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orchha gatha

बेतवा की जुबानी : ओरछा की कहानी (भाग-1)

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एक रात को मैं मध्य प्रदेश की गंगा कही जाने वाली पावन नदी बेतवा के तट पर ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा हुआ. बेतवा की लहरों के एक तरफ महान बुंदेला शासको की छतरियां बनी हुई है, तो दूसरी तरफ ओरछा अभयारण्य जो कभी तुंगा मुनि की तपोभूमि रहा है. धवल चांदनी में बेतवा की लहरें हिलोर मार रही है .. तभी कलकल के कलरव के बीच कहीं से एक मधुर आवाज आती है...
हे पथिक...
क्या तुम मेरी आवाज सुन रहे हो ?
 हैरान होकर अपने आस पास देखा तो वहां मेरे अलावा कोई भी नही था. मैं आश्चर्य मिश्रित भय के साथ आने वाली आवाज के स्रोत को खोज रहा था. कभी फिर से आवाज ने मेरा ध्यान खींचा...
हे पथिक....
तुम्हे डरने की आवश्यकता नही है..
मैं हूँ....बेत्रवती !
जिसे तुम लोग अब बेतवा कहते हो .
मैंने ध्यान दिया तो आवाज बेतवा की लहरों से ही आ रही थी .....
मैने श्रद्धा वश हाथ जोड़ लिये
बेतवा की आवाज !
सुनकर तो मेरे रोंगटे ही खड़े हो गये . विश्वास ही नही हो रहा है, कि मैं जाग रहा हूँ , या सपना देख रहा हूँ. मुँह से आवाज ही नही निकल पा रही...तभी बेतवा की एक लहर तेजी से ग्रेनाइट की चट्टान से टकराई. पानी के छींटे मेरे ऊपर आये...मेरी तंद्रा…

ओरछा महामिलन की अंतिम बेला के अविस्मरणीय क्षण

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अगर आप ओरछा के बारे में जानना चाहते है , तो इन लिंक्स पर क्लिक करके पढ़िए ओरछा गाथा पहला भागओरछा गाथा दूसरा भागओरछा गाथा तीसरा भाग ओरछा गाथा भाग चौथा
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ओरछा महामिलन (पांचवी कड़ी )
                                                                 अभी तक आप लोगों ने ओरछा महामिलन की दो दिवसीय कार्यक्रम में तुंगारण्य में वृक्षारोपण कार्यक्रम तक पढ़ा।  अब सभी ओरछा अभ्यारण्य में स्थित पचमढ़िया पहुँच चुके थे।  पचमढ़िया ओरछा अभ्यारण्य के अंदर स्थित पुराने राजशाही  ज़माने की पांच छोटे-छोटे मंदिर है , जिन्हें स्थानीय भाषा में मढिया कहा जाता है।  पांच मढिया होने के कारण इस स्थान का नाम पचमढ़िया पढ़ा।  ये मढिया जामनी  नदी की एक धार में बने टापूओं  पर बनी है।  वैसे पूरा ओरछा अभ्यारण्य भी बेतवा और जामनी नदी के  संगम  पूर्व बने टापू में ही बना है।  इस अभ्यारण्य में पुराने ज़माने के शिकारगाह भी बने है।  जहाँ कभी राजा अपने सिपाहियों के साथ डेरा डा…

ओरछा महामिलन :साउंड एंड लाइट शो , परिचय ,तुंगारण्य में वृक्षारोपण

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अभी तक आपने ओरछा महामिलन का पहले दिन का विवरण पढ़ा।  सभी लोग तय कार्यक्रम के अनुसार निश्चित समय पर रामराजा मंदिर पहुँच चुके थे।  आरती शुरू हो चुकी थी, मगर मैं अभी तक घर पर था। जब अनिमेष गोद  से उतरने  का नाम ही नही ले रहा था , तो उसे साथ ही लेकर कार से मंदिर पहुंचा ...



अगर आप ओरछा के बारे में जानना चाहते है , तो इन लिंक्स पर क्लिक करके पढ़िए ओरछा गाथा पहला भाग ओरछा गाथा दूसरा भाग ओरछा गाथा तीसरा भाग ओरछा गाथा भाग चौथा
इस पोस्ट को शुरू से पढ़ने के लिए नीचे दी गयी लिंक पर क्लिक कर करके पढ़िए ओरछा महामिलन (पहली कड़ी )ओरछा महामिलन (दूसरी कड़ी )ओरछा महामिलन (तीसरी कड़ी )ओरछा महामिलन (चौथी कड़ी ) ओरछा महामिलन (पांचवी कड़ी )
अभी तक आपने ओरछा महामिलन का पहले दिन का विवरण पढ़ा।  सभी लोग तय कार्यक्रम के अनुसार निश्चित समय पर रामराजा मंदिर पहुँच चुके थे।  आरती शुरू हो चुकी थी, मगर मैं अभी तक घर पर था। जब अनिमेष गोद  से उतरने  का नाम ही नही ले रहा था , तो उसे साथ ही लेकर कार से मंदिर पहुंचा , तो देखा ग्रुप के अधिकांश पुरुष सदस्य रामराजा के दर्शन कर चुके है।  हाँ महिलाये जरूर लाइन में लगकर दर्शन की प्रतीक्षा…

कटरीना ट्री और सूर्यास्त : ओरछा महामिलन का प्रथम दिवस

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इसके पहले के भाग पढ़ने के लिए क्लिक करें  राम राम मित्रों ,                       जैसे कि आपने अभी तक पढ़ा , कि ओरछा भ्रमण के प्रथम सत्र के बाद सभी वापिस होटल खाना  खाने के लिए लौट आये। खाने में पूड़ी, मटर-पनीर की सब्जी , आलू-गोभी की सूखी सब्जी के साथ पुलाव, दाल , रायता और रसगुल्ला के साथ सलाद के साथ सभी हँसते - हँसाते  खाने का लुत्फ़ ले रहे थे।  माहौल ऐसा बना था , मानो किसी अपने की शादी में सब आये हो , और सब एक-दूसरे के रिश्तेदार या पुराने परिचित  हो।  लग ही नही रहा था, कि सब सोशल मीडिया की आभासी दुनिया में एक दूसरे से परिचित हुए और पहली बार मिल रहे है।  इस कथित आभासी दुनिया ने हम सब को न केवल यथार्थ के धरातल पर मिलाया बल्कि एक परिवार के रूप में जोड़ा था।  अपनी अपनी जिंदगी की आपाधापी से दूर एक दूसरे के साथ हंसी-ठिठोली के साथ बड़े -बड़े ठहाके भी लग रहे।  जी हाँ , ठहाके !  जो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में लगभग लापता से ही हो गए। ऐसे ठहाके हम अपने परिवार या दोस्तों के साथ ही लगा पाते , वो इस पल इन  घुमक्कडों के परिवार में लग रहे थे।  महिलाएं जो इस ग्रुप में शामिल नही थी , और अपने पतियों…