दी गयी लिंक पर क्लिक कर मेरी पोस्ट पढ़िए -   
 , ओरछा ,  

वीरसिंह महल का प्रवेश द्वार 
प्रवेश द्वार पर लगी महल की जानकारी 
प्रवेश करते ही नजर आता हिस्सा 
शहर के दूसरे हिस्से में नजर आता गोविंददेव महल और बीच में फाँसीघर नजर आ रहा है।  
महल के दूसरे हिस्से से दिखता तालाब 
मुगलिया शैली की डिजायन 
नृत्यशाला की मनोरम छत 
महल के गलियारे 
बंद दरवाजे से जब पेंटिंग पसंद आयी तो फिर दरवाजा खुलवाया 
महारानी के कमरे की नक्काशी और चित्र 
खूबसूरत चित्र 
मनमोहक डिजायन 
खूबसूरत पत्थर की जालियां 
छत भी कम खूबसूरत नहीं है।  
रंग ऐसे जैसे कल ही रंगाई हुई हो 
सबसे ऊपरी मंजिल 
मयूर अंकन 
पास के तालाब में अठखेलियां करते युवा 
हमें विदा करते किंगफिशर जी 

रविवार, 10 जून 2018

एक किला जहाँ पूरी बारात ही गायब हो गयी


बुंदेलखंड भारत के इतिहास में एक उपेक्षित क्षेत्र रहा है, जब हम भारतीय इतिहास को पढ़ते हैं ,तो हमें बुंदेलखंड के बारे में बहुत कम या कहें की नाम मात्र की ही जानकारी मिलती है । जबकि बुंदेलखंड की धरती वीरभूमि रही है यहां पर समय समय पर वीर पैदा हुए । बुंदेलखंड की बात चले और हम बुंदेला शासको के  दिनों को याद ना करें यह तो संभव ही नहीं क्योंकि बुंदेले ने  ही तो बुंदेलखंड की स्थापना की ।

                                                      मैंने अपनी ओरछा गाथा सीरीज  में बुंदेलखंड की स्थापना का जिक्र किया है, और बुंदेलखंड की पहली राजधानी बनने का गौरव टीकमगढ़ जिले में स्थित गढ़कुंडार नामक स्थान को प्राप्त हुआ है । बुंदेलों की राजधानी बनने के पूर्व गढ़ कुंडार खंगार वंश की राजधानी रहा और खंगार वंश के प्रतापी राजा खेत सिंह (10 वी सदी )  ने स्थान का पल्लवन पुष्पन किया । राजा खेतसिंह खंगार पृथ्वीराज चौहान के सेनापति रहे थे , उन्होंने पृथ्वीराज की तरफ से कई युद्धों में वीरता का परिचय दिया था , इसी से खुश  होके  पृथ्वीराज ने उन्हें गढ़कुंडार की रियासत प्रदान की।  मुहम्मद गोरी से पृथ्वीराज की हार  बाद  खेतसिंह ने स्वयं को स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया था। 14 वी सदी में  खंगारों से छीनकर बुंदेला शासकों ने गढ़कुंडार को अपनी राजधानी बनाया ।
                                    वर्तमान में गढ़ कुंडार मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले में निवाड़ी तहसील के अंतर्गत आता है । यह झांसी छतरपुर सड़क मार्ग पर निवाड़ी से 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है जबकि झांसी से इसकी दूरी लगभग 58 किलोमीटर है । यहां का नजदीकी रेलवे स्टेशन निवाड़ी है । जो झांसी मानिकपुर रेलवे लाइन पर स्थित है । वर्तमान में गढ़ कुंडार एक छोटा सा कस्बा है और यहां पर दर्शनीय स्थलों में गढ़कुंडार का प्रसिद्ध किला गीद्द वाहिनी का मंदिर तालाब आदि देखने योग्य स्थल हैं । शासन की उपेक्षा के कारण यहां पर बहुत कम लोग ही आते हैं । हां प्रतिवर्ष दिसंबर माह में 27 से 29 दिसंबर तक मध्य प्रदेश शासन द्वारा तीन दिवसीय गढ़ कुंडार महोत्सव का आयोजन किया जाता है । यह महोत्सव भी खंगार जाति का महोत्सव बनकर रह गया है , जबकि से पर्यटन गतिविधियों के साथ जोड़कर और अधिक सफल बनाया जा सकता था ।
अब किले  के कुछ इतिहास पर नजर डाली जाए ।

किले का इतिहास

-यह किला चंदेल काल में चंदेलों का सूबाई मुख्यालय और सैनिक अड्डा था।
- यशोवर्मा चंदेल (925-40 ई.) ने दक्षिणी-पश्चिमी बुंदेलखंड को अपने अधिकार में कर लिया था।
- इसकी सुरक्षा के लिए गढ़कुंडार किले में कुछ निर्माण कराया गया था।
- इसमें किलेदार भी रखा गया। 1182 में चंदेलों-चौहानों का युद्ध हुआ, जिसमें चंदेल हार गए।
- इसमें गढ़कुंडार के किलेदार शियाजू पवार की जान चली गई।
- इसके बाद यहां नायब किलेदार खेत सिंह खंगार ने खंगार राज्य स्थापित कर दिया।
- 1182 से 1257 तक यहां खंगार राज रहा। इसके बाद बुंदेला राजा सोहन पाल ने यहां खुद को स्थापित कर लिया।
- 1257 से 1539 ई. तक यानी 283 साल तक किले पर बुंदेलों का शासन रहा।
- इसके बाद यह किला वीरान होता चला गया। 1605 के बाद ओरछा के राजा वीर सिंह देव ने गढ़कुंडार की सुध ली।
- वीर सिंह ने प्राचीन चंदेला युग, कुठारी, भूतल घर जैसे विचित्र तिलिस्मी गढ़ का जीर्णोधार कराकर गढ़कुंडार को किलों की पहली पंक्ति में स्थापित कर दिया।
- 13वीं से 16 वीं शताब्दी तक यह बुंदेला शासकों की राजधानी रही।
- 1531 में राजा रूद्र प्रताप देव ने गढ़ कुंडार से अपनी राजधानी ओरछा बना ली।

घूमने आई पूरी बारात में हो गई थी गायब..
- बताया जाता है कि काफी समय पहले यहां पास के गांव में एक बारात आई थी। बारात में शामिल 50 से 60 लोग किला घूमन आए। यहां वे किले के अंडरग्राउंड वाले हिस्‍से में चले गए। नीचे गए सभी लोग आज तक वापस नहीं लौटे। इसके बाद भी कुछ इस तरह की घटनाएं हुईं। इन घटनाओं के बाद किले के नीचे जाने वाले सभी दरवाजों को बंद कर दिया गया। किला बिल्‍कुल भूल-भुलैया की तरह है। अगर जानकारी न हो तो ज्‍यादा अंदर जाने पर कोई भी खो सकता है। भूलभुलैया और अंधेरा रहने के कारण दिन में भी यह किला डरावना लगता है।
- गढ़कुंडार को लेकर वृन्दावनलाल वर्मा ने उपन्यास भी लिखा  है। इस उपन्यास  में गढ़कुंडार के कई रहस्य दर्ज किए गए हैं।

                                    गढ़ कुंडार इतिहास प्रेमियों के लिए आज भी आकर्षित करता है और इसी आकर्षण में बंद कर मैं अभी तक 5-6   बार इस जगह जा चुका हूं । यह किला अपनी खूबसूरती के साथ-साथ महत्वपूर्ण सुरक्षा व्यवस्था के लिए जाना जाता है । ऊंचाई पर बने इस किले से आसपास का बहुत ही सुंदर नजारा दिखाई देता है । किले का निर्माण सामने एक पहाड़ी के सापेक्ष इस तरह किया गया है , कि जब हम सड़क मार्ग से किले की ओर आते हैं , तो दूरी पर किला नजर आता है । जैसे जैसे ही हम उसके नजदीक पहुंचते हैं यह दिखाई देना बंद हो जाता है । ऐसा कहा जाता है, कि यह किला सात मंजिला है , जिसमे जमीन  ऊपर तीन मंजिल है, और चार मंजिल जमीन के नीचे बने है।  हालाँकि   दरवाजे सुरक्षा की दृष्टि से बंद कर दिए गए है।  गढ़कुंडार का किला बौना चोर के लिए भी प्रसिद्ध रहा है । कहते है कि उसकी लंबाई 52 अंगुल (साढ़े तीन फुट ) थी, इसलिए उसे बौना चोर कहते थे । कुछ लोग उसका नामकरण 52 चोरियों की वजह से कहते हैं । कहा जाता है कि बोना चोर एक ऐसा चोर था जिससे तत्कालीन समय का बुंदेलखंडी रॉबिनहुड कहा जा सकता है । यह धनाढ्य व्यक्तियों को पहले से चेतावनी देता था , कि वह उसके यहां चोरी करेगा और उनकी तमाम सुरक्षा व्यवस्थाओं को चकमा देकर वह चोरी करने में सफल हो जाता था । धनाढ्यों से लूटे गए धन से वह गरीबों और जरूरतमंदों की मदद भी करता था  । इसलिए वह क्षेत्र में लोकप्रिय था।  बौना चोर धन के  लिए धन लोलुप लोगों किले में बहुत खुदाई भी की है।  फ़िलहाल किले की सुरक्षा के लिए मध्य प्रदेश पुरातत्व विभाग ने प्राइवेट सुरक्षा एजेंसी के कुछ गार्ड नियुक्त किये है , जो दिन में आने वाले लोगो के लिए गाइड का भी काम करते है।   
                            गढ़कुंडार में ही गिद्धवाहनी देवी का मंदिर है।  गिद्ध वाहिनी मंदिर मूलतः विंध्यवासिनी देवी का मंदिर है । उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के विंध्याचल में स्थित विंध्यवासिनी देवी बुंदेलों की कुलदेवी हैं । ऐसी मान्यता है , कि  विंध्यवासिनी ही  बुंदेलों की सहायता करने के लिए विंध्याचल से गिद्ध पर बैठकर गढ़कुंडार आई इसलिए उन्हें यहां पर गिद्ध वाहिनी कहा गया । गिद्धवाहिनी मंदिर के बाहर एक बहुत ही खूबसूरत गिद्ध की प्रतिमा की बनी हुई है । साथ ही मंदिर से लगा हुआ एक बड़ा तालाब है जो इस जगह की खूबसूरती में चार चांद लगा देता है । इस तालाब में सर्दियों में कई प्रकार के प्रवासी पक्षी भी आते है।  हालाँकि पिछले कई सालों  के सूखे के कारण हाल -बेहाल है।
बुंदेलखंड के अन्य दर्शनीय स्थल -
ओरछा
देवगढ़
टीकमगढ़
दतिया
झाँसी
खजुराहो
पन्ना
कालिंजर


गढ़कुंडार किले का प्रवेश द्वार ( हालाँकि दरवाजा नया लगा है ) 
प्रवेश द्वार  से दिखता किला 
किले का एक बुर्ज 
किले में प्रवेश करते ही बनी भूलभुलैया 

किले की भूलभुलैया में में रोशनी के लिए छत में रोशनदान बने है।  (अभी सुरक्षा की दृष्टि से जाली लगाई गयी है।  ) 
किले की दीवार पर शुकदेव जी 
किले का जर्जर हिस्सा 

किले के अंदर का विहंगम दृश्य 
किले की सबसे ऊपरी मंजिल 
किले से शाही प्रवेश द्वार का रास्ता 
किले के पास बनी प्राचीन बाबड़ी  जो कभी किले वासियों की प्यास बुझती होगी।  
छत पर बनी डिजायन  
किले से दिखता गिद्धवाहिनी मंदिर और सूखा पड़ा तालाब 
गढ़कुण्डार के तालाब में प्रवासी पक्षी 
सुधा घर्षण यन्त्र (जिसका आज भी पुनर्निर्माण में प्रयोग होता है।  )

orchha gatha

बेतवा की जुबानी : ओरछा की कहानी (भाग-1)

एक रात को मैं मध्य प्रदेश की गंगा कही जाने वाली पावन नदी बेतवा के तट पर ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा हुआ. बेतवा की लहरों के एक तरफ महान ब...