बुधवार, 22 अगस्त 2012

राग दरवारी :हिंदी साहित्य का व्यंग्य का सर्वश्रेष्ठ और कालजयी उपन्यास

नमस्कार मित्रो ,

बहुत दिनों बाद मैं आज ब्लॉग लिखने बैठा हूँ . कुछ दिन सोचा इन्टरनेट की दुनिया से दूर होकर साहित्य की दुनिया की सैर की जाये . इस लिए मैं पिछले हफ्ते हिंदी  साहित्य का व्यंग्य का सर्वश्रेष्ठ और कालजयी उपन्यास " राग दरवारी " पढने में व्यस्त था . सच पूछो तो श्रीलाल शुक्ल जी का लिखित उपन्यास हर भारतीय को पढना चाहिए . इस उपन्यास में शुक्ल जी ने एक कसबे 'शिवपालगंज ' और उसके निवासियों ( जिन्हें उपन्यास में गंजहा कहा गया है ) के बहाने भारतीय संस्कृति और मानसिकता पर करारा व्यंग्य किया है . जैसे :- " वर्तमान शिक्षा पद्धति रास्ते में पड़ी हुई कुतिया है , जिसे कोई भी लात मार सकता है . "
स्व० श्रीलाल शुक्ल जी
शुक्ल जी ने शिवपालगंज कसबे के बहाने देश  की लगभग हर समस्या को जोरदार तरीके से उठाते है . यही कारण है, कि 1960 के दशक में लिखा  गया ये उपन्यास आज भी प्रासंगिक  है. शुक्ल जी जिस सरल भाषा शैली में अपनी बात रखते  है ,वह लाजवाब है ! उदहारण के लिए  इस देश के निवासी परंपरा से कवि है , चीज  को समझने से पहले वे उस पर मुग्ध होकर कविता कहते है . भाखड़ा नांगल बांध को देखकर वे कह सकते है 'अहा ! अपना चमत्कार दिखाने  के लिए , देखो प्रभु ने फिर से भारतभूमि को चुना . '
मेरे अभी तक पढ़े गए साहित्य में निश्चय ही 'राग दरवारी ' सर्वश्रेष्ट है . राग दरवारी के पात्र वैद्य जी , रंगनाथ , रुप्पन बाबु , बद्री पहलवान , प्रिंसपल साहब , खन्ना मास्टर , सनीचर , लंग्गड़  और अन्य पात्र हमारे आस-पास के ही लगते है . और उपन्यास को पढ़ते समय हम भी उन्ही में शामिल हो जाते है . लगता है शुक्ल जी हमारी ही कहानी कह रहे है . आज भी ग्रामीण भारत 'राग दरवारी ' के शिवपाल गंज कि तरह है . आज देश के लोग वैद्य जी तरह देश को अच्छाई का मुखौटा पहन कर लूट रहे है , आज भी प्रिंसिपल साहब जैसे चापलूस देश की व्यवस्था को चूस रहे है . आज भी सत्ता का विरोध करने वालों  को खन्ना मास्टर की तरह परेशान किया जा रहा है . आज भी लंग्गड़ जैसे कई ईमानदार लोग अपनी जमीन  की नक़ल लेने  के लिए तहसीली  का चक्कर काट रहे है. आज भी बद्री पहलवान जैसे गुंडे सत्ता के उत्तराधिकारी बन रहे है . आज भी गयादीन जैसे सीधे-सादे  लोग  अपनी बेटी की इज्जत बचाने के लिए पलायन कर रहे है . आज भी सनीचर जैसे लोग सत्ता की कठपुतली बन कर दुसरो की उंगलियों पर नाच रहे है . आज भी देश के लोग भंग और गांजे के नशे में धूत्त होकर मतदान कर रहे है , आज भी रुप्पन बाबु और रंगनाथ  जैसे पढ़े लिखे हम जैसे लोग शुरूआती विरोध का भ्रम रच कर बाद में उसी सड़ी हुई व्यवस्था का अंग बनने को  बेबस है !!!
स्वर्गीय श्रीलाल शुक्ल जी को नमन !
इन्टरनेट प्रेमियों के लिए खुशखबरी ' राग दरबारी ' जो कि राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है , अब ऑनलाइन भी उपलब्ध है .

रविवार, 12 अगस्त 2012

यही तो देश का कष्ट है


यही तो देश का कष्ट है
कि सारे नेता भ्रष्ट है
राजनीती तो अब नष्ट है
तब भी नेता स्वस्थ्य है
वे घोटालो के अभ्यस्त है
और आम जनता त्रस्त है
सारे मौका परस्त है
सब अपने में मस्त है
वतन कि हालत पस्त है
खुशहाली अस्त-व्यस्त है
यही तो देश का कष्ट है
कि अब सब ध्रतराष्ट्र  है
- मुकेश पाण्डेय 'चन्दन'

मंगलवार, 7 अगस्त 2012

बूंदों में जाने क्या ......नया है ?

अले याल फिल पानी गिलने लगा ,...तू भी तो अपने पापा से छतरी मँगा !

छई छप्पा छई ...चलो उठो ...फिर से खेलते है छई छप्पा छई !
अक्सर बच्चे ही बारिश की बूंदों का मजा ले पाते ....हमारे भीतर तो बचपना बचा ही नही है . अब देखो न कितने मजे से खेल रहे बच्चो के झुण्ड में जब एक बच्चा गिर जाता है , तो बाकि उसे उठाने को दौड़ पड़े है . और हम इसे देख कर बस इतना कह पाते है ........काश !
बरसे चाहे कितना भी  पानी , पर माँ कहती पढने से न करना आना-कानी
बारिश में सबसे बुरा लगता है , स्कूल जाना ! लेकिन मन मार कर जाना पड़ता है . और जब मम्मी मेरे लिए इतनी परेशान हो सकती है , तो मैं तो उनका लाडला राजकुमार स्कूल क्यों  नही जाऊंगा ? एएँ !
गिरा अबकी खूब पानी ...सड़क पे आ गयी जल की रानी लाओ बंसी पकडे मछली खूब सारी, माँ भी होगी खुश बनेगी इसी की तरकारी
अरे यार छोडो स्कूल ...वहां भी तो पानी टपक रहा है , चलो  मछली पकड़ते है .........देखो कौन सबसे ज्यादा मछली पकड़ता है ? अरे ...वो  देखो मछ्....छ्ली !!!!!!!!!!!
हम तो है बाल मजदूर , हर हाल में काम करने को मजबूर
माँ बीमार है , घर में पानी भरा है , बापू का पता नही , माँ की दवा लेने  के लिए पैसे की व्यवस्था भी तो करनी है . अब काम तो करना ही होगा ........घर पर माँ इन्तजार कर रही होगी ......मुझे नही खेलना .......लाया साब ....गर्म ही ला रहा हूँ !
बारिश चाहे करें कितनी भी खटपट , पर अपना धंधा न होने दूंगा  चौपट 
अरे साब , बारिश आप बड़े लोगो को ख़ुशी देती होगी , अपने लिए तो मुसीबत ही होती है ....अब देखो न , कल रात हुई तूफानी बारिश में दुकान बह गयी .किसी तरह  काम तो करना होगा , वरना पेट कैसे भरेगा ?
जब बारिश हो जोरदार , तब ऐसी करें आड़ , जय भारत और जय जुगाड़



सीप न सही मकड़ी होके भी है स्वाति की चाह , बोलो वाह वाह

बूंदों में जाने क्या ......नया है ?

एक बूंद में समायी सारी कायनात .......

मगर आजकल शहरी आपा-धापी में ऐसे नज़ारे देखने वाले लोग बारिश की खुबसूरत कहानियो को कहाँ पढ़ पाते है ?
आपको इन चित्रों के माध्यम से सुनाई गयी कहानियों में से कौन सी कहानी अच्छी लगी ? जरुर बताना

शनिवार, 4 अगस्त 2012

इत्तफाक (कविता )

तब बारिश हो रही थी , था शायद सावन का महिना 
जब भीगता देख मुझे , मुस्कुराई थी एक हसीना 
उसकी मुस्कराहट , दिल में हलचल मचा गई 
एक पल में ही न जाने , कितने सपने सजा गई 
पास आते उसके कदमो ने , दिल में उमंग जगाई 
मन ख़ुशी से झूमा , मनो उसके कदमों में दुनिया समाई 
कदम-दर-कदम दिल की धड़कन तेज हो रही थी 
आँखे उसकी कुछ उम्मीदों का बीज बो रही थी 
होंठ मानो उसके कुछ कहने को थे बेताब
इधर हम जागी आँखों से देख रहे थे ख्वाब 
जिन्दगी भीगते-भागते कर गयी मजाक 
पर कैसे मानू  की ये हकीकत थी या इत्तफाक 
  उसकी छुअन  से तन में एक बिजली समाई 
हाथ में राखी लिए बोली , आज रक्षाबंधन है मेरे भाई !!!!

गुरुवार, 2 अगस्त 2012

तुम्हारे जाने से .........

सभी ब्लोगेर्स साथियों को पावन रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाये . रक्षाबंधन भारतीय संस्कृति का एक अनूठा त्यौहार है . इस दिन का सभी बहनों को बड़ी बेसब्री से इन्तजार होता है . लेकिन इस बार रक्षाबंधन के दिन मैं अपनी बहन को राखी बंधवाने के बाद  उसे जब स्टेशन छोड़ने जा रहा था , तो मन बड़ा व्यथित था .अभी तक तो सभी रक्ष्बंधन साथ मनाये थे , लेकिन उसकी शादी के बाद ये विछोह ...पुरानी यादों को फिल्म की रील की तरह फ्लेश बैक में ले जा रहा था . बचपन की बातों से लेकर अब तक की सारी बातें एक एक करके याद आ रही थी . वो बात -बात में लड़ना -झगड़ना , रूठना-मनाना और न जाने कितनी बातें ............
तुम्हारे जाने से, जीवन में एक कमी सी तो है 
आँखे कुछ ढूंढे  , इनमे भी नमी सी तो है 
दुनिया की रीत है, एक दिन था तुम्हे जाना 
आखिर क्यों कोई अपना , हो जाता बेगाना 
वो बचपन की बातें , वो होती तकरार 
बस तेरी याद बची , कहाँ  तेरा प्यार ?
मेरे लिए सब कुछ थी तुम , अब जाने कहाँ गुम
वो तुम्हारी बकबक , अब तुम्हारी तस्वीर गुमसुम 
हर पल हर लम्हा तुम्हारी याद दिलाता 
अब जाना, कि ये रिश्ता क्या कहलाता 
मुझे पता है , वहां तुम्हारी आँखों में भी होगा पानी 
 पर शायद , मिलना-बिछड़ना ही है जिंदगानी 
कैसे भूलूं , कैसे याद करूँ , प्यारी बहना 
जब बोलते आंसू , तो जुबाँ से कहना 
सोच के तुम्हारी मुस्कराहट , आंसू निकल आते 
काश ! फिर कहीं से वो बीते पल मिल जाते

सोमवार, 30 जुलाई 2012

सरदार को एक रुपया भीख दे देना..!

कुछ दोस्त मिलकर डेल्ही घूमने का प्रोग्राम बनाते है और रेलवे
स्टेशन से बहार निकलकर एक टेक्सी किराए पर लेते है , उस
टेक्सी का ड्राइवर बुढ्ढा सरदार था,

यात्रा के दौरान बच्चो को मस्ती सुजती है और
सब दोस्त मिलकर बारी बारी सरदार पर बने
जोक्स को एकदुसरे को सुनाते है

उनका मकसद उस ड्राइवर को चिढाना था . लेकिनवो बुढ्ढा सरदार चिढाना तो दूर पर उनके साथ
हर जोक पर हस रहा था ,
सब साईट सीन को देख बच्चे वापस रेलवे स्टेशन आ जाते है ...और तय
किया किराया उस सरदार को चुकाते है , सरदार
भी वो पैसे ले लेता है , पर हर बच्चे को अपनी और से एक एक
रूपया हाथ में देता है

एक लड़का बोलता है "पाजी हम सुबह से आपकी कोम
पर जोक मार रहे है , आप गुस्स्सा तो दूर पर हर जोक में
हमारे साथ हस रहे थे , और जब ये यात्रा पूरी हो गई आप हर लडके
को प्यार से एक-एक रूपया दे रहे है , ऐसा क्यों ? "

सरदार बोला " बच्चो आप अभी जवान
हो आपका नया खून है आप मस्ती नहीं करोगे तो कौन
करेगा ? लेकिन मेने आपको एक- एक रूपया इस लिए दिया के जब
वापस आप अपने अपने शहर जाओगे तो ये रूपया आप उस सरदार
को दे देना जो रास्ते में भीख मांग रहा हो ,
इस बात
को दो साल हो गए है और जितने लडके डेल्ही घूमने गए थे सब
के पास वो एक रुपये का सिक्का आज भी जेब में
पड़ा है ...उन्हें कोई सरदार भीख
मांगता नहीं  मिला .

 

गुरुवार, 26 जुलाई 2012

बाकी रह गये कुछ निशाँ....

जिन्दगी में कुछ छूट जाता है , जाने कहाँ 
होता है सब कुछ साथ, है पर दिल तनहा 
अतीत  की होती है , कुछ रंगीली यादें
कुछ खाली पन्ने , तो कुछ अधूरे फ़लसफ़ा
मन करता है, कि फिर लौट चले पीछे 
 पर बाकी है, अभी देखना आगे का जहाँ 
हम तनहा ही चले थे , इस सफ़र में 
फिर तनहा , छूटे जाने कितने कारवां 
ख़ुशी सी होती नही , पर गम भी नही
निकले कितने अश्क, लगे कितने कहकहा 
 लहरें यूँ ही आती रही , साहिल पे खड़े हम 
आखिर समंदर में , डूब ही गया ये आसमाँ
टूट गये वो बनाये हुए रेत के महल
पर अभी भी बाकी रह गये कुछ निशाँ

गुरुवार, 12 जुलाई 2012

ब्राह्मणों की कहानी ........

नमस्कार ,
मित्रो आज हम इतिहास से कुछ खोज कर बड़ी ही मजेदार चीज लाये है !
अरे भाई ! इतना जल्दी क्या है ?
जब खोज कर लाये है , तो आप को भी बताएँगे ही , यहाँ तो आप ही के लिए आते है न !
आज हम ब्राह्मणों के बारे में कुछ ज्ञान खोज के लाये है ! हां लेकिन ये सब आपकी जानकारी के लिए है , इसमें कोई जातिवाद नही है.
तो भैया तो सबसे पहले ब्राह्मण शब्द का प्रयोग अथर्वेद के उच्चारण कर्ता ऋषियों के लिए किया गया था . फिर प्रत्येक वेद को समझनेके लिए ग्रन्थ लिखे गये उन्हें भी  ब्रह्मण साहित्य कहा गया है . 
अब देखा जाये तो भारत में सबसे ज्यादा विभाजन या वर्गीकरण ब्राह्मणों में ही है . जैसे :- सरयू पारीण, कान्यकुब्ज , जिझौतिया , मैथिल , मराठी , बंगाली ,भार्गव ,कश्मीरी , सनाढ्य , गौड़ , महा-बामन और भी बहुत कुछ . इसी प्रकार ब्राह्मणों में सबसे ज्यादा उपनाम (सरनेम या टाईटल )  भी प्रचलित है , तो इन्ही  में कुछ लोकप्रिय उपनामों और उनकी उत्पत्ति के बारे में जानते है . 
एक वेद को पढने  वाले ब्रह्मण को पाठक कहा गया 
दो वेद पढने वाले को द्विवेदी कहा गया , जो कालांतर में दुबे हो गया 
तीन वेद को पढने वाले को त्रिवेदी/ त्रिपाठी  कहा गया , जो कालांतर में तिवारी हो गया 
चार वेदों को पढने वाले चतुर्वेदी कहलाये , जो कालांतर में चौबे हुआ 
शुक्ल यजुर्वेद को पढने वाले शुक्ल या शुक्ला  कहलाये 
चारो वेदों , पुराणों और उपनिषदों के ज्ञाता को पंडित कहा गया , जो आगे चलकर पाण्डेय .पाध्याय ( ये कालांतर में उपाध्याय हुआ ) बने .
इनके अलावा प्रसिद्द ऋषियों के वंशजो ने अपने  ऋषिकुल या गोत्र के नाम को ही उपनाम की तरह अपना लिया , जैसे :- 
भगवन परसुराम भी भृगु कुल के थे
भृगु कुल के वंशज भार्गव कहलाये , इसी तरह गौतम , अग्निहोत्री , गर्ग . भरद्वाज  आदि 


इन्हें तो आप पहचान गये होंगे ! अगर नही पहचाने तो जानकारी के लिए बता दे ये इन पंक्तियों का लेखक है .

शास्त्र धारण करने वाले या शास्त्रार्थ करने वाले शास्त्री की उपाधि से विभूषित हुए . बहुत से ब्राह्मणों को अनेक शासको  ने भी कई  तरह की उपाधियाँ  दी  , जिसे बाद में उनके  वंशजो ने उपनाम   की तरह उपयोग  किया . इस  तरह से ब्राह्मणों के उपनाम प्रचलन में आये . बाकि अगली किसी पोस्ट में ............
तब तक के लिए राम राम 

सोमवार, 9 जुलाई 2012

हिंदी की रोचक लोकोक्तिया / कहावतें !



हम अक्सर अपने बड़े- बुजुर्गो से लोकोक्तिया / कहावतें  सुनते आये है , इन  कहावतो में जहाँ रोचकता, मधुरता होती  है , वही इनके साथ कोई कहानी और सन्देश भी छुपा रहता है .आजकल तो इनका प्रयोग बहुत कम सुनने में मिलता है . अक्सर लोग कहावतों और लोकोक्तियों को एक ही समझते है . मगर इनमे भी कुछ अंतर है . जहाँ कहावतें किसी के भी द्वारा कही गयी होती है , वही अधिकांश लोकोक्तियाँ  विद्वानों के द्वारा कही गयी होती है . कहावतों और लोकोक्तियों में थोड़े शब्दों में बहुत कुछ कह दिया जाता है . और भाषा में प्रांजलता , प्रवाहमयता , सजीवता के साथ ही कलात्मकता  का प्रवेश हो जाता है .कहावतों और लोकोक्तियों का आधार घटनाये, परिस्थितियां और दृष्टान्त होते है .
आज मैं  भी हिंदी और उसकी बोलियों से कुछ रोचक कहावतें सहेज कर आपके लिए लाया हूँ
* नोट- इन कहावतों  में जाति सूचक शब्दों का भी प्रयोग हुआ है , इन्हें किसी जाति से जोड़े .बल्कि उनके अर्थो पर ध्यान दे . सधन्यवाद  ! 
# अढाई हाथ की ककड़ी , नौ हाथ का बीज - अनहोनी बात होना
जैसे- पाकिस्तान द्वारा शांति के कार्य करना वैसे ही है - कि  अढाई हाथ की ककड़ी , नौ हाथ का बीज

# अटका बनिया देय उधार- दबाव पड़ने पर सब कुछ करना पड़ता है .
जैसे- राष्ट्रपति पद के समर्थन के लिए यु पी   बंगाल को अधिक राशि जारी करके यही जाता रही है , कि अटका बनिया देय उधार.

# अपना ढेंढार देखे नही , दुसरे की फुल्ली निहारे - अपने अधिक  दुर्गुण को छोड़ कर दुसरे के कम अवगुण को देखना
जैसे - कांग्रेस द्वारा दुसरे दलों के भ्रष्टाचार की बात करने को तो यही कहा जा सकता है , कि  अपना ढेंढार देखे नही , दुसरे की फुल्ली निहारे

# अपनी नाक कटे तो कटे , दुसरे का सगुन तो बिगड़े - दुसरो को हानि पहुचाने के लिए स्वयं की हानि को भी तैयार रहना .
जैसे - दिग्विजय सिंह के बयानों से तो ऐसा लगता है , कि अपनी नाक कटे तो कटे , दुसरे का सगुन तो बिगड़े

# अपनी गरज बावली - स्वार्थी मनुष्य दुसरो की चिंता नही करता है
जैसेसांसदों द्वारा महामंदी के दौर में भी अपना वेतन बढ़ाने को लोगो ने कहा - अपनी गरज बावली

# अपने पूत को कोई काना नही कहता - अपनी चीज को कोई ख़राब नही कहता  है
जैसे - उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव  में राहुल गाँधी के प्रचार के बाद भी हुई हार के बाद jab राहुल को कुछ नही कहा गया तो मजबूरन यही  कहना पड़ा  - अपने पूत को कोई काना नही कहता .

# आंख एक नही और कजरौटा दस- दस - व्यर्थ का आडम्बर  
जैसे - योजना आयोग में 35  करोड़ का शौचालय बनने पर कहना ही पड़ा कि   आंख एक नही और कजरौटा दस- दस .

# आठ  कनौजिया , नौ चूल्हे - मेल रहना  
जैसे - आज भाजपा के हाल देख कर  लगता है  , आठ  कनौजिया , नौ चूल्हे

# आई तो रोजी नही तो रोजा - कमाया तो खाया , नही तो भूखे ही सही
जैसे - भारत में आज भी गरीब लोग है , जिनका जीवन इस कहावत को चरितार्थ करता है - आई तो रोजी नही तो रोजा.

# आस-पास बरसे , दिल्ली पड़ी तरसेजिसको जरुरत हो , उसे मिले
जैसे - सरकार के गोदामों में सड़ रहे अनाज और देश में भूखे मरते लोगो को देख यही लगता है , कि  आस-पास बरसे , दिल्ली पड़ी तरसे .



# इक नागिन अरु पंख लगायीएक दोष के साथ दुसरे का जुड़ जाना
जैसे -


बुधवार, 4 जुलाई 2012

कहाँ गया सावन ?

मित्रो ,
सावन ने दस्तक ने दस्तक दे दी है , मगर मन  है  कि मानने को तैयार ही नही है ! अरे सावन ऐसे आता है ? इस बार के सावन को देख कर लग रहा है, इन्द्र के यहाँ भी यूपीए कि सरकार बन गयी है. लगता है सावन भी घोटाले का शिकार हो गया है . अब प्रणब दा सरकार में रहे नही वरना  आंकड़े पेश करते और बताते आया सावन झूम के ! सचमुच किसानो की आँखों से आंसू टपकने  लगे .......फसलें सूखने की कगार पर आ  गयी है , तो दूसरी और असम में  ब्रम्हपुत्र  की बाढ़ से हजारो लोग त्राहि-त्राहि कर रहे  है 
कभी बाढ़ तो कभी सूखा
भारत  भूखा का भूखा  !
सावन का नाम सुनते ही बचपन की याद आने लगती है , बचपन में सिर्फ सावन के महीने  में ही खिलौने बिकते थे (तब चाईनीज खिलौने नही आते थे ). पूरी साल सावन का इन्तजार रहता था . खिलौनों की वैरायटी भी सीमित होती  थी .

शुक्रवार, 29 जून 2012

गंगा भले ही श्रेष्ठ हो मगर ज्येष्ठ है मैकलसुता !


अमरकंटक में नर्मदा  कुंड


नमस्कार मित्रो ,
 आज हम चर्चा करेंगे मध्य प्रदेश की जीवनरेखा कही जाने वाली एक अति महत्पूर्ण नदी "नर्मदा " की , जिसे पुराणों में रेवा के नाम से जाना गया है . भारत में बहने वाली लगभग सभी नदिया विवाहित मानी जाती है , जबकि सौमोदेवी - नर्मदा ही एक मात्र नदी है , जो अविवाहित है !   गंगा की उत्पत्ति की कथा तो आप सभी जानते होंगे , कि विष्णुपदी गंगा स्वर्ग से भागीरथ के प्रयास से पृथ्वी पर अवतरित  हुई . जबकि नर्मदा इसके पूर्व से ही भूलोक में विराजमान थी . अगर हम धार्मिक-पौराणिक संदर्भो से भी हटकर भूगर्भिक/ भौगोलिक प्रमाणों का सहारा ले तो हिमालय से निकलने वाली गंगा से नर्मदा प्राचीन प्रमाणित होती है
नर्मदा कुंड से नर्मदा का उद्गम
. जैसा  कि हमने भूगोल की किताबो में पढ़ा है , कि हिमालय एक नवीन वलित पर्वत है, जो प्लेट- विवर्तनिक प्रक्रिया के फलस्वरूप उत्पन्न हुआ है . अर्थात इसकी उत्पत्ति बहुत बाद में हुई है . इसके पूर्व यहाँ पर टेथिस सागर था , तो जाहिर है कि उससे निकलने वाली गंगा भी हिमालय के बाद ही उत्पन्न हुई होगी . जबकि भूगर्भिक साक्ष्य बताते है , कि अरावली , विंध्यांचल , सतपुड़ा और मैकल जैसी श्रेणिया अवशिष्ट पर्वतो का उदहारण है , जो कि हिमालय से बहुत पहले से मौजूद है .तो मैकल पर्वत की अमरकंटक चोटी (जिला  - अनुपपुर, मध्य प्रदेश) से निकलने वाली नर्मदा भी गंगा से बहुत प्राचीन है.
भेड़ाघाट (जबलपुर ) में संगमरमरी घाटी में नर्मदा   
नर्मदा के विवाह के सम्बन्ध में एक पौराणिक कथा मिलती  है - नर्मदा का विवाह सोनभद्र नाम के युवक से होने जा रहा था , तभी नर्मदा को पता चला कि सोनभद्र एक आदिवासी कन्या जोहिला से प्रेम करता है . तब नर्मदा क्रोधावेश में अमरकंटक से दक्षिण - पश्चिम दिशा की ओर नदी रूप में आगे बढ़ने लगी , नर्मदा को रोकने के लिए पंडित- नाई आदि पहाड़ो के रूप में खड़े हुए  , मगर नर्मदा सारी बाधाओ  को चीरकर आगे बढती  रही. इधर अमरकंटक में ही सोनभद्र नद का रूप लेकर उत्तर- पूर्व दिशा में आगे बढ़ा , जहाँ उसका मिलन जोहिला से हुआ . इस तरह भारत की सारी नदियों में नर्मदा ही अविवाहित है . और इसी कारण से नर्मदा का महत्त्व अन्य नदियों से ज्यादा है . नर्मदा ही भारत की एकमात्र नदी है , जिसकी परिक्रमा की जाती है . हर साल हजारो लोग नर्मदा  की पैदल परिक्रमा पूरी करते है .   
पूरी दुनिया में अमरकंटक ही ऐसा स्थल है , जहा से तीन नदियों (नर्मदा, सोन और जोहिला) का उद्गम हुआ है , और तीन विपरीत दिशाओ में बहती है .  
नर्मदा घाटी परियोजना के अंतर्गत नर्मदा  और उसकी सहायक नदियों पर 29 बड़े , १३५ मध्यम और 3000 छोटे बांध बनाये  जा रहे  है, जिसका विरोध नर्मदा बचाओ आन्दोलन (मेधा पाटकर ) जैसे संगठन कर रहे है.    
नर्मदा अपने उद्गम से 8 - 10 किमी ० बाद कपिलधारा एवं दुग्धधारा जलप्रपात बनाती  है, जबलपुर के पास भेड़ाघाट में नर्मदा मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा जलप्रपात धूंआधार बनाती है . बडवाह के पास मान्धाता और दरदी नाम के दो जलप्रपात का निर्माण होता है . महेश्वर के निकट नर्मदा सहस्त्रधारा   जलप्रपात का निर्माण करती है .
ओम्कारेश्वर  में ॐ के आकार में नर्मदा का विहंगम दृश्य
नर्मदा मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले के अमरकंटक से निकल कर गुजरात में खम्भात की खाड़ी में मिलने तक 1312  किमी ० का सफ़र तय करती है , जिसमे सबसे ज्यादा मध्य प्रदेश में 1077  किमी ० प्रवाहित होती है . नर्मदा मध्य प्रदेश , महाराष्ट्र और गुजरात तीन राज्यों से बहती है . नर्मदा के बेसिन  का क्षेत्रफल 86,000  वर्ग किमी ० है . नर्मदा अनुपपुर , मंडला, डिंडोरी ,जबलपुर, नरसिंहपुर, होशंगाबाद , रायसेन , हरदा, खंडवा , खरगौन . धार, सीहोर  , देवास, बडवानी और अलीराजपुर जिलो से बहती है . 

गुजरात में सरदार सरोवर  बांध का सुन्दर दृश्य
 नर्मदा की सहायक नदियों के नाम भी बड़े दिलचस्प है . नर्मदा के दांये तट से मिलने वाली नदिया है - हिरन , तेंदोनी, बारना  , चन्द्र केशर , मान , हथिनी  आदि तो बांये तट से बंजर, दूधी  , शक्कर, तवा , गंजाल , छोटी तवा , कुण्डी देव, गोई आदि  


नमामि देवी नर्मदे


नर्मदा मैकल श्रेणी से निकल कर सतपुड़ा और विंध्यांचल पर्वत को विभाजित करती है . नर्मदा मध्य प्रदेश को भी दो भागो में बाँटती है नर्मदा के किनारे  बारह ज्योतिर्लिंगों  में से एक ओम्कारेश्वर स्थित है , जहाँ नर्मदा ॐ के आकार में बहती है  .नर्मदा के किनारे मांडू या मांडव नामक बहुत ही खूबसूरत पर्यटन स्थल है .गंगा जहाँ मनुष्यों के पापो को धोती है , तो नर्मदा जड़ वस्तुओ को भी देवत्व प्रदान करती है . तभी तो कवि शिव मंगल सिंह "सुमन " को लिखना पड़ा-
नर्मदा में   गिरा  जो कंकर 
 
                                                              हर- हर करता बना वो शंकर   !
तो कैसी लगी आप को नर्मदा की ये यात्रा .....जरुर बताना 
आपका अपना ही मुकेश पाण्डेय " चन्दन " 

























orchha gatha

बेतवा की जुबानी : ओरछा की कहानी (भाग-1)

एक रात को मैं मध्य प्रदेश की गंगा कही जाने वाली पावन नदी बेतवा के तट पर ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा हुआ. बेतवा की लहरों के एक तरफ महान ब...