गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

जिंदगी और मेरा संवाद !


जिन्दगी ने मुझसे पूछा- तू चाहता क्या है ?
मैंने कहा- तू ही मेरी चाहत, तुझसे दिल लगाना चाहता हूँ तू औरो को आजमाती होगी, मैं तुझे आजमाना चाहता हूँ
जिंदगी - इतनी आसन नही मैं, जितना तुम समझ बैठे मेरी चाहत में जाने कितने मौत को गले लगा बैठे
मैं- गर तू आसान होती, तो मेरी चाहत होती
मौत तो मिलेगी ही ,उससे कहाँ राहत होती
मौत तो मंजिल है, पर सफ़र तो तू है
दिल्लगी समझना , ये इश्क की खुशबु है
जिन्दगी - मेरे सफ़र में , सब इश्क जाओगे भूल
कोई
खुशबु नही यहाँ, ही कोई फूल
मैं- होगा ये तुम्हारा नजरिया , पर तुम खूबसूरत हो
लाख समझाओ मुझे, पर तुम मेरी जरुरत हो
जिंदगी- मैं असीम हूँ, जैसे कोई सागर मिल गयी ,
तो करोगे क्या मुझे पाकर
मैं - तुम्हे सहरे , बहुत नज़रिये बदलने है
बहुतो की जिंदगी में 'चन्दन' के फूल खिलने है

हो खुशियों की बारिश , उस नए आँगन में


हो खुशियों की बारिश, उस नए आँगन में
मनचाहा प्यार मिले, प्रियतम मनभावन में
हर ख्वाहिश पूरी हो, ससुराल में हो इतना सुख
राज करो ऐसे, कि बाबुल को हो दुःख
योगेश से ऐसा हो योग हो , हो वर्षा का अभिनन्दन
परिणित जीवन ऐसे महके, जैसे हो कोई चन्दन
लाड-प्यार से पली गुडिया, वहां भी मिले प्यार
मायके का चिराग , रोशन करें वहां का घर संसार
हर पल, हर क्षण खुशियाँ हो, हो दुखो का सामना

उज्जवल हो परिणित जीवन , है यही शुभकामना
मेरी प्यारी मुहबोली बहन वर्षा शर्मा को वैवाहिक जीवन कि हार्दिक शुभकामनाएं

बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

ख्वाबो में तुम आते हो .....


हर गुजरती रात में ख्वाबो में तुम आते हो
और हर ख्वाब में दिल में आग तुम लगाते हो
आखिर क्या खता की हमने जो हमें ये सिला मिला
दिन--दिन क्यों मुझ पर इतने सितम ढाते हो
पल दो पल के लिए मिलती है कुछ खुशियाँ
क्यों दो पल का एक अहसास तुम जागते हो
ये मुस्कुराहते कभी हो पायेगी हकीकत
या सिर्फ ख्वाबो में ही तुम मुस्कुराते हो
वो ख्वाबो की तुम्हारी हसीं अदाएं
आखिर क्यों दिल में एक आरज़ू तुम जगाते हो
है उस हसीं पल का इंतज़ार, जब होगी मुलाकात
या फिर सिर्फ ख्वाबो के ' चन्दन' महकाते हो

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

अनादि काल से पूजते आ रहे है शिव !


सर्वप्रथम आप सभी को महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभ कामनाएं !
"शिव " का शाब्दिक अर्थ होता है , कल्याण । अर्थात शिव कल्याण के देवता है । (शिव का संहारक रूप भी पुनः नव सृष्टि के लिए होता है ) शिव को महादेव कहा जाता है , क्योंकि सभी देवो में महँ शिव ही है । बाकि देवताओ और शिव में सबसे बड़ा अंतर ये है , कि शिव सभी (देव , दानव , मानव, किन्नर , नाग , भूत-पिशाच आदि ) में सामान रूप से लोकप्रिय और पूज्य है । शिव की पूजा के साक्ष्य इतिहास में सिन्धु घाटी सभ्यता (२३५०-१७५० ई० पू० ) से ही मिलना प्रारंभ हो जाते है । सिन्धु घाटी में लोग शिव की पूजा लिंग रूप में तो करते ही थे , साथ ही यहाँ से शिव के पशुपति रूप की मुद्राएं भी मिली है है । सिन्धु घाटी में लिंग-योनी के मृदा स्वरुप बहुतायत से प्राप्त हुए है ।
सिन्धु घाटी सभ्यता के बाद आर्य (वैदिक ) सभ्यता में भी शिव की पूजा का वर्णन मिलता है । चूँकि वैदिक सभ्यता पशुपालन पर आधारित थी , और शिव का सम्पूर्ण परिवार ही इसका समर्थन करता है ( शिव का वाहन -बैल, पारवती का सिंह , गणेश का मूषक , कार्तिकेय का मयूर ) ।
हर काल में शिव का पूजन अन्य देवताओ से अधिक होता रहा । एक कारन यह भी है , कि शिव का पूजन अन्य देवी देवताओ से सरल भी है , और शिव जल्दी प्रसन्न होने वाले देवता है । यही कारन है कि हमरे देश में महिलाएं सोलह सोमवार , सावन सोमवार , हरितालिका तीज आदि त्यौहार बड़ी मात्रा में रखती है । और पुरुष भी शिव को अपना आराध्य मानते है । हर गाँव में आपको सबसे ज्यादा शिव के ही मंदिर मिल जायेंगे ।


जय जय शिव शंकर
बम बम भोले

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2012

करवटें बदलते रहे .........


आँखों में आंसू , दिल में कासक लिए करवटें बदलते रहे
पर वो न आये जिनके लिए , हम कबसे मचलते रहे

यूँ ही इन्तजार में कट गयी , न जाने कितनी रातें
और बस तन्हाईयों से होती रही हमारी मुलाकातें

इन्तहा हो रही है, हर घडी हमारे इन्तजार की
आखिर कब पूरी होगी , चाहत उनके दीदार की

जगी आँखों से ही हम कितने ख्वाब बुनते रहे
पर वो न आये , जिनके लिए हम कबसे मचलते रहे

अब सूख चूका है , इन आँखों का भी पानी
सोचा था हसीं होगी दास्तान , पर बनी दुःख भरी कहानी

हर पल आँखे ताकती है , उस डगर को
आखिर कब तरस आएगा , मेरे हमसफ़र को

हर शाम कितने चिराग जलते और बुझते रहे
पर वो न आये जिनके लिए , हम कबसे मचलते रहे

मुकेश पाण्डेय "चन्दन"

रविवार, 12 फ़रवरी 2012

ऐसी निभाना तुम प्रीत .........

सब भूल जाना चाहता हूँ , तुम्हारी बांहों में
रच-बस जाना चाहता हूँ, तुम्हारी निगाहों में
स्वर भी तुम हो , ह्रदय का स्पंदन भी तुम हो
तीर्थ सा पावन सरस, चन्दन भी हो तुम
तुम से शुरू होकर , तुम पर ही ख़त्म हो जीवन
मन में बसी एक सुन्दर सी मूरत हो प्रियतम
मेरा  सर्वस्य तुम, और मैं हूँ पर्याय तुम्हारा
रीत भले ही कुछ हो , पर तुम पर ही सब कुछ हारा
जिन्दगी भी तुम्हारे बिना, ख़त्म हो जाएगी
दम निकलने के बाद, मिलने की आरज़ू रह जाएगी
गीत अब तुम्हारे लिए होंगे. तुम जीवन का संगीत 
हो अमर अपना बंधन . ऐसी निभाना  तुम प्रीत       
मुकेश पाण्डेय " चन्दन "


शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

आज एक प्रण ठाना है......


आज एक प्रण ठाना है
कुछ बनके सबको दिखाना है
चाहे आये आंधी , या जाये तूफ़ान
सबसे टकरा जाऊँगा, बनके मैं चट्टान
लक्ष्य बिसरित होगा मन से
चाहे
संघर्ष कितना भी हो जीवन से
सच्ची लगन और होगा अटल इरादा
तिनके सी उड़ जाएगी, राह की हर बाधा
मिलेंगे
राह में जाने कितने कंटक-शूल
पर सिवाय लक्ष्य के जाऊँगा सब भूल
चाँद से भी उस पर जाना है
कुछ बनके सबको दिखाना है
मित्रो मैंने अपनी ये कविता ८ अगस्त २००५ को उस समय लिखी थी, जब मैं इलाहबाद में सिविल सर्विस की तैयारी करने पंहुचा ही था । तब से आज सफलता मिलने तक लगभग साढ़े ६ वर्ष का समय लग गया , मगर कभी भी हार नही मानी , बस लगा रहा अपनी मंजिल की और पहुचने में ............आज भले ही मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग के माध्यम से आबकारी उप निरीक्षक पद जरुर मिला गया है , मगर अभी तो सफ़र में एक मील का पत्थर मिला है , मंजिल तो बाकि है ...............

अब दिल में एक आरजू है


अब दिल में एक आरजू है
कुछ करने की जुस्तजू है
लगा के पंख उड़ना है आसमान में
करके कुछ दिखाना है इस जहाँ में
सबसे अलग मंजिल पानी है
बस कुछ जुदा करने की ठानी है
कदमो के के नीचे करना है आफताब
क़ल होगी ये हकीकत ,न होगा ये ख्वाब
दरिया के साथ , हम नही बहने वाले
हम तो है, दरिया का रुख मोड़ने वाले
दुनिया देखेगी हमारी परवाज
सबसे अलग होगा "चन्दन" का अंदाज
मुकेश पाण्डेय "चन्दन"

बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

तन्हाईयाँ ..........


बहुत कुछ आदमी को सिखा जाती है तन्हाईयाँ
जिन्दगी के सफ़र की मंजिल दिखा जाती है तन्हाईयाँ
जिन्दगी के कई राज़ अपने में छुपा लेती है तन्हाईयाँ
ऊंचों-ऊंचों को भी झुका देती है तन्हाईयाँ
किसी की हमदम बन जाती है तन्हाईयाँ
तो किसी को हर कदम याद आती है तन्हाईयाँ
कभी लाख जिल्लतो से बचाती है तन्हाईयाँ
तो कभी मन में उथल पुथल मचाती है तन्हाईयाँ
कभी किसी की याद दिला जाती है तन्हाईयाँ
कभी किसी की फ़रियाद सुना जाती है तन्हाईयाँ
तनहा करके भी भीड़ में गम कर जाती है तन्हाईयाँ
हँसते हुए भी आँखे नाम कर जाती है तन्हाईयाँ

मंगलवार, 31 जनवरी 2012

न जाने क्यूँ वो मुझसे रूठ गये !

न जाने क्यूँ वो मुझसे रूठ गये
एक पल में ही सरे रिश्ते नाते टूट गये
क्या खता की थी हमने, जो हमको ये सिला मिला
क्या ज़रा सी आह भरने पर, हमको ये जलजला मिला
उनको हमारी छोटी सी गलती पर, जरा भी रहम न आया
बड़े जालिम निकले वो, जो हमपे इतना सितम ढाया
उनके साथ ही , उनकी यादें , बातें , सारे कारवां पीछे छूट गये
न जाने क्यूँ वो मुझसे रूठ गये
निगाहें जब हम उनसे मिलते है वो अपना चेहरा मोड़ लेते है अब
हमने भी देखना बंद कर दिया , हम भी दूर से हाथ जोड़ लेते है अब
हमसे रुखसत जो वो होंगे, तभी नज़रे मिलायेंगे हम
गर जालिम है वो , तो हम भी कर सकते है जुलम
सपने निकले कच्ची मिटटी के , जो झट से टूट गये
न जाने क्यूँ वो मुझसे रूठ गये



सोमवार, 9 जनवरी 2012

उपहार :कविता


एक दिन जरुरी काम से , मैं गया एक कार्यालय
वहां सब मस्ती में थे, सब की थी अपनी लय
काम करवाने की नीयत से मैं, पहुंचा अधिकारी कक्ष की ओर
चपरासी ने रोका, साहब बिजी है! आना किसी दिन और
बहुत जरुरी काम है , नही है मेरे पास फिर आने का वक़्त
लौट जाओ , बिना उपहार वालो के लिए कानून है सख्त
"उपहार " आपके कहने का क्या प्रयास है ? क्या साहब का जन्मदिन आसपास है ?
जन्मदिन वाला उपहार साहब स्वीकार नही करते बिना उपहार वालो के लिए अपना समय बेकार नही करते
अरे भाई , ऑफिस में क्या है उपहार का काम ? उपहार तो है समारोहों का ताम झाम
ऑफिस में बिन उपहार के नही बनता है कोई काम
क्योंकि भैया उपहार है, "रिश्वत" का नया नाम

शनिवार, 7 जनवरी 2012

नव वर्ष आया .................पत्रिका :जबलपुर में १ जनवरी को प्रकाशित


आप सभी को देर से ही सही नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाये , दर असल मैं जबलपुर में मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग -२०१० की मुख्य परीक्षा में व्यस्त था । अभी फुर्सत मिली है , तो आपके सामने पत्रिका (अखबार) के १ जनवरी के नैनो अंक के मुखप्रष्ठ पर पहली कविता मेरी प्रकाशित हुई , हालाँकि अन्दर के पृष्ठों में २०-२५ कवितायेँ थी । उसी को ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर रहा हूँ .......
नव, नूतन , नवल नया वर्ष आया है
नई उमंग, नई आशा संग लाया है
कुछ ऐसी खुशियाँ मिले नए साल में
स्वाभिमान जगे, यूं तिलक लगे भाल में

अश्रु बहे तो खुशियों से होके सराबोर
दमके जीवन, मुस्कान हो हर और
चाँद सितारे झोली में, ऐसा हो दामन
सब कुछ शाश्वत , मन हो पावन
रात भी आये , पर भटके न सवेरा
तपती धुप में हो, चैन का बसेरा
नव, नूतन , नवल हो अभिनन्दन
हर ओर खुशबू हो , जैसे महके 'चन्दन'

मंगलवार, 1 नवंबर 2011

सब कुछ नया नया ............सब कुछ अलग

दोस्तों कई बार ऐसा होता है, कि आपके जीवन में अचानक कोई आता है और आपका जीवन बदल जाता है। इसी तरह से कुछ मेरे जीवन में भी कुछ इसी तरह से हो रहा है। हर सुबह का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार रहता है ............ जिन्दगी में कुछ नयी उमंगें.................सपने..................अपने .......................घर ................घास...........पलास..........आस-पास .............हरियाली..........दिवाली .........................सब कुछ अच्छा लगने लगा है ।
वर्ष २०११ में बहुत सी सफलताएं मिली है।

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2011

दिवाली : एक पर्व और उद्देश्य



दिवाली पर्व के बारे में अनेक कथाएँ और किंवदंतियाँ प्रचलित है। वैसे तो यह त्यौहार धन और प्रकश से जुदा है । मगर इस त्यौहार पर साफ़-सफाई और स्वच्छता की परंपरा भी जुडी है । हमारे ग्रंथो में कहा गया है - तमसो माँ ज्योतिरगमय अर्थात हे माँ ! मुझे अन्धकार से प्रकाश की और ले चलो । इसी उद्देश्य की सार्थकता को प्रतिबिंबित करता है ये त्यौहार । मगर आज हम बाजारवाद और आधुनिकता के अन्धानुकरण के कारन इस त्यौहार के मूल उद्देश्यों को भूल कर केवल आडम्बरो और कर्मकांडो के पीछे भाग रहे है ।



हम बाहरी चमक दमक को बढ़ने में तो खूब लगे है , मगर कभी खुद के भीतर झांक कर देखा है कि कितनी गंदगी है ?



हमने घरो के बाहर रोशनियों से जगमग कर दिया है , मगर कभी अपने भीतर के अँधेरे को दूर कर पाए है ?



हम धन कि आस में लक्ष्मी को पूजते है , मगर कभी धन का सही अर्थ समझ पाए है ?



दुसरो को मिठाईयां तो खूब बांटते है , मगर उनसे कितनी बार मीठे बोल बोले है ?






दीपावली को भगवन राम से भी जोड़ कर देखा जाता है । कहते है कि, भगवान राम रावन को मार कर इसी दिन अयोध्या वापिस लौटे और इस ख़ुशी में अयोध्या वासियों ने दीप मालाये सजाकर उनका आमवस्या कीअँधेरी रात में स्वागत किया तभी से दीप जलने की परंपरा चल पड़ी । एक कथा ये भी है ,किइसी दिन देव- असुर द्वारा किये गये समुद्र-मंथन के दौरान कार्तिक आमवस्या के दिन ही समुद्र से लक्ष्मी अवतरित हुई थी । इसीलिए इस दिन लक्ष्मी कि पूजा कि जाती है।



प्राचीन काल में हिन्दुओ के चार प्रमुख त्योहारों को चार वर्णों के आधार पर विभाजित किया गया था। ब्राम्हणों के लिए रक्षाबंधन, क्षत्रियो के लिए दशहरा, वैश्यों के लिए दीपावली और शूद्रो के लिए होली । इस तरह से दीपावली का ये पर्व वैश्यों के लिए अति महत्वपूर्ण होता है , सभी वैश्य इस दिन अपने पुराने बही खातो को बंद कर नए बही खातो का पूजन कर व्यापार की पुनः शुरुआत करते है ।



हिन्दू धर्म में सदैव ही प्रकाश को महत्वपूर्ण मन गया है , प्रत्येक शुभ अवसर की शुरुआत दीप जलाकर की जाती है । अग्नि को देवता का दर्ज़ा दिया गया है । भगवान बुद्ध ने जो अपना अंतिम उपदेश दिया था - अप्प दीपो भाव अर्थात अपना दीपक स्वयं बनो । बुद्ध की इस बात के निहातार्थ बहुत थे , जैसे जीवन के अन्धकार से लड़ने के लिए हमें स्वयं ही दीवाक बनना होगा,तभी जीवन के सरे अन्धकार दूर हो पाएंगे ........






अबकी दिवाली ऐसी मनाना



दियो में ही नही, दिल में भी ज्योत जलाना



दूर हो मन का अँधेरा, ऐसा हो प्रकाश



बस घरो में ही नही , जीवन में उजास



दीपमालाओं सा, प्रकाशित हो जीवन



दूर हो अँधेरा , उज्जवल हो मन



दूजो के जीवन में खुशियाँ लाना



अबकी दिवाली ऐसी मनाना



खुशियों से उन्हें भर दो, जो दिल है खली



रोशन हो उनको घर भी, जिनकी सूनी थाली



सबके घर हो रोशन , ऐसी हो दिवाली



दियो में ही नही , दिल में भी ज्योत जलाना



अबकी दिवाली ऐसी मनाना


शनिवार, 22 अक्टूबर 2011

दिल्ली : नाम बड़े और दर्शन छोटे ...!!

ये है दिल्ली नगरिया ...










आभाव का प्रभाव !!









मज़बूरी लेकिन जरुरी ...









स्वागतम दिल्ली !!!

नमस्कार मित्रो ,
पिछले ५-६ दिनों से दिल्ली प्रवास पर हूँ । इसके पहले सिर्फ एक बार ही कुछ घंटो के लिए ही दिल्ली आया था । इसलिए दिल्ली की वही तस्वीर मन में बसी थी , जो टी ० वी ० और फिल्मो में ही देखी थी । जब पहली बार आया था , तो निजामुद्दीन स्टेशन से मुखर्जी नगर तक ही गया था । रस्ते में राजघाट आदि होते हुए ही सुन्दर दिल्ली ही दिखी थी । मगर इन ५-६ दिनों में दिल्ल्ली की दूसरी ही तस्वीर दिखी है .....
चमचमाती इमारतों के पीछे बिलबिलाते झुग्गियो के लोग ............... सड़ांध मारते अतिक्रमित नाले -नालियां ......... दिन भर की भाग दौड़ के बाद रात भर पानी आने का इंतजार करते लोग ............. दिल्ली जल बोर्ड के टेंकरों के सामने पानी के लिए लड़ते झगड़ते लोग .................मेट्रो का सुख तो है , मगर रिक्शोवालो के सूखते कंठ भी है..........
वाह री ....... दिल्ल्ली

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2011

खींचो अब प्रत्यंचा .....



जब-जब घायल हुआ, धर्म का सांचा
तब-तब थामी किसी ने प्रत्यंचा
जब रावण का बढ़ रहा था अत्याचार
तब धर्म होने लगा बेबस और लाचार
ज्यो ही सीता का हुआ अपहरण, कराही प्रकृति
तब हुंकार भरी राम ने , झूम उठी धरती
धूमिल हुआ दशानन, कोई अधर्मी न बचा
अधर्म के विरुद्ध, जब राम ने खींची प्रत्यंचा
द्वापर में कौरवों ने पांडवों पर कहर ढहाया
सत्य- धर्म पांडवों का , दुर्योधन को न भाया
यूं ही बढती गयी, नित अधर्म की पराकाष्ठा
पर डिग न पाई , पांडवो की धर्म में आस्था
कुरुक्षेत्र के रण में , कृष्ण ने महाभारत रचा
सुन गीता का उपदेश, अर्जुन ने खींची प्रत्यंचा
आज भी अधर्ममय हो गया है सकल राष्ट्र
हर ओर रावण, कंस , दुर्योधन और ध्रतराष्ट्र
नित बढ़ता जा रहा है, अधर्म का अत्याचार
क्यों चुप हैं हम, आओ मिलकर करें विचार
कब तक करेंगे राम-कृष्ण, अर्जुन की प्रतीक्षा
जागो,उठो और खींचो अब ........प्रत्यंचा

बुधवार, 12 अक्टूबर 2011

मैं और जिन्दगी ........!!!!!!!


















जिन्दगी ने मुझसे कहा- तू चाहता क्या है ?






मैंने कहा- तू ही मेरी चाहत , तुझसे दिल लगाना चाहता हूँ






तू औरो को आजमाती है, मैं तुझे आज़माना चाहता हूँ






जिन्दगी- इतनी आसान नही मैं, जितना तुम समझ बैठे






मेरी चाहत में न जाने कितने , मौत को गले लगा बैठे






मैं- गर तू आसन होती , तो मेरी चाहत न होती






मौत तो मिलेगी ही, उससे कहाँ राहत होती ?






मौत तो मंजिल है , मगर सफ़र तो तू है






दिल्लगी न समझना , ये इश्क की खुशबू है






जिन्दगी- मेरे सफ़र में, सब इश्क जाओगे भूल






कोई खुशबु नही यहाँ , न ही कोई है फूल






मैं- होगा ये तुम्हारा नजरिया ,पर तुम बहुत खूबसूरत हो






लाख समझाओ मुझे, पर तुम मेरी जरुरत हो






जिन्दगी- मैं असीम हूँ, जैसे कोई सागर






मिल भी गयी , तो करोगे क्या मुझे पाकर






मैं-तुम्हारे सहारे, बहुत से नज़रिए बदलने है






बहुतो की जिन्दगी में , "चन्दन " के फूल खिलने है !

सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

चिर ऋणी रहूँगा गुरुवर का ....











परम पूज्य स्वामी श्री सुकान्तानंद जी के श्री चरणों में सादर समर्पित !


जब चारो तरफ था अँधेरा, माँ थी मुझसे दूर

जिन्दगी उलझनों से घिरी, मैं था मजबूर

राह कोई सूझी नही, प्यास मेरी बुझी नही

जीवन में थी एक कमी, और आँखों में थी नमी

किस डगर पर चालू , कैसे जीवन में संभालू

मन में थे कई विचार , पर मैं न था तैयार

तब किसी ने हाथ थमा , जिन्दगी को दिया अमलीजामा

अब तक था मैं गुमराह , फिर मिली मुझे सही राह

दूर हटी परेशानियों की छाया , जीवन में उजाला आया

भटकते- भटकते पहुंचा जहाँ , अहसान है उस दर का

आगे अब शब्द नही, चिर ऋणी रहूँगा गुरुवर का


आपका चरण सेवक

मुकेश पाण्डेय "चन्दन "

मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011

बूँद











कौन कहता है ,कि बूँद छोटी होती है

वो अपने अन्दर सागर समेटे होती है


जीवन की शुरुआत बूँद से ही होती है


बूँद के बिना कहाँ आँख रोती है ?


बूँद से बादल, बादल से वर्षा होती है


वर्षा की बूँद, बीजों में जीवन बोती है


करते श्रम तो पसीने की बून्द निकलती है


बूँद जीवन का सत्य लेकर मचलती है


छोटी होकर बड़ा होना , बूँद सिखलाती है



संगठन ही जीवन है, ये बूँद दिखलाती है





- मुकेश पाण्डेय 'चन्दन'

गुरुवार, 22 सितंबर 2011

‎32 रुपये प्रतिदिन खर्च करने वाला गरीब नहीं:

‎32 रुपये प्रतिदिन खर्च करने वाला गरीब नहीं:

योजना आयोग आजतक ब्यूरो नई दिल्ली, 21 सितम्बर 2011 क्या दिल्ली में सिर्फ 32 रुपये रोजाना की कमाई पर कोई गुजर-बसर कर सकता है?

सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को दाखिल हलफनामे में योजना आयोग ने गरीबी रेखा की जो नई परिभाषा तय की है, उसमें कहा गया है कि दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर या चेन्नई में अगर चार लोगों का परिवार महीने में 3860 रुपये से ज्यादा खर्च करता है तो उसे गरीब नहीं माना जाएगा.
...
चार लोगों पर 3860 रुपये का मतलब है एक आदमी पर 32 रुपये प्रतिदिन. इसी तरह योजना आयोग के मुताबिक अगर ग्रामीण क्षेत्रों में कोई शख्स हर रोज 26 रुपये से ज्यादा खर्च करता है तो वो गरीब नहीं कहलाएगा. उसे गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों के लिए चलने वाली सरकारी योजना का लाभ नहीं मिलेगा.

सब्जी की कीमतों में आग लगी है. दूध के दाम लगातार बढ़ रहे हैं. खाने पीने की चीजों के भाव आसमान छू रहे हैं. महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ कर रख दी है. लेकिन योजना आयोग की दलील है कि जो हर रोज 32 रुपए खर्च कर सकता है वो गरीब नहीं कहा जाएगा.

चलिए जानते हैं कि योजना आय़ोग ने सुप्रीम कोर्ट में जो हलफनामा दायर किया है उसमें गरीबी की परिभाषा क्या दी गई हैः

1. शहरों में जो 965 रुपए प्रति माह खर्च करते हैं. यानी शहरों में जो 32 रुपए प्रति दिन खर्च करते हैं वो गरीब नहीं है.

2. गांवों में जो 781 रुपए प्रति माह खर्च करते हैं. यानी गांवों में जो 26 रु प्रति दिन खर्च करते हैं वो गरीब नहीं हैं.

3. मेट्रो में रहने वाला 4 लोगों का परिवार अगर प्रति माह 3860 खर्च करता है. वो गरीब नहीं हैं.

योजना आयोग ने गरीब और गरीबी की परिभाषा बदल दी.

अब इस बदली हुई परिभाषा के अनुसार शहरों में 32 और गांवों में 26 रुपए खर्च करने वाले लोग कल्याणकारी योजनाओं का लाभ नहीं उठा सकते. तेंदुलकर कमेटी का हवाला देते हुए योजना आयोग ने कहा कि आप गरीब नहीं है

अगर चावल या गेहूं पर हर रोज 5 रु खर्च करते हैं.

अब देखिए 5 रुपये में आपको मिलेगा क्या. दिल्ली में चावल औसतन 22 रुपए किलो है और गेहूं औसतन 12 रु किलो. तो 5 रुपए में मिलेगा 136 ग्राम चावल (3 रु का) और 166 ग्राम गेहूं (2 रुपए). योजना आयोग कहता है आप गरीब नहीं हैं.

अगर हर रोज 1.80 रु सब्जियों पर खर्च करते हैं. अब देखिए 1.80 रुपए में मिलेगा क्या 180 ग्राम आलू या 90 ग्राम प्याज या 90 ग्राम टमाटर या 180 ग्रा लौकी. योजना आयोग कहता है कि आप गरीब नहीं हैं.

अगर हर रोज दाल पर 1 रुपये खर्च कर सकते हैं. अब जरा देखिए 1 रुपये में कितनी दाल मिलेगी. दिल्ली में दाल की औसत दर 50 रु प्रति किलो है. यानी 1 रुपये में सिर्फ 20 ग्राम दाल मिलेगी. योजना आयोग कहता हैं. आप गरीब नहीं हैं

अगर दूध पर हर रोज 2.30 रुपये खर्च करते हैं. अब देखिए 2.30 रु में कितना दूध मिलेगा. दूध की कीमत है 34 रुपये प्रति लीटर. लिहाजा 2.30 रुपये में सिर्फ 67 मिली दूध मिल सकता है. योजना आयोग कहता है. आप गरीब नहीं है

अगर एलपीजी पर हर महीने 112 रुपए खर्च करते हैं. अब ब्लैक मार्केट में एलपीजी दरों के मुताबिक 112 रुपए में करीब दो किलो एलपीजी ही मिल सकती है.

योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को आंकड़े तो बता दिया. लेकिन जरा सोचिए क्या इस बढ़ती महंगाई में 32 रुपये प्रतिदिन में कोई अपना गुजारा कर सकता है.

जरा सोचिए क्या महज 3860 रुपये में चार लोगों का परिवार अपनी जिंदगी काट सकता है. आप ये सवाल योजना आयोग को छोड़कर किसी से भी पूछिए जवाब मिलेगा आंकड़ों से जिंदगी नहीं चलती.See More

बुधवार, 14 सितंबर 2011

न चुनर बची न चिंदी : यही तो है आज की हिंदी



आप सभी को हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाये !



आज ब्लोगिंग जगत में बहुत से लोग हिंदी के बारे में लिखेंगे , बहुत से कार्यक्रम होंगे , हिंदी की बेइज्जती और सम्मान भी होगा । और कल फिर हिंदी भुला दी जाएगी । आज हिंदी इस दशा पर आंसू भी नही निकलते !!!!



ब्लोगिंग जगत में मैं समीर लाल 'समीर" (उड़नतश्तरी ) जी का ह्रदय से आजीवन आभारी रहूँगा , क्योंकि अगर वो न होते तो शायद इस ब्लॉग को आप न पढ़ पाते । कनाडा जैसे आंग्लभाषी राष्ट्र में रहकर हिंदी की इतनी सेवा करना समीर जी जैसा कोई बिरला (सीमेंट नही ) ही कर सकता है । सर्वप्रथम समीर जी सारे हिंदी ब्लोगेर्स की और से मैं आपको कोटि कोटि नमन करता हूँ । तत्पश्चात बाकि हिंदी सेवी लोगो को भी मेरा नमन !!!



मेरे मन में आज की हिंदी को लेकर कुछ ख्याल आ रहे है .............






न चुनर बची न चिंदी !



वाह रे ! मेरे देश की राजभाषा हिंदी



अपने ही देश में तू परायी है



हिंदी बोलने में क्यों हमें शर्म आई है



तकनीक में भी अंग्रेजी नही है मज़बूरी



तो भैया , क्यों है हिंदी से दुरी



जिसने हमें पाला पोसा
उसी का हमने तोडा भरोसा



थोड़े पढ़ लिख कर बन गये अंग्रेज



हिंदी टूटी खटिया और विदेशी को सुन्दर सेज



राम भरोसे अपनी भाषा



हिन्दलिश में होती , नयी परिभाषा



अरे कपूतो ! अब तो आँखे खोलो



घर में ही सही , अपनी भाषा तो बोलो



शनिवार, 10 सितंबर 2011

बस सफलता से एक कदम दूर ............


नमस्कार मित्रो ,
एक खुशखबरी है !
हाल ही में मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित राज्य सेवा परीक्षा २००९ की मुख्य परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ है । और ख़ुशी की बात ये है , कि इस परीक्षा में आपका ये परिचित इस परीक्षा में सफल हो गया है । और ५ दिसंबर से साक्षात्कार शुरू हो रहे है ..........मतलब मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग में अंतिम चयन में बस एक कदम दूर हूँ । आपकी दुआओं के साथ इस सफलता की उम्मीद में आपका ही ...........

गुरुवार, 1 सितंबर 2011

रविवार, 14 अगस्त 2011

एक अनोखा रक्षाबंधन: इतिहास के झरोखे से



सर्वप्रथम आप सभी को प्यार के बंधन के पावन पर्व रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाये !!



मित्रो , हमारे देश के महान नेताओ ने देश की आज़ादी के समय जीवन के हर पक्ष को आज़ादी के एक मौके की तरह से इस्तेमाल किया , चाहे वो त्यौहार ही क्यों न हो !



इसी तरह जब १९०५ में लार्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन प्रस्तावित किया तो , गुरुदेव रवींद्र नाथ टेगौर (तब उन्हें गाँधी जी ने गुरुदेव की उपाधि नही दी थी ) ने रक्षाबंधन पर्व का एक सार्थक प्रयोग किया था। चूँकि अंग्रेजो का बंग भंग करने का मकसद फूट डालो राज करो की नीति के अंतर्गत हिन्दू मुसलमानों में फूट डालना था । लेकिन हमारे महान नेताओ ने उनके मंसूबो पर पानी फेर दिया । जहाँ कृष्ण कुमार मित्र ने स्वदेशी आन्दोलन चलाकर जहाँ अंग्रेजो की नाक में दम कर दिया था , वहीँ रवींद्र नाथ टेगौर ने रक्षा बंधन को अनोखे तरीके से मनाया । पुरे बंगाल में हिन्दुओ ने अपने मुस्लिम भाईयो को राखी बांध कर अंग्रेजो के मुंह पर जोरदार तमाचा मारा । इसी रक्षा बंधन के दौरान ही रवींद्र नाथ टेगौर ने अपना विख्यात गीत आमार सोनार बांगला लिखा था , जो आगे चलकर बंगलादेश का राष्ट्रगान बना । (रवींद्र नाथ टेगौर विश्व के एकमात्र व्यक्ति है जिन्होंने दो राष्ट्रों के राष्ट्रगान की रचना की है ।)



इस तरह एक रक्षाबंधन वो भी था , जब हिन्दू मुसलमान एक हो गये थे । आज के दौर में इसकी प्रासंगिकता और बढ़ गयी है .....



ये बंधन तो ...........प्यार का बंधन ..

सोमवार, 1 अगस्त 2011

भारत रत्न : न जाने कितने जतन

अटल बिहारी वाजपेयी


वर्गीज कुरियन




डॉ एम० एस० स्वामीनाथन





नमस्कार ,








आज देश में सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न देने की मांग बड़े जोर शोर से उठ रही है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह ने सचिन से पहले हाकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को देने की बात कही है। जबकि मेरा मानना है , कि खिलाडियों को जब उनके खेल में योगदान के लिए पहले से ही राजीव गाँधी खेल रत्न दिया जाता है , तो उन्हें भारत रत्न दिए जाने कि तुक कहाँ तक सही है ? मेरे ख्याल से भारत रत्न सिर्फ उन्ही लोगो को दिया जाना चाहिए जिन्होंने देश के लिए बहुत कुछ किया हो , न कि किसी क्षेत्र विशेष में दिए गये योगदान के आधार पर।




आज भी देश में बहुत से ऐसे लोग है , जिन्होंने देश के लिए सचिन तेंदुलकर से ज्यादा योगदान दिया है। जैसे हरित क्रांति के सूत्रधार डॉ एम्० एस० स्वामीनाथन, श्वेत क्रांति के सूत्रधार डॉ वर्गीज कुरियन तथा ९८ परमाणु परिक्षण के पुरोधा प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी और ऐसे नमो कि सूचि बहुत लम्बी है जिन्होंने देश के लिए सचिन कि तुलना में कहीं ज्यादा योगदान दिया है । मैं सचिन को भारत रत्न दिए जाने का विरोधी नही हू मगर उससे पहले इन लोगो को भी भारत रत्न बनने का हक पहले है।








भारत रत्न जहाँ देश का सर्वोच्च सम्मान है , वही कुछ कमी सी लगती है , जैसे यह सम्मान प्रत्येक वर्ष नही प्रदान किया जाता है । क्या भारत भूमि में रत्नों कि इतनी कमी है , कि हम हर साल एक भारत रत्न नही दे सकते है ?








दूसरी कमी ये महसूस होती है कि इस सम्मान में अभी तक राजनेताओ का ही बोलबाला रहा है , तो क्या देश की सेवा केवल राजनेता ही करते है । नोबल पुरुस्कार कि तर्ज़ पर भारत रत्न को भी मरणोपरांत दिया जाना बंद कर देना चाहिए । क्योंकि लौह पुरुष सरदार पटेल को उनके मरने के पचास साल बाद भारत रत्न दिया जाना किस तरह से उनका सही सम्मान लगता है ।








भारत रत्न के बारे में मेरा एक और सुझाव है कि इसके लिए एक उच्च स्तरीय समिति बनायीं जनि चाहिए जिसमे अलग अलग क्षेत्रो के विशेषज्ञ हो और उनके द्वारा तैयार कि गयी सूचि पर जनता से राय जाननी चाहिए ।

सोमवार, 25 जुलाई 2011

सावन की भूलभुलैया.........



जय हो ,







बहुत सालों बाद आज सावन जमकर बरसा



जाने कब से इसके लिए था मन तरसा



रिम झिम सी फुहारों में



भीगी भीगी सी बहारो में



फिर भीगा सा कोई याद आया



मन में फिर वो सावन समाया



फिर दिल भीग गया उसकी यादो में



खुशबु सावन की बसी उसके वादों में



आज फिर घटाओं ने उसकी याद दिलाई



आज फिर से वही खुमारी छाई



जम के बरसो सावन



आज फिर याद आया साजन !

orchha gatha

बेतवा की जुबानी : ओरछा की कहानी (भाग-1)

एक रात को मैं मध्य प्रदेश की गंगा कही जाने वाली पावन नदी बेतवा के तट पर ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा हुआ. बेतवा की लहरों के एक तरफ महान ब...