बुधवार, 13 जून 2012

एक अकेला पेड़ !

सोया  पेड़ के नीचे एक थका राही
तभी कहीं से एक दर्द भरी आवाज़ कराही
नींद खुली राही की , देखा चारो तरफ सुनसान 
एक अकेला पेड़ था, बाकि इलाका था वीरान 
क्या देख रहे हो तुम , अचरज होके आसपास 
मैं अकेला पेड़ बचा, बाकी का इंसानों ने किया नाश 
थी यहाँ भी हरियाली  , थे अनेक पशु और पक्षी 
सबका नाश किया मानव ने, बनके पर्यावरण भक्षी 
असहाय बनके खड़ा रहा , देखता रहा सहोदरों का नाश
मेरी बांहों को भी काट दिया, है अंतिम क्षण की आस 
क्या शत्रुता थी इन मनवो से, सदा  ही उनका कल्याण किया 
मीठे-मीठे फल  दिए उनको, और ऑक्सीजन  सा प्राण दिया   
पर वो हमारा मोल समझ न सका अब तक 
यूँ ही अपने पैरो पर कुल्हाड़ी मारेगा  कब तक
        

17 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर प्रस्तुति,,,बेहतरीन रचना,,,,,

    MY RECENT POST,,,,,काव्यान्जलि ...: विचार,,,,

    उत्तर देंहटाएं
  2. पर्यावरण की चिंता सबको करनी चाहिए।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर....
    सार्थक भावाव्यक्ति......

    अनु

    उत्तर देंहटाएं

ab apki baari hai, kuchh kahne ki ...

orchha gatha

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