विचारों की रेल चल रही .........चन्दन की महक के साथ ,अभिव्यक्ति का सफ़र जारी है . क्या आप मेरे हमसफ़र बनेगे ?
रविवार, 27 सितंबर 2009
हर घर में रावण छिपा है !!
कितनी बार आग लगाओगे, हर पग पर तम जाल बिछा है
एक्पुतला जल जाने से, सारा पाप नही मर जाता
पुतले में आग लगाने से , हर नर राम नही बन जाता
जब होगा अहम् , तब तक रावण नही मरेगा
अहम् ब्रम्हास्मि मार्के भी रावण यही कहेगा
स्वार्थ, ईर्ष्या, घृणा, पाप चारो और यही मचा है
कितने पुतले जलाओगे हर घर में रावण छिपा है ।
हर दिन सीता का अपहरण हो रहा है
पुलिस प्रशासन कुम्भकरण सो रहा है
गीध जटायु मूक बनके सब छिपा है
कितने पुतले.................................
आज रावण एक नही , उसके रूप कई है
अन्याय , अत्याचार के बाद भी वह सही है
मारते मारते रावण को आज राम थक जायेंगे
इतने रावण है की कई राम भी न मार पाएंगे
कितने पुतले जलाओगे , हर घर में रावण छिपा है
कितनी बार आग लगाओगे , हर पग पर तम जाल बिछा
मित्रो आप को विजय दशमी की हार्दिक शुभकामनाये । जैसा की हम जानते है की विजय दशमी बुराई
पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है । हम भारतीय ढोंग ज्यादा करते है, मतलब हम जो त्यौहार मानते है उनमे सन्देश तो बहुत अच्छे होते है , मगर वो सिर्फ लिखने कहने के लिए ही होते है । उन पर हम अमल करने की कंजूसी करते है । ऐसा क्यों ? हम इतने दोगले क्यों है ? सिर्फ परंपरा निर्वाह के लिए ही हम पर्व-त्यौहार कब तक मानते रहेंगे ?
मेरी ये बातें हो सकता है कुछ लोगो को जरुर बुरी लग सकती है ! मगर मुझे नादाँ समझ कर क्षमा करे क्योंकि सच यही है । जो कड़वा है । आप अपनी प्रतिक्रिया से जरुर अवगत कराये ताकि मुझे पता चल सके की मैं कितना सही और गलत हूँ ।
जय जय .......
बुधवार, 23 सितंबर 2009
ये जननी, ये माता !!
इतने में नारद ने पूछा - क्या कर रहे हो भगवन ?
नारद, मैं आज बना रहा हूँ , ब्रम्हांड की अनमोल काया
जिसमे होगा प्यार का सागर , और मेरी माया
या कह सकते हो, की मैं बना रहा हूँ अपना प्रतिरूप
जो देगी सबको छाया, करके सहन जीवन की धूप
वो हंसकर झेलेगी कष्ट, पर फ़िर भी करेगी सृजन
सृजनहार भले ही मैं हूँ , पर वो देगी सबको जीवन
उसके बिना अकल्पनीय होगी , सारी सृष्टि
प्रेम का प्रतीक , होगी उसकी वात्सल्य पूर्ण दृष्टि
आज मैं करके उसका सृजन , अपने को धन्य पाता
मुझसे भी बढ़कर होगी, ये जननी, ये माता !!
जैसा की आप सभी जानते है की आजकल पूरे देश में आदि शक्ति जगत जननी दुर्गा का महापर्व नवरात्री मनाया जा रहा है । इस पर्व में लोग दुर्गा के नारी स्वरुप का पूजन करते है , कन्याओ को देवी मान कर उनकी पूजा करते है । मगर क्या हम सचमुच इस पर्व का औचित्य या मतलब समझ पाए है ? क्या हम झूठ मूठ ही नही देवी के दिखावे के लिए दर्शन प्रदर्शन नही कर रहे है ? क्या बड़ी बड़ी झांकिया और पंडाल सजाने से देवी प्रसन्न हो जायेगी ? क्या नो दिन भूखे रहने से देवी की हम पर कृपा हो जायेगी ?
जब तक इस परम पवित्र देव भूमि भारत वर्ष में कन्या भ्रूण हत्या , दहेज़ के लिए बहुओं की हत्या ,घटता लिंगानुपात , महिलाओ के प्रति बढती हिंसा, अश्लीलता आदि कई अपराध उपस्थित है , तब तक हमारी आराधना निश्फक ही होगी ! ये मेरे अपने विचार है आप भी अपने विचारो से जरूर अवगत कराये ।जय जय ............
सोमवार, 21 सितंबर 2009
कुछ बचपन की यादें, शायद आपके साथ भी ऐसा हुआ हो !
मैं जिस कसबे में रहता था वहां हर साल कसबे के लोगो के द्वारा दशहरा के समय रामलीला खेली जाती थी । मेरे उम्र के भी कई बच्चे भी रामलीला में भाग लेते थे । मुझे भी राम लीला देखने में मजा आता और उसमे भाग लेने का मन करता था। कई बार कोशिश की मगर कोई फायदा नही हुआ । मुझे किसी पत्र के लायक नही समझा गया । पर अपनी किस्मत भी जोरदार थी , एक जब दशहरा के दिन रावन बध का मंचन होना था । रामलीला का यह प्रसंग देखने दूर दूर के गांवों से लोग आए थे । राम-हनुमान में जोरदारhओ रही थी । मैं रामलीला के प्रबंधक के यहाँ हर दिन की तरह एक आशा के साथ पंहुचा । मगर आज तो गजब हो गया इस विशेष दिन मुझे वानर सेना के एक वानर के रोल के लिए चुना गया। मैं स्वाभाविक रूप से बड़ा खुश !!
अब रामलीला शुरू राम और हनुमान के बीच युद्ध प्रारम्भ :
मैं मुह में लाल रंग पोते हाफपेंट लाल रंग के पहने और पीछे छोटी सी पुँछ लगाये मंच पर जेश्रीराम चिल्लाते हुए आया । मैं मन में सोच रहा था की शायद मेरा मुकाबला महाबली रावन से होगा । अपनी इस उपलब्धि पर मैं इतना खुश था , की शायद रामायण सीरियल के बानर भी इतने न हुए होंगे !
पर ये क्या हो गया !!
मेरे मंच पर आते ही विशालकाय शरीर वाले बड़ी मूछो वाले दुष्ट रावन ने अट्टहास किया -
हीही हां हा हा और मैं छोटा सा बानर कुछ डर सा गया ! फ़िर रावन मेरी तरफ़ लपका ...... मैं डर के मरे मंच के पीछे भगा ........ मगर बलिष्ट दुष्ट रावन ने मुझे पकड़ लिया । सरे दर्शक हस हस के लोट पोत हो रहे थे , मगर मेरी हाफ पेंट गीली हो रही थी !!
.....मैं मम्मी मम्मी चिल्लाया मगर उस दुष्ट को तरस न आया !......उसने मुझे उठाया ......और .......और....... फ़िर उठाकर हनुमान की तरफ़ फेक दिया ....हनुअमान ने लपका ... दर्शको ने जोरदार ताली बजाई । मुझे नानी याद आई ..... हनुमान जी ने भी गुस्सा दिखाया और ..... हाय ! मेरी फूटी किस्मत ........हनुमान जी ने भी मुझे लपक के रावन की ओरफेंका ....... संकट मोचन मेरे लिए संकट दायक हो गये!! ..... फ़िर रावन ने लपका ....फेका ... हनुमान ...लपका ..... फेका.... रावन ...... हनुमान .......रावन ......हनुमान ......रावन ........फ़िर अचानक रावन ने लपकने में ढील की मैं धडाम से नीचे गिरा... ... जान बची तो लाखो पाए !....... मैंने फ़िर आव देखा न तव ........फ़िर ऐसे भगा की सीधे अपने घर जाकर ही रुका !
हूउह अरे भाई साँस तो ले लेने दो ......जेश्रीराम
अब बस आज थक गया हूँ । अभी जब जब दशहरा आता है, या तेलेविसन पर रामायण चलती है तो मेरे रोंगटे खड़े हो जाते है !!
तब से मैंने कभी रामलीला नही देखि !
आखिर में बचपन में खेली ज्ञऐ कुछ खेलो की लीने शायद आपने भी ये खेले हो ?
आजकल के होनहार तो कम्पूटर और मोबाईल से ही काम चला लेते है । जे जे ....
1.) मछली जल की रानी है,जीवन उसका पानी है।हाथ लगाओ डर जायेगीबाहर निकालो मर जायेगी।
2.) पोशम्पा भाई पोशम्पा,सौ रुपये की घडी चुराई।अब तो जेल मे जाना पडेगा,जेल की रोटी खानी पडेगी,जेल का पानी पीना पडेगा।थै थैयाप्पा थुशमदारी बाबा खुश।
3.) झूठ बोलना पाप है,नदी किनारे सांप है।काली माई आयेगी,तुमको उठा ले जायेगी।
4.) आज सोमवार है,चूहे को बुखार है।चूहा गया डाक्टर के पास,डाक्टर ने लगायी सुई,चूहा बोला उईईईईई।
5.) आलू-कचालू बेटा कहा गये थे,बन्दर की झोपडी मे सो रहे थे।बन्दर ने लात मारी रो रहे थे,मम्मी ने पैसे दिये हंस रहे थे।
6।) तितली उडी, बस मे चढी।सीट ना मिली,तो रोने लगी।।driver बोला आजा मेरे पास,तितली बोली " हट बदमाश "।
7.) चन्दा मामा दूर के,पूए पकाये भूर के।आप खाएं थाली मे,मुन्ने को दे प्याली में
क्यों आपको भी अपना बचपन याद आया की नही ? सही बताना !
रविवार, 20 सितंबर 2009
मजहब
तो भइया क्यो होती है , मजहब के नाम पे लडाई
क्या मजहब के बन्दों को मजहब का पाठ समझ न आया
क्यों मजहब के नाम पर, इन बन्दों ने खुनी रंग चढाया
इनको मजहब का पाठ पढ़ा दे कोई ज्ञानी
समझा दे इनको खून खून है , नही है पानी
अमन का संदेसा देकर इनको, बंद करवा दे मौत का तमाशा
होता रहा ये सब तो कुछ न बचेगा, न मजहब न खुनी प्यासा
मन्दिर के घंटे चीखे, चिल्लाएं मस्जिद की अजाने
मजहब की लडाई बंद कर दो, ओ मजहबी दीवाने
अपने मंसूबो की खातिर, क्यों करते हो मजहब बदनाम
एक संदेशे नानक ईसा के , एक ही आल्लाताला राम
मित्रो , आप सभी को नवरात्री और ईद की दिल से ढेर शुभकामनाये ।
रविवार, 13 सितंबर 2009
कुर्सी खामोश है !!
सबसे सस्ती कारऔर सबसे महंगी दाल
कहीं बाढ़ से लोग त्रस्त,कहीं पर सूखा
आम इन्सान परेशां खड़ा , नंगा और भूखा
जिन्दगी की साडी मिठास ले महँगी हुई चीनी
बची खुची इज्ज़त भी कुदरत ने छिनी
आंकडो में महंगाई और मुद्रास्फीति घट रही है
हकीकत में क़र्ज़ से किसान की छाती फट रही है
कहीं पानीसे तबाही, कहीं पानी की कमी
पर कुर्सी खामोश है, सलामत जो उसकी जमीं
मित्रो , देश के हालत आपसे छुपे नही है , मगर हमरी खाशी ही कुर्सी को खामोश किए है । आज बढती महंगाई के कारन एक आम आदमी को दाल रोटी भी ढंग से नसीब नही हो पा रही है , आम आदमी की सरकार के मंत्री तो फाइव स्टार होटलों में मजे कर रहे मगर आम आदमी .............?
यही हाल आम आदमी की भाषा हिन्दी का भी है , जिस तरह सत्तानशीं लोगो को आम आदमी की याद चुनावो में आती है , उसी तरह हिन्दी की याद भी सितम्बर के महीने आती है । कल हिन्दी की पुण्यतिथि ओफ्फ्हो क्षमा करना हिन्दी दिवस है । हम क्यों साल के कुछ दिन हिन्दी को कुछ दिन याद कर उसे श्रद्धांजलि देते है ? मैं आप सभी हिन्दी ब्लोगेर्स को नमन करता हूँ , जो हमेशा हिन्दी की लाज बचाए रखते है । उड़नतश्तरी वाले समीर जी तो विशेष रूप से नमन योग्य है जो परदेश में भी हिन्दी की अलख जगाये हुए है । खैर मुझ अज्ञानी से जो भी भूल हुई हो उसे क्षमा करना ! आप सभी को भारत की रास्त्रभाषा दिवस की कोटि कोटि शुभकामनाये ॥
जे हो हिन्दी , हिंदुस्तान की शान
शुक्रवार, 11 सितंबर 2009
भैंस चालीसा
मित्रो ये मेरी रचना नही है , इसे किसी मित्र ने ही मुझे ऑरकुट पर स्क्रैप किया था , मुझे लगा की आप सभी को इससे रु-ब-रु करू। कैसी लगी जरुर बताना ।
मंगलवार, 8 सितंबर 2009
भारत भी बन सकता है , शत प्रतिशत साक्षर !!
चलिए सरकार की खामिया बहुत है , जब सरे कुएं में भंग हो तो किसे दोष दे ?
अब बात करते है , की भारत १०० % साक्षर कैसे बने ? भारत में सबसे ज्यादा विश्वविद्यालय है । हमारे देश में हर साल लगभग ३३ लाख विद्यार्थी स्नातक होते है । उसके बाद बेरोजगारों की भीड़ में खो जाते है ! (अगर किस्मत या पैसे वाले न हो तो ) मेरे अनुसार हम हर साल स्नातक होने वाले विद्यार्थियो का सही उपयोग साक्षरता को बढ़ने में कर सकते है । स्नातक के पाठ्यक्रम में एक अतिरिक्त विषय जोड़ा जाए , जो सभी के लिए अनिवार्य हो । इस विषय मे सभी chhatro को एक व्यक्ति को साक्षर बनने की jababdari लेनी होगी । shikshako के द्वारा इसका mulyankan किया जाएगा । अन्तिम वर्ष मे mulyankan के aaadhar पर anksoochi मे इसके ank भी जोड़े जाए । इससे हर साल लगभग ३३ लाख लोग साक्षर होंगे । वो भी बिना किसी सरकारी kharch के !
इस vyawstha का ये फायदा होगा की , सरकार का bahumulya पैसा तो bhachega ही sath ही chhatro को uttardyitv की भावना भी utpan होगी ।
maaf कीजिये takniki gadbadi के karan मैं इस lekh को यही samapt करने को मजबूर हूँ ।
गुरुवार, 3 सितंबर 2009
गणेशोत्सव और कांटा लगा !!
लेकिन धार्मिक की जगह, फिल्मी गीत बजा रहे थे
बंगले के पीछे कांटा लगा, बुद्धि विनायक सुन रहे थे
मनो काँटों से बचने के लिए जाल कोई बुन रहे थे
बेरी के नीचे लगा हुआ था, काँटों का अम्बार
लहूलुहान से बैठे गजानन , होके बेबस और लाचार
सोच रहे थे , कब अनंत चतुर्दर्शी आएगी ?
जाने कब बेरी के काँटों से मुक्ति मिल पायेगी ?
मुश्किल हो गया, इस लोक में शान्ति का ठिकाना
नाक में दम कर दिया , और कहते अगले बरस जल्दी आना !
मैं इसी बरस जल्दी जाने की सोच रहा हूँ
अपने फिल्मी भक्तो के लिए अपने आंसू पोछ रहा हूँ
मुझसे बढ़कर , इनके लिए फिल्मे और फिल्मी संसार
फ़िर गणेशोत्सव क्यों मनाते ? करते क्यों मुझ पर उपकार ?
मित्रो , गणेश विसर्जन के साथ गणेशोत्सव समाप्त हो गया , पर दुःख की बात है की लोकमान्य तिलक ने जिस उद्देश्य के साथ इसे शुरू किया उसकी पवित्रतता तो जाने कब की ख़त्म हो गयी है। अब लोग इस परम्परा को बस निभा रहे है ! उनमे वो श्रद्धा और भक्ति की भावना नही बची है । शेष भगवन मालिक है । गणपति बाप्पा मोरिया रे ......
मंगलवार, 1 सितंबर 2009
वाजपेयी का काव्य पाठ और खली पड़ी कुर्सियां !!
पिछले दिनों १३ औगस्त को डॉ हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय, सागर (म०प्र०) के हिन्दी विभाग द्वारा हिन्दी के जाने माने कवि, राजनयिक और पत्रकार डॉ अशोक वाजपेयी जी का काव्य पाठ aआयोजित किया गया था । पर हाय रे विडम्बना और विश्वविद्यालय प्रशासन की व्यवस्था की इतने नामी कवि का काव्य पाठ और उसकी सूचना तक आम लोगो को नही दी गयी । परिणामस्वरूप कार्यक्रम में जब डॉ वाजपेयी अपने जन्मस्थान में आयोजित इस कार्यक्रम में अपना काव्य पाठ कर रहे थे ,तो विश्वविद्यालय के स्वर्ण जयंती हाल में बमुश्किल पचास लोग भी नही थे । अपने जन्म स्थान पर इतने नामी कवि के काव्य पाठ पर दिल रो आया , की विश्वविद्यालय प्रशासन ने अगर सिर्फ़ स्थानीय समाचार पत्रों में छोटी सी ख़बर भी दे दी होती तो डॉ वाजपेयी के हजारो प्रशंशक टूट पड़ते । डॉ वाजपेयी ने कार्यक्रम में अपनी १९ कविताये और सागर (म० प्र० ) शहर के अपने अनुभव सुनाये । पर उनकी आँखों में कही नामी भी नज़र आई कि जिस शहर कि तारीफ वो अपने हर कार्यक्रम में बड़ी शिद्दत के साथ करते है , उस शहर को हर जगह बड़े गर्व के साथ अपना जन्म स्थान बताते है । उस शहर ने उनके साथ इतनी बेरूखी दिखाई । पर मैं अपनी इस पोस्ट के माध्यम से डॉ अशोक वाजपेयी जी को ये बताना चाहता हूँ कि बेरूखी सागर वासियो ने नही बल्कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने की , वरना शहर के लोग अब भी आप को अपने शहर का गौरव मानते है । आज भी सागर वासी बड़े फक्र से बताते है , की डॉ अशोक वाजपेयी जी सागर शहर की देन है ।
बड़े शर्म की बात है की प्रशासन की गलतियाँ लोगो को भुगतनी पड़ती है , आज भी मुझ जैसे सैकडो लोगो को इस बात का रंज है , की हम डॉ वाजपेयी जी का काव्यपाठ नही सुन पाए ।
खैर दर्द सहने के लिए है ,मुल्क का आम इंसान
खुशियाँ तो खास लोगो की होती है , शान !
जब दर्द की बात चली है तो , आज आपसे कुछ दर्द और बाँटना चाहता हूँ। घबराइये मत जनाब मैं अपनी निजी समस्याए लेकर नही बैठ रहा हूँ । अमा मियां दुनिया में वैसे क्या कम पिरोब्लम है , जो मैं आपको अपनी पिरोब्लम में उलझाऊ । खामखा मेरी टाइम पास करने की आदत तो है , नही ! पिछली दो पोस्टो से मेरे कुछ पाठक मित्रो ने आदेश किया की जनाब थोडी बड़ी पोस्ट लिखा करो और कुछ फोटो शोतो भी लगाया करो !
अब मैं आपको बताऊ की पहली बात समय आभाव की है । और दूसरी ये की मैं ठहरा नया नया बिलागर !! मुझे अभी भी खुदा कसम अपनी पोस्ट में फोटू लगाना नही आया , एक बार उड़नतश्तरी वाले समीर जी से पूछा था , मगर उनकी बताई बातें मेरे भेजे के ऊपर से निकल गई , इसमे समीर का कोई दोषः नही , मैं ही अल्पबुद्धि जो ठहरा । समीर जी तो बड़े परोपकारी है , मेरी बुद्धि में जरा तकनिकी बातें देर से आती है , इसलिए चाहकर भी मैं अपनी पोस्ट में फोटू नही दे पा रहा हूँ । अगर आप में कोई सज्जन जरा सरल भाषा में मेरी मदद करे तो उसका मैं आभारी रहूँगा । लो मियाँ मुआफ करना मैं नादाँ अपनी ही लेके बैठ गया ।
अभी आज के अखबार में एक अच्छी ख़बर पढने को मिली की , अपने पड़ोसी देश भूटान में स्थानीय चुनावो में उम्मेद्वारो की न केवल लिखित परीक्षा होगी , और उनका मौखिक साक्षात्कार भी होगा जिसमे में उनसे प्रशासनिक, राजनेतिक और सामाजिक सवाल पूछे जायेंगे !
इश्वर से प्राथना कीजिये की हमारे नेताओ को सद्बुद्धि दे ताकि वे भी कोई इसी तरह का कानून बनाये ! अरे भाई जब पाकिस्तान में भी जब चुनाव लड़ने की योग्यता स्नातक है , तो हम यार इतने गये गुजरे नही है ?! खैर अपनी तो हमें मालूम है , नेताओ की खुदा जाने ? क्यो आप ही कुछ बोले ?
शुक्रवार, 28 अगस्त 2009
कभी बाढ़ कभी सूखा , भारत भूखा का भूखा
देर के लिए क्षमा चाहता हूँ। दरअसल मैं इन दिनों में बिहार ,बंगाल, उडीसा और आन्ध्र परदेस की सैर पर था । इन राज्यों की सैर में मैंने अतुल्य भारत की असली छवि देखि । जहाँ आंध्र की चमक देखि वही उडीसा की उधासी भी आँखों में आंसू लेन के लिए काफी थी । बिहार में बदलाव की आहात सुनी तो आमार सोनार बांगला भी देखा । चिल्का झील की विराटता देखि विशाखापत्तनम में जीवन में पहली बार सागर दर्शन भी किया । दोस्तों , अभी वरिश का मौसम चल रहा है , लेकिन देश के २५० से ज्यादा जिलो में सूखा फैला है । जमीन में पड़ी दरारों को देख कर किसानो की छाती फट पड़ने को आतुर है , आँखों में पानी हाई मगर आसमान सूना है । ये कहर कम नही था , रही सही कसार महंगाई ने पुरी कर दी । दाल १०० रूपये किलो बिकी तो शक्कर ४० रूपये किलो । देश के कुछ इलाको में पानी इतना गिरा की sailab सब कुछ भा ले gya । बिहार के ३८ में से 26 सूखा grast है तो baaki १२ baadhgrast है । हाँ वरिश पर मेरी कविता "pahli fuhaar " hind yugm के july के padcast kvi sammelan में jarur सुने ।
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रविवार, 16 अगस्त 2009
देशभक्ति से बस इतना नाता है, दीवालों पे लिख देते है दिवाली में पुत जाता है
तो कल आप सभी ने जम कर स्वतंत्रता दिवस की खुशियाँ मनाई, है न ! मगर आज मैंने जब सड़के और गलियां देखि तो दिल रो उठा । जी हाँ जिस तिरंगे झंडे की शान में कल अखबारों, टी० वी० और रेडियो में कई नगमे , तराने गए जा रहे थे । आज हालत-ऐ-बयाँ कुछ और थी । जी हाँ सडको , नालियो और जाने कहाँ -कहाँ हमारे देश की आन बान और शान तिरंगा पड़ा हुआ था । जी हाँ , कल अभिवावकों ने अपने बच्चो को तिरंगे तो खरीद के ले दिया , मगर उसकी इज्ज़त करना उन्हें नही बताया । उन्हें ये नही बताया की इस तिरंगे की खातिर हमारे देश के लोगो ने कितनी कुर्बानिया दी है। ये हमारे देश का प्रतीक है । हमें इस पर नाज़ होना चाहिए ।
हर साल हम जोर शोर से १५ अगस्त और २६ जनवरी मानते है ,मगर दूसरे दिन नालियो सडको पर हजारो कागज और पोलीथिन के तिरंगे फटे हुए बेकार हालत में मिल जाते है । क्या हम अपने देश की इस आन की रक्षा नही कर सकते है ?
मेरा आप सभी से अनुरोध है की तिरंगे को इस हाल से बचने के लिए आप और हम मिलकर कुछ कदम उठा सकते सकते है । :-
* बच्चो को तिरंगे की अहमियत के बारे में बताये ।
* बच्चो को तिरंगे और स्वंतंत्रता की कहानिया सुनाये ।
* हो सके तो कागज या पोलीथिन की जगह कपड़े का तिरंगा ख़रीदे , जो न केवल ज्यादा दिन चलेगा बल्कि उसका अपमान भी होने की कम सम्भावना है ।
* आप इस बारे में ज्यादा से ज्यादा लोगो को बताये , की भारतीय राष्ट्र ध्वज के अपमान से सम्बन्धी ध्वज संहिता बनी है । उल्लंघन प्र सजा हो सकती है
शनिवार, 15 अगस्त 2009
न बिजली न पानी , फ़िर भी खुश हम हिन्दुस्तानी !!
भारत भाग्य बिधाता !!
आप सभीको देश की स्वतंत्रता की ६३ वी वर्षगांठ की हार्दिक शुभकामनाये ?!!
भाई सब कह रहे है तो हमने भी कह दिया । ऐसा नही की हमें देश से प्यार नही है , देश के लिए मेरा दिल बेकरार नही है । फ़िर आप सोच रहे होंगे की मैं ऐसा क्या कह रहा हूँ ? अरे भाई इन ६२ सालो में हमने अपने देश के लिए क्या किया है , जो हम आज देश भक्ति का झंडा आज बुलंद किए है । आप कहेंगे की की देश ने बहुत तरक्की कर ली है । अमाँ मिया ये तो सबको मालूम है , मगर ईमानदारी से दिल पर हाथ रख कहिये आप ने अपनी और से देश के लिए क्या किया है ? कभी देश में फैले भ्रस्ताचार के खिलाफ आवाज़ उठाई है , जब आपका कोई स्वार्थ नही था ? कभी किसी अनपढ़ को पढ़कर देश में साक्षरता की दर बढ़ाने में कोई मदद की है ? या कभी किसी को कोई ग़लत काम करते हुए रोका है ,जब वो या उससे पीड़ित आपका कोई pahchan wala नही था ? ऐसे dhero swal खड़े है ? फ़िर इन्हे सोचे और कुछ करे देश के लिए तभी सही azadi का utsav होगा । ये मेरे विचार है vicharo से jarur avgat karaye ।
जय hind
शनिवार, 25 जुलाई 2009
आज भी आधी आबादी संघर्षरत है .
ये तीनो खबरें दिल को आहात करने वाली है । एक और जहाँ देश में महिलाये नित नये प्रतिमान रच रही है वही इस तरह की घटनाये दिल को आहत करती है । ये ख़बर उसी बिहार की है , जहाँ से भारत की पहली महिला लोक सभा स्पीकर हाल ही में मीरा कुमार जी बनी , बिहार ही भारत का पहला राज्य है जिसने सबसे पहले पंचायती राज में महिलाओ को ५०% आरक्षण दिया।
मित्रो आज भी देश में इस तरह की घटनाये हो रही है , जब देश चाँद को छू रहा है , कब तक ऐसा होता रहेगा ? शायद जब तक हम मूक दर्शक बने रहेंगे !
रविवार, 19 जुलाई 2009
वाह वाह नेताजी !!
हमारे देश के नेताओ के बारे में कहने को जी नही करता है, पूछे क्यो अरे भाई कुछ अच्छा करे तो लिखे , अब उनकी करनी पर लानत भेजने से कुछ होने वाला तो है नही । खैर आज नारद मुनि जी ने प्रेरित किया तो लिखने बैठ ही गये । हमारे नेता लोग जितना सरकारी धन का दुरूपयोग करते है , उतना दुनिया में शायद ही कही होता होगा। गलती पूरी उन्ही की नही है , हम ही तो उन्हें चुन के भेजते है । अब जब ग़लत लोगो को चुनेगे तो काम भी तो गलत ही करेंगे वो । अब जरा कुछ हमारे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के छेदों पर गौर फरमाए ।
*हमारे यहाँ चुनाव लड़ने की कोई योग्यता निर्धारित नही है , जबकि बिना स्नातक किए कोई पाकिस्तान में चुनाव नही लड़ सकता है ।
* हमारे यहाँ चुनाव प्रत्यासियो का चरित्र का सत्यापन नही किया जाता है, जबकि एक चपरसी की नौकरी लगने पर भी उसका चरित्र सत्यापन जहाँ -जहाँ वो रहा है वहां की पुलिस से करवाया जाता है ।
*आप को किसी प्रत्याशियों को नकारने का कोई प्रावधान नही है।
* हम ख़ुद मतदान के प्रति जबाबदार नही है , मत देना हमर फ़र्ज़ नही है शायद !
और भी कई बातें है मगर आज इतना ही बाकि फ़िर कभी , खैर इन में कुछ सवाल आपके के छुपे है ,उनके जवाब जरुर देना । शुक्रिया नारद जी
गुरुवार, 16 जुलाई 2009
ब्लोगिंग आख़िर एक फुरसतिया काम है !!.......जवाब दो
मेरे एक मित्र है ,जो इंटरनेट के भी अच्छे जान कार है । बहुत दिनों बाद उनसे मुलाकात हुई तो हाल चाल जानने की ओपचारिकता के बाद उन्होंने मुझसे पूछा कि भाई आजकल क्या चल रहा है ? मैंने भी ये जानते हुए कि वो इंटरनेट के जानकार है , इसलिए कहा कि आजकल ब्लोगिंग कर रहे है। लेकिन ये क्या ब्लोगिंग की सुनकर वो उल्टे मुझ पर भड़क उठे ! अरे ब्लोगिंग तो उन लोगो का काम है जिन्हें कोई काम नही होता,और उन्हें छपत की बिमारी होती है । मैंने कहा ऐसी बात नही है, आजकल ब्लोगिंग में बहुत अच्छा साहित्य और पत्रकारिता लिखी जा रही है । फ़िर जनाब जरा ऊँचे स्वर में बोले- अरे छोडो ये ब्लोगिंग वाले क्या जाने साहित्य लिखना और पत्रकारिता करना । जिनकी रचनाये किसी पत्र-पत्रिका में नही छपी तो वो ब्लॉग पर अपनी रचना पोस्ट कर साहित्यकार हो गया, जिन्हें किसी सनचार पत्र या न्यूज़ चेनल वालो ने किसी काम का नही समझा वो ब्लॉग पर पत्रकार बन गया। मैं खूब समझता हूँ इन ब्लोगेर्स को दो चार लेने लिख कर अपने आप को जाने क्या समझते है । एक तो इन्हे पढता ही कौन है ? सरे ब्लोगेर्स एक-दुसरे की रचनाओ पर झूठी टिप्पणिया देते है , वो इसलिए ताकि ताकि कोई उनके ब्लॉग पर आकर अपनी तारीफ के जवाब में एक अच्छी सी टिप्पणी कर जाए। बस सरे फुर्सतियो की फौज है ब्लोगिंग । हुंह कोई काम नही तो ब्लोगेर बन जाओ । तुम भी किस चक्कर में पड़े हो , अपने काम में मन लगाओ ।
रही बात तुम्हारी कविताओ और अभिव्यक्ति की तो छोडो भी , क्या रखा है हिन्दी साहित्य में ?
प्रेमचंद भी भूख से मर गए ! क्या दिया उन्हें हमने जिन्दा रहते हुए ? जिन्दगी मर दूसरो की पीड़ा लिखते रहे पर कभी उनकी पीड़ा को कोई समझा ?
लिखना है तो dear english में likho कहाँ हिन्दी के चक्कर में हो एक पैसे का munafa नही होने wala ।
चूँकि we मुझसे umra में बड़े थे , इसलिए उनसे कुछ नही कह paya पर मन में बहुत baicheni हो रही थी । सोचा aapse ही अपनी पीड़ा bant loo !
बुधवार, 15 जुलाई 2009
चुपके-चुपके भाग -१
गली से गुजरा तुम्हारी, मैं एक शाम चुपके-चुपके
दिल को बैचैन कर गई, तुम्हारी मुस्कान चुपके-चुपके
तुम्हारी मुस्कुराहटों ने घायल कर दिया, इस संगदिल को
बना लो हमे अपना सनम , होगा तुम्हारा एहसान चुपके-चुपके
कब तुम ओगी, है इंतजार इस दिल-ऐ-महफ़िल को
पलके बिछाए खड़े है हम, बन जाओ मेरे मेहमान चुपके-चुपके
आंखे थकने न पाए ,कुछ तो तरस आए मेरी मंजिल को
बता दो कि कब पुरा करोगी , मेरा ये अरमान चुपके-चुपके
राह-ऐ-मोहब्बत के सफर में बन जाओ हमसफ़र तुम
बनके हमदम ,हम दे देंगे तुम्हारी खातिर जान चुपके-चुपके
जिन्दगी में मेरी आकर दे देना एक डगर तुम
बाकि न रहेगा कुछ जिन्दगी में ,होगा एक मुकाम चुपके-चुपके
हालत क्या है हमारे, डाल देना एक नज़र तुम
इंतज़ार तेरी खुशबू का इस "चंदन" को, महकेगा सारा जहाँ चुपके-चुपके
इस रचन में आपने एक लड़के की ख्वाहिश और गुजारिश देखि है , मगर उसकी प्रेमिका का जबाब भी उसे बड़े जोरदार तरीके से मिलता है। प्रेमिका का जबाब मैं आपको अगली पोस्ट में इस शर्त में लिखूंगा की ये रचना आपको पसंद आई इसका प्रमाण आपकी टिप्पणियों से जरुर मिलेगा , इसी आशा के साथ आपका हर बार की तरह स्नेहिल मुकेश पाण्डेय "चंदन"
मंगलवार, 14 जुलाई 2009
छोटू
बाल मन गिलास धोये, या जूठे बर्तन समेंटू
हर नुक्कड़,हर चौराहे, हर चाय की दूकान पर
बर्तन मांजते, डांट सुनते बाज़ार या मकान पर
ग्राहकों की झिड़की और मालिक की डांट
खाली गिलासों सी जिन्दगी, जूठन में कहाँ ठाठ
हर ढाबे-दूकान में पिसता छोटू का मासूम बचपन
मासूमियत खोयी, बस बचा कप-प्लेट और जूठन
कब तक मिलेंगे ये छोटू, चाय बेचते, कचरा बीनते
आख़िर क्यों ? हम उनका बचपन छीनते
छोड़ के पाठशाला, कब तक बनेंगे जिन्दगी के शिष्य
सोच लो ! ये छोटू ही कल बनेंगे देश का भविष्य
आपका अपना ही मुकेश पाण्डेय "चंदन"
सोमवार, 13 जुलाई 2009
प्रेम मर रहा है !
बस भ्रम मिलन का बचा संसार
गगन छू रहा है बसुधा को
पर यथार्थ विरह है सर्वदा को
अब बची कहाँ प्रतीक्षा मिलन की
बस क्षुधा ही क्षुधा है तन की
दूषित हो चुकी है हर भावना
कहाँ है पवित्रता की सम्भावना
नही है यहाँ विरह की वेदना
मर चुकी जहाँ प्रेम की संवेदना
प्रिय की कमी नही है जीवन में
कमी है तो प्रेम की हर मन में
प्रेम मर रहा ही कोई सुने पुकार
बस भ्रम मिलन का बचा संसार
आपका अपना मुकेश पाण्डेय "चंदन "
रविवार, 12 जुलाई 2009
गरीब की बेटी
क्योंकि मैं हूँ एक गरीब की बेटी
सारी इच्छाए मेरी अधूरी रह गयी
गरीबी, मेरे सपनो की दूरी बन गयी
मेरे पास भी है, इच्छायों अ अनंत आकाश
मेरे भी है कुस्छ सपने, है कुछ करने की आस
काश, मैं भी किसी बड़े घर में पैदा होती
न तन पर है पूरे कपड़े , न खाने को है रोटी
हर जगह निगाहें, तन को है तरेरती
पर मदद के वक्त, आंखे है फेरती
न जाने क्यों किया, ये अन्याय उसने मेरे साथ
दे दिया जीवन , पर कुछ भी नही है मेंरे हाथ
दुनिया बड़ी जालिम है, न जीने न मरने देती
क्योंकि मैं हूँ एक गरीब की बेटी
आपका ही मुकेश पाण्डेय "चंदन"
शुक्रवार, 10 जुलाई 2009
समलैंगिगता की भयावहता और भविष्य
अरे भाई जब से दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैंगिगता पर अपना निर्णय क्या दिया पुरे देश में हल्ला हो गया , सरे न्यूज़ चैनल , अख़बार बस इसी को लेकर बहस जरी किए है । मुस्लिम संगठनो ने इसे इस्लाम विरोधी बताया तो संघ परिवार इसे भारतीय परम्पर के खिलाफ घोषित कर रहा है । बाबा राम देव भी इसके खिलाफ मोर्चा खोले बैठे है । अब तो सुप्रीम कोर्ट में भी इसके खिलाफ याचिका दायर हो गई है। अब जब चारो तरफ़ इसी का बोल बाला है तो मैंने सोचा क्यों न मैं भी अपनी तुच्छ बुद्धि से कुछ विचार प्रगट करू ।
समलैंगिगता कुछ मानसिक रूप से विकृत लोगो का शौक है। कुछ लोग कहते है कि समलैंगिग लोग जन्मजात ही होते है इसलिए इसे मान्यता देनी चाहिए । मेरे ख्याल से ये प्रक्रिया कुदरती तो बिल्कुल नही है , क्योंकि प्रकृति ने ऐसी कोई व्यवस्था नही की। और तो और जानवर भी इस तरह का व्यवहार नही करते यानि समलैंगिक लोग जानवरों से भी गए गुजरे है ! खैर कुछ लोग ऐसा चाहते है , इसलिए उसे कानूनी मान्यता मिलनी चाहिए ये कोई तर्क नही है , क्योंकि कुछ लोग तो अपराध और आतंकवाद भी फैलाना चाहते है , तो क्या उन्हें भी कानूनी मान्यता दे दी जानी चाहिए ?
अब जनाब ! सोचिये अगर भविष्य में संलैंगिगता को कानूनी मान्यता मिल गई तो कैसे कैसे नज़ारे होंगे ।
१.एक पिता बड़ी मुश्किल से पैसे जुटा के अपने एकलौते बेटे को पढने किसी बड़े शहर भेजता है। जब बेटा पढ़ाई पुरी कर के वापस लौटता है तो उसके साथ एक लड़का भी आता है , तो पिता पूछता है - बेटा ये तुम्हारा दोस्त है क्या ?
बेटा- नही पिताजी ये आपकी बहू है। मैंने और इसने शादी कर ली है !
२.एक पिता अपनी एकलौती लड़की की शादी के कई सपने संजोये बैठा है। उसने कई जगह रिश्ते तलासने शुरू कर दिए है । एक जगह बात पक्की होती है । अब लड़के वाले लड़की देखने आते है। लड़की ने शादी से इनकार करदिया ! कारन पूछने पर बताया की वो अपनी एक सहेली को प्यार करती है , और उसी से शादी करेगी !!
३.एक आदमी की पत्नी अपने पति से तलाक लेना चाहती है। जब वकील ने तलाक लेने का कारन पूछा तो उसने बताया की उसके पति को उसमे कोई दिलचस्पी नही है , क्योंकि वो समलैंगिक है !
४.लड़कियों को नै परशानी शुरू हो गई , अब उन्हें लड़के न तो देखते है और न ही छेड़ते है ,क्योंकि अब उन्हें अपने पुरूष दोस्तों से ही अपनी इच्छा की पूर्ति हो रही है । हाँ कुछ लड़को ने जरुर अपने पुरूष दोस्तों को आकर्षित करने के लिए सजना संवरना शौर कर दिया है !
५.केन्द्र सरकार सन २०२१ की जनगणना के नतीजो से चिंतित है। क्योंकि देश की आबादी अब बढ़ने की वजाय घट रही है ! देश में परिवार नामक सामाजिक संस्था अब धीरे धीरे लुप्त हो रही है। देश में समलैंगिको की बढती आबादी देश की आबादी घटने की सबसे बड़ा कारन है ।
ये मेरे अपने विचार है , आपका इनसे सहमत होना बिल्कुल जरुरी नही है । मगर अपने विचार भी जरुर प्रस्तुत करे ........आपका ही मुकेश पाण्डेय "चंदन"
orchha gatha
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